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उद्योग पर्व · अध्याय 55

दुर्योधन का अपने बल का बखान

दुर्योधन अपने चिन्तित पिता से कहता है कि जब पाण्डवों के मित्र राजा पहली बार कृष्ण के साथ एकत्र हुए थे, तब उसे भी विनाश का भय हुआ था, पर भीष्म, द्रोण, कृप और अश्वत्थामा ने उसे आश्वासन दिया कि वे सब राजाओं को जीत सकते हैं। वह बलराम से सीखे अपने गदा-कौशल का और भीष्म, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा तथा कर्ण की अजेयता का बखान करता है। पाण्डवों की सात के मुकाबले अपनी ग्यारह अक्षौहिणी गिनाकर वह धृतराष्ट्र से हिम्मत न हारने को कहता है, और फिर संजय से दोबारा प्रश्न करने लगता है।

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56

दुर्योधन उवाच

श्लोक 1 (5.55.1)

न भेतव्यं महाराज न शोच्या भवतां वयम् । समर्थाः स्म पराञ्जेतुं बलिनः समरे विभो ॥

na bhetavyaṃ mahārāja na śocyā bhavatāṃ vayam | samarthāḥ sma parāñjetuṃ balinaḥ samare vibho

महाराज, डरिए मत; आपको हमारे लिए शोक करने की आवश्यकता नहीं है। हे प्रभो, हम बलवान हैं और युद्ध में शत्रुओं को जीतने में समर्थ हैं।

श्लोक 2 (5.55.2)

वने प्रव्राजितान्पार्थान्यदायान्मधुसूदनः । महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना ॥

vane pravrājitānpārthānyadāyānmadhusūdanaḥ | mahatā balacakreṇa pararāṣṭrāvamardinā

जब पृथा के पुत्र वन में निर्वासित थे, तब मधुसूदन शत्रु-राज्यों को रौंद डालने वाली विशाल सेना के साथ उनके पास आए थे;

श्लोक 3 (5.55.3)

केकया धृष्टकेतुश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । राजानश्चान्वयुः पार्थान्बहवोऽन्येऽनुयायिनः ॥

kekayā dhṛṣṭaketuśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | rājānaścānvayuḥ pārthānbahavo'nye'nuyāyinaḥ

और केकय, धृष्टकेतु, पृषत-वंशी धृष्टद्युम्न तथा अनेक अन्य राजा अनुयायी बनकर पार्थों के पीछे-पीछे आए थे।

श्लोक 4 (5.55.4)

इन्द्रप्रस्थस्य चादूरात्समाजग्मुर्महारथाः । व्यगर्हयंश्च संगम्य भवन्तं कुरुभिः सह ॥

indraprasthasya cādūrātsamājagmurmahārathāḥ | vyagarhayaṃśca saṃgamya bhavantaṃ kurubhiḥ saha

वे महारथी इन्द्रप्रस्थ के निकट एकत्र हुए और मिलकर उन्होंने कौरवों सहित आपकी निन्दा की।

श्लोक 5 (5.55.5)

ते युधिष्ठिरमासीनमजिनैः प्रतिवासितम् । कृष्णप्रधानाः संहत्य पर्युपासन्त भारत ॥

te yudhiṣṭhiramāsīnamajinaiḥ prativāsitam | kṛṣṇapradhānāḥ saṃhatya paryupāsanta bhārata

हे भारत, कृष्ण को आगे करके वे सब मृगचर्म ओढ़कर बैठे युधिष्ठिर के पास एकत्र हुए और उनकी सेवा में बैठे।

श्लोक 6 (5.55.6)

प्रत्यादानं च राज्यस्य कार्यमूचुर्नराधिपाः । भवतः सानुबन्धस्य समुच्छेदं चिकीर्षवः ॥

pratyādānaṃ ca rājyasya kāryamūcurnarādhipāḥ | bhavataḥ sānubandhasya samucchedaṃ cikīrṣavaḥ

उन नरेशों ने कहा कि राज्य वापस लेना ही चाहिए; वे आपको आपके समस्त परिवार सहित नष्ट कर देना चाहते थे।

श्लोक 7 (5.55.7)

श्रुत्वा चैवं मयोक्तास्तु भीष्मद्रोणकृपास्तदा । ज्ञातिक्षयभयाद्राजन्भीतेन भरतर्षभ ॥

śrutvā caivaṃ mayoktāstu bhīṣmadroṇakṛpāstadā | jñātikṣayabhayādrājanbhītena bharatarṣabha

यह सुनकर, हे राजन्, हे भरतश्रेष्ठ, अपने कुटुम्ब के विनाश के भय से डरे हुए मैंने तब भीष्म, द्रोण और कृप से कहा —

श्लोक 8 (5.55.8)

न ते स्थास्यन्ति समये पाण्डवा इति मे मतिः । समुच्छेदं हि नः कृत्स्नं वासुदेवश्चिकीर्षति ॥

na te sthāsyanti samaye pāṇḍavā iti me matiḥ | samucchedaṃ hi naḥ kṛtsnaṃ vāsudevaścikīrṣati

