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उद्योग पर्व · अध्याय 51

भीमसेन से धृतराष्ट्र का भय

सञ्जय से पाण्डवों के सहायकों का वर्णन सुनकर धृतराष्ट्र स्वीकार करते हैं कि उन्हें सबसे अधिक भय भीमसेन से है। वे बचपन से भीम के बल और स्वभाव को याद करते हैं, बिना शस्त्र के उसके द्वारा जरासन्ध के वध का स्मरण करते हैं, और कल्पना करते हैं कि वह लोहे की गदा से हाथियों, रथों और मनुष्यों को कुचल रहा है। वे मानते हैं कि भीष्म, द्रोण और कृप कर्तव्यवश उनकी ओर से लड़ेंगे और क्षत्रिय की तरह प्राण देंगे, पर उन्हें केवल कौरवों का विनाश दिखता है; वे इसका दोष जुए और पुत्र के लोभ पर डालते हैं, और निराश होकर कहते हैं कि दैव मनुष्य से बलवान् है, इसलिए वे अपने पुत्रों को रोक नहीं पाते।

अध्याय 50अध्याय-सूचीअध्याय 52

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (5.51.1)

सर्व एते महोत्साहा ये त्वया परिकीर्तिताः । एकतस्त्वेव ते सर्वे समेता भीम एकतः ॥

sarva ete mahotsāhā ye tvayā parikīrtitāḥ | ekatastveva te sarve sametā bhīma ekataḥ

तुमने जिन महान् उत्साही योद्धाओं का वर्णन किया है, वे सब मिलकर एक ओर हैं और अकेला भीम दूसरी ओर।

श्लोक 2 (5.51.2)

भीमसेनाद्धि मे भूयो भयं सञ्जायते महत् । क्रुद्धादमर्षणात्तात व्याघ्रादिव महारुरोः ॥

bhīmasenāddhi me bhūyo bhayaṃ sañjāyate mahat | kruddhādamarṣaṇāttāta vyāghrādiva mahāruroḥ

क्योंकि हे तात, मुझे भीमसेन से ही सबसे बड़ा भय होता है — उस क्रुद्ध और असहनशील भीम से — जैसे बड़े रुरु मृग को बाघ से।

श्लोक 3 (5.51.3)

जागर्मि रात्रयः सर्वा दीर्घमुष्णं च निःश्वसन् । भीतो वृकोदरात्तात सिंहात्पशुरिवापरः ॥

jāgarmi rātrayaḥ sarvā dīrghamuṣṇaṃ ca niḥśvasan | bhīto vṛkodarāttāta siṃhātpaśurivāparaḥ

हे तात, मैं सारी-सारी रात जागता रहता हूँ और लम्बी, गरम साँसें भरता हूँ; वृकोदर से मैं वैसे ही डरा रहता हूँ जैसे कोई दूसरा पशु सिंह से।

श्लोक 4 (5.51.4)

न हि तस्य महाबाहोः शक्रप्रतिमतेजसः । सैन्येऽस्मिन्प्रतिपश्यामि य एनं विषहेद्युधि ॥

na hi tasya mahābāhoḥ śakrapratimatejasaḥ | sainye'sminpratipaśyāmi ya enaṃ viṣahedyudhi

इन्द्र के समान तेजस्वी उस महाबाहु का युद्ध में सामना कर सके, ऐसा कोई मुझे इस सेना में दिखाई नहीं देता।

श्लोक 5 (5.51.5)

अमर्षणश्च कौन्तेयो दृढवैरश्च पाण्डवः । अनर्महासी सोन्मादस्तिर्यक्प्रेक्षी महास्वनः ॥

amarṣaṇaśca kaunteyo dṛḍhavairaśca pāṇḍavaḥ | anarmahāsī sonmādastiryakprekṣī mahāsvanaḥ

कुन्तीपुत्र असहनशील है और वह पाण्डव अपने वैर पर दृढ़ रहता है; वह बिना परिहास के हँसता है, उन्मत्त-सा है, तिरछी दृष्टि से देखता है और गरजकर बोलता है।

श्लोक 6 (5.51.6)

महावेगो महोत्साहो महाबाहुर्महाबलः । मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनान्तं करिष्यति ॥

mahāvego mahotsāho mahābāhurmahābalaḥ | mandānāṃ mama putrāṇāṃ yuddhenāntaṃ kariṣyati

महान् वेग, महान् उत्साह, विशाल भुजाओं और महान् बल वाला वह मेरे मूर्ख पुत्रों का युद्ध में अन्त कर देगा।

श्लोक 7 (5.51.7)

