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विराट पर्व · अध्याय 20

द्रौपदी का विराट को उलाहना; युधिष्ठिर का उसे लौटाना

बलशाली कीचक को दण्ड देने में असमर्थ विराट उसे केवल मीठे वचनों से शान्त करता है। तब द्रौपदी राजा और सभासदों को उलाहना देती है कि वे दोषी को दण्ड देने और असहायों की रक्षा करने के राजधर्म से चूक गए, और विलाप करती है कि उसके वीर पति उसे लात खाते देखकर भी सह रहे हैं। सभासद उसकी और उसके शुभ लक्षणों की प्रशंसा करते हैं; संन्यासी के वेश में युधिष्ठिर उसे धैर्य और क्षमा का उपदेश देकर सुदेष्णा के भवन में भेज देते हैं। वहाँ वह रानी को बताती है कि कीचक ने उसे मारा, उसके गन्धर्व पतियों के हाथों कीचक की मृत्यु की भविष्यवाणी करती है, और व्रत लेती है कि उसके मारे जाने तक वह न स्नान करेगी, न भोजन।

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.20.1)

एवं विलपमानायां पाञ्चाल्यां मत्स्यपुङ्गवः । अशक्तः कीचकं तत्र शासितुं बलदर्पितम् । विराटराजः सूतं तु सान्त्वेनैव न्यवारयत् ॥

evaṃ vilapamānāyāṃ pāñcālyāṃ matsyapuṅgavaḥ | aśaktaḥ kīcakaṃ tatra śāsituṃ baladarpitam | virāṭarājaḥ sūtaṃ tu sāntvenaiva nyavārayat

जब पांचालराजकुमारी इस प्रकार विलाप कर रही थी, तब मत्स्यों में श्रेष्ठ राजा विराट बल के घमण्ड में चूर कीचक को वहाँ दण्ड न दे सके; उन्होंने उस सूत को केवल मीठे वचनों से रोक दिया।

श्लोक 2 (4.20.2)

कीचकं मत्स्यराजेन कृतागसमनिन्दिता । नापराधानुरूपेण दण्डेन प्रतिपादितम् ॥

kīcakaṃ matsyarājena kṛtāgasamaninditā | nāparādhānurūpeṇa daṇḍena pratipāditam

उस निर्दोष स्त्री ने देखा कि मत्स्यराज ने अपराधी कीचक को उसके अपराध के अनुरूप दण्ड नहीं दिया।

श्लोक 3 (4.20.3)

पाञ्चालराजस्य सुता दृष्ट्वा सुरसुतोपमा । धर्मज्ञा व्यवहाराणां कीचके कृतकिल्बिषे । पुनः प्रोवाच राजानं स्मरन्ती धर्ममुत्तमम् ॥

pāñcālarājasya sutā dṛṣṭvā surasutopamā | dharmajñā vyavahārāṇāṃ kīcake kṛtakilbiṣe | punaḥ provāca rājānaṃ smarantī dharmamuttamam

देवकन्या के समान सुन्दर, व्यवहार (न्याय) के धर्म को जानने वाली पांचालराज की पुत्री ने कीचक को अपराधी देखकर उत्तम धर्म का स्मरण करते हुए राजा से फिर कहा।

श्लोक 4 (4.20.4)

संप्रेक्ष्य च वरारोहा सर्वांस्तत्र सभासदः । राजानुवर्तनपरान्कीचकं च कृतागसम् । विराटं चाह पाञ्चाली दुःखेनाविष्टचेतना ॥

saṃprekṣya ca varārohā sarvāṃstatra sabhāsadaḥ | rājānuvartanaparānkīcakaṃ ca kṛtāgasam | virāṭaṃ cāha pāñcālī duḥkhenāviṣṭacetanā

सुन्दरी पांचाली ने वहाँ बैठे सब सभासदों को, जो केवल राजा की हाँ में हाँ मिलाने में लगे थे, और अपराधी कीचक को देखा, और दुःख से व्याकुल चित्त होकर विराट से कहा —

द्रौपद्युवाच

श्लोक 5 (4.20.5)

न राजन्राजवत्किंचित्समाचरसि कीचके । दस्यूनामिव ते धर्मो न सत्सु परिवर्तते ॥

na rājanrājavatkiṃcitsamācarasi kīcake | dasyūnāmiva te dharmo na satsu parivartate

"हे राजन्! कीचक के विषय में आप राजा के योग्य कुछ भी आचरण नहीं कर रहे। आपका धर्म लुटेरों जैसा है; सज्जनों के बीच वह नहीं टिकता।

श्लोक 6 (4.20.6)

न कीचकः स्वधर्मस्थो न च मत्स्यः कथंचन । सभासदोऽप्यधर्मज्ञा य इमं पर्युपासते ॥

na kīcakaḥ svadharmastho na ca matsyaḥ kathaṃcana | sabhāsado'pyadharmajñā ya imaṃ paryupāsate

न कीचक अपने धर्म में स्थित है, न मत्स्यराज ही किसी प्रकार; और जो सभासद ऐसे व्यक्ति की सेवा में बैठे हैं, वे भी धर्म नहीं जानते।

श्लोक 7 (4.20.7)

न धर्मं कीचको वेत्ति राजभृत्यास्तथैव च । न राजा विनयं ब्रूते अमात्याश्च न जानते ॥

na dharmaṃ kīcako vetti rājabhṛtyāstathaiva ca | na rājā vinayaṃ brūte amātyāśca na jānate

न कीचक धर्म जानता है, न राजा के सेवक; राजा मर्यादा की बात नहीं कहते और मन्त्री भी उसे नहीं समझते।

श्लोक 8 (4.20.8)

नोपालभे त्वां नृपते विराटं नृपसंसदि । नाहमेतेन युक्ता वै हन्तुं मात्स्य तवान्तिके ॥

nopālabhe tvāṃ nṛpate virāṭaṃ nṛpasaṃsadi | nāhametena yuktā vai hantuṃ mātsya tavāntike

हे राजा विराट! मैं राजाओं की इस सभा में आपको दोष नहीं देती; हे मत्स्यराज, आपके सामने इस (कीचक) को मार डालना मेरे वश में नहीं है।

श्लोक 9 (4.20.9)

