उद्योग पर्व · अध्याय 71
युधिष्ठिर का श्रीकृष्ण से कौरवों के पास जाने का अनुरोध
सञ्जय के जाने के बाद युधिष्ठिर अपने सहयोगियों के साथ श्रीकृष्ण के पास जाते हैं और अपनी स्थिति रखते हैं: धृतराष्ट्र राज्य लौटाए बिना शान्ति चाहते हैं, दुर्योधन ने पाँच गाँव भी देने से मना कर दिया है, और उनके कुल के मनुष्य के लिए निर्धनता मृत्यु से भी बुरी है — फिर भी जाति-बन्धुओं और गुरुजनों से युद्ध पाप है जो अन्तहीन वैर को जन्म देता है, इसलिए झुककर मिली शान्ति ही श्रेष्ठ होती, यदि पुत्र के वश में पड़े धृतराष्ट्र उसे स्वीकार करते। श्रीकृष्ण दोनों पक्षों के हित में शान्ति के लिए कुरुसभा में जाने का निश्चय करते हैं। युधिष्ठिर दुर्योधन के राजाओं के बीच उनकी सुरक्षा को लेकर चिन्तित होते हैं, पर श्रीकृष्ण कहते हैं कि कोई उनके सामने टिक नहीं सकता और यह यात्रा या तो सफल होगी या कम से कम उन्हें निन्दा से मुक्त रखेगी; तब युधिष्ठिर उन्हें आशीर्वाद देकर विदा करते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (5.71.1)
प्रयाते सञ्जये साधौ कौरवान्प्रति वै तदा । किं चक्रुः पाण्डवास्तत्र मम पूर्वपितामहाः ॥
prayāte sañjaye sādhau kauravānprati vai tadā | kiṃ cakruḥ pāṇḍavāstatra mama pūrvapitāmahāḥ
जब साधु सञ्जय कौरवों की ओर लौट गए, तब मेरे प्रपितामह पाण्डवों ने वहाँ क्या किया?
श्लोक 2 (5.71.2)
एतत्सर्वं द्विजश्रेष्ठ विस्तरं मम सत्तम । कथयस्व प्रयत्नेन श्रोतुमिच्छामि पण्डित ॥
etatsarvaṃ dvijaśreṣṭha vistaraṃ mama sattama | kathayasva prayatnena śrotumicchāmi paṇḍita
हे द्विजश्रेष्ठ, हे सत्पुरुष, यह सब मुझे विस्तार से और यत्नपूर्वक बताइए; हे विद्वन्, मैं इसे सुनना चाहता हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (5.71.3)
सञ्जये प्रतियाते तु धर्मराजो युधिष्ठिरः । अर्जुनं भीमसेनं च माद्रीपुत्रौ च भारत ॥
sañjaye pratiyāte tu dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | arjunaṃ bhīmasenaṃ ca mādrīputrau ca bhārata
हे भारत, सञ्जय के लौट जाने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने अर्जुन, भीमसेन, माद्री के दोनों पुत्रों,
श्लोक 4 (5.71.4)
विराटं द्रुपदं चैव केकयानां महारथान् । अब्रवीदुपसङ्गम्य शङ्खचक्रगदाधरम् । अभियाचामहे गत्वा प्रयातुं कुरुसंसदम् ॥
virāṭaṃ drupadaṃ caiva kekayānāṃ mahārathān | abravīdupasaṅgamya śaṅkhacakragadādharam | abhiyācāmahe gatvā prayātuṃ kurusaṃsadam
विराट, द्रुपद और केकयों के महारथियों से कहा — “चलो, शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले के पास चलकर हम उनसे कुरुओं की सभा में जाने की प्रार्थना करें,
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 5 (5.71.5)
यथा भीष्मेण द्रोणेन बाह्लीकेन च धीमता । अन्यैश्च कुरुभिः सार्धं न युध्येमहि संयुगे ॥
yathā bhīṣmeṇa droṇena bāhlīkena ca dhīmatā | anyaiśca kurubhiḥ sārdhaṃ na yudhyemahi saṃyuge
जिससे हमें भीष्म, द्रोण, बुद्धिमान बाह्लीक और दूसरे कुरुओं के साथ युद्ध में न लड़ना पड़े।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (5.71.6)
एष नः प्रथमः कल्प एतन्नः श्रेय उत्तमम् । एवमुक्ताः सुमनसस्तेऽभिजग्मुर्जनार्दनम् ॥
eṣa naḥ prathamaḥ kalpa etannaḥ śreya uttamam | evamuktāḥ sumanasaste'bhijagmurjanārdanam
यही हमारा पहला उपाय और परम कल्याण है।” ऐसा कहे जाने पर वे प्रसन्नचित्त होकर जनार्दन के पास गए —
श्लोक 7 (5.71.7)
पाण्डवैः सह राजानो मरुत्वन्त इवामराः । तदा च दुःसहाः सर्वे सदस्यास्ते नरर्षभाः ॥
pāṇḍavaiḥ saha rājāno marutvanta ivāmarāḥ | tadā ca duḥsahāḥ sarve sadasyāste nararṣabhāḥ
पाण्डवों के साथ वे राजा, मानो मरुद्गणों सहित देवता हों; और तब सभा के वे सभी दुर्धर्ष नरश्रेष्ठ सदस्य भी।
श्लोक 8 (5.71.8)
जनार्दनं समासाद्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अब्रवीत्परवीरघ्नं दाशार्हं पाण्डुनन्दनः ॥
janārdanaṃ samāsādya kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | abravītparavīraghnaṃ dāśārhaṃ pāṇḍunandanaḥ
जनार्दन के पास पहुँचकर कुन्तीपुत्र, पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर ने शत्रुवीरों का संहार करने वाले दाशार्ह से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 9 (5.71.9)
अयं स कालः संप्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल । न च त्वदन्यं पश्यामि यो न आपत्सु तारयेत् ॥
ayaṃ sa kālaḥ saṃprāpto mitrāṇāṃ mitravatsala | na ca tvadanyaṃ paśyāmi yo na āpatsu tārayet
हे मित्रवत्सल, मित्रों के काम आने का यह समय आ पहुँचा है; और तुम्हारे सिवा मुझे कोई नहीं दिखता जो हमें विपत्तियों से पार लगाए।
श्लोक 10 (5.71.10)
त्वां हि माधवमाश्रित्य निर्भया मोघदर्पितम् । धार्तराष्ट्रं सहामात्यं स्वयं समनुयुङ्क्ष्महे ॥
tvāṃ hi mādhavamāśritya nirbhayā moghadarpitam | dhārtarāṣṭraṃ sahāmātyaṃ svayaṃ samanuyuṅkṣmahe
हे माधव, तुम्हारा आश्रय लेकर हम निर्भय होकर व्यर्थ घमंड में चूर धृतराष्ट्र-पुत्र और उसके मन्त्रियों के सामने स्वयं अपनी माँग रखेंगे।
श्लोक 11 (5.71.11)
यथा हि सर्वास्वापत्सु पासि वृष्णीनरिन्दम् । तथा ते पाण्डवा रक्ष्याः पाह्यस्मान्महतो भयात् ॥
yathā hi sarvāsvāpatsu pāsi vṛṣṇīnarindam | tathā te pāṇḍavā rakṣyāḥ pāhyasmānmahato bhayāt
