विराट पर्व · अध्याय 19
राजसभा में कीचक का द्रौपदी पर पाद-प्रहार
निकलने से पहले द्रौपदी देवताओं का स्मरण करती है और सूर्य की उपासना करती है, जो उसकी रक्षा के लिए एक अदृश्य राक्षस भेजते हैं। अपने घर में कीचक उपहारों और मनुहार से उसका स्वागत करता है; वह उसे ठुकराकर सुरा माँगती है, और जब कीचक उसका हाथ पकड़ता है तो वह छूटकर राजसभा की ओर दौड़ती है, जहाँ कीचक उसे बालों से पकड़कर गिराता है और राजा विराट के सामने लात मारता है, तब तक कि राक्षस उसे दूर पटक देता है। कीचक के वध को उतावले भीम को कंक-वेशधारी युधिष्ठिर फलदार वृक्ष के रूपक से रोक देते हैं, और द्रौपदी विराट से अपनी रक्षा की गुहार लगाती हुई उन्हें राजा के न्यायपूर्ण निर्णय के कर्तव्य का स्मरण कराती है, जैसा कभी ब्रह्मा ने इन्द्र को सिखाया था।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.19.1)
अकीर्तयत सुश्रोणी धर्मं शक्रं दिवाकरम् । मारुतं चाश्विनौ देवौ कुबेरं वरुणं यमम् ॥
akīrtayata suśroṇī dharmaṃ śakraṃ divākaram | mārutaṃ cāśvinau devau kuberaṃ varuṇaṃ yamam
उस सुंदरी ने धर्म, इन्द्र, सूर्य, वायु, दोनों अश्विनीकुमारों, कुबेर, वरुण और यम का,
श्लोक 2 (4.19.2)
रुद्रमग्निं भगं विष्णुं स्कन्दं पूषणमेव च । सावित्रीसहितं चापि ब्रह्माणं पर्यकीर्तयत् ॥
rudramagniṃ bhagaṃ viṣṇuṃ skandaṃ pūṣaṇameva ca | sāvitrīsahitaṃ cāpi brahmāṇaṃ paryakīrtayat
रुद्र, अग्नि, भग, विष्णु, स्कन्द और पूषा का स्मरण किया; और सावित्री सहित ब्रह्मा का भी आवाहन किया।
श्लोक 3 (4.19.3)
इत्येवं मृगशावाक्षी सुश्रोणी धर्मचारिणी । उपातिष्ठत सा सूर्यं मुहूर्तमबला तदा ॥
ityevaṃ mṛgaśāvākṣī suśroṇī dharmacāriṇī | upātiṣṭhata sā sūryaṃ muhūrtamabalā tadā
इस प्रकार सबका स्मरण करके मृगछौने जैसी आँखों वाली, धर्मपरायणा वह असहाय नारी कुछ क्षण सूर्य की उपासना में खड़ी रही।
श्लोक 4 (4.19.4)
तदस्यास्तनुमध्यायाः सर्वं सूर्योऽवबुद्धवान् । अन्तर्हितं ततस्तस्या रक्षो रक्षार्थमादिशत् ॥
tadasyāstanumadhyāyāḥ sarvaṃ sūryo'vabuddhavān | antarhitaṃ tatastasyā rakṣo rakṣārthamādiśat
सूर्य ने उस कृशकटि नारी की सारी स्थिति समझ ली और फिर उसकी रक्षा के लिए एक अदृश्य राक्षस को आदेश दिया।
श्लोक 5 (4.19.5)
तच्चैनां नाजहात्तत्र सर्वावस्थास्वनिन्दिताम् ॥
taccaināṃ nājahāttatra sarvāvasthāsvaninditām
और उस राक्षस ने वहाँ हर स्थिति में उस अनिन्दिता का साथ नहीं छोड़ा।
श्लोक 6 (4.19.6)
प्रतस्थे सा सुकेशान्ता त्वरमाणा पुनःपुनः । विलम्बमाना विवशा कीचकस्य निवेशनम् ॥
pratasthe sā sukeśāntā tvaramāṇā punaḥpunaḥ | vilambamānā vivaśā kīcakasya niveśanam
सुंदर केशों वाली वह विवश होकर कीचक के घर की ओर चली — बार-बार कभी जल्दी करती, कभी ठिठकती हुई।
श्लोक 7 (4.19.7)
तां मृगीमिव वित्रस्तां दृष्ट्वा कृष्णां समागताम् । उत्पपातासनात्तूर्णं नावं लब्ध्वेव पारगः ॥
tāṃ mṛgīmiva vitrastāṃ dṛṣṭvā kṛṣṇāṃ samāgatām | utpapātāsanāttūrṇaṃ nāvaṃ labdhveva pāragaḥ
हरिणी-सी डरी हुई कृष्णा को आई देखकर वह तुरंत आसन से उछल पड़ा, जैसे नदी पार करने वाले को नाव मिल गई हो।
