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विराट पर्व · अध्याय 18

सुदेष्णा द्वारा द्रौपदी को कीचक के घर भेजना

रानी की सैरन्ध्री बनकर छिपी द्रौपदी से ठुकराया गया कीचक अपनी बहन सुदेष्णा के चरणों में गिरकर विनती करता है कि वह उस स्त्री को उसके लिए राज़ी करे, नहीं तो वह मर जाएगा। सुदेष्णा उसे चेताती है कि पाँच गन्धर्व उसकी रक्षा करते हैं और उसकी वासना पूरे कुल का नाश कर देगी, पर भाई के स्नेहवश वह एक युक्ति मान लेती है — कीचक सुरा और भोजन तैयार करवाए और वह सैरन्ध्री को सुरा लाने भेजेगी। द्रौपदी न भेजे जाने की विनती करती है, पर क्रुद्ध रानी उसे सोने का पात्र थमा देती है, और द्रौपदी रोती हुई पाँचों पाण्डवों के प्रति अपनी निष्ठा के सत्य से अपनी रक्षा की प्रार्थना करती है।

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.18.1)

प्रत्याख्यातश्च पाञ्चाल्या कीचकः काममोहितः । प्रविश्य राजभवनं भगिन्या अग्रतः स्थितः ॥

pratyākhyātaśca pāñcālyā kīcakaḥ kāmamohitaḥ | praviśya rājabhavanaṃ bhaginyā agrataḥ sthitaḥ

पाञ्चाली से ठुकराया गया, काम से मोहित कीचक राजभवन में जाकर अपनी बहन के सामने खड़ा हो गया।

श्लोक 2 (4.18.2)

सोभिवीक्ष्य सुकेशान्तां सुदेष्णां भगिनीं प्रियाम् । अमर्यादेन कामेन घोरेणाभिपरिप्लुतः ॥

sobhivīkṣya sukeśāntāṃ sudeṣṇāṃ bhaginīṃ priyām | amaryādena kāmena ghoreṇābhipariplutaḥ

सुंदर केशों वाली अपनी प्रिय बहन सुदेष्णा को देखकर वह मर्यादाहीन, भयंकर काम-वासना में डूब गया।

श्लोक 3 (4.18.3)

स तु मूर्ध्न्यञ्जलिं कृत्वा भगिन्याश्चरणावुभौ । संमोहाभिहतस्तूर्णं वातोद्धृत इवार्णवः ॥

sa tu mūrdhnyañjaliṃ kṛtvā bhaginyāścaraṇāvubhau | saṃmohābhihatastūrṇaṃ vātoddhṛta ivārṇavaḥ

बहन के दोनों चरणों में सिर पर हाथ जोड़कर, मोह से आहत वह सहसा वायु से उद्वेलित समुद्र-सा हो गया।

श्लोक 4 (4.18.4)

स प्रोवाच सुदुःखार्तो भगिनीं निश्वसन्मुहुः । अव्यक्तमृदुना साम्ना शुष्यता च पुनःपुनः ॥

sa provāca suduḥkhārto bhaginīṃ niśvasanmuhuḥ | avyaktamṛdunā sāmnā śuṣyatā ca punaḥpunaḥ

अत्यंत दुःखी होकर, बार-बार निःश्वास लेते और बार-बार सूखते कंठ से, वह अस्पष्ट, कोमल और मनुहार भरे स्वर में बहन से बोला —

कीचक उवाच

श्लोक 5 (4.18.5)

यथा सुदेष्णे सैरन्ध्र्या संगच्छेयं सकामया । तथा शीघ्रं कुरुष्वाद्य माऽहं प्राणान्प्रहासिषम् ॥

yathā sudeṣṇe sairandhryā saṃgaccheyaṃ sakāmayā | tathā śīghraṃ kuruṣvādya mā'haṃ prāṇānprahāsiṣam

"सुदेष्णे! आज ही शीघ्र ऐसा उपाय करो कि सैरन्ध्री स्वेच्छा से मुझसे मिले; ऐसा न हो कि मैं प्राण गँवा दूँ।

श्लोक 6 (4.18.6)

यदीयमनवद्याङ्गी न मामद्यापि काङ्क्षते । चेतसाऽभिप्रसन्नेन गतोस्मि यमसादनम् ॥

yadīyamanavadyāṅgī na māmadyāpi kāṅkṣate | cetasā'bhiprasannena gatosmi yamasādanam