हे शत्रुदमन, जैसे तुम सब विपत्तियों में वृष्णियों की रक्षा करते हो, वैसे ही पाण्डव भी तुम्हारे रक्षणीय हैं; इस महान भय से हमारी रक्षा करो।
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 12 (5.71.12)
अयमस्मि महाबाहो ब्रूहि यत्ते विवक्षितम् । करिष्यामि हि तत्सर्वं यत्त्वं वक्ष्यसि भारत ॥
ayamasmi mahābāho brūhi yatte vivakṣitam | kariṣyāmi hi tatsarvaṃ yattvaṃ vakṣyasi bhārata
हे महाबाहु, मैं उपस्थित हूँ; जो कहना चाहते हो, कहो। हे भारत, तुम जो भी कहोगे, वह सब मैं करूँगा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 13 (5.71.13)
श्रुतं ते धृतराष्ट्रस्य सपुत्रस्य चिकीर्षितम् । एतद्धि सकलं कृष्ण सञ्जयो मां यदब्रवीत् ॥
śrutaṃ te dhṛtarāṣṭrasya saputrasya cikīrṣitam | etaddhi sakalaṃ kṛṣṇa sañjayo māṃ yadabravīt
धृतराष्ट्र और उसके पुत्रों का इरादा तुमने सुन लिया है; हे कृष्ण, सञ्जय ने मुझसे जो कुछ कहा, वह सब यही था।
श्लोक 14 (5.71.14)
मृदुपूर्वं साममिश्रं सममुग्रं च माधव । न कृतं न्यायमास्थाय गर्हिताश्च ततो वयम् ॥
mṛdupūrvaṃ sāmamiśraṃ samamugraṃ ca mādhava | na kṛtaṃ nyāyamāsthāya garhitāśca tato vayam
हे माधव, वह बात आरम्भ में कोमल और सान्त्वना से मिली हुई थी, पर साथ ही कठोर भी थी। न्याय का आश्रय लेकर कुछ नहीं किया गया, और उलटे हमारी ही निन्दा की गई।
श्लोक 15 (5.71.15)
तन्मतं धृतराष्ट्रस्य सोऽस्यात्मा विवृतान्तरः । यथोक्तं दूत आचष्टे वध्यः स्यादन्यथा ब्रुवन् ॥
tanmataṃ dhṛtarāṣṭrasya so'syātmā vivṛtāntaraḥ | yathoktaṃ dūta ācaṣṭe vadhyaḥ syādanyathā bruvan
वही धृतराष्ट्र का मत है; उसमें उसका अन्तर्मन खुलकर सामने आ गया है। दूत वही कहता है जो उससे कहलाया गया हो; अन्यथा कहे तो वह वध के योग्य होगा।
श्लोक 16 (5.71.16)
अप्रदानेन राज्यस्य शान्तिमस्मासु मार्गति । लुब्धः पापेन मनसा चरन्नसममात्मनः ॥
apradānena rājyasya śāntimasmāsu mārgati | lubdhaḥ pāpena manasā carannasamamātmanaḥ
राज्य लौटाए बिना ही वह हमसे शान्ति चाहता है — लोभी, पापी मन वाला, और हमारे साथ बराबरी का व्यवहार न करने वाला।
श्लोक 17 (5.71.17)
यत्तद्द्वादशवर्षाणि वनेषु ह्युषिता वयम् । छद्मना शरदं चैकां धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥
yattaddvādaśavarṣāṇi vaneṣu hyuṣitā vayam | chadmanā śaradaṃ caikāṃ dhṛtarāṣṭrasya śāsanāt
धृतराष्ट्र की आज्ञा से हम बारह वर्ष वनों में रहे और एक वर्ष छिपकर बिताया,
श्लोक 18 (5.71.18)
स्थाता नः समये तस्मिन्धृतराष्ट्र इति प्रभो । नाहास्म समयं कृष्ण तद्धि नो ब्राह्मणा विदुः ॥
sthātā naḥ samaye tasmindhṛtarāṣṭra iti prabho | nāhāsma samayaṃ kṛṣṇa taddhi no brāhmaṇā viduḥ
हे प्रभो, इस भरोसे पर कि धृतराष्ट्र उस शर्त पर हमारे साथ टिके रहेंगे। हे कृष्ण, हमने शर्त नहीं तोड़ी; ब्राह्मण इसे जानते हैं।
श्लोक 19 (5.71.19)
गृद्धो राजा धृतराष्ट्रः स्वधर्मं नानुपश्यति । वश्यत्वात्पुत्रगृद्धित्वान्मन्दस्यान्वेति शासनं ॥
gṛddho rājā dhṛtarāṣṭraḥ svadharmaṃ nānupaśyati | vaśyatvātputragṛddhitvānmandasyānveti śāsanaṃ
लोभी राजा धृतराष्ट्र अपने धर्म की ओर नहीं देखते; दूसरे के वश में होने और पुत्र के लोभ के कारण वे उस मूर्ख के आदेश पर चलते हैं।
श्लोक 20 (5.71.20)
सुयोधनमते तिष्ठन्राजाऽस्मासु जनार्दन । मिथ्याचरति लुब्धः संश्चरन्हि प्रियमात्मनः ॥
suyodhanamate tiṣṭhanrājā'smāsu janārdana | mithyācarati lubdhaḥ saṃścaranhi priyamātmanaḥ
हे जनार्दन, सुयोधन के मत पर चलते हुए राजा लोभवश हमारे साथ झूठा व्यवहार करते हैं, केवल अपना प्रिय साधते हुए।
श्लोक 21 (5.71.21)
इतो दुःखतरं किं नु यदहं मातरं ततः । संविधातुं न शक्नोमि मित्राणां वा जनार्दन ॥
ito duḥkhataraṃ kiṃ nu yadahaṃ mātaraṃ tataḥ | saṃvidhātuṃ na śaknomi mitrāṇāṃ vā janārdana
हे जनार्दन, इससे बढ़कर दुःख क्या होगा कि मैं न अपनी माता का भरण-पोषण कर पाता हूँ, न अपने मित्रों का?
श्लोक 22 (5.71.22)
काशिभिश्चेदिपाञ्चालैर्मत्स्यैश्च मधुसूदन । भवता चैव नाथेन पञ्च ग्रामा वृता मया ॥
kāśibhiścedipāñcālairmatsyaiśca madhusūdana | bhavatā caiva nāthena pañca grāmā vṛtā mayā
हे मधुसूदन, काशी, चेदि, पाञ्चाल और मत्स्य राजाओं के साथ, और तुम्हें अपना रक्षक मानकर, मैंने पाँच गाँव माँगे थे —
श्लोक 23 (5.71.23)
अविस्थलं वृकस्थलं माकन्दी वारणावतम् । अवसानं च गोविन्द कंचिदेवात्र पञ्चमम् ॥
avisthalaṃ vṛkasthalaṃ mākandī vāraṇāvatam | avasānaṃ ca govinda kaṃcidevātra pañcamam
अविस्थल, वृकस्थल, माकन्दी और वारणावत; और हे गोविन्द, पाँचवाँ कोई भी एक निवास-स्थान।
श्लोक 24 (5.71.24)
पञ्च नस्तात दीयन्तां ग्रामा वा नगराणि वा । वसेम सहिता येषु मा च नो भरता नशन् ॥
pañca nastāta dīyantāṃ grāmā vā nagarāṇi vā | vasema sahitā yeṣu mā ca no bharatā naśan
हे तात, हमें पाँच गाँव या नगर ही दे दिए जाएँ, जिनमें हम साथ रह सकें, और हमारे कारण भरतवंशियों का नाश न हो।
श्लोक 25 (5.71.25)
न च तानपि दुष्टात्मा धार्तराष्ट्रोऽनुमन्यते । स्वाम्यमात्मनि मत्वाऽसावतो दुःखतरं नु किं ॥
na ca tānapi duṣṭātmā dhārtarāṣṭro'numanyate | svāmyamātmani matvā'sāvato duḥkhataraṃ nu kiṃ
पर दुष्टात्मा धृतराष्ट्र-पुत्र इन्हें भी देना स्वीकार नहीं करता, क्योंकि वह सारा स्वामित्व अपना ही मानता है। इससे बढ़कर दुःख क्या होगा?
