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विराट पर्व · अध्याय 14

सैरन्ध्री के वेश में द्रौपदी का सुदेष्णा की सेवा में प्रवेश

द्रौपदी अपने केश छिपाकर, एक मैला वस्त्र पहनकर, सैरन्ध्री अर्थात् सेवा चाहने वाली दासी के रूप में नगर में आती हैं। रानी सुदेष्णा महल से उन्हें देखकर बुलवा लेती हैं और उनका रूप देखकर चकित होकर पूछती हैं कि वे कौन हैं। द्रौपदी बताती हैं कि वे मालिनी नाम की सैरन्ध्री हैं, जो पहले सत्यभामा और द्रौपदी की सेवा कर चुकी हैं, और पाँच गन्धर्व पति उनकी रक्षा करते हैं, जो उनका अपमान करने वाले पुरुष को मार डालते हैं। सुदेष्णा को डर है कि राजा विराट उन पर मोहित हो जाएँगे, पर द्रौपदी की शर्तों से आश्वस्त होकर वे उन्हें अन्तःपुर में रख लेती हैं, जहाँ द्रौपदी छिपकर दुःखपूर्वक रहने लगती हैं।

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.14.1)

ततः कृष्णा सुकेशी सा दर्शनीया शुचिस्मिता । वेणीकेशान्समुत्क्षिप्य पीनवृत्तकुचा शुभा । जुगूहे दक्षिणे पार्श्वे मृदूनसितलोचना ॥

tataḥ kṛṣṇā sukeśī sā darśanīyā śucismitā | veṇīkeśānsamutkṣipya pīnavṛttakucā śubhā | jugūhe dakṣiṇe pārśve mṛdūnasitalocanā

तब सुन्दर केशों वाली, दर्शनीय, मधुर मुस्कान वाली, पुष्ट स्तनों वाली कल्याणी कृष्णा ने अपनी वेणी के केश ऊपर समेटे और उन कोमल केशों को अपनी दाहिनी ओर छिपा लिया — वे काले नेत्रों वाली।

श्लोक 2 (4.14.2)

वासश्च परिधायैकं कृष्णा सुमलिनं महत् । कृत्वा वेषं च सैरन्ध्र्याः कृष्णा व्यचरदार्तवत् ॥

vāsaśca paridhāyaikaṃ kṛṣṇā sumalinaṃ mahat | kṛtvā veṣaṃ ca sairandhryāḥ kṛṣṇā vyacaradārtavat

एक ही बड़ा और बहुत मैला वस्त्र पहनकर, सैरन्ध्री अर्थात् सेवा करने वाली दासी का वेश बनाकर, कृष्णा दुखियारी स्त्री की भाँति इधर-उधर घूमने लगीं।

श्लोक 3 (4.14.3)

प्रविष्टा नगरं भीरूः सैरन्ध्रीवेषसंयुता । तां नराः परिधावन्तः स्त्रियश्च समुपाद्रवन् ॥

praviṣṭā nagaraṃ bhīrūḥ sairandhrīveṣasaṃyutā | tāṃ narāḥ paridhāvantaḥ striyaśca samupādravan

सैरन्ध्री के वेश में वह संकोची स्त्री नगर में प्रविष्ट हुईं। पुरुष दौड़-दौड़कर उनके पास आने लगे और स्त्रियाँ भी उन्हें घेरने लगीं।

श्लोक 4 (4.14.4)

अपृच्छंस्ते च तां दृष्ट्वा का त्वं किं च चिकीर्षसि । सा तानुवाच राजेन्द्र सैरन्ध्र्यहमुपागता । कर्म चेच्छामि वै कर्तुं तस्य या मां भरिष्यति ॥

apṛcchaṃste ca tāṃ dṛṣṭvā kā tvaṃ kiṃ ca cikīrṣasi | sā tānuvāca rājendra sairandhryahamupāgatā | karma cecchāmi vai kartuṃ tasya yā māṃ bhariṣyati

उन्हें देखकर लोगों ने पूछा — "तुम कौन हो? क्या करना चाहती हो?" हे राजेन्द्र, उन्होंने उत्तर दिया — "मैं सैरन्ध्री हूँ और यहाँ आई हूँ। जो मेरा भरण-पोषण करे, मैं उसका काम करना चाहती हूँ।"

श्लोक 5 (4.14.5)

तस्या रूपेण वेषेण श्लक्ष्णया च गिरा तथा । न श्रद्दधानास्तां देवीमन्नहेतोरुपस्थिताम् ॥

tasyā rūpeṇa veṣeṇa ślakṣṇayā ca girā tathā | na śraddadhānāstāṃ devīmannahetorupasthitām

उनके रूप, वेश और मधुर वाणी को देखकर लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि यह देवी केवल अन्न के लिए यहाँ आई है।

श्लोक 6 (4.14.6)

विराटस्य तु कैकेयी भार्या परमसंमता । आलोकयन्ती ददृशे प्रासादाद्द्रुपदात्मजाम् ॥

virāṭasya tu kaikeyī bhāryā paramasaṃmatā | ālokayantī dadṛśe prāsādāddrupadātmajām

तभी विराट की परम प्रिय पत्नी, केकयराज की पुत्री ने महल से बाहर देखते हुए द्रुपदकुमारी को देखा।

श्लोक 7 (4.14.7)

सा समीक्ष्य तथारूपामनाथामेकवाससम् । स्त्रीभिश्च पुरुषैश्चापि सर्वतः परिवारिताम् ॥

sā samīkṣya tathārūpāmanāthāmekavāsasam | strībhiśca puruṣaiścāpi sarvataḥ parivāritām

उन्होंने देखा कि वह रूपवती स्त्री अनाथ-सी है, एक ही वस्त्र पहने है, और चारों ओर से स्त्री-पुरुषों से घिरी हुई है।

श्लोक 8 (4.14.8)

विराटभार्या तां देवी कारुण्याज्जातसंभ्रमा । अप्रेषयत्समीपस्थाः स्त्रियो वृद्धाश्च तत्पराः ॥

virāṭabhāryā tāṃ devī kāruṇyājjātasaṃbhramā | apreṣayatsamīpasthāḥ striyo vṛddhāśca tatparāḥ

करुणा से द्रवित होकर विराट की रानी ने तुरन्त अपने पास खड़ी स्त्रियों और अपनी सेवा में तत्पर वृद्धाओं को भेजा।

सुदेष्णोवाच

श्लोक 9 (4.14.9)

अपनीय ततः सर्वा आनयध्वमिहैव ताम् । यदा दृष्टा मया साध्वी कम्पते मे मनस्तदा । तस्माच्छीघ्रमिहानाय्य दर्शयध्वं यदीच्छथ ॥

apanīya tataḥ sarvā ānayadhvamihaiva tām | yadā dṛṣṭā mayā sādhvī kampate me manastadā | tasmācchīghramihānāyya darśayadhvaṃ yadīcchatha