यदि यह निर्दोष अंगों वाली अब भी प्रसन्न मन से मुझे नहीं चाहती, तो समझो मैं यमलोक पहुँच गया।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (4.18.7)

तमुवाच परिष्वज्य सुदेष्णा भ्रातरं प्रियम् । भ्रातुर्जीवितरक्षार्थं समाश्वास्यासितेक्षणा ॥

tamuvāca pariṣvajya sudeṣṇā bhrātaraṃ priyam | bhrāturjīvitarakṣārthaṃ samāśvāsyāsitekṣaṇā

श्याम नेत्रों वाली सुदेष्णा ने अपने प्रिय भाई को गले लगाया और उसके प्राण बचाने के लिए उसे ढाढ़स बँधाते हुए कहा —

सुदेष्णोवाच

श्लोक 8 (4.18.8)

शरणागतेयं सुश्रोणी मया दत्ताभया च सा । शुभाचारा च भद्रं ते नैनां वक्तुमिहोत्सहे ॥

śaraṇāgateyaṃ suśroṇī mayā dattābhayā ca sā | śubhācārā ca bhadraṃ te naināṃ vaktumihotsahe

"यह सुंदरी मेरी शरण में आई है और मैंने इसे अभय दिया है। यह सदाचारिणी भी है — तुम्हारा भला हो — मैं इससे यह बात कहने का साहस नहीं कर सकती।

श्लोक 9 (4.18.9)

एषा हि शक्या नान्येन स्प्रष्टुं पापेन चेतसा । गन्धर्वाः किल पञ्चेमां रक्षन्ति रमयन्ति च ॥

eṣā hi śakyā nānyena spraṣṭuṃ pāpena cetasā | gandharvāḥ kila pañcemāṃ rakṣanti ramayanti ca

कोई दूसरा पापपूर्ण मन से इसे छू भी नहीं सकता, क्योंकि कहते हैं कि पाँच गन्धर्व इसकी रक्षा करते हैं और इसके साथ रमण करते हैं।

श्लोक 10 (4.18.10)

एवमेषा ममाचष्टे तथा प्रथमसंगमे । तथैव गजनासोरूः सत्यमाह ममान्तिके । ते हि क्रुद्धा महात्मानो नाशयेयुर्हि जीवितम् ॥

evameṣā mamācaṣṭe tathā prathamasaṃgame | tathaiva gajanāsorūḥ satyamāha mamāntike | te hi kruddhā mahātmāno nāśayeyurhi jīvitam

पहली भेंट में इसने मुझसे ऐसा ही कहा था, और हाथी की सूँड़ जैसी जंघाओं वाली इसने मेरे सामने यही सच कहा है। वे महात्मा क्रुद्ध हो जाएँ तो प्राण ही हर लें।

श्लोक 11 (4.18.11)

राजा चैव समीक्ष्यैनां संमोहं गतवानिह । मया च सत्यवचनैरनुनीतो महीपतिः ॥

rājā caiva samīkṣyaināṃ saṃmohaṃ gatavāniha | mayā ca satyavacanairanunīto mahīpatiḥ

राजा भी इसे देखकर यहाँ मोहित हो गए थे, पर मैंने सच्ची बातें कहकर उन्हें समझा लिया।

श्लोक 12 (4.18.12)

सोप्येनामनिशं दृष्ट्वा मनसैवाभ्यनन्दत । भयाद्गन्धर्वमुख्यानां जीवितस्योपघातिनाम् । मनसाऽपि ततस्त्वेनां न चिन्तयति पार्थिवः ॥

sopyenāmaniśaṃ dṛṣṭvā manasaivābhyanandata | bhayādgandharvamukhyānāṃ jīvitasyopaghātinām | manasā'pi tatastvenāṃ na cintayati pārthivaḥ

वे भी इसे निरंतर देखकर केवल मन ही मन सराहते रहे; और प्राण हर लेने वाले उन गन्धर्व-प्रमुखों के भय से राजा अब मन में भी इसके बारे में नहीं सोचते।

श्लोक 13 (4.18.13)

ते हि क्रुद्धा महात्मानो गरुडानिलतेजसः । दहेयुरपि लोकांस्त्रीन्युगान्तेष्विव भास्करः ॥

te hi kruddhā mahātmāno garuḍānilatejasaḥ | daheyurapi lokāṃstrīnyugānteṣviva bhāskaraḥ

