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उद्योग पर्व · अध्याय 57

संजय द्वारा पाण्डव-पक्ष के सहयोगियों का वर्णन

धृतराष्ट्र के पूछने पर कि पाण्डवों की ओर से लड़ने कौन-कौन आए हैं, संजय उनके सहयोगी राजाओं और उनकी सेनाओं के नाम बताते हैं, और यह भी कि पाण्डव-पक्ष के वीरों ने कौरव-पक्ष के योद्धाओं को युद्ध में अपने-अपने भाग के रूप में कैसे बाँट लिया है। धृतराष्ट्र अपने पुत्रों के विषय में निराश हो जाते हैं, पर दुर्योधन डींग मारता है कि उसका पक्ष पाण्डवों से कहीं बढ़कर है। जब धृतराष्ट्र पूछते हैं कि पाण्डवों का उत्साह कौन बढ़ाता है, तो संजय धृष्टद्युम्न की प्रतिज्ञा सुनाते हैं कि वह अकेला समूची कौरव-सेना को रोक लेगा, युधिष्ठिर द्वारा उसकी प्रशंसा बताते हैं, और धृष्टद्युम्न की वह चेतावनी भी कि कौरव अर्जुन के हाथों नष्ट होने से पहले युधिष्ठिर को उनका राज्य लौटा दें।

अध्याय 56अध्याय-सूचीअध्याय 58

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (5.57.1)

कांस्तत्र सञ्जयापश्यः प्रीत्यर्थेन समागतान् । ये योत्स्यन्ते पाण्डवार्थे पुत्रस्य मम वाहिनीम् ॥

kāṃstatra sañjayāpaśyaḥ prītyarthena samāgatān | ye yotsyante pāṇḍavārthe putrasya mama vāhinīm

संजय, तुमने वहाँ पाण्डवों के प्रेमवश किन-किन को एकत्र देखा, जो पाण्डवों की ओर से मेरे पुत्र की सेना से युद्ध करेंगे?

सञ्जय उवाच

श्लोक 2 (5.57.2)

मुख्यमन्धकवृष्णीनामपश्यं कृष्णमागतम् । चेकितानं च तत्रैव युयुधानं च सात्यकिम् ॥

mukhyamandhakavṛṣṇīnāmapaśyaṃ kṛṣṇamāgatam | cekitānaṃ ca tatraiva yuyudhānaṃ ca sātyakim

मैंने वहाँ अन्धकों और वृष्णियों के प्रमुख श्रीकृष्ण को आया हुआ देखा; वहीं चेकितान को और युयुधान सात्यकि को भी देखा।

श्लोक 3 (5.57.3)

पृथगक्षौहिणीभ्यां तु पाण्डवानभिसंश्रितौ । महारथौ समाख्यातावुभौ पुरुषमानिनौ ॥

pṛthagakṣauhiṇībhyāṃ tu pāṇḍavānabhisaṃśritau | mahārathau samākhyātāvubhau puruṣamāninau

वे दोनों अलग-अलग एक-एक अक्षौहिणी सेना लेकर पाण्डवों के पक्ष में आ मिले हैं — दोनों प्रसिद्ध महारथी हैं और अपने पौरुष पर गर्व करते हैं।

श्लोक 4 (5.57.4)

अक्षौहिण्याऽथ पाञ्चाल्यो दशभिस्तनयैर्वृतः । सत्यजित्प्रमुखैर्वीरैर्धृष्टद्युम्नपुरोगमैः ॥

akṣauhiṇyā'tha pāñcālyo daśabhistanayairvṛtaḥ | satyajitpramukhairvīrairdhṛṣṭadyumnapurogamaiḥ

पाञ्चालराज एक अक्षौहिणी सेना के साथ आए हैं, अपने दस पुत्रों से घिरे हुए — सत्यजित् आदि वीर, जिनके अगुआ धृष्टद्युम्न हैं।

श्लोक 5 (5.57.5)

द्रुपदो वर्धयन्मानं शिखण्डिपरिपालितः । उपायात्सर्वसैन्यानां प्रतिच्छाद्य तदा वपुः ॥

drupado vardhayanmānaṃ śikhaṇḍiparipālitaḥ | upāyātsarvasainyānāṃ praticchādya tadā vapuḥ

शिखण्डी से रक्षित द्रुपद पाण्डवों का मान बढ़ाते हुए आए हैं; उस समय उनकी समस्त सेना के शरीर कवचों से ढके थे।

श्लोक 6 (5.57.6)

विराटः सह पुत्राभ्यां शङ्खेनैवोत्तरेण च । सूर्यदत्तादिभिर्वीरैर्मदिराक्षपुरोगमैः ॥

virāṭaḥ saha putrābhyāṃ śaṅkhenaivottareṇa ca | sūryadattādibhirvīrairmadirākṣapurogamaiḥ

