विराट पर्व · अध्याय 21
कीचक का वंश और द्रौपदी के शाप न देने का कारण
जनमेजय पूछते हैं कि महान तेजस्विनी द्रौपदी ने कीचक के अत्याचार को बिना शाप दिए क्यों सह लिया, और कीचक कौन था। वैशम्पायन सूतों की उत्पत्ति और सूतराज केकय का वृत्तान्त बताते हैं, जिनके मालवी से उत्पन्न एक सौ छह पुत्र कीचक कहलाए और जिनकी पुत्री सुदेष्णा विराट की रानी बनी; कालेय दैत्यों के अंश से जन्मा कीचक विराट का सेनापति बना और उसने उनके लिए अनेक देश जीते। क्षमा के आदर और पतियों की इच्छा के कारण द्रौपदी ने उसे शाप नहीं दिया, और युधिष्ठिर द्वारा रोके गए भीम ने पाकशाला में करवटें बदलते हुए रात बिताई।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (4.21.1)
अहो दुःखतरं प्राप्ता कीचकेन पदा हता । पतिव्रता महाभागा द्रौपदी योषितां वरा ॥
aho duḥkhataraṃ prāptā kīcakena padā hatā | pativratā mahābhāgā draupadī yoṣitāṃ varā
अहो! पतिव्रता, महाभाग्यशाली, स्त्रियों में श्रेष्ठ द्रौपदी को कीचक के लात मारने से और भी बड़ा दुःख झेलना पड़ा।
श्लोक 2 (4.21.2)
दुःशलां स्मारयन्ती सा भर्तॄणां भगिनीं शुभाम् । नाशपत्सिन्धुराजं सा बलात्कारेण वाहिता ॥
duḥśalāṃ smārayantī sā bhartṝṇāṃ bhaginīṃ śubhām | nāśapatsindhurājaṃ sā balātkāreṇa vāhitā
अपने पतियों की सुन्दर बहन दुःशला का स्मरण करके उसने बलपूर्वक हर ले जाने वाले सिन्धुराज को शाप नहीं दिया था।
श्लोक 3 (4.21.3)
किमर्थमिह संप्राप्ता कीचकेन दुरात्मना । नाशपत्तं महाभागा कृष्णा पादेन ताडिता ॥
kimarthamiha saṃprāptā kīcakena durātmanā | nāśapattaṃ mahābhāgā kṛṣṇā pādena tāḍitā
तो फिर यहाँ आकर जब दुरात्मा कीचक ने उसे लात मारी, तब उस महाभागा कृष्णा ने उसे शाप क्यों नहीं दिया?
श्लोक 4 (4.21.4)
तेजोराशिरियं देवी धर्मज्ञा सत्यवादिनी । केशपाशे परामृष्टा मर्षयन्ती ह्यशक्तवत् ॥
tejorāśiriyaṃ devī dharmajñā satyavādinī | keśapāśe parāmṛṣṭā marṣayantī hyaśaktavat
यह देवी तेज की राशि है, धर्म जानने वाली और सत्यवादिनी है; फिर भी केश पकड़कर घसीटे जाने पर इसने असमर्थ की भाँति सब सह लिया।
श्लोक 5 (4.21.5)
नैतत्कारणमल्पं हि श्रोतुकामोऽस्मि सत्तम । कृष्णायास्तु परिक्लेशान्मनो मे दूयते भृशम् ॥
naitatkāraṇamalpaṃ hi śrotukāmo'smi sattama | kṛṣṇāyāstu parikleśānmano me dūyate bhṛśam
हे सत्पुरुषों में श्रेष्ठ! यह कोई छोटी बात नहीं, मैं इसका कारण सुनना चाहता हूँ। कृष्णा के कष्टों से मेरा मन बहुत दुःखी है।
श्लोक 6 (4.21.6)
कस्य वंशे समुद्भूतः स च दुर्ललितो मुने । बलोन्मत्तः कथं चासीत्स्यालो मात्स्यस्य कीचकः ॥
kasya vaṃśe samudbhūtaḥ sa ca durlalito mune | balonmattaḥ kathaṃ cāsītsyālo mātsyasya kīcakaḥ
हे मुने! वह उद्दण्ड कीचक किसके वंश में पैदा हुआ था? और मत्स्यराज का वह साला बल के मद में ऐसा उन्मत्त कैसे हो गया?