क्योंकि वे महात्मा क्रोधित होने पर गरुड़ और वायु जैसे तेजस्वी हो जाते हैं; वे युगान्त के सूर्य की भाँति तीनों लोकों को भी भस्म कर सकते हैं।

श्लोक 14 (4.18.14)

सैरन्ध्र्या ह्येतदाख्यातं मम तेषां महद्बलम् । तव चाहमिदं गुह्यं स्नेहाद्वक्ष्यामि बन्धुवत् ॥

sairandhryā hyetadākhyātaṃ mama teṣāṃ mahadbalam | tava cāhamidaṃ guhyaṃ snehādvakṣyāmi bandhuvat

सैरन्ध्री ने ही मुझे उनके महान बल के बारे में बताया है; और मैं स्नेहवश, अपनी सगी होने के नाते, तुम्हें यह गुप्त बात बता रही हूँ।

श्लोक 15 (4.18.15)

मा गमिष्यसि वै कृच्छ्रां गतिं परमदुर्गमाम् । बलिनस्ते रुजं कुर्युः कुलस्य च धनस्य च ॥

mā gamiṣyasi vai kṛcchrāṃ gatiṃ paramadurgamām | balinaste rujaṃ kuryuḥ kulasya ca dhanasya ca

उस कठिन और अत्यंत दुर्गम मार्ग पर मत चलो। वे बलवान तुम्हारे कुल और धन का नाश कर देंगे।

श्लोक 16 (4.18.16)

तस्मान्नास्यां मनः कर्तुं यदि प्राणाः प्रियास्तव । न चिन्तयेथा मागास्त्वं मत्प्रियं च यदीच्छसि ॥

tasmānnāsyāṃ manaḥ kartuṃ yadi prāṇāḥ priyāstava | na cintayethā māgāstvaṃ matpriyaṃ ca yadīcchasi

इसलिए यदि तुम्हें प्राण प्यारे हैं तो इस पर मन मत लगाओ। यदि मेरा प्रिय चाहते हो तो न इसके बारे में सोचो, न इसके पास जाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (4.18.17)

एवमुक्तस्तु दुष्टात्मा भगिनीं कीचकोऽब्रवीत् । गन्धर्वाणां शतं वाऽपि सहस्रमयुतानि वा । अहमेको वधिष्यामि गन्धर्वान्पञ्च किं पुनः ॥

evamuktastu duṣṭātmā bhaginīṃ kīcako'bravīt | gandharvāṇāṃ śataṃ vā'pi sahasramayutāni vā | ahameko vadhiṣyāmi gandharvānpañca kiṃ punaḥ

यह सुनकर दुष्टात्मा कीचक ने बहन से कहा — "सौ गन्धर्व हों, हज़ार हों या दसियों हज़ार — मैं अकेला ही उन्हें मार डालूँगा; फिर पाँच की तो बात ही क्या!

कीचक उवाच

श्लोक 18 (4.18.18)

न च त्वमभिजानीषे स्त्रीणां गुह्यमनुत्तमम् । पुत्रं वा किल पौत्रं वा भ्रातरं वा मनस्विनम् ॥

na ca tvamabhijānīṣe strīṇāṃ guhyamanuttamam | putraṃ vā kila pautraṃ vā bhrātaraṃ vā manasvinam

तुम स्त्रियों का वह परम रहस्य नहीं जानतीं। चाहे पुत्र हो, पौत्र हो या मनस्वी भाई —

श्लोक 19 (4.18.19)

रहसीह नरं दृष्ट्वा नानागन्धविभूषितम् । योनिरुत्स्विद्यते स्त्रीणां सतीनामपि च श्रुतम् ॥

rahasīha naraṃ dṛṣṭvā nānāgandhavibhūṣitam | yonirutsvidyate strīṇāṃ satīnāmapi ca śrutam

एकांत में अनेक सुगंधों से सजे पुरुष को देखकर स्त्रियों का शरीर काम से आर्द्र हो उठता है, सती स्त्रियों का भी — ऐसा सुना गया है।

श्लोक 20 (4.18.20)

मां निरीक्ष्यानुलिप्ताङ्गं सर्वाभरणभूषितम् । वशमेष्यति सैरन्ध्री मन्मथेनाभिपीडिता । सा त्वं दृष्ट्वा ब्रूहि चैनां मम चेज्जीवितं प्रियं ॥

māṃ nirīkṣyānuliptāṅgaṃ sarvābharaṇabhūṣitam | vaśameṣyati sairandhrī manmathenābhipīḍitā | sā tvaṃ dṛṣṭvā brūhi caināṃ mama cejjīvitaṃ priyaṃ

