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उद्योग पर्व · अध्याय 99

नारद द्वारा पाताल का वर्णन

नारद मातलि को नागलोक की नाभि में स्थित पाताल नगर दिखाते हैं, जहाँ दैत्य और दानव रहते हैं, और उसके नाम तथा उसकी अद्भुत बातों का वर्णन करते हैं — जल खाने वाली आसुरी अग्नि, देवताओं द्वारा रखा गया अमृत जिससे चन्द्रमा घटता-बढ़ता है, हर पर्व पर प्रकट होने वाले अश्वशिरा, इन्द्र की वर्षा के लिए जल खींचने वाला ऐरावण, दिन में मरकर रात में जी उठने वाले जलचर, और गोव्रत का पालन करने वाले ब्राह्मण। वे एक दीप्तिमान अण्डा भी दिखाते हैं, जिससे प्रलय के समय उठने वाली अग्नि तीनों लोकों को जला देगी। मातलि को वहाँ कोई वर नहीं भाता और वह कहीं और चलने को कहता है।

अध्याय 98अध्याय-सूचीअध्याय 100

नारद उवाच

श्लोक 1 (5.99.1)

एतत्तु नागलोकस्य नाभिस्थाने स्थितं पुरम् । पातालमिति विख्यातं दैत्यदानवसेवितम् ॥

etattu nāgalokasya nābhisthāne sthitaṃ puram | pātālamiti vikhyātaṃ daityadānavasevitam

नागलोक की नाभि में स्थित यह नगर पाताल के नाम से विख्यात है; इसमें दैत्य और दानव रहते हैं।

श्लोक 2 (5.99.2)

इदमद्भिः समं प्राप्ता ये केचिद्भुवि जङ्गमाः । प्रविशन्तो महानादं नदन्ति भयपीडिताः ॥

idamadbhiḥ samaṃ prāptā ye kecidbhuvi jaṅgamāḥ | praviśanto mahānādaṃ nadanti bhayapīḍitāḥ

पृथ्वी के जो भी चलने-फिरने वाले प्राणी जल के साथ बहकर यहाँ पहुँचते हैं, वे प्रवेश करते समय भय से पीड़ित होकर ज़ोर से चिल्लाते हैं।

श्लोक 3 (5.99.3)

अत्रासुरोऽग्निः सततं दीप्यते वारिभोजनः । व्यापारेण धृतात्मानं निबद्धं समबुध्यत ॥

atrāsuro'gniḥ satataṃ dīpyate vāribhojanaḥ | vyāpāreṇa dhṛtātmānaṃ nibaddhaṃ samabudhyata

यहाँ जल का भोजन करने वाली आसुरी अग्नि निरन्तर जलती रहती है; वह जानती है कि जगत् के हित के लिए वह अपनी मर्यादा में बँधी और रोकी हुई है।

श्लोक 4 (5.99.4)

अत्रामृतं सुरैः पीत्वा निहितं निहतारिभिः । अतः सोमस्य हानिश्च वृद्धिश्चैव प्रदृश्यते ॥

atrāmṛtaṃ suraiḥ pītvā nihitaṃ nihatāribhiḥ | ataḥ somasya hāniśca vṛddhiścaiva pradṛśyate

यहाँ शत्रुओं का संहार करने वाले देवताओं ने अमृत पीकर शेष रख दिया था; इसी से चन्द्रमा का घटना और बढ़ना दिखाई देता है।

श्लोक 5 (5.99.5)

अत्रादित्यो हयशिराः काले पर्वणि पर्वणि । उत्तिष्ठति सुवर्णाख्यो वाग्भिरापूरयञ्जगत् ॥

atrādityo hayaśirāḥ kāle parvaṇi parvaṇi | uttiṣṭhati suvarṇākhyo vāgbhirāpūrayañjagat

यहाँ प्रत्येक पर्व के समय अदितिपुत्र अश्वशिरा, जिन्हें सुवर्ण कहा जाता है, वेद-वाणी से जगत् को भरते हुए प्रकट होते हैं।

श्लोक 6 (5.99.6)

