उद्योग पर्व · अध्याय 72
दौत्य से पहले श्रीकृष्ण का युधिष्ठिर को परामर्श
शान्ति की युधिष्ठिर की इच्छा का उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि भिक्षा और दीनता क्षत्रिय का धर्म नहीं है, और जिस दुर्योधन ने द्यूत में छल किया, द्रौपदी को सभा में घसीटवाया और पाण्डवों के विनाश की डींग हाँकी, वह स्वेच्छा से राज्य कभी नहीं लौटाएगा। फिर भी वे कौरवों के पास जाकर राजाओं और प्रजा के सामने युधिष्ठिर के गुणों और दुर्योधन के दोषों को प्रकट करेंगे और पाण्डवों का हित छोड़े बिना शान्ति का प्रयत्न करेंगे। भयंकर अपशकुनों को देखकर वे युद्ध की आशंका करते हैं और युधिष्ठिर से सेना तैयार रखने को कहते हैं।
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 1 (5.72.1)
सञ्जयस्य श्रुतं वाक्यं भवतश्च श्रुतं मया । सर्वं जानाम्यभिप्रायं तेषां च भवतश्च यः ॥
sañjayasya śrutaṃ vākyaṃ bhavataśca śrutaṃ mayā | sarvaṃ jānāmyabhiprāyaṃ teṣāṃ ca bhavataśca yaḥ
मैंने सञ्जय की बात भी सुनी है और आपकी भी। उनका जो अभिप्राय है और आपका जो अभिप्राय है, वह सब मैं जानता हूँ।
श्लोक 2 (5.72.2)
तव धर्माश्रिता बुद्धिस्तेषां वैराश्रया मतिः । यदयुद्धेन लभ्येत तत्ते बहुमतं भवेत् ॥
tava dharmāśritā buddhisteṣāṃ vairāśrayā matiḥ | yadayuddhena labhyeta tatte bahumataṃ bhavet
आपकी बुद्धि धर्म पर टिकी है और उनकी मति वैर पर। जो कुछ बिना युद्ध के मिल सके, वही आपको अधिक प्रिय है।
श्लोक 3 (5.72.3)
न चैवं नैष्ठिकं कर्म क्षत्रियस्य विशांपते । आहुराश्रमिणः सर्वे न भैक्षं क्षत्रियश्चरेत् ॥
na caivaṃ naiṣṭhikaṃ karma kṣatriyasya viśāṃpate | āhurāśramiṇaḥ sarve na bhaikṣaṃ kṣatriyaścaret
किन्तु हे प्रजानाथ, आजीवन संन्यास का व्रत क्षत्रिय का कर्म नहीं है। सभी आश्रमों के ज्ञाता कहते हैं कि क्षत्रिय भिक्षा से जीवन न चलाए।
श्लोक 4 (5.72.4)
जयो वधो वा सङ्ग्रामे धात्राऽऽदिष्टः सनातनः । स्वधर्मः क्षत्रियस्यैष कार्पण्यं न प्रशस्यते ॥
jayo vadho vā saṅgrāme dhātrā''diṣṭaḥ sanātanaḥ | svadharmaḥ kṣatriyasyaiṣa kārpaṇyaṃ na praśasyate
युद्ध में विजय या मृत्यु, यही विधाता ने सनातन काल से निश्चित किया है। यही क्षत्रिय का स्वधर्म है; उसके लिए दीनता प्रशंसनीय नहीं है।
श्लोक 5 (5.72.5)
न हि कार्पण्यमास्थाय शक्या वृत्तिर्युधिष्ठिर । विक्रमस्व महाबाहो जहि शत्रून्परन्तप ॥
na hi kārpaṇyamāsthāya śakyā vṛttiryudhiṣṭhira | vikramasva mahābāho jahi śatrūnparantapa
हे युधिष्ठिर, दीनता अपनाकर जीविका नहीं चल सकती। हे महाबाहु, पराक्रम दिखाइए और हे परन्तप, शत्रुओं का वध कीजिए।
श्लोक 6 (5.72.6)
अतिगृद्धाः कृतस्नेहा दीर्घकालं सहोषिताः । कृतमित्राः कृतबला धार्तराष्ट्राः परन्तप ॥
atigṛddhāḥ kṛtasnehā dīrghakālaṃ sahoṣitāḥ | kṛtamitrāḥ kṛtabalā dhārtarāṣṭrāḥ parantapa
हे परन्तप, धृतराष्ट्र के पुत्र अत्यन्त लोभी हैं। उन्होंने लोगों का स्नेह जीत लिया है, बहुत समय से उनके साथ रहे हैं, मित्र बना लिए हैं और बल जुटा लिया है।