श्लोक 7 (4.21.7)
दृष्ट्वापि तां प्रियां भार्यां सूतपुत्रेण ताडिताम् । नैव चुक्षुभिरे वीराः किमकुर्वन्त तं प्रति ॥
dṛṣṭvāpi tāṃ priyāṃ bhāryāṃ sūtaputreṇa tāḍitām | naiva cukṣubhire vīrāḥ kimakurvanta taṃ prati
अपनी प्रिय पत्नी को सूतपुत्र से पिटती देखकर भी वे वीर विचलित क्यों नहीं हुए? उन्होंने उसके विरुद्ध क्या किया?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (4.21.8)
त्वदुक्तोऽयमनुप्रश्नः कुरूणां कीर्तिवर्धनः । एतत्सर्वं यथा वक्ष्ये विस्तरेणेह पार्थिव ॥
tvadukto'yamanupraśnaḥ kurūṇāṃ kīrtivardhanaḥ | etatsarvaṃ yathā vakṣye vistareṇeha pārthiva
हे राजन्! कुरुओं की कीर्ति बढ़ाने वाला यह तुम्हारा प्रश्न है; मैं इसका सारा उत्तर तुम्हें विस्तार से बताऊँगा।
श्लोक 9 (4.21.9)
ब्राह्मण्यां क्षत्रियाज्जातः सूतो भवति पार्थिव । प्रातिलोम्येन जातानां स ह्येको द्विज एव तु ॥
brāhmaṇyāṃ kṣatriyājjātaḥ sūto bhavati pārthiva | prātilomyena jātānāṃ sa hyeko dvija eva tu
हे राजन्! क्षत्रिय पिता और ब्राह्मणी माता से उत्पन्न सन्तान सूत कहलाती है। प्रतिलोम क्रम से जन्मे लोगों में केवल वही द्विज माना जाता है।
श्लोक 10 (4.21.10)
रथकारमितीमं हि क्रियायुक्तं द्विजन्मनाम् । क्षत्रियादवरो वैश्याद्विशिष्ट इति चक्षते ॥
rathakāramitīmaṃ hi kriyāyuktaṃ dvijanmanām | kṣatriyādavaro vaiśyādviśiṣṭa iti cakṣate
उसे रथकार कहते हैं, जो द्विजों की क्रियाओं से युक्त होता है; कहा जाता है कि वह क्षत्रिय से नीचे और वैश्य से ऊँचा है।
श्लोक 11 (4.21.11)
सह सूतेन संबन्धः कृतः पूर्वं नराधिपैः । तेन तु प्रातिलोम्येन राजशब्दो न लभ्यते ॥
saha sūtena saṃbandhaḥ kṛtaḥ pūrvaṃ narādhipaiḥ | tena tu prātilomyena rājaśabdo na labhyate
प्राचीन काल में राजाओं ने सूतों के साथ (विवाह-)सम्बन्ध किए थे; किन्तु उस प्रतिलोम जन्म के कारण (सूत को) "राजा" की उपाधि नहीं मिलती।
श्लोक 12 (4.21.12)
तेषां तु सूतविषयः सूतानां नामतः कृतः । उपजीव्यं च यत्क्षेत्रं राजन्सूतेन वै पुरा ॥
teṣāṃ tu sūtaviṣayaḥ sūtānāṃ nāmataḥ kṛtaḥ | upajīvyaṃ ca yatkṣetraṃ rājansūtena vai purā
उनके लिए सूतों के नाम से एक सूत-प्रदेश बनाया गया, और हे राजन्, वह भूमि भी जो सूत को प्राचीन काल में जीविका के लिए मिली थी।
श्लोक 13 (4.21.13)
सूतानामधिपो राजा केकयो नाम विश्रुतः । राजकन्यासमुद्भूतः सारथ्येऽनुपमोऽभवत् ॥
sūtānāmadhipo rājā kekayo nāma viśrutaḥ | rājakanyāsamudbhūtaḥ sārathye'nupamo'bhavat
सूतों के अधिपति केकय नाम के प्रसिद्ध राजा थे। राजकन्या से उत्पन्न वे सारथि-कर्म में अनुपम थे।
श्लोक 14 (4.21.14)
पुत्रास्तस्य कुरुश्रेष्ठ मालव्यां जज्ञिरे तदा । कीचका इति विख्याताः शतं षट् चैव भारत ॥
putrāstasya kuruśreṣṭha mālavyāṃ jajñire tadā | kīcakā iti vikhyātāḥ śataṃ ṣaṭ caiva bhārata
