विराट पर्व · अध्याय 13
ग्वाले के वेश में सहदेव का विराट की सेवा में प्रवेश
ग्वाले का वेश धारण करके सहदेव राजा विराट के सामने आते हैं। उनका तेज देखकर विराट चकित हो जाते हैं और उन्हें अपनी सेना का नायक तथा मन्त्री बनाना चाहते हैं। सहदेव यह अस्वीकार करते हैं, अपना नाम अरिष्टनेमि बताते हैं — एक वैश्य, जो तन्त्रीपाल नाम से युधिष्ठिर के असंख्य गोधन की गणना करता था — और गौओं तथा बैलों के विषय में अपनी निपुणता का वर्णन करते हैं। विराट प्रसन्न होकर अपने सारे पशु और ग्वाले उन्हें सौंप देते हैं, और पाण्डव विराट के यहाँ अपना अज्ञातवास बिताने लगते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.13.1)
अथापरोऽदृश्यत वै शशी यथा हुतो हविर्भिर्हि यथाऽध्वरे शिखी । तथा समालक्ष्यत चारुदर्शनः प्रकाशयन्सूर्य इवाचिरोदितः ॥
athāparo'dṛśyata vai śaśī yathā huto havirbhirhi yathā'dhvare śikhī | tathā samālakṣyata cārudarśanaḥ prakāśayansūrya ivāciroditaḥ
तब एक और व्यक्ति दिखाई दिया — चन्द्रमा के समान, या यज्ञ में आहुतियों से प्रज्वलित अग्नि के समान। देखने में वह अत्यन्त सुन्दर था और अभी-अभी उदित हुए सूर्य की भाँति प्रकाश बिखेरता दिखाई दिया।
श्लोक 2 (4.13.2)
तमाव्रजन्तं सहदेवमग्रणीर्नृपो विराटो नचिरात्समैक्षत । प्रैक्षन्त तं तत्र पृथक्समागताः सभागताः सर्वमनोहरप्रभम् । युवानमायान्तममित्रकर्शनं प्रमुक्तमभ्रादिव चन्द्रमण्डलम् ॥
tamāvrajantaṃ sahadevamagraṇīrnṛpo virāṭo nacirātsamaikṣata | praikṣanta taṃ tatra pṛthaksamāgatāḥ sabhāgatāḥ sarvamanoharaprabham | yuvānamāyāntamamitrakarśanaṃ pramuktamabhrādiva candramaṇḍalam
शीघ्र ही अग्रणी राजा विराट ने सहदेव को आते देखा। सभा में अलग-अलग स्थानों पर एकत्र सब लोग उस युवक को निहारने लगे, जिसकी कान्ति सबका मन मोह लेती थी — शत्रुओं को सताने वाला वह वीर बादल से मुक्त हुए चन्द्रमण्डल की भाँति चला आ रहा था।
श्लोक 3 (4.13.3)
यष्ट्या प्रमाणान्वितया सुदर्शनं दामानि पाशं च निबद्ध्य पृष्ठतः । मौर्वीं च तन्त्रीं महतीं सुसंहितां बालैश्च तारैर्बहुभिः समावृताम् ॥
yaṣṭyā pramāṇānvitayā sudarśanaṃ dāmāni pāśaṃ ca nibaddhya pṛṣṭhataḥ | maurvīṃ ca tantrīṃ mahatīṃ susaṃhitāṃ bālaiśca tārairbahubhiḥ samāvṛtām
वह देखने में सुन्दर था; उसके हाथ में उचित लम्बाई की लाठी थी, पीठ पर रस्सियाँ और पगहा बँधे थे, और मूर्वा की बटी हुई एक लम्बी, मज़बूत डोरी थी, जिस पर बालों की अनेक लटें लिपटी थीं।
श्लोक 4 (4.13.4)
स चापि राजानमुवाच वीर्यवान्कुरुष्व मां पार्थिव गोष्ववस्थितम् । मया हि गुप्ताः पशवो भवन्तु ते प्रसन्ननिद्राः प्रभवोस्मि वल्लवः ॥
sa cāpi rājānamuvāca vīryavānkuruṣva māṃ pārthiva goṣvavasthitam | mayā hi guptāḥ paśavo bhavantu te prasannanidrāḥ prabhavosmi vallavaḥ
