उद्योग पर्व · अध्याय 54
सञ्जय द्वारा धृतराष्ट्र की भर्त्सना
सञ्जय मानते हैं कि गाण्डीव क्षत्रियों के विनाश का कारण बनेगा, पर पूछते हैं कि अर्जुन की वास्तविकता जानने वाला राजा पुत्र के वश में कैसे आ गया। वे धृतराष्ट्र को याद दिलाते हैं कि आरम्भ से उन्होंने ही पाण्डवों के साथ अन्याय किया — जुए के समय वे बालक की तरह मुस्कराते रहे, पाण्डवों पर बरसाए गए कटु वचनों की उपेक्षा की, उनकी जीती हुई पृथ्वी को अपना किया हुआ माना, और भूल गए कि गन्धर्वों से उनके पुत्रों को अर्जुन ने ही छुड़ाया था। अर्जुन, गाण्डीव, श्रीकृष्ण और वानर-ध्वज को वहन करने वाले रथ का वर्णन करते हुए वे चेताते हैं कि सहयोगी जातियाँ पाण्डवों की ओर चली गई हैं, पापी दुर्योधन को हर उपाय से रोकना चाहिए, और राजा का विलाप — जिसके विषय में जुए के समय वे और विदुर पहले ही सावधान कर चुके थे — अब निरर्थक है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (5.54.1)
एवमेतन्महाराज यथावदसि भारत । युद्धे विनाशः क्षत्रस्य गाण्डीवेन प्रदृश्यते ॥
evametanmahārāja yathāvadasi bhārata | yuddhe vināśaḥ kṣatrasya gāṇḍīvena pradṛśyate
महाराज, हे भारत, आप जैसा कहते हैं वैसा ही है; गाण्डीव के द्वारा क्षत्रियों का विनाश स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
श्लोक 2 (5.54.2)
इदं तु नाभिजानामि तव धीरस्य नित्यशः । यत्पुत्रवशमागच्छेस्तत्त्वज्ञः सव्यसाचिनः ॥
idaṃ tu nābhijānāmi tava dhīrasya nityaśaḥ | yatputravaśamāgacchestattvajñaḥ savyasācinaḥ
पर यह मैं नहीं समझ पाता कि सदा धीर रहने वाले और सव्यसाची की वास्तविकता जानने वाले आप अपने पुत्र के वश में कैसे आ गए।
श्लोक 3 (5.54.3)
नैष कालो महाराज तव शश्वत्कृतागसः । त्वया ह्येवादितः पार्था निकृता भरतर्षभ ॥
naiṣa kālo mahārāja tava śaśvatkṛtāgasaḥ | tvayā hyevāditaḥ pārthā nikṛtā bharatarṣabha
महाराज, बार-बार अपराध करने वाले आपके लिए यह उसका समय नहीं है; हे भरतश्रेष्ठ, आरम्भ से आपने ही तो पार्थों के साथ छल किया।
श्लोक 4 (5.54.4)
पिता श्रेष्ठः सुहृद्यश्च सम्यक्प्रणिहितात्मवान् । आस्थेयं हि हितं तेन न द्रोग्धा गुरुरुच्यते ॥
pitā śreṣṭhaḥ suhṛdyaśca samyakpraṇihitātmavān | āstheyaṃ hi hitaṃ tena na drogdhā gururucyate
जो पिता श्रेष्ठ, हितैषी और उचित रूप से सधे हुए मन वाला है, उसे हित की ही स्थापना करनी चाहिए; जो द्रोह करे, उसे गुरुजन नहीं कहा जाता।
श्लोक 5 (5.54.5)
इदं जितमिदं लब्धमिति श्रुत्वा पराजितान् । द्यूतकाले महाराज स्मयसे स्म कुमारवत् ॥
idaṃ jitamidaṃ labdhamiti śrutvā parājitān | dyūtakāle mahārāja smayase sma kumāravat
महाराज, जुए के समय पाण्डवों के हारते जाने पर 'यह जीता, वह मिला' — यह सुनकर आप बालक की तरह मुस्कराते थे।
श्लोक 6 (5.54.6)
परुषाण्युच्यमानांश्च पुरा पार्थानुपेक्षसे । कृत्स्नं राज्यं जयन्तीति प्रपातं नानुपश्यसि ॥
paruṣāṇyucyamānāṃśca purā pārthānupekṣase | kṛtsnaṃ rājyaṃ jayantīti prapātaṃ nānupaśyasi