श्लोक 7 (5.72.7)
न पर्यायोऽस्ति यत्साम्यं त्वयि कुर्युर्विशांपते । बलवत्तां हि मन्यन्ते भीष्मद्रोणकृपादिभिः ॥
na paryāyo'sti yatsāmyaṃ tvayi kuryurviśāṃpate | balavattāṃ hi manyante bhīṣmadroṇakṛpādibhiḥ
हे प्रजानाथ, ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे वे आपके साथ सन्धि करें, क्योंकि भीष्म, द्रोण, कृप आदि के कारण वे स्वयं को बलवान मानते हैं।
श्लोक 8 (5.72.8)
यावच्च मार्दवेनैतान्राजन्नुपचरिष्यसि । तावदेते हरिष्यन्ति तव राज्यमरिन्दम ॥
yāvacca mārdavenaitānrājannupacariṣyasi | tāvadete hariṣyanti tava rājyamarindama
हे राजन्, जब तक आप इनके साथ कोमलता का व्यवहार करेंगे, हे अरिन्दम, तब तक ये आपका राज्य हरते ही रहेंगे।
श्लोक 9 (5.72.9)
नानुक्रोशान्न कार्पण्यान्न च धर्मार्थकारणात् । अलं कर्तुं धार्तराष्ट्रस्तव काममरिन्दम ॥
nānukrośānna kārpaṇyānna ca dharmārthakāraṇāt | alaṃ kartuṃ dhārtarāṣṭrastava kāmamarindama
हे अरिन्दम, न दया से, न आपकी दीनता से, और न धर्म या अर्थ के कारण धृतराष्ट्र का पुत्र आपकी इच्छा पूरी करने को तैयार होगा।
श्लोक 10 (5.72.10)
एतदेव निमित्तं ते धार्तराष्ट्रो यथा त्वयि । नान्वतप्यत कोपेन तव कृत्वाऽपि दुष्करम् ॥
etadeva nimittaṃ te dhārtarāṣṭro yathā tvayi | nānvatapyata kopena tava kṛtvā'pi duṣkaram
आपके लिए यही प्रमाण पर्याप्त है कि धृतराष्ट्र के पुत्र को आपके प्रति इतना कठोर अपराध करके भी क्रोधवश कोई पछतावा नहीं हुआ।
श्लोक 11 (5.72.11)
पितामहस्य द्रोणस्य विदुरस्य च धीमतः । ब्राह्मणानां च साधूनां राज्ञश्च नगरस्य च ॥
pitāmahasya droṇasya vidurasya ca dhīmataḥ | brāhmaṇānāṃ ca sādhūnāṃ rājñaśca nagarasya ca
पितामह, द्रोण और बुद्धिमान् विदुर के, ब्राह्मणों और सज्जनों के, राजा के और नगर के लोगों के देखते-देखते,
श्लोक 12 (5.72.12)
पश्यतां कुरुमुख्यानां सर्वेषामेव तत्त्वतः । दानशीलं मृदुं दान्तं धर्मशीलमनुव्रतम् ॥
paśyatāṃ kurumukhyānāṃ sarveṣāmeva tattvataḥ | dānaśīlaṃ mṛduṃ dāntaṃ dharmaśīlamanuvratam
सभी प्रमुख कुरुवंशियों के सामने, आप जैसे दानशील, कोमल, संयमी, धर्मपरायण और आज्ञाकारी को,
श्लोक 13 (5.72.13)
यत्त्वामुपधिना राजन्द्यूते वञ्चितवांस्तदा । न चापत्रपते तेन नृशंसः स्वेन कर्मणा ॥
yattvāmupadhinā rājandyūte vañcitavāṃstadā | na cāpatrapate tena nṛśaṃsaḥ svena karmaṇā
हे राजन्, उसने तब द्यूत में छल से ठग लिया, फिर भी वह क्रूर अपने उस कर्म पर लज्जित नहीं होता।
श्लोक 14 (5.72.14)
तथाशीलसमाचारे राजन्मा प्रणयं कृथाः । वध्यास्ते सर्वलोकस्य किं पुनस्तव भारत ॥
tathāśīlasamācāre rājanmā praṇayaṃ kṛthāḥ | vadhyāste sarvalokasya kiṃ punastava bhārata
हे राजन्, ऐसे स्वभाव और आचरण वाले के प्रति स्नेह मत रखिए। ऐसे लोग सारे संसार के लिए वध्य हैं, फिर हे भारत, आपके लिए तो कहना ही क्या?