उस पराक्रमी ने राजा से कहा — "हे राजन्, मुझे अपनी गौओं की देखरेख पर नियुक्त कीजिए। मेरे संरक्षण में आपके पशु चैन से सोएँगे; मैं कुशल ग्वाला हूँ।"
सहदेव उवाच
श्लोक 5 (4.13.5)
न श्वापदेभ्यो न च रोगतो भयं न चापि दावान्न च तस्कराद्भयम् । पयःप्रभूता बहुला निरामया भवन्ति गावः सुभृता नराधिप ॥
na śvāpadebhyo na ca rogato bhayaṃ na cāpi dāvānna ca taskarādbhayam | payaḥprabhūtā bahulā nirāmayā bhavanti gāvaḥ subhṛtā narādhipa
"उन्हें न हिंसक पशुओं से भय रहेगा, न रोग से, न दावानल से और न चोरों से। हे नरेश, भली-भाँति पाली गई आपकी गौएँ बहुत-सी, निरोग और भरपूर दूध देने वाली हो जाएँगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (4.13.6)
निशम्य राजा सहदेवभाषितं निरीक्ष्य माद्रीसुतमभ्यनन्दत् । उवाच हृष्टो मुदितेन चेतसा न बल्लवत्वं त्वयि वीर लक्षये ॥
niśamya rājā sahadevabhāṣitaṃ nirīkṣya mādrīsutamabhyanandat | uvāca hṛṣṭo muditena cetasā na ballavatvaṃ tvayi vīra lakṣaye
सहदेव की बात सुनकर और माद्रीपुत्र को ध्यान से देखकर राजा ने उनका स्वागत किया। हर्षित होकर, प्रसन्न मन से वे बोले — "हे वीर, तुममें मुझे ग्वाले का कोई लक्षण नहीं दिखता।"
विराट उवाच
श्लोक 7 (4.13.7)
धैर्याद्वपुः क्षात्रमिवेह ते दृढं प्रकाशते कौरववंशजस्य वा । नापण्डितेयं तव दृश्यते तनुर्भवेह राज्ये मम मन्त्रधर्मभृत् ॥
dhairyādvapuḥ kṣātramiveha te dṛḍhaṃ prakāśate kauravavaṃśajasya vā | nāpaṇḍiteyaṃ tava dṛśyate tanurbhaveha rājye mama mantradharmabhṛt
"तुम्हारा सुदृढ़ शरीर किसी क्षत्रिय का-सा, या कौरव-वंश में जन्मे पुरुष का-सा तेजस्वी दिखता है। तुम्हारी यह देह किसी अनपढ़ की नहीं लगती। मेरे राज्य में रहकर मेरे मन्त्री बनो और धर्म का भार सँभालो।"
श्लोक 8 (4.13.8)
प्रशाधि मत्स्यान्सहराजकानिमान्बृहस्पतिः शक्रयुतानिवामरान् । बलं च मे रक्ष सुवेष सर्वशो गृहाण खड्गं प्रतिरूपमात्मनः ॥
praśādhi matsyānsaharājakānimānbṛhaspatiḥ śakrayutānivāmarān | balaṃ ca me rakṣa suveṣa sarvaśo gṛhāṇa khaḍgaṃ pratirūpamātmanaḥ
"जैसे बृहस्पति इन्द्र-सहित देवताओं का मार्गदर्शन करते हैं, वैसे ही तुम राजाओं-सहित इन मत्स्यों पर शासन करो। हे सुन्दर वेश वाले, मेरी सेना की हर प्रकार से रक्षा करो और अपने योग्य खड्ग ग्रहण करो।"
श्लोक 9 (4.13.9)
अनीककर्णाग्रधरो बलस्य मे प्रभुर्भवानस्तु गृहाण कार्मुकम् ॥
anīkakarṇāgradharo balasya me prabhurbhavānastu gṛhāṇa kārmukam
"मेरी सेना के अग्रभाग और पार्श्वों को सँभालो और उसके स्वामी बनो। धनुष ग्रहण करो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (4.13.10)
विराटराज्ञाऽभिहितः कुरूत्तमः प्रशस्य राजानमभिप्रणम्य च । उवाच मत्स्यप्रवरं महापतिः शृणुष्व राजन्मम वाक्यमुत्तमम् ॥
