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विराट पर्व · अध्याय 22

द्रौपदी का भीम को जगाकर अपना दुःख सुनाना

कीचक के अपमान से आहत द्रौपदी रात में रसोईघर जाकर भीम को जगाती है और उनके आग्रह पर अपने दुःख कह सुनाती है—द्यूतसभा का अपमान, वन के कष्ट, जयद्रथ द्वारा हरण, सुदेष्णा की दासता और राजा विराट के सामने कीचक की लात। वह कहती है कि यदि भीम सवेरा होने से पहले कीचक के वध की प्रतिज्ञा नहीं करेंगे तो वह प्राण त्याग देगी; वह युधिष्ठिर के जुए की निन्दा करती है और उनके पुराने वैभव की तुलना कंक के रूप में उनके वर्तमान जीवन से करती है। फिर वह एक-एक भाई के अपमान पर विलाप करती है—रानी के मनोरंजन के लिए पशुओं से लड़ते भीम, रनिवास में नृत्यशिक्षक बने अर्जुन, राजा के अश्वपाल नकुल और ग्वाले सहदेव—और उसका यह विलाप अगले अध्याय तक चलता है।

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.22.1)

सा सूतपुत्राभिहता राजपुत्री सुदुःखिता । वधं कृष्णा परीप्सन्ती सूतपुत्रस्य भामिनी ॥

sā sūtaputrābhihatā rājaputrī suduḥkhitā | vadhaṃ kṛṣṇā parīpsantī sūtaputrasya bhāminī

सूतपुत्र के प्रहार से अत्यन्त दुःखी, मानिनी राजकुमारी कृष्णा सूतपुत्र के वध की कामना करती हुई

श्लोक 2 (4.22.2)

जगामावासमेवाथ तदा सा द्रुपदात्मजा । कृत्वा शौचं यथान्यायं कृष्णा सा तनुमध्यमा ॥

jagāmāvāsamevātha tadā sā drupadātmajā | kṛtvā śaucaṃ yathānyāyaṃ kṛṣṇā sā tanumadhyamā

अपने निवास-स्थान को लौट गई। वहाँ पतली कमर वाली द्रुपदकुमारी कृष्णा ने विधिपूर्वक शौच किया,

श्लोक 3 (4.22.3)

गात्राणि वाससी चैव प्रक्षाल्य सलिलेन सा । चिन्तयामास रुदती तस्य दुःखस्य निर्णयम् ॥

gātrāṇi vāsasī caiva prakṣālya salilena sā | cintayāmāsa rudatī tasya duḥkhasya nirṇayam

अपने अंगों और दोनों वस्त्रों को जल से धोया और रोती हुई सोचने लगी कि उस दुःख का अन्त कैसे हो।

श्लोक 4 (4.22.4)

किं करोमि क्व गच्छामि कथं कार्यं भवेन्मम । इत्येवं चिन्तयित्वा सा भीमं तं मनसाऽगमत् । अन्यः कर्ता विना भीमान्न मेऽद्य मनसेप्सितम् ॥

kiṃ karomi kva gacchāmi kathaṃ kāryaṃ bhavenmama | ityevaṃ cintayitvā sā bhīmaṃ taṃ manasā'gamat | anyaḥ kartā vinā bhīmānna me'dya manasepsitam

"मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरा काम कैसे बने?" ऐसा सोचकर उसका मन भीम की ओर गया—"भीम के सिवा कोई दूसरा आज मेरे मन की इच्छा पूरी नहीं कर सकता।"

श्लोक 5 (4.22.5)

प्रादुर्भूते क्षणे रात्रौ विहाय शयनं स्वकम् । दुःखेन महता युक्ता मानसेन मनस्विनी । प्राद्रवन्नाथमिच्छन्ती तथा नाथवती सती ॥

prādurbhūte kṣaṇe rātrau vihāya śayanaṃ svakam | duḥkhena mahatā yuktā mānasena manasvinī | prādravannāthamicchantī tathā nāthavatī satī

रात का समय आने पर वह अपनी शय्या छोड़कर, मन के भारी दुःख से भरी हुई, वह मनस्विनी रक्षक की खोज में दौड़ पड़ी—यद्यपि वह स्वयं पतियों वाली थी।

श्लोक 6 (4.22.6)

सा वै महानसं प्राप्य भीमसेनं शुचिस्मिता । उपासर्पत पाञ्चाली वासितेव महागजम् ॥

sā vai mahānasaṃ prāpya bhīmasenaṃ śucismitā | upāsarpata pāñcālī vāsiteva mahāgajam

रसोईघर में पहुँचकर उज्ज्वल मुस्कान वाली पाञ्चाली भीमसेन के पास वैसे ही गई जैसे मदमत्त हथिनी किसी महान गजराज के पास जाती है।

श्लोक 7 (4.22.7)

सर्वश्वेतेव माहेयी वने वृद्धा त्रिहायणी । महर्षभं यथा सुप्तमर्थिनी वननिर्झरे । संप्रसुप्तं तथा सिंहं मृगराजवधूरिव ॥

sarvaśveteva māheyī vane vṛddhā trihāyaṇī | maharṣabhaṃ yathā suptamarthinī vananirjhare | saṃprasuptaṃ tathā siṃhaṃ mṛgarājavadhūriva

जैसे वन में पली तीन वर्ष की सर्वथा श्वेत गाय किसी झरने के किनारे सोए हुए महान वृषभ के पास जाती है, या जैसे सिंहराज की पत्नी गहरी नींद में सोए सिंह के पास जाती है,

श्लोक 8 (4.22.8)

अभिप्रसार्य बाहुभ्यां पतिं सुप्तं समाश्लिषत् । सुजातं गोमतीतीरे सालं वल्लीव पुष्पिता ॥

abhiprasārya bāhubhyāṃ patiṃ suptaṃ samāśliṣat | sujātaṃ gomatītīre sālaṃ vallīva puṣpitā

उसने अपनी भुजाएँ फैलाकर सोए हुए पति का आलिंगन किया, जैसे फूलों से लदी बेल गोमती के तट पर उगे ऊँचे साल वृक्ष से लिपट जाती है।

श्लोक 9 (4.22.9)

परिस्पृश्य च पाणिभ्यां पतिं सुप्तमबोधयत् । श्रीरिवान्या महोत्साहं सुप्तं विष्णुमिवार्णवे । क्षौमावदाते शयने शयानं वृषभेक्षणम् ॥

parispṛśya ca pāṇibhyāṃ patiṃ suptamabodhayat | śrīrivānyā mahotsāhaṃ suptaṃ viṣṇumivārṇave | kṣaumāvadāte śayane śayānaṃ vṛṣabhekṣaṇam

उसने अपने हाथों से छूकर स्वच्छ रेशमी चादर बिछी शय्या पर सोए हुए, वृषभ-जैसे नेत्रों वाले पति को जगाया—मानो दूसरी लक्ष्मी समुद्र में सोए महातेजस्वी विष्णु को जगा रही हो;

श्लोक 10 (4.22.10)

यथा शची देवराजं रुद्राणी शंकरं यथा । ब्रह्माणमिव सावित्री देवसेना गुहं यथा ॥

yathā śacī devarājaṃ rudrāṇī śaṃkaraṃ yathā | brahmāṇamiva sāvitrī devasenā guhaṃ yathā

