उद्योग पर्व · अध्याय 53
धृतराष्ट्र का शान्ति का आग्रह
धृतराष्ट्र पाण्डव पक्ष की शक्ति का लेखा-जोखा करते हैं — भाइयों जितने ही समर्पित अनुयायी, सञ्जय द्वारा गिनाए गए सहयोगी राज्य, लोकों को वश में कर सकने वाले श्रीकृष्ण, अर्जुन से शिक्षित सात्यकि और क्रूरकर्मा धृष्टद्युम्न। वे युधिष्ठिर के गुणों की प्रशंसा करते हैं और उसे ऐसी अग्नि बताते हैं जिसमें कोई समझदार नहीं कूदेगा। फिर कौरवों से कहते हैं कि युद्ध न करना ही उचित है, क्योंकि युद्ध से पूरे कुल का नाश होगा; यदि वे सहमत हों तो वे शान्ति का प्रयत्न करेंगे, क्योंकि युधिष्ठिर इस अधर्म का दोष केवल उन्हीं पर डालता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (5.53.1)
यथैव पाण्डवाः सर्वे पराक्रान्ता जिगीषवः । तथैवाभिसरास्तेषां त्यक्तात्मानो जये धृताः ॥
yathaiva pāṇḍavāḥ sarve parākrāntā jigīṣavaḥ | tathaivābhisarāsteṣāṃ tyaktātmāno jaye dhṛtāḥ
जैसे सभी पाण्डव पराक्रमी और विजय के इच्छुक हैं, वैसे ही उनके अनुयायी भी प्राणों का मोह छोड़कर विजय के लिए दृढ़ हैं।
श्लोक 2 (5.53.2)
त्वमेव हि पराक्रान्तानाचक्षीथाः परान्मम । पाञ्चालान्केकयान्मत्स्यान्मागधान्वत्सभूमिपान् ॥
tvameva hi parākrāntānācakṣīthāḥ parānmama | pāñcālānkekayānmatsyānmāgadhānvatsabhūmipān
तुमने ही तो मुझे मेरे पराक्रमी शत्रुओं का वर्णन सुनाया है — पाञ्चाल, केकय, मत्स्य, मागध और वत्सदेश के राजा।
श्लोक 3 (5.53.3)
यश्च सेन्द्रानिमाँल्लोकानिच्छन्कुर्याद्वशे बली । स स्रष्टा जगतः कृष्णः पाण्डवानां जये धृतः ॥
yaśca sendrānimām̐llokānicchankuryādvaśe balī | sa sraṣṭā jagataḥ kṛṣṇaḥ pāṇḍavānāṃ jaye dhṛtaḥ
और जगत् के स्रष्टा वे बलवान् श्रीकृष्ण, जो चाहें तो इन्द्र सहित इन सब लोकों को अपने वश में कर लें, पाण्डवों की विजय के लिए दृढ़ हैं।
श्लोक 4 (5.53.4)
समस्तामर्जुनाद्विद्यां सात्यकिः क्षिप्रमाप्तवान् । शैनेयः समरे स्थाता बीजवत्प्रवपञ्शरान् ॥
samastāmarjunādvidyāṃ sātyakiḥ kṣipramāptavān | śaineyaḥ samare sthātā bījavatpravapañśarān
सात्यकि ने अर्जुन से सम्पूर्ण अस्त्रविद्या शीघ्र ही सीख ली; वह शिनि का पौत्र युद्ध में बीज की तरह बाण बोता हुआ डटा रहेगा।
श्लोक 5 (5.53.5)
धृष्टद्युम्नश्च पाञ्चाल्यः क्रूरकर्मा महारथः । मामकेषु रणं कर्ता बलेषु परमास्त्रवित् ॥
dhṛṣṭadyumnaśca pāñcālyaḥ krūrakarmā mahārathaḥ | māmakeṣu raṇaṃ kartā baleṣu paramāstravit
और पाञ्चाल धृष्टद्युम्न, क्रूर कर्म करने वाला महारथी और श्रेष्ठ अस्त्रों का ज्ञाता, मेरी सेनाओं से युद्ध करेगा।
श्लोक 6 (5.53.6)
युधिष्ठिरस्य च क्रोधादर्जुनस्य च विक्रमात् । यमाभ्यां भीमसेनाच्च भयं मे तात जायते ॥
yudhiṣṭhirasya ca krodhādarjunasya ca vikramāt | yamābhyāṃ bhīmasenācca bhayaṃ me tāta jāyate
हे तात, मुझे युधिष्ठिर के क्रोध से, अर्जुन के पराक्रम से, और नकुल-सहदेव तथा भीमसेन से भय होता है।
श्लोक 7 (5.53.7)
अमानुषं मनुष्येन्द्रैर्जालं विततमन्तरा । न मे सैन्यास्तरिष्यन्ति ततः क्रोशामि सञ्जय ॥
amānuṣaṃ manuṣyendrairjālaṃ vitatamantarā | na me sainyāstariṣyanti tataḥ krośāmi sañjaya
वे नरेन्द्र बीच में एक अलौकिक जाल फैला देंगे और मेरी सेनाएँ उसे पार नहीं कर पाएँगी — इसीलिए, सञ्जय, मैं विलाप करता हूँ।
श्लोक 8 (5.53.8)