अंगों पर लेप लगाए और सब आभूषणों से सजे मुझे देखकर सैरन्ध्री कामदेव से पीड़ित होकर मेरे वश में आ जाएगी। इसलिए यदि मेरा जीवन तुम्हें प्रिय है तो उससे मिलो और उससे बात करो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (4.18.21)

एवमुक्ता सुदेष्णा तु शोकेनाभिप्रपीडिता । अहो दुःखमहो कृच्छ्रमहो पापमिति स्मह ॥

evamuktā sudeṣṇā tu śokenābhiprapīḍitā | aho duḥkhamaho kṛcchramaho pāpamiti smaha

ऐसा कहे जाने पर शोक से अत्यंत पीड़ित सुदेष्णा बोल उठी — "हाय दुःख! हाय संकट! हाय पाप!"

श्लोक 22 (4.18.22)

प्रारुदद्भृशदुःखार्ता विपाकं तस्य वीक्ष्य सा । पातालेषु पतत्येष विलपन्बडवामुखे ॥

prārudadbhṛśaduḥkhārtā vipākaṃ tasya vīkṣya sā | pātāleṣu patatyeṣa vilapanbaḍavāmukhe

इसका परिणाम देखकर वह अत्यंत दुःखी होकर फूट-फूटकर रोने लगी — "यह विलाप करता हुआ पाताल में, बड़वानल के मुख में गिर रहा है।"

सुदेष्णोवाच

श्लोक 23 (4.18.23)

त्वत्कृते विनशिष्यन्ति भ्रातरः सुहृदश्च मे । किंनु शक्यं मया कर्तुं यत्त्वमेवमभिप्लुतः ॥

tvatkṛte vinaśiṣyanti bhrātaraḥ suhṛdaśca me | kiṃnu śakyaṃ mayā kartuṃ yattvamevamabhiplutaḥ

"तुम्हारे कारण मेरे भाई और सुहृद नष्ट हो जाएँगे। जब तुम इस तरह बह गए हो, तो मैं क्या कर सकती हूँ?

श्लोक 24 (4.18.24)

न च श्रेयोऽभिजानीषे काममेवानुवर्तसे । ध्रुवं गतायुस्त्वं पाप यदेवं काममोहितः । अकर्तव्ये हि मां पापे नियुनङ्क्षि नराधम ॥

na ca śreyo'bhijānīṣe kāmamevānuvartase | dhruvaṃ gatāyustvaṃ pāpa yadevaṃ kāmamohitaḥ | akartavye hi māṃ pāpe niyunaṅkṣi narādhama

तुम अपना हित नहीं पहचानते, केवल काम के पीछे चलते हो। पापी! जब तुम इस प्रकार काम से मोहित हो, तो निश्चय ही तुम्हारी आयु पूरी हो चुकी है। नराधम! तुम मुझे न करने योग्य पाप-कर्म में लगा रहे हो।

श्लोक 25 (4.18.25)

अपि चैतत्पुरा प्रोक्तं निपुणैर्मनुजोत्तमैः । एकस्तु कुरुते पापं स्वजातिस्तेन हन्यते ॥

api caitatpurā proktaṃ nipuṇairmanujottamaiḥ | ekastu kurute pāpaṃ svajātistena hanyate

पूर्वकाल में निपुण श्रेष्ठ पुरुषों ने यह भी कहा है — पाप एक व्यक्ति करता है, और उसके कारण उसका सारा कुल मारा जाता है।

श्लोक 26 (4.18.26)

गतस्त्वं धर्मराजस्य विषयं नात्र संशयः । अदूषितमिदं सर्वं स्वजनं घातयिष्यसि ॥

gatastvaṃ dharmarājasya viṣayaṃ nātra saṃśayaḥ | adūṣitamidaṃ sarvaṃ svajanaṃ ghātayiṣyasi

तुम धर्मराज यम के राज्य में पहुँच चुके हो, इसमें संदेह नहीं; और तुम अपने इन सब निर्दोष स्वजनों को भी मरवा दोगे।

श्लोक 27 (4.18.27)