श्लोक 8 (4.19.8)
श्लक्ष्णं चोवाच वाक्यं स कीचकः काममूर्च्छितः । स्वागतं ते सुकेशान्ते सुव्युष्टा रजनी मम ॥
ślakṣṇaṃ covāca vākyaṃ sa kīcakaḥ kāmamūrcchitaḥ | svāgataṃ te sukeśānte suvyuṣṭā rajanī mama
काम से मूर्छित कीचक ने उससे मधुर वाणी में कहा — "सुकेशी, तुम्हारा स्वागत है! मेरी रात सुखद प्रभात में बदल गई है।
कीचक उवाच
श्लोक 9 (4.19.9)
स्वामिनी त्वमनुप्राप्ता चिरस्य भवनं शुभे । कुरुष्व च मयि प्रीतिं वशं चोपानयस्व माम् ॥
svāminī tvamanuprāptā cirasya bhavanaṃ śubhe | kuruṣva ca mayi prītiṃ vaśaṃ copānayasva mām
शुभे, बहुत समय बाद तुम मेरे भवन में स्वामिनी बनकर आई हो। मुझ पर प्रेम करो और मुझे अपने वश में कर लो।
श्लोक 10 (4.19.10)
प्रतिगृह्णीष्व मे भोगांस्त्वदर्थमुपकल्पितान् । सर्वरत्नमयीं मालां कुण्डले च हिरण्मये ॥
pratigṛhṇīṣva me bhogāṃstvadarthamupakalpitān | sarvaratnamayīṃ mālāṃ kuṇḍale ca hiraṇmaye
तुम्हारे लिए जुटाए गए मेरे इन भोगों को स्वीकार करो — सब प्रकार के रत्नों से बनी माला और सोने के दो कुण्डल,
श्लोक 11 (4.19.11)
वासांसि चन्दनं माल्यं धूपशुद्धां च वारुणीम् । प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते विहर त्वं यथेच्छसि । प्रीत्या मे कुरु पद्माक्षि प्रसादं प्रियदर्शने ॥
vāsāṃsi candanaṃ mālyaṃ dhūpaśuddhāṃ ca vāruṇīm | pratigṛhṇīṣva bhadraṃ te vihara tvaṃ yathecchasi | prītyā me kuru padmākṣi prasādaṃ priyadarśane
वस्त्र, चन्दन, मालाएँ और धूप से शुद्ध की हुई वारुणी। इन्हें स्वीकार करो — तुम्हारा कल्याण हो — और जैसे चाहो विहार करो। कमलनयनी, प्रियदर्शने, प्रेमपूर्वक मुझ पर कृपा करो।
श्लोक 12 (4.19.12)
स्वास्तीर्णमस्ति शयनं सितसूक्ष्मोत्तरच्छदम् । अत्रारुह्य मया सार्धं पिबेमां वरवारुणीम् ॥
svāstīrṇamasti śayanaṃ sitasūkṣmottaracchadam | atrāruhya mayā sārdhaṃ pibemāṃ varavāruṇīm
यहाँ अच्छी तरह बिछी सेज है, जिस पर सफ़ेद महीन चादर है। मेरे साथ इस पर चढ़कर यह उत्तम वारुणी पियो।
श्लोक 13 (4.19.13)
भजस्व मां विशालाक्षि भर्ता ते सदृशोस्म्यहम् । उपसर्प वरारोहे मेरुमर्कप्रभा यथा ॥
bhajasva māṃ viśālākṣi bhartā te sadṛśosmyaham | upasarpa varārohe merumarkaprabhā yathā
विशालाक्षी, मुझे स्वीकार करो; मैं तुम्हारे योग्य पति हूँ। वरारोहे, मेरे पास आओ, जैसे सूर्य की प्रभा मेरु पर्वत के पास आती है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (4.19.14)
स मूढः कीचकस्तत्र प्राप्तां राजीवलोचनाम् । अब्रवीद्द्रौपदीं दृष्ट्वा दुरात्मा ह्यात्मसंमतः ॥
sa mūḍhaḥ kīcakastatra prāptāṃ rājīvalocanām | abravīddraupadīṃ dṛṣṭvā durātmā hyātmasaṃmataḥ
उस मूढ़, दुष्ट और आत्ममुग्ध कीचक ने वहाँ आई कमलनयनी द्रौपदी को देखकर ऐसा कहा।
श्लोक 15 (4.19.15)
कीचकेनैवमुक्ता सा द्रौपदी वरवर्णिनी । अब्रवीत्तमनाचारं नेदृशं वक्तुमर्हसि ॥
kīcakenaivamuktā sā draupadī varavarṇinī | abravīttamanācāraṃ nedṛśaṃ vaktumarhasi