जैसे शची देवराज इन्द्र को, रुद्राणी शंकर को, सावित्री ब्रह्मा को और देवसेना स्कन्द को जगाती है;

श्लोक 11 (4.22.11)

दिशागजसमाकारं गजं गजवधूरिव । भीमं प्राबोधयत्कान्ता लक्ष्मीर्दामोदरं यथा ॥

diśāgajasamākāraṃ gajaṃ gajavadhūriva | bhīmaṃ prābodhayatkāntā lakṣmīrdāmodaraṃ yathā

जैसे हथिनी दिग्गजों के समान विशाल हाथी को जगाती है, जैसे लक्ष्मी दामोदर को जगाती हैं—वैसे ही उस प्रिया ने भीम को जगाया।

श्लोक 12 (4.22.12)

वीणेव मधुरालापा स्वरं गान्धारमाश्रिता । अभ्यभाषत पाञ्चाली कौरवं पाण्डुनन्दनम् ॥

vīṇeva madhurālāpā svaraṃ gāndhāramāśritā | abhyabhāṣata pāñcālī kauravaṃ pāṇḍunandanam

गान्धार स्वर में बजती वीणा के समान मधुर वाणी वाली पाञ्चाली ने कुरुवंशी पाण्डुपुत्र से कहा—

द्रौपद्युवाच

श्लोक 13 (4.22.13)

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे भीमसेन मृतो यथा । न मृतः स हि पापीयान्भार्यामालम्ब्य जीवति ॥

uttiṣṭhottiṣṭha kiṃ śeṣe bhīmasena mṛto yathā | na mṛtaḥ sa hi pāpīyānbhāryāmālambya jīvati

"उठो, उठो! भीमसेन, मरे हुए की तरह क्यों पड़े हो? वह पापी मरा नहीं है—तुम्हारी पत्नी पर हाथ डालकर भी वह जीवित है!

श्लोक 14 (4.22.14)

तस्मिञ्जीवति पापिष्ठे सेनावाहे मम द्विषि । तत्कर्म कृतवत्यद्य कथं निद्रां निषेवसे ॥

tasmiñjīvati pāpiṣṭhe senāvāhe mama dviṣi | tatkarma kṛtavatyadya kathaṃ nidrāṃ niṣevase

मेरा वह शत्रु, वह महापापी सेनापति आज वैसा कर्म करके भी जीवित है—तब तुम नींद में कैसे पड़े रह सकते हो?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (4.22.15)

सुखसुप्तश्च तं शब्दं निशम्य स वृकोदरः । संवेदितः कुरुश्रेष्ठः तोत्रैरिव महागजः ॥

sukhasuptaśca taṃ śabdaṃ niśamya sa vṛkodaraḥ | saṃveditaḥ kuruśreṣṭhaḥ totrairiva mahāgajaḥ

सुख से सोए हुए कुरुश्रेष्ठ वृकोदर उस आवाज़ को सुनकर ऐसे जाग उठे जैसे अंकुशों से कोंचा गया महागज।

श्लोक 16 (4.22.16)

स वै विहाय शयनं यस्मिन्सुप्तः प्रबोधितः । उदतिष्ठदमेयात्मा पर्यङ्के सोत्तरच्छदे ॥

sa vai vihāya śayanaṃ yasminsuptaḥ prabodhitaḥ | udatiṣṭhadameyātmā paryaṅke sottaracchade

जिस शय्या पर वे सोए थे और जगाए गए थे, उसे छोड़कर वे अपार आत्मबल वाले भीम चादर बिछे पलंग पर उठ बैठे।

श्लोक 17 (4.22.17)

उपवेश्य च दुर्धर्षः पाञ्चालकुलवर्धनीम् । अथाब्रवीद्राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रियाम् ॥

upaveśya ca durdharṣaḥ pāñcālakulavardhanīm | athābravīdrājaputrīṃ kauravyo mahiṣīṃ priyām

पाञ्चालकुल की कीर्ति बढ़ाने वाली राजकुमारी को पास बिठाकर उस दुर्जय कुरुवंशी ने अपनी प्रिय रानी से कहा—

भीम उवाच

श्लोक 18 (4.22.18)

केनार्थेन च संप्राप्ता त्वरितेव ममान्तिकम् । न ते प्रकृतिमान्वर्णः कृशा त्वमभिलक्ष्यसे ॥

kenārthena ca saṃprāptā tvariteva mamāntikam | na te prakṛtimānvarṇaḥ kṛśā tvamabhilakṣyase

"तुम किस कारण इतनी उतावली में मेरे पास आई हो? तुम्हारा रंग स्वाभाविक नहीं है; तुम दुर्बल दिखाई देती हो।

श्लोक 19 (4.22.19)

प्रकाशं यदि वा गुह्यं सर्वमाख्यातुमर्हसि । आचक्ष्व त्वमशेषेण सर्वं विद्यामहं यथा ॥

prakāśaṃ yadi vā guhyaṃ sarvamākhyātumarhasi | ācakṣva tvamaśeṣeṇa sarvaṃ vidyāmahaṃ yathā

बात खुली हो या गुप्त, तुम्हें सब कुछ बता देना चाहिए। पूरी बात बिना कुछ छोड़े कहो, जिससे मैं सब जान सकूँ।

श्लोक 20 (4.22.20)

सुखं वा यदि वा दुःखं शुभं वा यदि वाऽशुभम् । यद्यप्यसुकरं कर्म कृतमित्यवधारय ॥

sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ śubhaṃ vā yadi vā'śubham | yadyapyasukaraṃ karma kṛtamityavadhāraya

सुख हो या दुःख, शुभ हो या अशुभ—काम कितना ही कठिन क्यों न हो, उसे पूरा हुआ ही समझो।

श्लोक 21 (4.22.21)

अहमेव हि ते कृष्णे विश्वास्यः सर्वकर्मसु । अहमापत्सु चापि त्वां मोक्षयामि पुनः पुनः ॥

ahameva hi te kṛṣṇe viśvāsyaḥ sarvakarmasu | ahamāpatsu cāpi tvāṃ mokṣayāmi punaḥ punaḥ

कृष्णे, हर काम में केवल मैं ही तुम्हारे विश्वास के योग्य हूँ; मैं ही तुम्हें बार-बार विपत्तियों से छुड़ाता हूँ।

श्लोक 22 (4.22.22)

शीघ्रमुक्त्वा यथाकामं यत्ते कार्यं विवक्षितम् । गच्छ वै शयनायैव यावदन्यो न बुध्यते ॥

śīghramuktvā yathākāmaṃ yatte kāryaṃ vivakṣitam | gaccha vai śayanāyaiva yāvadanyo na budhyate

जो काम तुम कहना चाहती हो, वह जल्दी से जैसे चाहो कह दो, और फिर किसी दूसरे के जागने से पहले अपनी शय्या पर लौट जाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (4.22.23)

सा लज्जमाना भीता च अधोमुखमुखी ततः । नोवाच किंचिद्वचनं बाष्पदूषितलोचना ॥

sā lajjamānā bhītā ca adhomukhamukhī tataḥ | novāca kiṃcidvacanaṃ bāṣpadūṣitalocanā

लज्जित और भयभीत होकर उसने सिर नीचे झुका लिया और कुछ भी नहीं बोली; उसकी आँखें आँसुओं से धुँधली हो गई थीं।

श्लोक 24 (4.22.24)

अथाब्रवीद्भीमपराक्रमो बली वृकोदरः पाण्डवमुख्यसंमतः । प्रब्रूहि किं ते करवाणि सुन्दरि प्रियं प्रिये वारणमत्तगामिनि ॥

athābravīdbhīmaparākramo balī vṛkodaraḥ pāṇḍavamukhyasaṃmataḥ | prabrūhi kiṃ te karavāṇi sundari priyaṃ priye vāraṇamattagāmini

तब भयानक पराक्रम वाले, पाण्डवों में प्रधान युधिष्ठिर द्वारा सम्मानित बलवान वृकोदर बोले—"सुन्दरी, बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ? प्रिये, मदमत्त गज की-सी चाल वाली, तुम्हें क्या प्रिय है?"