उरुग्राहगृहीतानां गदां बिभ्रद्वृकोदरः । कुरूणामृषभो युद्धे दण्डपाणिरिवान्तकः ॥

urugrāhagṛhītānāṃ gadāṃ bibhradvṛkodaraḥ | kurūṇāmṛṣabho yuddhe daṇḍapāṇirivāntakaḥ

बड़े हठ की पकड़ में जकड़े हुए लोगों के लिए कुरुश्रेष्ठ वृकोदर युद्ध में गदा धारण किए हुए दण्डधारी यमराज के समान होगा।

श्लोक 8 (5.51.8)

अष्टाश्रिमायसीं घोरां गदां काञ्चनभूषणाम् । मनसाहं प्रपश्यामि ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ॥

aṣṭāśrimāyasīṃ ghorāṃ gadāṃ kāñcanabhūṣaṇām | manasāhaṃ prapaśyāmi brahmadaṇḍamivodyatam

मैं मन की आँखों से उसकी आठ धारों वाली, सोने से सजी भयंकर लोहे की गदा को ब्रह्मदण्ड की भाँति उठी हुई देखता हूँ।

श्लोक 9 (5.51.9)

यथा मृगाणां यूथेषु सिंहो जातबलश्चरेत् । मामकेषु तथा भीमो बलेषु विचरिष्यति ॥

yathā mṛgāṇāṃ yūtheṣu siṃho jātabalaścaret | māmakeṣu tathā bhīmo baleṣu vicariṣyati

जैसे पूर्ण बल पाया हुआ सिंह मृगों के झुंडों में विचरता है, वैसे ही भीम मेरी सेनाओं में विचरेगा।

श्लोक 10 (5.51.10)

सर्वेषां मम पुत्राणां स एकः क्रूरविक्रमः । बह्वाशी विप्रतीपश्च बाल्येऽपि रभसः सदा ॥

sarveṣāṃ mama putrāṇāṃ sa ekaḥ krūravikramaḥ | bahvāśī vipratīpaśca bālye'pi rabhasaḥ sadā

मेरे सब पुत्रों में अकेला वही क्रूर पराक्रम वाला था; बचपन में भी वह बहुत खाने वाला, सबके विरुद्ध चलने वाला और सदा उग्र वेग वाला था।

श्लोक 11 (5.51.11)

उद्वेपते मे हृदयं ये मे दुर्योधनादयः । बाल्येऽपि तेन युध्यन्तो वारणेनेव मर्दिताः ॥

udvepate me hṛdayaṃ ye me duryodhanādayaḥ | bālye'pi tena yudhyanto vāraṇeneva marditāḥ

मेरा हृदय काँप उठता है — मेरे दुर्योधन आदि पुत्र बचपन में भी उससे लड़ते हुए ऐसे कुचले गए थे जैसे हाथी से।

श्लोक 12 (5.51.12)

तस्य वीर्येण संक्लिष्टा नित्यमेव सुता मम । स एव हेतुर्भेदस्य भीमो भीमपराक्रमः ॥

tasya vīryeṇa saṃkliṣṭā nityameva sutā mama | sa eva heturbhedasya bhīmo bhīmaparākramaḥ

उसके बल से मेरे पुत्र सदा ही पीड़ित रहे हैं; भयंकर पराक्रमी भीम ही इस फूट का कारण है।

श्लोक 13 (5.51.13)

ग्रसमानमनीकानि नरवारणवाजिनाम् । पश्यामीवाग्रतो भीमं क्रोधमूर्छितमाहवे ॥

grasamānamanīkāni naravāraṇavājinām | paśyāmīvāgrato bhīmaṃ krodhamūrchitamāhave

मुझे ऐसा दिखाई देता है मानो युद्ध में क्रोध से उन्मत्त भीम मेरे सामने मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों की सेनाओं को निगलता जा रहा है।

श्लोक 14 (5.51.14)

अस्त्रे द्रोणार्जुनसमं वायुवेगसमं जवे । महेश्वरसमं क्रोधे को हन्याद्भीममाहवे ॥

astre droṇārjunasamaṃ vāyuvegasamaṃ jave | maheśvarasamaṃ krodhe ko hanyādbhīmamāhave

अस्त्रों में द्रोण और अर्जुन के समान, वेग में वायु के समान, क्रोध में महेश्वर के समान — युद्ध में भीम को कौन मार सकता है?