कीचक के ऐसा कहने पर सुंदरी द्रौपदी ने उस दुराचारी से कहा — "तुम्हें ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 16 (4.19.16)
नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टुं श्वपचेनेव ब्राह्मणी । गन्तुमिच्छसि दुर्बुद्धे गतिं दुर्गतरान्तराम् ॥
nāhaṃ śakyā tvayā spraṣṭuṃ śvapaceneva brāhmaṇī | gantumicchasi durbuddhe gatiṃ durgatarāntarām
जैसे श्वपच ब्राह्मणी को नहीं छू सकता, वैसे ही तुम मुझे नहीं छू सकते। दुर्बुद्धि, तुम उस मार्ग पर जाना चाहते हो जो और भी दुर्गम गहराइयों में ले जाता है —
श्लोक 17 (4.19.17)
यत्र गच्छन्ति बहवः परदाराभिमर्शकाः । नराः संभिन्नमर्यादाः कीटवच्चाशुभाश्रयाः ॥
yatra gacchanti bahavaḥ paradārābhimarśakāḥ | narāḥ saṃbhinnamaryādāḥ kīṭavaccāśubhāśrayāḥ
जहाँ परस्त्री को छूने वाले, सब मर्यादाएँ तोड़ने वाले बहुत-से लोग जाते हैं और कीड़ों की तरह अशुभ स्थानों में पड़े रहते हैं।
श्लोक 18 (4.19.18)
अप्रैषीन्मां सुराहारीं सुदेष्णा त्वन्निवेशनम् । तस्यै नयिष्ये मदिरां भगिनी तृषिता तव ॥
apraiṣīnmāṃ surāhārīṃ sudeṣṇā tvanniveśanam | tasyai nayiṣye madirāṃ bhaginī tṛṣitā tava
सुदेष्णा ने मुझे सुरा लाने के लिए तुम्हारे घर भेजा है। मैं उनके लिए मदिरा ले जाऊँगी; तुम्हारी बहन प्यासी है।
श्लोक 19 (4.19.19)
पिपासिता च कैकेयी तूर्णं मामादिशत्ततः । दीयतां मे सुरा शीघ्रं सूतपुत्र व्रजाम्यहम् ॥
pipāsitā ca kaikeyī tūrṇaṃ māmādiśattataḥ | dīyatāṃ me surā śīghraṃ sūtaputra vrajāmyaham
कैकेयी प्यासी थीं और उन्होंने तुरंत मुझे भेजा। सूतपुत्र, मुझे जल्दी सुरा दो; मैं जा रही हूँ।"
कीचक उवाच
श्लोक 20 (4.19.20)
अन्या भद्रे हरिष्यन्ति राजपुत्र्याः सुरामिमाम् । किं त्वं यास्यसि कल्याणि मदर्थं त्वमिहागता ॥
anyā bhadre hariṣyanti rājaputryāḥ surāmimām | kiṃ tvaṃ yāsyasi kalyāṇi madarthaṃ tvamihāgatā
"भद्रे, राजकुमारी के लिए यह सुरा दूसरी स्त्रियाँ ले जाएँगी। कल्याणी, तुम क्यों जाओगी? तुम तो मेरे लिए यहाँ आई हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (4.19.21)
इत्युक्त्वा दक्षिणे पाणौ सूतपुत्रः परामृशत् । सा गृहीता विधून्वन्ती भूमौ निक्षिप्य भाजनम् । सभां शरणमाधावद्यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥
ityuktvā dakṣiṇe pāṇau sūtaputraḥ parāmṛśat | sā gṛhītā vidhūnvantī bhūmau nikṣipya bhājanam | sabhāṃ śaraṇamādhāvadyatra rājā yudhiṣṭhiraḥ
यह कहकर सूतपुत्र ने उसका दाहिना हाथ पकड़ लिया। पकड़ी जाने पर उसने झटककर हाथ छुड़ाया, पात्र भूमि पर फेंक दिया और शरण के लिए उस सभा की ओर दौड़ी जहाँ राजा युधिष्ठिर थे।
श्लोक 22 (4.19.22)
तां कीचकः प्रधावन्तीं केशपक्षे परामृशत् । पातयित्वा तु तां भूमौ सूतपुत्रः पदाऽवधीत् ॥
tāṃ kīcakaḥ pradhāvantīṃ keśapakṣe parāmṛśat | pātayitvā tu tāṃ bhūmau sūtaputraḥ padā'vadhīt
दौड़ती हुई उसे कीचक ने बालों से पकड़ लिया; उसे भूमि पर गिराकर सूतपुत्र ने लात मारी —
श्लोक 23 (4.19.23)
सभायां पश्यतो राज्ञो विराटस्य महात्मनः । ब्राह्मणानां च वृद्धानां क्षत्रियाणां च पश्यतां ॥
