Skip to main content

विराट पर्व · अध्याय 15

भीम द्वारा मल्ल जीमूत का वध

जनमेजय पूछते हैं कि विराटनगर में पाण्डव कैसे रहे। वैशम्पायन बताते हैं कि कैसे प्रत्येक पाण्डव छद्मवेष में राजा की सेवा करता और अपनी कमाई दूसरों में बाँटता था, और द्रौपदी सबकी देखभाल करती थी। चौथे महीने में शंकर के महोत्सव पर एक विशालकाय मल्ल विराट के सब मल्लों को भयभीत कर देता है; कंक बने युधिष्ठिर रसोइये बल्लव का नाम सुझाते हैं, और राजा के कहने पर भीम उस मल्ल जीमूत से कुश्ती लड़कर उसे मार डालते हैं। भीम को भरपूर पुरस्कार मिलता है और बाद में उन्हें वन्य पशुओं से लड़वाया जाता है; अर्जुन, नकुल और सहदेव भी राजा को प्रसन्न करते हैं, और सबको कष्ट उठाते देख द्रौपदी दुःखी रहती है।

अध्याय 14अध्याय-सूचीअध्याय 16

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (4.15.1)

एवं विराटनगरे वसन्तः सत्यविक्रमाः । अत ऊर्ध्वं नरव्याघ्राः किमकुर्वत पाण्डवाः ॥

evaṃ virāṭanagare vasantaḥ satyavikramāḥ | ata ūrdhvaṃ naravyāghrāḥ kimakurvata pāṇḍavāḥ

इस प्रकार विराटनगर में रहते हुए उन सत्यपराक्रमी, नरश्रेष्ठ पाण्डवों ने उसके बाद क्या किया?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (4.15.2)

एवं ते न्यवसंस्तत्र प्रच्छन्नाः कुरुनन्दनाः । आराधयन्तो राजानं यदकुर्वत तच्छृणु ॥

evaṃ te nyavasaṃstatra pracchannāḥ kurunandanāḥ | ārādhayanto rājānaṃ yadakurvata tacchṛṇu

इस प्रकार कुरुकुल को आनन्द देने वाले पाण्डव राजा की सेवा करते हुए वहाँ छिपकर रहे। उन्होंने जो किया, वह सुनो।

श्लोक 3 (4.15.3)

युधिष्ठिरः सभास्तारः सभ्यानामभवत्प्रियः । तथैव च विराटस्य सपुत्रस्य विशांपते ॥

yudhiṣṭhiraḥ sabhāstāraḥ sabhyānāmabhavatpriyaḥ | tathaiva ca virāṭasya saputrasya viśāṃpate

हे प्रजानाथ, युधिष्ठिर सभा के साथी के रूप में सभासदों के प्रिय हो गए, और उसी प्रकार पुत्रों सहित विराट के भी।

श्लोक 4 (4.15.4)

स ह्यक्षहृदयज्ञस्तान्क्रीडयामास पाण्डवः । अक्षबद्धान्यथाकामं सूत्रबद्धानिव द्विजान् ॥

sa hyakṣahṛdayajñastānkrīḍayāmāsa pāṇḍavaḥ | akṣabaddhānyathākāmaṃ sūtrabaddhāniva dvijān

वे पाण्डुपुत्र पासों का रहस्य जानते थे, इसलिए उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार ऐसे खिलाते थे मानो वे डोरी से बँधे पक्षियों की तरह पासों से बँधे हों।

श्लोक 5 (4.15.5)

अज्ञातं च विराटस्य विजित्य वसु धर्मराट् । भ्रातृभ्यः पुरुषव्याघ्रो यथेष्टं संप्रयच्छति ॥

ajñātaṃ ca virāṭasya vijitya vasu dharmarāṭ | bhrātṛbhyaḥ puruṣavyāghro yatheṣṭaṃ saṃprayacchati

वे नरश्रेष्ठ धर्मराज विराट से, उनके अनजाने में, धन जीतकर अपने भाइयों को उनकी इच्छा के अनुसार दे देते थे।

श्लोक 6 (4.15.6)

भीमसेनोपि मांसानि भक्ष्याणि विविधानि च । अतिसृष्टानि मत्स्येन विक्रीणन्निव भ्रातृषु ॥

bhīmasenopi māṃsāni bhakṣyāṇi vividhāni ca | atisṛṣṭāni matsyena vikrīṇanniva bhrātṛṣu

भीमसेन भी मत्स्यराज से मिले मांस और तरह-तरह के खाद्य पदार्थ अपने भाइयों को ऐसे दे देते थे मानो बेच रहे हों।