"भीड़ को हटाकर उसे यहीं ले आओ। उस साध्वी को देखते ही मेरा मन काँप उठता है। इसलिए यदि तुम मेरा मन रखना चाहती हो तो उसे शीघ्र यहाँ लाकर मुझे दिखाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (4.14.10)

तास्तथोक्ता उपागम्य द्रौपदीं परिसंगताः । आनीय सर्वथा त्वेनामब्रुवन्मधुराक्षरम् ॥

tāstathoktā upāgamya draupadīṃ parisaṃgatāḥ | ānīya sarvathā tvenāmabruvanmadhurākṣaram

यह आदेश पाकर वे स्त्रियाँ गईं और द्रौपदी को घेरकर खड़ी हो गईं; फिर हर प्रकार से आदरपूर्वक उन्हें साथ लेकर मीठे शब्दों में बोलीं —

स्त्रिय ऊचुः

श्लोक 11 (4.14.11)

भद्रे त्वां द्रष्टुमिच्छन्ती सुदेष्णा हर्म्यभूतले । त्वदर्थं प्रैषयच्चास्मान्द्रष्टुं तां त्वं यदीच्छसि । आयाह्यस्माभिरेवाद्य रक्ष्यमाणा यथेष्टतः ॥

bhadre tvāṃ draṣṭumicchantī sudeṣṇā harmyabhūtale | tvadarthaṃ praiṣayaccāsmāndraṣṭuṃ tāṃ tvaṃ yadīcchasi | āyāhyasmābhirevādya rakṣyamāṇā yatheṣṭataḥ

"हे भद्रे, महल की छत पर बैठी रानी सुदेष्णा तुम्हें देखना चाहती हैं और उन्होंने हमें तुम्हारे लिए भेजा है। यदि तुम उनसे मिलना चाहो तो अभी हमारे साथ चलो; हम तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हारी रक्षा करेंगी।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (4.14.12)

तच्छ्रुत्वा द्रौपदी तासां वचनं वाक्यकोविदा । ईप्सितार्थातिलाभेन हृष्टाऽऽयाता गृहोत्तमम् ॥

tacchrutvā draupadī tāsāṃ vacanaṃ vākyakovidā | īpsitārthātilābhena hṛṣṭā''yātā gṛhottamam

उनकी बात सुनकर वाक्पटु द्रौपदी मनचाही वस्तु के इतनी सहजता से मिल जाने पर प्रसन्न हुईं और उस श्रेष्ठ भवन में आ गईं।

श्लोक 13 (4.14.13)

राजवेश्म ह्युपाक्रम्य यत्राग्र्यमहिषी स्थिता । सुदेष्णामगमत्कृष्णा राजभार्यां यशस्विनीम् ॥

rājaveśma hyupākramya yatrāgryamahiṣī sthitā | sudeṣṇāmagamatkṛṣṇā rājabhāryāṃ yaśasvinīm

जहाँ पटरानी थीं, उस राजभवन में पहुँचकर कृष्णा राजा की यशस्विनी पत्नी सुदेष्णा के पास गईं।

श्लोक 14 (4.14.14)

कृष्णान्केशान्मृदून्दीर्घान्समुद्ग्रथ्यासितेक्षणा । कुञ्चिताग्रांस्तु सूक्ष्माग्रान्दर्शनीयान्निबध्य च । जुगूहे दक्षिणे पार्श्वे मृदूनायतलोचना ॥

kṛṣṇānkeśānmṛdūndīrghānsamudgrathyāsitekṣaṇā | kuñcitāgrāṃstu sūkṣmāgrāndarśanīyānnibadhya ca | jugūhe dakṣiṇe pārśve mṛdūnāyatalocanā

उस श्याम नेत्रों वाली ने अपने लम्बे, कोमल, काले केशों को — जिनके सिरे घुँघराले और महीन थे और जो देखने में सुन्दर थे — गूँथकर बाँधा और विशाल नेत्रों वाली उस नारी ने उन्हें दाहिनी ओर छिपा लिया।

श्लोक 15 (4.14.15)

सा प्रविश्य विराटस्य द्रौपद्यन्तःपुरं शुभा । ह्रीनिषेवान्विता बाला कम्पमाना लतेव सा ॥

sā praviśya virāṭasya draupadyantaḥpuraṃ śubhā | hrīniṣevānvitā bālā kampamānā lateva sā

सुन्दरी द्रौपदी विराट के अन्तःपुर में प्रविष्ट हुईं — लज्जा से भरी वह युवती लता की भाँति काँप रही थी।

श्लोक 16 (4.14.16)

अभिगम्य च सुश्रोणी सर्वलक्षणसंयुता । ददर्शावस्थितां हैमे पीठे रत्नपरिच्छदे ॥

abhigamya ca suśroṇī sarvalakṣaṇasaṃyutā | dadarśāvasthitāṃ haime pīṭhe ratnaparicchade

आगे बढ़कर सब शुभ लक्षणों से युक्त उस सुन्दर नितम्बों वाली नारी ने रानी को रत्नजटित सोने के आसन पर बैठे देखा।

श्लोक 17 (4.14.17)

रक्तसूक्ष्माम्बरधरां मेघे सौदामिनीमिव । नानावर्णविचित्रां च सर्वाभरणभूषिताम् ॥

raktasūkṣmāmbaradharāṃ meghe saudāminīmiva | nānāvarṇavicitrāṃ ca sarvābharaṇabhūṣitām

वे महीन लाल वस्त्र पहने थीं, मानो बादल में बिजली चमक रही हो; अनेक रंगों से सुशोभित थीं और सब आभूषणों से अलंकृत थीं।

श्लोक 18 (4.14.18)

सुभ्रूं सुकेशीं सुश्रोणीं कुब्जवामनमध्यगाम् । बहुपुष्पोपकीर्णायां भूम्यां वेदिमिवाध्वरे ॥

subhrūṃ sukeśīṃ suśroṇīṃ kubjavāmanamadhyagām | bahupuṣpopakīrṇāyāṃ bhūmyāṃ vedimivādhvare

सुन्दर भौंहों, सुन्दर केशों और सुन्दर नितम्बों वाली वे रानी कुबड़ी और बौनी दासियों के बीच ऐसी लगती थीं जैसे बहुत-से फूलों से ढकी भूमि पर यज्ञ की वेदी हो।

श्लोक 19 (4.14.19)

सुदेष्णां राजमहिषीं सर्वालंकारभूषिताम् । श्रीमतीं राजपुत्रीणां शतेन परिवारिताम् ॥

sudeṣṇāṃ rājamahiṣīṃ sarvālaṃkārabhūṣitām | śrīmatīṃ rājaputrīṇāṃ śatena parivāritām

वह पटरानी सुदेष्णा थीं — सब अलंकारों से विभूषित, शोभामयी, और सौ राजकुमारियों से घिरी हुई।