विराट अपने दो पुत्रों — शंख और उत्तर — के साथ, और सूर्यदत्त आदि वीरों के साथ, जिनके अगुआ मदिराक्ष हैं,

श्लोक 7 (5.57.7)

सहितः पृथिवीपालो भ्रातृभिस्तनयैस्तथा । अक्षौहिण्यैव सैन्यानां वृतः पार्थं समाश्रितः ॥

sahitaḥ pṛthivīpālo bhrātṛbhistanayaistathā | akṣauhiṇyaiva sainyānāṃ vṛtaḥ pārthaṃ samāśritaḥ

वे पृथ्वीपालक अपने भाइयों और पुत्रों सहित, एक अक्षौहिणी सेना से घिरे हुए, पार्थ के आश्रित हो गए हैं।

श्लोक 8 (5.57.8)

जारासन्धिर्मागधश्च धृष्टकेतुश्च चेदिराट् । पृथक्पृथगनुप्राप्तौ पृथगक्षौहिणीवृतौ ॥

jārāsandhirmāgadhaśca dhṛṣṭaketuśca cedirāṭ | pṛthakpṛthaganuprāptau pṛthagakṣauhiṇīvṛtau

जरासन्ध का पुत्र मगधराज और चेदिराज धृष्टकेतु अलग-अलग आए हैं, दोनों अपनी-अपनी अक्षौहिणी सेना से घिरे हुए।

श्लोक 9 (5.57.9)

केकया भ्रातरः पञ्च सर्वे लोहितकध्वजाः । अक्षौहिणीपरिवृताः पाण्डवानभिसंश्रिताः ॥

kekayā bhrātaraḥ pañca sarve lohitakadhvajāḥ | akṣauhiṇīparivṛtāḥ pāṇḍavānabhisaṃśritāḥ

पाँचों केकय भाई, जिन सबकी ध्वजाएँ लाल हैं, एक अक्षौहिणी सेना से घिरे हुए पाण्डवों के पक्ष में आ गए हैं।

श्लोक 10 (5.57.10)

एतानेतावतस्तत्र तानपश्यं समागतान् । ये पाण्डवार्थे योत्स्यन्ति धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम् ॥

etānetāvatastatra tānapaśyaṃ samāgatān | ye pāṇḍavārthe yotsyanti dhārtarāṣṭrasya vāhinīm

इतने ये सब मैंने वहाँ एकत्र देखे, जो पाण्डवों की ओर से धृतराष्ट्र-पुत्र की सेना से युद्ध करेंगे।

श्लोक 11 (5.57.11)

यो वेद मानुषं व्यूहं दैवं गान्धर्वमासुरम् । स तत्र सेनाप्रमुखे धृष्टद्युम्नो महारथः ॥

yo veda mānuṣaṃ vyūhaṃ daivaṃ gāndharvamāsuram | sa tatra senāpramukhe dhṛṣṭadyumno mahārathaḥ

जो मनुष्यों, देवताओं, गन्धर्वों और असुरों — सबकी व्यूह-रचना जानते हैं, वे महारथी धृष्टद्युम्न वहाँ सेना के अग्रभाग में हैं।

श्लोक 12 (5.57.12)

भीष्मः शान्तनवो राजन्भागः क्लृप्तः शिखण्डिनः । तं विराटोऽनुसंयाता सार्धं मत्स्यैः प्रहारिभिः ॥

bhīṣmaḥ śāntanavo rājanbhāgaḥ klṛptaḥ śikhaṇḍinaḥ | taṃ virāṭo'nusaṃyātā sārdhaṃ matsyaiḥ prahāribhiḥ

हे राजन्, शान्तनुनन्दन भीष्म शिखण्डी के भाग में रखे गए हैं; और विराट अपने प्रहार-कुशल मत्स्य योद्धाओं के साथ उसके पीछे-पीछे चलेंगे।

श्लोक 13 (5.57.13)

ज्येष्ठस्य पाण्डुपुत्रस्य भागो मद्राधिपो बली । तौ तु तत्राब्रुवन्केचिद्विषमौ नो मताविति ॥

jyeṣṭhasya pāṇḍuputrasya bhāgo madrādhipo balī | tau tu tatrābruvankecidviṣamau no matāviti

बलवान मद्रराज पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र के भाग में हैं; पर वहाँ कुछ लोगों ने कहा — 'हमें ये दोनों बराबरी के नहीं लगते।'

श्लोक 14 (5.57.14)

दुर्योधनः सहसुतः सार्धं भ्रातृशतेन च । प्राच्याश्च दाक्षिणात्याश्च भीमसेनस्य भागतः ॥

duryodhanaḥ sahasutaḥ sārdhaṃ bhrātṛśatena ca | prācyāśca dākṣiṇātyāśca bhīmasenasya bhāgataḥ

