उद्योग पर्व · अध्याय 58
दुर्योधन का रण-यज्ञ
धृतराष्ट्र दुर्योधन से युद्ध से लौट आने और पाण्डवों को उनका उचित भाग देने की विनती करते हैं, और याद दिलाते हैं कि कुरुवंश के कोई भी बड़े-बूढ़े युद्ध नहीं चाहते, कर्ण, दुःशासन और शकुनि ही उसे उकसा रहे हैं। दुर्योधन उत्तर देता है कि वह किसी बड़े के भरोसे नहीं है: उसने और कर्ण ने युधिष्ठिर को बलि-पशु बनाकर रण-यज्ञ की दीक्षा ले ली है, और वह सुई की नोक भर भूमि भी नहीं छोड़ेगा। धृतराष्ट्र उसका त्याग कर देते हैं, उसके पीछे मृत्यु की ओर जाने वालों के लिए शोक करते हैं, और भविष्यवाणी करते हैं कि भीम और सात्यकि कौरव-सेना का कैसा संहार करेंगे; फिर वे संजय से दोबारा प्रश्न करते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (5.58.1)
क्षत्रतेजा ब्रह्मचारी कौमारादपि पाण्डवः । तेन संयुगमेष्यन्ति मन्दा विलपतो मम ॥
kṣatratejā brahmacārī kaumārādapi pāṇḍavaḥ | tena saṃyugameṣyanti mandā vilapato mama
वह पाण्डव बचपन से ही क्षत्रिय-तेज से युक्त और ब्रह्मचारी रहा है; और मेरे विलाप करते रहने पर भी ये मूर्ख उसी से युद्ध करने जाएँगे।
श्लोक 2 (5.58.2)
दुर्योधन निवर्तस्व युद्धाद्भरतसत्तम । न हि युद्धं प्रशंसन्ति सर्वावस्थमरिन्दम ॥
duryodhana nivartasva yuddhādbharatasattama | na hi yuddhaṃ praśaṃsanti sarvāvasthamarindama
दुर्योधन, हे भरतश्रेष्ठ, युद्ध से लौट आओ। हे शत्रुदमन, ज्ञानी किसी भी अवस्था में युद्ध की प्रशंसा नहीं करते।
श्लोक 3 (5.58.3)
अलमर्धं पृथिव्यास्ते सहामात्यस्य जीवितुम् । प्रयच्छ पाण्डुपुत्राणां यथोचितमरिन्दम ॥
alamardhaṃ pṛthivyāste sahāmātyasya jīvitum | prayaccha pāṇḍuputrāṇāṃ yathocitamarindama
मन्त्रियों सहित तुम्हारे जीवन-निर्वाह के लिए आधी पृथ्वी पर्याप्त है। हे शत्रुदमन, पाण्डुपुत्रों को उनका उचित भाग दे दो।
श्लोक 4 (5.58.4)
एतद्धि कुरवः सर्वे मन्यन्ते धर्मसंहितम् । यत्त्वं प्रशान्तिं मन्येथाः पाण्डुपुत्रैर्महात्मभिः ॥
etaddhi kuravaḥ sarve manyante dharmasaṃhitam | yattvaṃ praśāntiṃ manyethāḥ pāṇḍuputrairmahātmabhiḥ
क्योंकि सभी कुरुवंशी इसी को धर्मसम्मत मानते हैं कि तुम महात्मा पाण्डुपुत्रों के साथ शान्ति का विचार करो।
श्लोक 5 (5.58.5)
अङ्गेमां समवेक्षस्व पुत्र स्वामेव वाहिनीम् । जात एष तवाभावस्त्वं तु मोहान्न बुद्ध्यसे ॥
aṅgemāṃ samavekṣasva putra svāmeva vāhinīm | jāta eṣa tavābhāvastvaṃ tu mohānna buddhyase
पुत्र, ज़रा अपनी ही इस सेना को ध्यान से देखो — तुम्हारा विनाश तो उत्पन्न हो चुका है, पर मोहवश तुम इसे समझ नहीं रहे।
श्लोक 6 (5.58.6)
न त्वहं युद्धमिच्छामि नैतदिच्छति बाह्लिकः । न च भीष्मो न च द्रोणो नाश्वत्थामा न सञ्जयः ॥
na tvahaṃ yuddhamicchāmi naitadicchati bāhlikaḥ | na ca bhīṣmo na ca droṇo nāśvatthāmā na sañjayaḥ