द्रौपद्युवाच

श्लोक 25 (4.22.25)

अशोच्यता कुतस्तस्या यस्या भर्ता युधिष्ठिरः । जानन्सर्वाणि दुःखानि किं मां भीमानुपृच्छसि ॥

aśocyatā kutastasyā yasyā bhartā yudhiṣṭhiraḥ | jānansarvāṇi duḥkhāni kiṃ māṃ bhīmānupṛcchasi

"जिसके पति युधिष्ठिर हों, वह शोक से कैसे बच सकती है? तुम मेरे सारे दुःख जानते हो, भीम, फिर मुझसे क्यों पूछते हो?

श्लोक 26 (4.22.26)

यन्मां दासीप्रवादेन प्रातिकामी तदाऽनयत् । सभायां परिषन्मध्ये तन्मे मर्माणि कृन्तति ॥

yanmāṃ dāsīpravādena prātikāmī tadā'nayat | sabhāyāṃ pariṣanmadhye tanme marmāṇi kṛntati

प्रातिकामी ने मुझे दासी कहकर सभा में, सभासदों के बीच घसीट लिया था—वह बात आज भी मेरे मर्म को काटती है।

श्लोक 27 (4.22.27)

विकृष्टा हास्तिनपुरे सभायां राजसंसदि । दुःशासनेन केशान्ते परामृष्टा रजस्वला ॥

vikṛṣṭā hāstinapure sabhāyāṃ rājasaṃsadi | duḥśāsanena keśānte parāmṛṣṭā rajasvalā

हस्तिनापुर में राजाओं से भरी सभा में दुःशासन ने रजस्वला अवस्था में मुझे बाल पकड़कर घसीटा था,

श्लोक 28 (4.22.28)

क्षत्रियैस्तत्र कर्णाद्यैर्दृष्टा दुर्योधनेन च । श्वशुराभ्यां च भीष्मेण विदुरेण च धीमता । द्रोणेन च महाबाहो कृपेण च परंतप ॥

kṣatriyaistatra karṇādyairdṛṣṭā duryodhanena ca | śvaśurābhyāṃ ca bhīṣmeṇa vidureṇa ca dhīmatā | droṇena ca mahābāho kṛpeṇa ca paraṃtapa

और वहाँ कर्ण आदि क्षत्रियों ने, दुर्योधन ने, मेरे दोनों ससुरों ने, भीष्म ने, बुद्धिमान विदुर ने, महाबाहो, द्रोण ने और परन्तप, कृप ने मुझे उस दशा में देखा।

श्लोक 29 (4.22.29)

साऽहं श्वशुरयोर्मध्ये भ्रातृमध्ये च पाण्डव । केशे गृहीत्वा च सभां नीता जीवति वै त्वयि ॥

sā'haṃ śvaśurayormadhye bhrātṛmadhye ca pāṇḍava | keśe gṛhītvā ca sabhāṃ nītā jīvati vai tvayi

पाण्डव, तुम्हारे जीते-जी मुझे बाल पकड़कर दोनों ससुरों के बीच और भाइयों के बीच सभा में ले जाया गया।

श्लोक 30 (4.22.30)

विप्रयुक्ता ततश्चाहं वने राज्याद्वनं गता । साऽहं वने दुर्वसतिं वसन्ती त्वध्वकर्शिता । जटासुरपरिक्लेशात्प्राप्तापि सुमहद्भयम् ॥

viprayuktā tataścāhaṃ vane rājyādvanaṃ gatā | sā'haṃ vane durvasatiṃ vasantī tvadhvakarśitā | jaṭāsuraparikleśātprāptāpi sumahadbhayam

फिर राज्य से बिछुड़कर मैं वन में गई; वहाँ रास्तों की थकान से टूटी हुई मैंने बड़े कष्ट से निवास किया, और जटासुर के उत्पात से भी मुझ पर बड़ा भय आया।

श्लोक 31 (4.22.31)

पार्थिवस्य सुता नाम का नु जीवेत मादृशी । अनुभूय भृशं दुःखमन्यत्र द्रौपदीं प्रभो ॥

pārthivasya sutā nāma kā nu jīveta mādṛśī | anubhūya bhṛśaṃ duḥkhamanyatra draupadīṃ prabho

स्वामी, द्रौपदी को छोड़कर मेरी जैसी कौन राजकुमारी इतना भारी दुःख भोगकर भी जीवित रहेगी?

श्लोक 32 (4.22.32)

वनवासगता चाहं सैन्धवेन दुरात्मना । परामृष्टा द्वितीयं च सोढुमुत्सहते तु का ॥

vanavāsagatā cāhaṃ saindhavena durātmanā | parāmṛṣṭā dvitīyaṃ ca soḍhumutsahate tu kā

वनवास के समय दुष्टात्मा सैन्धव ने दूसरी बार मुझ पर हाथ डाला। कौन स्त्री यह सह सकती है?

श्लोक 33 (4.22.33)

पद्भ्यां पर्यचरं चाहं देशान्विषमसंस्थितान् । दुर्गाञ्श्वापदसंकीर्णांस्त्वयि जीवति पाण्डवे ॥

padbhyāṃ paryacaraṃ cāhaṃ deśānviṣamasaṃsthitān | durgāñśvāpadasaṃkīrṇāṃstvayi jīvati pāṇḍave

तुम जैसे पाण्डव के जीते-जी मैं ऊबड़-खाबड़, दुर्गम और हिंसक पशुओं से भरे प्रदेशों में पैदल भटकती रही।

श्लोक 34 (4.22.34)

ततोऽहं द्वादशे वर्षे वन्यमूलफलाशना । इदं पुरमनुप्राप्ता सुदेष्णापरिचारिका । परस्त्रियमुपातिष्ठे सत्यधर्मपरायणा ॥

tato'haṃ dvādaśe varṣe vanyamūlaphalāśanā | idaṃ puramanuprāptā sudeṣṇāparicārikā | parastriyamupātiṣṭhe satyadharmaparāyaṇā

फिर बारहवें वर्ष में, जंगली कन्द-मूल और फल खाकर, मैं सुदेष्णा की दासी बनकर इस नगर में आई; सत्य और धर्म में निष्ठा रखते हुए भी मैं पराई स्त्री की सेवा करती हूँ।

श्लोक 35 (4.22.35)

गोशीर्षकं पद्मकं च हरिश्यामं च चन्दनम् । नित्यं पिंषे विराटस्य त्वयि जीवति पाण्डव ॥

gośīrṣakaṃ padmakaṃ ca hariśyāmaṃ ca candanam | nityaṃ piṃṣe virāṭasya tvayi jīvati pāṇḍava

