विराट पर्व · अध्याय 16
कीचक की द्रौपदी पर आसक्ति
अज्ञातवास के दस महीने बीतने पर विराट का सेनापति कीचक रानी सुदेष्णा की दासी बनी द्रौपदी को देखता है और काम से व्याकुल हो उठता है। वह अपनी बहन सुदेष्णा से पूछता है कि यह स्त्री कौन है और उसे अपने भवन में चाहता है। फिर वह स्वयं द्रौपदी के पास जाकर उसके रूप की लंबी प्रशंसा करता है, उससे अपनी कामाग्नि शान्त करने की याचना करता है, और अपनी पत्नियों को त्यागकर उसका दास बनने का प्रस्ताव रखता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.16.1)
वसमानेषु पार्थेषु मत्स्यस्य नगरे तदा । महारथेषु च्छन्नेषु मासा दश समाययुः ॥
vasamāneṣu pārtheṣu matsyasya nagare tadā | mahāratheṣu cchanneṣu māsā daśa samāyayuḥ
जब पृथा के पुत्र, वे महारथी, मत्स्यराज के नगर में छिपकर रह रहे थे, तब दस महीने बीत गए।
श्लोक 2 (4.16.2)
याज्ञसेनी सुदेष्णां तु शुश्रूषन्ती विशांपते । आवसत्परिचारार्हा सुदुःखं जनमेजय ॥
yājñasenī sudeṣṇāṃ tu śuśrūṣantī viśāṃpate | āvasatparicārārhā suduḥkhaṃ janamejaya
हे प्रजानाथ जनमेजय, जो स्वयं सेवा पाने योग्य थी, वह याज्ञसेनी (द्रौपदी) सुदेष्णा की सेवा करती हुई बड़े दुःख से वहाँ रहती थी।
श्लोक 3 (4.16.3)
तथा चरन्ती पाञ्चाली सुदेष्णाया निवेशने । तां देवीं तोषयामास तथा चान्तःपुरस्त्रियः ॥
tathā carantī pāñcālī sudeṣṇāyā niveśane | tāṃ devīṃ toṣayāmāsa tathā cāntaḥpurastriyaḥ
सुदेष्णा के भवन में इस प्रकार रहती हुई पाञ्चाली ने रानी को और अन्तःपुर की स्त्रियों को भी प्रसन्न कर रखा था।
श्लोक 4 (4.16.4)
तस्मिन्वर्षे गतप्राये कीचकस्तु महाबलः । सेनापतिर्विराटस्य ददर्श द्रुपदात्मजाम् ॥
tasminvarṣe gataprāye kīcakastu mahābalaḥ | senāpatirvirāṭasya dadarśa drupadātmajām
जब वह वर्ष लगभग बीतने को था, तब विराट के सेनापति महाबली कीचक ने द्रुपदकुमारी को देखा।
श्लोक 5 (4.16.5)
तां दृष्ट्वा देवगर्भाभां चरन्तीं देवतामिव । कीचकः कामयामास कामबाणप्रपीडितः ॥
tāṃ dṛṣṭvā devagarbhābhāṃ carantīṃ devatāmiva | kīcakaḥ kāmayāmāsa kāmabāṇaprapīḍitaḥ
देवकन्या-सी कान्तिवाली और देवी की तरह विचरती उस स्त्री को देखकर कामदेव के बाणों से पीड़ित कीचक उसकी कामना करने लगा।
श्लोक 6 (4.16.6)
स तु कामाग्निसंतप्तः सुदेष्णामभिगम्य वै । प्रहसन्निव सेनानीरिदं वचनमब्रवीत् ॥
sa tu kāmāgnisaṃtaptaḥ sudeṣṇāmabhigamya vai | prahasanniva senānīridaṃ vacanamabravīt
काम की आग में जलता हुआ वह सेनापति सुदेष्णा के पास गया और मानो मुस्कुराते हुए यह बात बोला —
कीचक उवाच
श्लोक 7 (4.16.7)
नेयं मया जातु पुरेह दृष्टा राज्ञी विराटस्य निवेशने शुभा । रूपेण चोन्मादयतीव मां भृशं गन्धेन जाता मदिरेव भामिनी ॥