एतत्तु मे दुःखतरं येनाहं भ्रातृसौहृदात् । विदितार्था करिष्यामि तुष्टो भव कुलक्षये ॥

etattu me duḥkhataraṃ yenāhaṃ bhrātṛsauhṛdāt | viditārthā kariṣyāmi tuṣṭo bhava kulakṣaye

मुझे इससे भी अधिक दुःख इस बात का है कि सब कुछ जानते हुए भी भाई के स्नेहवश मैं यह करूँगी। तो कुल के विनाश से संतुष्ट हो जाओ।

श्लोक 28 (4.18.28)

गच्छ शीघ्रमितस्त्वं हि स्वमेव भवनं शुभम् । किंचित्कार्यं समुद्दिश्य सुरामन्नं च कारय ॥

gaccha śīghramitastvaṃ hi svameva bhavanaṃ śubham | kiṃcitkāryaṃ samuddiśya surāmannaṃ ca kāraya

यहाँ से शीघ्र अपने सुंदर भवन में जाओ और किसी काम का बहाना बनाकर सुरा और भोजन तैयार करवाओ।

श्लोक 29 (4.18.29)

कृते चान्ने सुरायां च प्रेषयिष्यसि मे पुनः । तामहं प्रेषयिष्यामि मध्वन्नार्थं तवान्तिकम् ॥

kṛte cānne surāyāṃ ca preṣayiṣyasi me punaḥ | tāmahaṃ preṣayiṣyāmi madhvannārthaṃ tavāntikam

भोजन और सुरा तैयार हो जाने पर मुझे फिर संदेश भेजना; तब मैं उसे मधु और अन्न लाने के लिए तुम्हारे पास भेजूँगी।

श्लोक 30 (4.18.30)

ततः संप्रेषितामेनां विजने निरवग्रहाम् । सान्त्वयेथा यथान्यायं यदि साम सहिष्यति ॥

tataḥ saṃpreṣitāmenāṃ vijane niravagrahām | sāntvayethā yathānyāyaṃ yadi sāma sahiṣyati

फिर जब वह भेजी जाए और एकांत में तुम्हारे पास हो, जहाँ कोई रोक-टोक न हो, तो उसे उचित रीति से मीठी बातों से मनाना — यदि वह मनुहार सह ले।

श्लोक 31 (4.18.31)

सद्यः कृतमिदं सर्वं शेषमत्रानुचिन्तय ॥

sadyaḥ kṛtamidaṃ sarvaṃ śeṣamatrānucintaya

यह सब तुरंत हो जाएगा; बाकी तुम स्वयं सोच लो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 32 (4.18.32)

सुदेष्णयैवमुक्तस्तु कीचकः कालचोदितः । त्वरमाणः प्रचक्राम स्वगृहं राजवेश्मनः ॥

sudeṣṇayaivamuktastu kīcakaḥ kālacoditaḥ | tvaramāṇaḥ pracakrāma svagṛhaṃ rājaveśmanaḥ

सुदेष्णा के ऐसा कहने पर काल से प्रेरित कीचक जल्दी-जल्दी राजमहल से अपने घर चला गया।

श्लोक 33 (4.18.33)

आगम्य च गृहं रम्यं सुरामन्नं चकार ह । अजैडकं च सुकृतं बहु चोच्चावचान्मृगान् ॥

āgamya ca gṛhaṃ ramyaṃ surāmannaṃ cakāra ha | ajaiḍakaṃ ca sukṛtaṃ bahu coccāvacānmṛgān

अपने रमणीय घर पहुँचकर उसने सुरा और भोजन तैयार करवाया — अच्छी तरह पकाया बकरे और भेड़ का मांस, और छोटे-बड़े अनेक प्रकार के मृग,

श्लोक 34 (4.18.34)

भक्षांश्च विविधाकारान्बहूंश्चोच्चावचांस्तदा । कारयामास कुशलैरन्नपानैः सुसंस्कृतम् ॥

bhakṣāṃśca vividhākārānbahūṃścoccāvacāṃstadā | kārayāmāsa kuśalairannapānaiḥ susaṃskṛtam

और अनेक आकार-प्रकार के छोटे-बड़े भक्ष्य पदार्थ भी। यह सब उसने कुशल रसोइयों से अन्न-पान सहित भली-भाँति तैयार करवाया।

श्लोक 35 (4.18.35)

