उद्योग पर्व · अध्याय 73
भीमसेन की शान्ति के लिए विनती
अप्रत्याशित रूप से कोमल बने भीमसेन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि वे दुर्योधन से मधुर वचन बोलें और युद्ध का भय न दिखाएँ, क्योंकि दुर्योधन हठी, क्रोधी और दुष्ट स्वभाव का है। वे उन अठारह राजाओं का स्मरण करते हैं जो युग के अन्त में जन्म लेकर अपने ही कुल का नाश कर बैठे, और आशंका करते हैं कि दुर्योधन भी कुरुकुल के लिए वैसा ही अंगारा बन सकता है। भरतवंश के विनाश की अपेक्षा पाण्डव विनम्र होकर दुर्योधन के पीछे चलना भी स्वीकार कर लेंगे; भीष्म और सभासदों से भाइयों में सौहार्द के लिए कहा जाए—यही युधिष्ठिर और दयालु अर्जुन भी चाहते हैं।
भीम उवाच
श्लोक 1 (5.73.1)
यथायथैव शान्तिः स्यात्कुरूणां मधुसूदन । तथातथैव भाषेथा मा स्म युद्धेन भीषयेः ॥
yathāyathaiva śāntiḥ syātkurūṇāṃ madhusūdana | tathātathaiva bhāṣethā mā sma yuddhena bhīṣayeḥ
हे मधुसूदन, जिस प्रकार भी कौरवों में शान्ति हो, उसी प्रकार बोलिए। उन्हें युद्ध का भय मत दिखाइए।
श्लोक 2 (5.73.2)
अमर्षी जातसंरम्भः श्रेयोद्वेषी महामनाः । नोग्रं दुर्योधनो वाच्यः साम्नैवेनं समाचरेः ॥
amarṣī jātasaṃrambhaḥ śreyodveṣī mahāmanāḥ | nograṃ duryodhano vācyaḥ sāmnaivenaṃ samācareḥ
दुर्योधन असहिष्णु, शीघ्र क्रोध करने वाला, अपने ही कल्याण से द्वेष रखने वाला और अभिमानी है। उससे कठोर बात न कही जाए; उसके साथ सान्त्वना से ही व्यवहार कीजिए।
श्लोक 3 (5.73.3)
प्रकृत्या पापसत्वश्च तुल्यचेतास्तु दस्युभिः । ऐश्वर्यमदमत्तश्च कृतवैरश्च पाण्डवैः ॥
prakṛtyā pāpasatvaśca tulyacetāstu dasyubhiḥ | aiśvaryamadamattaśca kṛtavairaśca pāṇḍavaiḥ
वह स्वभाव से ही पापी है, लुटेरों जैसी मनोवृत्ति वाला है, ऐश्वर्य के मद में चूर है और उसने पाण्डवों से वैर ठान रखा है।
श्लोक 4 (5.73.4)
अदीर्घदर्शी निष्ठूरी क्षेप्ता क्रूरपराक्रमः । दीर्घमन्युरनेयश्च पापात्मा निकृतिप्रियः ॥
adīrghadarśī niṣṭhūrī kṣeptā krūraparākramaḥ | dīrghamanyuraneyaśca pāpātmā nikṛtipriyaḥ
वह दूर की नहीं सोचता; कठोर बोलने वाला, निन्दक, क्रूर पराक्रम वाला, देर तक क्रोध पालने वाला, शिक्षा न मानने वाला, पापात्मा और छल-कपट का प्रेमी है।
श्लोक 5 (5.73.5)
म्रियेतापि न भज्येत नैव जह्यात्स्वकं मतम् । तादृशेन शमः कृष्ण मन्ये परमदुष्करः ॥
mriyetāpi na bhajyeta naiva jahyātsvakaṃ matam | tādṛśena śamaḥ kṛṣṇa manye paramaduṣkaraḥ
वह मर जाएगा पर झुकेगा नहीं; अपना मत कभी नहीं छोड़ेगा। हे कृष्ण, मैं समझता हूँ कि ऐसे व्यक्ति के साथ सन्धि अत्यन्त कठिन है।
श्लोक 6 (5.73.6)
सुहृदामप्यवाचीनस्त्यक्तधर्मा प्रियानृतः । प्रतिहन्त्येव सुहृदां वाचश्चैव मनांसि च ॥
suhṛdāmapyavācīnastyaktadharmā priyānṛtaḥ | pratihantyeva suhṛdāṃ vācaścaiva manāṃsi ca
वह मित्रों के भी विपरीत चलता है, उसने धर्म को त्याग दिया है और उसे असत्य प्रिय है। वह अपने हितैषियों के वचनों और भावनाओं, दोनों को कुचल देता है।