श्लोक 26 (5.71.26)
कुले जातस्य वृद्धस्य परवित्तेषु गृद्ध्यतः । लोभः प्रज्ञानमाहन्ति प्रज्ञा हन्ति हता ह्रियं ॥
kule jātasya vṛddhasya paravitteṣu gṛddhyataḥ | lobhaḥ prajñānamāhanti prajñā hanti hatā hriyaṃ
जब उत्तम कुल में जन्मा और बड़ा हुआ मनुष्य पराए धन का लोभ करता है, तो लोभ उसकी विवेक-बुद्धि को नष्ट कर देता है, और नष्ट हुई बुद्धि उसकी लज्जा को नष्ट कर देती है।
श्लोक 27 (5.71.27)
ह्रीर्हता बाधते धर्मं धर्मो हन्ति हतः श्रियम् । श्रीर्हता पुरुषं हन्ति पुरुषस्याधनं वधः ॥
hrīrhatā bādhate dharmaṃ dharmo hanti hataḥ śriyam | śrīrhatā puruṣaṃ hanti puruṣasyādhanaṃ vadhaḥ
नष्ट हुई लज्जा धर्म को पीड़ित करती है, नष्ट हुआ धर्म श्री को नष्ट करता है, और नष्ट हुई श्री मनुष्य को नष्ट कर देती है। मनुष्य के लिए निर्धनता ही मृत्यु है।
श्लोक 28 (5.71.28)
अधनाद्धि निवर्तन्ते ज्ञातयः सुहृदो द्विजाः । अपुष्पादफलाद्वृक्षाद्यथा कृष्ण पतत्रिणः ॥
adhanāddhi nivartante jñātayaḥ suhṛdo dvijāḥ | apuṣpādaphalādvṛkṣādyathā kṛṣṇa patatriṇaḥ
हे कृष्ण, निर्धन मनुष्य से जाति-बन्धु, मित्र और ब्राह्मण वैसे ही मुँह मोड़ लेते हैं, जैसे फूल और फल से रहित वृक्ष को पक्षी छोड़ देते हैं।
श्लोक 29 (5.71.29)
एतच्च मरणं तात उन्मत्तपतितादिव । ज्ञातयो विनिवर्तन्ते प्रेतसत्वादिवासवः ॥
etacca maraṇaṃ tāta unmattapatitādiva | jñātayo vinivartante pretasatvādivāsavaḥ
हे तात, यही मृत्यु है कि जाति-बन्धु उससे वैसे ही लौट जाते हैं जैसे किसी पागल या पतित से, जैसे मरे हुए मनुष्य को प्राण छोड़ जाते हैं।
श्लोक 30 (5.71.30)
नातः पापीयसीं कांचिदवस्थां शम्बरोऽब्रवीत् । यत्र नैवाऽद्य न प्रातर्भोजनं प्रतिदृश्यते ॥
nātaḥ pāpīyasīṃ kāṃcidavasthāṃ śambaro'bravīt | yatra naivā'dya na prātarbhojanaṃ pratidṛśyate
शम्बर ने कहा था कि उस अवस्था से बुरी कोई अवस्था नहीं, जिसमें न आज भोजन दिखाई देता है, न कल सुबह।
श्लोक 31 (5.71.31)
धनमाहुः परं धर्मं धने सर्वं प्रतिष्ठितम् । जीवन्ति धनिनो लोके मृता ये त्वधना नराः ॥
dhanamāhuḥ paraṃ dharmaṃ dhane sarvaṃ pratiṣṭhitam | jīvanti dhanino loke mṛtā ye tvadhanā narāḥ
धन को परम धर्म कहा गया है; धन पर ही सब कुछ टिका है। संसार में धनवान ही जीते हैं; निर्धन मनुष्य तो मरे हुए के समान हैं।
श्लोक 32 (5.71.32)
ये धनादपकर्षन्ति नरं स्वबलमास्थिताः । ते धर्ममर्थं कामं च प्रमथ्नन्ति नरं च तम् ॥
ye dhanādapakarṣanti naraṃ svabalamāsthitāḥ | te dharmamarthaṃ kāmaṃ ca pramathnanti naraṃ ca tam
जो अपने बल के भरोसे किसी मनुष्य को उसके धन से गिरा देते हैं, वे उसके धर्म, अर्थ और काम को, और उस मनुष्य को भी, नष्ट कर डालते हैं।
श्लोक 33 (5.71.33)
एतामवस्थां प्राप्यैके मरणं वव्रिरे जनाः । ग्रामायैके वनायैके नाशायैके प्रवव्रजुः ॥
etāmavasthāṃ prāpyaike maraṇaṃ vavrire janāḥ | grāmāyaike vanāyaike nāśāyaike pravavrajuḥ
इस अवस्था में पहुँचकर कुछ लोगों ने मृत्यु चुन ली; कुछ किसी गाँव को चले गए, कुछ वन को, और कुछ विनाश की ओर।
श्लोक 34 (5.71.34)
उन्मादमेके पुष्यन्ति यान्त्यन्ये द्विषतां वशम् । दास्यमेके च गच्छन्ति परेषामर्थहेतुना ॥
unmādameke puṣyanti yāntyanye dviṣatāṃ vaśam | dāsyameke ca gacchanti pareṣāmarthahetunā
कुछ उन्माद में पड़ जाते हैं, कुछ शत्रुओं के वश में चले जाते हैं, और कुछ धन के लिए दूसरों के दास बन जाते हैं।
श्लोक 35 (5.71.35)
आपदेवास्य मरणात्पुरुषस्य गरीयसी । श्रियो विनाशस्तद्ध्यस्य निमित्तं धर्मकामयोः ॥
āpadevāsya maraṇātpuruṣasya garīyasī | śriyo vināśastaddhyasya nimittaṃ dharmakāmayoḥ
मनुष्य के लिए विपत्ति मृत्यु से भी भारी है — और विपत्ति है श्री का नाश, क्योंकि श्री ही उसके धर्म और काम का साधन है।
श्लोक 36 (5.71.36)
यदस्य धर्म्यं मरणं शाश्वतं लोकवर्त्मवत् । समन्तात्सर्वभूतानां न तदत्येति कश्चन ॥
yadasya dharmyaṃ maraṇaṃ śāśvataṃ lokavartmavat | samantātsarvabhūtānāṃ na tadatyeti kaścana
उसके लिए मृत्यु तो स्वाभाविक और सनातन है, संसार के सामान्य मार्ग जैसी; कहीं भी कोई प्राणी उसका उल्लंघन नहीं कर पाता।
श्लोक 37 (5.71.37)
न तथा बाध्यते कृष्ण प्रकृत्या निर्धनो जनः । यथा भद्रां श्रियं प्राप्य तया हीनः सुखैधितः ॥
na tathā bādhyate kṛṣṇa prakṛtyā nirdhano janaḥ | yathā bhadrāṃ śriyaṃ prāpya tayā hīnaḥ sukhaidhitaḥ
हे कृष्ण, जन्म से निर्धन मनुष्य उतना दुःखी नहीं होता, जितना वह जो उत्तम श्री पाकर और सुख में पलकर फिर उससे वंचित हो जाता है।
श्लोक 38 (5.71.38)
स तदाऽऽत्मापराधेन संप्राप्तो व्यसनं महत् । सेन्द्रान्गर्हयते देवान्नात्मानं च कथंचन ॥
sa tadā''tmāparādhena saṃprāpto vyasanaṃ mahat | sendrāngarhayate devānnātmānaṃ ca kathaṃcana
अपने ही अपराध से बड़े संकट में पड़कर वह तब इन्द्र सहित देवताओं को दोष देता है, अपने आप को कभी नहीं।
श्लोक 39 (5.71.39)
न चास्य सर्वशास्त्राणि प्रभवन्ति निबर्हणे । सोऽभिक्रुध्यति भृत्यानां सुहृदश्चाभ्यसूयति ॥