पाण्डव, तुम्हारे जीते-जी मैं प्रतिदिन विराट के लिए गोशीर्ष, पद्मक और हरिश्याम चन्दन पीसती हूँ।

श्लोक 36 (4.22.36)

साऽहं बहूनि दुःखानि गणयामि न ते कृते ॥

sā'haṃ bahūni duḥkhāni gaṇayāmi na te kṛte

फिर भी तुम्हारे लिए मैं इन बहुत-से दुःखों को कुछ नहीं गिनती।

श्लोक 37 (4.22.37)

मत्स्यराजसमक्षं तु तस्य धूर्तस्य पश्यतः । कीचकेन पदा स्पृष्टा का नु जीवेत मादृशी ॥

matsyarājasamakṣaṃ tu tasya dhūrtasya paśyataḥ | kīcakena padā spṛṣṭā kā nu jīveta mādṛśī

पर मत्स्यराज के सामने, उस जुआरी के देखते-देखते कीचक ने मुझे लात मारी—मेरी जैसी कौन स्त्री इसके बाद जीवित रह सकती है?

श्लोक 38 (4.22.38)

एवं बहुविधैर्दुःखैः क्लिश्यमानां च पाण्डव । न मां जानासि कौन्तेय किं फलं जीवितेन मे ॥

evaṃ bahuvidhairduḥkhaiḥ kliśyamānāṃ ca pāṇḍava | na māṃ jānāsi kaunteya kiṃ phalaṃ jīvitena me

पाण्डव, मैं इस प्रकार अनेक दुःखों से पीड़ित हूँ, और कुन्तीपुत्र, तुम मेरी सुध नहीं लेते। मेरे जीने से क्या लाभ?

श्लोक 39 (4.22.39)

द्रुपदस्य सुता चाहं धृष्टद्युम्नस्य चानुजा । अग्निकुण्डात्समुद्भूता नोर्व्यां जातु चराम्यहम् ॥

drupadasya sutā cāhaṃ dhṛṣṭadyumnasya cānujā | agnikuṇḍātsamudbhūtā norvyāṃ jātu carāmyaham

मैं द्रुपद की पुत्री और धृष्टद्युम्न की छोटी बहन हूँ; मैं यज्ञकुण्ड की अग्नि से प्रकट हुई हूँ, धरती पर जन्म लेने वाली साधारण स्त्री नहीं हूँ।

श्लोक 40 (4.22.40)

कीचकं चेन्न हन्यास्त्वं ग्रीवां बद्ध्वा जले म्रिये । विषमालोड्य पास्यामि प्रवेक्ष्याम्यथवाऽनलं ॥

kīcakaṃ cenna hanyāstvaṃ grīvāṃ baddhvā jale mriye | viṣamāloḍya pāsyāmi pravekṣyāmyathavā'nalaṃ

यदि तुम कीचक को नहीं मारोगे तो मैं गले में फन्दा बाँधकर जल में प्राण दे दूँगी, या विष घोलकर पी लूँगी, या आग में प्रवेश कर जाऊँगी;

श्लोक 41 (4.22.41)

आत्मानं नाशयिष्यामि वृक्षमारुह्य वा पते । शस्त्रेणाङ्गं च भेत्स्यामि किं फलं जीवितेन मे ॥

ātmānaṃ nāśayiṣyāmi vṛkṣamāruhya vā pate | śastreṇāṅgaṃ ca bhetsyāmi kiṃ phalaṃ jīvitena me

हे पति, या मैं पेड़ पर चढ़कर अपना अन्त कर लूँगी, या शस्त्र से अपना अंग चीर डालूँगी। मेरे जीने से क्या लाभ?

श्लोक 42 (4.22.42)

योऽयं राज्ञो विराटस्य कीचको नाम भारत । सेनानीः पुरुषव्याघ्र स्यालः परमदुर्मतिः ॥

yo'yaṃ rājño virāṭasya kīcako nāma bhārata | senānīḥ puruṣavyāghra syālaḥ paramadurmatiḥ

भारत, यह जो राजा विराट का सेनापति और साला कीचक है, हे पुरुषसिंह, वह अत्यन्त दुर्बुद्धि है।

श्लोक 43 (4.22.43)

स मां सैरन्ध्रिवेषेण वसन्तीं राजवेश्मनि । नित्यमेवाह दुष्टात्मा भार्या मम भवेति वै ॥

sa māṃ sairandhriveṣeṇa vasantīṃ rājaveśmani | nityamevāha duṣṭātmā bhāryā mama bhaveti vai

मैं सैरन्ध्री के वेश में राजमहल में रहती हूँ, और वह दुष्टात्मा मुझसे रोज़ कहता है—'मेरी पत्नी बन जा।'

श्लोक 44 (4.22.44)

तेनैवमुच्यमानाया वधार्हेणारिसूदन । कालेनेव फलं पक्वं हृदयं मे विदीर्यते ॥

tenaivamucyamānāyā vadhārheṇārisūdana | kāleneva phalaṃ pakvaṃ hṛdayaṃ me vidīryate

शत्रुसूदन, वध के योग्य उस व्यक्ति से ऐसी बातें सुनते-सुनते मेरा हृदय समय पर पके फल की तरह फट रहा है।

श्लोक 45 (4.22.45)

शरणं भव कौन्तेय मा स्म गच्छे युधिष्ठिरम् । निरुद्योगं निरामर्षं निर्वीर्यमरिमर्दन ॥

śaraṇaṃ bhava kaunteya mā sma gacche yudhiṣṭhiram | nirudyogaṃ nirāmarṣaṃ nirvīryamarimardana

कुन्तीपुत्र, तुम मेरे शरणदाता बनो; अरिमर्दन, मैं युधिष्ठिर की ओर न जाऊँ, जो उद्यमहीन, क्रोधहीन और पराक्रमहीन हैं।

श्लोक 46 (4.22.46)

मा स्म सीमन्तिनी काचिञ्जनयेत्पुत्रमीदृशम् ॥

mā sma sīmantinī kāciñjanayetputramīdṛśam

कोई भी सौभाग्यवती स्त्री ऐसा पुत्र कभी न जने!