सभासदस्तु पश्यन्तु कीचकं धर्मलङ्घिनम् । विराटनृपते पश्य मामनाथामनागसम् ॥

sabhāsadastu paśyantu kīcakaṃ dharmalaṅghinam | virāṭanṛpate paśya māmanāthāmanāgasam

पर सभासद धर्म का उल्लंघन करने वाले कीचक को देखें। हे राजा विराट! मुझ अनाथ और निरपराध को देखिए।

श्लोक 10 (4.20.10)

न साम फलते दुष्टे दुष्टे दण्डः प्रयुज्यते ॥

na sāma phalate duṣṭe duṣṭe daṇḍaḥ prayujyate

दुष्ट के साथ समझाने-बुझाने का कोई फल नहीं होता; दुष्ट पर तो दण्ड का ही प्रयोग किया जाता है।

श्लोक 11 (4.20.11)

अदण्ड्यान्दण्डयन्राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन् । स राजा न भवेल्लोके राजशब्दस्य भाजनम् ॥

adaṇḍyāndaṇḍayanrājā daṇḍyāṃścaivāpyadaṇḍayan | sa rājā na bhavelloke rājaśabdasya bhājanam

जो राजा दण्ड के अयोग्य को दण्ड देता है और दण्ड के योग्य को छोड़ देता है, वह संसार में "राजा" कहलाने का पात्र नहीं होता।

श्लोक 12 (4.20.12)

दीनान्धकृपणाशक्तपङ्गुकुब्जजडादिकान् । अनाथबालवृद्धांश्च पुरुषान्वा स्त्रियोऽपि वा । दुष्टचोराभिभूतांश्च पालयेदवनीपतिः ॥

dīnāndhakṛpaṇāśaktapaṅgukubjajaḍādikān | anāthabālavṛddhāṃśca puruṣānvā striyo'pi vā | duṣṭacorābhibhūtāṃśca pālayedavanīpatiḥ

पृथ्वीपति को दीनों, अन्धों, दरिद्रों, असमर्थों, लँगड़ों, कुबड़ों, जड़बुद्धि आदि की; अनाथों, बालकों और वृद्धों की, चाहे वे पुरुष हों या स्त्रियाँ; और दुष्टों तथा चोरों से सताए हुए लोगों की रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 13 (4.20.13)

अनाथानां च नाथः स्यादपितॄणां पिता नृपः । माता भवेदमातॄणामगुरूणां गुरुर्भवेत् । अगतीनां गती राजा नृणां राजा परायणम् ॥

anāthānāṃ ca nāthaḥ syādapitṝṇāṃ pitā nṛpaḥ | mātā bhavedamātṝṇāmagurūṇāṃ gururbhavet | agatīnāṃ gatī rājā nṛṇāṃ rājā parāyaṇam

राजा अनाथों का नाथ, पितृहीनों का पिता, मातृहीनों की माता और गुरुहीनों का गुरु बने। जिनका कोई सहारा नहीं, उनका सहारा राजा है; राजा ही मनुष्यों का परम आश्रय है।

श्लोक 14 (4.20.14)

विशेषतः परैर्दुष्टैः परामृष्टां नरोत्तमः । स्त्रियं साध्वीमनाथां च पालयेत्स्वसुतामिव ॥

viśeṣataḥ parairduṣṭaiḥ parāmṛṣṭāṃ narottamaḥ | striyaṃ sādhvīmanāthāṃ ca pālayetsvasutāmiva

विशेष रूप से, श्रेष्ठ पुरुष (राजा) को दुष्ट परायों द्वारा सताई गई साध्वी, अनाथ स्त्री की अपनी पुत्री के समान रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 15 (4.20.15)

त्वद्गृहावसतिं राजन्नेतावत्कालपर्ययम् । अधिकां त्वत्सुतायाश्च पश्य मां कीचकाहतां ॥

tvadgṛhāvasatiṃ rājannetāvatkālaparyayam | adhikāṃ tvatsutāyāśca paśya māṃ kīcakāhatāṃ

हे राजन्! मैं इतने समय से आपके घर में रह रही हूँ, आपकी पुत्री से भी बढ़कर। देखिए, कीचक ने मुझे मारा है।"

विराट उवाच

श्लोक 16 (4.20.16)

परोक्षं नाभिजानामि विग्रहं युवयोरहम् । अर्थतत्त्वमविज्ञाय किं स्यादकुशलं मम ॥

parokṣaṃ nābhijānāmi vigrahaṃ yuvayoraham | arthatattvamavijñāya kiṃ syādakuśalaṃ mama

"तुम दोनों के बीच का झगड़ा मेरी आँखों से ओझल हुआ, मैं उसे नहीं जानता। बात की असलियत जाने बिना मेरा क्या दोष हो सकता है?"

द्रौपद्युवाच

श्लोक 17 (4.20.17)

येषां न वैरी स्वपिति पदा भूमिमुपस्पृशन् । तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदाऽवधीत् ॥

yeṣāṃ na vairī svapiti padā bhūmimupaspṛśan | teṣāṃ māṃ māninīṃ bhāryāṃ sūtaputraḥ padā'vadhīt

"जिनका शत्रु धरती पर पाँव रखते हुए चैन से सो नहीं पाता, उनकी मानिनी पत्नी को इस सूतपुत्र ने लात मारी है।

श्लोक 18 (4.20.18)

ये च दद्युर्न याचेयुर्ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः । येषां दुन्दुभिनिर्घोषो ज्याघोषः श्रूयते भृशम् । तेषां मां दयितां भार्यां सूतपुत्रः पदाऽवधीत् ॥

ye ca dadyurna yāceyurbrahmaṇyāḥ satyavādinaḥ | yeṣāṃ dundubhinirghoṣo jyāghoṣaḥ śrūyate bhṛśam | teṣāṃ māṃ dayitāṃ bhāryāṃ sūtaputraḥ padā'vadhīt

जो दान देते हैं पर माँगते नहीं, ब्राह्मणों के भक्त और सत्यवादी हैं, जिनके नगाड़ों का घोष और धनुष की डोरी की टंकार ज़ोर से सुनाई देती है — उनकी प्रिय पत्नी को इस सूतपुत्र ने लात मारी है।

श्लोक 19 (4.20.19)