na cāsya sarvaśāstrāṇi prabhavanti nibarhaṇe | so'bhikrudhyati bhṛtyānāṃ suhṛdaścābhyasūyati
सारे शास्त्र भी उसके दुःख को मिटाने में समर्थ नहीं होते; वह अपने सेवकों पर क्रोध करता है और मित्रों से ईर्ष्या करता है।
श्लोक 40 (5.71.40)
तत्तदा मन्युरेवैति स भूयः संप्रमुह्यति । स मोहवशमापन्नः क्रूरं कर्म निषेवते ॥
tattadā manyurevaiti sa bhūyaḥ saṃpramuhyati | sa mohavaśamāpannaḥ krūraṃ karma niṣevate
तब उस पर केवल क्रोध ही छाया रहता है और वह और भी मोह में पड़ जाता है; मोह के वश होकर वह क्रूर कर्म करने लगता है।
श्लोक 41 (5.71.41)
पापकर्मतया चैव सङ्करं तेन पुष्यति । सङ्करो नरकायैव सा काष्ठा पापकर्मणाम् ॥
pāpakarmatayā caiva saṅkaraṃ tena puṣyati | saṅkaro narakāyaiva sā kāṣṭhā pāpakarmaṇām
पापकर्म के कारण वह वर्णसंकर को बढ़ाता है; और वर्णसंकर नरक की ओर ही ले जाता है — यही पापकर्मों की अन्तिम परिणति है।
श्लोक 42 (5.71.42)
न चेत्प्रबुध्यते कृष्ण नरकायैव गच्छति । तस्य प्रबोधः प्रज्ञैव प्रज्ञाचक्षुस्तरिष्यति ॥
na cetprabudhyate kṛṣṇa narakāyaiva gacchati | tasya prabodhaḥ prajñaiva prajñācakṣustariṣyati
हे कृष्ण, यदि वह नहीं जागता तो सीधे नरक को जाता है। उसका जागना प्रज्ञा ही है; प्रज्ञा की आँख वाला पार हो जाएगा।
श्लोक 43 (5.71.43)
प्रज्ञालाभे हि पुरुषः शास्त्राण्येवान्ववेक्षते । शास्त्रनिष्ठः पुनर्धर्मं तस्य ह्रीरङ्गमुत्तमम् ॥
prajñālābhe hi puruṣaḥ śāstrāṇyevānvavekṣate | śāstraniṣṭhaḥ punardharmaṃ tasya hrīraṅgamuttamam
प्रज्ञा पाकर मनुष्य शास्त्रों की ओर ही देखता है; शास्त्र में निष्ठा रखकर वह फिर धर्म की ओर लौटता है, और लज्जा उस धर्म का उत्तम अंग है।
श्लोक 44 (5.71.44)
ह्रीमान्हि पापं प्रद्वेष्टि तस्य श्रीरभिवर्धते । श्रीमान्स यावद्भवति तावद्भवति पूरुषः ॥
hrīmānhi pāpaṃ pradveṣṭi tasya śrīrabhivardhate | śrīmānsa yāvadbhavati tāvadbhavati pūruṣaḥ
लज्जावान मनुष्य पाप से द्वेष करता है और उसकी श्री बढ़ती है; जब तक वह श्रीमान रहता है, तभी तक वह सच्चा पुरुष रहता है।
श्लोक 45 (5.71.45)
धर्मनित्यः प्रशान्तात्मा कार्ययोगवहः सदा । नाधर्मे कुरुते बुद्धिं न च पापे प्रवर्तते ॥
dharmanityaḥ praśāntātmā kāryayogavahaḥ sadā | nādharme kurute buddhiṃ na ca pāpe pravartate
सदा धर्म में स्थित, शान्तचित्त और सदा अपने कर्तव्यों का भार उठाने वाला वह अधर्म में मन नहीं लगाता और न पाप में प्रवृत्त होता है।
श्लोक 46 (5.71.46)
अह्रीको वा विमूढो वा नैव स्त्री न पुनः पुमान् । नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति यथा शूद्रस्तथैव सः ॥
ahrīko vā vimūḍho vā naiva strī na punaḥ pumān | nāsyādhikāro dharme'sti yathā śūdrastathaiva saḥ
निर्लज्ज या मूढ़ मनुष्य न स्त्री है, न पुरुष; धर्म में उसका कोई अधिकार नहीं, वह शूद्र के समान ही है।
श्लोक 47 (5.71.47)
ह्रीमानवति देवांश्च पितॄनात्मानमेव च । तेनामृतत्वं व्रजति सा काष्ठा पुण्यकर्मणाम् ॥
hrīmānavati devāṃśca pitṝnātmānameva ca | tenāmṛtatvaṃ vrajati sā kāṣṭhā puṇyakarmaṇām
लज्जावान मनुष्य देवताओं, पितरों और अपनी भी रक्षा करता है; उसी से वह अमरता पाता है — यही पुण्यकर्मों की अन्तिम परिणति है।
श्लोक 48 (5.71.48)
तदिदं मयि ते दृष्टं प्रत्यक्षं मधुसूदन । यथा राज्यात्परिभ्रष्टो वसामि वसतीरिमाः ॥
tadidaṃ mayi te dṛṣṭaṃ pratyakṣaṃ madhusūdana | yathā rājyātparibhraṣṭo vasāmi vasatīrimāḥ
हे मधुसूदन, यह सब तुमने मुझमें प्रत्यक्ष देखा है — कि राज्य से भ्रष्ट होकर मैं किस प्रकार इन निवासों में रह रहा हूँ।
श्लोक 49 (5.71.49)
ते वयं न श्रियं हातुमलं न्यायेन केनचित् । अत्र नो यतमानानां वधश्चेदपि साधु तत् ॥
te vayaṃ na śriyaṃ hātumalaṃ nyāyena kenacit | atra no yatamānānāṃ vadhaścedapi sādhu tat
किसी भी न्याय से हम अपनी राजलक्ष्मी छोड़ नहीं सकते; उसके लिए प्रयत्न करते हुए यदि हमारा वध भी हो जाए, तो वह भी अच्छा है।
श्लोक 50 (5.71.50)
तत्र नः प्रथमः कल्पो यद्वयं ते च माधव । प्रशान्ताः समभूताश्च श्रियं तामश्नुवीमहि ॥
tatra naḥ prathamaḥ kalpo yadvayaṃ te ca mādhava | praśāntāḥ samabhūtāśca śriyaṃ tāmaśnuvīmahi
हे माधव, इसमें हमारा पहला उपाय यह है कि हम और वे शान्त रहकर और समान भाव से उस राजलक्ष्मी का उपभोग करें।
श्लोक 51 (5.71.51)
तत्रैषा परमा काष्ठा रौद्रकर्मक्षयोदया । यद्वयं कौरवान्हत्वा तानि राष्ट्राण्यवाप्नुमः ॥
tatraiṣā paramā kāṣṭhā raudrakarmakṣayodayā | yadvayaṃ kauravānhatvā tāni rāṣṭrāṇyavāpnumaḥ
दूसरी अन्तिम सीमा — जो रौद्र कर्म और विनाश से उपजती है — यह है कि हम कौरवों को मारकर वे राज्य प्राप्त करें।
श्लोक 52 (5.71.52)
ये पुनः स्युरसंबद्धा अनार्याः कृष्ण शत्रवः । तेषामप्यवधः कार्यः किंपुनर्ये स्युरीदृशाः ॥
ye punaḥ syurasaṃbaddhā anāryāḥ kṛṣṇa śatravaḥ | teṣāmapyavadhaḥ kāryaḥ kiṃpunarye syurīdṛśāḥ
हे कृष्ण, जो शत्रु हमसे कोई सम्बन्ध न रखने वाले अनार्य हों, उनका भी वध नहीं करना चाहिए; फिर ऐसे लोगों का तो कहना ही क्या!