यस्मादलं समस्तास्ताः पतन्ति जलमूर्तयः । तस्मात्पातालमित्येव ख्यायते पुरमुत्तमम् ॥

yasmādalaṃ samastāstāḥ patanti jalamūrtayaḥ | tasmātpātālamityeva khyāyate puramuttamam

क्योंकि जल के सारे रूप यहाँ पूरी तरह आ गिरते हैं, इसलिए यह उत्तम नगर 'पाताल' कहलाता है।

श्लोक 7 (5.99.7)

ऐरावणोऽस्मात्सलिलं गृहीत्वा जगतो हितः । मेघेष्वामुञ्चते शीतं यन्महेन्द्रः प्रवर्षति ॥

airāvaṇo'smātsalilaṃ gṛhītvā jagato hitaḥ | megheṣvāmuñcate śītaṃ yanmahendraḥ pravarṣati

जगत् के हित के लिए ऐरावण यहीं से जल लेकर मेघों में वह शीतल जल छोड़ता है, जिसे महेन्द्र बरसाते हैं।

श्लोक 8 (5.99.8)

ऐरावतो नागराजो वामनः कुमुदोऽञ्जनः । प्रसूताः सुप्रतीकस्य वंशे वारणसत्तमाः ॥

airāvato nāgarājo vāmanaḥ kumudo'ñjanaḥ | prasūtāḥ supratīkasya vaṃśe vāraṇasattamāḥ

गजराज ऐरावत, वामन, कुमुद और अंजन — ये श्रेष्ठ हाथी सुप्रतीक के वंश में उत्पन्न हुए।

श्लोक 9 (5.99.9)

अत्र नानाविधाकारास्तिमयो नैकरूपिणः । अप्सु सोमप्रभां पीत्वा वसन्ति जलचारिणः ॥

atra nānāvidhākārāstimayo naikarūpiṇaḥ | apsu somaprabhāṃ pītvā vasanti jalacāriṇaḥ

यहाँ नाना आकारों और अनेक रूपों वाले तिमि आदि जलचर रहते हैं, जो जल में चन्द्रमा की प्रभा पीकर जीते हैं।

श्लोक 10 (5.99.10)

अत्र सूर्यांशुभिर्भिन्नाः पातालतलमाश्रिताः । मृता हि दिवसे सूत पुनर्जीवन्ति वै निशि ॥

atra sūryāṃśubhirbhinnāḥ pātālatalamāśritāḥ | mṛtā hi divase sūta punarjīvanti vai niśi

हे सूत, यहाँ सूर्य की किरणों से बिंधे प्राणी पाताल के तल में आश्रय लेते हैं; वे दिन में मर जाते हैं और रात में फिर जी उठते हैं।

श्लोक 11 (5.99.11)

उदयन्नित्यशश्चात्र चन्द्रमा रश्मिबाहुभिः । अमृतं स्पृश्य संस्पर्शात्संजीवयतिदेहिनः ॥

udayannityaśaścātra candramā raśmibāhubhiḥ | amṛtaṃ spṛśya saṃsparśātsaṃjīvayatidehinaḥ

यहाँ प्रतिदिन उदय होता चन्द्रमा अपनी किरणों रूपी भुजाओं से अमृत का स्पर्श करता है और उस स्पर्श से प्राणियों को फिर जीवित कर देता है।

श्लोक 12 (5.99.12)

अत्र तेऽधर्मनिरता बद्धाः कालेन पीडिताः । दैतेया निवसन्ति स्म वासवेन हृतश्रियः ॥

atra te'dharmaniratā baddhāḥ kālena pīḍitāḥ | daiteyā nivasanti sma vāsavena hṛtaśriyaḥ

यहाँ अधर्म में लगे वे दैत्य रहते हैं, जो बँधे हुए और काल से पीड़ित हैं, और जिनकी श्री इन्द्र ने छीन ली है।

श्लोक 13 (5.99.13)

अत्र भूतपतिर्नाम सर्वभूतमहेश्वरः । भूतये सर्वभूतानामचरत्तप उत्तमम् ॥

atra bhūtapatirnāma sarvabhūtamaheśvaraḥ | bhūtaye sarvabhūtānāmacarattapa uttamam