मैं युद्ध नहीं चाहता, न बाह्लीक चाहते हैं; न भीष्म, न द्रोण, न अश्वत्थामा और न संजय;
श्लोक 7 (5.58.7)
न सोमदत्तो न शलो न कृपो युद्धमिच्छति । सत्यव्रतः पुरुमित्रो जयो भूरिश्रवास्तथा ॥
na somadatto na śalo na kṛpo yuddhamicchati | satyavrataḥ purumitro jayo bhūriśravāstathā
न सोमदत्त, न शल और न कृप युद्ध चाहते हैं; न सत्यव्रत, पुरुमित्र, जय और भूरिश्रवा ही।
श्लोक 8 (5.58.8)
येषु संप्रतितिष्ठेयुः कुरवः पीडिताः परैः । ते युद्धं नाभिनन्दन्ति तत्तुभ्यं तात रोचताम् ॥
yeṣu saṃpratitiṣṭheyuḥ kuravaḥ pīḍitāḥ paraiḥ | te yuddhaṃ nābhinandanti tattubhyaṃ tāta rocatām
शत्रुओं से पीड़ित होने पर कुरुवंशी जिनके सहारे टिकेंगे, वे ही युद्ध का स्वागत नहीं करते। पुत्र, यही बात तुम्हें भी रुचनी चाहिए।
श्लोक 9 (5.58.9)
न त्वं करोषि कामेन कर्णः कारयिता तव । दुःशासनश्च पापात्मा शकुनिश्चापि सौबलः ॥
na tvaṃ karoṣi kāmena karṇaḥ kārayitā tava | duḥśāsanaśca pāpātmā śakuniścāpi saubalaḥ
तुम यह अपनी इच्छा से नहीं कर रहे। तुमसे यह कर्ण करवा रहा है, और पापी दुःशासन तथा सुबलपुत्र शकुनि भी।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 10 (5.58.10)
नाहं भवति न द्रोणे नाश्वत्थाम्नि न सञ्जये । न भीष्मे न काम्भोजे न कृपे न च बाह्लिके ॥
nāhaṃ bhavati na droṇe nāśvatthāmni na sañjaye | na bhīṣme na kāmbhoje na kṛpe na ca bāhlike
न आप पर, न द्रोण पर, न अश्वत्थामा या संजय पर, न भीष्म पर, न काम्बोजराज पर, न कृप पर और न बाह्लीक पर,
श्लोक 11 (5.58.11)
सत्यव्रते पुरुमित्रे भूरिश्रवसि वा पुनः । अन्येषु वा तावकेषु भारं कृत्वा समाह्वयम् ॥
satyavrate purumitre bhūriśravasi vā punaḥ | anyeṣu vā tāvakeṣu bhāraṃ kṛtvā samāhvayam
न सत्यव्रत पर, न पुरुमित्र पर, न भूरिश्रवा पर, और न आपके किसी अन्य व्यक्ति पर भार डालकर मैंने (पाण्डवों को) ललकारा है।
श्लोक 12 (5.58.12)
अहं च तात कर्णश्च रणयज्ञं वितत्य वै । युधिष्ठिरं पशुं कृत्वा दीक्षितौ भरतर्षभ ॥
ahaṃ ca tāta karṇaśca raṇayajñaṃ vitatya vai | yudhiṣṭhiraṃ paśuṃ kṛtvā dīkṣitau bharatarṣabha
पिताजी, मैंने और कर्ण ने रण-यज्ञ का विस्तार किया है, और हे भरतश्रेष्ठ, युधिष्ठिर को बलि-पशु बनाकर हम दोनों उसकी दीक्षा ले चुके हैं।
श्लोक 13 (5.58.13)
रथो वेदी स्रुवः खड्गो गदा स्रुक् कवचोऽजिनम् । चातुर्होत्रं च धुर्या मे शरा दर्भा हविर्यशः ॥
ratho vedī sruvaḥ khaḍgo gadā sruk kavaco'jinam | cāturhotraṃ ca dhuryā me śarā darbhā haviryaśaḥ
रथ वेदी है, तलवार स्रुवा, गदा स्रुक् और कवच मृगचर्म; मेरे रथ के चार घोड़े चार होता हैं, बाण कुश हैं और यश हवि है।
श्लोक 14 (5.58.14)
आत्मयज्ञेन नृपते इष्ट्वा वैवस्वतं रणे । विजित्य च समेष्यावो हतामित्रौ श्रिया वृतौ ॥
ātmayajñena nṛpate iṣṭvā vaivasvataṃ raṇe | vijitya ca sameṣyāvo hatāmitrau śriyā vṛtau