श्लोक 53 (5.71.53)
ज्ञातयश्चैव भूयिष्ठाः सहाया गुरवश्च नः । तेषां वधोऽतिपापीयान्किं नु युद्धेऽस्ति शोभनम् ॥
jñātayaścaiva bhūyiṣṭhāḥ sahāyā guravaśca naḥ | teṣāṃ vadho'tipāpīyānkiṃ nu yuddhe'sti śobhanam
उनमें अधिकांश हमारे जाति-बन्धु, सहायक और गुरुजन हैं; उनका वध अत्यन्त पापपूर्ण होगा। युद्ध में भला क्या शुभ है?
श्लोक 54 (5.71.54)
पापः क्षत्रियधर्मोऽयं वयं च क्षत्रबन्धवः । स नः स्वधर्मोऽधर्मो वा वृत्तिरन्या विगर्हिता ॥
pāpaḥ kṣatriyadharmo'yaṃ vayaṃ ca kṣatrabandhavaḥ | sa naḥ svadharmo'dharmo vā vṛttiranyā vigarhitā
यह क्षत्रिय-धर्म पापमय है, और हम क्षत्रिय-कुल में जन्मे हैं। धर्म हो या अधर्म, यही हमारा स्वधर्म है; दूसरी कोई जीविका हमारे लिए निन्दित है।
श्लोक 55 (5.71.55)
शूद्रः करोति शुश्रूषां वैश्या वै पण्यजीविकाः । वयं वधेन जीवामः कपालं ब्राह्मणैर्वृतम् ॥
śūdraḥ karoti śuśrūṣāṃ vaiśyā vai paṇyajīvikāḥ | vayaṃ vadhena jīvāmaḥ kapālaṃ brāhmaṇairvṛtam
शूद्र सेवा करता है, वैश्य व्यापार से जीते हैं; हम वध से जीते हैं, और ब्राह्मणों ने भिक्षापात्र अपनाया है।
श्लोक 56 (5.71.56)
क्षत्रियः क्षत्रियं हन्ति मत्स्यो मत्स्येन जीवति । श्वा श्वानं हन्ति दाशार्ह पश्य धर्मो यथागतः ॥
kṣatriyaḥ kṣatriyaṃ hanti matsyo matsyena jīvati | śvā śvānaṃ hanti dāśārha paśya dharmo yathāgataḥ
क्षत्रिय क्षत्रिय को मारता है, मछली मछली पर जीती है, कुत्ता कुत्ते को मारता है; हे दाशार्ह, देखो, यह धर्म कैसा चला आया है!
श्लोक 57 (5.71.57)
युद्धे कृष्ण कलिर्नित्यं प्राणाः सीदन्ति संयुगे । बलं तु नीतिमाधाय युध्ये जयपराजयौ ॥
yuddhe kṛṣṇa kalirnityaṃ prāṇāḥ sīdanti saṃyuge | balaṃ tu nītimādhāya yudhye jayaparājayau
हे कृष्ण, युद्ध में सदा कलह रहता है और रणभूमि में प्राण नष्ट होते हैं। फिर भी नीति को ही बल बनाकर मैं लड़ूँगा; पर जय और पराजय,
श्लोक 58 (5.71.58)
नात्मच्छन्देन भूतानां जीवितं मरणं तथा । नाप्यकाले सुखं प्राप्यं दुःखं वाऽपि यदूत्तम ॥
nātmacchandena bhūtānāṃ jīvitaṃ maraṇaṃ tathā | nāpyakāle sukhaṃ prāpyaṃ duḥkhaṃ vā'pi yadūttama
प्राणियों के जीवन और मरण की तरह, अपनी इच्छा से नहीं होते; हे यदुश्रेष्ठ, असमय न सुख मिलता है, न दुःख।
श्लोक 59 (5.71.59)
एको ह्यपि बहून्हन्ति घ्नन्त्येकं बहवोऽप्युत । शूरं कापुरुषो हन्ति अयशस्वी यशस्विनम् ॥
eko hyapi bahūnhanti ghnantyekaṃ bahavo'pyuta | śūraṃ kāpuruṣo hanti ayaśasvī yaśasvinam
एक भी अनेक को मार डालता है, और अनेक मिलकर एक को मार देते हैं; कायर शूर को मार देता है और यशहीन यशस्वी को।
श्लोक 60 (5.71.60)
जयो नैवोभयोर्दृष्टो नोभयोश्च पराजयः । तथैवापचयो दृष्टो व्यपयाने क्षयव्ययौ ॥
jayo naivobhayordṛṣṭo nobhayośca parājayaḥ | tathaivāpacayo dṛṣṭo vyapayāne kṣayavyayau
विजय कभी दोनों पक्षों की नहीं देखी जाती, न पराजय दोनों की; पर हानि वैसे ही दोनों ओर दिखती है, और पीछे हटने में भी विनाश और क्षति होती है।
श्लोक 61 (5.71.61)
सर्वथा वृजिनं युद्धं को घ्नन्न प्रतिहन्यते । हतस्य च हृषीकेश समौ जयपराजयौ ॥
sarvathā vṛjinaṃ yuddhaṃ ko ghnanna pratihanyate | hatasya ca hṛṣīkeśa samau jayaparājayau
युद्ध हर प्रकार से पापमय है। कौन मारने वाला बदले में मारा नहीं जाता? और हे हृषीकेश, जो मारा गया उसके लिए जय और पराजय समान हैं।
श्लोक 62 (5.71.62)
पराजयश्च मरणान्मन्ये नैव विशिष्यते । यस्य स्याद्विजयः कृष्ण तस्याप्यपचयो ध्रुवम् ॥
parājayaśca maraṇānmanye naiva viśiṣyate | yasya syādvijayaḥ kṛṣṇa tasyāpyapacayo dhruvam
मेरे विचार में पराजय मृत्यु से कुछ भिन्न नहीं; और हे कृष्ण, जिसकी विजय होती है, उसकी भी हानि निश्चित है।
श्लोक 63 (5.71.63)
अन्ततो दयितं घ्नन्ति केचिदप्यपरे जनाः । तस्याङ्गबलहीनस्य पुत्रान्भ्रातॄनपश्यतः ॥
antato dayitaṃ ghnanti kecidapyapare janāḥ | tasyāṅgabalahīnasya putrānbhrātṝnapaśyataḥ
अन्त में दूसरे लोग उसके किसी प्रियजन को मार डालते हैं; और तब शारीरिक बल से हीन, अपने पुत्रों और भाइयों को न देख पाने वाले उस मनुष्य के मन में
श्लोक 64 (5.71.64)
निर्वेदो जीविते कृष्ण सर्वतश्चोपजायते । ये ह्येव धीरा ह्रीमन्त आर्याः करुणवेदिनः ॥
nirvedo jīvite kṛṣṇa sarvataścopajāyate | ye hyeva dhīrā hrīmanta āryāḥ karuṇavedinaḥ
हे कृष्ण, हर ओर से जीवन के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है। क्योंकि जो धीर, लज्जाशील, आर्य और करुणा को जानने वाले होते हैं,
श्लोक 65 (5.71.65)
त एव युद्धे हन्यन्ते यवीयान्मुच्यते जनः । हत्वाऽप्यनुशयो नित्यं परानपि जनार्दन ॥
ta eva yuddhe hanyante yavīyānmucyate janaḥ | hatvā'pyanuśayo nityaṃ parānapi janārdana