हे कुरुश्रेष्ठ! तब मालवी से उनके पुत्र उत्पन्न हुए, जो कीचक नाम से विख्यात हुए; हे भारत, वे एक सौ छह थे।
श्लोक 15 (4.21.15)
तेषामासीद्बलश्रेष्ठः कीचकः सर्वजित्प्रभो । अग्रजो बलसंमत्तस्तेनासीत्सूतषट्शतम् ॥
teṣāmāsīdbalaśreṣṭhaḥ kīcakaḥ sarvajitprabho | agrajo balasaṃmattastenāsītsūtaṣaṭśatam
हे प्रभो! उनमें बल में श्रेष्ठ, सबको जीतने वाला, बल के मद में चूर सबसे बड़ा भाई कीचक था; उसी के कारण एक सौ छह सूतों का वह दल प्रतिष्ठित था।
श्लोक 16 (4.21.16)
मालव्या एव कौरव्य तत्र ह्यवरजाऽभवत् । तस्यां केकयराज्ञस्तु सुदेष्णा दुहिताऽभवत् ॥
mālavyā eva kauravya tatra hyavarajā'bhavat | tasyāṃ kekayarājñastu sudeṣṇā duhitā'bhavat
हे कौरव्य! वहाँ मालवी की एक छोटी बहन थी; उससे केकयराज की पुत्री सुदेष्णा उत्पन्न हुई।
श्लोक 17 (4.21.17)
तां विराटस्य मात्स्यस्य केकयः प्रददौ मुदा । सुरथायां मृतायां तु कौसल्यां श्वेतमातरि ॥
tāṃ virāṭasya mātsyasya kekayaḥ pradadau mudā | surathāyāṃ mṛtāyāṃ tu kausalyāṃ śvetamātari
श्वेत की माता कोसलराजकुमारी सुरथा की मृत्यु हो जाने पर केकय ने प्रसन्नतापूर्वक उसे मत्स्यराज विराट को ब्याह दिया।
श्लोक 18 (4.21.18)
श्वेते विनष्टे शङ्खे च गते मातुलवेश्मनि । सुदेष्णां महिषीं लब्ध्वा राजा दुःखमपानुदत् ॥
śvete vinaṣṭe śaṅkhe ca gate mātulaveśmani | sudeṣṇāṃ mahiṣīṃ labdhvā rājā duḥkhamapānudat
और श्वेत के मारे जाने तथा शंख के मामा के घर चले जाने पर, सुदेष्णा को रानी के रूप में पाकर राजा ने अपना दुःख दूर किया।
श्लोक 19 (4.21.19)
उत्तरं चोत्तरां चैव विराटात्पृथिवीपते । सुदेष्णा सुषुवे देवी कैकेयी कुलवृद्धये ॥
uttaraṃ cottarāṃ caiva virāṭātpṛthivīpate | sudeṣṇā suṣuve devī kaikeyī kulavṛddhaye
हे पृथ्वीपते! केकयराजकुमारी रानी सुदेष्णा ने कुल की वृद्धि के लिए विराट से उत्तर और उत्तरा को जन्म दिया।
श्लोक 20 (4.21.20)
मातृष्वसृसुतां राजन्कीचकस्तामनिन्दिताम् । सदा परिचरन्प्रीत्या विराटे न्यवसत्सुखी ॥
mātṛṣvasṛsutāṃ rājankīcakastāmaninditām | sadā paricaranprītyā virāṭe nyavasatsukhī
हे राजन्! कीचक अपनी मौसी की उस निर्दोष पुत्री की सदा प्रेम से सेवा करता हुआ विराट के राज्य में सुखपूर्वक रहता था।
श्लोक 21 (4.21.21)
भ्रातरश्चास्य विक्रान्ताः सर्वे च तमनुव्रताः । विराटस्यैव संहृष्टा बलं कोशं त्ववर्धयन् ॥
bhrātaraścāsya vikrāntāḥ sarve ca tamanuvratāḥ | virāṭasyaiva saṃhṛṣṭā balaṃ kośaṃ tvavardhayan
उसके पराक्रमी भाई, जो सब उसके अनुगामी थे, प्रसन्न होकर विराट की सेना और कोष को बढ़ाते रहे।
श्लोक 22 (4.21.22)
कालेया नाम ते दैत्याः प्रायशो भुवि विश्रुताः । जज्ञिरे कीचका राजन्बाणो ज्येष्ठस्तथाऽभवत् ॥
kāleyā nāma te daityāḥ prāyaśo bhuvi viśrutāḥ | jajñire kīcakā rājanbāṇo jyeṣṭhastathā'bhavat