श्लोक 20 (4.14.20)

ताः सर्वा द्रौपदीं दृष्ट्वा सन्तप्ताः परमाङ्गनाः । परितश्चोपतस्थुस्ताः सहसोत्थाय चासनात् ॥

tāḥ sarvā draupadīṃ dṛṣṭvā santaptāḥ paramāṅganāḥ | paritaścopatasthustāḥ sahasotthāya cāsanāt

द्रौपदी को देखकर वे सब श्रेष्ठ स्त्रियाँ व्याकुल हो उठीं और सहसा अपने आसनों से उठकर उनके चारों ओर आ खड़ी हुईं।

श्लोक 21 (4.14.21)

निरीक्षमाणाः सर्वास्ताः शचीं देवीमिवागताम् । गूढगुल्फां वरारोहां कृष्णां ताम्रायतेक्षणाम् । अतिसर्वानवद्याङ्गीं नतगात्रीं सुमध्यमाम् ॥

nirīkṣamāṇāḥ sarvāstāḥ śacīṃ devīmivāgatām | gūḍhagulphāṃ varārohāṃ kṛṣṇāṃ tāmrāyatekṣaṇām | atisarvānavadyāṅgīṃ natagātrīṃ sumadhyamām

वे सब उन्हें ऐसे निहारने लगीं मानो स्वयं शची देवी आ गई हों — उनके टखने मांसल थे, नितम्ब सुन्दर थे, वे श्यामवर्णा थीं, उनके नेत्र लम्बे और ललाई लिए हुए थे, उनका हर अंग निर्दोष था, कमर पतली थी और देह कुछ झुकी हुई थी;

श्लोक 22 (4.14.22)

न ह्रस्वां नातिमहतीं जातां बहुतृणे वने । ऋश्यरोहीमिवानिन्द्यां सुकेशीं मृगलोचनाम् ॥

na hrasvāṃ nātimahatīṃ jātāṃ bahutṛṇe vane | ṛśyarohīmivānindyāṃ sukeśīṃ mṛgalocanām

न नाटी, न बहुत लम्बी; घनी घास वाले वन में जन्मी हिरनी की भाँति निर्दोष, सुन्दर केशों वाली और मृग के-से नेत्रों वाली;

श्लोक 23 (4.14.23)

तां मृगीमिव वित्रस्तां यूथभ्रष्टामिव द्विपाम् । लक्ष्मीमिव विशालाक्षीं विद्यामिव यशस्विनीम् ॥

tāṃ mṛgīmiva vitrastāṃ yūthabhraṣṭāmiva dvipām | lakṣmīmiva viśālākṣīṃ vidyāmiva yaśasvinīm

डरी हुई हिरनी के समान, झुण्ड से बिछुड़ी हथिनी के समान; लक्ष्मी के समान विशाल नेत्रों वाली और विद्या के समान यशस्विनी;

श्लोक 24 (4.14.24)

रोहिणीमिव ताराणां दीप्तामग्निशिखामिव । पार्वतीमिव रुद्राणीं वेलामिव महोदधेः ॥

rohiṇīmiva tārāṇāṃ dīptāmagniśikhāmiva | pārvatīmiva rudrāṇīṃ velāmiva mahodadheḥ

तारों में रोहिणी के समान, अग्नि की लपट के समान दीप्त; रुद्र की पत्नी पार्वती के समान; और महासागर की तटरेखा के समान;

श्लोक 25 (4.14.25)

सुलभामिव नागीनां मृगीणामिव किन्नरीम् । गङ्गामिव विशुद्धाङ्गीं शारदीमिव शर्वरीम् ॥

sulabhāmiva nāgīnāṃ mṛgīṇāmiva kinnarīm | gaṅgāmiva viśuddhāṅgīṃ śāradīmiva śarvarīm

नागकन्याओं में सुलभा के समान, मृगियों में किन्नरी के समान; गंगा के समान निर्मल अंगों वाली और शरद् की रात्रि के समान सुन्दर;

श्लोक 26 (4.14.26)

तामचिन्त्यतमां लोके इलामिव यशस्विनीम् । सावित्रीमिव दुर्धर्षां ब्राह्म्या लक्ष्म्या समन्विताम् ॥

tāmacintyatamāṃ loke ilāmiva yaśasvinīm | sāvitrīmiva durdharṣāṃ brāhmyā lakṣmyā samanvitām

संसार में सबसे अद्भुत, इला के समान यशस्विनी, सावित्री के समान अजेय, और ब्राह्मी शोभा से सम्पन्न;

श्लोक 27 (4.14.27)

सीतामिव सतीं शुद्धामरुन्धतीमिव प्रियाम् । सुदेष्णा पर्यपृच्छत्तां विस्मयोत्फुल्ललोचना ॥

sītāmiva satīṃ śuddhāmarundhatīmiva priyām | sudeṣṇā paryapṛcchattāṃ vismayotphullalocanā

सीता के समान सती और शुद्ध, अरुन्धती के समान प्रिय — ऐसी द्रौपदी से सुदेष्णा ने विस्मय से खिले नेत्रों से पूछा —

सुदेष्णोवाच

श्लोक 28 (4.14.28)

का त्वं सर्वानवद्याङ्गि कुतोसि त्वमिहागता । कस्य वा त्वं विशालाक्षि किं वा ते करवाण्यहम् ॥

kā tvaṃ sarvānavadyāṅgi kutosi tvamihāgatā | kasya vā tvaṃ viśālākṣi kiṃ vā te karavāṇyaham

"हे सर्वांगसुन्दरी, तुम कौन हो? तुम कहाँ से यहाँ आई हो? हे विशाल नेत्रों वाली, तुम किसकी हो? मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?"

श्लोक 29 (4.14.29)

गूढगुल्फा समानोरूस्त्रिगम्भीरा षडुन्नता । स्निग्धा पञ्चसु रक्तेषु हंसगद्गदभाषिणी ॥

gūḍhagulphā samānorūstrigambhīrā ṣaḍunnatā | snigdhā pañcasu rakteṣu haṃsagadgadabhāṣiṇī

"तुम्हारे टखने मांसल हैं, जाँघें सुडौल और बराबर हैं; तुम्हारे तीन अंग गहरे और छह अंग उन्नत हैं; जो पाँच अंग लाल होने चाहिए वे स्निग्ध और लाल हैं; और तुम हंस की-सी मधुर, कोमल वाणी बोलती हो।"

श्लोक 30 (4.14.30)

सुकेशी सुस्वरा श्यामा पीनश्रोणीपयोधरा । अरालपक्ष्मनयना बिम्बोष्ठी तनुमध्यमा ॥

sukeśī susvarā śyāmā pīnaśroṇīpayodharā | arālapakṣmanayanā bimboṣṭhī tanumadhyamā

"तुम्हारे केश सुन्दर हैं, स्वर मधुर है; तुम श्यामवर्णा युवती हो, तुम्हारे नितम्ब और स्तन पुष्ट हैं; तुम्हारी आँखों की पलकें घुमावदार हैं, होंठ बिम्बफल-से लाल हैं और कमर पतली है।"

श्लोक 31 (4.14.31)

कम्बुग्रीवा गूढसिरा पूर्णचन्द्रनिभानना । दानवी किन्नरी वा त्वं गन्धर्वी वनदेवता ॥

kambugrīvā gūḍhasirā pūrṇacandranibhānanā | dānavī kinnarī vā tvaṃ gandharvī vanadevatā

"तुम्हारी गर्दन शंख जैसी है, नसें दिखाई नहीं देतीं, मुख पूर्णचन्द्र के समान है। क्या तुम कोई दानवी हो, किन्नरी हो, गन्धर्वी हो या वनदेवी?"