अपने पुत्रों और सौ भाइयों सहित दुर्योधन, तथा पूर्व और दक्षिण के राजा भीमसेन के भाग में हैं।

श्लोक 15 (5.57.15)

अर्जुनस्य तु भागेन कर्णो वैकर्तनो मतः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सैन्धवश्च जयद्रथः ॥

arjunasya tu bhāgena karṇo vaikartano mataḥ | aśvatthāmā vikarṇaśca saindhavaśca jayadrathaḥ

विकर्तन-पुत्र कर्ण अर्जुन के भाग में माना गया है; और अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सिन्धुराज जयद्रथ भी।

श्लोक 16 (5.57.16)

अशक्याश्चैव ये केचित्पृथिव्यां शूरमानिनः । सर्वांस्तानर्जुनः पार्थः कल्पयामास भागतः ॥

aśakyāścaiva ye kecitpṛthivyāṃ śūramāninaḥ | sarvāṃstānarjunaḥ pārthaḥ kalpayāmāsa bhāgataḥ

और पृथ्वी पर अपने को शूरवीर मानने वाले जो भी योद्धा अजेय समझे जाते हैं, उन सबको पृथापुत्र अर्जुन ने अपने भाग में रख लिया है।

श्लोक 17 (5.57.17)

महेष्वासा राजपुत्रा भ्रातरः पञ्च केकयाः । केकयानेव भागेन कृत्वा योत्स्यन्ति संयुगे ॥

maheṣvāsā rājaputrā bhrātaraḥ pañca kekayāḥ | kekayāneva bhāgena kṛtvā yotsyanti saṃyuge

महान धनुर्धर पाँचों केकय राजकुमार भाई युद्ध में (दूसरे पक्ष के) केकयों को ही अपना भाग बनाकर लड़ेंगे।

श्लोक 18 (5.57.18)

तेषामेव कृतो भागो मालवाः साल्वकास्तथा । त्रिगर्तानां च वै मुख्यौ यौ तौ संशप्तकाविति ॥

teṣāmeva kṛto bhāgo mālavāḥ sālvakāstathā | trigartānāṃ ca vai mukhyau yau tau saṃśaptakāviti

उन्हीं के भाग में मालव और साल्वक भी रखे गए हैं, तथा त्रिगर्तों के वे दो प्रमुख भी, जो संशप्तक कहलाते हैं।

श्लोक 19 (5.57.19)

दुर्योधनसुताः सर्वे तथा दुःशासनस्य च । सौभद्रेण कृतो भागो राजा चैव बृहद्बलः ॥

duryodhanasutāḥ sarve tathā duḥśāsanasya ca | saubhadreṇa kṛto bhāgo rājā caiva bṛhadbalaḥ

दुर्योधन के और दुःशासन के सभी पुत्र, तथा राजा बृहद्बल भी, सुभद्रा-पुत्र (अभिमन्यु) के भाग में रखे गए हैं।

श्लोक 20 (5.57.20)

द्रौपदेया महेष्वासाः सुवर्णविकृतध्वजाः । धृष्टद्युम्नमुखा द्रोणमभियास्यन्ति भारत ॥

draupadeyā maheṣvāsāḥ suvarṇavikṛtadhvajāḥ | dhṛṣṭadyumnamukhā droṇamabhiyāsyanti bhārata

हे भारत, सोने से बनी ध्वजाओं वाले महान धनुर्धर द्रौपदी-पुत्र, धृष्टद्युम्न को आगे करके, द्रोण पर आक्रमण करेंगे।

श्लोक 21 (5.57.21)

चेकितानः सोमदत्तं द्वैरथे योद्धुमिच्छति । भोजं तु कृतवर्माणं युयुधानो युयुत्सति ॥

cekitānaḥ somadattaṃ dvairathe yoddhumicchati | bhojaṃ tu kṛtavarmāṇaṃ yuyudhāno yuyutsati

चेकितान द्वैरथ युद्ध में सोमदत्त से लड़ना चाहते हैं, और युयुधान भोजवंशी कृतवर्मा से युद्ध करने को उत्सुक हैं।

श्लोक 22 (5.57.22)

सहदेवस्तु माद्रेयः शूरः संक्रन्दनो युधि । स्वमंशं कल्पयामास श्यालं ते सुबलात्मजम् ॥

sahadevastu mādreyaḥ śūraḥ saṃkrandano yudhi | svamaṃśaṃ kalpayāmāsa śyālaṃ te subalātmajam

युद्ध में गर्जना करने वाले शूरवीर माद्रीपुत्र सहदेव ने आपके साले सुबलपुत्र (शकुनि) को अपना भाग चुना है।