हे राजन्! पृथ्वी पर प्रसिद्ध कालेय नामक दैत्य ही कीचकों के रूप में उत्पन्न हुए थे, और उनमें सबसे बड़ा बाण भी इसी प्रकार (कीचक बनकर) जन्मा।
श्लोक 23 (4.21.23)
स हि सर्वास्त्रसंपन्नो बलवान्भीमविक्रमः । कीचको नष्टमर्यादो बभूव भयदो नृणाम् ॥
sa hi sarvāstrasaṃpanno balavānbhīmavikramaḥ | kīcako naṣṭamaryādo babhūva bhayado nṛṇām
सब अस्त्रों में निपुण, बलवान और भयंकर पराक्रमी कीचक मर्यादाहीन होकर मनुष्यों के लिए भय का कारण बन गया।
श्लोक 24 (4.21.24)
तं प्राप्य बलसंमत्तं विराटः पृथिवीपतिः । जिगाय सर्वांश्च रिपून्यथेन्द्रो दानवान्पुरा ॥
taṃ prāpya balasaṃmattaṃ virāṭaḥ pṛthivīpatiḥ | jigāya sarvāṃśca ripūnyathendro dānavānpurā
बल के मद में चूर उस कीचक को पाकर पृथ्वीपति विराट ने अपने सब शत्रुओं को ऐसे जीत लिया जैसे प्राचीन काल में इन्द्र ने दानवों को जीता था।
श्लोक 25 (4.21.25)
मेखलांश्च त्रिगर्तांश्च दशार्णांश्च कशेरुकान् । मालवांश्चैव यवनान्सिलिन्दान्काशिकोसलान् ॥
mekhalāṃśca trigartāṃśca daśārṇāṃśca kaśerukān | mālavāṃścaiva yavanānsilindānkāśikosalān
मेखल, त्रिगर्त, दशार्ण और कशेरुक; मालव, यवन, सिलिन्द, काशी और कोसल;
श्लोक 26 (4.21.26)
करदांश्च निषिद्धांश्च शिवान्मचुलकांस्तथा । पुलिन्दांश्च कलिङ्गांश्च तङ्कणान्परतङ्कणान् ॥
karadāṃśca niṣiddhāṃśca śivānmaculakāṃstathā | pulindāṃśca kaliṅgāṃśca taṅkaṇānparataṅkaṇān
करद, निषिद्ध, शिव और मचुलक; पुलिन्द, कलिंग, तंकण और परतंकण —
श्लोक 27 (4.21.27)
अन्ये च बहवः शूरा नानाजनपदेश्वराः । कीचकेन रणे भग्ना विद्रवन्ति दिशो दश ॥
anye ca bahavaḥ śūrā nānājanapadeśvarāḥ | kīcakena raṇe bhagnā vidravanti diśo daśa
ये तथा अनेक देशों के अधिपति बहुत-से अन्य शूरवीर रण में कीचक से पराजित होकर दसों दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 28 (4.21.28)
तमेवंवीर्यसंपन्नं नागायुतसमं बले । विराटस्तत्र सेनायाश्चकार पतिमात्मनः ॥
tamevaṃvīryasaṃpannaṃ nāgāyutasamaṃ bale | virāṭastatra senāyāścakāra patimātmanaḥ
ऐसे पराक्रम से सम्पन्न और बल में दस हज़ार हाथियों के समान उस कीचक को विराट ने वहाँ अपनी सेना का सेनापति बना दिया।
श्लोक 29 (4.21.29)
विराटभ्रातरश्चैव दश दाशरथेः समाः । ते चैनानन्ववर्तन्त कीचकान्बलवत्तरान् ॥
virāṭabhrātaraścaiva daśa dāśaratheḥ samāḥ | te cainānanvavartanta kīcakānbalavattarān
विराट के दस भाई भी, जो दशरथनन्दन (राम) के समान थे, उन अधिक बलवान कीचकों का अनुसरण करते थे।
श्लोक 30 (4.21.30)
एवंविधबलो भीमः कीचकस्ते च तद्विधाः । राज्ञः स्याला महात्मानो विराटस्य हितैषिणः ॥
evaṃvidhabalo bhīmaḥ kīcakaste ca tadvidhāḥ | rājñaḥ syālā mahātmāno virāṭasya hitaiṣiṇaḥ
ऐसा भयंकर बलशाली था कीचक, और उसके भाई भी वैसे ही थे — राजा विराट के हितैषी, महान साले।
श्लोक 31 (4.21.31)