श्लोक 32 (4.14.32)

अप्सरा वाऽसि नागी वा तारा वा त्वं विलासिनी । अलम्बुसा मिश्रकेशी पुण्डरीकाऽथ मालिनी ॥

apsarā vā'si nāgī vā tārā vā tvaṃ vilāsinī | alambusā miśrakeśī puṇḍarīkā'tha mālinī

"हे विलासिनी, क्या तुम कोई अप्सरा हो, नागकन्या हो या कोई तारा? क्या तुम अलम्बुसा हो, मिश्रकेशी, पुण्डरीका या मालिनी?"

श्लोक 33 (4.14.33)

तेनतेनैव संपन्ना काश्मीरीव तुरंगमा । इन्द्राणी त्वथ रुद्राणी स्वधा वाऽप्यथवा रतिः ॥

tenatenaiva saṃpannā kāśmīrīva turaṃgamā | indrāṇī tvatha rudrāṇī svadhā vā'pyathavā ratiḥ

"कश्मीरी घोड़ी की भाँति तुम इन सब लक्षणों से सम्पन्न हो। क्या तुम इन्द्राणी हो, रुद्राणी हो, स्वधा हो या फिर रति?"

श्लोक 34 (4.14.34)

देवि देवेषु विख्याता ब्रूहि का त्वमिहागता । तव ह्यनुपमं रूपं भूषणैरपि वर्जितम् ॥

devi deveṣu vikhyātā brūhi kā tvamihāgatā | tava hyanupamaṃ rūpaṃ bhūṣaṇairapi varjitam

"हे देवी, तुम अवश्य देवताओं में विख्यात कोई देवी हो। बताओ, तुम कौन हो जो यहाँ आई हो? आभूषणों के बिना भी तुम्हारा रूप अनुपम है।"

श्लोक 35 (4.14.35)

त्वां सृष्ट्वोपरतं मन्ये लोककर्तारमीश्वरम् । न तृप्यन्ति स्त्रियो दृष्ट्वा का न पुंसां रतिर्भवेत् ॥

tvāṃ sṛṣṭvoparataṃ manye lokakartāramīśvaram | na tṛpyanti striyo dṛṣṭvā kā na puṃsāṃ ratirbhavet

"मुझे लगता है कि जगत् के रचयिता ईश्वर तुम्हें रचकर सृष्टि से विरत हो गए। स्त्रियाँ तुम्हें देखकर तृप्त नहीं होतीं, तो पुरुषों का क्या हाल होगा?"

श्लोक 36 (4.14.36)

प्रवालपुष्पस्तबकैराचिता वनदेवताः । त्वामेव हि निरीक्षन्ते विस्मिता रूपसंपदा ॥

pravālapuṣpastabakairācitā vanadevatāḥ | tvāmeva hi nirīkṣante vismitā rūpasaṃpadā

"कोंपलों और फूलों के गुच्छों से सजी वनदेवियाँ भी तुम्हारी रूप-सम्पदा पर विस्मित होकर केवल तुम्हें ही निहारती हैं।"

श्लोक 37 (4.14.37)

अन्तःपुरगता नार्यो मृगाः पक्षिगणा नराः । सर्वे त्वामेव कल्याणि निरीक्षन्ते सुविस्मिताः ॥

antaḥpuragatā nāryo mṛgāḥ pakṣigaṇā narāḥ | sarve tvāmeva kalyāṇi nirīkṣante suvismitāḥ

"हे कल्याणी, अन्तःपुर की स्त्रियाँ, मृग, पक्षियों के झुण्ड और मनुष्य — सब अत्यन्त विस्मित होकर केवल तुम्हें ही देख रहे हैं।"

श्लोक 38 (4.14.38)

न त्वादृशी काचन मे त्रिषु लोकेषु सुन्दरी । दृष्टपूर्वा श्रुता वाऽपि चक्षुषा विद्यते शुभा ॥

na tvādṛśī kācana me triṣu lokeṣu sundarī | dṛṣṭapūrvā śrutā vā'pi cakṣuṣā vidyate śubhā

"तीनों लोकों में तुम्हारे जैसी शुभ सुन्दरी मैंने न कभी अपनी आँखों से देखी, न उसके विषय में सुना।"

द्रौपद्युवाच

श्लोक 39 (4.14.39)

नास्मि देवी न गन्धर्वी न यक्षी न च किन्नरी । सैरन्ध्री नाम मे जातिर्वन्यमूलफलाशना ॥

nāsmi devī na gandharvī na yakṣī na ca kinnarī | sairandhrī nāma me jātirvanyamūlaphalāśanā

"मैं न देवी हूँ, न गन्धर्वी, न यक्षी और न किन्नरी। मेरी जाति सैरन्ध्री है, और मैं वन के कन्द-मूल और फल खाकर रहती आई हूँ।"

श्लोक 40 (4.14.40)

पतीनां प्रेक्षमाणानां कस्मिंश्चित्कारणान्तरे । केशपाशे परामृष्टा साऽहं त्रस्ता वनं गता ॥

patīnāṃ prekṣamāṇānāṃ kasmiṃścitkāraṇāntare | keśapāśe parāmṛṣṭā sā'haṃ trastā vanaṃ gatā

"किसी कारणवश मेरे पतियों के देखते-देखते मेरे केश पकड़े गए; तब मैं भयभीत होकर वन में चली गई।"

श्लोक 41 (4.14.41)

तत्र द्वादशवर्षाणि वन्यमूलफलाशना । चराम्यनिलया सुभ्रूः सा तवान्तिकमागता ॥

tatra dvādaśavarṣāṇi vanyamūlaphalāśanā | carāmyanilayā subhrūḥ sā tavāntikamāgatā

"वहाँ बारह वर्ष तक मैं कन्द-मूल-फल खाकर बिना किसी ठिकाने के भटकती रही; हे सुन्दर भौंहों वाली, अब मैं तुम्हारे पास आई हूँ।"

श्लोक 42 (4.14.42)