श्लोक 15 (5.72.15)
वाग्भिस्त्वप्रतिरूपाभिरतुदत्त्वां सहानुजम् । श्लाघमानः प्रहृष्टः सन्भ्रातृभिः सह भाषते ॥
vāgbhistvapratirūpābhiratudattvāṃ sahānujam | ślāghamānaḥ prahṛṣṭaḥ sanbhrātṛbhiḥ saha bhāṣate
उसने अनुचित वचनों से आपको और आपके छोटे भाइयों को पीड़ा दी, और अब डींग हाँकता हुआ, प्रसन्न होकर अपने भाइयों के बीच कहता है—
श्लोक 16 (5.72.16)
एतावत्पाण्डवानां हि नास्ति किंचिदिह स्वकम् । नामधेयं च गोत्रं च तदप्येषां न शिष्यते ॥
etāvatpāṇḍavānāṃ hi nāsti kiṃcidiha svakam | nāmadheyaṃ ca gotraṃ ca tadapyeṣāṃ na śiṣyate
"अब यहाँ पाण्डवों का अपना कुछ भी नहीं रहा। केवल उनका नाम और गोत्र बचा है, और वह भी उनके पास नहीं रहेगा।
श्लोक 17 (5.72.17)
कालेन महता चैषां भविष्यति पराभवः । प्रकृतिं ते भजिष्यन्ति नष्टप्रकृतयो मयि ॥
kālena mahatā caiṣāṃ bhaviṣyati parābhavaḥ | prakṛtiṃ te bhajiṣyanti naṣṭaprakṛtayo mayi
समय आने पर इनका पराभव होगा। मेरे सामने इनका तेज नष्ट हो चुका है; ये मृत्यु को प्राप्त होंगे।"
श्लोक 18 (5.72.18)
दुःशासनेन पापेन तदा द्यूते प्रवर्तिते । अनाथवत्तदा देवी द्रौपदी सुदुरात्मना ॥
duḥśāsanena pāpena tadā dyūte pravartite | anāthavattadā devī draupadī sudurātmanā
जब पापी दुःशासन ने द्यूत चलाया, तब उस परम दुष्ट ने रानी द्रौपदी को, मानो उसका कोई रक्षक ही न हो,
श्लोक 19 (5.72.19)
आकृष्य केशे रुदती सभायां राजसंसदि । भीष्मद्रोणप्रमुखतो गौरिति व्याहृता मुहुः ॥
ākṛṣya keśe rudatī sabhāyāṃ rājasaṃsadi | bhīṣmadroṇapramukhato gauriti vyāhṛtā muhuḥ
बाल पकड़कर रोती हुई सभा में, राजाओं के समाज में घसीटा, और भीष्म, द्रोण आदि के सामने उसे बार-बार "गाय" कहकर पुकारा गया।
श्लोक 20 (5.72.20)
भवता वारिताः सर्वे भ्रातरो भीमविक्रमाः । धर्मपाशनिबद्धाश्च न किंचित्प्रतिपेदिरे ॥
bhavatā vāritāḥ sarve bhrātaro bhīmavikramāḥ | dharmapāśanibaddhāśca na kiṃcitpratipedire
आपने अपने भयंकर पराक्रमी सभी भाइयों को रोक दिया; धर्म के पाश में बँधे वे कुछ भी न कर सके।
श्लोक 21 (5.72.21)
एताश्चान्याश्च परुषा वाचः स समुदीरयन् । श्लाघते ज्ञातिमध्ये स्म त्वयि प्रव्रजिते वनम् ॥
etāścānyāśca paruṣā vācaḥ sa samudīrayan | ślāghate jñātimadhye sma tvayi pravrajite vanam
ये और ऐसे ही अन्य कठोर वचन कहते हुए, आपके वन चले जाने पर वह अपने कुटुम्बियों के बीच डींग हाँकता रहा।
श्लोक 22 (5.72.22)
ये तत्रासन्समानीतास्ते दृष्ट्वा त्वामनागसम् । अश्रुकण्ठा रुदन्तश्च सभायामासते सदा ॥
ye tatrāsansamānītāste dṛṣṭvā tvāmanāgasam | aśrukaṇṭhā rudantaśca sabhāyāmāsate sadā