पहले जब पार्थों को कटु वचन कहे जा रहे थे, तब आपने उपेक्षा की; 'ये सारा राज्य जीत रहे हैं' — यह सोचकर आपने सामने की खाई नहीं देखी।
श्लोक 7 (5.54.7)
पित्र्यं राज्यं महाराज कुरवस्ते सजाङ्गलाः । अथ वीरैर्जितामुर्वीमखिलां प्रत्यपद्यथाः ॥
pitryaṃ rājyaṃ mahārāja kuravaste sajāṅgalāḥ | atha vīrairjitāmurvīmakhilāṃ pratyapadyathāḥ
महाराज, आपका पैतृक राज्य तो जांगल सहित कुरुदेश ही था; फिर आपको उन वीरों द्वारा जीती हुई सम्पूर्ण पृथ्वी प्राप्त हुई।
श्लोक 8 (5.54.8)
बाहुवीर्यार्जिता भूमिस्तव पार्थैर्निवेदिता । मयेदं कृतमित्येव मन्यसे राजसत्तम ॥
bāhuvīryārjitā bhūmistava pārthairniveditā | mayedaṃ kṛtamityeva manyase rājasattama
पार्थों ने अपनी भुजाओं के बल से जो भूमि जीती, वह आपको सौंप दी; और हे राजश्रेष्ठ, आप समझते हैं कि यह मैंने किया।
श्लोक 9 (5.54.9)
ग्रस्तान्गन्धर्वराजेन मज्जतो ह्यप्लवेऽम्भसि । आनिनाय पुनः पार्थः पुत्रांस्ते राजसत्तम ॥
grastāngandharvarājena majjato hyaplave'mbhasi | ānināya punaḥ pārthaḥ putrāṃste rājasattama
हे राजश्रेष्ठ, जब आपके पुत्र गन्धर्वराज द्वारा पकड़ लिए गए थे और बिना नौका के जल में डूब रहे थे, तब पार्थ ही उन्हें वापस लाया।
श्लोक 10 (5.54.10)
कुमारवच्च स्मयसे द्यूते विनिकृतेषु यत् । पाण्डवेषु वने राजन्प्रव्रजत्सु पुनःपुनः ॥
kumāravacca smayase dyūte vinikṛteṣu yat | pāṇḍaveṣu vane rājanpravrajatsu punaḥpunaḥ
और हे राजन्, जब जुए में छले गए पाण्डव वन को जा रहे थे, तब आप बार-बार बालक की तरह मुस्कराते रहे।
श्लोक 11 (5.54.11)
प्रवर्षतः शरव्रातानर्जुनस्य शितान्बहून् । अप्यर्णवा विशुष्येयुः किं पुनर्मांसयोनयः ॥
pravarṣataḥ śaravrātānarjunasya śitānbahūn | apyarṇavā viśuṣyeyuḥ kiṃ punarmāṃsayonayaḥ
जब अर्जुन तीखे बाणों के अनेक समूहों की वर्षा करेगा, तब समुद्र भी सूख जाएँगे — फिर मांस से उत्पन्न प्राणियों की तो बात ही क्या!
श्लोक 12 (5.54.12)
अस्यतां फाल्गुनः श्रेष्ठो गाण्डीवं धनुषां वरम् । केशवः सर्वभूतानामायुधानां सुदर्शनम् । वानरो रोचमानश्च केतुः केतुमतां वरः ॥
asyatāṃ phālgunaḥ śreṣṭho gāṇḍīvaṃ dhanuṣāṃ varam | keśavaḥ sarvabhūtānāmāyudhānāṃ sudarśanam | vānaro rocamānaśca ketuḥ ketumatāṃ varaḥ
बाण चलाने वालों में फाल्गुन श्रेष्ठ है, धनुषों में गाण्डीव, सब प्राणियों में केशव, आयुधों में सुदर्शन; और ध्वजाओं में वह चमकता वानर-ध्वज श्रेष्ठ है।
श्लोक 13 (5.54.13)
एवमेतानि स रथो वहते सह यो रणे । क्षपयिष्यति नो राजन्कालचक्रमिवोद्यतम् ॥
evametāni sa ratho vahate saha yo raṇe | kṣapayiṣyati no rājankālacakramivodyatam
इस प्रकार जो रथ इन सबको एक साथ लेकर युद्ध में चलता है, हे राजन्, वह उठे हुए कालचक्र की तरह हमारा विनाश कर देगा।
श्लोक 14 (5.54.14)
तस्याद्य वसुधा राजन्निखिला भरतर्षभ । यस्य भीमार्जुनौ योधौ स राजा राजसत्तम ॥
tasyādya vasudhā rājannikhilā bharatarṣabha | yasya bhīmārjunau yodhau sa rājā rājasattama