श्लोक 7 (5.73.7)
स मन्युवशमापन्नः स्वभावं दुष्टमास्थितः । स्वभावात्पापमभ्येति तृणैश्छन्न इवोरगः ॥
sa manyuvaśamāpannaḥ svabhāvaṃ duṣṭamāsthitaḥ | svabhāvātpāpamabhyeti tṛṇaiśchanna ivoragaḥ
क्रोध के वश में पड़ा और अपने दुष्ट स्वभाव में स्थित वह स्वभाव से ही पाप की ओर बढ़ता है, जैसे घास में छिपा साँप।
श्लोक 8 (5.73.8)
दुर्योधनो हि यत्सेनः सर्वथा विदितस्तव । यच्छीलो यत्स्वभावश्च यद्बलो यत्पराक्रमः ॥
duryodhano hi yatsenaḥ sarvathā viditastava | yacchīlo yatsvabhāvaśca yadbalo yatparākramaḥ
दुर्योधन की सेना कैसी है, उसका शील, उसका स्वभाव, उसका बल और उसका पराक्रम कैसा है—यह सब आप भली-भाँति जानते हैं।
श्लोक 9 (5.73.9)
पुरा प्रसन्नाः कुरवः सहपुत्रास्तथा वयम् । इन्द्रज्येष्ठा इवाभूम मोदमानाः सबान्धवाः ॥
purā prasannāḥ kuravaḥ sahaputrāstathā vayam | indrajyeṣṭhā ivābhūma modamānāḥ sabāndhavāḥ
पहले कौरव अपने पुत्रों सहित प्रसन्न थे और हम भी; हम अपने बन्धुओं के साथ ऐसे आनन्द से रहते थे जैसे इन्द्र को बड़ा मानकर देवता रहते हैं।
श्लोक 10 (5.73.10)
दुर्योधनस्य क्रोधेन भरता मधुसूदन । धक्ष्यन्ते शिशिरापाये वनानीव हुताशनैः ॥
duryodhanasya krodhena bharatā madhusūdana | dhakṣyante śiśirāpāye vanānīva hutāśanaiḥ
हे मधुसूदन, दुर्योधन के क्रोध से भरतवंशी ऐसे जल जाएँगे जैसे शिशिर ऋतु के अन्त में आग से वन जल जाते हैं।
श्लोक 11 (5.73.11)
अष्टादशेमे राजानः प्रख्याता मधुसूदन । ये समुच्चिच्छिदुर्ज्ञातीन्सुहृदश्च सबान्धवान् ॥
aṣṭādaśeme rājānaḥ prakhyātā madhusūdana | ye samuccicchidurjñātīnsuhṛdaśca sabāndhavān
हे मधुसूदन, अठारह ऐसे प्रसिद्ध राजा हुए हैं जिन्होंने अपने ही जाति-बन्धुओं, मित्रों और सम्बन्धियों का नाश कर डाला।
श्लोक 12 (5.73.12)
असुराणां समृद्धानां ज्वलतामिव तेजसा । पर्यायकाले धर्मस्य प्राप्ते कलिरजायत ॥
asurāṇāṃ samṛddhānāṃ jvalatāmiva tejasā | paryāyakāle dharmasya prāpte kalirajāyata
जब समृद्ध और तेज से जगमगाते हुए असुरों में धर्म के अन्त का समय आया, तब उनमें कलि का जन्म हुआ।
श्लोक 13 (5.73.13)
हैहयानामुदावर्तो नीपानां जनमेजयः । बहुलस्तालजङ्घानां कृमीणामुद्धतो वसुः ॥
haihayānāmudāvarto nīpānāṃ janamejayaḥ | bahulastālajaṅghānāṃ kṛmīṇāmuddhato vasuḥ
हैहयों में उदावर्त, नीपों में जनमेजय, तालजंघों में बहुल, कृमियों में उद्धत वसु,
श्लोक 14 (5.73.14)
अजबिन्दुः सुवीराणां सुराष्ट्राणां रुषर्द्धिकः । अर्कजश्च बलीहानां चीनानां धौतमूलकः ॥
ajabinduḥ suvīrāṇāṃ surāṣṭrāṇāṃ ruṣarddhikaḥ | arkajaśca balīhānāṃ cīnānāṃ dhautamūlakaḥ
सुवीरों में अजबिन्दु, सुराष्ट्रों में रुषर्द्धिक, बलीहों में अर्कज, चीनों में धौतमूलक,
श्लोक 15 (5.73.15)
हयग्रीवो विदेहानां वरयुश्च महौजसाम् । बाहुः सुन्दरवंशानां दीप्ताक्षाणां पुरूरवाः ॥
hayagrīvo videhānāṃ varayuśca mahaujasām | bāhuḥ sundaravaṃśānāṃ dīptākṣāṇāṃ purūravāḥ
