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विराट पर्व · अध्याय 12

नकुल का विराट के अश्वाध्यक्ष के रूप में प्रवेश

विराट जब अपने घोड़ों का निरीक्षण कर रहे होते हैं, तब नकुल दिखाई देते हैं, और उनके रूप तथा घोड़ों की परख से प्रभावित राजा उन्हें बुलवाते हैं। नकुल अश्वपाल बनने की याचना करते हुए बताते हैं कि युधिष्ठिर ने उन्हें अपने असंख्य घोड़ों का अध्यक्ष बनाया था, कि वे घोड़ों का स्वभाव, उन्हें सधाना और उनकी चिकित्सा जानते हैं, और उनका नाम ग्रन्थिक था। उन्हें राजा बनने योग्य मानते हुए भी विराट अपने सब घोड़े और सारथी उनके अधीन कर देते हैं, और वे वहाँ सम्मान से अज्ञात रूप में रहते हैं।

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.12.1)

अथापरोऽदृश्यत पाण्डवः प्रभुर्विराटराजे तुरगान्समीक्षति । तमापतन्तं ददृशुः पृथग्जनाः प्रमुक्तमभ्रादिव चन्द्रमण्डलम् ॥

athāparo'dṛśyata pāṇḍavaḥ prabhurvirāṭarāje turagānsamīkṣati | tamāpatantaṃ dadṛśuḥ pṛthagjanāḥ pramuktamabhrādiva candramaṇḍalam

तब, जब राजा विराट अपने घोड़ों का निरीक्षण कर रहे थे, एक और समर्थ पाण्डव दिखाई दिया; लोगों ने उसे बादल से मुक्त हुए चन्द्रमण्डल की भाँति आते देखा।

श्लोक 2 (4.12.2)

स वै हयानैक्षत तानितस्ततः समीक्षमाणं च ददर्श मत्स्यराट् । दृष्ट्वा तथैनं स कुरूत्तमं ततः पप्रच्छ तान्सर्वसभासदस्तदा ॥

sa vai hayānaikṣata tānitastataḥ samīkṣamāṇaṃ ca dadarśa matsyarāṭ | dṛṣṭvā tathainaṃ sa kurūttamaṃ tataḥ papraccha tānsarvasabhāsadastadā

वह इधर-उधर घोड़ों को देख रहा था, और मत्स्यराज ने उसे उनकी जाँच करते देखा। उस कुरुश्रेष्ठ को इस प्रकार देखकर राजा ने तब अपने सब सभासदों से पूछा —

विराट उवाच

श्लोक 3 (4.12.3)

को वा विजानाति पुराऽस्य दर्शनं योऽयं युवाऽभ्येति हि मामिकां सभाम् । प्रियो हि मे दर्शनतोपि संमतो ब्रवीतु कश्चिद्यदि दृष्टवानिमम् ॥

ko vā vijānāti purā'sya darśanaṃ yo'yaṃ yuvā'bhyeti hi māmikāṃ sabhām | priyo hi me darśanatopi saṃmato bravītu kaścidyadi dṛṣṭavānimam

"इसे पहले किसने देखा है — यह युवक जो मेरी सभा की ओर आ रहा है? देखने भर से यह मुझे प्रिय और मान्य लगता है। जिसने इसे देखा हो, वह बताए।

श्लोक 4 (4.12.4)

अयं हयान्पश्यति मामकान्मुहुर्ध्रुवं हयज्ञो भविता विचक्षणः । प्रवेश्यतामेष समीपमाशु वै विभाति वीरो हि यथाऽमरस्तथा ॥

ayaṃ hayānpaśyati māmakānmuhurdhruvaṃ hayajño bhavitā vicakṣaṇaḥ | praveśyatāmeṣa samīpamāśu vai vibhāti vīro hi yathā'marastathā

यह बार-बार मेरे घोड़ों को देख रहा है; निश्चय ही यह कोई चतुर अश्व-पारखी होगा। इसे तुरन्त मेरे पास लाया जाए; यह वीर देवता के समान दमक रहा है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (4.12.5)

वितर्कयत्येव हि मत्स्यराजनि त्वरन्कुरूणामृषभः सभामगात् । ततः प्रणम्योपनतः कुरूत्तमो विराटराजानमुवाच पार्थिवम् ॥

vitarkayatyeva hi matsyarājani tvarankurūṇāmṛṣabhaḥ sabhāmagāt | tataḥ praṇamyopanataḥ kurūttamo virāṭarājānamuvāca pārthivam