जानामि केशान्ग्रथितुं विचित्रान्ग्रथितुं मणीन् । मल्लिकोत्पलपद्मानां जानामि ग्रथितुं स्रजः ॥

jānāmi keśāngrathituṃ vicitrāngrathituṃ maṇīn | mallikotpalapadmānāṃ jānāmi grathituṃ srajaḥ

"मैं केश सँवारना और रंग-बिरंगी मणियाँ गूँथना जानती हूँ; मैं मल्लिका, उत्पल और कमल की मालाएँ गूँथना भी जानती हूँ।"

श्लोक 43 (4.14.43)

सिन्धुवारकजातीनां रचयाम्यवतंसकान् । पत्रं मृगाङ्गमगरुं पिंषे च हरिचन्दनम् । ग्रथयिष्यामि चित्राश्च स्रजः परमशोभनाः ॥

sindhuvārakajātīnāṃ racayāmyavataṃsakān | patraṃ mṛgāṅgamagaruṃ piṃṣe ca haricandanam | grathayiṣyāmi citrāśca srajaḥ paramaśobhanāḥ

"मैं सिन्दुवार और जाती (चमेली) के फूलों से कर्णफूल बनाती हूँ; सुगन्धित पत्ते, कस्तूरी, अगरु और हरिचन्दन पीसती हूँ; और अत्यन्त सुन्दर रंग-बिरंगी मालाएँ गूँथ सकती हूँ।"

श्लोक 44 (4.14.44)

आराधयं सत्यभामां कृष्णस्य महिषीं प्रियाम् । कृष्णां च भार्यां पार्थानां नारीणामुत्तमां तथा ॥

ārādhayaṃ satyabhāmāṃ kṛṣṇasya mahiṣīṃ priyām | kṛṣṇāṃ ca bhāryāṃ pārthānāṃ nārīṇāmuttamāṃ tathā

"मैंने श्रीकृष्ण की प्रिय पटरानी सत्यभामा की सेवा की है, और पृथापुत्रों की पत्नी, स्त्रियों में श्रेष्ठ कृष्णा (द्रौपदी) की भी।"

श्लोक 45 (4.14.45)

तथाऽस्मि सुभ्रुवा चाहमिष्टलाभेन तोषिता । मालिनी चेति मे नाम स्वयं देवी चकार ह । कृष्णा कमलपत्राक्षी सा मे प्राणसमा सखी ॥

tathā'smi subhruvā cāhamiṣṭalābhena toṣitā | mālinī ceti me nāma svayaṃ devī cakāra ha | kṛṣṇā kamalapatrākṣī sā me prāṇasamā sakhī

"इस प्रकार उन सुन्दर भौंहों वाली देवी ने मनचाही वस्तुएँ देकर मुझे सन्तुष्ट रखा। स्वयं महारानी ने मेरा नाम मालिनी रखा। कमलनयनी कृष्णा मेरी प्राणों के समान प्रिय सखी हैं।"

श्लोक 46 (4.14.46)

न चाहं चिरमिच्छामि क्वचिद्वस्तुं शुभानने । व्रतं किलैतदस्माकं कुलधर्मोऽयमीदृशः ॥

na cāhaṃ ciramicchāmi kvacidvastuṃ śubhānane | vrataṃ kilaitadasmākaṃ kuladharmo'yamīdṛśaḥ

"हे सुमुखी, मैं कहीं भी अधिक समय तक नहीं रहना चाहती। कहते हैं, यही हमारा व्रत है और ऐसा ही हमारा कुलधर्म है।"

श्लोक 47 (4.14.47)

योऽस्माकं तु हरेद्द्रव्यं देशं वसनमेव वा । न क्रोद्धव्यं किलास्माभिरस्मद्गुरुरमर्षणः ॥

yo'smākaṃ tu hareddravyaṃ deśaṃ vasanameva vā | na kroddhavyaṃ kilāsmābhirasmadgururamarṣaṇaḥ

"यदि कोई हमारा धन, देश या वस्त्र तक छीन ले, तो भी कहते हैं कि हमें क्रोध नहीं करना चाहिए; क्योंकि हमारे गुरु इसे सहन नहीं करते।"

श्लोक 48 (4.14.48)

साऽहं वनानि दुर्गाणि तीर्थानि च सरांसि च । शैलांश्च विविधान्रम्यान्सरितश्च समुद्रगाः ॥

sā'haṃ vanāni durgāṇi tīrthāni ca sarāṃsi ca | śailāṃśca vividhānramyānsaritaśca samudragāḥ

"इसलिए मैं दुर्गम वनों, तीर्थों और सरोवरों में, अनेक रमणीय पर्वतों पर और समुद्र में मिलने वाली नदियों के तटों पर घूमती रहती हूँ।"

श्लोक 49 (4.14.49)

भर्तृशोकपरीताङ्गी भर्तृसब्रह्मचारिणी । विचरामि महीं दुर्गां यत्र सायंनिवेशना ॥

bhartṛśokaparītāṅgī bhartṛsabrahmacāriṇī | vicarāmi mahīṃ durgāṃ yatra sāyaṃniveśanā

"पतियों के शोक में डूबी, उन्हीं के समान ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई, मैं इस दुर्गम पृथ्वी पर विचरती हूँ, और जहाँ साँझ हो जाए वहीं ठहर जाती हूँ।"

श्लोक 50 (4.14.50)

वीरपत्नी यदा देवी चरमाणेषु भर्तृषु । साऽहं विवत्सा विधिना गन्धमादनपर्वतात् । शृणोमि तव सौशील्यं भर्तुर्मधुरभाषिणि ॥

vīrapatnī yadā devī caramāṇeṣu bhartṛṣu | sā'haṃ vivatsā vidhinā gandhamādanaparvatāt | śṛṇomi tava sauśīlyaṃ bharturmadhurabhāṣiṇi

"जब वीरों की पत्नी महारानी अपने पतियों के साथ वन-वन घूम रही थीं, तब दैववश अपनी सन्तान से बिछुड़ी मैंने गन्धमादन पर्वत पर, हे मधुरभाषिणी, तुम्हारे और तुम्हारे पति के सद्व्यवहार के विषय में सुना।"

श्लोक 51 (4.14.51)

माहात्म्यं च ततः श्रुत्वा ब्राह्मणानां समीपतः । त्वामुपस्थातुमिच्छामि ततश्चाहमिहागता ॥

māhātmyaṃ ca tataḥ śrutvā brāhmaṇānāṃ samīpataḥ | tvāmupasthātumicchāmi tataścāhamihāgatā

"फिर ब्राह्मणों के मुख से तुम्हारी महिमा सुनकर मैं तुम्हारी सेवा करना चाहती थी, इसीलिए मैं यहाँ आई हूँ।"

श्लोक 52 (4.14.52)