sabhāyāṃ paśyato rājño virāṭasya mahātmanaḥ | brāhmaṇānāṃ ca vṛddhānāṃ kṣatriyāṇāṃ ca paśyatāṃ
सभा में, महात्मा राजा विराट के देखते-देखते, और वृद्ध ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के देखते-देखते।
श्लोक 24 (4.19.24)
तस्याः पादाभितप्ताया मुखाद्रुधिरमास्रवत् ॥
tasyāḥ pādābhitaptāyā mukhādrudhiramāsravat
पैर के प्रहार से आहत उसके मुँह से रक्त बहने लगा।
श्लोक 25 (4.19.25)
ततो दिवाकरेणाशु राक्षसः संनियोजितः । स कीचकमपोवाह वातवेगेन भारत ॥
tato divākareṇāśu rākṣasaḥ saṃniyojitaḥ | sa kīcakamapovāha vātavegena bhārata
भारत, तब सूर्य द्वारा नियुक्त राक्षस ने तुरंत आँधी के वेग से कीचक को दूर धकेल दिया।
श्लोक 26 (4.19.26)
स पपात तदा भूमौ रक्षोबलसमीरितः । विघूर्णमानो निश्चेष्टश्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥
sa papāta tadā bhūmau rakṣobalasamīritaḥ | vighūrṇamāno niśceṣṭaśchinnamūla iva drumaḥ
राक्षस के बल से धकेला गया वह भूमि पर गिर पड़ा — चकराता हुआ और निश्चेष्ट, जड़ से कटे वृक्ष की तरह।
श्लोक 27 (4.19.27)
तां दृष्ट्वा तत्र ते सभ्या हाहाभूताः समन्ततः । न युक्तं सूतपुत्रेति कीचकेति च तेऽवदन् । किमियं वध्यते बाला कृपणा चाप्यबान्धवा ॥
tāṃ dṛṣṭvā tatra te sabhyā hāhābhūtāḥ samantataḥ | na yuktaṃ sūtaputreti kīcaketi ca te'vadan | kimiyaṃ vadhyate bālā kṛpaṇā cāpyabāndhavā
उसे देखकर सभासद चारों ओर हाहाकार करने लगे। वे बोले — "सूतपुत्र, यह उचित नहीं! कीचक, यह उचित नहीं! इस बेचारी, असहाय बाला को क्यों मारा जा रहा है?"
श्लोक 28 (4.19.28)
तस्यामासन्हि ते पार्थाः सभायां भ्रातरस्तथा । अमृष्यमाणाः कृष्णायाः कीचकेन पदा वधं ॥
tasyāmāsanhi te pārthāḥ sabhāyāṃ bhrātarastathā | amṛṣyamāṇāḥ kṛṣṇāyāḥ kīcakena padā vadhaṃ
उस सभा में पृथा के पुत्र, वे भाई, बैठे थे, जो कीचक द्वारा कृष्णा पर किए गए पाद-प्रहार को सह नहीं पा रहे थे।
श्लोक 29 (4.19.29)
तां दृष्ट्वा भीमसेनस्य क्रोधादास्रमवर्तत । धूमोच्छ्वासः समभवन्नेत्रे चोच्छ्रितपक्ष्मणी । सस्वेदा भ्रुकुटी चोग्रा ललाटे समवर्तत ॥
tāṃ dṛṣṭvā bhīmasenasya krodhādāsramavartata | dhūmocchvāsaḥ samabhavannetre cocchritapakṣmaṇī | sasvedā bhrukuṭī cogrā lalāṭe samavartata
उसे देखकर भीमसेन की आँखों में क्रोध के आँसू भर आए। उनकी साँस धुएँ-सी निकलने लगी, पलकें तन गईं, और माथे पर पसीने से भीगी भयंकर भौंहें चढ़ गईं।
श्लोक 30 (4.19.30)
तस्य भीमो वधप्रेप्सुः कीचकस्य दुरात्मनः । दन्तैर्दन्तांस्तदा रोषान्निष्पिपेष महामनाः ॥
tasya bhīmo vadhaprepsuḥ kīcakasya durātmanaḥ | dantairdantāṃstadā roṣānniṣpipeṣa mahāmanāḥ
दुष्ट कीचक का वध करने को आतुर महामना भीम क्रोध से दाँत पीसने लगे।
श्लोक 31 (4.19.31)
भूयः संचरितः क्रुद्धः सहसोत्थाय चासनात् । निरैक्षत द्रुमं दीर्घं राजानं चाप्यवैक्षत ॥
bhūyaḥ saṃcaritaḥ kruddhaḥ sahasotthāya cāsanāt | niraikṣata drumaṃ dīrghaṃ rājānaṃ cāpyavaikṣata
फिर क्रोध से उत्तेजित होकर वे सहसा आसन से उठे, एक ऊँचे वृक्ष की ओर देखा और राजा की ओर भी देखा।