neyaṃ mayā jātu pureha dṛṣṭā rājñī virāṭasya niveśane śubhā | rūpeṇa conmādayatīva māṃ bhṛśaṃ gandhena jātā madireva bhāminī
विराट के इस भवन में मैंने इस सुन्दरी को पहले कभी नहीं देखा — यह तो रानी जैसी है। अपने रूप से यह भामिनी मुझे वैसे ही पूरी तरह उन्मत्त किए दे रही है जैसे सुगन्ध से भरी मदिरा।
श्लोक 8 (4.16.8)
का देवरूपा हृदयंगमा शुभे ह्याचक्ष्व मे कस्य कुतोत्र शोभने । चित्तं हि निर्मथ्य करोति मां वशे न चान्यदत्रौषधमस्ति मे मतम् ॥
kā devarūpā hṛdayaṃgamā śubhe hyācakṣva me kasya kutotra śobhane | cittaṃ hi nirmathya karoti māṃ vaśe na cānyadatrauṣadhamasti me matam
हे शुभे, मुझे बताओ — देवताओं जैसे रूपवाली, सीधे हृदय में उतर जाने वाली यह कौन है? यह सुन्दरी किसकी है और कहाँ से आई है? इसने मेरे मन को मथकर मुझे अपने वश में कर लिया है; मुझे इसका और कोई उपचार नहीं सूझता।
श्लोक 9 (4.16.9)
अहो तवेयं परिचारिका शुभा प्रत्यग्ररूपा प्रतिभाति मामियम् । अयुक्तरूपं हि करोति कर्म ते प्रशास्तु मां यच्च ममास्ति किंचन ॥
aho taveyaṃ paricārikā śubhā pratyagrarūpā pratibhāti māmiyam | ayuktarūpaṃ hi karoti karma te praśāstu māṃ yacca mamāsti kiṃcana
अहो, तुम्हारी यह सुन्दर सेविका मुझे नवयौवन से भरी लगती है। तुम्हारा जो काम यह करती है, वह इसके योग्य नहीं। यह मुझ पर और मेरी हर वस्तु पर शासन करे।
श्लोक 10 (4.16.10)
प्रभूतनागाश्वरथं महाजनं समृद्धियुक्तं बहुपानभोजनम् । मनोहरं काञ्चनचित्रभूषणं गृहं महच्छोभयतामियं मम ॥
prabhūtanāgāśvarathaṃ mahājanaṃ samṛddhiyuktaṃ bahupānabhojanam | manoharaṃ kāñcanacitrabhūṣaṇaṃ gṛhaṃ mahacchobhayatāmiyaṃ mama
मेरा विशाल भवन — जिसमें बहुत-से हाथी, घोड़े, रथ और बहुत-से लोग हैं, जो समृद्धि से भरा है, जहाँ खाने-पीने की भरमार है, जो मनोहर है और सोने के चित्र-विचित्र आभूषणों से सजा है — उसे यह सुशोभित करे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (4.16.11)
ततः सुदेष्णामनुमन्त्र्य कीचकस्ततः समभ्येत्य नराधिपात्मजाम् । उवाच कृष्णामभिसान्त्वयंस्तदा मृगेन्द्रकन्यामिव जम्बुको वने ॥
tataḥ sudeṣṇāmanumantrya kīcakastataḥ samabhyetya narādhipātmajām | uvāca kṛṣṇāmabhisāntvayaṃstadā mṛgendrakanyāmiva jambuko vane
तब सुदेष्णा से सलाह करके कीचक राजकुमारी कृष्णा के पास गया और उसे मीठी बातों से फुसलाते हुए बोला — जैसे वन में कोई सियार सिंह की कन्या से बोले।
कीचक उवाच
श्लोक 12 (4.16.12)
का त्वं कस्यासि कल्याणि कुतो वा त्वं वरानने । प्राप्ता विराटनगरं तत्त्वमाचक्ष्व शोभने ॥
kā tvaṃ kasyāsi kalyāṇi kuto vā tvaṃ varānane | prāptā virāṭanagaraṃ tattvamācakṣva śobhane