गुरवो मम धर्मश्च वायुः शक्रस्तथाऽश्विनौ । तेषां प्रसादाच्च न मां कश्चिद्धर्षयते पुमान् ॥

guravo mama dharmaśca vāyuḥ śakrastathā'śvinau | teṣāṃ prasādācca na māṃ kaściddharṣayate pumān

"धर्म, वायु, इन्द्र और दोनों अश्विनीकुमार मेरे गुरुजन हैं; उनकी कृपा से कोई पुरुष मेरा तिरस्कार नहीं कर सकता।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 53 (4.14.53)

एवमुक्त्वा सुदेष्णां तां कृताञ्जलिपुटा स्थिता । साऽब्रवीद्विस्मयाविष्टा द्रौपदीं योषितां वराम् ॥

evamuktvā sudeṣṇāṃ tāṃ kṛtāñjalipuṭā sthitā | sā'bravīdvismayāviṣṭā draupadīṃ yoṣitāṃ varām

सुदेष्णा से इतना कहकर द्रौपदी हाथ जोड़कर खड़ी हो गईं। तब विस्मय से भरी सुदेष्णा ने स्त्रियों में श्रेष्ठ द्रौपदी से कहा —

सुदेष्णोवाच

श्लोक 54 (4.14.54)

न भरेयमहं भद्रे संशयो मम विद्यते । राजा त्वयं हि त्वां दृष्ट्वा मतिं पापां करिष्यति ॥

na bhareyamahaṃ bhadre saṃśayo mama vidyate | rājā tvayaṃ hi tvāṃ dṛṣṭvā matiṃ pāpāṃ kariṣyati

"हे भद्रे, मैं तुम्हें नहीं रख सकती; मेरे मन में शंका है। क्योंकि यह राजा तुम्हें देखते ही पाप की ओर मन लगा बैठेगा।"

श्लोक 55 (4.14.55)

साऽहं त्वां न क्षमां मन्ये वसन्तीमिह वेश्मनि । एष दोषोस्ति सुश्रोणि कथं वाभीरु मन्यसे ॥

sā'haṃ tvāṃ na kṣamāṃ manye vasantīmiha veśmani | eṣa doṣosti suśroṇi kathaṃ vābhīru manyase

"इसलिए मैं तुम्हारा मेरे घर में रहना उचित नहीं समझती। हे सुन्दरी, यही दोष है; हे भीरु, तुम क्या सोचती हो?"

श्लोक 56 (4.14.56)

स्थिता राजकुले नार्यो याश्चेमा मम वेश्मनि । त्वामेवैकां निरीक्षन्ते विस्मयाद्वरवर्णिनि ॥

sthitā rājakule nāryo yāścemā mama veśmani | tvāmevaikāṃ nirīkṣante vismayādvaravarṇini

"हे सुन्दरी, राजकुल की जो स्त्रियाँ मेरे इस भवन में रहती हैं, वे भी विस्मित होकर केवल तुम्हें ही निहार रही हैं।"

श्लोक 57 (4.14.57)

वृक्षांश्चोपस्थितान्पश्य य इमे मम वेश्मनि । विनमन्ते हि त्वां दृष्ट्वा पुमांसं कं न लोभयेः ॥

vṛkṣāṃścopasthitānpaśya ya ime mama veśmani | vinamante hi tvāṃ dṛṣṭvā pumāṃsaṃ kaṃ na lobhayeḥ

"मेरे भवन में खड़े इन वृक्षों को देखो — तुम्हें देखकर ये भी झुक जाते हैं। फिर तुम किस पुरुष को लुभा न लोगी?"

श्लोक 58 (4.14.58)

बिभर्षि परमं रूपमतिमानुषमद्भुतम् । तिर्यग्योनिगताश्चापि निरीक्षन्ते सविस्मयाः । तव रूपमनिन्द्याङ्गि किं पुनर्मानवा भुवि ॥

bibharṣi paramaṃ rūpamatimānuṣamadbhutam | tiryagyonigatāścāpi nirīkṣante savismayāḥ | tava rūpamanindyāṅgi kiṃ punarmānavā bhuvi

"तुम्हारा रूप परम सुन्दर, अलौकिक और अद्भुत है। हे अनिन्द्य सुन्दरी, पशु-पक्षी तक विस्मित होकर तुम्हारा रूप निहारते हैं, फिर पृथ्वी के मनुष्यों का तो कहना ही क्या!"

श्लोक 59 (4.14.59)

राजा विराटः सुश्रोणि दृष्ट्वा ते परमं वपुः । मां विहाय वरारोहे त्वां गच्छेत्सर्वचेतसा ॥

rājā virāṭaḥ suśroṇi dṛṣṭvā te paramaṃ vapuḥ | māṃ vihāya varārohe tvāṃ gacchetsarvacetasā

"हे सुन्दरी, राजा विराट तुम्हारा यह परम सुन्दर शरीर देखते ही मुझे छोड़कर पूरे मन से तुम्हारी ओर चले जाएँगे।"

श्लोक 60 (4.14.60)

यं हि त्वमनवद्याङ्गी नरमायतलोचने । सुप्रसन्ना हि वीक्षेथाः स कामवशगो भवेत् ॥

yaṃ hi tvamanavadyāṅgī naramāyatalocane | suprasannā hi vīkṣethāḥ sa kāmavaśago bhavet

"हे विशाल नेत्रों वाली अनिन्द्य सुन्दरी, जिस पुरुष को तुम प्रसन्न होकर देख लोगी, वह काम के वश में हो जाएगा।"

श्लोक 61 (4.14.61)

सुस्नाताऽलंकृता हि त्वं यमीक्षेथा हि मानुषम् । ग्लानिर्न तस्य दुःखं वा न तन्द्रिर्न पराजयः ॥

susnātā'laṃkṛtā hi tvaṃ yamīkṣethā hi mānuṣam | glānirna tasya duḥkhaṃ vā na tandrirna parājayaḥ

"स्नान करके और सजकर तुम जिस मनुष्य की ओर देख लो, उसे न थकान होगी, न दुःख, न आलस्य और न पराजय;"

श्लोक 62 (4.14.62)

न शोको न च सन्तापो न क्रोधो नानृतं वदे । यं त्वं सर्वानवद्याङ्गि भजेथाः समलंकृता ॥

na śoko na ca santāpo na krodho nānṛtaṃ vade | yaṃ tvaṃ sarvānavadyāṅgi bhajethāḥ samalaṃkṛtā

"हे सर्वांगसुन्दरी, सज-धजकर तुम जिसकी सेवा करो, उसे न शोक होगा, न सन्ताप, न क्रोध — मैं झूठ नहीं कहती।"

श्लोक 63 (4.14.63)

न व्याधिर्न जरा तस्य न तृष्णा न क्षुधा भवेत् । यस्य त्वं वशगा सुभ्रु भवेरङ्कगता सती ॥

na vyādhirna jarā tasya na tṛṣṇā na kṣudhā bhavet | yasya tvaṃ vaśagā subhru bhaveraṅkagatā satī