श्लोक 47 (4.22.47)

विजानामि तवामर्षं बलं वीर्यं च पाण्डव । ततोऽहं परिदेवामि चाग्रतस्ते महाबल ॥

vijānāmi tavāmarṣaṃ balaṃ vīryaṃ ca pāṇḍava | tato'haṃ paridevāmi cāgrataste mahābala

पाण्डव, मैं तुम्हारे अमर्ष, बल और पराक्रम को जानती हूँ; इसीलिए, महाबली, मैं तुम्हारे सामने विलाप कर रही हूँ।

श्लोक 48 (4.22.48)

यथा यूथपतिर्मत्तः कुञ्जरः षाष्टिहायनः । भूमौ निपतितं बिल्वं पद्भ्यामाक्रम्य पीडयेत् ॥

yathā yūthapatirmattaḥ kuñjaraḥ ṣāṣṭihāyanaḥ | bhūmau nipatitaṃ bilvaṃ padbhyāmākramya pīḍayet

जैसे साठ वर्ष का मदमत्त यूथपति हाथी धरती पर गिरे बेल के फल को पैरों से दबाकर कुचल देता है,

श्लोक 49 (4.22.49)

तथैव च शिरस्तस्य निपात्य धरणीतले । वामेन पुरुषव्याघ्र मर्द पादेन पाण्डव ॥

tathaiva ca śirastasya nipātya dharaṇītale | vāmena puruṣavyāghra marda pādena pāṇḍava

वैसे ही, पुरुषसिंह पाण्डव, उसका सिर धरती पर पटककर अपने बाएँ पैर से कुचल डालो।

श्लोक 50 (4.22.50)

स चेदुद्यन्तमादित्यं प्रातरुत्थाय पश्यति । कीचकः शर्वरीं व्युष्टां नाहं जीवितुमुत्सहे ॥

sa cedudyantamādityaṃ prātarutthāya paśyati | kīcakaḥ śarvarīṃ vyuṣṭāṃ nāhaṃ jīvitumutsahe

यदि यह रात बीतने पर कीचक सवेरे उठकर उगते सूर्य को देख लेगा, तो मैं जीवित नहीं रहना चाहूँगी।

श्लोक 51 (4.22.51)

शापितोऽसि मम प्राणैः सुकृतेनार्जुनस्य च । युधिष्ठिरस्य पादाभ्यां यमयोर्जीवितेन च । कीचकस्य वधं नाद्य प्रतिजानासि भारत ॥

śāpito'si mama prāṇaiḥ sukṛtenārjunasya ca | yudhiṣṭhirasya pādābhyāṃ yamayorjīvitena ca | kīcakasya vadhaṃ nādya pratijānāsi bhārata

भारत, मैं तुम्हें अपने प्राणों की, अर्जुन के पुण्य की, युधिष्ठिर के चरणों की और नकुल-सहदेव के जीवन की शपथ दिलाती हूँ—क्या तुम आज कीचक के वध की प्रतिज्ञा नहीं करोगे?

श्लोक 52 (4.22.52)

भ्रातरं च विगर्हस्व ज्येष्ठं दुर्द्यूतदेविनम् । यस्यास्मि कर्मणा प्राप्ता दुःखमेतदनन्तकम् ॥

bhrātaraṃ ca vigarhasva jyeṣṭhaṃ durdyūtadevinam | yasyāsmi karmaṇā prāptā duḥkhametadanantakam

और अपने उस बड़े भाई की निन्दा करो, जो खोटा जुआरी है, जिसके कर्म के कारण मैं इस अन्तहीन दुःख में पड़ी हूँ।

श्लोक 53 (4.22.53)

येषां मुख्यतमो ज्येष्ठो भवेत्तु कुलपांसनः । भ्रातरं परमन्वीयुस्तेऽपि शालीनबुद्धयः ॥

yeṣāṃ mukhyatamo jyeṣṭho bhavettu kulapāṃsanaḥ | bhrātaraṃ paramanvīyuste'pi śālīnabuddhayaḥ

जिनका सबसे बड़ा और प्रमुख भाई कुल को कलंकित करने वाला हो, वे भी अपने संकोची स्वभाव के कारण अन्त तक उसी भाई के पीछे चलते हैं।

श्लोक 54 (4.22.54)

को हि राज्यं परित्यज्य सपुत्रपशुबान्धवम् । प्रव्रजेत महारण्यमजिनैः परिवारितः ॥

ko hi rājyaṃ parityajya saputrapaśubāndhavam | pravrajeta mahāraṇyamajinaiḥ parivāritaḥ

भला और कौन पुत्रों, पशुओं और बन्धु-बान्धवों सहित अपना राज्य त्यागकर मृगचर्म ओढ़े महावन में निकल जाता?

श्लोक 55 (4.22.55)

यदि निष्कसहस्राणि यद्वाऽन्यत्सारवद्धनम् । सायं प्रातरदेविष्यदपि संवत्सरायुतम् ॥

yadi niṣkasahasrāṇi yadvā'nyatsāravaddhanam | sāyaṃ prātaradeviṣyadapi saṃvatsarāyutam

यदि वह हज़ारों स्वर्णमुद्राओं से, या किसी और बहुमूल्य धन से, दस हज़ार वर्षों तक सुबह-शाम जुआ खेलता रहता,

श्लोक 56 (4.22.56)

रुक्मं हिरण्यं वासांसि यानं युग्यमजाविकम् । अश्वाश्वतरसङ्घाश्च न जातु क्षयमाव्रजेत् ॥

rukmaṃ hiraṇyaṃ vāsāṃsi yānaṃ yugyamajāvikam | aśvāśvatarasaṅghāśca na jātu kṣayamāvrajet

तो भी उसका सोना, स्वर्णराशि, वस्त्र, रथ, वाहन, भेड़-बकरियाँ और घोड़ों-खच्चरों के झुंड कभी समाप्त न होते।

श्लोक 57 (4.22.57)

सोऽयं द्यूतप्रवादेन श्रियश्चैवावरोपितः । तूष्णीमास्ते यथा मूढः स्वानि कर्माणि चिन्तयन् ॥

so'yaṃ dyūtapravādena śriyaścaivāvaropitaḥ | tūṣṇīmāste yathā mūḍhaḥ svāni karmāṇi cintayan

पर वही आज जुए की चर्चा के कारण अपने ऐश्वर्य से गिराया हुआ, मूढ़ की तरह चुपचाप बैठा अपने कर्मों का चिन्तन करता रहता है।

श्लोक 58 (4.22.58)

पुरा दशसहस्राणि दन्तिनां वाजिनामपि । यं यान्तमनुयान्ति स्म सोऽयं द्यूतेन जीवति ॥

purā daśasahasrāṇi dantināṃ vājināmapi | yaṃ yāntamanuyānti sma so'yaṃ dyūtena jīvati

जिसके चलने पर कभी दस हज़ार हाथी और घोड़े पीछे-पीछे चलते थे, वही आज जुए के सहारे जी रहा है।

श्लोक 59 (4.22.59)

तथा शतसहस्राणि स्त्रीणाममिततेजसाम् । उपासते स्म राजानमिन्द्रप्रस्थे युधिष्ठिरम् ॥

tathā śatasahasrāṇi strīṇāmamitatejasām | upāsate sma rājānamindraprasthe yudhiṣṭhiram

और इन्द्रप्रस्थ में अपार तेज वाली लाखों स्त्रियाँ राजा युधिष्ठिर की सेवा में उपस्थित रहती थीं।

श्लोक 60 (4.22.60)

शतं दासीसहस्राणां यस्य नित्यं महानसे । पात्रहस्ता दिवारात्रमतिथीन्भोजयन्त्युत ॥

śataṃ dāsīsahasrāṇāṃ yasya nityaṃ mahānase | pātrahastā divārātramatithīnbhojayantyuta

जिसकी रसोई में प्रतिदिन एक लाख दासियाँ हाथों में पात्र लिए दिन-रात अतिथियों को भोजन कराती थीं;

श्लोक 61 (4.22.61)

एष निष्कसहस्राणि दत्त्वा प्रातर्दिनेदिने । द्यूतजेन ह्यनर्थेन महता समुपावृतः ॥

eṣa niṣkasahasrāṇi dattvā prātardinedine | dyūtajena hyanarthena mahatā samupāvṛtaḥ