हे कल्याणी, तुम कौन हो और किसकी हो? हे सुमुखी, तुम कहाँ से विराटनगर आई हो? हे शोभने, मुझे सच-सच बताओ।
श्लोक 13 (4.16.13)
रूपमग्र्यं तथा कान्तिः सौकुमार्यमनुत्तमम् । कान्त्या विभाति वक्त्रं ते शशाङ्क इव निर्मलं ॥
rūpamagryaṃ tathā kāntiḥ saukumāryamanuttamam | kāntyā vibhāti vaktraṃ te śaśāṅka iva nirmalaṃ
तुम्हारा रूप सर्वश्रेष्ठ है, कान्ति और कोमलता अनुपम है; तुम्हारा मुख निर्मल चन्द्रमा की तरह कान्ति से दमकता है।
श्लोक 14 (4.16.14)
नेत्रे सुविपुले सुभ्रु पद्मपत्रनिभे शुभे । वाक्यं ते चारुसर्वाङ्गि परपुष्टरुतोपमम् ॥
netre suvipule subhru padmapatranibhe śubhe | vākyaṃ te cārusarvāṅgi parapuṣṭarutopamam
हे सुन्दर भौंहों वाली, तुम्हारे नेत्र बड़े-बड़े और कमल की पंखुड़ियों जैसे सुन्दर हैं; हे सर्वांगसुन्दरी, तुम्हारी वाणी कोयल की कूक जैसी है।
श्लोक 15 (4.16.15)
एवंरूपा मया नारी काचिदन्या महीतले । न दृष्टपूर्वा सुश्रोणि यादृशी त्वमनिन्दिते ॥
evaṃrūpā mayā nārī kācidanyā mahītale | na dṛṣṭapūrvā suśroṇi yādṛśī tvamanindite
हे सुश्रोणी, हे अनिन्दिता, पृथ्वी पर मैंने तुम्हारे जैसी रूपवती कोई दूसरी स्त्री पहले कभी नहीं देखी।
श्लोक 16 (4.16.16)
लक्ष्मीः पद्मालया का त्वमथ भूतिः सुमध्यमे । ह्रीः श्रीः कीर्तिरथो कान्तिरासां का त्वं वरानने ॥
lakṣmīḥ padmālayā kā tvamatha bhūtiḥ sumadhyame | hrīḥ śrīḥ kīrtiratho kāntirāsāṃ kā tvaṃ varānane
हे सुमध्यमा, तुम कौन हो — कमल में वास करने वाली लक्ष्मी, या भूति? ह्री, श्री, कीर्ति और कान्ति — हे सुमुखी, इनमें से तुम कौन हो?
श्लोक 17 (4.16.17)
अतीव रूपिणी किं त्वमनङ्गाङ्गविहारिणी । अतीव भ्राजसे सुभ्रु प्रभेवेन्दोरनुत्तमा ॥
atīva rūpiṇī kiṃ tvamanaṅgāṅgavihāriṇī | atīva bhrājase subhru prabhevendoranuttamā
तुम अत्यन्त रूपवती हो — क्या तुम अनंग (कामदेव) के अंग में विहार करने वाली रति हो? हे सुभ्रू, तुम चन्द्रमा की अनुपम प्रभा की तरह अत्यन्त दमक रही हो।
श्लोक 18 (4.16.18)
अपि चेक्षणपक्ष्माणां स्मितज्योत्स्नोपमं शुभम् । दिव्यांशुरश्मिभिर्वृत्तं दिव्यकान्तिमनोरमम् ॥
api cekṣaṇapakṣmāṇāṃ smitajyotsnopamaṃ śubham | divyāṃśuraśmibhirvṛttaṃ divyakāntimanoramam
तुम्हारी पलकों की मुस्कान-सी हल्की खुलन चाँदनी जैसी सुन्दर है, दिव्य किरणों से घिरी और दिव्य कान्ति से मनोहर।
श्लोक 19 (4.16.19)
निरीक्ष्य वक्त्रचन्द्रं ते लक्ष्म्याऽनुपमया युतम् । कृत्स्ने जगति को नेह कामस्य वशगो भवेत् ॥
nirīkṣya vaktracandraṃ te lakṣmyā'nupamayā yutam | kṛtsne jagati ko neha kāmasya vaśago bhavet
अनुपम शोभा से युक्त तुम्हारे चन्द्रमुख को देखकर सारे संसार में ऐसा कौन है जो काम के वश में न हो जाए?