तेजस्विनस्तथा क्षान्ता बलवन्तश्च मानिनः । महेष्वासा रणे शूरा गर्विता मानतत्पराः । तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदाऽवधीत् ॥

tejasvinastathā kṣāntā balavantaśca māninaḥ | maheṣvāsā raṇe śūrā garvitā mānatatparāḥ | teṣāṃ māṃ māninīṃ bhāryāṃ sūtaputraḥ padā'vadhīt

जो तेजस्वी होकर भी क्षमाशील हैं, बलवान और स्वाभिमानी हैं, महाधनुर्धर, रण में शूर, गर्वीले और मान की रक्षा में तत्पर हैं — उनकी मानिनी पत्नी को इस सूतपुत्र ने लात मारी है।

श्लोक 20 (4.20.20)

सर्वलोकमिमं हन्युर्यदि क्रुद्धा महाबलाः । तेषां मां दयितां भार्यां सूतपुत्रः पदाऽवधीत् ॥

sarvalokamimaṃ hanyuryadi kruddhā mahābalāḥ | teṣāṃ māṃ dayitāṃ bhāryāṃ sūtaputraḥ padā'vadhīt

जो महाबली क्रोधित हो जाएँ तो इस सारे संसार का नाश कर दें — उनकी प्रिय पत्नी को इस सूतपुत्र ने लात मारी है।

श्लोक 21 (4.20.21)

येषां नास्ति समः कश्चिद्वीर्ये सत्ये बले दमे । तेषां मां दयितां भार्यां सूतपुत्रः पदाऽवधीत् ॥

yeṣāṃ nāsti samaḥ kaścidvīrye satye bale dame | teṣāṃ māṃ dayitāṃ bhāryāṃ sūtaputraḥ padā'vadhīt

पराक्रम, सत्य, बल और संयम में जिनकी बराबरी करने वाला कोई नहीं — उनकी प्रिय पत्नी को इस सूतपुत्र ने लात मारी है।

श्लोक 22 (4.20.22)

येषां न सदृशः कश्चिद्धनाद्यैर्भुवि मानवः । तेषां मां दयितां भार्यां सूतपुत्रः पदाऽवधीत् ॥

yeṣāṃ na sadṛśaḥ kaściddhanādyairbhuvi mānavaḥ | teṣāṃ māṃ dayitāṃ bhāryāṃ sūtaputraḥ padā'vadhīt

धन आदि में पृथ्वी पर कोई मनुष्य जिनके समान नहीं — उनकी प्रिय पत्नी को इस सूतपुत्र ने लात मारी है।

श्लोक 23 (4.20.23)

तवाग्रतो विशेषेण प्रजानां च हितैषिणः । पश्यतो निहता राजंस्तेनेह जगतीपते ॥

tavāgrato viśeṣeṇa prajānāṃ ca hitaiṣiṇaḥ | paśyato nihatā rājaṃsteneha jagatīpate

हे राजन्, हे जगत्पति! प्रजा का हित चाहने वाले आपके ठीक सामने, आपके देखते-देखते उसने मुझे यहाँ मारा है।

श्लोक 24 (4.20.24)

शरणं ये प्रपन्नानां भवन्ति शरणार्थिनाम् । चरन्ति लोके प्रच्छन्नाः क्वनु तेऽद्य महाबलाः ॥

śaraṇaṃ ye prapannānāṃ bhavanti śaraṇārthinām | caranti loke pracchannāḥ kvanu te'dya mahābalāḥ

जो शरण चाहने वाले शरणागतों के रक्षक हैं, वे महाबली आज संसार में छिपकर घूमते हुए कहाँ हैं?

श्लोक 25 (4.20.25)

कथं ते सूतपुत्रेण वध्यमानां प्रियां सतीम् । मर्षयन्ति यथा क्लीबा बलवन्तोऽतितेजसः ॥

kathaṃ te sūtaputreṇa vadhyamānāṃ priyāṃ satīm | marṣayanti yathā klībā balavanto'titejasaḥ

वे बलवान और अत्यन्त तेजस्वी होकर भी अपनी प्रिय सती पत्नी को सूतपुत्र से पिटती देखकर नपुंसकों की तरह कैसे सह रहे हैं?

श्लोक 26 (4.20.26)

क्वनु तेषाममर्षश्च वीर्यं तेषां च तद्बलम् । न परीप्सन्ति ये भार्यां वध्यमानां दुरात्मना ॥

kvanu teṣāmamarṣaśca vīryaṃ teṣāṃ ca tadbalam | na parīpsanti ye bhāryāṃ vadhyamānāṃ durātmanā

कहाँ गया उनका रोष, उनका पराक्रम और वह बल, जो वे दुरात्मा द्वारा पीटी जाती अपनी पत्नी को बचाना नहीं चाहते?

श्लोक 27 (4.20.27)

मयाऽपि शक्यं किं कर्तुं विराटे धर्मदूषणे । मां मर्षयति यः पश्यन्वध्यमानामनागसम् ॥

mayā'pi śakyaṃ kiṃ kartuṃ virāṭe dharmadūṣaṇe | māṃ marṣayati yaḥ paśyanvadhyamānāmanāgasam

मैं क्या कर सकती हूँ, जब धर्म को दूषित करने वाले विराट मुझ निरपराध को पिटती देखकर भी उसे सह लेते हैं?

श्लोक 28 (4.20.28)

धर्मो विद्धो ह्यधर्मेण सभां यत्रोपतिष्ठति । न चेद्विशल्यः क्रियते सर्वे विद्धाः सभासदः ॥

dharmo viddho hyadharmeṇa sabhāṃ yatropatiṣṭhati | na cedviśalyaḥ kriyate sarve viddhāḥ sabhāsadaḥ

जहाँ अधर्म से बिंधा हुआ धर्म सभा में उपस्थित होता है और उसका काँटा निकाला नहीं जाता, वहाँ सब सभासद बिंध जाते हैं।

श्लोक 29 (4.20.29)

यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च । हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥

yatra dharmo hyadharmeṇa satyaṃ yatrānṛtena ca | hanyate prekṣamāṇānāṃ hatāstatra sabhāsadaḥ

जहाँ देखते-देखते अधर्म से धर्म और असत्य से सत्य मारा जाता है, वहाँ सभासद स्वयं मारे जाते हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 30 (4.20.30)