वे ही युद्ध में मारे जाते हैं और तुच्छ मनुष्य बच निकलता है। और हे जनार्दन, शत्रुओं को भी मारकर सदा पश्चात्ताप होता है।
श्लोक 66 (5.71.66)
अनुबद्धश्च पापोऽत्र शेषश्चाप्यवशिष्यते । शेषो हि बलमासाद्य न शेषमनुशेषयेत् ॥
anubaddhaśca pāpo'tra śeṣaścāpyavaśiṣyate | śeṣo hi balamāsādya na śeṣamanuśeṣayet
इसमें पाप पीछे लगा रहता है, और शत्रु का कुछ न कुछ शेष बचा ही रहता है; वह शेष बल पाकर विजेता का कोई शेष नहीं छोड़ना चाहता,
श्लोक 67 (5.71.67)
सर्वोच्छेदे च यतते वैरस्यान्तविधित्सया । जयो वैरं प्रसृजति दुःखमास्ते पराजितः ॥
sarvocchede ca yatate vairasyāntavidhitsayā | jayo vairaṃ prasṛjati duḥkhamāste parājitaḥ
और वैर का अन्त करने की इच्छा से सबके सम्पूर्ण उच्छेद का यत्न करता है। विजय वैर को जन्म देती है; पराजित दुःख में रहता है।
श्लोक 68 (5.71.68)
सुखं प्रशान्तः स्वपिति हित्वा जयपराजयौ । जातवैरश्च पुरुषो दुःखं स्वपिति नित्यदा ॥
sukhaṃ praśāntaḥ svapiti hitvā jayaparājayau | jātavairaśca puruṣo duḥkhaṃ svapiti nityadā
जय और पराजय दोनों को छोड़कर शान्त मनुष्य सुख से सोता है; पर जिसके मन में वैर जन्म ले चुका, वह सदा दुःख से सोता है,
श्लोक 69 (5.71.69)
अनिर्वृत्तेन मनसा ससर्प इव वेश्मनि । उत्सादयति यः सर्वं यशसा स विमुच्यते ॥
anirvṛttena manasā sasarpa iva veśmani | utsādayati yaḥ sarvaṃ yaśasā sa vimucyate
अशान्त मन से, मानो ऐसे घर में हो जिसमें साँप रहता हो। जो सबका संहार कर देता है, उसका यश उससे छूट जाता है,
श्लोक 70 (5.71.70)
अकीर्तिं सर्वभूतेषु शाश्वतीं स नियच्छति । न हि वैराणि शाम्यन्ति दीर्घकालधृतान्यपि ॥
akīrtiṃ sarvabhūteṣu śāśvatīṃ sa niyacchati | na hi vairāṇi śāmyanti dīrghakāladhṛtānyapi
और सब प्राणियों में स्थायी अपकीर्ति पाता है। क्योंकि बहुत समय से पाले हुए वैर भी शान्त नहीं होते;
श्लोक 71 (5.71.71)
आख्यातारश्च विद्यन्ते पुमांश्चेद्विद्यते कुले । न चापि वैरं वैरेण केशव व्युपशाम्यति ॥
ākhyātāraśca vidyante pumāṃścedvidyate kule | na cāpi vairaṃ vaireṇa keśava vyupaśāmyati
यदि कुल में एक भी पुरुष बचा हो, तो पुराना वैर सुनाने वाले मिल ही जाते हैं। और हे केशव, वैर से वैर कभी शान्त नहीं होता;
श्लोक 72 (5.71.72)
हविषाऽग्निर्यथा कृष्ण भूय एवाभिवर्धते । अतोऽन्यथा नास्ति शान्तिर्नित्यमन्तरमन्ततः ॥
haviṣā'gniryathā kṛṣṇa bhūya evābhivardhate | ato'nyathā nāsti śāntirnityamantaramantataḥ
बल्कि हे कृष्ण, आहुति पाकर अग्नि की तरह वह और भी बढ़ता है। अन्त हुए बिना शान्ति नहीं होती; अन्त तक कोई न कोई छिद्र बना ही रहता है।
श्लोक 73 (5.71.73)
अन्तरं लिप्समानानामयं दोषो निरन्तरः । पौरुषे यो हि बलवानाधिर्हृदयबाधनः । तस्य त्यागेन वा शान्तिर्मरणेनापि वा भवेत् ॥
antaraṃ lipsamānānāmayaṃ doṣo nirantaraḥ | pauruṣe yo hi balavānādhirhṛdayabādhanaḥ | tasya tyāgena vā śāntirmaraṇenāpi vā bhavet
छिद्र खोजने वालों में यह दोष निरन्तर बना रहता है। पौरुष में जो प्रबल, हृदय को पीड़ा देने वाली मनोव्यथा है, वह या तो उसके त्याग से शान्त होती है, या मृत्यु से।
श्लोक 74 (5.71.74)
अथवा मूलघातेन द्विषतां मधुसूदन । फलनिर्वृत्तिरिद्धा स्यात्तन्नृशंसतरं भवेत् ॥
athavā mūlaghātena dviṣatāṃ madhusūdana | phalanirvṛttiriddhā syāttannṛśaṃsataraṃ bhavet
अथवा हे मधुसूदन, शत्रुओं को जड़ से मिटाकर पूरी सफलता मिल सकती है; पर वह और भी अधिक क्रूर मार्ग होगा।
श्लोक 75 (5.71.75)
या तु त्यागेन शान्तिः स्यात्तदृते वध एव सः । संशयाच्च समुच्छेदाद्द्विषतामात्मनस्तथा ॥
yā tu tyāgena śāntiḥ syāttadṛte vadha eva saḥ | saṃśayācca samucchedāddviṣatāmātmanastathā
और राज्य के त्याग से जो शान्ति मिले, वह राज्य के बिना वध ही है; क्योंकि शत्रुओं से सदा खटका बना रहता है और अपना विनाश निश्चित हो जाता है।
श्लोक 76 (5.71.76)
न च त्यक्तुं तदिच्छामो न चेच्छामः कुलक्षयम् । अत्र या प्रणिपातेन शान्तिः सैव गरीयसी ॥
na ca tyaktuṃ tadicchāmo na cecchāmaḥ kulakṣayam | atra yā praṇipātena śāntiḥ saiva garīyasī
हम न तो उसे छोड़ना चाहते हैं, न कुल का नाश चाहते हैं। ऐसे में झुककर जो शान्ति मिले, वही सबसे श्रेष्ठ है।
श्लोक 77 (5.71.77)
सर्वथा यतमानानामयुद्धमभिकाङ्क्षताम् । सान्त्वे प्रतिहते युद्धं प्रसिद्धं नापराक्रमः ॥
sarvathā yatamānānāmayuddhamabhikāṅkṣatām | sāntve pratihate yuddhaṃ prasiddhaṃ nāparākramaḥ
जो सब प्रकार से प्रयत्न करते हैं और युद्ध न होने की कामना करते हैं, उनकी सान्त्वना ठुकरा दी जाए तो युद्ध ही मान्य मार्ग है; उसमें पराक्रम का अभाव नहीं।
श्लोक 78 (5.71.78)
प्रतिघातेन सान्त्वस्य दारुणं संप्रवर्तते । तच्छुनामिव संपाते पण्डितैरुपलक्षितम् ॥