श्लोक 32 (4.19.32)
वधमाकाङ्क्षमाणं तं कीचकस्य दुरात्मनः । आकारेणैव भीमं स प्रत्यषेधद्युधिष्ठिरः ॥
vadhamākāṅkṣamāṇaṃ taṃ kīcakasya durātmanaḥ | ākāreṇaiva bhīmaṃ sa pratyaṣedhadyudhiṣṭhiraḥ
दुष्ट कीचक के वध की इच्छा रखने वाले भीम को युधिष्ठिर ने केवल संकेत भरी मुद्रा से रोक दिया।
श्लोक 33 (4.19.33)
तस्य राजा शनैः संज्ञां कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । चकार भीमसेनस्य रोषाविष्टस्य धीमतः ॥
tasya rājā śanaiḥ saṃjñāṃ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | cakāra bhīmasenasya roṣāviṣṭasya dhīmataḥ
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने क्रोध से भरे बुद्धिमान भीमसेन को धीरे से संकेत किया।
श्लोक 34 (4.19.34)
प्रत्याख्यानं तदा चाह कङ्को नाम युधिष्ठिरः ॥
pratyākhyānaṃ tadā cāha kaṅko nāma yudhiṣṭhiraḥ
तब कंक नाम धारण किए युधिष्ठिर ने उन्हें रोकते हुए कहा —
कङ्क उवाच
श्लोक 35 (4.19.35)
सूद मा साहसं कार्षीः फलितोऽयं वनस्पतिः । नात्र शुष्काणि काष्ठानि सन्ति यानि च कानि च ॥
sūda mā sāhasaṃ kārṣīḥ phalito'yaṃ vanaspatiḥ | nātra śuṣkāṇi kāṣṭhāni santi yāni ca kāni ca
"रसोइये, दुस्साहस मत करो। यह वृक्ष फलों से लदा है। यहाँ कोई भी सूखी लकड़ी नहीं है।
श्लोक 36 (4.19.36)
यदि ते दारुकृत्यं स्यान्निष्क्रम्य नगराद्बहिः । समूलं शातयेर्वृक्षं श्रमस्ते न भविष्यति ॥
yadi te dārukṛtyaṃ syānniṣkramya nagarādbahiḥ | samūlaṃ śātayervṛkṣaṃ śramaste na bhaviṣyati
यदि तुम्हें लकड़ी चाहिए तो नगर से बाहर जाकर किसी वृक्ष को जड़ समेत काट लो; तुम्हें कोई परिश्रम नहीं होगा।
श्लोक 37 (4.19.37)
यस्य चार्द्रस्य वृक्षस्य शीतच्छायां समाश्रयेत् । न तस्य पर्णे द्रुह्येत पूर्ववृत्तमनुस्मरन् ॥
yasya cārdrasya vṛkṣasya śītacchāyāṃ samāśrayet | na tasya parṇe druhyeta pūrvavṛttamanusmaran
जिस हरे वृक्ष की शीतल छाया में आश्रय लिया हो, उसके पहले के उपकार को याद करके उसके एक पत्ते का भी अहित नहीं करना चाहिए।
श्लोक 38 (4.19.38)
न क्रोधकालसमयः सूद मा चापलं कृथाः । अपूर्णोऽयं द्विपक्षोनो नेदं बलवतां बहु ॥
na krodhakālasamayaḥ sūda mā cāpalaṃ kṛthāḥ | apūrṇo'yaṃ dvipakṣono nedaṃ balavatāṃ bahu
रसोइये, यह क्रोध का समय नहीं है; चपलता मत करो। हमारे ये दो पखवाड़े अभी पूरे नहीं हुए हैं; बलवानों के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 39 (4.19.39)
अथाङ्गुष्ठेनावमृद्नादङ्गुष्ठं तत्र धर्मराट् । प्रबोधनभयाद्राज्ञो भीमं तं प्रत्यषेधयत् ॥
athāṅguṣṭhenāvamṛdnādaṅguṣṭhaṃ tatra dharmarāṭ | prabodhanabhayādrājño bhīmaṃ taṃ pratyaṣedhayat
तब धर्मराज ने अपने अँगूठे से उनका अँगूठा दबाया और राजा पर भेद खुल जाने के भय से भीम को रोक दिया।
श्लोक 40 (4.19.40)
भीमसेनस्तु तद्वाक्यं श्रुत्वा परपुरञ्जयः । सहसोत्पतितं क्रोधं न्ययच्छद्धृतिमान्बलात् । इङ्गितज्ञः स तु भ्रातुस्तूष्णीमासीद्वृकोदरः ॥
bhīmasenastu tadvākyaṃ śrutvā parapurañjayaḥ | sahasotpatitaṃ krodhaṃ nyayacchaddhṛtimānbalāt | iṅgitajñaḥ sa tu bhrātustūṣṇīmāsīdvṛkodaraḥ