तस्यास्तत्कृपणं श्रुत्वा सैरन्ध्र्याः परिदेवितम् । ततः सभ्यास्तु ते सर्वे भूयः कृष्णामपूजयन् । साधुसाध्विति चाप्याहुः कीचकं चाप्यगर्हयन् ॥

tasyāstatkṛpaṇaṃ śrutvā sairandhryāḥ paridevitam | tataḥ sabhyāstu te sarve bhūyaḥ kṛṣṇāmapūjayan | sādhusādhviti cāpyāhuḥ kīcakaṃ cāpyagarhayan

सैरन्ध्री का वह करुण विलाप सुनकर सब सभासदों ने फिर से कृष्णा का सम्मान किया; वे "साधु! साधु!" कहने लगे और कीचक की निन्दा करने लगे।

श्लोक 31 (4.20.31)

केचित्कृष्णां प्रशंसन्ति केचिन्निन्दन्ति कीचकम् । केचिन्निन्दन्ति राजानं केचिद्देवीं च तां नराः ॥

kecitkṛṣṇāṃ praśaṃsanti kecinnindanti kīcakam | kecinnindanti rājānaṃ keciddevīṃ ca tāṃ narāḥ

कुछ लोग कृष्णा की प्रशंसा करने लगे, कुछ कीचक की निन्दा, कुछ राजा की निन्दा और कुछ उस रानी की।

सभ्या ऊचुः

श्लोक 32 (4.20.32)

यस्येयं चारुसर्वाङ्गी भार्या स्यादायतेक्षणा । परो लाभश्च तस्य स्यान्न स शोचेत्कदाचन ॥

yasyeyaṃ cārusarvāṅgī bhāryā syādāyatekṣaṇā | paro lābhaśca tasya syānna sa śocetkadācana

"यह सर्वांगसुन्दरी, विशाल नेत्रों वाली स्त्री जिसकी पत्नी हो, उसे परम लाभ प्राप्त है; वह कभी शोक नहीं करेगा।

श्लोक 33 (4.20.33)

यस्या गात्रं शुभं पीनं मुखं जयति पङ्कजम् । गतिर्हंसं स्मितं कुन्दं सैषा नार्हति पद्वधम् ॥

yasyā gātraṃ śubhaṃ pīnaṃ mukhaṃ jayati paṅkajam | gatirhaṃsaṃ smitaṃ kundaṃ saiṣā nārhati padvadham

जिसका शरीर सुन्दर और भरा-पूरा है, जिसका मुख कमल को जीतता है, जिसकी चाल हंस को और मुस्कान कुन्द के फूल को मात देती है — वह लात खाने योग्य नहीं।

श्लोक 34 (4.20.34)

द्वात्रिंशद्दशना यस्याः श्वेता मांसनिबन्धनाः । स्निग्धाश्च मृदवः केशाः सैषा नार्हति पद्वधम् ॥

dvātriṃśaddaśanā yasyāḥ śvetā māṃsanibandhanāḥ | snigdhāśca mṛdavaḥ keśāḥ saiṣā nārhati padvadham

जिसके बत्तीस दाँत सफ़ेद और मसूड़ों में दृढ़ता से जमे हैं, और जिसके केश चिकने और कोमल हैं — वह लात खाने योग्य नहीं।

श्लोक 35 (4.20.35)

पद्मं चक्रं ध्वजं शङ्खं प्रासादो मकरस्तथा । यस्याः पाणितले सन्ति सैषा नार्हति पद्वधम् ॥

padmaṃ cakraṃ dhvajaṃ śaṅkhaṃ prāsādo makarastathā | yasyāḥ pāṇitale santi saiṣā nārhati padvadham

जिसकी हथेलियों पर कमल, चक्र, ध्वजा, शंख, प्रासाद और मकर के चिह्न हैं — वह लात खाने योग्य नहीं।

श्लोक 36 (4.20.36)

आवर्ताः खलु चत्वारः सर्वे चैव प्रदक्षिणाः । समं गात्रं शुभं स्निग्धं यस्या नार्हति पद्वधम् ॥

āvartāḥ khalu catvāraḥ sarve caiva pradakṣiṇāḥ | samaṃ gātraṃ śubhaṃ snigdhaṃ yasyā nārhati padvadham

जिसके शरीर पर चार भँवर हैं, सब दाहिनी ओर घूमे हुए, और जिसका शरीर सुडौल, सुन्दर और चिकना है — वह लात खाने योग्य नहीं।

श्लोक 37 (4.20.37)

अच्छिद्रहस्तपादा च अच्छिद्रदशना च या । कन्या कमलपत्राक्षी कथमर्हति पद्वधम् ॥

acchidrahastapādā ca acchidradaśanā ca yā | kanyā kamalapatrākṣī kathamarhati padvadham

जिसके हाथ-पैर और दाँत बिना किसी दरार के सटे हुए हैं, ऐसी कमलदल-नयनी कन्या लात खाने योग्य कैसे हो सकती है?

श्लोक 38 (4.20.38)

सेयं लक्षणसंपन्ना पूर्णचन्द्रनिभानना । सुरूपिणी सुवदना नेयं योग्या पदा वधम् ॥

seyaṃ lakṣaṇasaṃpannā pūrṇacandranibhānanā | surūpiṇī suvadanā neyaṃ yogyā padā vadham

यह शुभ लक्षणों से सम्पन्न है, इसका मुख पूर्ण चन्द्रमा जैसा है, यह रूपवती और सुमुखी है; यह पाँव से मारी जाने योग्य नहीं।

श्लोक 39 (4.20.39)

देवदेवीव सुभगा शक्रदेवीव शोभना । अप्सरा इव सारूप्यान्नेयं योग्या पदा वधम् ॥

devadevīva subhagā śakradevīva śobhanā | apsarā iva sārūpyānneyaṃ yogyā padā vadham

यह देवताओं की देवी के समान सौभाग्यवती, इन्द्राणी के समान शोभायमान और रूप में अप्सरा जैसी है; यह पाँव से मारी जाने योग्य नहीं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 40 (4.20.40)

इति स्मापूजयंस्तत्र कृष्णां प्रेक्ष्य सभासदः ॥

iti smāpūjayaṃstatra kṛṣṇāṃ prekṣya sabhāsadaḥ

इस प्रकार सभासदों ने वहाँ कृष्णा को देखकर उसका सम्मान किया।

श्लोक 41 (4.20.41)