विदेहों में हयग्रीव, महौजसों में वरयु, सुन्दरवंशों में बाहु, दीप्ताक्षों में पुरूरवा,
श्लोक 16 (5.73.16)
सहजश्चेदिमत्स्यानां प्रवीराणां वृषध्वजः । धारणश्चन्द्रवत्सानां मुकुटानां विगाहनः ॥
sahajaścedimatsyānāṃ pravīrāṇāṃ vṛṣadhvajaḥ | dhāraṇaścandravatsānāṃ mukuṭānāṃ vigāhanaḥ
चेदियों और मत्स्यों में सहज, प्रवीरों में वृषध्वज, चन्द्रवत्सों में धारण, मुकुटों में विगाहन,
श्लोक 17 (5.73.17)
शमश्च नन्दिवेगानामित्येते कुलपांसनाः । युगान्ते कृष्ण संभूताः कुलेषु पुरुषाधमाः ॥
śamaśca nandivegānāmityete kulapāṃsanāḥ | yugānte kṛṣṇa saṃbhūtāḥ kuleṣu puruṣādhamāḥ
और नन्दिवेगों में शम—हे कृष्ण, ये कुल को कलंकित करने वाले नराधम युग के अन्त में अपने-अपने कुलों में उत्पन्न हुए।
श्लोक 18 (5.73.18)
अप्ययं नः कुरूणां स्याद्युगान्ते कालसंभृतः । दुर्योधनः कुलाङ्गारो जघन्यः पापपूरुषः ॥
apyayaṃ naḥ kurūṇāṃ syādyugānte kālasaṃbhṛtaḥ | duryodhanaḥ kulāṅgāro jaghanyaḥ pāpapūruṣaḥ
इसी प्रकार युग के अन्त में काल द्वारा लाया गया यह दुर्योधन भी हम कौरवों के लिए कुल का अंगारा, नीच और पापी पुरुष हो सकता है।
श्लोक 19 (5.73.19)
तस्मान्मृदु शनैर्ब्रूया धर्मार्थसहितं हितम् । कामानुबद्धं बहुलं नोग्रमुग्रपराक्रमम् ॥
tasmānmṛdu śanairbrūyā dharmārthasahitaṃ hitam | kāmānubaddhaṃ bahulaṃ nogramugraparākramam
इसलिए उस उग्र पराक्रमी से धीरे-धीरे, कोमलता से, धर्म और अर्थ से युक्त हितकारी बात कहिए—अधिकतर उसकी रुचि के अनुसार, कठोरता से नहीं।
श्लोक 20 (5.73.20)
अपि दुर्योधनं कृष्ण सर्वे वयमधश्चराः । नीचैर्भूत्वाऽनुयास्यामो मा स्म नो भरता नशन् ॥
api duryodhanaṃ kṛṣṇa sarve vayamadhaścarāḥ | nīcairbhūtvā'nuyāsyāmo mā sma no bharatā naśan
हे कृष्ण, हम सब नीचे होकर विनम्रता से दुर्योधन के पीछे भी चलेंगे, बस भरतवंश का नाश न हो।
श्लोक 21 (5.73.21)
अप्युदासीनवृत्तिः स्याद्यथा नः कुरुभिः सह । वासुदेव तथा कार्यं न कुरूननयः स्पृशेत् ॥
apyudāsīnavṛttiḥ syādyathā naḥ kurubhiḥ saha | vāsudeva tathā kāryaṃ na kurūnanayaḥ spṛśet
हे वासुदेव, ऐसा कीजिए कि हम कौरवों के साथ कम से कम उदासीन भाव से रह सकें, और कौरवों पर कोई विपत्ति न आए।
श्लोक 22 (5.73.22)
वाच्यः पितामहो वृद्धो ये च कृष्ण सभासदः । भ्रातॄणामस्तु सौभ्रात्रं धार्तराष्ट्रः प्रशाम्यताम् ॥
vācyaḥ pitāmaho vṛddho ye ca kṛṣṇa sabhāsadaḥ | bhrātṝṇāmastu saubhrātraṃ dhārtarāṣṭraḥ praśāmyatām
हे कृष्ण, वृद्ध पितामह और सभा में बैठे लोगों से कहिए कि भाइयों में भाईचारा रहे और धृतराष्ट्र का पुत्र शान्त हो जाए।
श्लोक 23 (5.73.23)
अहमेतद्ब्रवीम्येवं राजा चैव प्रशंसति । अर्जुनो नैव युद्धार्थी भूयसी हि दयाऽर्जुने ॥
ahametadbravīmyevaṃ rājā caiva praśaṃsati | arjuno naiva yuddhārthī bhūyasī hi dayā'rjune
मैं यही कहता हूँ और राजा युधिष्ठिर भी इसकी प्रशंसा करते हैं। अर्जुन भी युद्ध नहीं चाहते, क्योंकि अर्जुन में बहुत दया है।