श्लोक 23 (5.57.23)

उलूकं चैव कैतव्यं ये च सारस्वता गणाः । नकुलः कल्पयामास भागं माद्रवतीसुतः ॥

ulūkaṃ caiva kaitavyaṃ ye ca sārasvatā gaṇāḥ | nakulaḥ kalpayāmāsa bhāgaṃ mādravatīsutaḥ

माद्रवती-पुत्र नकुल ने जुआरी के पुत्र उलूक को और सारस्वत गणों को अपना भाग बनाया है।

श्लोक 24 (5.57.24)

ये चान्ये पार्थिवा राजन्प्रत्युद्यास्यन्ति सङ्गरे । समाह्वानेन तांश्चापि पाण्डुपुत्रा अकल्पयन् ॥

ye cānye pārthivā rājanpratyudyāsyanti saṅgare | samāhvānena tāṃścāpi pāṇḍuputrā akalpayan

हे राजन्, और भी जो राजा युद्ध में उनका सामना करने आगे बढ़ेंगे, उन्हें भी पाण्डुपुत्रों ने ललकार कर आपस में बाँट लिया है।

श्लोक 25 (5.57.25)

एवमेषामनीकानि प्रविभक्तानि भागशः । यत्ते कार्यं सपुत्रस्य क्रियतां तदकालिकम् ॥

evameṣāmanīkāni pravibhaktāni bhāgaśaḥ | yatte kāryaṃ saputrasya kriyatāṃ tadakālikam

इस प्रकार उनकी सेनाएँ भाग-भाग करके बाँट दी गई हैं। आपको और आपके पुत्रों को जो करना हो, वह बिना विलम्ब कीजिए।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 26 (5.57.26)

न सन्ति सर्वे पुत्रा मे मूढा दुर्द्यूतदेविनः । येषां युद्धं बलवता भीमेन रणमूर्धनि ॥

na santi sarve putrā me mūḍhā durdyūtadevinaḥ | yeṣāṃ yuddhaṃ balavatā bhīmena raṇamūrdhani

कपटपूर्ण द्यूत खेलने वाले मेरे वे मूर्ख पुत्र अब नहीं रहे समझो, जिन्हें युद्ध के अग्रभाग में बलवान भीम से लड़ना है।

श्लोक 27 (5.57.27)

राजानः पार्थिवाः सर्वे प्रोक्षिताः कालधर्मणा । गाण्डीवाग्निं प्रवेक्ष्यन्ति पतङ्गा इव पावकम् ॥

rājānaḥ pārthivāḥ sarve prokṣitāḥ kāladharmaṇā | gāṇḍīvāgniṃ pravekṣyanti pataṅgā iva pāvakam

पृथ्वी के सभी राजा, जिन्हें काल-धर्म ने बलि-पशु की भाँति अभिषिक्त कर दिया है, गाण्डीव की अग्नि में वैसे ही प्रवेश करेंगे जैसे पतंगे आग में।

श्लोक 28 (5.57.28)

विद्रुतां वाहिनीं मन्ये कृतवैरैर्महात्मभिः । तां रणे केऽनुयास्यन्ति प्रभग्नां पाण्डवैर्युधि ॥

vidrutāṃ vāhinīṃ manye kṛtavairairmahātmabhiḥ | tāṃ raṇe ke'nuyāsyanti prabhagnāṃ pāṇḍavairyudhi

जिन महात्माओं से हमने वैर बाँध लिया है, उनके द्वारा मैं अपनी सेना को भागती हुई देखता हूँ। जब पाण्डव उसे युद्ध में तोड़ देंगे, तब रण में उसके पीछे कौन जाएगा?

श्लोक 29 (5.57.29)

सर्वे ह्यतिरथाः शूराः कीर्तिमन्तः प्रतापिनः । सूर्यपावकयोस्तुल्यास्तेजसा समितिंजयाः ॥

sarve hyatirathāḥ śūrāḥ kīrtimantaḥ pratāpinaḥ | sūryapāvakayostulyāstejasā samitiṃjayāḥ

वे सभी अतिरथी हैं, शूर हैं, यशस्वी और प्रतापी हैं, तेज में सूर्य और अग्नि के समान हैं, युद्ध में विजयी होने वाले हैं —

श्लोक 30 (5.57.30)

येषां युधिष्ठिरो नेता गोप्ता च मधुसूदनः । योधौ च पाण्डवौ वीरौ सव्यसाचिवृकोदरौ ॥

yeṣāṃ yudhiṣṭhiro netā goptā ca madhusūdanaḥ | yodhau ca pāṇḍavau vīrau savyasācivṛkodarau