मत्स्यराज अभी विचार कर ही रहे थे कि वह कुरुश्रेष्ठ तेज़ी से सभा में आ पहुँचा। तब प्रणाम करके पास आकर उस कुरुश्रेष्ठ ने पृथ्वीपति राजा विराट से कहा —

नकुल उवाच

श्लोक 6 (4.12.6)

तवागतोऽहं पुरमद्य भूपते जिजीविषुर्वेतनभोजनार्थिकः । तवाश्वबन्धः सुभृतो भवाम्यहं कुरुष्व मामश्वपतिं यदीच्छसि ॥

tavāgato'haṃ puramadya bhūpate jijīviṣurvetanabhojanārthikaḥ | tavāśvabandhaḥ subhṛto bhavāmyahaṃ kuruṣva māmaśvapatiṃ yadīcchasi

"हे भूपति, जीविका की इच्छा से, वेतन और भोजन पाने के लिए मैं आज आपके नगर में आया हूँ। आपके द्वारा भली-भाँति पोषित होकर मैं आपका अश्वपाल बनूँगा; यदि आप चाहें तो मुझे अपने घोड़ों का अध्यक्ष बना दीजिए।"

विराट उवाच

श्लोक 7 (4.12.7)

ददानि यानानि धनानि वेतनं न चाश्वसूतो भवितुं त्वमर्हसि । कुतोसि कस्यासि कथं त्वमागतो ब्रवीहि शिल्पं तव विद्यते च यत् ॥

dadāni yānāni dhanāni vetanaṃ na cāśvasūto bhavituṃ tvamarhasi | kutosi kasyāsi kathaṃ tvamāgato bravīhi śilpaṃ tava vidyate ca yat

"मैं तुम्हें वाहन, धन और वेतन देता हूँ; तुम्हें सईस नहीं बनना चाहिए। तुम कहाँ से आए हो? किसके पुत्र हो? यहाँ कैसे आए? बताओ, तुम्हारे पास कौन-सी कला है।"

नकुल उवाच

श्लोक 8 (4.12.8)

पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां ज्येष्ठो राजा युधिष्ठिरः । तेनाहमश्वेषु पुरा प्रकृतः शत्रुकर्शन ॥

pañcānāṃ pāṇḍuputrāṇāṃ jyeṣṭho rājā yudhiṣṭhiraḥ | tenāhamaśveṣu purā prakṛtaḥ śatrukarśana

"पाण्डु के पाँच पुत्रों में सबसे बड़े राजा युधिष्ठिर हैं। हे शत्रुसंहारक, पहले उन्होंने मुझे अपने घोड़ों पर नियुक्त किया था।

श्लोक 9 (4.12.9)

अश्वानां प्रकृतिं वेद्मि विनयं चापि सर्वशः । दुष्टानां प्रतिपत्तिं च कृत्स्नं चैव चिकित्सितम् ॥

aśvānāṃ prakṛtiṃ vedmi vinayaṃ cāpi sarvaśaḥ | duṣṭānāṃ pratipattiṃ ca kṛtsnaṃ caiva cikitsitam

मैं घोड़ों का स्वभाव और हर प्रकार से उन्हें सधाना जानता हूँ; दुष्ट घोड़ों को वश में करने की विधि और उनकी सम्पूर्ण चिकित्सा भी।

श्लोक 10 (4.12.10)

न कातरं स्यान्मम वाजिवाहनं न मेऽस्ति दुष्टा बडवा कुतो हयः । जानंस्तु मामाह स चापि पाण्डवो युधिष्ठिरो ग्रन्थिकमेव नामतः ॥

na kātaraṃ syānmama vājivāhanaṃ na me'sti duṣṭā baḍavā kuto hayaḥ | jānaṃstu māmāha sa cāpi pāṇḍavo yudhiṣṭhiro granthikameva nāmataḥ

मेरा कोई घोड़ा कभी डरपोक नहीं होता; मेरी कोई घोड़ी दुष्ट नहीं होती, फिर घोड़ों की तो बात ही क्या। मुझे जानते हुए स्वयं पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझे ग्रन्थिक नाम से पुकारते थे।

श्लोक 11 (4.12.11)