हे राजन्, रण में आत्म-यज्ञ के द्वारा वैवस्वत यम का यजन करके हम दोनों शत्रुओं को मारकर, विजय पाकर और लक्ष्मी से युक्त होकर लौटेंगे।
श्लोक 15 (5.58.15)
अहं च तात कर्णश्च भ्राता दुःशासनश्च मे । एते वयं हनिष्यामः पाण्डवान्समरे त्रयः ॥
ahaṃ ca tāta karṇaśca bhrātā duḥśāsanaśca me | ete vayaṃ haniṣyāmaḥ pāṇḍavānsamare trayaḥ
पिताजी, मैं, कर्ण और मेरा भाई दुःशासन — हम तीनों युद्ध में पाण्डवों को मार डालेंगे।
श्लोक 16 (5.58.16)
अहं हि पाण्डवान्हत्वा प्रशास्ता पृथिवीमिमाम् । मां वा हत्वा पाण्डुपुत्रा भोक्तारः पृथिवीमिमां ॥
ahaṃ hi pāṇḍavānhatvā praśāstā pṛthivīmimām | māṃ vā hatvā pāṇḍuputrā bhoktāraḥ pṛthivīmimāṃ
या तो मैं पाण्डवों को मारकर इस पृथ्वी पर शासन करूँगा, या पाण्डुपुत्र मुझे मारकर इस पृथ्वी का भोग करेंगे।
श्लोक 17 (5.58.17)
त्यक्तं मे जीवितं राज्यं धनं सर्वं च पार्थिव । न जातु पाण्डवैः सार्धं वसेयमहमच्युत ॥
tyaktaṃ me jīvitaṃ rājyaṃ dhanaṃ sarvaṃ ca pārthiva | na jātu pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ vaseyamahamacyuta
हे पृथ्वीपति, मैंने जीवन, राज्य, धन — सब कुछ त्याग दिया है; हे अच्युत, मैं पाण्डवों के साथ कभी नहीं रहूँगा।
श्लोक 18 (5.58.18)
यावद्धि सूच्यास्तीक्ष्णाया विध्येदग्रेण मारिष । तावदप्यपरित्याज्यं भूमेर्नः पाण्डवान्प्रति ॥
yāvaddhi sūcyāstīkṣṇāyā vidhyedagreṇa māriṣa | tāvadapyaparityājyaṃ bhūmernaḥ pāṇḍavānprati
हे मान्यवर, तीखी सुई की नोक जितनी भूमि छेद सकती है, उतनी भूमि भी हम पाण्डवों के लिए नहीं छोड़ेंगे।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 19 (5.58.19)
सर्वान्वस्तात शोचामि त्यक्तो दुर्योधनो मया । ये मन्दमनुयास्यध्वं यान्तं वैवस्वतक्षयम् ॥
sarvānvastāta śocāmi tyakto duryodhano mayā | ye mandamanuyāsyadhvaṃ yāntaṃ vaivasvatakṣayam
पुत्रो, मैं तुम सबके लिए शोक करता हूँ; दुर्योधन को तो मैंने त्याग दिया। तुम, जो यमलोक को जाते हुए इस मूर्ख के पीछे जाओगे —
श्लोक 20 (5.58.20)
रुरूणामिव यूथेषु व्याघ्राः प्रहरतां वराः । वरान्वरान्हनिष्यन्ति समेता युधि पाण्डवाः ॥
rurūṇāmiva yūtheṣu vyāghrāḥ praharatāṃ varāḥ | varānvarānhaniṣyanti sametā yudhi pāṇḍavāḥ
जैसे रुरु मृगों के झुंडों में प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ बाघ, वैसे ही एकजुट पाण्डव युद्ध में तुम्हारे श्रेष्ठ-श्रेष्ठ वीरों को चुन-चुनकर मारेंगे।
श्लोक 21 (5.58.21)
प्रतीपमिव मे भाति युयुधानेन भारती । व्यस्ता सीमन्तिनी ग्रस्ता प्रमृष्टा दीर्घबाहुना ॥
pratīpamiva me bhāti yuyudhānena bhāratī | vyastā sīmantinī grastā pramṛṣṭā dīrghabāhunā
मुझे ऐसा दिखता है कि महाबाहु युयुधान भारती सेना को पीछे धकेल देंगे, और वह किसी असहाय स्त्री की भाँति बिखरी, पकड़ी और रौंदी हुई होगी।
श्लोक 22 (5.58.22)