जो प्रतिदिन सवेरे हज़ारों स्वर्णमुद्राएँ दान करता था—वही आज जुए से उत्पन्न इस महान अनर्थ से घिर गया है।

श्लोक 62 (4.22.62)

एनं सुस्वरसंपन्ना बहवः सूतमागधाः । सुप्तं प्रातरुपातिष्ठन्सुमृष्टमणिकुण्डलाः ॥

enaṃ susvarasaṃpannā bahavaḥ sūtamāgadhāḥ | suptaṃ prātarupātiṣṭhansumṛṣṭamaṇikuṇḍalāḥ

मधुर स्वर वाले बहुत-से सूत और मागध, चमकते मणिकुण्डल पहने, सवेरे उसके सोते समय ही उसकी सेवा में आ खड़े होते थे।

श्लोक 63 (4.22.63)

सहस्रं वालखिल्यानां सहस्रमुदवासिनाम् । सहस्रमश्मकुट्टानां सहस्रं वायुभोजिनाम् ॥

sahasraṃ vālakhilyānāṃ sahasramudavāsinām | sahasramaśmakuṭṭānāṃ sahasraṃ vāyubhojinām

एक हज़ार वालखिल्य, एक हज़ार जल में निवास करने वाले, एक हज़ार पत्थर से कूटकर अन्न खाने वाले, एक हज़ार वायु पर जीने वाले;

श्लोक 64 (4.22.64)

सहस्रं मुनिपत्नीनां सहस्रं ब्रह्मचारिणाम् । सहस्रं मौनशीलानां सहस्रं गृहमेधिनाम् ॥

sahasraṃ munipatnīnāṃ sahasraṃ brahmacāriṇām | sahasraṃ maunaśīlānāṃ sahasraṃ gṛhamedhinām

एक हज़ार मुनिपत्नियाँ, एक हज़ार ब्रह्मचारी, एक हज़ार मौनव्रती, एक हज़ार गृहस्थ;

श्लोक 65 (4.22.65)

हंसाः परमहंसाश्च योगिनश्च द्विजातयः । कुटीचकाः परिव्राजो ये चान्ये वनचारिणः ॥

haṃsāḥ paramahaṃsāśca yoginaśca dvijātayaḥ | kuṭīcakāḥ parivrājo ye cānye vanacāriṇaḥ

हंस और परमहंस, योगी और द्विज, कुटीचक, परिव्राजक और अन्य वनवासी;

श्लोक 66 (4.22.66)

संविभक्तात्मकाश्चैव बहवश्चोर्ध्वरेतसः । चतुर्वेदविदो विप्राः शिक्षामीमांसपारगाः । क्रमपाठाश्च ये विप्राः सामाध्यायनिकाश्च ये ॥

saṃvibhaktātmakāścaiva bahavaścordhvaretasaḥ | caturvedavido viprāḥ śikṣāmīmāṃsapāragāḥ | kramapāṭhāśca ye viprāḥ sāmādhyāyanikāśca ye

अपना सब कुछ बाँट देने वाले और ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी बहुत-से लोग, चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण, शिक्षा और मीमांसा में पारंगत, क्रमपाठ करने वाले ब्राह्मण और सामवेद का अध्ययन करने वाले—

श्लोक 67 (4.22.67)

सहस्रमृषयो यस्य नित्यमासन्सभासदः । तपःश्रुतोपसंपन्नाः सर्वकामैरुपास्थिताः ॥

sahasramṛṣayo yasya nityamāsansabhāsadaḥ | tapaḥśrutopasaṃpannāḥ sarvakāmairupāsthitāḥ

तप और शास्त्रज्ञान से सम्पन्न एक हज़ार ऋषि सदा उसकी सभा के सदस्य रहते थे, और उन्हें सभी इच्छित वस्तुएँ उपलब्ध कराई जाती थीं।

श्लोक 68 (4.22.68)

अन्धान्वृद्धाननाथांस्तु सर्वराष्ट्रेषु दुःखितान् । बिभर्त्यन्नार्थिनो नित्यमानृशंस्याद्युधिष्ठिरः ॥

andhānvṛddhānanāthāṃstu sarvarāṣṭreṣu duḥkhitān | bibhartyannārthino nityamānṛśaṃsyādyudhiṣṭhiraḥ

युधिष्ठिर करुणावश सदा सब राज्यों के अन्धों, बूढ़ों, अनाथों और अन्न माँगने आए सभी दुखियों का भरण-पोषण करते थे।

श्लोक 69 (4.22.69)

स एष निलयं प्राप्तो मत्स्यस्य परिचारकः । सभायां विनतो राज्ञः कङ्को नाम युधिष्ठिरः ॥

sa eṣa nilayaṃ prāpto matsyasya paricārakaḥ | sabhāyāṃ vinato rājñaḥ kaṅko nāma yudhiṣṭhiraḥ

वही युधिष्ठिर आज मत्स्यराज का सेवक बनकर इस घर में आ पहुँचे हैं और कंक नाम से सभा में राजा के आगे झुके रहते हैं।

श्लोक 70 (4.22.70)

इन्द्रप्रस्थे निवसतः समये यस्य पार्थिवाः । आसन्बलिकराः सर्वे सोऽन्येभ्यो भृतिमिच्छति ॥

indraprasthe nivasataḥ samaye yasya pārthivāḥ | āsanbalikarāḥ sarve so'nyebhyo bhṛtimicchati

इन्द्रप्रस्थ में रहते समय जिसे सब राजा कर देते थे, वही आज दूसरों से वेतन चाहता है।

श्लोक 71 (4.22.71)

पार्थिवाः पृथिवीपाला यस्यासन्वशवर्तिनः । स वशे विवशो राज्ञां परेषामद्य वर्तते ॥

pārthivāḥ pṛthivīpālā yasyāsanvaśavartinaḥ | sa vaśe vivaśo rājñāṃ pareṣāmadya vartate

पृथ्वी के पालक राजा जिसके वश में रहते थे, वही आज विवश होकर दूसरे राजाओं के अधीन जी रहा है।

श्लोक 72 (4.22.72)

संप्राप्य पृथिवीं कृत्स्नां रश्मिवानिव तेजसा । सोऽद्य राज्ञो विराटस्य सभास्तारो युधिष्ठिरः ॥

saṃprāpya pṛthivīṃ kṛtsnāṃ raśmivāniva tejasā | so'dya rājño virāṭasya sabhāstāro yudhiṣṭhiraḥ

जिसने सूर्य के समान तेज से सारी पृथ्वी को प्राप्त किया था, वही युधिष्ठिर आज राजा विराट का सभासद है।

श्लोक 73 (4.22.73)

यमुपासत राजानं सभायामृषिसत्तमाः । तमुपासीनमद्यान्यं पश्य पाण्डव पाण्डवम् ॥

yamupāsata rājānaṃ sabhāyāmṛṣisattamāḥ | tamupāsīnamadyānyaṃ paśya pāṇḍava pāṇḍavam

पाण्डव, उस पाण्डव को देखो—सभा में श्रेष्ठ ऋषि जिस राजा की उपासना करते थे, वही आज दूसरे की उपासना में बैठा है।

श्लोक 74 (4.22.74)

अनवद्यं महाप्राज्ञं जीवितार्थेन संवृतम् । दृष्ट्वा कस्य न दुःखं स्याद्धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥

anavadyaṃ mahāprājñaṃ jīvitārthena saṃvṛtam | dṛṣṭvā kasya na duḥkhaṃ syāddharmarājaṃ yudhiṣṭhiram

निर्दोष और परम बुद्धिमान धर्मराज युधिष्ठिर को केवल जीविका के लिए इस दशा में बँधा देखकर किसे दुःख न होगा?