त्वरावान्कालपाशेन कण्ठे बद्धः पशुर्यथा । नावबुध्यत मूढात्मा मरणं समुपस्थितम् ॥

tvarāvānkālapāśena kaṇṭhe baddhaḥ paśuryathā | nāvabudhyata mūḍhātmā maraṇaṃ samupasthitam

जल्दबाज़ी में, गले में काल का फंदा बँधे पशु की तरह, वह मूढ़ सामने खड़ी मृत्यु को नहीं पहचान सका।

श्लोक 36 (4.18.36)

आनीतायां सुरायां तु कृते चान्ने सुसंस्कृते । कीचकः पुनरागम्य सुदेष्णां वाक्यमब्रवीत् ॥

ānītāyāṃ surāyāṃ tu kṛte cānne susaṃskṛte | kīcakaḥ punarāgamya sudeṣṇāṃ vākyamabravīt

सुरा आ जाने और भोजन भली-भाँति तैयार हो जाने पर कीचक फिर आया और सुदेष्णा से बोला —

कीचक उवाच

श्लोक 37 (4.18.37)

मधु मांसं च बहुधा भक्ष्याश्च बहुधा कृताः । सुदेष्णे ब्रूहि सैरन्ध्रीं यथा सा मे गृहं व्रजेत् ॥

madhu māṃsaṃ ca bahudhā bhakṣyāśca bahudhā kṛtāḥ | sudeṣṇe brūhi sairandhrīṃ yathā sā me gṛhaṃ vrajet

"मधु, मांस और अनेक प्रकार के भक्ष्य बहुत मात्रा में तैयार हैं। सुदेष्णे, सैरन्ध्री से कहो कि वह मेरे घर आए —

श्लोक 38 (4.18.38)

केनचित्त्वद्य कार्येण त्वर शीघ्रं मम प्रियम् । अहं हि शरणं देवं प्रतिपद्ये वृषध्वजम् । समागमं मे सैरन्ध्र्या मरणं वा दिशेति वै ॥

kenacittvadya kāryeṇa tvara śīghraṃ mama priyam | ahaṃ hi śaraṇaṃ devaṃ pratipadye vṛṣadhvajam | samāgamaṃ me sairandhryā maraṇaṃ vā diśeti vai

आज किसी काम के बहाने। जल्दी करो, शीघ्र मेरा प्रिय करो। मैं वृषध्वज भगवान की शरण लेता हूँ — वे मुझे या तो सैरन्ध्री का समागम दें या मृत्यु।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 39 (4.18.39)

सा तमाह विनिःश्वस्य प्रतिगच्छ स्वकं गृहम् । एषाऽहमपि सैरन्ध्रीं सुरार्थे तूर्णमादिशे ॥

sā tamāha viniḥśvasya pratigaccha svakaṃ gṛham | eṣā'hamapi sairandhrīṃ surārthe tūrṇamādiśe

उसने निःश्वास लेकर उससे कहा — "अपने घर लौट जाओ। मैं स्वयं सैरन्ध्री को तुरंत सुरा लाने के लिए भेजती हूँ।"

श्लोक 40 (4.18.40)

एवमुक्तस्तु पापात्मा कीचकस्त्वरितः पुनः । स्वगृहं प्राविशत्तूर्णं सैरन्ध्रीगतमानसः ॥

evamuktastu pāpātmā kīcakastvaritaḥ punaḥ | svagṛhaṃ prāviśattūrṇaṃ sairandhrīgatamānasaḥ

यह सुनकर पापी कीचक जल्दी से लौटा और सैरन्ध्री में मन लगाए तुरंत अपने घर में चला गया।

श्लोक 41 (4.18.41)

कीचकं तु गतं ज्ञात्वा त्वरमाणं स्वकं गृहम् । सैरन्ध्रीं तत आहूय सुदेष्णा वाक्यमब्रवीत् ॥

kīcakaṃ tu gataṃ jñātvā tvaramāṇaṃ svakaṃ gṛham | sairandhrīṃ tata āhūya sudeṣṇā vākyamabravīt

कीचक को जल्दी से अपने घर गया जानकर सुदेष्णा ने सैरन्ध्री को बुलाया और कहा —

सुदेष्णोवाच

श्लोक 42 (4.18.42)

गच्छ सैरन्ध्रि मत्प्रीत्यै कीचकस्य निवेशनम् । सुरामानय सुश्रोणि तृषिताऽहं विलासिनि ॥

gaccha sairandhri matprītyai kīcakasya niveśanam | surāmānaya suśroṇi tṛṣitā'haṃ vilāsini