pratighātena sāntvasya dāruṇaṃ saṃpravartate | tacchunāmiva saṃpāte paṇḍitairupalakṣitam
सान्त्वना के ठुकराए जाने पर भयंकर संघर्ष छिड़ जाता है; विद्वानों ने इसे कुत्तों के आपस में भिड़ने में देखा है।
श्लोक 79 (5.71.79)
लाङ्गूलचालनं क्ष्वेडा प्रतिवाचो विवर्तनम् । दन्तदर्शनमारावस्ततो युद्धं प्रवर्तते ॥
lāṅgūlacālanaṃ kṣveḍā prativāco vivartanam | dantadarśanamārāvastato yuddhaṃ pravartate
पूँछ हिलाना, गुर्राना, पलटकर भौंकना, भूमि पर लोटना, दाँत दिखाना, ऊँचे स्वर में भौंकना — और फिर लड़ाई छिड़ जाती है।
श्लोक 80 (5.71.80)
तत्र यो बलवान्कृष्ण जित्वा सोऽत्ति तदामिषम् । एवमेव मनुष्येषु विशेषो नास्ति कश्चन ॥
tatra yo balavānkṛṣṇa jitvā so'tti tadāmiṣam | evameva manuṣyeṣu viśeṣo nāsti kaścana
हे कृष्ण, तब जो बलवान होता है, वह जीतकर वह मांस खा जाता है। मनुष्यों में भी ठीक ऐसा ही होता है; कोई अन्तर नहीं।
श्लोक 81 (5.71.81)
सर्वथा त्वेतदुचितं दुर्बलेषु बलीयसाम् । अनादरो विरोधश्च प्रणिपाती हि दुर्बलः ॥
sarvathā tvetaducitaṃ durbaleṣu balīyasām | anādaro virodhaśca praṇipātī hi durbalaḥ
बलवानों का दुर्बलों के प्रति यही सामान्य व्यवहार है — अनादर और विरोध; और दुर्बल झुक जाता है।
श्लोक 82 (5.71.82)
पिता राजा च वृद्धश्च सर्वथा मानमर्हति । तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च धृतराष्ट्रो जनार्दन ॥
pitā rājā ca vṛddhaśca sarvathā mānamarhati | tasmānmānyaśca pūjyaśca dhṛtarāṣṭro janārdana
पिता, राजा और वृद्ध सब प्रकार से सम्मान के योग्य होता है; इसलिए हे जनार्दन, धृतराष्ट्र माननीय और पूजनीय हैं।
श्लोक 83 (5.71.83)
पुत्रस्नेहश्च बलवान्धृतराष्ट्रस्य माधव । स पुत्रवशमापन्नः प्रणिपातं प्रहास्यति ॥
putrasnehaśca balavāndhṛtarāṣṭrasya mādhava | sa putravaśamāpannaḥ praṇipātaṃ prahāsyati
पर हे माधव, धृतराष्ट्र का पुत्र-स्नेह प्रबल है; पुत्र के वश में पड़े हुए वे हमारे झुकने को ठुकरा देंगे।
श्लोक 84 (5.71.84)
तत्र किं मन्यसे कृष्ण प्राप्तकालमनन्तरम् । कथमर्थाच्च धर्माच्च न हीयेमहि माधव ॥
tatra kiṃ manyase kṛṣṇa prāptakālamanantaram | kathamarthācca dharmācca na hīyemahi mādhava
तो हे कृष्ण, तुम्हारे विचार में अब आगे क्या करना समयोचित है? हे माधव, हम अर्थ और धर्म दोनों से वंचित कैसे न हों?
श्लोक 85 (5.71.85)
ईदृशेऽत्यर्थकृच्छ्रेऽस्मिन्कमन्यं मधुसूदन । उपसंप्रष्टुमर्हामि त्वामृते पुरुषोत्तम ॥
īdṛśe'tyarthakṛcchre'sminkamanyaṃ madhusūdana | upasaṃpraṣṭumarhāmi tvāmṛte puruṣottama
हे मधुसूदन, ऐसे भारी संकट में, हे पुरुषोत्तम, तुम्हें छोड़कर मैं और किससे परामर्श करूँ?
श्लोक 86 (5.71.86)
प्रियश्च प्रियकामश्च गतिज्ञः सर्वकर्मणाम् । को हि कृष्णास्ति नस्त्वादृक्सर्वनिश्चयवित्सुहृत् ॥
priyaśca priyakāmaśca gatijñaḥ sarvakarmaṇām | ko hi kṛṣṇāsti nastvādṛksarvaniścayavitsuhṛt
हे कृष्ण, तुम्हारे समान हमारा कौन सुहृद् है — जो प्रिय है, हमारा भला चाहता है, सब कर्मों की गति जानता है और हर बात का निर्णय करना जानता है?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 87 (5.71.87)
एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मराजं जनार्दनः । उभयोरेव वामर्थे यास्यामि कुरुसंसदम् ॥
evamuktaḥ pratyuvāca dharmarājaṃ janārdanaḥ | ubhayoreva vāmarthe yāsyāmi kurusaṃsadam
ऐसा कहे जाने पर जनार्दन ने धर्मराज को उत्तर दिया — “तुम दोनों पक्षों के ही हित के लिए मैं कुरुओं की सभा में जाऊँगा।”
कृष्ण उवाच
श्लोक 88 (5.71.88)
शमं तत्र लभेयं चेद्युष्मदर्थमहापयन् । पुण्यं मे सुमहद्राजंश्चरितं स्यान्महाफलम् ॥
śamaṃ tatra labheyaṃ cedyuṣmadarthamahāpayan | puṇyaṃ me sumahadrājaṃścaritaṃ syānmahāphalam
हे राजन्, यदि तुम्हारे हित को हानि पहुँचाए बिना मैं वहाँ शान्ति स्थापित कर सकूँ, तो यह मेरा अत्यन्त पुण्य और महान फल देने वाला कर्म होगा।
श्लोक 89 (5.71.89)
मोचयेयं मृत्युपाशात्संरब्धान्कुरुसृञ्जयान् । पाण्डवान्धार्तराष्ट्रांश्च सर्वां च पृथिवीमिमाम् ॥
mocayeyaṃ mṛtyupāśātsaṃrabdhānkurusṛñjayān | pāṇḍavāndhārtarāṣṭrāṃśca sarvāṃ ca pṛthivīmimām
मैं क्रोध से भरे कुरुओं और सृञ्जयों को, पाण्डवों और धृतराष्ट्र-पुत्रों को, और इस सारी पृथ्वी को मृत्यु के पाश से छुड़ा लूँगा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 90 (5.71.90)
न ममैतन्मतं कृष्ण यत्त्वं यायाः कुरून्प्रति । सुयोधनः सूक्तमपि न करिष्यति ते वचः ॥
na mamaitanmataṃ kṛṣṇa yattvaṃ yāyāḥ kurūnprati | suyodhanaḥ sūktamapi na kariṣyati te vacaḥ
हे कृष्ण, मेरी यह राय नहीं कि तुम कुरुओं के पास जाओ। सुयोधन तुम्हारी भली बात भी नहीं मानेगा।
श्लोक 91 (5.71.91)