मातलिरिव देवपतेर्दशरथनृपतेः सुमन्त्र इव यन्ता । सुमह इव जामदग्नेस्तथैव तव शिक्षयाम्यश्वान् ॥

mātaliriva devapaterdaśarathanṛpateḥ sumantra iva yantā | sumaha iva jāmadagnestathaiva tava śikṣayāmyaśvān

जैसे देवराज के मातलि, राजा दशरथ के सारथी सुमन्त्र, और जमदग्नि-पुत्र के सुमह थे, वैसे ही मैं आपके घोड़ों को शिक्षित करूँगा।

श्लोक 12 (4.12.12)

युधिष्ठिरस्य राजेन्द्र नरराजस्य शासनात् । शतसाहस्रकोटीनामश्वानामस्मि रक्षिता ॥

yudhiṣṭhirasya rājendra nararājasya śāsanāt | śatasāhasrakoṭīnāmaśvānāmasmi rakṣitā

हे राजेन्द्र, नरराज युधिष्ठिर की आज्ञा से मैं सौ हज़ार करोड़ घोड़ों का रक्षक था।"

विराट उवाच

श्लोक 13 (4.12.13)

यदस्ति किंचिन्मम वाजिवाहनं तदस्तु सर्वं त्वदधीनमद्य वै । ये चापि केचिन्मम वाजियोधास्त्वदाश्रयाः सारथयश्च सन्तु मे ॥

yadasti kiṃcinmama vājivāhanaṃ tadastu sarvaṃ tvadadhīnamadya vai | ye cāpi kecinmama vājiyodhāstvadāśrayāḥ sārathayaśca santu me

"मेरे पास जितने भी घोड़े और वाहन हैं, वे सब आज से तुम्हारे अधीन रहें; और मेरे जो भी अश्वारोही योद्धा और सारथी हैं, वे तुम्हारे आश्रय में रहें।

श्लोक 14 (4.12.14)

इदं तवेष्टं विहितं सुरोपम ब्रवीहि यत्ते प्रसमीक्षितं वरम् । न तेऽनुरूपं हयकर्म दृश्यते विभाति राजेव न कर्म वाजिनाम् ॥

idaṃ taveṣṭaṃ vihitaṃ suropama bravīhi yatte prasamīkṣitaṃ varam | na te'nurūpaṃ hayakarma dṛśyate vibhāti rājeva na karma vājinām

हे देवतुल्य, तुम्हारी यह इच्छा पूरी की गई; बताओ, तुम कौन-सा पारिश्रमिक चाहते हो। घोड़ों का काम तुम्हारे योग्य नहीं दिखता; तुम राजा की तरह शोभा पाते हो, घोड़ों की सेवा करनेवाले की तरह नहीं।

श्लोक 15 (4.12.15)

युधिष्ठिरस्यैव हि दर्शनेन मे समं तवेदं प्रियदर्श दर्शनम् । कथं नु भृत्यैः स विनाकृतो वने चरत्यनिन्द्यो रमते च पाण्डवः ॥

yudhiṣṭhirasyaiva hi darśanena me samaṃ tavedaṃ priyadarśa darśanam | kathaṃ nu bhṛtyaiḥ sa vinākṛto vane caratyanindyo ramate ca pāṇḍavaḥ

हे प्रियदर्शन, तुम्हारा यह दर्शन मेरे लिए स्वयं युधिष्ठिर के दर्शन के समान है। अपने सेवकों से बिछुड़कर वह निर्दोष पाण्डव वन में कैसे विचरता होगा, और कैसे आनन्द पाता होगा?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (4.12.16)

तथा स गन्धर्ववरोपमो युवा विराटराज्ञा मुदितेन पूजितः । न चैवमन्येऽपि विदुः कथंचन प्रियाभिरामं विचरन्तमन्तरा ॥

tathā sa gandharvavaropamo yuvā virāṭarājñā muditena pūjitaḥ | na caivamanye'pi viduḥ kathaṃcana priyābhirāmaṃ vicarantamantarā

इस प्रकार गन्धर्वराज के समान वह युवक राजा विराट द्वारा प्रसन्नतापूर्वक सम्मानित हुआ; और वहाँ सबको प्रिय और मनोहर लगते हुए विचरनेवाले उसे दूसरा कोई भी किसी प्रकार नहीं पहचान सका।

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