"हे सुन्दर भौंहों वाली, जिसके वश में होकर तुम उसकी गोद में रहो, उसे न रोग होगा, न बुढ़ापा, न प्यास और न भूख।"

श्लोक 64 (4.14.64)

पञ्चत्वमपि संप्राप्तं यं च त्वं परिषस्वजेः । बाहुभ्यामनुरूपाभ्यां स जीवेदिति मे मतिः ॥

pañcatvamapi saṃprāptaṃ yaṃ ca tvaṃ pariṣasvajeḥ | bāhubhyāmanurūpābhyāṃ sa jīvediti me matiḥ

"मेरा तो यह विश्वास है कि जो मर भी चुका हो, उसे यदि तुम अपनी सुडौल भुजाओं में भर लो तो वह जी उठेगा।"

श्लोक 65 (4.14.65)

यस्य हि त्वं भवेर्भार्या यं च हृष्टा परिष्वजेः । अतिजीवेत्स सर्वेषु देवेष्विव पुरन्दरः ॥

yasya hi tvaṃ bhaverbhāryā yaṃ ca hṛṣṭā pariṣvajeḥ | atijīvetsa sarveṣu deveṣviva purandaraḥ

"तुम जिसकी पत्नी बनो और जिसे प्रसन्न होकर आलिंगन करो, वह जीवन में सबसे बढ़कर होगा, जैसे देवताओं में इन्द्र।"

श्लोक 66 (4.14.66)

अध्यारोहेद्यथा वृक्षं यथा वाऽऽरुह्य तक्षति । राजवेश्मनि वामोरु ननु स्यास्त्वं तथा मम ॥

adhyārohedyathā vṛkṣaṃ yathā vā''ruhya takṣati | rājaveśmani vāmoru nanu syāstvaṃ tathā mama

"जैसे कोई पेड़ पर चढ़ जाए, या चढ़कर उसी को काटने लगे, हे सुन्दर जाँघों वाली, इस राजभवन में तुम निश्चय ही मेरे लिए वैसी ही सिद्ध होगी।"

श्लोक 67 (4.14.67)

यथा कर्कटकी गर्भमाधत्ते मृत्युमात्मनः । तथाविधमहं मन्ये तव सुभ्रु समागमम् ॥

yathā karkaṭakī garbhamādhatte mṛtyumātmanaḥ | tathāvidhamahaṃ manye tava subhru samāgamam

"जैसे केकड़ी अपनी ही मृत्यु के लिए गर्भ धारण करती है, हे सुन्दर भौंहों वाली, वैसा ही मैं तुम्हारे साथ को समझती हूँ।"

श्लोक 68 (4.14.68)

अनुमानये त्वां सैरन्ध्रि नावमन्ये कथंचन । भर्तृशीलभयाद्भद्रे तव वासं न रोचये ॥

anumānaye tvāṃ sairandhri nāvamanye kathaṃcana | bhartṛśīlabhayādbhadre tava vāsaṃ na rocaye

"हे सैरन्ध्री, मैं तुम्हारा आदर करती हूँ, किसी भी प्रकार तुम्हारा अपमान नहीं करती; पर हे भद्रे, अपने पति के स्वभाव से डरकर मैं तुम्हारा यहाँ रहना नहीं चाहती।"

सैरन्ध्र्युवाच

श्लोक 69 (4.14.69)

नाहं शक्या विराटेन यद्वा चान्येन केनचित् । देवगन्धर्वयक्षैर्वा द्रष्टुं दुष्टेन चेतसा ॥

nāhaṃ śakyā virāṭena yadvā cānyena kenacit | devagandharvayakṣairvā draṣṭuṃ duṣṭena cetasā

"न विराट, न कोई और — न देवता, न गन्धर्व, न यक्ष — मुझे दुष्ट मन से देख सकता है।"

श्लोक 70 (4.14.70)

गन्धर्वाः पालयन्ते मां सुकुलाः पञ्च सुव्रताः । पुत्रा देवादिदेवानां सूर्यपावकवर्चसः ॥

gandharvāḥ pālayante māṃ sukulāḥ pañca suvratāḥ | putrā devādidevānāṃ sūryapāvakavarcasaḥ

"उत्तम कुल के और व्रतों का पालन करने वाले पाँच गन्धर्व मेरी रक्षा करते हैं — वे श्रेष्ठ देवताओं के पुत्र हैं और सूर्य तथा अग्नि के समान तेजस्वी हैं।"

श्लोक 71 (4.14.71)

यश्च दुःशीलवान्मर्त्यो मां स्पृशेद्दुष्टचेतसा । स तामेव निशां शीघ्रं शयीत मुसलैर्हतः ॥

yaśca duḥśīlavānmartyo māṃ spṛśedduṣṭacetasā | sa tāmeva niśāṃ śīghraṃ śayīta musalairhataḥ

"जो दुष्ट स्वभाव वाला मनुष्य बुरी नीयत से मुझे छुए, वह उसी रात मूसलों की मार से मरकर धरती पर पड़ा होगा।"

श्लोक 72 (4.14.72)

यस्यापि हि शतं पूर्णं बान्धवानां भवेदपि । सहस्रं वा विशालाक्षि कोटिर्वापि सहस्रिका । दुष्टचित्तश्च मां ब्रूयान्न स जीवेत्तवाग्रतः ॥

yasyāpi hi śataṃ pūrṇaṃ bāndhavānāṃ bhavedapi | sahasraṃ vā viśālākṣi koṭirvāpi sahasrikā | duṣṭacittaśca māṃ brūyānna sa jīvettavāgrataḥ

"हे विशाल नेत्रों वाली, चाहे उसके सौ बन्धु-बान्धव हों, या हज़ार, या हज़ार करोड़ — जो दुष्ट मन से मुझसे बात करे, वह तुम्हारी आँखों के सामने जीवित नहीं बचेगा।"

श्लोक 73 (4.14.73)

न तस्य त्रिदशा देवा नासुरा न च पन्नगाः । तेभ्यो गन्धर्वराजेभ्यस्त्राणं कुर्युरसंशयम् ॥

na tasya tridaśā devā nāsurā na ca pannagāḥ | tebhyo gandharvarājebhyastrāṇaṃ kuryurasaṃśayam

"उन गन्धर्वराजों से उसे न तैंतीस देवता बचा सकेंगे, न असुर और न नाग — इसमें कोई सन्देह नहीं।"

श्लोक 74 (4.14.74)

सुदेष्णे विश्वस त्वं मां स्वजने बान्धवेऽपि वा । नाहं शक्या नरैर्द्रष्टुं न च मे वृत्तमीदृशम् ॥

sudeṣṇe viśvasa tvaṃ māṃ svajane bāndhave'pi vā | nāhaṃ śakyā narairdraṣṭuṃ na ca me vṛttamīdṛśam