virāṭarājñā'bhihitaḥ kurūttamaḥ praśasya rājānamabhipraṇamya ca | uvāca matsyapravaraṃ mahāpatiḥ śṛṇuṣva rājanmama vākyamuttamam
राजा विराट के ऐसा कहने पर कुरुश्रेष्ठ सहदेव ने राजा की प्रशंसा की, उन्हें झुककर प्रणाम किया और मत्स्यराज से बोले — "हे राजन्, मेरी उत्तम बात सुनिए।"
सहदेव उवाच
श्लोक 11 (4.13.11)
बालो ह्यहं जातिविशेषदूषितः कुतोऽद्य मे नीतिषु युक्तमन्त्रता । स्वकर्मतुष्टाश्च वयं नराधिप प्रशाधि मां गोपरिरक्षणेऽनघ ॥
bālo hyahaṃ jātiviśeṣadūṣitaḥ kuto'dya me nītiṣu yuktamantratā | svakarmatuṣṭāśca vayaṃ narādhipa praśādhi māṃ goparirakṣaṇe'nagha
"मैं अभी युवक हूँ और मेरी जाति भी नीची है; नीति के विषयों में परामर्श देने की योग्यता मुझमें कहाँ से आएगी? हे नरेश, हम अपने ही काम से सन्तुष्ट रहते हैं। हे निष्पाप, मुझे गौओं की रक्षा के काम पर लगाइए।"
श्लोक 12 (4.13.12)
वैश्योस्मि नाम्नाऽहमरिष्टनेमिर्गोसङ्ख्य आसं कुरुपुङ्गवानाम् । वस्तुं त्वयीच्छामि विशांवरिष्ठ तान्राजसिंहान्न हि वेद्मि पार्थान् ॥
vaiśyosmi nāmnā'hamariṣṭanemirgosaṅkhya āsaṃ kurupuṅgavānām | vastuṃ tvayīcchāmi viśāṃvariṣṭha tānrājasiṃhānna hi vedmi pārthān
"मैं अरिष्टनेमि नाम का वैश्य हूँ। मैं कुरुश्रेष्ठों की गौओं की गणना करता था। हे मनुष्यों में श्रेष्ठ, मैं आपके आश्रय में रहना चाहता हूँ, क्योंकि मैं नहीं जानता कि वे राजसिंह पृथापुत्र अब कहाँ हैं।"
श्लोक 13 (4.13.13)
न जीवितुं शक्यमतोऽन्यकर्मणा न च त्वदन्यो मम रोचते विभो ॥
na jīvituṃ śakyamato'nyakarmaṇā na ca tvadanyo mama rocate vibho
"किसी दूसरे काम से मैं जीविका नहीं चला सकता, और हे प्रभो, आपके सिवा कोई मुझे भाता भी नहीं।"
विराट उवाच
श्लोक 14 (4.13.14)
त्वं ब्राह्मणो वा यदि वाऽपि भूमिपः समुद्रनेमीश्वररूपवानसि । आचक्ष्व तत्त्वं त्वममित्रकर्शन न बल्लवत्वं त्वयि विद्यते समम् ॥
tvaṃ brāhmaṇo vā yadi vā'pi bhūmipaḥ samudranemīśvararūpavānasi | ācakṣva tattvaṃ tvamamitrakarśana na ballavatvaṃ tvayi vidyate samam
"तुम या तो ब्राह्मण हो या कोई राजा; तुम्हारा रूप समुद्र से घिरी पृथ्वी के स्वामी जैसा है। हे शत्रुओं को सताने वाले, मुझे सच बताओ — ग्वाले का काम तुम्हें शोभा नहीं देता।"
श्लोक 15 (4.13.15)
कस्यासि राज्ञो विषयादिहागतः किं चापि शिल्पं तव विद्यते कृतम् । कथं त्वमस्मासु निवत्स्यसे सदा वदस्व किं चापि तवेह वेतनम् ॥
kasyāsi rājño viṣayādihāgataḥ kiṃ cāpi śilpaṃ tava vidyate kṛtam | kathaṃ tvamasmāsu nivatsyase sadā vadasva kiṃ cāpi taveha vetanam
"तुम किस राजा के राज्य से यहाँ आए हो? तुमने कौन-सा शिल्प सीखा है? हमारे बीच तुम सदा किस प्रकार रहोगे? और बताओ, यहाँ तुम्हें क्या वेतन चाहिए?"