श्लोक 7 (4.15.7)

वासांसि परिजीर्णानि लब्धान्यन्तःपुरेऽर्जुनः । विक्रीणन्निव सर्वेभ्यः पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ॥

vāsāṃsi parijīrṇāni labdhānyantaḥpure'rjunaḥ | vikrīṇanniva sarvebhyaḥ pāṇḍavebhyaḥ prayacchati

अर्जुन अन्तःपुर में मिले पुराने वस्त्र सब पाण्डवों को ऐसे दे देते थे मानो बेच रहे हों।

श्लोक 8 (4.15.8)

नकुलोपि धनं लब्ध्वा कृते कर्मणि वाजिनाम् । तुष्टे तस्मिन्नरपतौ पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ॥

nakulopi dhanaṃ labdhvā kṛte karmaṇi vājinām | tuṣṭe tasminnarapatau pāṇḍavebhyaḥ prayacchati

नकुल भी घोड़ों का काम करने पर प्रसन्न राजा से जो धन पाते, वह पाण्डवों को दे देते थे।

श्लोक 9 (4.15.9)

सहदेवोपि गोपानां वेषमास्थाय पाण्डवः । दधि क्षीरं घृतं चैव पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ॥

sahadevopi gopānāṃ veṣamāsthāya pāṇḍavaḥ | dadhi kṣīraṃ ghṛtaṃ caiva pāṇḍavebhyaḥ prayacchati

ग्वाले का वेष धारण किए पाण्डुपुत्र सहदेव भी पाण्डवों को दही, दूध और घी देते थे।

श्लोक 10 (4.15.10)

कृष्णा तु सर्वान्भ्रातॄंस्तान्निरीक्षन्ती तपस्विनी । यथा पुनरविज्ञाता तथा चरति भामिनी ॥

kṛṣṇā tu sarvānbhrātṝṃstānnirīkṣantī tapasvinī | yathā punaravijñātā tathā carati bhāminī

तपस्विनी कृष्णा भी उन सब भाइयों का ध्यान रखती हुई ऐसे रहती थी कि कोई उसे पहचान न पाए।

श्लोक 11 (4.15.11)

एवं संभावयन्तस्ते तदाऽन्योन्यं महारथाः । विराटनगरे चेरुः पुनर्गर्भधृता इव ॥

evaṃ saṃbhāvayantaste tadā'nyonyaṃ mahārathāḥ | virāṭanagare ceruḥ punargarbhadhṛtā iva

इस प्रकार एक-दूसरे की देखभाल करते हुए वे महारथी विराटनगर में ऐसे विचरते रहे मानो फिर से गर्भ में हों।

श्लोक 12 (4.15.12)

साशङ्का धार्तराष्ट्रस्य भयात्पाण्डुसुतास्तदा । प्रेक्षमाणास्तदा कृष्णामूषुश्छन्ना नराधिप ॥

sāśaṅkā dhārtarāṣṭrasya bhayātpāṇḍusutāstadā | prekṣamāṇāstadā kṛṣṇāmūṣuśchannā narādhipa

हे राजन्, धृतराष्ट्रपुत्र के भय से सशंकित पाण्डुपुत्र कृष्णा की देखभाल करते हुए वहाँ छिपकर रहे।

श्लोक 13 (4.15.13)

अथ मासे चतुर्थे तु शङ्करस्य महोत्सवः । आसीत्समृद्धो मत्स्येषु पुरुषाणां सुसंमतः ॥

atha māse caturthe tu śaṅkarasya mahotsavaḥ | āsītsamṛddho matsyeṣu puruṣāṇāṃ susaṃmataḥ

फिर चौथे महीने में मत्स्य देश में शंकर का महोत्सव आया, जो बड़े वैभव से मनाया जाता था और लोगों में बहुत सम्मानित था।

श्लोक 14 (4.15.14)

तत्र मल्लाः समापेतुर्दिग्भ्यो राजन्सहस्रशः ॥

tatra mallāḥ samāpeturdigbhyo rājansahasraśaḥ

हे राजन्, वहाँ सब दिशाओं से हज़ारों मल्ल आ जुटे।

श्लोक 15 (4.15.15)

महाकाया महावीर्याः कालकेया इवासुराः । वीर्योन्मत्ता बलोदग्रा राज्ञा समभिपूजिताः ॥

mahākāyā mahāvīryāḥ kālakeyā ivāsurāḥ | vīryonmattā balodagrā rājñā samabhipūjitāḥ

