विराट पर्व · अध्याय 17
द्रौपदी द्वारा कीचक का तिरस्कार
सैरन्ध्री के वेष में द्रौपदी कीचक को ठुकरा देती है: वह एक साधारण केश सँवारने वाली दासी और परायी स्त्री है, और परायी स्त्री का लोभ विनाश लाता है। कीचक फिर भी हठ करता है, अपने को राज्य का स्वामी बताता है और वह राज्य उसे सौंपने का प्रस्ताव रखता है। द्रौपदी उसे चेताती है कि पाँच भयंकर गन्धर्व, उसके पति, उसकी रक्षा करते हैं और वह जहाँ भी भागे, वे उसे मार डालेंगे; उससे याचना करना अपनी मृत्यु को बुलाना है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.17.1)
एवमुक्ताऽनवद्याङ्गी कीचकेन दुरात्मना । द्रौपदी तमुवाचेदं सैरन्ध्रीवेषधारिणी ॥
evamuktā'navadyāṅgī kīcakena durātmanā | draupadī tamuvācedaṃ sairandhrīveṣadhāriṇī
दुष्ट कीचक के ऐसा कहने पर सैरन्ध्री का वेष धारण किए हुए निर्दोष अंगों वाली द्रौपदी ने उससे यह कहा —
द्रौपद्युवाच
श्लोक 2 (4.17.2)
अप्रार्थनीयामिह मां सूतपुत्राभिमन्यसे । निहीनवर्णां सैरन्ध्रीं बीभत्सां केशकारिणीम् ॥
aprārthanīyāmiha māṃ sūtaputrābhimanyase | nihīnavarṇāṃ sairandhrīṃ bībhatsāṃ keśakāriṇīm
हे सूतपुत्र, तुम मुझे चाह रहे हो, जो यहाँ चाहे जाने योग्य नहीं — मैं तो नीच वर्ण की, कुरूप, केश सँवारने वाली एक सैरन्ध्री हूँ।
श्लोक 3 (4.17.3)
परदाराऽस्मि भद्रं ते न युक्तं तव सांप्रतम् । दयिताः प्राणिनां दारा धर्मं समनुचिन्तय ॥
paradārā'smi bhadraṃ te na yuktaṃ tava sāṃpratam | dayitāḥ prāṇināṃ dārā dharmaṃ samanucintaya
मैं परायी स्त्री हूँ — तुम्हारा कल्याण हो — यह तुम्हारे लिए उचित नहीं। सभी प्राणियों को अपनी पत्नियाँ प्रिय होती हैं; धर्म का विचार करो।
श्लोक 4 (4.17.4)
परदारे न ते बुद्धिर्जातु कार्या कथंचन । विवर्जनं ह्यकार्याणामेतत्सुपुरुषव्रतम् ॥
paradāre na te buddhirjātu kāryā kathaṃcana | vivarjanaṃ hyakāryāṇāmetatsupuruṣavratam
परायी स्त्री पर तुम्हें कभी किसी भी प्रकार मन नहीं लगाना चाहिए। न करने योग्य कामों से दूर रहना ही सज्जनों का व्रत है।
श्लोक 5 (4.17.5)
मिथ्याभिगृध्नो हि नरः पापात्मा मोहमास्थितः । अयशः प्राप्नुयाद्धोरं महद्वा प्राप्नुयाद्भयम् ॥
mithyābhigṛdhno hi naraḥ pāpātmā mohamāsthitaḥ | ayaśaḥ prāpnuyāddhoraṃ mahadvā prāpnuyādbhayam
जो पापी मनुष्य मोह में पड़कर अनुचित वस्तु का लोभ करता है, वह घोर अपयश पाता है या बड़े संकट में पड़ता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (4.17.6)