श्लोक 15 (5.51.15)

सञ्जयाचक्ष्व मे शूरं भीमसेनममर्षणम् । अतिलाभं तु मन्येऽहं यत्तेन रिपुघातिना । तदैव न हताः सर्वे पुत्रा मम मनस्विना ॥

sañjayācakṣva me śūraṃ bhīmasenamamarṣaṇam | atilābhaṃ tu manye'haṃ yattena ripughātinā | tadaiva na hatāḥ sarve putrā mama manasvinā

सञ्जय, मुझे उस शूर और असहनशील भीमसेन के विषय में बताओ। मैं इसे बड़ा लाभ ही मानता हूँ कि शत्रुओं का संहार करने वाले उस मनस्वी ने तभी मेरे सब पुत्रों को मार नहीं डाला।

श्लोक 16 (5.51.16)

येन भीमबला यक्षा राक्षसाश्च पुरा हताः । कथं तस्य रणे वेगं मानुषः प्रसहिष्यति ॥

yena bhīmabalā yakṣā rākṣasāśca purā hatāḥ | kathaṃ tasya raṇe vegaṃ mānuṣaḥ prasahiṣyati

जिसने पहले भयंकर बल वाले यक्षों और राक्षसों को मार डाला, युद्ध में उसके वेग को कोई मनुष्य कैसे सह सकेगा?

श्लोक 17 (5.51.17)

न स जातु वशे तस्थौ मम बाल्येऽपि सञ्जय । किं पुनर्मम दुष्पुत्रैः क्लिष्टः संप्रति पाण्डवः ॥

na sa jātu vaśe tasthau mama bālye'pi sañjaya | kiṃ punarmama duṣputraiḥ kliṣṭaḥ saṃprati pāṇḍavaḥ

सञ्जय, बचपन में भी वह कभी मेरे वश में नहीं रहा; फिर अब मेरे दुष्ट पुत्रों से सताया हुआ वह पाण्डव भला कैसे रहेगा?

श्लोक 18 (5.51.18)

निष्ठुरो रोषणोऽत्यर्थं भज्येतापि न संनमेत् । तिर्यक्प्रेक्षी संहतभ्रूः कथं शाम्येद्वृकोदरः ॥

niṣṭhuro roṣaṇo'tyarthaṃ bhajyetāpi na saṃnamet | tiryakprekṣī saṃhatabhrūḥ kathaṃ śāmyedvṛkodaraḥ

वह कठोर और अत्यन्त क्रोधी है; टूट भले जाए, झुकेगा नहीं। तिरछी दृष्टि और तनी हुई भौंहों वाला वृकोदर कैसे शान्त होगा?

श्लोक 19 (5.51.19)

शूरस्तथाऽप्रतिबलो गौरस्ताल इवोन्नतः । प्रमाणतो भीमसेनः प्रादेशेनाधिकोऽर्जुनात् ॥

śūrastathā'pratibalo gaurastāla ivonnataḥ | pramāṇato bhīmasenaḥ prādeśenādhiko'rjunāt

वह शूर, अतुलनीय बलशाली, गोरे रंग का और ताड़ के वृक्ष की तरह ऊँचा है; डील-डौल में भीमसेन अर्जुन से एक बित्ता बड़ा है।

श्लोक 20 (5.51.20)

जवेन वाजिनोऽत्येति बलेनात्येति कुञ्जरान् । अव्यक्तजल्पी मध्वक्षो मध्यमः पाण्डवो बली ॥

javena vājino'tyeti balenātyeti kuñjarān | avyaktajalpī madhvakṣo madhyamaḥ pāṇḍavo balī

वेग में वह घोड़ों से आगे निकल जाता है और बल में हाथियों से बढ़कर है; अस्पष्ट बोलने वाला, मधु-जैसी पीली आँखों वाला वह मझला पाण्डव बड़ा बलवान् है।

श्लोक 21 (5.51.21)

इति बाल्ये श्रुतः पूर्वं मया व्यासमुखात्पुरा । रूपतो वीर्यतश्चैव याथातथ्येन पाण्डवः ॥

iti bālye śrutaḥ pūrvaṃ mayā vyāsamukhātpurā | rūpato vīryataścaiva yāthātathyena pāṇḍavaḥ

यह सब मैंने बहुत पहले, उसके बचपन में ही, व्यास जी के मुख से सुना था — रूप और पराक्रम में वह पाण्डव ठीक वैसा ही है।

श्लोक 22 (5.51.22)

आयसेन स दण्डेन रथान्नागान्नरान्हयान् । हनिष्यति रणे क्रुद्धो रौद्रः क्रूरपराक्रमः ॥

āyasena sa daṇḍena rathānnāgānnarānhayān | haniṣyati raṇe kruddho raudraḥ krūraparākramaḥ

क्रुद्ध, रौद्र और क्रूर पराक्रम वाला वह अपने लोहे के दण्ड से युद्ध में रथों, हाथियों, मनुष्यों और घोड़ों का संहार करेगा।

श्लोक 23 (5.51.23)