वे विशालकाय और महाबली थे, कालकेय असुरों के समान; अपने पराक्रम से मतवाले और बल में बढ़े-चढ़े उन मल्लों का राजा ने सत्कार किया।

श्लोक 16 (4.15.16)

सिंहस्कन्धकटिग्रीवाः स्ववदाता मनस्विनः । असकृल्लब्धलक्षास्ते रङ्गे पार्थिवसन्निधौ ॥

siṃhaskandhakaṭigrīvāḥ svavadātā manasvinaḥ | asakṛllabdhalakṣāste raṅge pārthivasannidhau

सिंह जैसे कंधे, कमर और गर्दन वाले, निर्मल और मनस्वी वे मल्ल राजाओं के सामने अखाड़े में बार-बार विजय पा चुके थे।

श्लोक 17 (4.15.17)

तेषामेको महानासीत्सर्वमल्लानथाह्वयत् । व्यावल्गमानो ददृशे गर्जितोद्गतिभिः स्थितः ॥

teṣāmeko mahānāsītsarvamallānathāhvayat | vyāvalgamāno dadṛśe garjitodgatibhiḥ sthitaḥ

उनमें एक महान मल्ल था जिसने सब मल्लों को ललकारा। वह वहाँ उछलता-कूदता, गरजता और छलाँगें भरता दिखाई दिया।

श्लोक 18 (4.15.18)

वित्रस्तमनसः सर्वे मल्लास्ते हतचेतसः । अवाङ्मुखाश्च भीताश्च मल्लाश्चान्ये विचेतसः ॥

vitrastamanasaḥ sarve mallāste hatacetasaḥ | avāṅmukhāśca bhītāśca mallāścānye vicetasaḥ

सब मल्ल भयभीत होकर सुध-बुध खो बैठे; कुछ डर से सिर झुकाए रहे और कुछ अचेत-से हो गए।

श्लोक 19 (4.15.19)

व्यसुत्वमपरे चैव वाञ्छन्ति प्रतिविह्वलाः । गां प्रवेष्टुमथेच्छन्ति खं गन्तुमिव चोत्थिताः ॥

vyasutvamapare caiva vāñchanti prativihvalāḥ | gāṃ praveṣṭumathecchanti khaṃ gantumiva cotthitāḥ

कुछ अत्यन्त व्याकुल होकर मानो मृत्यु चाहने लगे; वे धरती में समा जाना चाहते थे, या आकाश में उड़ जाने को उठे-से लगते थे।

श्लोक 20 (4.15.20)

त्रस्ताः शान्ता विषण्णाङ्गा निःशब्दं विह्वलेक्षणाः । विराटराजमल्लास्ते भग्नदर्पा हतप्रभाः ॥

trastāḥ śāntā viṣaṇṇāṅgā niḥśabdaṃ vihvalekṣaṇāḥ | virāṭarājamallāste bhagnadarpā hataprabhāḥ

डरे हुए, सहमे, शिथिल अंगों वाले, चुपचाप और व्याकुल दृष्टि वाले राजा विराट के मल्लों का घमण्ड टूट गया और उनकी कान्ति जाती रही।

श्लोक 21 (4.15.21)

मल्लेन्द्रनिहताः सर्वे न किंचित्प्रवदन्ति ते । मल्ल उद्वीक्ष्य तान्मल्लांस्त्रस्तान्वाक्यमुवाच ह ॥

mallendranihatāḥ sarve na kiṃcitpravadanti te | malla udvīkṣya tānmallāṃstrastānvākyamuvāca ha

उस मल्लराज से दबे हुए वे सब कुछ भी न बोले। तब उस मल्ल ने उन भयभीत मल्लों को देखकर यह बात कही —

जीमूत उवाच

श्लोक 22 (4.15.22)

आगतं मल्लराजं मां कृत्स्ने पृथिविमण्डले । सिंहव्याघ्रगणैः सार्धं क्रीडन्तं विद्धि भूपते ॥

āgataṃ mallarājaṃ māṃ kṛtsne pṛthivimaṇḍale | siṃhavyāghragaṇaiḥ sārdhaṃ krīḍantaṃ viddhi bhūpate

हे भूपते, जान लो कि मैं, मल्लों का राजा, आया हूँ — मैं जो सारी पृथ्वी पर सिंहों और बाघों के झुंडों के साथ खेलता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (4.15.23)

मल्लेन्द्रस्य वचः श्रुत्वा बलदर्पसमन्वितम् । विराटो वीक्ष्य तान्मल्लांस्त्रस्तान्वाक्यमुवाच ह ॥

mallendrasya vacaḥ śrutvā baladarpasamanvitam | virāṭo vīkṣya tānmallāṃstrastānvākyamuvāca ha