जो लोग वहाँ बुलाए गए थे, वे आपको निरपराध देखकर आँसुओं से रुँधे कण्ठ से रोते हुए सभा में बैठे रहे।
श्लोक 23 (5.72.23)
न चैनमभ्यनन्दंस्ते राजानो ब्राह्मणैः सह । सर्वे दुर्योधनं तत्र निन्दन्ति स्म सभासदः ॥
na cainamabhyanandaṃste rājāno brāhmaṇaiḥ saha | sarve duryodhanaṃ tatra nindanti sma sabhāsadaḥ
ब्राह्मणों सहित राजाओं ने उसका अभिनन्दन नहीं किया; वहाँ के सभी सभासद दुर्योधन की निन्दा करते रहे।
श्लोक 24 (5.72.24)
कुलीनस्य च या निन्दा वधो वाऽमित्रकर्शन । महागुणो वधो राजन्न तु निन्दा कुजीविका ॥
kulīnasya ca yā nindā vadho vā'mitrakarśana | mahāguṇo vadho rājanna tu nindā kujīvikā
हे शत्रुसूदन, कुलीन पुरुष के लिए या तो निन्दा है या मृत्यु। हे राजन्, मृत्यु कहीं अधिक श्रेष्ठ है, निन्दा नहीं, जो एक अधम जीवन है।
श्लोक 25 (5.72.25)
तदैव निहतो राजन्यदैव निरपत्रपः । निन्दितश्च महाराज पृथिव्यां सर्वराजभिः ॥
tadaiva nihato rājanyadaiva nirapatrapaḥ | ninditaśca mahārāja pṛthivyāṃ sarvarājabhiḥ
हे राजन्, वह निर्लज्ज तो उसी क्षण मारा गया, हे महाराज, जब पृथ्वी के सब राजाओं ने उसकी निन्दा की।
श्लोक 26 (5.72.26)
ईषत्करो वधस्तस्य यस्य चारित्रमीदृशम् । प्रस्कुन्देन प्रतिस्तब्धश्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥
īṣatkaro vadhastasya yasya cāritramīdṛśam | praskundena pratistabdhaśchinnamūla iva drumaḥ
जिसका आचरण ऐसा है, उसका वध करना सरल है। वह उस वृक्ष के समान है जिसकी जड़ कट चुकी हो और जो केवल चारों ओर बने गोल चबूतरे के सहारे खड़ा हो।
श्लोक 27 (5.72.27)
वध्यः सर्प इवानार्यः सर्वलोकस्य दुर्मतिः । जह्येनं त्वममित्रघ्न मा राजन्विचिकित्सिथाः ॥
vadhyaḥ sarpa ivānāryaḥ sarvalokasya durmatiḥ | jahyenaṃ tvamamitraghna mā rājanvicikitsithāḥ
यह दुर्बुद्धि अनार्य साँप की तरह सारे संसार के लिए वध्य है। हे शत्रुघ्न, इसका वध कीजिए; हे राजन्, संशय मत कीजिए।
श्लोक 28 (5.72.28)
सर्वथा त्वत्क्षमं चैतद्रोचते च ममानघ । यत्त्वं पितरि भीष्मे च प्रणिपातं समाचरेः ॥
sarvathā tvatkṣamaṃ caitadrocate ca mamānagha | yattvaṃ pitari bhīṣme ca praṇipātaṃ samācareḥ
फिर भी, हे निष्पाप, यह सब प्रकार से आपके योग्य है और मुझे भी अच्छा लगता है कि आप अपने पिता (धृतराष्ट्र) और भीष्म के सामने विनय से झुकें।
श्लोक 29 (5.72.29)
अहं तु सर्वलोकस्य गत्वा छेत्स्यामि संशयम् । येषामस्ति द्विधाभावो राजन्दुर्योधनं प्रति ॥
ahaṃ tu sarvalokasya gatvā chetsyāmi saṃśayam | yeṣāmasti dvidhābhāvo rājanduryodhanaṃ prati