एवमुक्तस्तु सैरन्ध्र्या कीचकः काममोहितः । जानन्नपि सुदुर्बुद्धिः परदाराभिमर्शने ॥
evamuktastu sairandhryā kīcakaḥ kāmamohitaḥ | jānannapi sudurbuddhiḥ paradārābhimarśane
सैरन्ध्री के ऐसा कहने पर भी काम से मोहित वह दुर्बुद्धि कीचक, परायी स्त्री को छूने के
श्लोक 7 (4.17.7)
दोषान्बहून्प्राणहरान्सर्वलोकविगर्हितान् । प्रोवाचेदं सुदुर्बुद्धिर्द्रौपदीमजितेन्द्रियः ॥
doṣānbahūnprāṇaharānsarvalokavigarhitān | provācedaṃ sudurbuddhirdraupadīmajitendriyaḥ
प्राणघातक और सारे संसार में निन्दित अनेक दोषों को जानते हुए भी, उस अत्यन्त दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय ने द्रौपदी से यह कहा —
कीचक उवाच
श्लोक 8 (4.17.8)
नार्हस्येवं वरारोहे प्रत्याख्यातुं वरानने । मां मन्मथसमाविष्टं त्वत्कृते चारुहासिनि ॥
nārhasyevaṃ varārohe pratyākhyātuṃ varānane | māṃ manmathasamāviṣṭaṃ tvatkṛte cāruhāsini
हे वरारोहे, हे सुमुखी, हे चारुहासिनी, मैं तुम्हारे लिए काम से ग्रस्त हूँ; मुझे इस तरह ठुकराना तुम्हें शोभा नहीं देता।
श्लोक 9 (4.17.9)
प्रत्याख्याय च मां भीरु वशगं प्रियवादिनम् । नूनं त्वमसितापाङ्गि पश्चात्तापं करिष्यसि ॥
pratyākhyāya ca māṃ bhīru vaśagaṃ priyavādinam | nūnaṃ tvamasitāpāṅgi paścāttāpaṃ kariṣyasi
हे भीरु, मैं तुम्हारे वश में हूँ और तुमसे प्रिय बोलता हूँ; मुझे ठुकराकर, हे कजरारे नयनों वाली, तुम निश्चय ही बाद में पछताओगी।
श्लोक 10 (4.17.10)
अहं हि सुभ्रु राज्यस्य कृत्स्नस्यास्य सुमध्यमे । प्रभुर्वासयिता चैव वीर्ये चाप्रतिमः क्षितौ ॥
ahaṃ hi subhru rājyasya kṛtsnasyāsya sumadhyame | prabhurvāsayitā caiva vīrye cāpratimaḥ kṣitau
हे सुभ्रू, हे सुमध्यमा, मैं ही इस सारे राज्य का स्वामी और इसे बसाए रखने वाला हूँ, और पराक्रम में पृथ्वी पर मेरी बराबरी करने वाला कोई नहीं।
श्लोक 11 (4.17.11)
पृथिव्यां मत्समो नास्ति कश्चिदन्यः पुमानिह । रूपयौवनसौभाग्यैर्भोगैश्चानुत्तमैः शुभैः ॥
pṛthivyāṃ matsamo nāsti kaścidanyaḥ pumāniha | rūpayauvanasaubhāgyairbhogaiścānuttamaiḥ śubhaiḥ
रूप, यौवन, सौभाग्य और उत्तम, सुन्दर भोगों में पृथ्वी पर मेरे समान कोई दूसरा पुरुष नहीं है।
श्लोक 12 (4.17.12)
सर्वकामसमृद्धेषु भोगेष्वनुपमेष्विह । भोक्तव्येषु च कल्याणि कस्माद्दास्ये रता ह्यसि ॥
sarvakāmasamṛddheṣu bhogeṣvanupameṣviha | bhoktavyeṣu ca kalyāṇi kasmāddāsye ratā hyasi
हे कल्याणी, जब यहाँ सब कामनाओं से भरे अनुपम भोग भोगने को हैं, तब तुम दासीपन में क्यों रमी हुई हो?