संपूर्णं पूरयन्भूयो धनं पार्थस्य माधवः । शैनेयः समरे स्थाता बीजवत्प्रवपञ्शरान् ॥
saṃpūrṇaṃ pūrayanbhūyo dhanaṃ pārthasya mādhavaḥ | śaineyaḥ samare sthātā bījavatpravapañśarān
शिनि का पौत्र माधव (सात्यकि) पार्थ के पहले से भरे भण्डार को और भरता हुआ, बीज की तरह बाण बोता हुआ युद्ध में डटा रहेगा।
श्लोक 23 (5.58.23)
सेनामुखे प्रयुद्धानां भीमसेनो भविष्यति । तं सर्वे संश्रयिष्यन्ति प्राकारमकुतोभयम् ॥
senāmukhe prayuddhānāṃ bhīmaseno bhaviṣyati | taṃ sarve saṃśrayiṣyanti prākāramakutobhayam
लड़ने वाली सेना के अग्रभाग में भीमसेन होंगे, और सब उन्हीं का आश्रय लेंगे, जैसे किसी निर्भय परकोटे का।
श्लोक 24 (5.58.24)
यदा द्रक्ष्यसि भीमेन कुञ्जरान्विनिपातितान् । विशीर्णदन्तान्गिर्याभान्भिन्नकुम्भान्सशोणितान् ॥
yadā drakṣyasi bhīmena kuñjarānvinipātitān | viśīrṇadantāngiryābhānbhinnakumbhānsaśoṇitān
जब तुम भीम के द्वारा गिराए गए पर्वत जैसे हाथियों को देखोगे, जिनके दाँत टूटे होंगे, कुम्भस्थल फटे होंगे और जो रक्त से लथपथ होंगे —
श्लोक 25 (5.58.25)
तानभिप्रेक्ष्य सङ्ग्रामे विशीर्णानिव पर्वतान् । भीतो भीमस्य संस्पर्शात्स्मर्तासि वचनस्य मे ॥
tānabhiprekṣya saṅgrāme viśīrṇāniva parvatān | bhīto bhīmasya saṃsparśātsmartāsi vacanasya me
युद्ध में उन्हें बिखरे हुए पर्वतों की तरह देखकर, भीम के स्पर्श से भयभीत होकर, तुम मेरी बात याद करोगे।
श्लोक 26 (5.58.26)
निर्दग्धं भीमसेनेन सैन्यं रथहयद्विपम् । गतिमग्नेरिव प्रेक्ष्य स्मर्तासि वचनस्य मे ॥
nirdagdhaṃ bhīmasenena sainyaṃ rathahayadvipam | gatimagneriva prekṣya smartāsi vacanasya me
जब तुम रथों, घोड़ों और हाथियों सहित सेना को भीमसेन के द्वारा अग्नि की राह की तरह भस्म हुआ देखोगे, तब मेरी बात याद करोगे।
श्लोक 27 (5.58.27)
महद्वो भयमागामि न चेच्छाम्यथ पाण्डवैः । गदया भीमसेनेन हताः शममुपैष्यथ ॥
mahadvo bhayamāgāmi na cecchāmyatha pāṇḍavaiḥ | gadayā bhīmasenena hatāḥ śamamupaiṣyatha
यदि तुम पाण्डवों से सन्धि नहीं करोगे तो तुम पर बड़ा भय आने वाला है; भीमसेन की गदा से मारे जाकर तुम (मृत्यु की) शान्ति पाओगे।
श्लोक 28 (5.58.28)
महावनमिव च्छिन्नं यदा द्रक्ष्यसि पातितम् । बलं कुरूणां भीमेन तदा स्मर्तासि मे वचः ॥
mahāvanamiva cchinnaṃ yadā drakṣyasi pātitam | balaṃ kurūṇāṃ bhīmena tadā smartāsi me vacaḥ
जब तुम कौरवों की सेना को भीम के द्वारा कटे हुए विशाल वन की तरह गिरी हुई देखोगे, तब मेरी बात याद करोगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (5.58.29)
एतावदुक्त्वा राजा तु सर्वांस्तान्पृथिवीपतीन् । अनुभाष्य महाराज पुनः पप्रच्छ सञ्जयम् ॥
etāvaduktvā rājā tu sarvāṃstānpṛthivīpatīn | anubhāṣya mahārāja punaḥ papraccha sañjayam
हे महाराज, इतना कहकर और उन सब राजाओं से बात करके राजा (धृतराष्ट्र) ने फिर संजय से पूछा।