वे वचन सुनकर शत्रु-नगरों को जीतने वाले धैर्यवान भीमसेन ने सहसा उमड़े क्रोध को बलपूर्वक रोक लिया; भाई के संकेत समझने वाले वृकोदर चुप हो गए।
श्लोक 41 (4.19.41)
भीमस्य च समारम्भं दृष्ट्वा राज्ञोऽस्य चेष्टितम् । द्रौपदी चाधिकं क्रोधात्प्रारुदत्सा पुनःपुनः ॥
bhīmasya ca samārambhaṃ dṛṣṭvā rājño'sya ceṣṭitam | draupadī cādhikaṃ krodhātprārudatsā punaḥpunaḥ
भीम का उठना और राजा की यह चेष्टा देखकर द्रौपदी क्रोध से और भी अधिक, बार-बार रोने लगी।
श्लोक 42 (4.19.42)
कीचकेनानुगमनात्कृष्णा ताम्रायतेक्षणा । सभाद्वारमुपगम्य रुदन्ती वाक्यमब्रवीत् ॥
kīcakenānugamanātkṛṣṇā tāmrāyatekṣaṇā | sabhādvāramupagamya rudantī vākyamabravīt
कीचक के पीछा करने से जिसकी बड़ी-बड़ी आँखें लाल हो गई थीं, वह कृष्णा सभा के द्वार पर आई और रोती हुई बोली —
श्लोक 43 (4.19.43)
अवेक्षमाणा सुश्रोणी पतींस्तान्दीनचेतसः । आकारं परिरक्षन्ती प्रतिज्ञां धर्मसंयुताम् । दह्यमानेव रौद्रेण चक्षुषा द्रुपदात्मजा ॥
avekṣamāṇā suśroṇī patīṃstāndīnacetasaḥ | ākāraṃ parirakṣantī pratijñāṃ dharmasaṃyutām | dahyamāneva raudreṇa cakṣuṣā drupadātmajā
अपने दुःखी पतियों की ओर देखती हुई, अपना वेश और धर्म से बँधी प्रतिज्ञा बचाए रखती हुई, सुंदरी द्रुपदकुमारी मानो अपनी रौद्र दृष्टि से जलाती हुई बोली —
द्रौपद्युवाच
श्लोक 44 (4.19.44)
प्रजारक्षणशीलानां राज्ञां ह्यमिततेजसाम् । कार्याऽनुपालनं नित्यं धर्मे सत्ये च तिष्ठताम् ॥
prajārakṣaṇaśīlānāṃ rājñāṃ hyamitatejasām | kāryā'nupālanaṃ nityaṃ dharme satye ca tiṣṭhatām
"प्रजा की रक्षा करना जिनका स्वभाव है, जो धर्म और सत्य में स्थित हैं, उन अपार तेजस्वी राजाओं का नित्य कर्तव्य है कि वे हर मामले में न्याय करें —
श्लोक 45 (4.19.45)
स्वप्रजायां प्रजायां च विशेषं नाधिगच्छताम् । प्रियेष्वपि च वध्येषु समत्वं ये समाश्रिताः ॥
svaprajāyāṃ prajāyāṃ ca viśeṣaṃ nādhigacchatām | priyeṣvapi ca vadhyeṣu samatvaṃ ye samāśritāḥ
ऐसे राजा, जो अपने लोगों और दूसरी प्रजा में भेद नहीं करते, और जो प्रियजनों तथा दण्ड के योग्य लोगों के प्रति भी समभाव रखते हैं।
श्लोक 46 (4.19.46)
विवादेषु प्रवृत्तेषु समं कार्यानुदर्शिना । राज्ञा धर्मासनस्थेन जितौ लोकावुभावपि ॥
vivādeṣu pravṛtteṣu samaṃ kāryānudarśinā | rājñā dharmāsanasthena jitau lokāvubhāvapi
विवाद उठने पर न्याय के आसन पर बैठा जो राजा निष्पक्ष होकर मामले को देखता है, वह दोनों लोकों को जीत लेता है।
श्लोक 47 (4.19.47)
राजन्धर्मासनस्थो हि रक्ष मां त्वमनागसम् ॥
rājandharmāsanastho hi rakṣa māṃ tvamanāgasam
राजन्, तुम न्याय के आसन पर बैठे हो; मुझ निर्दोष की रक्षा करो।
श्लोक 48 (4.19.48)
अहं त्वनपराध्यन्ती कीचकेन दुरात्मना । पश्यतस्ते महाराज हता पादेन दासिवत् ॥
ahaṃ tvanaparādhyantī kīcakena durātmanā | paśyataste mahārāja hatā pādena dāsivat
महाराज, मैंने कोई अपराध नहीं किया था, फिर भी दुष्ट कीचक ने तुम्हारे देखते-देखते मुझे दासी की तरह लात मारी।