सा विनिःश्वस्य सुश्रोणी भूमावन्तर्मुखी स्थिता । तूष्णीमासीत्तदा दृष्ट्वा विवक्षन्तं युधिष्ठिरम् ॥

sā viniḥśvasya suśroṇī bhūmāvantarmukhī sthitā | tūṣṇīmāsīttadā dṛṣṭvā vivakṣantaṃ yudhiṣṭhiram

वह सुन्दरी लम्बी साँस लेकर धरती की ओर मुँह झुकाए खड़ी रही; फिर युधिष्ठिर को कुछ कहने को उद्यत देखकर चुप हो गई।

श्लोक 42 (4.20.42)

युधिष्ठिरस्य कोपात्तु ललाटे स्वेद आस्रवत् । अब्रवीद्धर्मपुत्रोऽथ सैरन्ध्रीं महिषीं प्रियाम् । कृष्णां तत्र नृपाभ्याशे परिव्राजकरूपधृत् ॥

yudhiṣṭhirasya kopāttu lalāṭe sveda āsravat | abravīddharmaputro'tha sairandhrīṃ mahiṣīṃ priyām | kṛṣṇāṃ tatra nṛpābhyāśe parivrājakarūpadhṛt

क्रोध के कारण युधिष्ठिर के ललाट पर पसीना बहने लगा। तब परिव्राजक का वेश धारण किए धर्मपुत्र ने वहाँ राजा के पास ही अपनी प्रिय रानी सैरन्ध्री कृष्णा से कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 43 (4.20.43)

गच्छ सैरन्ध्रि मा भैस्त्वं सुदेष्णाया निवेशनम् । राजा ह्ययं धर्मशीलो विराटः परलोकभीः । यतस्त्वां न परित्राति सत्ये धर्मपथे स्थितः ॥

gaccha sairandhri mā bhaistvaṃ sudeṣṇāyā niveśanam | rājā hyayaṃ dharmaśīlo virāṭaḥ paralokabhīḥ | yatastvāṃ na paritrāti satye dharmapathe sthitaḥ

"सैरन्ध्री! डरो मत, सुदेष्णा के भवन में चली जाओ। ये राजा विराट धर्मशील हैं और परलोक से डरते हैं; सत्य और धर्म के मार्ग पर स्थित होकर भी जब वे तुम्हारी रक्षा नहीं कर रहे, तो तुम चली जाओ।

श्लोक 44 (4.20.44)

भर्तारमनुरुन्धन्त्यः क्लिश्यन्ते वीरपत्नयः । शुश्रूषया क्लिश्यमानाः पतिलोकं जयन्त्युत ॥

bhartāramanurundhantyaḥ kliśyante vīrapatnayaḥ | śuśrūṣayā kliśyamānāḥ patilokaṃ jayantyuta

वीरों की पत्नियाँ पति का अनुसरण करती हुई कष्ट सहती हैं; सेवा में कष्ट उठाकर वे पतिलोक को जीत लेती हैं।

श्लोक 45 (4.20.45)

मन्ये न कालः क्रोधस्य पश्यन्ति पतयस्तव । तेन त्वां नाभिधावन्ति गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः ॥

manye na kālaḥ krodhasya paśyanti patayastava | tena tvāṃ nābhidhāvanti gandharvāḥ sūryavarcasaḥ

मैं समझता हूँ, तुम्हारे पति देख रहे हैं कि यह क्रोध का समय नहीं है; इसीलिए सूर्य के समान तेजस्वी वे गन्धर्व तुम्हारी ओर दौड़कर नहीं आते।

श्लोक 46 (4.20.46)

श्रूयन्तां ते सुकेशान्ते मोक्षधर्माश्रयाः कथाः । यथा धर्मः कुलस्त्रीणां दृष्टो धर्मानुरोधनात् ॥

śrūyantāṃ te sukeśānte mokṣadharmāśrayāḥ kathāḥ | yathā dharmaḥ kulastrīṇāṃ dṛṣṭo dharmānurodhanāt

हे सुन्दर केशों वाली! मोक्षधर्म पर आधारित ये बातें सुनो, जिनसे जाना जाता है कि धर्म के अनुसार कुलीन स्त्रियों का धर्म क्या माना गया है।

श्लोक 47 (4.20.47)

नास्ति यज्ञः स्त्रियाः कश्चिन्न श्राद्धं नाप्युपोषणम् । या तु भर्तारि शुश्रूषा सा स्वर्गायाभिजायते ॥

nāsti yajñaḥ striyāḥ kaścinna śrāddhaṃ nāpyupoṣaṇam | yā tu bhartāri śuśrūṣā sā svargāyābhijāyate

स्त्री के लिए न कोई अलग यज्ञ है, न श्राद्ध, न उपवास; पति की सेवा ही उसे स्वर्ग दिलाती है।

श्लोक 48 (4.20.48)

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । पुत्रस्तु स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥

pitā rakṣati kaumāre bhartā rakṣati yauvane | putrastu sthāvire bhāve na strī svātantryamarhati

कुमारी अवस्था में पिता रक्षा करता है, यौवन में पति और बुढ़ापे में पुत्र; स्त्री स्वतन्त्रता की अधिकारिणी नहीं है।

श्लोक 49 (4.20.49)

भीरु भर्तृभयात्पत्न्यो न क्रुध्यन्ति कदाचन । बहुभिश्च परिक्लेशैरवज्ञाताश्च शत्रुभिः । अनन्यभावाः शुद्धाश्च पुण्यलोकं जयन्त्युत ॥

bhīru bhartṛbhayātpatnyo na krudhyanti kadācana | bahubhiśca parikleśairavajñātāśca śatrubhiḥ | ananyabhāvāḥ śuddhāśca puṇyalokaṃ jayantyuta

हे भीरु! पत्नियाँ पति के भय से कभी क्रोध नहीं करतीं; अनेक कष्ट सहकर और शत्रुओं से अपमानित होकर भी वे अनन्य भाव और पवित्रता बनाए रखती हैं और पुण्यलोक जीत लेती हैं।

श्लोक 50 (4.20.50)