श्लोक 75 (4.22.75)

उपास्ते स्म सभायां यं कृत्स्नाऽपि च वसुन्धरा । तमुपासीनमद्यान्यं पश्य भारत भारतम् ॥

upāste sma sabhāyāṃ yaṃ kṛtsnā'pi ca vasundharā | tamupāsīnamadyānyaṃ paśya bhārata bhāratam

भारत, उस भरतवंशी को देखो—सारी पृथ्वी सभा में जिसकी उपासना करती थी, वही आज दूसरे की उपासना में बैठा है।

श्लोक 76 (4.22.76)

एवं बहुविधैर्दुःखैः पीड्यमानामनाथवत् । शोकसागरमध्यस्थां किं मां भीम न पश्यसि ॥

evaṃ bahuvidhairduḥkhaiḥ pīḍyamānāmanāthavat | śokasāgaramadhyasthāṃ kiṃ māṃ bhīma na paśyasi

भीम, इस प्रकार अनेक दुःखों से अनाथ की तरह पीड़ित, शोक के सागर के बीच डूबती हुई मुझे क्या तुम नहीं देखते?

श्लोक 77 (4.22.77)

इदं तु मे दुःखतरं यत्त्वां वक्ष्यामि भारत । न मेऽभ्यसूया कर्तव्या दुःखादेतद्ब्रवीम्यहम् ॥

idaṃ tu me duḥkhataraṃ yattvāṃ vakṣyāmi bhārata | na me'bhyasūyā kartavyā duḥkhādetadbravīmyaham

भारत, अब जो मैं तुमसे कहने जा रही हूँ, वह और भी बड़ा दुःख है। तुम मुझसे रुष्ट न होना; मैं दुःख के कारण ही यह कह रही हूँ।

श्लोक 78 (4.22.78)

शार्दूलैर्महिषैर्नागैरागारे योत्स्यसे यदा । कैकेय्याः प्रेक्षमाणायास्तदा मे कश्मलोऽभवत् ॥

śārdūlairmahiṣairnāgairāgāre yotsyase yadā | kaikeyyāḥ prekṣamāṇāyāstadā me kaśmalo'bhavat

जब-जब तुम्हें महल में कैकेयी के देखते हुए बाघों, भैंसों और हाथियों से लड़ना होता है, तब-तब मुझ पर मूर्च्छा छा जाती है;

श्लोक 79 (4.22.79)

हसन्त्यन्तःपुरे नार्यो मम चेष्टां निरीक्ष्य च ॥

hasantyantaḥpure nāryo mama ceṣṭāṃ nirīkṣya ca

और रनिवास की स्त्रियाँ मेरी यह दशा देखकर हँसती हैं।

श्लोक 80 (4.22.80)

तत उत्थाय कैकेयी सर्वास्ताः प्रत्यभाषत । प्रेक्ष्य मामनवद्याङ्गीं कश्मलाभिहतामिव ॥

tata utthāya kaikeyī sarvāstāḥ pratyabhāṣata | prekṣya māmanavadyāṅgīṃ kaśmalābhihatāmiva

तब कैकेयी उठकर, मुझ सुन्दर अंगों वाली को मूर्च्छा से आहत-सी देखकर, उन सब स्त्रियों से बोली—

श्लोक 81 (4.22.81)

स्नेहात्संवासजादेव तदा वै चारुहासिनी । युध्यमानं महावीर्यमिमं समनुशोचति ॥

snehātsaṃvāsajādeva tadā vai cāruhāsinī | yudhyamānaṃ mahāvīryamimaṃ samanuśocati

'साथ रहने से उपजे स्नेह के कारण ही यह मधुर मुस्कान वाली इस महापराक्रमी को लड़ते देखकर शोक करती है।

श्लोक 82 (4.22.82)

कल्याणरूपा सैरन्ध्री वललश्चापि सुन्दरः । स्त्रीणां चित्तं हि दुर्ज्ञेयं युक्तरूपौ हि मे मतौ ॥

kalyāṇarūpā sairandhrī valalaścāpi sundaraḥ | strīṇāṃ cittaṃ hi durjñeyaṃ yuktarūpau hi me matau

सैरन्ध्री सुन्दरी है और वलल भी रूपवान है। स्त्रियों का मन जानना कठिन होता है; मेरी समझ में ये दोनों एक-दूसरे के योग्य हैं।

श्लोक 83 (4.22.83)

सैरन्ध्री प्रियसंवासान्नित्यं करुणवादिनी । अस्मिन्राजकुले चैतौ तुल्यकालनिवासिनौ ॥

sairandhrī priyasaṃvāsānnityaṃ karuṇavādinī | asminrājakule caitau tulyakālanivāsinau

प्रिय साथ के कारण सैरन्ध्री सदा उसके प्रति करुणा भरी बातें करती है; और ये दोनों इस राजकुल में एक ही समय से रह रहे हैं।'

श्लोक 84 (4.22.84)

इति ब्रुवाणा वाक्यानि सा मां नित्यमजीजपत् । क्रुध्यन्तीं मां च संप्रेक्ष्य पर्यशङ्कत मां त्वयि ॥

iti bruvāṇā vākyāni sā māṃ nityamajījapat | krudhyantīṃ māṃ ca saṃprekṣya paryaśaṅkata māṃ tvayi

ऐसी बातें कहकर वह मुझे सदा छेड़ती रहती थी; और मुझे क्रोधित देखकर उसे तुम्हारे प्रति मेरे लगाव का सन्देह हो गया।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 85 (4.22.85)

तस्यां तथा ब्रुवन्त्यां तु भीमो भीमपराक्रमः । नोवाच किंचिद्वचनं संरम्भाद्रक्तलोचनः ॥

tasyāṃ tathā bruvantyāṃ tu bhīmo bhīmaparākramaḥ | novāca kiṃcidvacanaṃ saṃrambhādraktalocanaḥ

जब वह इस प्रकार कह रही थी, तब भयानक पराक्रम वाले भीम क्रोध से लाल आँखें किए कुछ भी नहीं बोले।

श्लोक 86 (4.22.86)

ज्ञात्वा तु रुषितं भीमं द्रौपदी पुनरब्रवीत् । शोके यौधिष्ठिरे मग्ना नाहं जीवितुमुत्सहे ॥

jñātvā tu ruṣitaṃ bhīmaṃ draupadī punarabravīt | śoke yaudhiṣṭhire magnā nāhaṃ jīvitumutsahe

भीम को क्रुद्ध जानकर द्रौपदी फिर बोली—"युधिष्ठिर के शोक में डूबी हुई मैं जीवित नहीं रहना चाहती।

द्रौपद्युवाच

श्लोक 87 (4.22.87)

यस्तु देवान्मनुष्यांश्च सर्वानेकरथोऽजयत् । सोऽयं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा । आस्ते वेषप्रतिच्छन्नः कन्यानां परिचारकः ॥

yastu devānmanuṣyāṃśca sarvānekaratho'jayat | so'yaṃ rājño virāṭasya kanyānāṃ nartako yuvā | āste veṣapraticchannaḥ kanyānāṃ paricārakaḥ