'मेरा विचार है कि पाण्डव उस समझौते पर टिके नहीं रहेंगे, क्योंकि वासुदेव हमारा पूर्ण विनाश करना चाहते हैं।

श्लोक 9 (5.55.9)

ऋते च विदुरात्सर्वे यूयं वध्या मता मम । धृतराष्ट्रस्तु धर्मज्ञो न वध्यः कुरुसत्तमः ॥

ṛte ca vidurātsarve yūyaṃ vadhyā matā mama | dhṛtarāṣṭrastu dharmajño na vadhyaḥ kurusattamaḥ

मेरी समझ में विदुर को छोड़ आप सभी उनके लिए वध्य हैं; केवल धर्मज्ञ कुरुश्रेष्ठ धृतराष्ट्र वध्य नहीं हैं।

श्लोक 10 (5.55.10)

समुच्छेदं च कृत्स्नं नः कृत्वा तात जनार्दनः । एकराज्यं कुरूणां स्म चिकीर्षति युधिष्ठिरे ॥

samucchedaṃ ca kṛtsnaṃ naḥ kṛtvā tāta janārdanaḥ | ekarājyaṃ kurūṇāṃ sma cikīrṣati yudhiṣṭhire

तात, हमारा पूरा विनाश करके जनार्दन कुरुओं का एकछत्र राज्य युधिष्ठिर को सौंप देना चाहते हैं।

श्लोक 11 (5.55.11)

तत्र किं प्राप्तकालं नः प्रणिपातः पलायनम् । प्राणान्वा संपरित्यज्य प्रतियुध्यामहे परान् ॥

tatra kiṃ prāptakālaṃ naḥ praṇipātaḥ palāyanam | prāṇānvā saṃparityajya pratiyudhyāmahe parān

ऐसी स्थिति में हमारे लिए अब क्या करना उचित है — शरणागति, पलायन, या प्राणों का मोह छोड़कर शत्रुओं से डटकर युद्ध?

श्लोक 12 (5.55.12)

प्रतियुद्धे तु नियतः स्यादस्माकं पराजयः । युधिष्ठिरस्य सर्वे हि पार्थिवा वशवर्तिनः ॥

pratiyuddhe tu niyataḥ syādasmākaṃ parājayaḥ | yudhiṣṭhirasya sarve hi pārthivā vaśavartinaḥ

यदि हम युद्ध करें तो हमारी पराजय निश्चित है, क्योंकि सभी राजा युधिष्ठिर के वश में हैं।

श्लोक 13 (5.55.13)

विरक्तराष्ट्राश्च वयं मित्राणि कुपितानि नः । धिक्कृताः पार्थिवैः सर्वैः स्वजनेन च सर्वशः ॥

viraktarāṣṭrāśca vayaṃ mitrāṇi kupitāni naḥ | dhikkṛtāḥ pārthivaiḥ sarvaiḥ svajanena ca sarvaśaḥ

हमारा राष्ट्र हमसे विमुख है, हमारे मित्र हमसे रुष्ट हैं, और सब राजा तथा हमारे अपने लोग भी हर ओर से हमें धिक्कारते हैं।

श्लोक 14 (5.55.14)

प्रणिपाते न दोषोऽस्ति सन्धिर्नः शाश्वतीः समाः । पितरं त्वेव शोचामि प्रज्ञानेत्रं जनाधिपम् ॥

praṇipāte na doṣo'sti sandhirnaḥ śāśvatīḥ samāḥ | pitaraṃ tveva śocāmi prajñānetraṃ janādhipam

शरणागति में कोई दोष नहीं; उससे हमें चिरकाल तक सन्धि मिलेगी। पर मुझे अपने पिता, उन प्रज्ञाचक्षु नरेश, की ही चिन्ता है,

श्लोक 15 (5.55.15)

मत्कृते दुःखमापन्नं क्लेशं प्राप्तमनन्तकम् । कृतं हि तव पुत्रैश्च परेषामवरोधनम् । मत्प्रियार्थं पुरैवैतद्विदितं ते नरोत्तम ॥

matkṛte duḥkhamāpannaṃ kleśaṃ prāptamanantakam | kṛtaṃ hi tava putraiśca pareṣāmavarodhanam | matpriyārthaṃ puraivaitadviditaṃ te narottama

जो मेरे कारण दुःख में पड़े हैं और अनन्त क्लेश पा रहे हैं। हे नरश्रेष्ठ, आप जानते ही हैं कि आपके पुत्रों ने बहुत पहले मुझे प्रसन्न करने के लिए ही शत्रुओं का अवरोध किया था।'

श्लोक 16 (5.55.16)

ते राज्ञो धृतराष्ट्रस्य सामात्यस्य महारथाः । वैरं प्रतिकरिष्यन्ति कुलोच्छेदेन पाण्डवाः ॥

te rājño dhṛtarāṣṭrasya sāmātyasya mahārathāḥ | vairaṃ pratikariṣyanti kulocchedena pāṇḍavāḥ

'वे महारथी पाण्डव कुल का उच्छेद करके मन्त्रियों सहित राजा धृतराष्ट्र से वैर का बदला लेंगे।'

श्लोक 17 (5.55.17)