मल्लराज के बल के घमण्ड से भरे वचन सुनकर विराट ने अपने भयभीत मल्लों की ओर देखकर कहा —

विराट उवाच

श्लोक 24 (4.15.24)

अनेन सह मल्लेन को योद्धुं शक्तिमान्नरः ॥

anena saha mallena ko yoddhuṃ śaktimānnaraḥ

इस मल्ल से लड़ने में यहाँ कौन-सा पुरुष समर्थ है?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (4.15.25)

इत्युक्तास्ते विराटेन सर्वे मल्ला विशांपते । तूष्णीमासंस्ततो राजा क्रोधाविष्ट उवाच ह ॥

ityuktāste virāṭena sarve mallā viśāṃpate | tūṣṇīmāsaṃstato rājā krodhāviṣṭa uvāca ha

हे प्रजानाथ, विराट के ऐसा कहने पर सब मल्ल चुप रहे। तब क्रोध में भरकर राजा बोले —

विराट उवाच

श्लोक 26 (4.15.26)

ग्रामांश्च वेतनान्येषां मल्लानां हारयाम्यहम् ॥

grāmāṃśca vetanānyeṣāṃ mallānāṃ hārayāmyaham

मैं इन मल्लों के गाँव और वेतन छिनवा लूँगा!

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (4.15.27)

ततो युधिष्ठिरोऽवादीच्छ्रुत्वा मात्स्यपतेर्वचः ॥

tato yudhiṣṭhiro'vādīcchrutvā mātsyapatervacaḥ

तब मत्स्यराज के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 28 (4.15.28)

अस्ति मल्लो महाराज मया दृष्टो युधिष्ठिरे । अनेन सह मल्लेन योद्धुं शक्नोति भूपते ॥

asti mallo mahārāja mayā dṛṣṭo yudhiṣṭhire | anena saha mallena yoddhuṃ śaknoti bhūpate

महाराज, एक मल्ल है जिसे मैंने युधिष्ठिर के यहाँ देखा था। हे भूपते, वह इस मल्ल से लड़ सकता है।

श्लोक 29 (4.15.29)

योसौ मल्लो मया दृष्टः पूर्वं यौधिष्ठिरे पुरे । सोयं मल्लो वसत्येष राजंस्तव महानसे ॥

yosau mallo mayā dṛṣṭaḥ pūrvaṃ yaudhiṣṭhire pure | soyaṃ mallo vasatyeṣa rājaṃstava mahānase

हे राजन्, जिस मल्ल को मैंने पहले युधिष्ठिर के नगर में देखा था, वही मल्ल अब आपकी पाकशाला में रहता है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 30 (4.15.30)

युधिष्ठिरवचः श्रुत्वा व्यक्तमाहेति पार्थिवः । सोप्यथाहूयतां क्षिप्रं योद्धुं मल्लेन संप्रति ॥

yudhiṣṭhiravacaḥ śrutvā vyaktamāheti pārthivaḥ | sopyathāhūyatāṃ kṣipraṃ yoddhuṃ mallena saṃprati

युधिष्ठिर की बात सुनकर राजा ने कहा, "इसने साफ़ बात कही है। उसे तुरन्त बुलाया जाए, ताकि वह अभी इस मल्ल से लड़े।"

श्लोक 31 (4.15.31)

भीमसेनो विराटेन आहूतश्चोदितस्तथा । योद्धुं ततोऽब्रवीद्वाक्यं योद्धुं शक्नोमि भूपते ॥

bhīmaseno virāṭena āhūtaścoditastathā | yoddhuṃ tato'bravīdvākyaṃ yoddhuṃ śaknomi bhūpate

विराट के बुलाने और लड़ने को प्रेरित करने पर भीमसेन ने कहा — "हे भूपते, मैं लड़ सकता हूँ।"

भीमसेन उवाच

श्लोक 32 (4.15.32)

नरेन्द्र ते प्रभावेन श्रिया शक्त्या च शासनात् । अनेन सह मल्लेन योद्धुं राजेन्द्र शक्नुयाम् ॥

narendra te prabhāvena śriyā śaktyā ca śāsanāt | anena saha mallena yoddhuṃ rājendra śaknuyām

हे नरेन्द्र, आपके प्रभाव, श्री, शक्ति और आज्ञा के बल से, हे राजेन्द्र, मैं इस मल्ल से लड़ सकता हूँ।

श्लोक 33 (4.15.33)