"हे सुदेष्णे, मुझ पर अपने स्वजनों और बन्धुओं की भाँति विश्वास करो। पुरुष मुझे उस दृष्टि से नहीं देख सकते, और मेरा आचरण भी वैसा नहीं है।"

श्लोक 75 (4.14.75)

यो मे न दद्यादुच्छिष्टं न च पादौ प्रधावयेत् । प्रीयेरंस्तेन वासेन गन्धर्वाः पतयो मम ॥

yo me na dadyāducchiṣṭaṃ na ca pādau pradhāvayet | prīyeraṃstena vāsena gandharvāḥ patayo mama

"जहाँ कोई मुझे जूठा न दे और न मुझसे पैर धुलवाए, वहाँ मेरे रहने से मेरे गन्धर्व पति प्रसन्न होंगे।"

श्लोक 76 (4.14.76)

यो हि मां पुरुषो गृद्ध्येद्यथाऽन्याः प्राकृतस्त्रियः । तामेव स इमां रात्रिं प्रविशेदपरां तनुम् ॥

yo hi māṃ puruṣo gṛddhyedyathā'nyāḥ prākṛtastriyaḥ | tāmeva sa imāṃ rātriṃ praviśedaparāṃ tanum

"जो पुरुष मुझ पर दूसरी साधारण स्त्रियों की भाँति लालच की दृष्टि डाले, वह उसी रात दूसरे शरीर में चला जाएगा।"

श्लोक 77 (4.14.77)

न चाप्यहं चालयितुं शक्या केनचिदङ्गने । दुःखशीलाश्च गन्धर्वास्त इमे बलिनः प्रियाः । एवं निवसमानायां मयि मा ते भयं हि भूत् ॥

na cāpyahaṃ cālayituṃ śakyā kenacidaṅgane | duḥkhaśīlāśca gandharvāsta ime balinaḥ priyāḥ | evaṃ nivasamānāyāṃ mayi mā te bhayaṃ hi bhūt

"हे देवी, मुझे कोई डिगा नहीं सकता। वे गन्धर्व, मेरे प्रियजन, बड़े बलवान् और कठोर स्वभाव के हैं। इस प्रकार मेरे यहाँ रहने पर तुम्हें कोई भय नहीं होना चाहिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 78 (4.14.78)

एवमुक्ता तु सैरन्ध्र्या सुदेष्णा वाक्यमब्रवीत् । वसेह मयि कल्याणि यदि ते वृत्तमीदृशम् ॥

evamuktā tu sairandhryā sudeṣṇā vākyamabravīt | vaseha mayi kalyāṇi yadi te vṛttamīdṛśam

सैरन्ध्री के ऐसा कहने पर सुदेष्णा बोलीं — "हे कल्याणी, यदि तुम्हारा आचरण ऐसा है तो मेरे यहाँ रहो।"

सुदेष्णोवाच

श्लोक 79 (4.14.79)

कश्च ते दातुमुच्छिष्टं पुमानर्हति भामिनि । प्रसारयेच्च कः पादौ लक्ष्मीं दृष्ट्वैव बुद्धिमान् ॥

kaśca te dātumucchiṣṭaṃ pumānarhati bhāmini | prasārayecca kaḥ pādau lakṣmīṃ dṛṣṭvaiva buddhimān

"हे भामिनी, कौन पुरुष तुम्हें जूठा देने का साहस करेगा? और कौन बुद्धिमान् साक्षात् लक्ष्मी को देखकर उनके आगे अपने पैर फैलाएगा?"

श्लोक 80 (4.14.80)

एवमाचारसंपन्ना एवं देवपरायणा । रक्ष्या त्वमसि भूतानां सावित्रीवद्विजन्मनाम् ॥

evamācārasaṃpannā evaṃ devaparāyaṇā | rakṣyā tvamasi bhūtānāṃ sāvitrīvadvijanmanām

"ऐसे सदाचार से सम्पन्न और देवताओं में ऐसी निष्ठा रखने वाली तुम, जैसे द्विजों के लिए सावित्री रक्षणीय है, वैसे ही सब प्राणियों के लिए रक्षणीय हो।"

श्लोक 81 (4.14.81)

देवता इव कल्याणि पूजिता वरवर्णिनी । वस भद्रे मयि प्रीता प्रीतिर्हि मयि वर्तते । सर्वकामैः प्रमुदिता निरुद्विग्नमनाः सुखम् ॥

devatā iva kalyāṇi pūjitā varavarṇinī | vasa bhadre mayi prītā prītirhi mayi vartate | sarvakāmaiḥ pramuditā nirudvignamanāḥ sukham

"हे कल्याणी, हे सुन्दरी, देवता की भाँति पूजित होकर तुम प्रसन्नतापूर्वक मेरे पास रहो, क्योंकि मुझे तुमसे स्नेह है। सब कामनाओं से तृप्त होकर, निश्चिन्त मन से सुखपूर्वक रहो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 82 (4.14.82)

सुदेष्णयैवमुक्ता सा संप्रीता चारुहासिनी । निर्विशङ्का विराटस्य विवेशान्तःपुरं सुखम् ॥

sudeṣṇayaivamuktā sā saṃprītā cāruhāsinī | nirviśaṅkā virāṭasya viveśāntaḥpuraṃ sukham

सुदेष्णा के ऐसा कहने पर मधुर मुस्कान वाली द्रौपदी प्रसन्न और निःशंक होकर सुखपूर्वक विराट के अन्तःपुर में चली गईं।

श्लोक 83 (4.14.83)

याज्ञसेनी सुदेष्णां तु शुश्रूषन्ती विशांपते । अवसत्परिचारार्हा सुदुःखं जनमेजय ॥

yājñasenī sudeṣṇāṃ tu śuśrūṣantī viśāṃpate | avasatparicārārhā suduḥkhaṃ janamejaya

हे प्रजापालक जनमेजय, जो स्वयं सेवा पाने योग्य थीं, वह याज्ञसेनी सुदेष्णा की सेवा करती हुई वहाँ बड़े दुःख से रहने लगीं।

श्लोक 84 (4.14.84)

एवं विराटे न्यवसंस्तु पाण्डवाः कृष्णा तथाऽन्तःपुरमेत्य शोभना । अज्ञातचर्यां प्रतिरुद्धमानसा यथाऽग्नयो भस्मनि गूढतेजसः ॥

evaṃ virāṭe nyavasaṃstu pāṇḍavāḥ kṛṣṇā tathā'ntaḥpurametya śobhanā | ajñātacaryāṃ pratiruddhamānasā yathā'gnayo bhasmani gūḍhatejasaḥ

इस प्रकार पाण्डव विराट के यहाँ रहने लगे, और सुन्दरी कृष्णा भी अन्तःपुर में जाकर रहने लगीं। वे सब अपने मन को वश में रखकर अज्ञातवास बिता रहे थे — राख में ढकी आग की भाँति, जिसका तेज भीतर छिपा रहता है।

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