समेतं पार्थिवं क्षत्रं दुर्योधनवशानुगम् । तेषां मध्यावतरणं तव कृष्ण न रोचये ॥
sametaṃ pārthivaṃ kṣatraṃ duryodhanavaśānugam | teṣāṃ madhyāvataraṇaṃ tava kṛṣṇa na rocaye
पृथ्वी के सारे क्षत्रिय राजा दुर्योधन के वश में चलते हुए वहाँ एकत्र हैं; हे कृष्ण, उनके बीच तुम्हारा जाना मुझे अच्छा नहीं लगता।
श्लोक 92 (5.71.92)
न हि नः प्रीणयेद्द्रव्यं न देवत्वं कुतः सुखम् । न च सर्वामरैश्वर्यं तव द्रोहेण माधव ॥
na hi naḥ prīṇayeddravyaṃ na devatvaṃ kutaḥ sukham | na ca sarvāmaraiśvaryaṃ tava droheṇa mādhava
हे माधव, तुम्हारे अनिष्ट के मूल्य पर न कोई धन हमें प्रसन्न कर सकता है, न देवत्व — सुख की तो बात ही क्या — और न समस्त देवताओं का ऐश्वर्य।
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 93 (5.71.93)
जानाम्येतां महाराज धार्तराष्ट्रस्य पापताम् । अवाच्यास्तु भविष्यामः सर्वलोके महीक्षितां ॥
jānāmyetāṃ mahārāja dhārtarāṣṭrasya pāpatām | avācyāstu bhaviṣyāmaḥ sarvaloke mahīkṣitāṃ
हे महाराज, मैं धृतराष्ट्र-पुत्र की इस दुष्टता को जानता हूँ; पर जाने से हम संसार के सब राजाओं में निन्दा के पात्र नहीं रहेंगे।
श्लोक 94 (5.71.94)
न चापि मम पर्याप्ताः सहिताः सर्वपार्थिवाः । क्रुद्धस्य संयुगे स्थातुं सिंहस्येवेतरे मृगाः ॥
na cāpi mama paryāptāḥ sahitāḥ sarvapārthivāḥ | kruddhasya saṃyuge sthātuṃ siṃhasyevetare mṛgāḥ
और सारे राजा मिलकर भी युद्ध में मेरे क्रुद्ध होने पर मेरे सामने टिकने में समर्थ नहीं, जैसे सिंह के सामने दूसरे पशु।
श्लोक 95 (5.71.95)
अथ चेत्ते प्रवर्तेरन्मयि किंचिदसांप्रतम् । निर्दहेयं कुरून्सर्वानिति मे धीयते मतिः ॥
atha cette pravarteranmayi kiṃcidasāṃpratam | nirdaheyaṃ kurūnsarvāniti me dhīyate matiḥ
और यदि वे मेरे साथ कुछ भी अनुचित करें, तो मैं सब कुरुओं को भस्म कर दूँगा — ऐसा मेरा निश्चय है।
श्लोक 96 (5.71.96)
न जातु गमनं पार्थ भवेत्तत्र निरर्थकम् । अर्थप्राप्तिः कदाचित्स्यादन्ततो वाप्यवाच्यता ॥
na jātu gamanaṃ pārtha bhavettatra nirarthakam | arthaprāptiḥ kadācitsyādantato vāpyavācyatā
हे पार्थ, मेरा वहाँ जाना कभी व्यर्थ नहीं होगा; हो सकता है प्रयोजन सिद्ध हो जाए, नहीं तो कम से कम हम निन्दा से तो बचेंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 97 (5.71.97)
एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मराजो जनार्दनम् । भ्रातॄणां समवेतानां सकाशे पुरुषोत्तमम् ॥
evamuktaḥ pratyuvāca dharmarājo janārdanam | bhrātṝṇāṃ samavetānāṃ sakāśe puruṣottamam
ऐसा कहे जाने पर धर्मराज ने अपने एकत्र भाइयों के सामने पुरुषोत्तम जनार्दन को उत्तर दिया —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 98 (5.71.98)
यत्तुभ्यं रोचते कृष्ण स्वस्ति प्राप्नुहि कौरवान् । कृतार्थं स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्यामि पुनरागतम् ॥
yattubhyaṃ rocate kṛṣṇa svasti prāpnuhi kauravān | kṛtārthaṃ svastimantaṃ tvāṃ drakṣyāmi punarāgatam
हे कृष्ण, जैसा तुम्हें ठीक लगे; कुशलपूर्वक कौरवों के पास जाओ। मैं तुम्हें सफल-मनोरथ और सकुशल लौटकर आया हुआ फिर देखूँगा।
श्लोक 99 (5.71.99)
विष्वक्सेन कुरून्गत्वा भरताञ्शमयन्प्रभो । यथा सर्वे सुमनसः सह स्याम सुचेतसः ॥
viṣvaksena kurūngatvā bharatāñśamayanprabho | yathā sarve sumanasaḥ saha syāma sucetasaḥ
हे विष्वक्सेन, हे प्रभो, कुरुओं के पास जाकर भरतवंशियों को शान्त करो, जिससे हम सब प्रसन्न मन और सद्भाव से एक साथ रह सकें।
श्लोक 100 (5.71.100)
भ्राता चासि सखा चासि बीभत्सोर्मम च प्रियः । सौहृदेनाविशङ्क्योऽसि स्वस्ति प्राप्नुहि भूतये ॥
bhrātā cāsi sakhā cāsi bībhatsormama ca priyaḥ | sauhṛdenāviśaṅkyo'si svasti prāpnuhi bhūtaye
तुम हमारे भाई भी हो और सखा भी; बीभत्सु (अर्जुन) के और मेरे प्रिय हो। तुम्हारे सौहार्द पर कोई संदेह नहीं हो सकता; हमारे कल्याण के लिए कुशलपूर्वक जाओ।
श्लोक 101 (5.71.101)
अस्मान्वेत्थ परान्वेत्थ वेत्थार्थान्वेत्थ भाषितुम् । यद्यदस्मद्धितं कृष्ण तत्तद्वाच्यः सुयोधनः ॥
asmānvettha parānvettha vetthārthānvettha bhāṣitum | yadyadasmaddhitaṃ kṛṣṇa tattadvācyaḥ suyodhanaḥ
तुम हमें जानते हो, शत्रुओं को जानते हो, प्रयोजन जानते हो और बोलना जानते हो। हे कृष्ण, जो-जो हमारे हित में हो, वही-वही सुयोधन से कहना।
श्लोक 102 (5.71.102)
यद्यद्धर्मेण संयुक्तमुपपद्येद्धितं वचः । तत्तत्केशव भाषेथाः सान्त्वं वा यदि वेतरत् ॥
yadyaddharmeṇa saṃyuktamupapadyeddhitaṃ vacaḥ | tattatkeśava bhāṣethāḥ sāntvaṃ vā yadi vetarat
हे केशव, जो-जो वचन धर्म से युक्त और हमारे लिए हितकर हों, वही-वही कहना — चाहे वे सान्त्वनापूर्ण हों या कुछ और।