अमर्षी नित्यसंरब्धो भीमः प्रहरतां वरः । मया तात प्रतीपानि कुर्वन्पूर्वं विमानितः ॥

amarṣī nityasaṃrabdho bhīmaḥ praharatāṃ varaḥ | mayā tāta pratīpāni kurvanpūrvaṃ vimānitaḥ

असहनशील और सदा क्रोध से भरा भीम प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ है; और हे तात, पहले जब वह मेरे प्रतिकूल आचरण करता था, तब मैंने उसका अपमान किया था।

श्लोक 24 (5.51.24)

निष्कर्णामायसीं स्थूलां सुपार्श्वां काञ्चनीं गदाम् । शतघ्नीं शतनिर्ह्रादां कथं शक्ष्यन्ति मे सुताः ॥

niṣkarṇāmāyasīṃ sthūlāṃ supārśvāṃ kāñcanīṃ gadām | śataghnīṃ śatanirhrādāṃ kathaṃ śakṣyanti me sutāḥ

उसकी सीधी, भारी, सुडौल और सोने से मढ़ी लोहे की गदा, जो सैकड़ों को मारती है और सैकड़ों गर्जनाएँ करती है — मेरे पुत्र उसे कैसे सह सकेंगे?

श्लोक 25 (5.51.25)

अपारमप्लवागाधं समुद्रं शरवेधनम् । भीमसेनमयं दुर्गं तात मन्दास्तितीर्षवः ॥

apāramaplavāgādhaṃ samudraṃ śaravedhanam | bhīmasenamayaṃ durgaṃ tāta mandāstitīrṣavaḥ

भीमसेन ऐसा समुद्र है जिसका न पार है, न नौका और न थाह, जो बाणों से बींध डालता है — ऐसा दुर्गम दुर्ग; और हे तात, ये मूर्ख उसे पार करना चाहते हैं।

श्लोक 26 (5.51.26)

क्रोशतो मे न शृण्वन्ति बालाः पण्डितमानिनः । विषमं न हि मन्यन्ते प्रपातं मधुदर्शिनः ॥

krośato me na śṛṇvanti bālāḥ paṇḍitamāninaḥ | viṣamaṃ na hi manyante prapātaṃ madhudarśinaḥ

मैं पुकार-पुकार कर कहता हूँ, पर अपने को पण्डित मानने वाले ये नासमझ नहीं सुनते; केवल मधु देखने वाले वे उस भयानक खाई पर ध्यान ही नहीं देते।

श्लोक 27 (5.51.27)

संयुगे ये गमिष्यन्ति नररूपेण मृत्युना । नियतं चोदिता धात्रा सिंहेनेव महामृगाः ॥

saṃyuge ye gamiṣyanti nararūpeṇa mṛtyunā | niyataṃ coditā dhātrā siṃheneva mahāmṛgāḥ

जो मनुष्य-रूप धारी मृत्यु से युद्ध करने जाएँगे, वे निश्चय ही विधाता की प्रेरणा से वैसे ही जा रहे हैं जैसे बड़े पशु सिंह की ओर।

श्लोक 28 (5.51.28)

शैक्यां तात चतुष्किष्कुं षडश्रिममितौजसम् । प्रहितां दुःखसंस्पर्शां कथं शक्ष्यन्ति मे सुताः ॥

śaikyāṃ tāta catuṣkiṣkuṃ ṣaḍaśrimamitaujasam | prahitāṃ duḥkhasaṃsparśāṃ kathaṃ śakṣyanti me sutāḥ

हे तात, छींके में रखी उसकी चार हाथ लम्बी, छह धारों वाली, अपार बल वाली गदा, जो फेंके जाने पर छूते ही असह्य पीड़ा देती है — मेरे पुत्र उसे कैसे सह सकेंगे?

श्लोक 29 (5.51.29)

गदां भ्रामयतस्तस्य भिन्दतो हस्तिमस्तकान् । सृक्किणी लेलिहानस्य बाष्पमुत्सृजतो मुहुः ॥

gadāṃ bhrāmayatastasya bhindato hastimastakān | sṛkkiṇī lelihānasya bāṣpamutsṛjato muhuḥ

जब वह गदा घुमाता हुआ हाथियों के मस्तक फोड़ेगा, होंठों के कोने चाटेगा और बार-बार गरम साँस छोड़ेगा,

श्लोक 30 (5.51.30)

उद्दिश्य नागान्पततः कुर्वतो भैरवान्रवान् । प्रतीपं पततो मत्तान्कुञ्जरान्प्रति गर्जतः ॥

uddiśya nāgānpatataḥ kurvato bhairavānravān | pratīpaṃ patato mattānkuñjarānprati garjataḥ

