उद्योग पर्व · अध्याय 52
अर्जुन की अजेयता पर धृतराष्ट्र का विलाप
भीम के बाद धृतराष्ट्र अर्जुन की चर्चा करते हैं। वे कहते हैं कि उनकी सेना में कोई गाण्डीवधारी का सामना नहीं कर सकता; द्रोण और कर्ण भी उसके विरुद्ध जाएँ तो परिणाम संदिग्ध रहेगा और विजय उनकी नहीं होगी, क्योंकि कर्ण दयालु और असावधान है तथा द्रोण वृद्ध और स्वयं अर्जुन के गुरु हैं। खाण्डव वन का स्मरण करते हुए, जहाँ अर्जुन ने देवताओं को जीता था, और एक ही रथ पर दोनों कृष्णों तथा गाण्डीव के मेल को याद करते हुए वे कल्पना करते हैं कि अर्जुन के बाण कौरव सेना को दावानल की तरह जला रहे हैं, और भरतवंश के विनाश को आता देखते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (5.52.1)
यस्य वै नानृता वाचः कदाचिदनुशुश्रुम । त्रैलोक्यमपि तस्य स्याद्योद्धा यस्य धनञ्जयः ॥
yasya vai nānṛtā vācaḥ kadācidanuśuśruma | trailokyamapi tasya syādyoddhā yasya dhanañjayaḥ
जिसके वचन हमने कभी झूठे नहीं सुने, और जिसका योद्धा धनञ्जय है, उसके तो तीनों लोक भी हो सकते हैं।
श्लोक 2 (5.52.2)
तस्यैव च न पश्यामि युधि गाण्डीवधन्वनः । अनिशं चिन्तयानोऽपि यः प्रतीयाद्रथेन तम् ॥
tasyaiva ca na paśyāmi yudhi gāṇḍīvadhanvanaḥ | aniśaṃ cintayāno'pi yaḥ pratīyādrathena tam
रात-दिन सोचते रहने पर भी मुझे ऐसा कोई नहीं दिखता जो युद्ध में रथ लेकर उस गाण्डीवधारी का सामना कर सके।
श्लोक 3 (5.52.3)
अस्यतः कर्णिनालीकान्मार्गणान्हृदयच्छिदः । प्रत्येता न समः कश्चिद्युधि गाण्डीवधन्वनः ॥
asyataḥ karṇinālīkānmārgaṇānhṛdayacchidaḥ | pratyetā na samaḥ kaścidyudhi gāṇḍīvadhanvanaḥ
जब गाण्डीवधारी हृदय को चीर देने वाले कर्णी और नालीक बाण छोड़ता है, तब युद्ध में उसकी बराबरी का कोई नहीं जो उसका सामना कर सके।
श्लोक 4 (5.52.4)
द्रोणाकर्णौ प्रतीयातां यदि वीरौ नरर्षभौ । कृतास्त्रौ बलिनां श्रेष्ठौ समरेष्वपराजितौ ॥
droṇākarṇau pratīyātāṃ yadi vīrau nararṣabhau | kṛtāstrau balināṃ śreṣṭhau samareṣvaparājitau
यदि द्रोण और कर्ण उसका सामना करें — ये दोनों वीर नरश्रेष्ठ, अस्त्रविद्या में निपुण, बलवानों में श्रेष्ठ और युद्ध में कभी न हारने वाले —
श्लोक 5 (5.52.5)
महान्स्यात्संशयो लोके न त्वस्ति विजयो मम । घृणी कर्णः प्रमादी च आचार्यः स्थविरो गुरुः ॥
mahānsyātsaṃśayo loke na tvasti vijayo mama | ghṛṇī karṇaḥ pramādī ca ācāryaḥ sthaviro guruḥ
तो संसार में बड़ा संशय होगा, पर विजय मेरी नहीं होगी; क्योंकि कर्ण दयालु और असावधान है, और आचार्य वृद्ध हैं तथा (अर्जुन के) गुरु हैं।
श्लोक 6 (5.52.6)
समर्थो बलवान्पार्थो दृढधन्वा जितक्लमः । भवेत्सुतुमुलं युद्धं सर्वशोऽप्यपराजयः ॥
samartho balavānpārtho dṛḍhadhanvā jitaklamaḥ | bhavetsutumulaṃ yuddhaṃ sarvaśo'pyaparājayaḥ