श्लोक 20 (4.16.20)
हारालंकारयोग्यौ तु स्तनौ चोभौ सुशोभनौ । सुजातौ सहितौ लक्ष्म्या पीनौ वृत्तौ निरन्तरौ ॥
hārālaṃkārayogyau tu stanau cobhau suśobhanau | sujātau sahitau lakṣmyā pīnau vṛttau nirantarau
हार और आभूषणों के योग्य तुम्हारे दोनों स्तन अत्यन्त सुन्दर हैं — सुडौल, सटे हुए, शोभा से भरे, पुष्ट, गोल और परस्पर मिले हुए।
श्लोक 21 (4.16.21)
कुड्मलाम्बुरुहाकारौ तव सुभ्रु पयोधरौ । कामप्रतोदाविव मां तुदतश्चारुहासिनि ॥
kuḍmalāmburuhākārau tava subhru payodharau | kāmapratodāviva māṃ tudataścāruhāsini
हे सुभ्रू, हे चारुहासिनी, कमल की कलियों जैसे तुम्हारे पयोधर काम के अंकुशों की तरह मुझे चुभ रहे हैं।
श्लोक 22 (4.16.22)
वलीविभङ्गचतुरं स्तनभारविनामितम् । कराग्रसंमितं मध्यं तवेदं तनुमध्यमे ॥
valīvibhaṅgacaturaṃ stanabhāravināmitam | karāgrasaṃmitaṃ madhyaṃ tavedaṃ tanumadhyame
हे तनुमध्यमा, त्रिवली की रेखाओं से सुघड़ और स्तनों के भार से झुकी तुम्हारी यह कमर इतनी पतली है कि उँगलियों के पोरों में समा जाए।
श्लोक 23 (4.16.23)
दृष्ट्वैव चारुजघनं सरित्पुलिनसंनिभम् । कामव्याधिरसाध्यो मामप्याक्रामति भामिनि ॥
dṛṣṭvaiva cārujaghanaṃ saritpulinasaṃnibham | kāmavyādhirasādhyo māmapyākrāmati bhāmini
हे भामिनी, नदी के रेतीले तट-जैसे तुम्हारे सुन्दर नितम्बों को देखते ही काम का असाध्य रोग मुझ पर भी छा जाता है।
श्लोक 24 (4.16.24)
जज्वाल चाग्निमदनो दावाग्निरिव निर्दयः । त्वत्सङ्गमाभिसंकल्पविवृद्धो मां दहत्ययम् ॥
jajvāla cāgnimadano dāvāgniriva nirdayaḥ | tvatsaṅgamābhisaṃkalpavivṛddho māṃ dahatyayam
कामाग्नि दावानल की तरह निर्दय होकर भड़क उठी है; तुमसे मिलन की आशा से बढ़ी हुई यह मुझे जला रही है।
श्लोक 25 (4.16.25)
आत्मप्रदानवर्षेण संगमाम्भोधरेण च । शमयस्व वरारोहे ज्वलन्तं मन्मथानलम् ॥
ātmapradānavarṣeṇa saṃgamāmbhodhareṇa ca | śamayasva varārohe jvalantaṃ manmathānalam
हे वरारोहे, आत्मसमर्पण की वर्षा और मिलन के मेघ से इस धधकती कामाग्नि को शान्त करो।
श्लोक 26 (4.16.26)
मच्चित्तोन्मादनकरा मन्मथस्य शरोत्कराः । त्वत्सङ्गमाशानिशितास्तीव्राः शशिनिभानने । मह्यं विदार्य हृदयमिदं निर्दयवेगिताः ॥
maccittonmādanakarā manmathasya śarotkarāḥ | tvatsaṅgamāśāniśitāstīvrāḥ śaśinibhānane | mahyaṃ vidārya hṛdayamidaṃ nirdayavegitāḥ
हे चन्द्रमुखी, मेरे चित्त को उन्मत्त करने वाले कामदेव के बाणों के समूह — जो तुमसे मिलन की आशा से पैने हुए हैं, तीखे हैं और निर्दय वेग से छूटे हैं — मेरे इस हृदय को चीरकर
श्लोक 27 (4.16.27)
प्रविष्टा ह्यसितापाङ्गि प्रचण्डाश्चण्डदारुणाः । अत्युन्मादसमारम्भाः प्रीत्युन्मादकरा मम । आत्मप्रदानसंभोगैर्मामुद्धर्तुमिहार्हसि ॥