जब वह भयंकर गर्जना करता हुआ हाथियों पर टूट पड़ेगा, सामने से मतवाले हाथियों पर झपटेगा और उनके सामने दहाड़ेगा,

श्लोक 31 (5.51.31)

विगाह्य रथमार्गेषु वरानुद्दिश्य निघ्नतः । अग्नेः प्रज्वलितस्येव अपि मुच्येत मे प्रजा ॥

vigāhya rathamārgeṣu varānuddiśya nighnataḥ | agneḥ prajvalitasyeva api mucyeta me prajā

जब वह रथों के मार्गों में घुसकर श्रेष्ठ योद्धाओं को चुन-चुनकर मारेगा — तब क्या मेरी प्रजा उससे वैसे ही बच सकेगी जैसे धधकती आग से?

श्लोक 32 (5.51.32)

वीथीं कुर्वन्महाबाहुर्द्रावयन्मम वाहिनीम् । नृत्यन्निव गदापाणिर्युगान्तं दर्शयिष्यति ॥

vīthīṃ kurvanmahābāhurdrāvayanmama vāhinīm | nṛtyanniva gadāpāṇiryugāntaṃ darśayiṣyati

मेरी सेना में रास्ता बनाता और उसे भगाता हुआ वह महाबाहु, हाथ में गदा लिए मानो नाचता हुआ, युग के अन्त का दृश्य दिखा देगा।

श्लोक 33 (5.51.33)

प्रभिन्न इव मातङ्गः प्रभञ्जन्पुष्पितान्द्रुमान् । प्रवेक्ष्यति रणे सेनां पुत्राणां मे वृकोदरः ॥

prabhinna iva mātaṅgaḥ prabhañjanpuṣpitāndrumān | pravekṣyati raṇe senāṃ putrāṇāṃ me vṛkodaraḥ

जैसे मदमत्त हाथी फूलों से लदे पेड़ों को तोड़ता हुआ घुसता है, वैसे ही वृकोदर युद्ध में मेरे पुत्रों की सेना में घुसेगा।

श्लोक 34 (5.51.34)

कुर्वन्रथान्विपुरुषान्विसारथिहयध्वजान् । आरुजन्पुरुषव्याघ्रो रथिनः सादिनस्तथा ॥

kurvanrathānvipuruṣānvisārathihayadhvajān | ārujanpuruṣavyāghro rathinaḥ sādinastathā

रथों को योद्धाओं, सारथियों, घोड़ों और ध्वजाओं से रहित करता हुआ वह पुरुषसिंह रथियों और घुड़सवारों को भी कुचल डालेगा।

श्लोक 35 (5.51.35)

गङ्गावेग इवानूपांस्तीरजान्विविधान्द्रुमान् । प्रभङ्क्ष्यति रणे सेनां पुत्राणां मम सञ्जय ॥

gaṅgāvega ivānūpāṃstīrajānvividhāndrumān | prabhaṅkṣyati raṇe senāṃ putrāṇāṃ mama sañjaya

सञ्जय, जैसे गंगा का वेग जलभरे तटों पर उगे अनेक प्रकार के वृक्षों को तोड़ डालता है, वैसे ही वह युद्ध में मेरे पुत्रों की सेना को तोड़ डालेगा।

श्लोक 36 (5.51.36)

वधं नूनं गमिष्यन्ति भीमसेनभयार्दिताः । मम पुत्राश्च भृत्याश्च राजानश्चैव सञ्जय ॥

vadhaṃ nūnaṃ gamiṣyanti bhīmasenabhayārditāḥ | mama putrāśca bhṛtyāśca rājānaścaiva sañjaya

सञ्जय, भीमसेन के भय से पीड़ित मेरे पुत्र, सेवक और राजा निश्चय ही मृत्यु को प्राप्त होंगे।

श्लोक 37 (5.51.37)

येन राजा महावीर्यः प्रविश्यान्तःपुरं पुरा । वासुदेवसहायेन जरासन्धो निपातितः ॥

yena rājā mahāvīryaḥ praviśyāntaḥpuraṃ purā | vāsudevasahāyena jarāsandho nipātitaḥ

उसी ने पहले वासुदेव की सहायता से अन्तःपुर में घुसकर महापराक्रमी राजा जरासन्ध को मार गिराया था।

श्लोक 38 (5.51.38)

कृत्स्नेयं पृथिवी देवी जरासन्धेन धीमता । मागधेन्द्रेण बलिना वशे कृत्वा प्रतापिता ॥

kṛtsneyaṃ pṛthivī devī jarāsandhena dhīmatā | māgadhendreṇa balinā vaśe kṛtvā pratāpitā