सहदेव उवाच
श्लोक 16 (4.13.16)
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां ज्येष्ठो राजा युधिष्ठिरः । तस्याष्टौ शतसाहस्रं गवां वर्गाः शतंशतम् ॥
pañcānāṃ pāṇḍuputrāṇāṃ jyeṣṭho rājā yudhiṣṭhiraḥ | tasyāṣṭau śatasāhasraṃ gavāṃ vargāḥ śataṃśatam
"पाण्डु के पाँच पुत्रों में सबसे बड़े राजा युधिष्ठिर हैं। उनके पास गौओं के आठ लाख झुण्ड थे, और हर झुण्ड में सौ-सौ गौएँ थीं।"
श्लोक 17 (4.13.17)
अपरे दशसाहस्रा द्विस्तावन्तस्तथा परे । तेषां गोसङ्ख्य आसं वै तन्त्रीपालेति मां विदुः ॥
apare daśasāhasrā dvistāvantastathā pare | teṣāṃ gosaṅkhya āsaṃ vai tantrīpāleti māṃ viduḥ
"दूसरे झुण्ड दस-दस हज़ार के थे, और कुछ उनसे दुगुने। मैं उन सब गौओं की गणना करता था, और लोग मुझे तन्त्रीपाल के नाम से जानते थे।"
श्लोक 18 (4.13.18)
भूतं भव्यं भविष्यच्च यच्चान्यद्गोगतं क्वचित् । न मेऽस्त्यविदितं किंचित्समन्ताद्दशयोजनम् ॥
bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyacca yaccānyadgogataṃ kvacit | na me'styaviditaṃ kiṃcitsamantāddaśayojanam
"चारों ओर दस योजन के भीतर गौओं से सम्बन्धित जो कुछ भी हुआ है, हो रहा है या होने वाला है, उसमें से कुछ भी मुझसे छिपा नहीं है।"
श्लोक 19 (4.13.19)
गुणाः सुविदिता ह्यासन्मया तस्य महात्मनः । आसीच्च स मया तुष्टः कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥
guṇāḥ suviditā hyāsanmayā tasya mahātmanaḥ | āsīcca sa mayā tuṣṭaḥ kururājo yudhiṣṭhiraḥ
"उन महात्मा राजा को मेरे गुण भली-भाँति ज्ञात थे, और कुरुराज युधिष्ठिर मुझसे प्रसन्न रहते थे।"
श्लोक 20 (4.13.20)
अनेन गणिता गावो दुर्विज्ञेया महत्तराः । बहुक्षीरतरास्ता वै बह्व्यः सत्यः सपुत्रिकाः ॥
anena gaṇitā gāvo durvijñeyā mahattarāḥ | bahukṣīratarāstā vai bahvyaḥ satyaḥ saputrikāḥ
"मेरी गिनती और देखरेख में वे गौएँ इतनी बढ़ गईं कि उनकी संख्या जानना कठिन हो गया; वे अधिक दूध देने लगीं, और बहुत-सी गौएँ बछड़ों वाली हो गईं।"
श्लोक 21 (4.13.21)
क्षिप्रं च गावो बहुला भवन्ति न तासु रोगो भवतीह कश्चित् । तैस्तैरुपायैर्विदितं मयैतदेतानि शिल्पानि मयि स्थितानि ॥
kṣipraṃ ca gāvo bahulā bhavanti na tāsu rogo bhavatīha kaścit | taistairupāyairviditaṃ mayaitadetāni śilpāni mayi sthitāni
"मेरे हाथों गौएँ शीघ्र ही बहुत बढ़ जाती हैं और उन्हें कोई रोग नहीं होता। यह मैंने अनेक उपायों से जाना है; ये सारे कौशल मुझमें हैं।"
श्लोक 22 (4.13.22)
ऋषभानपि जानामि राजन्पूजितलक्षणान् । येषां मूत्रमुपाघ्राय वन्ध्या अपि प्रसूयते ॥
ṛṣabhānapi jānāmi rājanpūjitalakṣaṇān | yeṣāṃ mūtramupāghrāya vandhyā api prasūyate