एतत्ते कथितं सर्वं कीचकस्य पराक्रमम् । द्रौपदी न शशापैनं यस्मात्तद्गदतः शृणु ॥
etatte kathitaṃ sarvaṃ kīcakasya parākramam | draupadī na śaśāpainaṃ yasmāttadgadataḥ śṛṇu
मैंने तुम्हें कीचक के पराक्रम के विषय में सब बता दिया। अब मुझसे सुनो कि द्रौपदी ने उसे शाप क्यों नहीं दिया।
श्लोक 32 (4.21.32)
रक्षन्ति हि तपः क्रोधादृषयो न शपन्ति च । जानन्ती तद्यथातत्त्वं द्रौपदी न शशाप तम् ॥
rakṣanti hi tapaḥ krodhādṛṣayo na śapanti ca | jānantī tadyathātattvaṃ draupadī na śaśāpa tam
ऋषि क्रोध से अपने तप की रक्षा करते हैं और शाप नहीं देते; इस तत्त्व को जानती हुई द्रौपदी ने उसे शाप नहीं दिया।
श्लोक 33 (4.21.33)
क्षमा धर्मः क्षमा दानं क्षमा यज्ञः क्षमा तपः । क्षमा सत्यं क्षमा शीलं क्षमा सर्वमिति श्रुतिः ॥
kṣamā dharmaḥ kṣamā dānaṃ kṣamā yajñaḥ kṣamā tapaḥ | kṣamā satyaṃ kṣamā śīlaṃ kṣamā sarvamiti śrutiḥ
क्षमा धर्म है, क्षमा दान है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा तप है; क्षमा सत्य है, क्षमा शील है, क्षमा ही सब कुछ है — ऐसा श्रुति कहती है।
श्लोक 34 (4.21.34)
क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् । एतत्सर्वं विजानन्ती सा क्षमामन्वपद्यत ॥
kṣamāvatāmayaṃ lokaḥ paraścaiva kṣamāvatām | etatsarvaṃ vijānantī sā kṣamāmanvapadyata
यह लोक क्षमाशीलों का है और परलोक भी क्षमाशीलों का। यह सब जानकर उसने क्षमा को अपनाया।
श्लोक 35 (4.21.35)
भर्तॄणां मतमाज्ञाय क्षमिणां धर्मचारिणाम् । नाशपत्तं विशालाक्षी सती शक्ताऽपि भारत ॥
bhartṝṇāṃ matamājñāya kṣamiṇāṃ dharmacāriṇām | nāśapattaṃ viśālākṣī satī śaktā'pi bhārata
हे भारत! अपने क्षमाशील, धर्मपरायण पतियों का मत जानकर उस विशाल नेत्रों वाली सती ने समर्थ होते हुए भी उसे शाप नहीं दिया।
श्लोक 36 (4.21.36)
पाण्डवाश्चापि ते सर्वे द्रौपदीं प्रेक्ष्य दुःखिताम् । क्रोधाग्निनाऽप्यदह्यन्त तदा लज्जाव्यपेक्षया ॥
pāṇḍavāścāpi te sarve draupadīṃ prekṣya duḥkhitām | krodhāgninā'pyadahyanta tadā lajjāvyapekṣayā
सब पाण्डव भी द्रौपदी को दुःखी देखकर क्रोध की आग में जलते रहे, पर लज्जा का विचार करके रुके रहे।
श्लोक 37 (4.21.37)
अथ भीमो महाबाहुः सूदयिष्यंस्तु कीचकम् । वारितो धर्मपुत्रेण वेलयेव महोदधिः ॥
atha bhīmo mahābāhuḥ sūdayiṣyaṃstu kīcakam | vārito dharmaputreṇa velayeva mahodadhiḥ
तब कीचक को मार डालने को उद्यत महाबाहु भीम को धर्मपुत्र ने वैसे ही रोक लिया जैसे तट महासागर को रोकता है।
श्लोक 38 (4.21.38)
संधार्य मनसा रोषं दिवारात्रं विनिश्वसन् । महानसे तदा कृच्छ्रात्सुष्वाप रजनीं च ताम् ॥
saṃdhārya manasā roṣaṃ divārātraṃ viniśvasan | mahānase tadā kṛcchrātsuṣvāpa rajanīṃ ca tām
मन में क्रोध को दबाए, दिन-रात लम्बी साँसें लेते हुए उसने उस रात पाकशाला में बड़ी कठिनाई से नींद ली।