किन्तु हे राजन्, मैं जाकर सारे संसार का संशय दूर करूँगा—उन सबका जो दुर्योधन के विषय में दुविधा में हैं।
श्लोक 30 (5.72.30)
मध्ये राज्ञामहं तत्र प्रातिपौरुषिकान्गुणान् । तव सङ्कीर्तयिष्यामि ये च तस्य व्यतिक्रमाः ॥
madhye rājñāmahaṃ tatra prātipauruṣikānguṇān | tava saṅkīrtayiṣyāmi ye ca tasya vyatikramāḥ
वहाँ राजाओं के बीच मैं आपके पुरुषोचित गुणों का एक-एक करके वर्णन करूँगा, और उसके अपराधों का भी।
श्लोक 31 (5.72.31)
ब्रुवतस्तत्र मे वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् । निशम्य पार्थिवाः सर्वे नानाजनपदेश्वराः ॥
bruvatastatra me vākyaṃ dharmārthasahitaṃ hitam | niśamya pārthivāḥ sarve nānājanapadeśvarāḥ
वहाँ धर्म और अर्थ से युक्त मेरे हितकारी वचन सुनकर अनेक जनपदों के स्वामी सभी राजा
श्लोक 32 (5.72.32)
त्वयि संप्रतिपत्स्यन्ते धर्मात्मा सत्यवागिति । तस्मिंश्चाधिगमिष्यन्ति यथा लोभादवर्तत ॥
tvayi saṃpratipatsyante dharmātmā satyavāgiti | tasmiṃścādhigamiṣyanti yathā lobhādavartata
आपके विषय में यह मान लेंगे कि आप धर्मात्मा और सत्यवादी हैं, और उसके विषय में जान जाएँगे कि उसने लोभ के वश होकर व्यवहार किया।
श्लोक 33 (5.72.33)
गर्हयिष्यामि चैवैनं पौरजानपदेष्वपि । वृद्धबालानुपादाय चातुर्वर्ण्ये समागते ॥
garhayiṣyāmi caivainaṃ paurajānapadeṣvapi | vṛddhabālānupādāya cāturvarṇye samāgate
मैं नगर और जनपद के लोगों के बीच भी, बूढ़ों और बालकों को साथ लेकर, चारों वर्णों के एकत्र होने पर उसकी निन्दा करूँगा।
श्लोक 34 (5.72.34)
शमं वै याचमानस्त्वं नाधर्मं तत्र लप्स्यसे । कुरून्विगर्हयिष्यन्ति धृतराष्ट्रं च पार्थिवाः ॥
śamaṃ vai yācamānastvaṃ nādharmaṃ tatra lapsyase | kurūnvigarhayiṣyanti dhṛtarāṣṭraṃ ca pārthivāḥ
शान्ति की याचना करने से आपको वहाँ कोई अधर्म नहीं लगेगा; राजा लोग कौरवों और धृतराष्ट्र की निन्दा करेंगे।
श्लोक 35 (5.72.35)
तस्मिंल्लोकपरित्यक्ते किं कार्यमवशिष्यते । हते दुर्योधने राजन्यदन्यत्क्रियतामिति ॥
tasmiṃllokaparityakte kiṃ kāryamavaśiṣyate | hate duryodhane rājanyadanyatkriyatāmiti
जब संसार उसे त्याग देगा, तब करने को क्या शेष रहेगा? हे राजन्, दुर्योधन के मानो मर चुकने पर जो कुछ और करना हो, वह किया जाए।
श्लोक 36 (5.72.36)
यात्वा चाहं कुरून्सर्वान्युष्मदर्थमहापयन् । यतिष्ये प्रशमं कर्तुं लक्षयिष्ये च चेष्टितम् ॥
yātvā cāhaṃ kurūnsarvānyuṣmadarthamahāpayan | yatiṣye praśamaṃ kartuṃ lakṣayiṣye ca ceṣṭitam
सब कौरवों के पास जाकर मैं आपके हित को छोड़े बिना शान्ति स्थापित करने का प्रयत्न करूँगा, और उनकी चेष्टाओं को भी परखूँगा।
श्लोक 37 (5.72.37)