जिनके नेता युधिष्ठिर हैं और रक्षक मधुसूदन हैं, जिनके योद्धा दो वीर पाण्डव — सव्यसाची और वृकोदर — हैं,

श्लोक 31 (5.57.31)

नकुलः सहदेवश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । सात्यकिर्द्रुपदश्चैव धृष्टकेतुश्च सानुजः ॥

nakulaḥ sahadevaśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | sātyakirdrupadaścaiva dhṛṣṭaketuśca sānujaḥ

नकुल और सहदेव, पृषत-वंशी धृष्टद्युम्न, सात्यकि और द्रुपद, तथा अपने छोटे भाई सहित धृष्टकेतु,

श्लोक 32 (5.57.32)

उत्तमौजाश्च पाञ्चाल्यो युधामन्युश्च दुर्जयः । शिखण्डी क्षत्रदेवश्च तथा वैराटिरुत्तरः ॥

uttamaujāśca pāñcālyo yudhāmanyuśca durjayaḥ | śikhaṇḍī kṣatradevaśca tathā vairāṭiruttaraḥ

पाञ्चाल उत्तमौजा और दुर्जय युधामन्यु, शिखण्डी, क्षत्रदेव और विराटपुत्र उत्तर,

श्लोक 33 (5.57.33)

काशयश्चेदयश्चैव मत्स्याः सर्वे च सृञ्जयाः । विराटपुत्रो बभ्रुश्च पाञ्चालाश्च प्रभद्रकाः ॥

kāśayaścedayaścaiva matsyāḥ sarve ca sṛñjayāḥ | virāṭaputro babhruśca pāñcālāśca prabhadrakāḥ

काशी और चेदि के योद्धा, मत्स्य और सभी सृञ्जय, विराटपुत्र बभ्रु, तथा पाञ्चाल और प्रभद्रक —

श्लोक 34 (5.57.34)

येषामिन्द्रोऽप्यकामानां न हरेत्पृथिवीमिमाम् । वीराणां रणधीराणां ये भिन्द्युः पर्वतानपि ॥

yeṣāmindro'pyakāmānāṃ na haretpṛthivīmimām | vīrāṇāṃ raṇadhīrāṇāṃ ye bhindyuḥ parvatānapi

वे रण में धीर वीर, जो पर्वतों को भी तोड़ सकते हैं, और जिनकी इच्छा के विरुद्ध इन्द्र भी यह पृथ्वी नहीं छीन सकते।

श्लोक 35 (5.57.35)

तान्सर्वगुणसंपन्नानमनुष्यप्रतापिनः । क्रोशतो मम दुष्पुत्रो योद्धुमिच्छति सञ्जय ॥

tānsarvaguṇasaṃpannānamanuṣyapratāpinaḥ | krośato mama duṣputro yoddhumicchati sañjaya

संजय, सब गुणों से सम्पन्न और अलौकिक प्रताप वाले उन वीरों से मेरा दुष्ट पुत्र लड़ना चाहता है, जबकि मैं चिल्ला-चिल्लाकर रोक रहा हूँ।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 36 (5.57.36)

उभौ स्व एकजातीयौ तथोभौ भूमिगोचरौ । अथ कस्मात्पाण्डवानामेकतो मन्यसे जयम् ॥

ubhau sva ekajātīyau tathobhau bhūmigocarau | atha kasmātpāṇḍavānāmekato manyase jayam

हम दोनों एक ही जाति के हैं और दोनों ही पृथ्वी पर विचरने वाले हैं। तब आप विजय केवल पाण्डवों के ही पक्ष में क्यों मानते हैं?

श्लोक 37 (5.57.37)

पितामहं च द्रोणं च कृपं कर्णं च दुर्जयम् । जयद्रथं सोमदत्तमश्वत्थामानमेव च ॥

pitāmahaṃ ca droṇaṃ ca kṛpaṃ karṇaṃ ca durjayam | jayadrathaṃ somadattamaśvatthāmānameva ca

पितामह, द्रोण, कृप और दुर्जय कर्ण, जयद्रथ, सोमदत्त और अश्वत्थामा —

श्लोक 38 (5.57.38)

सुतेजसो महेष्वासानिन्द्रोऽपि सहितोऽमरैः । अशक्तः समरे जेतुं किं पुनस्तात पाण्डवाः ॥

sutejaso maheṣvāsānindro'pi sahito'maraiḥ | aśaktaḥ samare jetuṃ kiṃ punastāta pāṇḍavāḥ

इन तेजस्वी महान धनुर्धरों को देवताओं सहित इन्द्र भी युद्ध में नहीं जीत सकते; तब पाण्डवों की तो बात ही क्या, पिताजी?