यहाँ समस्त प्राणियों के महेश्वर भूतपति ने सब प्राणियों के कल्याण के लिए उत्तम तप किया था।

श्लोक 14 (5.99.14)

अत्र गोव्रतिनो विप्राः स्वाध्यायाम्नायकर्शिताः । त्यक्तप्राणा जितस्वर्गा निवसन्ति महर्षयः ॥

atra govratino viprāḥ svādhyāyāmnāyakarśitāḥ | tyaktaprāṇā jitasvargā nivasanti maharṣayaḥ

यहाँ गोव्रत का पालन करने वाले ब्राह्मण महर्षि रहते हैं, जो वेद के स्वाध्याय और पाठ से कृश हो गए हैं, जिन्होंने प्राणों का मोह छोड़ दिया है और स्वर्ग जीत लिया है।

श्लोक 15 (5.99.15)

यत्रतत्रशयो नित्यं येनकेनचिदाशितः । येनकेनचिदाच्छन्नः स गोव्रत इहोच्यते ॥

yatratatraśayo nityaṃ yenakenacidāśitaḥ | yenakenacidācchannaḥ sa govrata ihocyate

जो सदा जहाँ-तहाँ सो जाता है, जो कुछ मिल जाए वही खा लेता है और जो कुछ मिल जाए उसी से शरीर ढक लेता है — वही यहाँ गोव्रती कहलाता है।

श्लोक 16 (5.99.16)

पश्य यद्यत्र ते कश्चिद्रोचते गुणतो वरः । वरयिष्यामि तं गत्वा यत्नमास्थाय मातले ॥

paśya yadyatra te kaścidrocate guṇato varaḥ | varayiṣyāmi taṃ gatvā yatnamāsthāya mātale

देखो, यदि यहाँ कोई वर अपने गुणों के कारण तुम्हें भाता हो, तो हे मातलि, मैं जाकर यत्नपूर्वक उसका वरण करूँगा।

श्लोक 17 (5.99.17)

अण्डमेतज्जले न्यस्तं दीप्यमानमिव श्रिया । आप्रजानां निसर्गाद्वै नोद्भिद्यति न सर्पति ॥

aṇḍametajjale nyastaṃ dīpyamānamiva śriyā | āprajānāṃ nisargādvai nodbhidyati na sarpati

जल में रखा यह अण्डा, जो शोभा से मानो दमक रहा है, प्राणियों की सृष्टि से लेकर अब तक न फूटा है न हिला है।

श्लोक 18 (5.99.18)

नास्य जातिं निसर्गं वा कथ्यमानं शृणोमि वै । पितरं मातरं चापि नास्य जानाति कश्चन ॥

nāsya jātiṃ nisargaṃ vā kathyamānaṃ śṛṇomi vai | pitaraṃ mātaraṃ cāpi nāsya jānāti kaścana

इसके जन्म या स्वभाव के विषय में मैंने कभी किसी को कहते नहीं सुना; इसके पिता और माता को भी कोई नहीं जानता।

श्लोक 19 (5.99.19)

अतः किल महानग्निरन्तकाले समुत्थितः । धक्ष्यते मातले सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥

ataḥ kila mahānagnirantakāle samutthitaḥ | dhakṣyate mātale sarvaṃ trailokyaṃ sacarācaram

कहते हैं, हे मातलि, अन्तकाल में इसी से एक महान अग्नि उठेगी और चर-अचर सहित पूरी त्रिलोकी को जला देगी।

कण्व उवाच

श्लोक 20 (5.99.20)

मातलिस्त्वब्रवीच्छ्रुत्वा नारदस्याथ भाषितम् । न मेऽत्र रोचते कश्चिदन्यतो व्रज माचिरम् ॥

mātalistvabravīcchrutvā nāradasyātha bhāṣitam | na me'tra rocate kaścidanyato vraja māciram

नारद की बात सुनकर मातलि ने कहा — 'यहाँ मुझे कोई नहीं भाता। शीघ्र कहीं और चलिए।'

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