न क्रोधकालं नियतं पश्यन्ति पतयस्तव । न क्रुद्धान्प्रतियायाद्वै पतींस्ते वृत्रहा अपि । तेन त्वां नाभिधावन्ति गन्धर्वाः कामरूपिणः ॥

na krodhakālaṃ niyataṃ paśyanti patayastava | na kruddhānpratiyāyādvai patīṃste vṛtrahā api | tena tvāṃ nābhidhāvanti gandharvāḥ kāmarūpiṇaḥ

तुम्हारे पति नहीं देखते कि क्रोध का नियत समय आ गया है। क्रोधित होने पर तुम्हारे पतियों का सामना वृत्रासुर को मारने वाले इन्द्र भी नहीं कर सकते; इसीलिए इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वे गन्धर्व तुम्हारी ओर दौड़कर नहीं आते।

श्लोक 51 (4.20.51)

यदि ते समयः कश्चित्कृतो ह्यायतलोचने । तं स्मरस्व क्षमाशीले क्षमा धर्मो ह्यनुत्तमः ॥

yadi te samayaḥ kaścitkṛto hyāyatalocane | taṃ smarasva kṣamāśīle kṣamā dharmo hyanuttamaḥ

हे विशाल नेत्रों वाली! यदि कोई प्रतिज्ञा की गई है, तो हे क्षमाशीले, उसे स्मरण करो; क्षमा ही सर्वोत्तम धर्म है।

श्लोक 52 (4.20.52)

क्षमा धर्मः क्षमा सत्यं क्षमा दानं क्षमा तपः । क्षमावतामयं लोकः परलोकः क्षमावताम् ॥

kṣamā dharmaḥ kṣamā satyaṃ kṣamā dānaṃ kṣamā tapaḥ | kṣamāvatāmayaṃ lokaḥ paralokaḥ kṣamāvatām

क्षमा धर्म है, क्षमा सत्य है, क्षमा दान है, क्षमा तप है। यह लोक क्षमाशीलों का है और परलोक भी क्षमाशीलों का है।

श्लोक 53 (4.20.53)

द्व्यंशिनो द्वादशाङ्गस्य चतुर्विंशतिपर्वणः । कस्त्रिषष्ठिशतारस्य मासोनस्याक्षमी भवेत् ॥

dvyaṃśino dvādaśāṅgasya caturviṃśatiparvaṇaḥ | kastriṣaṣṭhiśatārasya māsonasyākṣamī bhavet

दो भागों, बारह अंगों, चौबीस पर्वों और तीन सौ साठ अरों वाले उस (वर्ष रूपी) चक्र के प्रति, जिसमें अब केवल एक मास शेष है, कौन अधीर होगा?

श्लोक 54 (4.20.54)

गच्छ सैरन्ध्रि गन्धर्वाः करिष्यन्ति तव प्रियम् । व्यपनेष्यन्ति ते दुःखं येन ते विप्रियं कृतम् ॥

gaccha sairandhri gandharvāḥ kariṣyanti tava priyam | vyapaneṣyanti te duḥkhaṃ yena te vipriyaṃ kṛtam

जाओ सैरन्ध्री, गन्धर्व तुम्हारा प्रिय करेंगे। जिसने तुम्हारा अहित किया है, उसे और तुम्हारे दुःख को वे दूर कर देंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 55 (4.20.55)

इत्येवमुक्ते तिष्ठन्तीं पुनरेवाह धर्मराट् । विघ्नं करोषि वै भद्रे दीव्यतां राजसंसदि ॥

ityevamukte tiṣṭhantīṃ punarevāha dharmarāṭ | vighnaṃ karoṣi vai bhadre dīvyatāṃ rājasaṃsadi

ऐसा कहने पर भी जब वह खड़ी रही, तो धर्मराज ने फिर कहा — "भद्रे! तुम राजसभा में जुआ खेलने वालों के खेल में विघ्न डाल रही हो।

श्लोक 56 (4.20.56)

तस्मात्त्वमपि सुश्रोणि शैलूषीव विभासि नः । एवमुक्ता तु सा भर्त्रा समुद्वीक्ष्याब्रवीदिदम् ॥

tasmāttvamapi suśroṇi śailūṣīva vibhāsi naḥ | evamuktā tu sā bhartrā samudvīkṣyābravīdidam

इसलिए हे सुन्दरी, तुम भी हमें नटी जैसी लगती हो।" पति के ऐसा कहने पर उसने उनकी ओर देखकर यह कहा —

द्रौपद्युवाच

श्लोक 57 (4.20.57)

सत्यमुक्तं त्वया विद्वञ्शैलूषीं विद्धि मां पुनः । शैलूषकस्य तस्याहं येषां ज्येष्ठोऽक्षकोविदः ॥

satyamuktaṃ tvayā vidvañśailūṣīṃ viddhi māṃ punaḥ | śailūṣakasya tasyāhaṃ yeṣāṃ jyeṣṭho'kṣakovidaḥ

"विद्वन्! आपने सच कहा, मुझे नटी ही समझिए। मैं उस नट-मण्डली की हूँ जिसका सबसे बड़ा जुए में निपुण है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 58 (4.20.58)

एवमुक्त्वा वरारोहा परिमृज्याननं शुभम् । केशान्विमुक्तान्संयम्य रुधिरेण समुक्षितान् ॥

evamuktvā varārohā parimṛjyānanaṃ śubham | keśānvimuktānsaṃyamya rudhireṇa samukṣitān

यह कहकर उस सुन्दरी ने अपना सुन्दर मुख पोंछा और रक्त से सने अपने खुले केशों को बाँध लिया।

श्लोक 59 (4.20.59)

पांसुकुण्ठितसर्वाङ्गी गजराजवधूरिव । प्रतस्थे नागनासोरूर्भर्तुराज्ञाय शासनम् ॥

pāṃsukuṇṭhitasarvāṅgī gajarājavadhūriva | pratasthe nāganāsorūrbharturājñāya śāsanam

धूल से सने सारे शरीर वाली, गजराज की हथिनी जैसी, हाथी की सूँड़ जैसी जाँघों वाली वह पति की आज्ञा मानकर चल पड़ी।

श्लोक 60 (4.20.60)