श्लोक 13 (4.17.13)
मया दत्तमिदं राज्यं स्वामिन्यसि शुभानने । भजस्व मां वरारोहे भुङ्क्ष्व भोगाननुत्तमान् ॥
mayā dattamidaṃ rājyaṃ svāminyasi śubhānane | bhajasva māṃ varārohe bhuṅkṣva bhogānanuttamān
यह राज्य मैं तुम्हें देता हूँ; हे शुभानने, तुम इसकी स्वामिनी हो। हे वरारोहे, मुझे अपनाओ और उत्तम भोगों का आनन्द लो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (4.17.14)
एवमुक्ता तु सा साध्वी कीचकेनाशुभं वचः । कीचकं प्रत्युवाचेदं गर्हयन्त्यस्य तद्वचः ॥
evamuktā tu sā sādhvī kīcakenāśubhaṃ vacaḥ | kīcakaṃ pratyuvācedaṃ garhayantyasya tadvacaḥ
कीचक के ऐसे अशुभ वचन कहने पर उस साध्वी ने उसकी बात की निन्दा करते हुए कीचक को यह उत्तर दिया —
सैरन्ध्र्युवाच
श्लोक 15 (4.17.15)
मा सूतपुत्र मुह्यस्व माऽद्य त्यक्ष्यसि जीवितम् । जानीहि पञ्चभिर्घोरैर्नित्यं मामभिरक्षिताम् ॥
mā sūtaputra muhyasva mā'dya tyakṣyasi jīvitam | jānīhi pañcabhirghorairnityaṃ māmabhirakṣitām
हे सूतपुत्र, मोह में मत पड़ो; आज अपने प्राण मत गँवाओ। जान लो कि पाँच भयंकर रक्षक सदा मेरी रक्षा करते हैं।
श्लोक 16 (4.17.16)
न चाप्यहं त्वया लभ्या गन्धर्वाः पतयो मम । ते त्वां निहन्युः कुपिताः साध्वलं मा व्यनीनशः ॥
na cāpyahaṃ tvayā labhyā gandharvāḥ patayo mama | te tvāṃ nihanyuḥ kupitāḥ sādhvalaṃ mā vyanīnaśaḥ
तुम मुझे नहीं पा सकते; गन्धर्व मेरे पति हैं। वे कुपित होकर तुम्हें मार डालेंगे। बस करो, अपना नाश मत करो।
श्लोक 17 (4.17.17)
अशक्यरूपं पुरुषैरध्वानं गन्तुमिच्छसि ॥
aśakyarūpaṃ puruṣairadhvānaṃ gantumicchasi
तुम उस मार्ग पर चलना चाहते हो जिस पर चलना मनुष्यों के बस का नहीं।
श्लोक 18 (4.17.18)
यथा निश्चेतनो बालः कूलस्थः कूलमुत्तरम् । तर्तुमिच्छति मन्दात्मा तथा त्वं कर्तुमिच्छसि ॥
yathā niścetano bālaḥ kūlasthaḥ kūlamuttaram | tartumicchati mandātmā tathā tvaṃ kartumicchasi
जैसे कोई नासमझ बालक इस किनारे पर खड़ा होकर उस पार जाना चाहे, वैसा ही, हे मूर्ख, तुम करना चाहते हो।
श्लोक 19 (4.17.19)
अन्तर्महीं वा यदि वोर्ध्वमुत्पतेः समुद्रपारं यदि वा प्रधावसि । तथापि तेषां न विमोक्षमर्हसि प्रमाथिनो देवसुता हि खेचराः ॥
antarmahīṃ vā yadi vordhvamutpateḥ samudrapāraṃ yadi vā pradhāvasi | tathāpi teṣāṃ na vimokṣamarhasi pramāthino devasutā hi khecarāḥ
चाहे तुम धरती के भीतर घुस जाओ या ऊपर आकाश में उड़ जाओ, चाहे समुद्र के उस पार भाग जाओ, फिर भी उनसे बच नहीं सकोगे; क्योंकि वे आकाश में विचरने वाले, शत्रुओं को मथ डालने वाले देवपुत्र हैं।
श्लोक 20 (4.17.20)
त्वं कालरात्रीमिव कश्चिदातुरः किं मां दृढं प्रार्थयसेऽद्य कीचक । किं मातुरङ्के शयितो यथा शिशुश्चन्द्रं जिघृक्षुरिव मन्यसे हि माम् ॥
tvaṃ kālarātrīmiva kaścidāturaḥ kiṃ māṃ dṛḍhaṃ prārthayase'dya kīcaka | kiṃ māturaṅke śayito yathā śiśuścandraṃ jighṛkṣuriva manyase hi mām
हे कीचक, जैसे कोई रोगी कालरात्रि को चाहे, वैसे ही आज तुम मुझसे इतने हठ से याचना क्यों कर रहे हो? जैसे माँ की गोद में लेटा शिशु चन्द्रमा को पकड़ना चाहता है, वैसा ही तुम मेरे विषय में सोचते हो।
श्लोक 21 (4.17.21)
तेषां प्रियां प्रार्थयतो न ते भुवि गत्वा दिवं वा शरणं भविष्यति । न वर्तते कीचक ते दृशा शुभं या तेन संजीवनमर्थयेत सा ॥
teṣāṃ priyāṃ prārthayato na te bhuvi gatvā divaṃ vā śaraṇaṃ bhaviṣyati | na vartate kīcaka te dṛśā śubhaṃ yā tena saṃjīvanamarthayeta sā
उनकी प्रिया से याचना करने पर तुम्हें न पृथ्वी पर शरण मिलेगी, न स्वर्ग जाकर। हे कीचक, जहाँ तक मैं देखती हूँ, तुम्हारे लिए कुछ भी शुभ नहीं है; कौन-सी स्त्री ऐसे पुरुष से अपने जीवन का सहारा चाहेगी?