पार्थ समर्थ, बलवान्, दृढ़ धनुष वाला और थकान को जीत चुका है। तब अत्यन्त घमासान युद्ध होगा, जिसमें किसी भी पक्ष की हार न होगी।
श्लोक 7 (5.52.7)
सर्वे ह्यस्त्रविदः शूराः सर्वे प्राप्ता महद्यशः । अपि सर्वामरैश्वर्यं त्यजेयुर्न पुनर्जयम् ॥
sarve hyastravidaḥ śūrāḥ sarve prāptā mahadyaśaḥ | api sarvāmaraiśvaryaṃ tyajeyurna punarjayam
वे सभी शूर और अस्त्रों के ज्ञाता हैं, सभी ने बड़ा यश पाया है; वे देवताओं का सारा ऐश्वर्य भले छोड़ दें, पर विजय नहीं छोड़ेंगे।
श्लोक 8 (5.52.8)
वधे नूनं भवेच्छान्तिस्तयोर्वा फाल्गुनस्य च । न तु हन्तार्जुनस्यास्ति जेता चास्य न विद्यते ॥
vadhe nūnaṃ bhavecchāntistayorvā phālgunasya ca | na tu hantārjunasyāsti jetā cāsya na vidyate
निश्चय ही शान्ति तभी होगी जब या तो वे दोनों मारे जाएँ या फाल्गुन। पर अर्जुन को मारने वाला कोई नहीं, और न उसे जीतने वाला ही कोई है।
श्लोक 9 (5.52.9)
मन्युस्तस्य कथं शाम्येन्मन्दान्प्रति य उत्थितः । अन्येऽप्यस्त्राणि जानन्ति जीयन्ते च जयन्ति च । एकान्तविजयस्त्वेव श्रूयते फाल्गुनस्य ह ॥
manyustasya kathaṃ śāmyenmandānprati ya utthitaḥ | anye'pyastrāṇi jānanti jīyante ca jayanti ca | ekāntavijayastveva śrūyate phālgunasya ha
इन मूर्खों के विरुद्ध भड़का हुआ उसका क्रोध कैसे शान्त होगा? दूसरे भी अस्त्र जानते हैं — वे कभी हारते हैं, कभी जीतते हैं; पर फाल्गुन की तो केवल विजय ही सुनी जाती है।
श्लोक 10 (5.52.10)
त्रयस्त्रिंशत्समाहूय खाण्डवेऽग्निमतर्पयत् । जिगाय च सुरान्सर्वान्नास्य विद्मः पराजयम् ॥
trayastriṃśatsamāhūya khāṇḍave'gnimatarpayat | jigāya ca surānsarvānnāsya vidmaḥ parājayam
तैंतीस देवताओं को ललकारकर उसने खाण्डव वन में अग्नि को तृप्त किया और सब देवताओं को जीत लिया; उसकी किसी पराजय को हम नहीं जानते।
श्लोक 11 (5.52.11)
यस्य यन्ता हृषीकेशः शीलवृत्तसमो युधि । ध्रुवस्तस्य जयस्तात यथेन्द्रस्य जयस्तथा ॥
yasya yantā hṛṣīkeśaḥ śīlavṛttasamo yudhi | dhruvastasya jayastāta yathendrasya jayastathā
हे तात, जिसका सारथि शील और आचरण में उसी के समान हृषीकेश है, उसकी विजय वैसे ही निश्चित है जैसे इन्द्र की।
श्लोक 12 (5.52.12)
कृष्णावेकरथे यत्तावधिज्यं गाण्डिवं धनुः । युगपत्त्रीणि तेजांसि समेतान्यनुशुश्रुम ॥
kṛṣṇāvekarathe yattāvadhijyaṃ gāṇḍivaṃ dhanuḥ | yugapattrīṇi tejāṃsi sametānyanuśuśruma
हमने सुना है कि एक ही रथ पर तैयार बैठे दोनों कृष्ण और डोरी चढ़ा गाण्डीव धनुष — ये तीनों तेज एक साथ मिल गए हैं।
श्लोक 13 (5.52.13)
नैवास्ति नो धनुस्तादृङ्न योद्धा न च सारथिः । तच्च मन्दा न जानन्ति दुर्योधनवशानुगाः ॥
naivāsti no dhanustādṛṅna yoddhā na ca sārathiḥ | tacca mandā na jānanti duryodhanavaśānugāḥ