ततो द्रोणोऽब्रवीद्भीष्मः कृपो द्रौणिश्च भारत । मत्वा मां महतीं चिन्तामास्थितं व्यथितेन्द्रियम् ॥

tato droṇo'bravīdbhīṣmaḥ kṛpo drauṇiśca bhārata | matvā māṃ mahatīṃ cintāmāsthitaṃ vyathitendriyam

हे भारत, तब मुझे गहरी चिन्ता में डूबा और व्याकुल-चित्त देखकर द्रोण, भीष्म, कृप और द्रोणपुत्र बोले —

श्लोक 18 (5.55.18)

अभिद्रुग्धाः परे चेन्नो न भेतव्यं परन्तप । असमर्थाः परे जेतुमस्मान्युधि समास्थितान् ॥

abhidrugdhāḥ pare cenno na bhetavyaṃ parantapa | asamarthāḥ pare jetumasmānyudhi samāsthitān

'हे परन्तप, यदि शत्रुओं के साथ हमने द्रोह भी किया हो, तब भी डरने की बात नहीं। युद्ध में डटे हुए हमें शत्रु जीत नहीं सकते।

श्लोक 19 (5.55.19)

एकैकशः समर्थाः स्मो विजेतुं सर्वपार्थिवान् । आगच्छन्तु विनेष्यामो दर्पमेषां शितैः शरैः ॥

ekaikaśaḥ samarthāḥ smo vijetuṃ sarvapārthivān | āgacchantu vineṣyāmo darpameṣāṃ śitaiḥ śaraiḥ

हम में से एक-एक भी सब राजाओं को जीतने में समर्थ है। वे आएँ — हम अपने तीखे बाणों से उनका दर्प चूर कर देंगे।

श्लोक 20 (5.55.20)

पुरैकेन हि भीष्मेण विजिताः सर्वपार्थिवाः । मृते पितर्यतिक्रुद्धो रथेनैकेन भारत ॥

puraikena hi bhīṣmeṇa vijitāḥ sarvapārthivāḥ | mṛte pitaryatikruddho rathenaikena bhārata

हे भारत, बहुत पहले पिता की मृत्यु के बाद अत्यन्त क्रुद्ध भीष्म ने अकेले, एक ही रथ से, सब राजाओं को जीत लिया था।

श्लोक 21 (5.55.21)

जघान सुबहूंस्तेषां संरब्धः कुरुसत्तमः । ततस्ते शरणं जग्मुर्देवव्रतमिमं भयात् ॥

jaghāna subahūṃsteṣāṃ saṃrabdhaḥ kurusattamaḥ | tataste śaraṇaṃ jagmurdevavratamimaṃ bhayāt

क्रोध में भरे उस कुरुश्रेष्ठ ने उनमें से बहुतों को मार डाला; तब भयभीत होकर वे इन्हीं देवव्रत की शरण में आए।

श्लोक 22 (5.55.22)

स भीष्मः सुसमर्थोऽयमस्माभिः सहितो रणे । परान्विजेतुं तस्मात्ते व्येतु भीर्भरतर्षभ ॥

sa bhīṣmaḥ susamartho'yamasmābhiḥ sahito raṇe | parānvijetuṃ tasmātte vyetu bhīrbharatarṣabha

वही पूर्ण समर्थ भीष्म रण में हमारे साथ शत्रुओं को जीतने के लिए उपस्थित रहेंगे; अतः हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हारा भय दूर हो।'

श्लोक 23 (5.55.23)

इत्येषां निश्चयो ह्यासीत्तत्कालेऽमिततेजसाम् । पुरा तेषां पृथिवी कृत्स्नासीद्वशवर्तिनी ॥

ityeṣāṃ niścayo hyāsīttatkāle'mitatejasām | purā teṣāṃ pṛthivī kṛtsnāsīdvaśavartinī

उस समय उन अपार तेजस्वी वीरों का यही निश्चय था। पहले सारी पृथ्वी उन (पाण्डवों) के वश में थी;

श्लोक 24 (5.55.24)

अस्मान्पुनरमी नाद्य समर्था जेतुमाहवे । छिन्नपक्षाः परे ह्यद्य वीर्यहीनाश्च पाण्डवाः ॥

asmānpunaramī nādya samarthā jetumāhave | chinnapakṣāḥ pare hyadya vīryahīnāśca pāṇḍavāḥ

पर अब वे युद्ध में हमें जीतने में समर्थ नहीं हैं। हमारे शत्रु पाण्डवों के पंख कट चुके हैं और वे पराक्रम से हीन हो गए हैं।

श्लोक 25 (5.55.25)

अस्मत्संस्था च पृथिवी वर्तते भरतर्षभ । एकार्थाः सुखदुःखेषु समानीताश्च पार्थिवाः ॥

asmatsaṃsthā ca pṛthivī vartate bharatarṣabha | ekārthāḥ sukhaduḥkheṣu samānītāśca pārthivāḥ

हे भरतश्रेष्ठ, अब पृथ्वी हमारे अधीन है, और यहाँ एकत्र किए गए राजा सुख-दुःख में हमारे साथ एक-प्रयोजन हैं।

श्लोक 26 (5.55.26)