"सैरन्ध्री, मेरी प्रसन्नता के लिए कीचक के घर जाओ। सुन्दरी, सुरा ले आओ; विलासिनी, मुझे प्यास लगी है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 43 (4.18.43)

सुदेष्णयैवमुक्ता सा निःश्वसन्ती नृपात्मजा । अब्रवीच्छोकसन्तप्ता नाहं तत्र व्रजामि वै ॥

sudeṣṇayaivamuktā sā niḥśvasantī nṛpātmajā | abravīcchokasantaptā nāhaṃ tatra vrajāmi vai

सुदेष्णा के ऐसा कहने पर राजकुमारी निःश्वास लेती हुई, शोक से संतप्त होकर बोली — "मैं वहाँ नहीं जाऊँगी।

द्रौपद्युवाच

श्लोक 44 (4.18.44)

सूतपुत्रो हि मां भद्रे कामात्मा चाभिमन्यते । न गच्छेयमहं तस्य राजपुत्रि निवेशनम् । त्वमेव भद्रे जानासि यथा स निरपत्रपः ॥

sūtaputro hi māṃ bhadre kāmātmā cābhimanyate | na gaccheyamahaṃ tasya rājaputri niveśanam | tvameva bhadre jānāsi yathā sa nirapatrapaḥ

भद्रे, वह कामी सूतपुत्र मुझ पर बुरी दृष्टि रखता है। राजकुमारी, मैं उसके घर नहीं जाऊँगी। भद्रे, तुम स्वयं जानती हो कि वह कितना निर्लज्ज है।

श्लोक 45 (4.18.45)

समयश्च कृतो भद्रे यथा प्रथमसंगमे । तथा निवसमानायां यथाऽहं नान्यचारिणी ॥

samayaśca kṛto bhadre yathā prathamasaṃgame | tathā nivasamānāyāṃ yathā'haṃ nānyacāriṇī

भद्रे, हमारी पहली भेंट में यह शर्त भी तय हुई थी कि यहाँ रहते हुए मैं किसी अन्य पुरुष के पास नहीं जाऊँगी।

श्लोक 46 (4.18.46)

कीचकश्च सुकेशान्ते मूढो मदनगर्वितः । स मामिह गतां दृष्ट्वा व्यवस्यति निराकृतिम् । कथं नु वै तत्र गतां मर्षयेन्मामबान्धवाम् ॥

kīcakaśca sukeśānte mūḍho madanagarvitaḥ | sa māmiha gatāṃ dṛṣṭvā vyavasyati nirākṛtim | kathaṃ nu vai tatra gatāṃ marṣayenmāmabāndhavām

सुकेशी, कीचक मूढ़ है और काम के मद में चूर है। मुझे वहाँ आई देखकर वह मेरा अपमान करने पर उतारू हो जाएगा। वहाँ पहुँची मुझ असहाय को वह भला कैसे छोड़ेगा?

श्लोक 47 (4.18.47)

बह्व्यः सन्ति तव प्रेष्या राजपुत्रि वशानुगाः । अन्यां प्रेषय कैकेयि संरक्ष्याऽहमिह त्वया ॥

bahvyaḥ santi tava preṣyā rājaputri vaśānugāḥ | anyāṃ preṣaya kaikeyi saṃrakṣyā'hamiha tvayā

राजकुमारी, तुम्हारी आज्ञा मानने वाली बहुत-सी दासियाँ हैं। कैकेयी, किसी और को भेजो और यहाँ मेरी रक्षा करो।

श्लोक 48 (4.18.48)

कीचकस्यालयं देवि न यामि भयकम्पिता । यद्यदन्यच्च मे कर्म करोमि च सुदुष्करम् ॥

kīcakasyālayaṃ devi na yāmi bhayakampitā | yadyadanyacca me karma karomi ca suduṣkaram

देवी, भय से काँपती हुई मैं कीचक के घर नहीं जाऊँगी। मेरे लिए जो भी दूसरा काम हो, चाहे वह कितना ही कठिन हो, मैं करूँगी।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 49 (4.18.49)

एवमुक्ता तु पाञ्चाल्या दैवयोगेन कैकयी । तां विराटस्य माहिषी क्रुद्धा भूयोऽन्वशासत ॥

evamuktā tu pāñcālyā daivayogena kaikayī | tāṃ virāṭasya māhiṣī kruddhā bhūyo'nvaśāsata