praviṣṭā hyasitāpāṅgi pracaṇḍāścaṇḍadāruṇāḥ | atyunmādasamārambhāḥ prītyunmādakarā mama | ātmapradānasaṃbhogairmāmuddhartumihārhasi
भीतर घुस गए हैं, हे कजरारे नयनों वाली — वे प्रचण्ड, भयंकर और क्रूर हैं, मुझे घोर उन्माद में डालते और प्रेम में पागल करते हैं। आत्मसमर्पण और संग-सुख देकर तुम्हें यहाँ मेरा उद्धार करना चाहिए।
श्लोक 28 (4.16.28)
चित्रमाल्याम्बरधरा सर्वाभरणभूषिता । कामं प्रकामं सेव त्वं मया सह विलासिनि ॥
citramālyāmbaradharā sarvābharaṇabhūṣitā | kāmaṃ prakāmaṃ seva tvaṃ mayā saha vilāsini
हे विलासिनी, रंग-बिरंगी मालाएँ और वस्त्र पहनकर, सब आभूषणों से सजकर मेरे साथ जी भरकर प्रेम-सुख भोगो।
श्लोक 29 (4.16.29)
नार्हसीहासुखं वस्तुं सुखार्हा सुखवर्जिता । प्राप्नुह्यनुत्तमं सौख्यं मत्तस्त्वं मत्तगामिनि ॥
nārhasīhāsukhaṃ vastuṃ sukhārhā sukhavarjitā | prāpnuhyanuttamaṃ saukhyaṃ mattastvaṃ mattagāmini
तुम सुख के योग्य हो; यहाँ सुख से वंचित होकर दुःख में रहना तुम्हें शोभा नहीं देता। हे मत्तगामिनी, मुझसे सर्वोत्तम सुख प्राप्त करो।
श्लोक 30 (4.16.30)
स्वादून्यमृतकल्पानि पेयानि विविधानि च । पिबमाना मनोज्ञानि रममाणा यथासुखम् ॥
svādūnyamṛtakalpāni peyāni vividhāni ca | pibamānā manojñāni ramamāṇā yathāsukham
अमृत के समान स्वादिष्ट और मनभावन तरह-तरह के पेय पीती हुई और इच्छानुसार आनन्द करती हुई,
श्लोक 31 (4.16.31)
भोगोपचारान्विविधान्सौभाग्यं चाप्यनुत्तमम् । पानं पिब महाभागे भोगैश्चानुत्तमैः शुभैः ॥
bhogopacārānvividhānsaubhāgyaṃ cāpyanuttamam | pānaṃ piba mahābhāge bhogaiścānuttamaiḥ śubhaiḥ
हे महाभागे, तरह-तरह के भोग-विलास और सर्वोत्तम सौभाग्य का आनन्द लो; उत्तम और सुन्दर भोगों के बीच मधुपान करो।
श्लोक 32 (4.16.32)
इदं हि रूपं प्रथमं तवानघे निरर्थकं केवलमद्य भामिनि । अधार्यमाणा स्रगिवोत्तमा शुभा न शोभसे सुन्दरि शोभना सती ॥
idaṃ hi rūpaṃ prathamaṃ tavānaghe nirarthakaṃ kevalamadya bhāmini | adhāryamāṇā sragivottamā śubhā na śobhase sundari śobhanā satī
हे निष्पाप भामिनी, तुम्हारे रूप का यह पहला निखार आज बिल्कुल व्यर्थ जा रहा है। हे सुन्दरी, जैसे कोई उत्तम सुन्दर माला पहनी न जाए, वैसे ही तुम सुन्दर होकर भी शोभा नहीं पा रही हो।
श्लोक 33 (4.16.33)
त्यजामि दारान्मम ये पुरातना भवन्तु दास्यस्तव चारुहासिनि । अहं च ते सुन्दरि दासवत्स्थितः सदा भविष्ये वशगो वरानने ॥
tyajāmi dārānmama ye purātanā bhavantu dāsyastava cāruhāsini | ahaṃ ca te sundari dāsavatsthitaḥ sadā bhaviṣye vaśago varānane
मैं अपनी पुरानी पत्नियों को त्याग दूँगा; हे चारुहासिनी, वे तुम्हारी दासियाँ बनें। और हे सुन्दरी, हे सुमुखी, मैं स्वयं दास की तरह सदा तुम्हारे वश में रहूँगा।