अप्यग्निं प्रविशेयुस्ते समुद्रं वा परन्तप । मदर्थं पार्थिवाः सर्वे तद्विद्धि कुरुसत्तम ॥

apyagniṃ praviśeyuste samudraṃ vā parantapa | madarthaṃ pārthivāḥ sarve tadviddhi kurusattama

हे कुरुश्रेष्ठ, हे परन्तप, यह जान लीजिए कि मेरे लिए वे सब राजा अग्नि में या समुद्र में भी प्रवेश कर जाएँगे।

श्लोक 27 (5.55.27)

उन्मत्तमिव चापि त्वां प्रहसन्तीह दुःखितम् । विलपन्तं बहुविधं भीतं परविकत्थने ॥

unmattamiva cāpi tvāṃ prahasantīha duḥkhitam | vilapantaṃ bahuvidhaṃ bhītaṃ paravikatthane

शत्रुओं की डींगों से डरकर आपको दुःखी होते और तरह-तरह से विलाप करते देख वे यहाँ आप पर किसी पागल की भाँति हँसते हैं।

श्लोक 28 (5.55.28)

एषां ह्येकैकशो राज्ञां समर्थं पाण्डवान्प्रति । आत्मानं मन्यते सर्वो व्येतु ते भयमागतम् ॥

eṣāṃ hyekaikaśo rājñāṃ samarthaṃ pāṇḍavānprati | ātmānaṃ manyate sarvo vyetu te bhayamāgatam

इन राजाओं में से प्रत्येक स्वयं को पाण्डवों से अकेले निपटने में समर्थ मानता है; आपका यह आया हुआ भय दूर हो जाए।

श्लोक 29 (5.55.29)

जेतुं समग्रां सेनां मे वासवोऽपि न शक्नुयात् । हन्तुमक्षय्यरूपेयं ब्रह्मणोऽपि स्वयंभुवः ॥

jetuṃ samagrāṃ senāṃ me vāsavo'pi na śaknuyāt | hantumakṣayyarūpeyaṃ brahmaṇo'pi svayaṃbhuvaḥ

मेरी समूची सेना को इन्द्र भी नहीं जीत सकते; यह अक्षय स्वरूप वाली है, स्वयम्भू ब्रह्मा भी इसे नष्ट नहीं कर सकते।

श्लोक 30 (5.55.30)

युधिष्ठिरः पुरं हित्वा पञ्चग्रामान्स याचते । भीतो हि मामकात्सैन्यात्प्रभावाच्चैव मे विभो ॥

yudhiṣṭhiraḥ puraṃ hitvā pañcagrāmānsa yācate | bhīto hi māmakātsainyātprabhāvāccaiva me vibho

हे प्रभो, युधिष्ठिर नगर छोड़कर केवल पाँच गाँव माँग रहे हैं, क्योंकि वे मेरी सेना और मेरे प्रभाव से डरे हुए हैं।

श्लोक 31 (5.55.31)

समर्थं मन्यसे यच्च कुन्तीपुत्रं वृकोदरम् । तन्मिथ्या न हि मे कृत्स्नं प्रभावं वेत्सि भारत ॥

samarthaṃ manyase yacca kuntīputraṃ vṛkodaram | tanmithyā na hi me kṛtsnaṃ prabhāvaṃ vetsi bhārata

हे भारत, आप जो कुन्तीपुत्र वृकोदर को बड़ा समर्थ मानते हैं, वह भ्रम है; आप मेरे पूरे प्रभाव को नहीं जानते।

श्लोक 32 (5.55.32)

मत्समो हि गदायुद्धे पृथिव्यां नास्ति कश्चन । नासीत्कश्चिदतिक्रान्तो भविता न च कश्चन ॥

matsamo hi gadāyuddhe pṛthivyāṃ nāsti kaścana | nāsītkaścidatikrānto bhavitā na ca kaścana

गदा-युद्ध में पृथ्वी पर मेरे समान कोई नहीं है। न कोई कभी मुझसे आगे बढ़ा, न आगे कोई बढ़ेगा।

श्लोक 33 (5.55.33)

युक्तो दुःखोषितश्चाहं विद्यापारगतस्तथा । तस्मान्न भीमान्नान्येभ्यो भयं मे विद्यते क्वचित् ॥

yukto duḥkhoṣitaścāhaṃ vidyāpāragatastathā | tasmānna bhīmānnānyebhyo bhayaṃ me vidyate kvacit

मैंने लगन से अभ्यास किया, गुरुकुल में कष्ट सहकर रहा और इस विद्या में पारंगत हुआ; इसलिए मुझे भीम से या किसी और से कहीं कोई भय नहीं है।

श्लोक 34 (5.55.34)

दुर्योधनसमो नास्ति गदायामिति निश्चयः । सङ्कर्षणस्य भवने यत्तदैनमुपावसम् ॥

duryodhanasamo nāsti gadāyāmiti niścayaḥ | saṅkarṣaṇasya bhavane yattadainamupāvasam

'गदा में दुर्योधन के समान कोई नहीं' — यह निर्णय तभी हो गया था जब मैं संकर्षण के घर में शिष्य बनकर रहा था।