विमुक्ता मृगशावाक्षी निरन्तरपयोधरा । प्रभा नक्षत्रराजस्य कालमेघैरिवावृता ॥

vimuktā mṛgaśāvākṣī nirantarapayodharā | prabhā nakṣatrarājasya kālameghairivāvṛtā

वहाँ से निकली वह हिरनी जैसी आँखों और सटे हुए पयोधरों वाली स्त्री काले मेघों से ढकी चन्द्रमा की प्रभा जैसी लग रही थी।

श्लोक 61 (4.20.61)

यस्यार्थे पाण्डवेयास्तु त्यजेयुरपि जीवितम् । तां ते दृष्ट्वा तथा कृष्णां क्षमिणो धर्मचारिणः । समयं नातिवर्तन्ते वेलामिव महोदधिः ॥

yasyārthe pāṇḍaveyāstu tyajeyurapi jīvitam | tāṃ te dṛṣṭvā tathā kṛṣṇāṃ kṣamiṇo dharmacāriṇaḥ | samayaṃ nātivartante velāmiva mahodadhiḥ

जिसके लिए पाण्डव अपने प्राण तक त्याग दें, उस कृष्णा को उस दशा में देखकर भी वे क्षमाशील, धर्मपरायण पाण्डव अपनी प्रतिज्ञा का उल्लंघन नहीं कर रहे थे, जैसे महासागर अपने तट का उल्लंघन नहीं करता।

श्लोक 62 (4.20.62)

सा प्रविश्य प्रवेपन्ती सुदेष्णाया निवेशनम् । रुदन्ती चारुसर्वाङ्गी तस्यास्तस्थावथाग्रतः ॥

sā praviśya pravepantī sudeṣṇāyā niveśanam | rudantī cārusarvāṅgī tasyāstasthāvathāgrataḥ

काँपती हुई वह सुदेष्णा के भवन में पहुँची और रोती हुई वह सर्वांगसुन्दरी उसके सामने जा खड़ी हुई।

श्लोक 63 (4.20.63)

तामुवाच विराटस्य महिषी शाठ्यमास्थिता । किमिदं पद्मसंकाशं सुदन्तोष्ठाक्षिनासिकम् ॥

tāmuvāca virāṭasya mahiṣī śāṭhyamāsthitā | kimidaṃ padmasaṃkāśaṃ sudantoṣṭhākṣināsikam

विराट की रानी ने छलपूर्वक उससे कहा — "यह क्या है? कमल के समान, सुन्दर दाँतों, होंठों, आँखों और नाक वाला तुम्हारा,

सुदेष्णोवाच

श्लोक 64 (4.20.64)

रुदन्त्या अवमृष्टास्रं पूर्णेन्दुसमवर्चसम् । बिम्बोष्ठं कृष्णताराभ्यामत्यन्तरुचिरप्रभम् । नयनाभ्यामजिह्याभ्यां मुखं ते मुञ्चते जलम् ॥

rudantyā avamṛṣṭāsraṃ pūrṇendusamavarcasam | bimboṣṭhaṃ kṛṣṇatārābhyāmatyantaruciraprabham | nayanābhyāmajihyābhyāṃ mukhaṃ te muñcate jalam

पूर्ण चन्द्रमा जैसा उज्ज्वल, रोते-रोते आँसू पोंछा हुआ, बिम्बफल जैसे होंठों वाला और काली पुतलियों से अत्यन्त मनोहर मुख तुम्हारी निर्मल आँखों से जल बहा रहा है!

श्लोक 65 (4.20.65)

कस्त्वाऽवधीद्वरारोहे कस्माद्रोदिषि शोभने । को विप्रयुज्यते दारैः सपुत्रैः सहबान्धवैः ॥

kastvā'vadhīdvarārohe kasmādrodiṣi śobhane | ko viprayujyate dāraiḥ saputraiḥ sahabāndhavaiḥ

हे सुन्दरी! तुम्हें किसने मारा? हे शोभने, तुम क्यों रो रही हो? कौन अपनी पत्नी, पुत्रों और बन्धुओं से बिछड़ने वाला है?

श्लोक 66 (4.20.66)

कस्याद्य राजा कुपितो वधमाज्ञापयिष्यति । ब्रूहि किं ते प्रियं कर्म कं त्यजे घातयामि वा ॥

kasyādya rājā kupito vadhamājñāpayiṣyati | brūhi kiṃ te priyaṃ karma kaṃ tyaje ghātayāmi vā

आज राजा किस पर क्रोधित होकर उसके वध की आज्ञा देंगे? बताओ, मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूँ? किसे त्याग दूँ या किसे मरवा डालूँ?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 67 (4.20.67)

तां निःश्वस्याब्रवीत्कृष्णा जानन्ती नाम पृच्छसि । भ्रातुस्त्वं मामनुप्रेष्य किमेवं हि विकत्थसे ॥

tāṃ niḥśvasyābravītkṛṣṇā jānantī nāma pṛcchasi | bhrātustvaṃ māmanupreṣya kimevaṃ hi vikatthase

लम्बी साँस लेकर कृष्णा ने उससे कहा — "तुम जानती हो, फिर भी पूछती हो! तुम्हीं ने मुझे अपने भाई के पास भेजा था, अब ऐसी बातें क्यों बनाती हो?

द्रौपद्युवाच

श्लोक 68 (4.20.68)

कीचको माऽवधीत्तत्र सुराहारीमितो गताम् । सभायां पश्यतो राज्ञो यथा वै निर्जने वने ॥

kīcako mā'vadhīttatra surāhārīmito gatām | sabhāyāṃ paśyato rājño yathā vai nirjane vane

जब मैं यहाँ से मदिरा लेने गई, तब कीचक ने वहाँ सभा में राजा के देखते-देखते मुझे ऐसे मारा मानो सुनसान वन हो।"

सुदेष्णोवाच

श्लोक 69 (4.20.69)

घातयामि सुदन्तोष्ठि कीचकं यदि मन्यसे । भ्राता यद्येष मे व्यक्तं योऽतीतो धर्मचारिणीम् । यस्त्वां कामाभिभूतात्मा दुर्लभामवमन्यते ॥

ghātayāmi sudantoṣṭhi kīcakaṃ yadi manyase | bhrātā yadyeṣa me vyaktaṃ yo'tīto dharmacāriṇīm | yastvāṃ kāmābhibhūtātmā durlabhāmavamanyate