"हे राजन्, मैं शुभ लक्षणों वाले बैलों को भी पहचानता हूँ — ऐसे बैल, जिनका मूत्र सूँघकर बाँझ गौएँ भी गर्भ धारण कर लेती हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (4.13.23)
मत्स्याधिपो हर्षकलेन चेतसा माद्रीसुतं पाण्डवमभ्यभाषत । नैवानुमन्ये तव कर्म कुत्सितं महीं समग्रामभिपातुमर्हसि ॥
matsyādhipo harṣakalena cetasā mādrīsutaṃ pāṇḍavamabhyabhāṣata | naivānumanye tava karma kutsitaṃ mahīṃ samagrāmabhipātumarhasi
मत्स्यराज का हृदय हर्ष से पुलकित हो उठा और उन्होंने माद्रीपुत्र पाण्डव से कहा — "मैं तुम्हारे काम को तुच्छ नहीं मानता; तुम तो सारी पृथ्वी की रक्षा करने योग्य हो।"
विराट उवाच
श्लोक 24 (4.13.24)
अथ त्विदानीं तव रोचते विभो यथेष्टतो गव्यमवेक्ष मामकम् । त्वदर्पणा मे पशवो भवन्तु वै पशून्सपालान्भवते ददाम्यहम् ॥
atha tvidānīṃ tava rocate vibho yatheṣṭato gavyamavekṣa māmakam | tvadarpaṇā me paśavo bhavantu vai paśūnsapālānbhavate dadāmyaham
"परन्तु हे प्रभो, यदि अब तुम्हें यही रुचता है तो मेरे गोधन की देखरेख अपनी इच्छा के अनुसार करो। मेरे पशु तुम्हें सौंपे जाएँ; मैं उनके ग्वालों-सहित सारे पशु तुम्हें देता हूँ।"
श्लोक 25 (4.13.25)
शतं सहस्राणि गवां हि सन्ति वर्णस्यवर्णस्य पृथग्गणानाम् । ददामि तेऽहं वरमीप्सितं च यत्त्वदर्पणा मे पशवो भवन्त्विति ॥
śataṃ sahasrāṇi gavāṃ hi santi varṇasyavarṇasya pṛthaggaṇānām | dadāmi te'haṃ varamīpsitaṃ ca yattvadarpaṇā me paśavo bhavantviti
"मेरे पास एक लाख गौएँ हैं, जो रंग-रंग के अलग-अलग झुण्डों में बँटी हैं। मैं तुम्हें मनचाहा वर देता हूँ — मेरे पशु तुम्हारे अधीन रहें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (4.13.26)
एवं विराटेन समेत्य पाण्डवो लब्ध्वा च गोबल्लवतां यथेष्टतः । अज्ञातचर्यामवसन्महात्मा यथा रविश्चास्तगिरिं प्रविष्टः ॥
evaṃ virāṭena sametya pāṇḍavo labdhvā ca goballavatāṃ yatheṣṭataḥ | ajñātacaryāmavasanmahātmā yathā raviścāstagiriṃ praviṣṭaḥ
इस प्रकार महात्मा पाण्डव सहदेव विराट से मिले और अपनी इच्छा के अनुसार ग्वाले का पद पाकर, अस्ताचल में छिपे सूर्य की भाँति, गुप्त रूप से वहाँ रहने लगे।
श्लोक 27 (4.13.27)
एवं विराटे न्यवसंश्च पाण्डवा यथा प्रतिज्ञाभिरमोघविक्रमाः । अबुद्धचर्यां चरितुं यथातथं समुद्रनेमीमभिशास्तुमुद्यताः ॥
evaṃ virāṭe nyavasaṃśca pāṇḍavā yathā pratijñābhiramoghavikramāḥ | abuddhacaryāṃ carituṃ yathātathaṃ samudranemīmabhiśāstumudyatāḥ
इस प्रकार अमोघ पराक्रम वाले पाण्डव अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार विराट के यहाँ रहने लगे। समुद्र से घिरी पृथ्वी पर शासन करने में समर्थ वे वीर अपना अज्ञातवास ठीक-ठीक निभाने में तत्पर थे।