श्लोक 35 (5.55.35)

युद्धे सङ्कर्षणसमो बलेनाभ्यधिको भुवि । गदाप्रहारं भीमो मे न जातु विषहेद्युधि ॥

yuddhe saṅkarṣaṇasamo balenābhyadhiko bhuvi | gadāprahāraṃ bhīmo me na jātu viṣahedyudhi

युद्ध में मैं संकर्षण के समान हूँ और बल में पृथ्वी पर सबसे बढ़कर हूँ। भीम युद्ध में मेरी गदा का प्रहार कभी सह नहीं सकेगा।

श्लोक 36 (5.55.36)

एकं प्रहारं यं दद्यां भीमाय रुषितो नृप । स एवैनं नयेद्घोरः क्षिप्रं वैवस्वतक्षयम् ॥

ekaṃ prahāraṃ yaṃ dadyāṃ bhīmāya ruṣito nṛpa | sa evainaṃ nayedghoraḥ kṣipraṃ vaivasvatakṣayam

हे नृप, क्रोध में भरकर मैं भीम पर जो एक प्रहार करूँगा, वही भयंकर प्रहार उसे तुरन्त वैवस्वत (यम) के लोक पहुँचा देगा।

श्लोक 37 (5.55.37)

इच्छेयं च गदाहस्तं राजन्द्रष्टुं वृकोदरम् । सुचिरं प्रार्थितो ह्येष मम नित्यं मनोरथः ॥

iccheyaṃ ca gadāhastaṃ rājandraṣṭuṃ vṛkodaram | suciraṃ prārthito hyeṣa mama nityaṃ manorathaḥ

हे राजन्, मैं गदा हाथ में लिए वृकोदर को देखना चाहता हूँ; यह बहुत समय से मेरी नित्य की अभिलाषा रही है।

श्लोक 38 (5.55.38)

गदया निहतो ह्याजौ मया पार्थो वृकोदरः । विशीर्णगात्रः पृथिवीं परासुः प्रपतिष्यति ॥

gadayā nihato hyājau mayā pārtho vṛkodaraḥ | viśīrṇagātraḥ pṛthivīṃ parāsuḥ prapatiṣyati

युद्ध में मेरी गदा से मारा गया पृथापुत्र वृकोदर क्षत-विक्षत अंगों के साथ प्राणहीन होकर धरती पर गिर पड़ेगा।

श्लोक 39 (5.55.39)

गदाप्रहाराभिहतो हिमवानपि पर्वतः । सकृन्मया विदीर्येत गिरिः शतसहस्रधा ॥

gadāprahārābhihato himavānapi parvataḥ | sakṛnmayā vidīryeta giriḥ śatasahasradhā

मेरी गदा के एक ही प्रहार से आहत होकर हिमालय पर्वत भी लाखों टुकड़ों में फट जाएगा।

श्लोक 40 (5.55.40)

स चाप्येतद्विजानाति वासुदेवार्जुनौ तथा । दुर्योधनसमो नास्ति गदायामिति निश्चयः ॥

sa cāpyetadvijānāti vāsudevārjunau tathā | duryodhanasamo nāsti gadāyāmiti niścayaḥ

यह बात वह (भीम) भी जानता है और वासुदेव तथा अर्जुन भी — गदा में दुर्योधन के समान कोई नहीं, यह निश्चित है।

श्लोक 41 (5.55.41)

तत्ते वृकोदरमयं भयं व्येतु महाहवे । व्यपनेष्याम्यहं ह्येनं मा राजन्विमना भव ॥

tatte vṛkodaramayaṃ bhayaṃ vyetu mahāhave | vyapaneṣyāmyahaṃ hyenaṃ mā rājanvimanā bhava

इसलिए महायुद्ध में वृकोदर से आपका यह भय दूर हो जाए। मैं उसे हटा दूँगा; हे राजन्, आप उदास न हों।

श्लोक 42 (5.55.42)

तस्मिन्मया हते क्षिप्रमर्जुनं बहवो रथाः । तुल्यरूपा विशिष्टाश्च क्षेप्स्यन्ति भरतर्षभ ॥

tasminmayā hate kṣipramarjunaṃ bahavo rathāḥ | tulyarūpā viśiṣṭāśca kṣepsyanti bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, मेरे द्वारा उसके मारे जाने पर अर्जुन के समान या उससे बढ़कर अनेक रथी शीघ्र ही अर्जुन को गिरा देंगे —

श्लोक 43 (5.55.43)

भीष्मो द्रोणः कृपो द्रौणिः कर्णो भूरिश्रवास्तथा । प्राग्ज्योतिषाधिपः शल्यः सिन्धुराजो जयद्रथः ॥

bhīṣmo droṇaḥ kṛpo drauṇiḥ karṇo bhūriśravāstathā | prāgjyotiṣādhipaḥ śalyaḥ sindhurājo jayadrathaḥ

भीष्म, द्रोण, कृप, द्रोणपुत्र, कर्ण और भूरिश्रवा, प्राग्ज्योतिष के अधिपति, शल्य, और सिन्धुराज जयद्रथ।

श्लोक 44 (5.55.44)