बुद्धिमान् और बलवान् मगधराज जरासन्ध ने इस समूची देवी पृथ्वी को अपने वश में करके अपने प्रताप से तपा रखा था।

श्लोक 39 (5.51.39)

भीष्मप्रतापात्कुरवो नयेनान्धकवृष्णयः । यन्न तस्य वशे जग्मुः केवलं दैवमेव तत् ॥

bhīṣmapratāpātkuravo nayenāndhakavṛṣṇayaḥ | yanna tasya vaśe jagmuḥ kevalaṃ daivameva tat

भीष्म के प्रताप से कौरव और अपनी नीति से अन्धक-वृष्णि उसके वश में नहीं आए — यह केवल दैव का ही काम था।

श्लोक 40 (5.51.40)

स गत्वा पाण्डुपुत्रेण तरसा बाहुशालिना । अनायुधेन वीरेण निहतः किं ततोऽधिकम् ॥

sa gatvā pāṇḍuputreṇa tarasā bāhuśālinā | anāyudhena vīreṇa nihataḥ kiṃ tato'dhikam

पर पाण्डुपुत्र ने वहाँ जाकर, बिना किसी शस्त्र के, केवल अपनी भुजाओं के बल से उस वीर को मार डाला — इससे बढ़कर और क्या होगा?

श्लोक 41 (5.51.41)

दीर्घकालसमासक्तं विषमाशीविषो यथा । स मोक्ष्यति रणे तेजः पुत्रेषु मम सञ्जय ॥

dīrghakālasamāsaktaṃ viṣamāśīviṣo yathā | sa mokṣyati raṇe tejaḥ putreṣu mama sañjaya

सञ्जय, जैसे विषधर सर्प लम्बे समय से संचित विष छोड़ता है, वैसे ही वह युद्ध में मेरे पुत्रों पर अपना तेज छोड़ेगा।

श्लोक 42 (5.51.42)

महेन्द्र इव वज्रेण दानवान्देवसत्तमः । भीमसेनो गदापाणिः सूदयिष्यति मे सुतान् ॥

mahendra iva vajreṇa dānavāndevasattamaḥ | bhīmaseno gadāpāṇiḥ sūdayiṣyati me sutān

जैसे देवश्रेष्ठ महेन्द्र ने वज्र से दानवों का संहार किया, वैसे ही गदाधारी भीमसेन मेरे पुत्रों का संहार करेगा।

श्लोक 43 (5.51.43)

अविषह्यमनावार्यं तीव्रवेगपराक्रमम् । पश्यामीवातिताम्राक्षमापतन्तं वृकोदरम् ॥

aviṣahyamanāvāryaṃ tīvravegaparākramam | paśyāmīvātitāmrākṣamāpatantaṃ vṛkodaram

मुझे ऐसा दिखाई देता है मानो असहनीय, अनिवार्य, तीव्र वेग और पराक्रम वाला, अत्यन्त लाल आँखों वाला वृकोदर हम पर झपटा आ रहा है।

श्लोक 44 (5.51.44)

अगदस्याप्यधनुषो विरथस्य विवर्मणः । बाहुभ्यां युध्यमानस्य कस्तिष्ठेदग्रतः पुमान् ॥

agadasyāpyadhanuṣo virathasya vivarmaṇaḥ | bāhubhyāṃ yudhyamānasya kastiṣṭhedagrataḥ pumān

गदा, धनुष, रथ और कवच के बिना केवल भुजाओं से लड़ते हुए भी उसके सामने कौन पुरुष टिक सकेगा?

श्लोक 45 (5.51.45)

भीष्मो द्रोणश्च विप्रोऽयं कृपः शारद्वतस्तथा । जानन्त्येते यथैवाहं वीर्यज्ञस्तस्य धीमतः ॥

bhīṣmo droṇaśca vipro'yaṃ kṛpaḥ śāradvatastathā | jānantyete yathaivāhaṃ vīryajñastasya dhīmataḥ

भीष्म, ये ब्राह्मण द्रोण और शरद्वान् के पुत्र कृप — ये सब भी उस बुद्धिमान् के पराक्रम को वैसे ही जानते हैं जैसे मैं।

श्लोक 46 (5.51.46)

आर्यव्रतं तु जानन्तः सङ्गरान्तं विधित्सवः । सेनामुखेषु स्थास्यन्ति मामकानां नरर्षभाः ॥

āryavrataṃ tu jānantaḥ saṅgarāntaṃ vidhitsavaḥ | senāmukheṣu sthāsyanti māmakānāṃ nararṣabhāḥ