युधिष्ठिरकृतं ज्ञात्वा श्रिया तव विशांपते । महादेवस्य भक्त्या च तं मल्लं पातयाम्यहम् ॥

yudhiṣṭhirakṛtaṃ jñātvā śriyā tava viśāṃpate | mahādevasya bhaktyā ca taṃ mallaṃ pātayāmyaham

युधिष्ठिर ने जो किया है, उसका ध्यान रखकर, हे प्रजानाथ, आपकी श्री से और महादेव की भक्ति से मैं उस मल्ल को पछाड़ दूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 34 (4.15.34)

चोदितो भीमसेनस्तु मल्लमाहूय मण्डले । योद्धुं व्यवस्थितो वीरो रेणुं संमृज्य हस्तयोः । मत्तो गज इवान्यं तु योद्धुं समुपचक्रमे ॥

codito bhīmasenastu mallamāhūya maṇḍale | yoddhuṃ vyavasthito vīro reṇuṃ saṃmṛjya hastayoḥ | matto gaja ivānyaṃ tu yoddhuṃ samupacakrame

इस प्रकार प्रेरित होकर वीर भीमसेन ने मल्ल को अखाड़े में ललकारा और हाथों पर धूल मलकर लड़ने को डट गए। जैसे मतवाला हाथी दूसरे हाथी पर टूट पड़ता है, वैसे ही वे युद्ध करने लगे।

श्लोक 35 (4.15.35)

अथ सूदेन तं मल्लं योधयामास मत्स्यराट् ॥

atha sūdena taṃ mallaṃ yodhayāmāsa matsyarāṭ

तब मत्स्यराज ने उस रसोइये को उस मल्ल से लड़वाया।

श्लोक 36 (4.15.36)

नोद्यमानस्तदा भीमो दुःखेनेवाकरोन्मतिम् । न हि शक्नोम्यशक्तोपि प्रत्याख्यातुं नराधिपं ॥

nodyamānastadā bhīmo duḥkhenevākaronmatim | na hi śaknomyaśaktopi pratyākhyātuṃ narādhipaṃ

इस प्रकार प्रेरित किए जाने पर भीम ने मानो दुःख के साथ निश्चय किया — "असमर्थ होकर भी मैं राजा को मना नहीं कर सकता।"

श्लोक 37 (4.15.37)

ततः स पुरुषव्याघ्रः शार्दूलशिथिलं चरन् । प्रविवेश महारङ्गं विराटमभिहर्षयन् ॥

tataḥ sa puruṣavyāghraḥ śārdūlaśithilaṃ caran | praviveśa mahāraṅgaṃ virāṭamabhiharṣayan

तब वह नरश्रेष्ठ बाघ की-सी ढीली, सहज चाल से चलता हुआ विराट को प्रसन्न करते हुए विशाल अखाड़े में उतरा।

श्लोक 38 (4.15.38)

बबन्ध कक्षां कौन्तेयस्ततः संहर्षयञ्जनम् । ततस्तु वृत्रसङ्काशं भीमो मल्लं समाह्वयत् ॥

babandha kakṣāṃ kaunteyastataḥ saṃharṣayañjanam | tatastu vṛtrasaṅkāśaṃ bhīmo mallaṃ samāhvayat

कुन्तीपुत्र ने कमर कसी, जिससे लोग हर्षित हो उठे; फिर भीम ने वृत्रासुर-जैसे उस मल्ल को ललकारा।

श्लोक 39 (4.15.39)

जीमूतं नाम तं तत्र मल्लप्रख्यातविक्रमम् । कक्षे मल्लं गृहीत्वाऽथ ननाद बहु सिंहवत् ॥

jīmūtaṃ nāma taṃ tatra mallaprakhyātavikramam | kakṣe mallaṃ gṛhītvā'tha nanāda bahu siṃhavat

उस मल्ल का नाम जीमूत था, जो मल्लों में अपने पराक्रम के लिए प्रसिद्ध था। उस मल्ल को बगल में दबोचकर वह सिंह की तरह ज़ोर से गरजा।

श्लोक 40 (4.15.40)

तावुभौ सुमहोत्साहावुभौ भीमपराक्रमौ । मत्ताविव महाकायौ वारणौ षष्ठिहायनौ ॥

tāvubhau sumahotsāhāvubhau bhīmaparākramau | mattāviva mahākāyau vāraṇau ṣaṣṭhihāyanau

दोनों बड़े उत्साही और भयंकर पराक्रमी थे, मानो साठ वर्ष के दो विशालकाय मतवाले हाथी हों।

श्लोक 41 (4.15.41)