एकैक एषां शक्तस्तु हन्तुं भारत पाण्डवान् । समेतास्तु क्षणेनैतान्नेष्यन्ति यमसादनम् ॥

ekaika eṣāṃ śaktastu hantuṃ bhārata pāṇḍavān | sametāstu kṣaṇenaitānneṣyanti yamasādanam

हे भारत, इनमें से एक-एक भी पाण्डवों को मारने में समर्थ है; मिलकर तो ये क्षण भर में उन्हें यमलोक पहुँचा देंगे।

श्लोक 45 (5.55.45)

समग्रा पार्थिवी सेना पार्थमेकं धनञ्जयम् । कस्मादशक्ता निर्जेतुमिति हेतुर्न विद्यते ॥

samagrā pārthivī senā pārthamekaṃ dhanañjayam | kasmādaśaktā nirjetumiti heturna vidyate

राजाओं की समूची सेना अकेले पार्थ धनञ्जय को न जीत सके, इसका कोई कारण नहीं है।

श्लोक 46 (5.55.46)

शरव्रातैस्तु भीष्मेण शतशो निचितोऽवशः । द्रोणद्रौणिकृपैश्चैव गन्ता पार्थो यमक्षयम् ॥

śaravrātaistu bhīṣmeṇa śataśo nicito'vaśaḥ | droṇadrauṇikṛpaiścaiva gantā pārtho yamakṣayam

भीष्म के और द्रोण, द्रोणपुत्र तथा कृप के सैकड़ों बाण-समूहों से ढका हुआ विवश पार्थ यमलोक चला जाएगा।

श्लोक 47 (5.55.47)

पितामहोऽपि गाङ्गेयः शान्तनोरधि भारत । ब्रह्मर्षिसदृशो जज्ञे देवैरपि सुदुःसहः ॥

pitāmaho'pi gāṅgeyaḥ śāntanoradhi bhārata | brahmarṣisadṛśo jajñe devairapi suduḥsahaḥ

हे भारत, पितामह गंगापुत्र भी शान्तनु से उत्पन्न हुए हैं; वे ब्रह्मर्षि के समान हैं और देवताओं के लिए भी दुःसह हैं।

श्लोक 48 (5.55.48)

न हन्ता विद्यते चापि राजन्भीष्मस्य कश्चन । पित्रा ह्युक्तः प्रसन्नेन नाकामस्त्वं मरिष्यसि ॥

na hantā vidyate cāpi rājanbhīṣmasya kaścana | pitrā hyuktaḥ prasannena nākāmastvaṃ mariṣyasi

हे राजन्, भीष्म को मारने वाला कोई है ही नहीं, क्योंकि प्रसन्न होकर उनके पिता ने उनसे कहा था — 'तुम्हारी इच्छा के बिना तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी।'

श्लोक 49 (5.55.49)

ब्रह्मर्षेश्च भरद्वाजाद्द्रोणो द्रोण्यामजायत । द्रोणाज्जज्ञे महाराज द्रौणिश्च परमास्त्रवित् ॥

brahmarṣeśca bharadvājāddroṇo droṇyāmajāyata | droṇājjajñe mahārāja drauṇiśca paramāstravit

ब्रह्मर्षि भरद्वाज से द्रोणी (कलश) में द्रोण का जन्म हुआ, और हे महाराज, द्रोण से परम अस्त्रवेत्ता द्रोणपुत्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 50 (5.55.50)

कृपश्चाचार्यमुख्योऽयं महर्षेर्गौतमादपि । शरस्तम्बोद्भवः श्रीमानवध्य इति मे मतिः ॥

kṛpaścācāryamukhyo'yaṃ maharṣergautamādapi | śarastambodbhavaḥ śrīmānavadhya iti me matiḥ

और ये आचार्यश्रेष्ठ कृप भी महर्षि गौतम से उत्पन्न, सरकंडों के झुरमुट से जन्मे, श्रीमान् हैं; मेरी समझ में वे अवध्य हैं।

श्लोक 51 (5.55.51)

अयोनिजास्त्रयो ह्येते पिता माता च मातुलः । अश्वत्थाम्नो महाराज स च शूरः स्थितो मम ॥

ayonijāstrayo hyete pitā mātā ca mātulaḥ | aśvatthāmno mahārāja sa ca śūraḥ sthito mama

हे महाराज, अश्वत्थामा के पिता, माता और मामा — ये तीनों अयोनिज हैं; और वह शूरवीर मेरे पक्ष में खड़ा है।

श्लोक 52 (5.55.52)

सर्व एते महाराज देवकल्पा महारथाः । शक्रस्यापि व्यथां कुर्युः संयुगे भरतर्षभ ॥

sarva ete mahārāja devakalpā mahārathāḥ | śakrasyāpi vyathāṃ kuryuḥ saṃyuge bharatarṣabha

हे महाराज, हे भरतश्रेष्ठ, ये सभी महारथी देवताओं के समान हैं; युद्ध में ये इन्द्र को भी व्यथित कर सकते हैं।

श्लोक 53 (5.55.53)