फिर भी आर्य-व्रत को जानते हुए और युद्ध को अन्त तक ले जाने का संकल्प किए हुए ये नरश्रेष्ठ मेरी सेनाओं के अग्रभाग में खड़े रहेंगे।

श्लोक 47 (5.51.47)

बलीयः सर्वतो दिष्टं पुरुषस्य विशेषतः । पश्यन्नपि जयं तेषां न नियच्छामि यत्सुतान् ॥

balīyaḥ sarvato diṣṭaṃ puruṣasya viśeṣataḥ | paśyannapi jayaṃ teṣāṃ na niyacchāmi yatsutān

दैव सबसे बलवान् है, विशेषकर मनुष्य के लिए; तभी तो उनकी विजय देखते हुए भी मैं अपने पुत्रों को नहीं रोकता।

श्लोक 48 (5.51.48)

ते पुराणं महेष्वासा मार्गमैन्द्रं समास्थिताः । त्यक्ष्यन्ति तुमुले प्राणान्रक्षन्तः पार्थिवं यशः ॥

te purāṇaṃ maheṣvāsā mārgamaindraṃ samāsthitāḥ | tyakṣyanti tumule prāṇānrakṣantaḥ pārthivaṃ yaśaḥ

वे महाधनुर्धर इन्द्र के प्राचीन मार्ग पर चलते हुए, राजोचित यश की रक्षा करते हुए, घमासान युद्ध में अपने प्राण त्याग देंगे।

श्लोक 49 (5.51.49)

यथैषां मामकास्तात तथैषां पाण्डवा अपि । पौत्रा भीष्मस्य शिष्याश्च द्रोणस्य च कृपस्य च ॥

yathaiṣāṃ māmakāstāta tathaiṣāṃ pāṇḍavā api | pautrā bhīṣmasya śiṣyāśca droṇasya ca kṛpasya ca

हे तात, जैसे मेरे पुत्र इनके अपने हैं, वैसे ही पाण्डव भी — वे भी भीष्म के पौत्र और द्रोण तथा कृप के शिष्य हैं।

श्लोक 50 (5.51.50)

ये त्वस्मदाश्रयं किञ्चिद्दत्तमिष्टं च सञ्जय । तस्यापचितिमार्यत्वात्कर्तारः स्थविरास्त्रयः ॥

ye tvasmadāśrayaṃ kiñciddattamiṣṭaṃ ca sañjaya | tasyāpacitimāryatvātkartāraḥ sthavirāstrayaḥ

सञ्जय, जिन्हें हमारा आश्रय मिला है — उन्हें जो कुछ दिया गया और जो सम्मान मिला — वे तीनों वृद्ध अपनी श्रेष्ठता के कारण उसका बदला अवश्य चुकाएँगे।

श्लोक 51 (5.51.51)

आददानस्य शस्त्रं हि क्षत्रधर्मं परीप्सतः । निधनं क्षत्रियस्याजौ वरमेवाहुरुत्तमम् ॥

ādadānasya śastraṃ hi kṣatradharmaṃ parīpsataḥ | nidhanaṃ kṣatriyasyājau varamevāhuruttamam

जिसने शस्त्र उठा लिया है और जो क्षत्रिय-धर्म का पालन करना चाहता है, उस क्षत्रिय के लिए युद्ध में मृत्यु को ही सबसे उत्तम कहा गया है।

श्लोक 52 (5.51.52)

स वै शोचामि सर्वान्वै ये युयुत्सन्ति पाण्डवैः । विक्रुष्टं विदुरेणादौ तदेतद्भयमागतम् ॥

sa vai śocāmi sarvānvai ye yuyutsanti pāṇḍavaiḥ | vikruṣṭaṃ vidureṇādau tadetadbhayamāgatam

इसलिए मुझे उन सबके लिए शोक है जो पाण्डवों से युद्ध करना चाहते हैं। विदुर ने आरम्भ में ही जिसकी पुकार की थी, वही भय अब आ पहुँचा है।

श्लोक 53 (5.51.53)

न तु मन्ये विघाताय ज्ञानं दुःखस्य सञ्जय । भवत्यतिबलं ह्येतज्ज्ञानस्याप्युपघातकम् ॥

na tu manye vighātāya jñānaṃ duḥkhasya sañjaya | bhavatyatibalaṃ hyetajjñānasyāpyupaghātakam

सञ्जय, मैं नहीं मानता कि ज्ञान दुःख का नाश कर देता है; बल्कि यह दुःख अत्यन्त प्रबल होकर ज्ञान का भी नाश कर देता है।

श्लोक 54 (5.51.54)

ऋषयो ह्यपि निर्मुक्ताः पश्यन्तो लोकसङ्ग्रहान् । सुखैर्भवन्ति सुखिनस्तथा दुःखेन दुःखिताः ॥