श्लोक 39 (5.57.39)

सर्वे च पृथिवीपाला मदर्थे तात पाण्डवान् । आर्याः शस्त्रभृतः शूराः समर्थाः प्रतिबाधितुं ॥

sarve ca pṛthivīpālā madarthe tāta pāṇḍavān | āryāḥ śastrabhṛtaḥ śūrāḥ samarthāḥ pratibādhituṃ

और पिताजी, पृथ्वी के सभी राजा — जो श्रेष्ठ, शस्त्रधारी और शूरवीर हैं — मेरे लिए पाण्डवों को रोकने में समर्थ हैं।

श्लोक 40 (5.57.40)

न मामकान्पाण्डवास्ते समर्थाः प्रतिवीक्षितुम् । पराक्रान्तो ह्यहं पाण्डून्सपुत्रान्योद्धुमाहवे ॥

na māmakānpāṇḍavāste samarthāḥ prativīkṣitum | parākrānto hyahaṃ pāṇḍūnsaputrānyoddhumāhave

वे पाण्डव मेरे योद्धाओं की ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते। मैं स्वयं पुत्रों सहित पाण्डवों से युद्ध करने में समर्थ हूँ।

श्लोक 41 (5.57.41)

मत्प्रियं पार्थिवाः सर्वे ये चिकीर्षन्ति भारत । ते तानावारयिष्यन्ति ऐणेयानिव तन्तुना ॥

matpriyaṃ pārthivāḥ sarve ye cikīrṣanti bhārata | te tānāvārayiṣyanti aiṇeyāniva tantunā

हे भारत, जो सब राजा मेरा प्रिय करना चाहते हैं, वे उन्हें वैसे ही रोक लेंगे जैसे हिरन के बच्चों को फंदे से रोका जाता है।

श्लोक 42 (5.57.42)

महता रथवंशेन शरजालैश्च मामकैः । अभिद्रुता भविष्यन्ति पाञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥

mahatā rathavaṃśena śarajālaiśca māmakaiḥ | abhidrutā bhaviṣyanti pāñcālāḥ pāṇḍavaiḥ saha

मेरे विशाल रथ-समूह और बाणों के जाल से खदेड़े जाकर पाण्डवों सहित पाञ्चाल भाग खड़े होंगे।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 43 (5.57.43)

उन्मत्त इव मे पुत्रो विलपत्येष सञ्जय । न हि शक्तो रणे जेतुं धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥

unmatta iva me putro vilapatyeṣa sañjaya | na hi śakto raṇe jetuṃ dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram

संजय, मेरा यह पुत्र पागल की तरह प्रलाप कर रहा है। यह धर्मराज युधिष्ठिर को युद्ध में नहीं जीत सकता।

श्लोक 44 (5.57.44)

जानाति हि यथा भीष्मः पाण्डवानां यशस्विनाम् । बलवत्तां सपुत्राणां धर्मज्ञानां महात्मनाम् ॥

jānāti hi yathā bhīṣmaḥ pāṇḍavānāṃ yaśasvinām | balavattāṃ saputrāṇāṃ dharmajñānāṃ mahātmanām

क्योंकि भीष्म भली-भाँति जानते हैं कि यशस्वी, धर्मज्ञ और महात्मा पाण्डव अपने पुत्रों सहित कितने बलवान हैं;

श्लोक 45 (5.57.45)

यतो नारोचयदयं विग्रहं तैर्महात्मभिः । किं तु सञ्जय मे ब्रूहि पुनस्तेषां विचेष्टितम् ॥

yato nārocayadayaṃ vigrahaṃ tairmahātmabhiḥ | kiṃ tu sañjaya me brūhi punasteṣāṃ viceṣṭitam

इसीलिए उन्होंने उन महात्माओं से विग्रह को उचित नहीं माना। पर संजय, मुझे फिर बताओ कि वे क्या कर रहे हैं।

श्लोक 46 (5.57.46)

कस्तांस्तरस्विनो भूयः सन्दीपयति पाण्डवान् । अर्चिष्मतो महेष्वासान्हविषा पावकानिव ॥

kastāṃstarasvino bhūyaḥ sandīpayati pāṇḍavān | arciṣmato maheṣvāsānhaviṣā pāvakāniva

उन वेगशाली, तेजस्वी, महान धनुर्धर पाण्डवों को कौन बार-बार वैसे ही उद्दीप्त करता है, जैसे आहुति से अग्नियों को?