हे भरतश्रेष्ठ राजन्, आज सारी पृथ्वी उसी की है; हे राजश्रेष्ठ, जिसके योद्धा भीम और अर्जुन हैं, वही राजा है।
श्लोक 15 (5.54.15)
तथा भीमहतप्रायां मज्जन्तीं तव वाहिनीम् । दुर्योधनमुखा दृष्ट्वा क्षयं यास्यन्ति कौरवाः ॥
tathā bhīmahataprāyāṃ majjantīṃ tava vāhinīm | duryodhanamukhā dṛṣṭvā kṣayaṃ yāsyanti kauravāḥ
भीम द्वारा प्रायः नष्ट की गई अपनी सेना को डूबते देखकर दुर्योधन आदि कौरव विनाश को प्राप्त होंगे।
श्लोक 16 (5.54.16)
न भीमार्जुनयोर्भीता लप्स्यन्ते विजयं विभो । तव पुत्रा महाराज राजानश्चानुसारिणः ॥
na bhīmārjunayorbhītā lapsyante vijayaṃ vibho | tava putrā mahārāja rājānaścānusāriṇaḥ
हे प्रभो महाराज, भीम और अर्जुन से डरे हुए आपके पुत्र और उनके अनुयायी राजा विजय नहीं पा सकेंगे।
श्लोक 17 (5.54.17)
मत्स्यास्त्वामद्य नार्चन्ति पञ्चालाश्च सकेकयाः । साल्वेयाः शूरसेनाश्च सर्वे त्वामवजानते ॥
matsyāstvāmadya nārcanti pañcālāśca sakekayāḥ | sālveyāḥ śūrasenāśca sarve tvāmavajānate
अब मत्स्य आपका आदर नहीं करते, न ही केकयों सहित पाञ्चाल; साल्वेय और शूरसेन सभी आपकी अवहेलना करते हैं।
श्लोक 18 (5.54.18)
पार्थं ह्येते गताः सर्वे वीर्यज्ञास्तस्य धीमतः । भक्त्या ह्यस्य विरुध्यन्ते तव पुत्रैः सदैव ते ॥
pārthaṃ hyete gatāḥ sarve vīryajñāstasya dhīmataḥ | bhaktyā hyasya virudhyante tava putraiḥ sadaiva te
क्योंकि वे सब उस बुद्धिमान् के पराक्रम को जानकर पार्थ की ओर चले गए हैं; उसकी भक्ति के कारण वे सदा आपके पुत्रों का विरोध करते हैं।
श्लोक 19 (5.54.19)
अनर्हानेव तु वधे धर्मयुक्तान्विकर्मणा । योऽक्लेशयत्पाण्डुपुत्रान्यो विद्वेष्ट्यधुनापि वै ॥
anarhāneva tu vadhe dharmayuktānvikarmaṇā | yo'kleśayatpāṇḍuputrānyo vidveṣṭyadhunāpi vai
जिसने धर्म पर चलने वाले, वध के सर्वथा अयोग्य पाण्डुपुत्रों को अपने कुकर्मों से सताया और जो अब भी उनसे द्वेष करता है,
श्लोक 20 (5.54.20)
सर्वोपायैर्नियन्तव्यः सानुगः पापपुरुषः । तव पुत्रो महाराज नानुशोचितुमर्हसि ॥
sarvopāyairniyantavyaḥ sānugaḥ pāpapuruṣaḥ | tava putro mahārāja nānuśocitumarhasi
महाराज, उस पापी पुरुष — आपके पुत्र — को उसके अनुयायियों सहित हर उपाय से रोकना चाहिए; उसके लिए आपको शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक 21 (5.54.21)
अपरोक्षं महाराज साक्षाच्चैनं ब्रवीम्यहम् । द्यूतकाले मया चोक्तं विदुरेण च धीमता ॥
aparokṣaṃ mahārāja sākṣāccainaṃ bravīmyaham | dyūtakāle mayā coktaṃ vidureṇa ca dhīmatā
महाराज, मैं यह आपसे खुलकर, आमने-सामने कहता हूँ। जुए के समय मैंने भी कहा था और बुद्धिमान् विदुर ने भी कहा था
श्लोक 22 (5.54.22)
यदिदं ते विलपितं पाण्डवान्प्रति भारत । अनीशेनैव राजेन्द्र सर्वमेतन्निरर्थकम् ॥
yadidaṃ te vilapitaṃ pāṇḍavānprati bhārata | anīśenaiva rājendra sarvametannirarthakam
कि हे भारत, हे राजेन्द्र, पाण्डवों को लेकर आपका यह सारा विलाप निरर्थक होगा — उस व्यक्ति के विलाप की तरह जिसके हाथ में कुछ नहीं।