ṛṣayo hyapi nirmuktāḥ paśyanto lokasaṅgrahān | sukhairbhavanti sukhinastathā duḥkhena duḥkhitāḥ

मुक्त हुए ऋषि भी, संसार के व्यवहार को देखते हुए, सुखों से सुखी और दुःख से दुःखी होते हैं।

श्लोक 55 (5.51.55)

किं पुनर्मोहमासक्तस्तत्र तत्र सहस्रधा । पुत्रेषु राज्यदारेषु पौत्रेष्वपि च बन्धुषु ॥

kiṃ punarmohamāsaktastatra tatra sahasradhā | putreṣu rājyadāreṣu pautreṣvapi ca bandhuṣu

फिर उसकी क्या बात जो मोह में डूबा हुआ हज़ारों प्रकार से जहाँ-तहाँ आसक्त है — पुत्रों में, राज्य और स्त्रियों में, पौत्रों और बन्धुओं में!

श्लोक 56 (5.51.56)

संशये तु महत्यस्मिन्किं नु मे क्षममुत्तरम् । विनाशं ह्येव पश्यामि कुरूणामनुचिन्तयन् ॥

saṃśaye tu mahatyasminkiṃ nu me kṣamamuttaram | vināśaṃ hyeva paśyāmi kurūṇāmanucintayan

इस महान् संकट में मेरे लिए कौन-सा उत्तर उचित है? बार-बार सोचने पर मुझे कौरवों का विनाश ही दिखाई देता है।

श्लोक 57 (5.51.57)

द्यूतप्रमुखमाभाति कुरूणां व्यसनं महत् । मन्देनैश्वर्यकामेन लोभात्पापमिदं कृतम् ॥

dyūtapramukhamābhāti kurūṇāṃ vyasanaṃ mahat | mandenaiśvaryakāmena lobhātpāpamidaṃ kṛtam

कौरवों की इस महान् विपत्ति का आरम्भ जुए से ही हुआ जान पड़ता है; ऐश्वर्य के इच्छुक उस मूर्ख ने लोभवश यह पाप किया।

श्लोक 58 (5.51.58)

मन्ये पर्यायधर्मोऽयं कालस्यात्यन्तगामिनः । चक्रे प्रधिरिवासक्तो नास्य शक्यं पलायितुम् ॥

manye paryāyadharmo'yaṃ kālasyātyantagāminaḥ | cakre pradhirivāsakto nāsya śakyaṃ palāyitum

मैं समझता हूँ कि यह अनन्त गति वाले काल का उलट-फेर करने वाला नियम है; पहिये से जुड़ी नेमि की तरह इससे भागना सम्भव नहीं।

श्लोक 59 (5.51.59)

किं नु कुर्यां कथं कुर्यां क्व नु गच्छामि सञ्जय । एते नश्यन्ति कुरवो मन्दाः कालवशं गताः ॥

kiṃ nu kuryāṃ kathaṃ kuryāṃ kva nu gacchāmi sañjaya | ete naśyanti kuravo mandāḥ kālavaśaṃ gatāḥ

सञ्जय, मैं क्या करूँ? कैसे करूँ? कहाँ जाऊँ? ये मूर्ख कौरव काल के वश में होकर नष्ट हो रहे हैं।

श्लोक 60 (5.51.60)

अवशोऽहं तदा तात पुत्राणां निहते शते । श्रोष्यामि निनदं स्त्रीणां कथं मां मरणं स्पृशेत् ॥

avaśo'haṃ tadā tāta putrāṇāṃ nihate śate | śroṣyāmi ninadaṃ strīṇāṃ kathaṃ māṃ maraṇaṃ spṛśet

हे तात, जब मेरे सौ पुत्र मारे जाएँगे, तब मैं विवश होकर स्त्रियों का विलाप सुनूँगा। हाय, किसी प्रकार मृत्यु ही मुझे आ ले!

श्लोक 61 (5.51.61)

यथा निदाघे ज्वलनः समिद्धो । दहेत्कक्षं वायुना चोद्यमानः । गदाहस्तः पाण्डवो वै तथैव । हन्ता मदीयान्सहितोऽर्जुनेन ॥

yathā nidāghe jvalanaḥ samiddho | dahetkakṣaṃ vāyunā codyamānaḥ | gadāhastaḥ pāṇḍavo vai tathaiva | hantā madīyānsahito'rjunena

जैसे ग्रीष्म ऋतु में धधकती आग वायु से प्रेरित होकर सूखे घास-फूस को जला डालती है, वैसे ही गदाधारी पाण्डव अर्जुन के साथ मिलकर मेरे लोगों का संहार करेगा।

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