नैतेषामर्जुनः शक्त एकैकं प्रतिवीक्षितुम् । सहितास्तु नरव्याघ्रा हनिष्यन्ति धनञ्जयम् ॥

naiteṣāmarjunaḥ śakta ekaikaṃ prativīkṣitum | sahitāstu naravyāghrā haniṣyanti dhanañjayam

अर्जुन इनमें से किसी एक की ओर आँख उठाकर देखने में भी समर्थ नहीं है; मिलकर तो ये नरव्याघ्र धनञ्जय को मार ही डालेंगे।

श्लोक 54 (5.55.54)

भीष्मद्रोणकृपाणां च तुल्यः कर्णो मतो मम । अनुज्ञातश्च रामेण मत्समोऽसीति भारत ॥

bhīṣmadroṇakṛpāṇāṃ ca tulyaḥ karṇo mato mama | anujñātaśca rāmeṇa matsamo'sīti bhārata

हे भारत, कर्ण को मैं भीष्म, द्रोण और कृप के समान मानता हूँ; परशुराम ने उसे 'तुम मेरे समान हो' कहकर विदा किया था।

श्लोक 55 (5.55.55)

कुण्डले रुचिरे चास्तां कर्णस्य सहजे शुभे । ते शच्यर्थं महेन्द्रेण याचितः स परन्तपः ॥

kuṇḍale rucire cāstāṃ karṇasya sahaje śubhe | te śacyarthaṃ mahendreṇa yācitaḥ sa parantapaḥ

कर्ण के पास जन्म से ही दो सुन्दर, शुभ कुण्डल थे। शची के लिए महेन्द्र ने उस परन्तप से उन्हें माँग लिया,

श्लोक 56 (5.55.56)

अमोघया महाराज शक्त्या परमभीमया । तस्य शक्त्योपगूढस्य कस्माज्जीवेद्धनञ्जयः ॥

amoghayā mahārāja śaktyā paramabhīmayā | tasya śaktyopagūḍhasya kasmājjīveddhanañjayaḥ

और हे महाराज, बदले में उसे अत्यन्त भयंकर अमोघ शक्ति मिली। उस शक्ति से सम्पन्न कर्ण के रहते धनञ्जय कैसे जीवित बचेगा?

श्लोक 57 (5.55.57)

विजयो मे ध्रुवं राजन्फलं पाणाविवाहितम् । अभिव्यक्तः परेषां च कृत्स्नो भुवि पराजयः ॥

vijayo me dhruvaṃ rājanphalaṃ pāṇāvivāhitam | abhivyaktaḥ pareṣāṃ ca kṛtsno bhuvi parājayaḥ

हे राजन्, मेरी विजय हाथ में रखे फल की भाँति निश्चित है; और पृथ्वी पर शत्रुओं की पूर्ण पराजय स्पष्ट दिखाई दे रही है।

श्लोक 58 (5.55.58)

अह्ना ह्येकेन भीष्मोऽयं प्रयुतं हन्ति भारत । तत्समाश्च महेष्वासा द्रोणद्रौणिकृपा अपि ॥

ahnā hyekena bhīṣmo'yaṃ prayutaṃ hanti bhārata | tatsamāśca maheṣvāsā droṇadrauṇikṛpā api

हे भारत, ये भीष्म एक ही दिन में दस लाख योद्धाओं को मार डालते हैं; और महाधनुर्धर द्रोण, द्रोणपुत्र तथा कृप भी उन्हीं के समान हैं।

श्लोक 59 (5.55.59)

संशप्तकानां वृन्दानि क्षत्रियाणां परन्तप । अर्जुनं वयमस्मान्वा निहन्यात्कपिकेतनः ॥

saṃśaptakānāṃ vṛndāni kṣatriyāṇāṃ parantapa | arjunaṃ vayamasmānvā nihanyātkapiketanaḥ

हे परन्तप, शपथ से बँधे क्षत्रियों (संशप्तकों) के दल कहते हैं — 'या तो हम अर्जुन को मारेंगे, या वह कपिध्वज हमें मारेगा।'

श्लोक 60 (5.55.60)

तांश्चालमिति मन्यन्ते सव्यसाचिवधे धृताः । पार्थिवाः स भवांस्तेभ्यो ह्यकस्माद्व्यथते कथम् ॥

tāṃścālamiti manyante savyasācivadhe dhṛtāḥ | pārthivāḥ sa bhavāṃstebhyo hyakasmādvyathate katham

राजा मानते हैं कि सव्यसाची के वध पर दृढ़ ये संशप्तक उसके लिए पर्याप्त हैं। फिर आप अकारण ही क्यों व्यथित हो रहे हैं?