सञ्जय उवाच

श्लोक 47 (5.57.47)

धृष्टद्युम्नः सदैवैतान्सन्दीपयति भारत । युद्ध्यध्वमिति माभैष्ट युद्धाद्भरतसत्तमाः ॥

dhṛṣṭadyumnaḥ sadaivaitānsandīpayati bhārata | yuddhyadhvamiti mābhaiṣṭa yuddhādbharatasattamāḥ

हे भारत, धृष्टद्युम्न ही उन्हें सदा उद्दीप्त करता रहता है — 'हे भरतश्रेष्ठो, युद्ध करो; युद्ध से मत डरो।'

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 48 (5.57.48)

ये केचित्पार्थिवास्तत्र धार्तराष्ट्रेण संवृताः । युद्धे समागमिष्यन्ति तुमुले शस्त्रसङ्कुले ॥

ye kecitpārthivāstatra dhārtarāṣṭreṇa saṃvṛtāḥ | yuddhe samāgamiṣyanti tumule śastrasaṅkule

वहाँ धृतराष्ट्र-पुत्र के साथ जुटे जो भी राजा शस्त्रों से भरे भीषण युद्ध में हमसे भिड़ेंगे —

श्लोक 49 (5.57.49)

तान्सर्वानाहवे क्रुद्धान्सानुबन्धान्समागतान् । अहमेकः समादास्ये तिमिर्मत्स्यानिवोदकात् ॥

tānsarvānāhave kruddhānsānubandhānsamāgatān | ahamekaḥ samādāsye timirmatsyānivodakāt

क्रोध में भरे, अपने बन्धु-बान्धवों सहित आए उन सबको मैं अकेला ही युद्ध में वैसे ही पकड़ लूँगा, जैसे तिमि मछली जल से मछलियों को पकड़ लेती है।

श्लोक 50 (5.57.50)

भीष्मं द्रोणं कृपं कर्णं द्रौणिं शल्यं सुयोधनम् । एतांश्चापि निरोत्स्यामि वेलेव मकरालयम् ॥

bhīṣmaṃ droṇaṃ kṛpaṃ karṇaṃ drauṇiṃ śalyaṃ suyodhanam | etāṃścāpi nirotsyāmi veleva makarālayam

भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, द्रोणपुत्र, शल्य और सुयोधन — इन्हें भी मैं वैसे ही रोक दूँगा जैसे तट समुद्र को रोकता है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 51 (5.57.51)

तथा ब्रुवन्तं धर्मात्मा प्राह राजा युधिष्ठिरः । तव धैर्यं च वीर्यं च पाञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥

tathā bruvantaṃ dharmātmā prāha rājā yudhiṣṭhiraḥ | tava dhairyaṃ ca vīryaṃ ca pāñcālāḥ pāṇḍavaiḥ saha

उसके ऐसा कहने पर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर ने कहा — 'तुम्हारे धैर्य और पराक्रम पर पाण्डवों सहित पाञ्चाल —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 52 (5.57.52)

सर्वे समधिरूढाः स्म सङ्ग्रामान्नः समुद्धर । जानामि त्वां महाबाहो क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम् ॥

sarve samadhirūḍhāḥ sma saṅgrāmānnaḥ samuddhara | jānāmi tvāṃ mahābāho kṣatradharme vyavasthitam

हम सब आश्रित हैं; इस युद्ध से हमारा उद्धार करो। हे महाबाहो, मैं जानता हूँ कि तुम क्षत्रिय-धर्म में दृढ़ हो,

श्लोक 53 (5.57.53)

समर्थमेकं पर्याप्तं कौरवाणां विनिग्रहे । पुरस्तादुपयातानां कौरवाणां युयुत्सताम् ॥

samarthamekaṃ paryāptaṃ kauravāṇāṃ vinigrahe | purastādupayātānāṃ kauravāṇāṃ yuyutsatām

और अकेले ही कौरवों का दमन करने में समर्थ हो — उन कौरवों का, जो युद्ध की इच्छा से हमारे सामने आ डटे हैं।

श्लोक 54 (5.57.54)

भवता यद्विधातव्यं तन्नः श्रेयः परंतप । सङ्ग्रामादपयातानां भग्नानां शरणैषिणाम् ॥

bhavatā yadvidhātavyaṃ tannaḥ śreyaḥ paraṃtapa | saṅgrāmādapayātānāṃ bhagnānāṃ śaraṇaiṣiṇām

हे परन्तप, तुम जो निश्चय करोगे वही हमारे लिए परम कल्याणकारी है। जब लोग युद्ध से भाग रहे हों, टूट चुके हों और शरण खोज रहे हों,

श्लोक 55 (5.57.55)

पौरुषं दर्शयञ्शूरो यस्तिष्ठेदग्रतः पुमान् । क्रीणीयात्तं सहस्रेण इति नीतिमतां मतम् ॥

pauruṣaṃ darśayañśūro yastiṣṭhedagrataḥ pumān | krīṇīyāttaṃ sahasreṇa iti nītimatāṃ matam