दर्शनीयो मनस्वी च लक्ष्मीवान्ब्रह्मवर्चसी । मेधावी सुकृतप्रज्ञो धर्मात्मा पाण्डुनन्दनः ॥
darśanīyo manasvī ca lakṣmīvānbrahmavarcasī | medhāvī sukṛtaprajño dharmātmā pāṇḍunandanaḥ
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर दर्शनीय, मनस्वी, लक्ष्मीवान्, ब्रह्मतेज से युक्त, मेधावी, सुशिक्षित बुद्धि वाला और धर्मात्मा है।
श्लोक 9 (5.53.9)
मित्रामात्यैः सुसंपन्नः संपन्नो युद्धयोजकैः । भ्रातृभिः श्वशुरैर्वीरैरुपपन्नो महारथैः ॥
mitrāmātyaiḥ susaṃpannaḥ saṃpanno yuddhayojakaiḥ | bhrātṛbhiḥ śvaśurairvīrairupapanno mahārathaiḥ
वह मित्रों और मन्त्रियों से भली-भाँति सम्पन्न है, युद्ध का संचालन करने वालों से युक्त है, और महारथी भाइयों तथा वीर श्वशुरों से घिरा हुआ है।
श्लोक 10 (5.53.10)
धृत्या च पुरुषव्याघ्रो नैभृत्येन च पाण्डवः । अनृशंसो वदान्यश्च ह्रीमान्सत्यपराक्रमः ॥
dhṛtyā ca puruṣavyāghro naibhṛtyena ca pāṇḍavaḥ | anṛśaṃso vadānyaśca hrīmānsatyaparākramaḥ
वह पुरुषसिंह पाण्डव धैर्य में और मन्त्रणा को गुप्त रखने में भी बढ़ा-चढ़ा है; वह दयालु, उदार, लज्जाशील और सच्चे पराक्रम वाला है।
श्लोक 11 (5.53.11)
बहुश्रुतः कृतात्मा च वृद्धसेवी जितेन्द्रियः । तं सर्वगुणसंपन्नं समिद्धमिव पावकम् ॥
bahuśrutaḥ kṛtātmā ca vṛddhasevī jitendriyaḥ | taṃ sarvaguṇasaṃpannaṃ samiddhamiva pāvakam
वह बहुश्रुत, संयमी, वृद्धों की सेवा करने वाला और जितेन्द्रिय है — ऐसा सर्वगुणसम्पन्न, प्रज्वलित अग्नि के समान।
श्लोक 12 (5.53.12)
तपन्तमभि को मन्दः पतिष्यति पतङ्गवत् । पाण्डवाग्निमनावार्यं मुमूर्षुर्नष्टचेतनः ॥
tapantamabhi ko mandaḥ patiṣyati pataṅgavat | pāṇḍavāgnimanāvāryaṃ mumūrṣurnaṣṭacetanaḥ
तपती हुई उस अनिवार्य पाण्डव-अग्नि पर कौन मूर्ख, मरने की इच्छा वाला और विवेकहीन होकर, पतंगे की भाँति गिरेगा?
श्लोक 13 (5.53.13)
तनुरुच्चः शिखी राजा मिथ्योपचरितो मया । मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनान्तं करिष्यति ॥
tanuruccaḥ śikhī rājā mithyopacarito mayā | mandānāṃ mama putrāṇāṃ yuddhenāntaṃ kariṣyati
वह छरहरा, ऊँचा, शिखाधारी राजा, जिसके साथ मैंने छल का व्यवहार किया है, मेरे मूर्ख पुत्रों का युद्ध में अन्त कर देगा।
श्लोक 14 (5.53.14)
तैरयुद्धं साधु मन्ये कुरवस्तन्निबोधत । युद्धे विनाशः कृत्स्नस्य कुलस्य भविता ध्रुवम् ॥
tairayuddhaṃ sādhu manye kuravastannibodhata | yuddhe vināśaḥ kṛtsnasya kulasya bhavitā dhruvam
हे कौरवो, यह समझ लो — मैं उनसे युद्ध न करना ही ठीक समझता हूँ; युद्ध में सारे कुल का विनाश निश्चित है।
श्लोक 15 (5.53.15)
एषा मे परमा बुद्धिर्यया शाम्यति मे मनः । यदि त्वयुद्धमिष्टं वो वयं शान्त्यै यतामहे ॥
eṣā me paramā buddhiryayā śāmyati me manaḥ | yadi tvayuddhamiṣṭaṃ vo vayaṃ śāntyai yatāmahe
यही मेरा दृढ़ विचार है, जिससे मेरा मन शान्त होता है; यदि तुम्हें युद्ध न करना प्रिय हो, तो हम शान्ति के लिए प्रयत्न करें।
श्लोक 16 (5.53.16)
न तु नः क्लिश्यमानानामुपेक्षेत युधिष्ठिरः । जुगुप्सति ह्यधर्मेण मामेवोद्दिश्य कारणम् ॥
na tu naḥ kliśyamānānāmupekṣeta yudhiṣṭhiraḥ | jugupsati hyadharmeṇa māmevoddiśya kāraṇam
हम कष्ट में हों तो युधिष्ठिर हमारी उपेक्षा नहीं करेगा; वह इस अधर्म की निन्दा करता है और इसका कारण केवल मुझे ही मानता है।