पाञ्चाली के ऐसा कहने पर दैवयोग से विराट की रानी कैकेयी क्रुद्ध हो उठी और उसने फिर आदेश दिया —

सुदेष्णोवाच

श्लोक 50 (4.18.50)

कीचकं चैव गच्छ त्वं बलात्कारेण चोदिता । नास्ति मेऽन्या त्वया तुल्या सा त्वं शीघ्रतरं व्रज ॥

kīcakaṃ caiva gaccha tvaṃ balātkāreṇa coditā | nāsti me'nyā tvayā tulyā sā tvaṃ śīghrataraṃ vraja

"तुम कीचक के पास जाओ — यह आदेश है, चाहे बलपूर्वक ही क्यों न भेजना पड़े। मेरे पास तुम्हारे बराबर दूसरी कोई नहीं, इसलिए तुम शीघ्र जाओ।

श्लोक 51 (4.18.51)

अवश्यं त्वेव गन्तव्यं किमर्थं मां विवक्षसि । शीघ्रं गच्छ त्वरस्वेति मत्प्रीतिवशमाचर ॥

avaśyaṃ tveva gantavyaṃ kimarthaṃ māṃ vivakṣasi | śīghraṃ gaccha tvarasveti matprītivaśamācara

तुम्हें जाना ही होगा। मुझसे बहस क्यों करना चाहती हो? जल्दी जाओ, शीघ्रता करो; मेरी इच्छा के अनुसार चलो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 52 (4.18.52)

न हीदृशो मम भ्राता किं त्वं समभिशङ्कसे । उक्त्वा चैनां बलाच्चैव विनियुज्य प्रभुत्वतः ॥

na hīdṛśo mama bhrātā kiṃ tvaṃ samabhiśaṅkase | uktvā caināṃ balāccaiva viniyujya prabhutvataḥ

मेरा भाई ऐसा नहीं है; तुम उस पर संदेह क्यों करती हो?" — यह कहकर उसने अपने स्वामित्व के बल पर उसे ज़बरदस्ती इस काम पर लगा दिया,

श्लोक 53 (4.18.53)

भाजनं प्रददौ चास्यै सपिधानं हिरण्मयम् । या सुजाता सुगन्धा च तामानय सुरामिति ॥

bhājanaṃ pradadau cāsyai sapidhānaṃ hiraṇmayam | yā sujātā sugandhā ca tāmānaya surāmiti

और उसे ढक्कन वाला सोने का पात्र देते हुए कहा — "जो सुरा सबसे उत्तम और सुगंधित हो, वही लाना।"

श्लोक 54 (4.18.54)

सा शङ्कमाना रुदती वेपन्ती द्रुपदात्मजा । दैवतेभ्यो नमस्कृत्वा श्वशुरेभ्यस्तथाऽब्रवीत् ॥

sā śaṅkamānā rudatī vepantī drupadātmajā | daivatebhyo namaskṛtvā śvaśurebhyastathā'bravīt

आशंकित, रोती और काँपती हुई द्रुपदकुमारी ने देवताओं और अपने श्वशुरों को प्रणाम करके कहा —

द्रौपद्युवाच

श्लोक 55 (4.18.55)

यथाऽहमन्यं पार्थेभ्यो नाभिजानामि मानवम् । तेन सत्येन मां दृष्ट्वा कीचको मा वशं नयेत् ॥

yathā'hamanyaṃ pārthebhyo nābhijānāmi mānavam | tena satyena māṃ dṛṣṭvā kīcako mā vaśaṃ nayet

"यदि मैं कुन्तीपुत्रों के सिवा किसी अन्य पुरुष को नहीं जानती, तो उस सत्य के बल से मुझे देखकर भी कीचक मुझे अपने वश में न कर सके।

श्लोक 56 (4.18.56)

यथाऽहं पाण्डुपुत्रेभ्यः पञ्चभ्यो नान्यगामिनी । तेन सत्येन मां दृष्ट्वा कीचको मा वशं नयेत् ॥

yathā'haṃ pāṇḍuputrebhyaḥ pañcabhyo nānyagāminī | tena satyena māṃ dṛṣṭvā kīcako mā vaśaṃ nayet

यदि मैं पाण्डु के पाँचों पुत्रों के सिवा किसी अन्य के पास नहीं जाती, तो उस सत्य के बल से मुझे देखकर भी कीचक मुझे अपने वश में न कर सके।"

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