"हे सुन्दर दाँतों और होंठों वाली! यदि तुम चाहो तो मैं कीचक को मरवा दूँगी, भले ही वह स्पष्ट रूप से मेरा भाई है; उसने एक धर्मचारिणी का अपमान किया है, काम से अन्धा होकर वह तुम जैसी दुर्लभ स्त्री का निरादर करता है।"

द्रौपद्युवाच

श्लोक 70 (4.20.70)

अद्यैव तं हनिष्यन्ति येषामागस्करो हि सः । मन्येऽहमद्य वा श्वो वा परलोकं गमिष्यति ॥

adyaiva taṃ haniṣyanti yeṣāmāgaskaro hi saḥ | manye'hamadya vā śvo vā paralokaṃ gamiṣyati

"जिनका उसने अपराध किया है, वे आज ही उसे मार डालेंगे। मैं समझती हूँ कि आज या कल वह परलोक चला जाएगा।

श्लोक 71 (4.20.71)

भ्रातुः प्रयच्छ त्वरिता जीवच्छ्राद्धं त्वमद्य वै । सुहृष्टं कुरु वै चैनं नासून्मन्ये धरिष्यति ॥

bhrātuḥ prayaccha tvaritā jīvacchrāddhaṃ tvamadya vai | suhṛṣṭaṃ kuru vai cainaṃ nāsūnmanye dhariṣyati

शीघ्र ही आज अपने भाई का जीवित-श्राद्ध कर दो; उसे भली-भाँति प्रसन्न कर लो, क्योंकि मुझे नहीं लगता कि वह जीवित रहेगा।

श्लोक 72 (4.20.72)

तेषां हि मम भर्तॄणां पञ्चानां धर्मचारिणाम् । एको दुर्मर्षणोऽत्यर्थं बले चाप्रतिमो भुवि ॥

teṣāṃ hi mama bhartṝṇāṃ pañcānāṃ dharmacāriṇām | eko durmarṣaṇo'tyarthaṃ bale cāpratimo bhuvi

मेरे उन पाँच धर्मात्मा पतियों में एक अत्यन्त असहनीय है और बल में पृथ्वी पर उसकी कोई बराबरी नहीं।

श्लोक 73 (4.20.73)

निर्मनुष्यमिमं लोकं कुर्यात्क्रुद्धो निशामिमाम् । न स संक्रुध्यते तावद्गन्धर्वः कामरूपधृत् ॥

nirmanuṣyamimaṃ lokaṃ kuryātkruddho niśāmimām | na sa saṃkrudhyate tāvadgandharvaḥ kāmarūpadhṛt

क्रोधित होने पर वह आज ही रात इस संसार को मनुष्यों से खाली कर दे। इच्छानुसार रूप धारण करने वाला वह गन्धर्व अभी तब तक क्रोधित नहीं है

श्लोक 74 (4.20.74)

नूनं ज्ञास्यति यावद्वै ममैतत्पादघातनम् । तत्क्षणात्कीचकः पापः सपुत्रभ्रातृबान्धवः । विनशिष्यति दुष्टात्मा यथा दुष्कृतकर्मकृत् ॥

nūnaṃ jñāsyati yāvadvai mamaitatpādaghātanam | tatkṣaṇātkīcakaḥ pāpaḥ saputrabhrātṛbāndhavaḥ | vinaśiṣyati duṣṭātmā yathā duṣkṛtakarmakṛt

जब तक वह मुझे लात मारे जाने की बात नहीं जान लेता। जानते ही उसी क्षण वह पापी, दुष्टात्मा कीचक अपने पुत्रों, भाइयों और बन्धु-बान्धवों सहित नष्ट हो जाएगा, जैसे कोई भी दुष्कर्मी नष्ट होता है।

श्लोक 75 (4.20.75)

अपि चैतत्पुरा प्रोक्तं निपुणैर्मनुजोत्तमैः । एकस्तु कुरुते पापं कालपाशवशं गतः । नीचेनात्मापराधेन कुलं तेन विनश्यति ॥

api caitatpurā proktaṃ nipuṇairmanujottamaiḥ | ekastu kurute pāpaṃ kālapāśavaśaṃ gataḥ | nīcenātmāparādhena kulaṃ tena vinaśyati

और यह बात पहले ही चतुर श्रेष्ठ पुरुषों ने कही है — काल के पाश में बँधा एक व्यक्ति पाप करता है, और उस नीच के अपने अपराध से सारा कुल नष्ट हो जाता है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 76 (4.20.76)

सुदेष्णामेवमुक्त्वा तु सैरन्ध्री दुःखमोहिता । कीचकस्य वधार्थाय व्रतदीक्षामुपागमत् ॥

sudeṣṇāmevamuktvā tu sairandhrī duḥkhamohitā | kīcakasya vadhārthāya vratadīkṣāmupāgamat

सुदेष्णा से ऐसा कहकर दुःख से व्याकुल सैरन्ध्री ने कीचक के वध के लिए व्रत की दीक्षा ले ली।

श्लोक 77 (4.20.77)

अभ्यर्थिता च नारीभिर्मानिता च सुदेष्णया । न च स्नाति न चाश्नाति न पांसून्परिमार्जति । रुधिरक्लिन्नवदना बभूव मृदितेक्षणा ॥

abhyarthitā ca nārībhirmānitā ca sudeṣṇayā | na ca snāti na cāśnāti na pāṃsūnparimārjati | rudhiraklinnavadanā babhūva mṛditekṣaṇā

स्त्रियों के मनाने और सुदेष्णा के आदर करने पर भी वह न स्नान करती, न भोजन करती, न धूल पोंछती; उसका मुख रक्त से भीगा था और आँखें सूजी हुई थीं।

श्लोक 78 (4.20.78)

तां तथा शोकसन्तप्तां दृष्ट्वा प्ररुदितां स्त्रियः । कीचकस्य वधं सर्वा मनोभिश्च शशंसिरे ॥

tāṃ tathā śokasantaptāṃ dṛṣṭvā praruditāṃ striyaḥ | kīcakasya vadhaṃ sarvā manobhiśca śaśaṃsire

उसे इस प्रकार शोक से सन्तप्त होकर रोती देखकर सब स्त्रियाँ मन ही मन कीचक के वध की कामना करने लगीं।

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