हमारे पास न वैसा धनुष है, न वैसा योद्धा, न वैसा सारथि; और दुर्योधन के वश में चलने वाले मूर्ख यह नहीं समझते।
श्लोक 14 (5.52.14)
शेषयेदशनिर्दीप्तो विपतन्मूर्ध्नि सञ्जय । न तु शेषं शरास्तात कुर्युरस्ताः किरीटिना ॥
śeṣayedaśanirdīpto vipatanmūrdhni sañjaya | na tu śeṣaṃ śarāstāta kuryurastāḥ kirīṭinā
सञ्जय, सिर पर गिरता हुआ जलता वज्र भी कुछ शेष छोड़ सकता है; पर हे तात, किरीटी के छोड़े बाण कुछ भी शेष नहीं छोड़ते।
श्लोक 15 (5.52.15)
अपि चास्यन्निवाभाति निघ्नन्निव धनञ्जयः । उद्धरन्निव कायेभ्यः शिरांसि शरवृष्टिभिः ॥
api cāsyannivābhāti nighnanniva dhanañjayaḥ | uddharanniva kāyebhyaḥ śirāṃsi śaravṛṣṭibhiḥ
मुझे अभी से ऐसा लगता है मानो धनञ्जय बाण छोड़ रहा है, संहार कर रहा है और बाणों की वर्षा से शरीरों से सिर उड़ा रहा है।
श्लोक 16 (5.52.16)
अपि बाणमयं तेजः प्रदीप्तमिव सर्वतः । गाण्डीवोत्थं दहेताजौ पुत्राणां मम वाहिनीम् ॥
api bāṇamayaṃ tejaḥ pradīptamiva sarvataḥ | gāṇḍīvotthaṃ dahetājau putrāṇāṃ mama vāhinīm
क्या गाण्डीव से उठा, चारों ओर धधकता बाणों का वह तेज युद्ध में मेरे पुत्रों की सेना को जला न डालेगा?
श्लोक 17 (5.52.17)
अपि सा रथघोषेण भयार्ता सव्यसाचिनः । वित्रस्ता बहुधा सेना भारती प्रतिभाति मे ॥
api sā rathaghoṣeṇa bhayārtā savyasācinaḥ | vitrastā bahudhā senā bhāratī pratibhāti me
सव्यसाची के रथ की गड़गड़ाहट से भयभीत, त्रस्त और अनेक दिशाओं में बिखरी हुई भारती सेना मुझे अभी से दिखाई देती है।
श्लोक 18 (5.52.18)
यथा कक्षं महानग्निः प्रदहेत्सर्वतश्चरन् । महार्चिरनिलोद्धूतस्तद्वद्धक्ष्यति मामकान् ॥
yathā kakṣaṃ mahānagniḥ pradahetsarvataścaran | mahārciraniloddhūtastadvaddhakṣyati māmakān
जैसे सब ओर फैलती, वायु से भड़की ऊँची लपटों वाली बड़ी आग सूखे घास-फूस को जला डालती है, वैसे ही वह मेरे लोगों को जला डालेगा।
श्लोक 19 (5.52.19)
यदोद्वमन्निशितान्बाणसङ्घां- । स्तानाततायी समरे किरीटी । सृष्टोऽन्तकः सर्वहरो विधात्रा । यथा भवेत्तद्वदपारणीयः ॥
yadodvamanniśitānbāṇasaṅghāṃ- | stānātatāyī samare kirīṭī | sṛṣṭo'ntakaḥ sarvaharo vidhātrā | yathā bhavettadvadapāraṇīyaḥ
जब धनुष ताने हुए किरीटी युद्ध में तीखे बाणों के वे समूह उगलेगा, तब वह विधाता द्वारा रचे सर्वसंहारक अन्तक के समान अजेय होगा।
श्लोक 20 (5.52.20)
यदा ह्यभीक्ष्णं सुबहून्प्रकारान् । श्रोतास्मि तानावसथे कुरूणाम् । तेषां समन्ताच्च तथा रणाग्रे । क्षयः किलायं भरतानुपैति ॥
yadā hyabhīkṣṇaṃ subahūnprakārān | śrotāsmi tānāvasathe kurūṇām | teṣāṃ samantācca tathā raṇāgre | kṣayaḥ kilāyaṃ bharatānupaiti
जब मैं कौरवों के भवन में बार-बार उन अनेक प्रकार की घटनाओं को सुनूँगा जो उनके चारों ओर और युद्ध के मोर्चे पर घटेंगी — तब निश्चय ही यह विनाश भरतवंशियों पर आ पहुँचेगा।