ततस्तौ नरशार्दूलौ बाहुयुद्धं समीयतुः । वीरौ परमसंहृष्टावन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ ॥

tatastau naraśārdūlau bāhuyuddhaṃ samīyatuḥ | vīrau paramasaṃhṛṣṭāvanyonyajayakāṅkṣiṇau

तब वे दोनों नरश्रेष्ठ बाहुयुद्ध में भिड़ गए — दोनों वीर अत्यन्त उल्लसित और एक-दूसरे को जीतने को उत्सुक।

श्लोक 42 (4.15.42)

उभौ परमसंहृष्टौ बलेनातिबलावुभौ । अन्योन्यस्यान्तरं प्रेप्सू परस्परजयैषिणौ ॥

ubhau paramasaṃhṛṣṭau balenātibalāvubhau | anyonyasyāntaraṃ prepsū parasparajayaiṣiṇau

दोनों अत्यन्त हर्षित थे, दोनों बल में अतिबली; दोनों एक-दूसरे की चूक ढूँढ़ते और एक-दूसरे को जीतना चाहते थे।

श्लोक 43 (4.15.43)

कृतप्रतिकृतैश्चित्रैर्बाहुभिश्च सुसङ्कटैः । सन्निपातावधूतैश्च प्रमाथोन्मथनैस्तथा ॥

kṛtapratikṛtaiścitrairbāhubhiśca susaṅkaṭaiḥ | sannipātāvadhūtaiśca pramāthonmathanaistathā

तरह-तरह के दाँव और प्रतिदाँव, कसकर जकड़ी भुजाओं, टकराकर झटकने, और रगड़ने तथा उखाड़ने वाले दाँवों से,

श्लोक 44 (4.15.44)

क्षेपणैर्मुष्टिभिश्चैव वराहोद्धूतनिस्स्वनैः । तलैर्वज्रनिपातैश्च प्रसृष्टाभिस्तथैव च ॥

kṣepaṇairmuṣṭibhiścaiva varāhoddhūtanissvanaiḥ | talairvajranipātaiśca prasṛṣṭābhistathaiva ca

फेंकने और घूँसों से, सूअर की घुरघुराहट-जैसी आवाज़ों से, वज्र की तरह गिरते थप्पड़ों और खुले हाथ के प्रहारों से,

श्लोक 45 (4.15.45)

शलाकानखपातैश्च पादोद्धूतैश्च दारुणैः । जानुभिश्चाश्मनिर्घोषैः शिरोभिश्चावघट्टनैः ॥

śalākānakhapātaiśca pādoddhūtaiśca dāruṇaiḥ | jānubhiścāśmanirghoṣaiḥ śirobhiścāvaghaṭṭanaiḥ

सलाई-जैसी उँगलियों और नाखूनों के वारों से, भयंकर लातों से, पत्थर-सी आवाज़ करते घुटनों से और सिरों की टक्करों से —

श्लोक 46 (4.15.46)

तद्युद्धमभवद्धोरमशस्त्रं बाहुतेजसा । बलप्राणेन शूराणां समाजोत्सवसन्निधौ ॥

tadyuddhamabhavaddhoramaśastraṃ bāhutejasā | balaprāṇena śūrāṇāṃ samājotsavasannidhau

वह युद्ध भयानक हो उठा — बिना शस्त्रों के, केवल भुजाओं के तेज से, वीरों के बल और प्राणशक्ति से, उत्सव में जुटी भीड़ के सामने।

श्लोक 47 (4.15.47)

अरज्यत जनः सर्वः सोत्क्रुष्टनिनदोत्थितः । बलिनोः संयुगे राजन्वृत्रवासवयोरिव ॥

arajyata janaḥ sarvaḥ sotkruṣṭaninadotthitaḥ | balinoḥ saṃyuge rājanvṛtravāsavayoriva

हे राजन्, वृत्र और इन्द्र के युद्ध जैसे उन दो बलवानों के संग्राम में सारी जनता रम गई और जयकार करती हुई उठ खड़ी हुई।

श्लोक 48 (4.15.48)

प्रकर्षणाकर्षणयोरभ्याकर्षविकर्षणैः । आकर्षतुरथान्योन्यं जानुभिश्चापि जघ्नतुः ॥

prakarṣaṇākarṣaṇayorabhyākarṣavikarṣaṇaiḥ | ākarṣaturathānyonyaṃ jānubhiścāpi jaghnatuḥ

धकेलते-खींचते, पास खींचते और दूर झटकते हुए उन्होंने एक-दूसरे को घसीटा और घुटनों से भी प्रहार किए।

श्लोक 49 (4.15.49)