श्लोक 49 (4.19.49)
त्वत्समक्षं नृपश्रेष्ठ निष्पिष्टा वसुधातले । अनागसं कृपार्हां मां स्त्रियं त्वं परिपालय ॥
tvatsamakṣaṃ nṛpaśreṣṭha niṣpiṣṭā vasudhātale | anāgasaṃ kṛpārhāṃ māṃ striyaṃ tvaṃ paripālaya
नृपश्रेष्ठ, तुम्हारे सामने ही मुझे धरती पर रौंदा गया। मुझ निर्दोष और दया की पात्र स्त्री की रक्षा करो।
श्लोक 50 (4.19.50)
रक्ष मां कीचकाद्भीतां धर्मं रक्ष नरेश्वर । मत्स्याधिप प्रजा रक्ष पिता पुत्रानिवौरसान् ॥
rakṣa māṃ kīcakādbhītāṃ dharmaṃ rakṣa nareśvara | matsyādhipa prajā rakṣa pitā putrānivaurasān
नरेश्वर, कीचक से डरी हुई मेरी रक्षा करो, धर्म की रक्षा करो। मत्स्यराज, जैसे पिता अपने औरस पुत्रों की रक्षा करता है, वैसे ही प्रजा की रक्षा करो।
श्लोक 51 (4.19.51)
यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात्मा कुरुते नृपः । अचिरात्तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ॥
yastvadharmeṇa kāryāṇi mohātmā kurute nṛpaḥ | acirāttaṃ durātmānaṃ vaśe kurvanti śatravaḥ
जो मोहग्रस्त राजा अधर्म से कार्य करता है, उस दुष्ट को शत्रु शीघ्र ही अपने वश में कर लेते हैं।
श्लोक 52 (4.19.52)
मत्स्यानां कुलजस्त्वं हि तेषां सत्यं परायणम् । त्वं किलैवंविधो जातः कुले धर्मपरायणे ॥
matsyānāṃ kulajastvaṃ hi teṣāṃ satyaṃ parāyaṇam | tvaṃ kilaivaṃvidho jātaḥ kule dharmaparāyaṇe
तुम मत्स्यों के कुल में जन्मे हो, जिनके लिए सत्य ही परम आश्रय है; कहते हैं कि तुम धर्मपरायण कुल में ऐसे ही गुणों के साथ जन्मे हो।
श्लोक 53 (4.19.53)
अतस्त्वाहमभिक्रन्दे शरणार्थं नराधिप । त्राहि मामद्य राजेन्द्र कीचकात्पापपूरुषात् ॥
atastvāhamabhikrande śaraṇārthaṃ narādhipa | trāhi māmadya rājendra kīcakātpāpapūruṣāt
इसलिए नराधिप, मैं शरण के लिए तुम्हें पुकारती हूँ। राजेन्द्र, आज मुझे उस पापी कीचक से बचाओ।
श्लोक 54 (4.19.54)
अनाथामिह मां ज्ञात्वा कीचकः पुरुषाधमः । प्रहरत्येव नीचात्मा न तु धर्ममवेक्षते ॥
anāthāmiha māṃ jñātvā kīcakaḥ puruṣādhamaḥ | praharatyeva nīcātmā na tu dharmamavekṣate
यहाँ मुझे अनाथ जानकर पुरुषों में अधम, नीच कीचक मुझ पर प्रहार ही करता है और धर्म की ओर नहीं देखता।
श्लोक 55 (4.19.55)
अकार्याणामनारम्भात्कार्याणामनुपालनात् । प्रजासु ये सुवृत्तास्ते स्वर्गमायान्ति भूमिपाः ॥
akāryāṇāmanārambhātkāryāṇāmanupālanāt | prajāsu ye suvṛttāste svargamāyānti bhūmipāḥ
जो राजा न करने योग्य काम नहीं करते, करने योग्य कामों को निभाते हैं और प्रजा के प्रति सदाचार रखते हैं, वे स्वर्ग जाते हैं।
श्लोक 56 (4.19.56)
कार्याकार्यविशेषज्ञाः कामकारेण पार्थिवाः । प्रजासु किल्बिषं कृत्वा नरकं यान्त्यधोमुखाः ॥
kāryākāryaviśeṣajñāḥ kāmakāreṇa pārthivāḥ | prajāsu kilbiṣaṃ kṛtvā narakaṃ yāntyadhomukhāḥ
जो राजा कर्तव्य और अकर्तव्य का भेद जानते हुए भी मनमाने ढंग से प्रजा के साथ अन्याय करते हैं, वे औंधे मुँह नरक में जाते हैं।
श्लोक 57 (4.19.57)
नैव यज्ञैर्न वा दानैर्न गुरोरुपसेवनात् । प्राप्नुवन्ति तथा धर्मं यथा कार्यानुपालनात् ॥