तब जो शूर पुरुष अपना पौरुष दिखाता हुआ उनके आगे डटकर खड़ा हो जाए, उसे हज़ार (मुद्राओं) से भी मोल ले लेना चाहिए — ऐसा नीतिज्ञों का मत है।

श्लोक 56 (5.57.56)

स त्वं शूरश्च वीरश्च विक्रान्तश्च नरर्षभ । भयार्तानां परित्राता संयुगेषु न संशयः ॥

sa tvaṃ śūraśca vīraśca vikrāntaśca nararṣabha | bhayārtānāṃ paritrātā saṃyugeṣu na saṃśayaḥ

हे नरश्रेष्ठ, तुम वैसे ही शूर, वीर और पराक्रमी हो; निस्सन्देह तुम युद्ध में भयभीत लोगों के रक्षक हो।'

सञ्जय उवाच

श्लोक 57 (5.57.57)

एवं ब्रुवति कौन्तेये धर्मात्मनि युधिष्ठिरे । धृष्टद्युम्न उवाचेदं मां वचो गतसाध्वसम् । सर्वाञ्जनपदान्सूत योधा दुर्योधनस्य ये ॥

evaṃ bruvati kaunteye dharmātmani yudhiṣṭhire | dhṛṣṭadyumna uvācedaṃ māṃ vaco gatasādhvasam | sarvāñjanapadānsūta yodhā duryodhanasya ye

जब कुन्तीपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिर ऐसा कह रहे थे, तब धृष्टद्युम्न ने मुझसे ये निर्भय वचन कहे — 'हे सूत, दुर्योधन के जितने भी योद्धा-जनपद हैं —

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 58 (5.57.58)

सबाह्लिकान्कुरून्ब्रूयाः प्रातिपेयाञ्शरद्वतः । सूतपुत्रं तथा द्रोणं सहपुत्रं जयद्रथम् ॥

sabāhlikānkurūnbrūyāḥ prātipeyāñśaradvataḥ | sūtaputraṃ tathā droṇaṃ sahaputraṃ jayadratham

बाह्लिकों सहित कुरुओं, प्रतीप के वंशजों और शरद्वान् के कुल वालों, सूतपुत्र (कर्ण), पुत्र सहित द्रोण और जयद्रथ,

श्लोक 59 (5.57.59)

दुःशासनं विकर्णं च तथा दुर्योधनं नृपम् । भीष्मं च ब्रूहि गत्वा त्वमाशु गच्छ च माचिरम् ॥

duḥśāsanaṃ vikarṇaṃ ca tathā duryodhanaṃ nṛpam | bhīṣmaṃ ca brūhi gatvā tvamāśu gaccha ca māciram

दुःशासन, विकर्ण और राजा दुर्योधन से, और भीष्म से भी — जाकर शीघ्र कहो; जाओ, देर मत करो —

श्लोक 60 (5.57.60)

युधिष्ठिरः साधुनैवाभ्युपेयो । मा वोऽवधीदर्जुनो देवगुप्तः । राज्यं दद्ध्वं धर्मराजस्य तूर्णं । याचध्वं वै पाण्डवं लोकवीरम् ॥

yudhiṣṭhiraḥ sādhunaivābhyupeyo | mā vo'vadhīdarjuno devaguptaḥ | rājyaṃ daddhvaṃ dharmarājasya tūrṇaṃ | yācadhvaṃ vai pāṇḍavaṃ lokavīram

युधिष्ठिर के पास सद्भाव से ही जाना चाहिए, ताकि देवताओं से रक्षित अर्जुन तुम्हारा वध न करें। धर्मराज को शीघ्र उनका राज्य दे दो; लोक-विख्यात वीर उस पाण्डव से (शान्ति की) याचना करो।

श्लोक 61 (5.57.61)

नैतादृशो हि योधोऽस्ति पृथिव्यामिह कश्चन । यथाविधः सव्यसाची पाण्डवः सत्यविक्रमः ॥

naitādṛśo hi yodho'sti pṛthivyāmiha kaścana | yathāvidhaḥ savyasācī pāṇḍavaḥ satyavikramaḥ

क्योंकि इस पृथ्वी पर सत्य-पराक्रमी पाण्डव सव्यसाची जैसा कोई योद्धा नहीं है।

श्लोक 62 (5.57.62)

देवैर्हि संभृतो दिव्यो रथो गाण्डीवधन्वनः । न स जेयो मनुष्येण मा स्म कृद्ध्वं मनो युधि ॥

devairhi saṃbhṛto divyo ratho gāṇḍīvadhanvanaḥ | na sa jeyo manuṣyeṇa mā sma kṛddhvaṃ mano yudhi

गाण्डीवधारी का दिव्य रथ देवताओं ने सजाया है; कोई मनुष्य उसे नहीं जीत सकता। युद्ध में मन मत लगाओ।'

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