ततः शब्देन महता भर्त्सयन्तौ परस्परम् । व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ नियुद्धकुशलावुभौ । बाहुभिः समसज्जेतामायसैः परिघैरिव ॥

tataḥ śabdena mahatā bhartsayantau parasparam | vyūḍhoraskau dīrghabhujau niyuddhakuśalāvubhau | bāhubhiḥ samasajjetāmāyasaiḥ parighairiva

फिर ज़ोर से गरजकर एक-दूसरे को धमकाते हुए, चौड़ी छाती और लंबी भुजाओं वाले, कुश्ती में निपुण वे दोनों लोहे के परिघ-जैसी बाँहों से गुँथ गए।

श्लोक 50 (4.15.50)

उत्पपाताथ वेगेन मल्लं कक्षे गृहीतवान् । पार्श्वं निगृह्य हस्तेन पातयामास मल्लकम् ॥

utpapātātha vegena mallaṃ kakṣe gṛhītavān | pārśvaṃ nigṛhya hastena pātayāmāsa mallakam

तब उन्होंने वेग से उछलकर मल्ल को बगल में दबोचा, हाथ से उसकी पसली पकड़ी और उसे पटक दिया।

श्लोक 51 (4.15.51)

चकर्ष दोर्भ्यामुत्पात्य भीमो मल्लममित्रहा । निनदं तमभिक्रोशञ्शार्दूल इव वारणम् ॥

cakarṣa dorbhyāmutpātya bhīmo mallamamitrahā | ninadaṃ tamabhikrośañśārdūla iva vāraṇam

शत्रुओं का नाश करने वाले भीम ने उस मल्ल को दोनों भुजाओं से उठाकर घसीटा और उसकी चिंघाड़ के बीच उसे ललकारते रहे, जैसे बाघ हाथी को।

श्लोक 52 (4.15.52)

समुद्यम्य महाबाहुर्भ्रामयामास वीर्यवान् । ततो मल्लाश्च मत्स्याश्च विस्मयं चक्रिरे परम् ॥

samudyamya mahābāhurbhrāmayāmāsa vīryavān | tato mallāśca matsyāśca vismayaṃ cakrire param

उसे ऊपर उठाकर उस पराक्रमी महाबाहु ने घुमाया; यह देखकर मल्ल और मत्स्यवासी अत्यन्त विस्मित हुए।

श्लोक 53 (4.15.53)

भ्रामयित्वा शतगुणं गतसत्त्वमचेतनम् । प्रत्यपिंषन्महाबाहुर्मल्लं भुवि वृकोदरः ॥

bhrāmayitvā śataguṇaṃ gatasattvamacetanam | pratyapiṃṣanmahābāhurmallaṃ bhuvi vṛkodaraḥ

सौ बार घुमाकर, जब वह निष्प्राण और अचेत हो गया, तब महाबाहु वृकोदर ने उस मल्ल को धरती पर रगड़कर पीस डाला।

श्लोक 54 (4.15.54)

तस्मिन्विनिहते वीरे जीमूते लोकविश्रुते । विराटः परमं हर्षमगच्छद्बान्धवैः सह ॥

tasminvinihate vīre jīmūte lokaviśrute | virāṭaḥ paramaṃ harṣamagacchadbāndhavaiḥ saha

लोकप्रसिद्ध वीर जीमूत के मारे जाने पर विराट अपने बन्धुओं के साथ परम हर्षित हुए।

श्लोक 55 (4.15.55)

प्रहर्षात्प्रददौ वित्तं बहु राजा महामनाः । बल्लवाय महारङ्गे यथा वैश्रवणस्तथा ॥

praharṣātpradadau vittaṃ bahu rājā mahāmanāḥ | ballavāya mahāraṅge yathā vaiśravaṇastathā

हर्ष से भरकर उदार राजा ने विशाल अखाड़े में ही कुबेर की भाँति बल्लव को बहुत-सा धन दिया।

श्लोक 56 (4.15.56)

एवं स सुबहून्मल्लान्पुरुषांश्च महाबलान् । विनिघ्नन्मत्स्यराजस्य प्रीतिमाहरदुत्तमाम् ॥

evaṃ sa subahūnmallānpuruṣāṃśca mahābalān | vinighnanmatsyarājasya prītimāharaduttamām

इस प्रकार बहुत-से मल्लों और महाबली पुरुषों को मारकर उन्होंने मत्स्यराज को परम प्रसन्नता दी।

श्लोक 57 (4.15.57)