कौरवाणां प्रवृत्तिं च गत्वा युद्धाधिकारिकाम् । निशम्य विनिवर्तिष्ये जयाय तव भारत ॥
kauravāṇāṃ pravṛttiṃ ca gatvā yuddhādhikārikām | niśamya vinivartiṣye jayāya tava bhārata
हे भारत, वहाँ जाकर युद्ध की ओर झुकी कौरवों की प्रवृत्ति को समझकर मैं आपकी विजय के लिए लौट आऊँगा।
श्लोक 38 (5.72.38)
सर्वथा युद्धमेवाहमाशंसामि परैः सह । निमित्तानि हि सर्वाणि तथा प्रादुर्भवन्ति मे ॥
sarvathā yuddhamevāhamāśaṃsāmi paraiḥ saha | nimittāni hi sarvāṇi tathā prādurbhavanti me
मैं सब प्रकार से शत्रुओं के साथ युद्ध की ही आशा करता हूँ, क्योंकि मुझे सभी शकुन वैसे ही दिखाई दे रहे हैं।
श्लोक 39 (5.72.39)
मृगाः शकुन्ताश्च वदन्ति घोरं । हस्त्यश्वमुख्येषु निशामुखेषु । घोराणि रूपाणि तथैव चाग्नि- । र्वर्णान्बहून्पुष्यति घोररूपान् ॥
mṛgāḥ śakuntāśca vadanti ghoraṃ | hastyaśvamukhyeṣu niśāmukheṣu | ghorāṇi rūpāṇi tathaiva cāgni- | rvarṇānbahūnpuṣyati ghorarūpān
पशु और पक्षी भयानक स्वर में बोल रहे हैं; सन्ध्या के समय श्रेष्ठ हाथियों और घोड़ों के बीच भयंकर रूप दिखाई देते हैं; और अग्नि भी अनेक भयावह रंग धारण कर रही है।
श्लोक 40 (5.72.40)
मनुष्यलोकक्षयकृत्सुघोरो । नो चेदनुप्राप्त इहान्तकः स्यात् । शस्त्राणि यन्त्रं कवचान्रथांश्च । नागान्हयांश्च प्रतिपादयित्वा ॥
manuṣyalokakṣayakṛtsughoro | no cedanuprāpta ihāntakaḥ syāt | śastrāṇi yantraṃ kavacānrathāṃśca | nāgānhayāṃśca pratipādayitvā
यदि मनुष्यलोक का संहार करने वाला भयंकर अन्तक यहाँ न आ पहुँचा होता, तो ऐसा न होता। शस्त्र, यन्त्र, कवच और रथ, हाथी और घोड़े तैयार करके
श्लोक 41 (5.72.41)
योधाश्च सर्वे कृतनिश्चयास्ते । भवन्तु हस्त्यश्वरथेषु यत्ताः । साङ्ग्रामिकं ते यदुपार्जनीयं । सर्वं समग्रं कुरु तन्नरेन्द्र ॥
yodhāśca sarve kṛtaniścayāste | bhavantu hastyaśvaratheṣu yattāḥ | sāṅgrāmikaṃ te yadupārjanīyaṃ | sarvaṃ samagraṃ kuru tannarendra
आपके सभी योद्धा दृढ़ निश्चय के साथ हाथियों, घोड़ों और रथों पर सन्नद्ध रहें। हे नरेन्द्र, युद्ध के लिए जो कुछ जुटाना है, वह सब पूरा-पूरा जुटा लीजिए।
श्लोक 42 (5.72.42)
दुर्योधनो न ह्यलमद्य दातुं । जीवंस्तवैतन्नृपते कथंचित् । यत्ते पुरस्तादभवत्समृद्धं । द्यूते हृतं पाण्डवमुख्य राज्यम् ॥
duryodhano na hyalamadya dātuṃ | jīvaṃstavaitannṛpate kathaṃcit | yatte purastādabhavatsamṛddhaṃ | dyūte hṛtaṃ pāṇḍavamukhya rājyam
हे राजन्, दुर्योधन जीते जी आज किसी भी प्रकार वह लौटाने को तैयार नहीं होगा जो पहले आपका था—हे पाण्डवश्रेष्ठ, आपका वह समृद्ध राज्य जो द्यूत में छीन लिया गया।