naiva yajñairna vā dānairna gurorupasevanāt | prāpnuvanti tathā dharmaṃ yathā kāryānupālanāt
न यज्ञों से, न दानों से, न गुरु-सेवा से राजाओं को उतना धर्म मिलता है जितना न्याय-कार्य के पालन से।
श्लोक 58 (4.19.58)
अपि चेदं पुरा ब्रह्मा प्रोवाचेन्द्राय पृच्छते । द्वन्द्वं कार्यमकार्यं च लोके चासीत्परं यथा ॥
api cedaṃ purā brahmā provācendrāya pṛcchate | dvandvaṃ kāryamakāryaṃ ca loke cāsītparaṃ yathā
और पूर्वकाल में पूछने पर ब्रह्मा ने इन्द्र से यह भी कहा था कि संसार में कर्तव्य और अकर्तव्य का द्वन्द्व किस प्रकार सर्वोपरि था;
श्लोक 59 (4.19.59)
धर्माधर्मौ पुनर्द्वन्द्वं विनियुक्तमथापि वा । क्रियाणामक्रियाणां च प्रापणे पुण्यपापयोः ॥
dharmādharmau punardvandvaṃ viniyuktamathāpi vā | kriyāṇāmakriyāṇāṃ ca prāpaṇe puṇyapāpayoḥ
और फिर किस प्रकार धर्म और अधर्म का द्वन्द्व नियत किया गया, तथा करना और न करना, जो पुण्य और पाप तक पहुँचाते हैं।
श्लोक 60 (4.19.60)
प्रजायां सृज्यमानायां पुरा ह्येतदुदाहृतम् । एतद्वो मानुषाः सम्यक्कार्यं द्वन्द्वत्रयं भुवि ॥
prajāyāṃ sṛjyamānāyāṃ purā hyetadudāhṛtam | etadvo mānuṣāḥ samyakkāryaṃ dvandvatrayaṃ bhuvi
जब प्रजा की सृष्टि हो रही थी, तभी पहले यह कहा गया था — 'मनुष्यो, पृथ्वी पर तुम्हें इन तीन द्वन्द्वों का भली-भाँति पालन करना है।'
श्लोक 61 (4.19.61)
अस्मिन्सुनीते दुर्नीते लभते कर्मजं फलम् । कल्याणकारी कल्याणं पापकारी च पापकम् ॥
asminsunīte durnīte labhate karmajaṃ phalam | kalyāṇakārī kalyāṇaṃ pāpakārī ca pāpakam
इसका संचालन अच्छा हो या बुरा, मनुष्य को कर्म से उत्पन्न फल मिलता है — भला करने वाले को भला और पाप करने वाले को पाप।
श्लोक 62 (4.19.62)
तेन गच्छति संसर्गं स्वर्गाय नरकाय वा । सुकृतं दुष्कृतं वाऽपि कृत्वा मोहेन मानवः । पश्चात्तापेन तप्येत स्वबुद्ध्या मरणं गतः ॥
tena gacchati saṃsargaṃ svargāya narakāya vā | sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ vā'pi kṛtvā mohena mānavaḥ | paścāttāpena tapyeta svabuddhyā maraṇaṃ gataḥ
उसी से मनुष्य स्वर्ग या नरक से जुड़ता है। मोहवश अच्छा या बुरा कर्म करके, अपनी ही बुद्धि से मृत्यु को प्राप्त मनुष्य पछतावे से संतप्त होता है।
श्लोक 63 (4.19.63)
एवमुक्त्वा परं वाक्यं विससर्ज शतक्रतुम् । शक्रोप्यापृच्छ्य ब्रह्माणं देवराज्यमपालयत् ॥
evamuktvā paraṃ vākyaṃ visasarja śatakratum | śakropyāpṛcchya brahmāṇaṃ devarājyamapālayat
ये श्रेष्ठ वचन कहकर ब्रह्मा ने शतक्रतु को विदा किया; और इन्द्र भी ब्रह्मा से विदा लेकर देवताओं का राज्य चलाने लगे।
श्लोक 64 (4.19.64)
यथोक्तं देवराजेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना । तथा त्वमपि राजेन्द्र कार्याकार्ये स्थिरो भव ॥
yathoktaṃ devarājena brahmaṇā parameṣṭhinā | tathā tvamapi rājendra kāryākārye sthiro bhava
जैसा परमेष्ठी ब्रह्मा ने देवराज से कहा था, वैसे ही राजेन्द्र, तुम भी कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में दृढ़ रहो।"