यदाऽस्य तुल्यः पुरुषो न कश्चित्तत्र विद्यते । ततो व्याघ्रैश्च सिंहैश्च द्विरदैश्चाप्ययोधयत् ॥

yadā'sya tulyaḥ puruṣo na kaścittatra vidyate | tato vyāghraiśca siṃhaiśca dviradaiścāpyayodhayat

जब वहाँ उनकी बराबरी का कोई पुरुष न रहा, तब राजा ने उन्हें बाघों, सिंहों और हाथियों से लड़वाया।

श्लोक 58 (4.15.58)

विराटेन प्रदत्तानि चित्राणि विविधानि च । स्थितेभ्यः पुरुषेभ्यश्च दत्त्वा द्रव्याणि जग्मिवान् ॥

virāṭena pradattāni citrāṇi vividhāni ca | sthitebhyaḥ puruṣebhyaśca dattvā dravyāṇi jagmivān

विराट की दी हुई तरह-तरह की सुन्दर वस्तुएँ वहाँ खड़े लोगों को बाँटकर वे चले गए।

श्लोक 59 (4.15.59)

पुनरन्तःपुरगतः स्त्रीणां मध्ये वृकोदरः । योध्यते स विराटस्य गजैः सिंहैर्महाबलैः ॥

punarantaḥpuragataḥ strīṇāṃ madhye vṛkodaraḥ | yodhyate sa virāṭasya gajaiḥ siṃhairmahābalaiḥ

फिर विराट के अन्तःपुर में स्त्रियों के बीच वृकोदर को हाथियों और महाबली सिंहों से लड़वाया जाता था।

श्लोक 60 (4.15.60)

बीभत्सुरपि गीतेन नृत्तेनापि च पाण्डवः । विराटं तोषयामास सर्वाश्चान्तःपुरस्त्रियः ॥

bībhatsurapi gītena nṛttenāpi ca pāṇḍavaḥ | virāṭaṃ toṣayāmāsa sarvāścāntaḥpurastriyaḥ

पाण्डुपुत्र बीभत्सु (अर्जुन) भी गीत और नृत्य से विराट को और अन्तःपुर की सब स्त्रियों को प्रसन्न करते थे।

श्लोक 61 (4.15.61)

अश्वैर्विनीतैर्जवनैस्तत्रतत्र समागतः । तोषयामास राजानं नकुलो नृपसत्तमम् । तस्मै प्रदेयं प्रायच्छत्प्रीतो राजा धनं बहु ॥

aśvairvinītairjavanaistatratatra samāgataḥ | toṣayāmāsa rājānaṃ nakulo nṛpasattamam | tasmai pradeyaṃ prāyacchatprīto rājā dhanaṃ bahu

नकुल जगह-जगह आकर सधे हुए तेज़ घोड़ों से श्रेष्ठ राजा को प्रसन्न करते थे; प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें बहुत-सा धन पुरस्कार में दिया।

श्लोक 62 (4.15.62)

विनीतान्वृषभान्दृष्ट्वा सहदेवस्य चाभितः । धनं ददौ बहुविधं विराटः पुरुषर्षभः ॥

vinītānvṛṣabhāndṛṣṭvā sahadevasya cābhitaḥ | dhanaṃ dadau bahuvidhaṃ virāṭaḥ puruṣarṣabhaḥ

सहदेव के चारों ओर सधे हुए बैलों को देखकर नरश्रेष्ठ विराट ने उन्हें अनेक प्रकार का धन दिया।

श्लोक 63 (4.15.63)

द्रौपदी प्रेक्ष्य तान्सर्वान्क्लिश्यमानान्महारथान् । नातिप्रीतमना राजन्निश्वासपरमाऽभवत् ॥

draupadī prekṣya tānsarvānkliśyamānānmahārathān | nātiprītamanā rājanniśvāsaparamā'bhavat

परन्तु हे राजन्, उन सब महारथियों को कष्ट उठाते देखकर द्रौपदी का मन प्रसन्न न रहता था; वह लंबी साँसें भरती रहती थी।

श्लोक 64 (4.15.64)

एवं ते न्यवसंस्तत्र प्रच्छन्नाः पुरुषर्षभाः । कर्माणि तस्य कुर्वाणा विराटनृपतेस्तदा ॥

evaṃ te nyavasaṃstatra pracchannāḥ puruṣarṣabhāḥ | karmāṇi tasya kurvāṇā virāṭanṛpatestadā

इस प्रकार वे नरश्रेष्ठ उस समय राजा विराट के काम करते हुए वहाँ छिपकर रहते रहे।

अध्याय 14अध्याय-सूचीअध्याय 16