श्लोक 61 (5.55.61)

भीमसेने च निहते कोऽन्यो युध्येत भारत । परेषां तन्ममाचक्ष्व यदि वेत्थ परन्तप ॥

bhīmasene ca nihate ko'nyo yudhyeta bhārata | pareṣāṃ tanmamācakṣva yadi vettha parantapa

हे भारत, भीमसेन के मारे जाने पर शत्रुओं में और कौन युद्ध करेगा? हे परन्तप, यदि आप जानते हों तो मुझे बताइए।

श्लोक 62 (5.55.62)

पञ्च ते भ्रातरः सर्वे धृष्टद्युम्नोऽथ सात्यकिः । परेषां सप्त ये राजन्योधाः सारं बलं मतम् ॥

pañca te bhrātaraḥ sarve dhṛṣṭadyumno'tha sātyakiḥ | pareṣāṃ sapta ye rājanyodhāḥ sāraṃ balaṃ matam

हे राजन्, पाँचों भाई तथा धृष्टद्युम्न और सात्यकि — शत्रुओं के ये सात योद्धा ही उनकी सेना का सार माने जाते हैं।

श्लोक 63 (5.55.63)

अस्माकं तु विशिष्टा ये भीष्मद्रोणकृपादयः । द्रौणिर्विकर्तनः कर्णः सोमदत्तोऽथ बाह्लिकः ॥

asmākaṃ tu viśiṣṭā ye bhīṣmadroṇakṛpādayaḥ | drauṇirvikartanaḥ karṇaḥ somadatto'tha bāhlikaḥ

किन्तु हमारे पक्ष में श्रेष्ठ योद्धा हैं — भीष्म, द्रोण, कृप आदि; द्रोणपुत्र, वैकर्तन कर्ण, सोमदत्त और बाह्लीक;

श्लोक 64 (5.55.64)

प्राग्ज्योतिषाधिपः शल्य आवन्त्यौ च जयद्रथः । दुःशासनो दुर्मुखश्च दुःसहश्च विशांपते ॥

prāgjyotiṣādhipaḥ śalya āvantyau ca jayadrathaḥ | duḥśāsano durmukhaśca duḥsahaśca viśāṃpate

प्राग्ज्योतिष के अधिपति, शल्य, अवन्ती के दोनों राजकुमार और जयद्रथ; हे प्रजापालक, दुःशासन, दुर्मुख और दुःसह;

श्लोक 65 (5.55.65)

श्रुतायुश्चित्रसेनश्च पुरुमित्रो विविंशतिः । शलो भूरिश्रवाश्चैव विकर्णश्च तवात्मजः ॥

śrutāyuścitrasenaśca purumitro viviṃśatiḥ | śalo bhūriśravāścaiva vikarṇaśca tavātmajaḥ

श्रुतायु, चित्रसेन, पुरुमित्र और विविंशति; शल, भूरिश्रवा और आपका पुत्र विकर्ण।

श्लोक 66 (5.55.66)

अक्षौहिण्यो हि मे राजन्दशैका च समाहृताः । न्यूना परेषां सप्तैव कस्मान्मे स्यात्पराजयः ॥

akṣauhiṇyo hi me rājandaśaikā ca samāhṛtāḥ | nyūnā pareṣāṃ saptaiva kasmānme syātparājayaḥ

हे राजन्, मैंने ग्यारह अक्षौहिणी सेना एकत्र की है; शत्रुओं की उससे कम, केवल सात हैं। फिर मेरी पराजय कैसे हो सकती है?

श्लोक 67 (5.55.67)

बलं त्रिगुणतो हीनं योध्यं प्राह बृहस्पतिः । परेभ्यस्त्रिगुणा चेयं मम राजन्ननीकिनी ॥

balaṃ triguṇato hīnaṃ yodhyaṃ prāha bṛhaspatiḥ | parebhyastriguṇā ceyaṃ mama rājannanīkinī

बृहस्पति ने कहा है कि एक-तिहाई कम सेना से युद्ध करना चाहिए; और हे राजन्, मेरी यह सेना शत्रुओं से एक-तिहाई अधिक है।

श्लोक 68 (5.55.68)

गुणहीनं परेषां च बहु पश्यामि भारत । गुणोदयं बहुगुणमात्मनश्च विशांपते ॥

guṇahīnaṃ pareṣāṃ ca bahu paśyāmi bhārata | guṇodayaṃ bahuguṇamātmanaśca viśāṃpate

हे भारत, शत्रुओं में मैं बहुत-सी गुणहीनता देखता हूँ, और हे प्रजापालक, अपने में बढ़ते हुए अनेक गुण।

श्लोक 69 (5.55.69)

एतत्सर्वं समाज्ञाय बलाग्र्यं मम भारत । न्यूनतां पाण्डवानां च न मोहं गन्तुमर्हसि ॥

etatsarvaṃ samājñāya balāgryaṃ mama bhārata | nyūnatāṃ pāṇḍavānāṃ ca na mohaṃ gantumarhasi

हे भारत, मेरी सेना की यह श्रेष्ठता और पाण्डवों की न्यूनता — यह सब जानकर आपको मोह में नहीं पड़ना चाहिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 70 (5.55.70)

इत्युक्त्वा सञ्जयं भूयः पर्यपृच्छत भारत । विवित्सुः प्राप्तकालानि ज्ञात्वा परपुरञ्जयः ॥

ityuktvā sañjayaṃ bhūyaḥ paryapṛcchata bhārata | vivitsuḥ prāptakālāni jñātvā parapurañjayaḥ

हे भारत, यह कहकर शत्रुनगरों को जीतने वाले दुर्योधन ने समयानुकूल कर्तव्य जानने की इच्छा से संजय से फिर प्रश्न किया।

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