जिसने अकेले एक रथ से सब देवताओं और मनुष्यों को जीत लिया था, वही आज राजा विराट की कन्याओं का युवा नृत्यशिक्षक है और वेश बदलकर कन्याओं का सेवक बना रहता है।

श्लोक 88 (4.22.88)

योऽतर्पयदमेयात्मा खाण्डवे जातवेदसम् । सोऽन्तःपुरगतः पार्थः कूपेऽग्निरिव संवृतः ॥

yo'tarpayadameyātmā khāṇḍave jātavedasam | so'ntaḥpuragataḥ pārthaḥ kūpe'gniriva saṃvṛtaḥ

जिस अपार आत्मबल वाले ने खाण्डव वन में अग्नि को तृप्त किया था, वही पार्थ आज रनिवास में कुएँ में छिपी आग की तरह ढका पड़ा है।

श्लोक 89 (4.22.89)

यस्माद्भयममित्राणां सदैव पुरुषर्षभात् । स लोकपरिभूतेन वेषेणास्ते धनंजयः ॥

yasmādbhayamamitrāṇāṃ sadaiva puruṣarṣabhāt | sa lokaparibhūtena veṣeṇāste dhanaṃjayaḥ

जिस पुरुषश्रेष्ठ से शत्रु सदा भयभीत रहते थे, वही धनञ्जय आज लोगों द्वारा तिरस्कृत वेश में रहता है।

श्लोक 90 (4.22.90)

यस्य ज्यातलनिर्घोषात्समकम्पन्त शत्रवः । षण्डरूपं वहन्तं तं गीतं नृत्तावलम्बनम् । कुर्वन्तमर्जुनं दृष्ट्वा न मे स्वास्थ्यं मनो व्रजेत् ॥

yasya jyātalanirghoṣātsamakampanta śatravaḥ | ṣaṇḍarūpaṃ vahantaṃ taṃ gītaṃ nṛttāvalambanam | kurvantamarjunaṃ dṛṣṭvā na me svāsthyaṃ mano vrajet

जिसकी प्रत्यंचा की टंकार से शत्रु काँप उठते थे, उस अर्जुन को नपुंसक का रूप धारण किए गाने-नाचने में लगा देखकर मेरे मन को चैन नहीं मिलता।

श्लोक 91 (4.22.91)

स्त्रियो गीतस्वरात्तस्य मुदिताः पर्युपासते ॥

striyo gītasvarāttasya muditāḥ paryupāsate

स्त्रियाँ उसके गीत के स्वर से प्रसन्न होकर उसे घेरे रहती हैं।

श्लोक 92 (4.22.92)

किरीटं सूर्यसंकाशं यस्य मूर्धन्यशोभत । वेणीविकृतकेशान्तः सोऽयमद्य धनंजयः ॥

kirīṭaṃ sūryasaṃkāśaṃ yasya mūrdhanyaśobhata | veṇīvikṛtakeśāntaḥ so'yamadya dhanaṃjayaḥ

जिसके मस्तक पर कभी सूर्य के समान चमकता किरीट शोभा पाता था, वही धनञ्जय आज बालों की चोटी गूँथे फिरता है।

श्लोक 93 (4.22.93)

यस्मिन्नस्त्राणि दिव्यानि समस्तानि महात्मनि । आधारः सर्वविद्यानां यो धारयति कुण्डले ॥

yasminnastrāṇi divyāni samastāni mahātmani | ādhāraḥ sarvavidyānāṃ yo dhārayati kuṇḍale

जिस महात्मा में सभी दिव्य अस्त्र स्थित हैं, जो सभी विद्याओं का आधार है, वह आज कुण्डल पहनता है।

श्लोक 94 (4.22.94)

यं वै राजसहस्राणि तेजसाऽप्रतिमं भुवि । समरे नातिवर्तन्ते वेलामिव महोर्मयः ॥

yaṃ vai rājasahasrāṇi tejasā'pratimaṃ bhuvi | samare nātivartante velāmiva mahormayaḥ

पृथ्वी पर तेज में जिसकी कोई बराबरी नहीं, जिसे हज़ारों राजा युद्ध में वैसे ही पार न कर सके जैसे बड़ी-बड़ी लहरें तट को पार नहीं कर पातीं—

श्लोक 95 (4.22.95)

सोऽयं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा । आस्ते वेषप्रतिच्छन्नः कन्यानां परिचारकः ॥

so'yaṃ rājño virāṭasya kanyānāṃ nartako yuvā | āste veṣapraticchannaḥ kanyānāṃ paricārakaḥ

वही आज राजा विराट की कन्याओं का युवा नृत्यशिक्षक है और वेश बदलकर कन्याओं का सेवक बना रहता है।

श्लोक 96 (4.22.96)

यस्य स्म रथनिर्घोषात्समकम्पत मेदिनी । सपर्वतवनाकाशा सहस्थावरजङ्गमा ॥

yasya sma rathanirghoṣātsamakampata medinī | saparvatavanākāśā sahasthāvarajaṅgamā

जिसके रथ की घरघराहट से पर्वतों, वनों और आकाश सहित, चर-अचर सब प्राणियों सहित पृथ्वी काँप उठती थी;

श्लोक 97 (4.22.97)

यस्मिञ्जाते महेष्वासे कुन्त्याः प्रीतिरवर्धत । न स शोचति मामद्य भीमसेन तवानुजः ॥

yasmiñjāte maheṣvāse kuntyāḥ prītiravardhata | na sa śocati māmadya bhīmasena tavānujaḥ

जिस महाधनुर्धर के जन्म पर कुन्ती का आनन्द बढ़ गया था—भीमसेन, तुम्हारा वह छोटा भाई आज मेरे लिए शोक नहीं करता।

श्लोक 98 (4.22.98)

विभूषितमलंकारैः कुण्डलैः परिपातुकैः । कम्बुपाणिमथायान्तं दृष्ट्वा सीदति मे मनः ॥

vibhūṣitamalaṃkāraiḥ kuṇḍalaiḥ paripātukaiḥ | kambupāṇimathāyāntaṃ dṛṣṭvā sīdati me manaḥ

जब मैं उसे आभूषणों से सजा, हिलते कुण्डल पहने और हाथों में शंख की चूड़ियाँ डाले आते देखती हूँ, तो मेरा मन बैठ जाता है।

श्लोक 99 (4.22.99)

वेणीविकृतकेशान्तं भीमधन्वानमर्जुनम् । कन्यापरिवृतं दृष्ट्वा शोकं गच्छति मे मनः ॥

veṇīvikṛtakeśāntaṃ bhīmadhanvānamarjunam | kanyāparivṛtaṃ dṛṣṭvā śokaṃ gacchati me manaḥ

भयंकर धनुष वाले अर्जुन को चोटी गूँथे, कन्याओं से घिरा देखकर मेरा मन शोक में डूब जाता है।

श्लोक 100 (4.22.100)

यदा ह्येनं परिवृतं कन्याभिर्देवरूपिणम् । प्रच्छन्नमिव मातङ्गं परिपूर्णं करेणुभिः ॥

yadā hyenaṃ parivṛtaṃ kanyābhirdevarūpiṇam | pracchannamiva mātaṅgaṃ paripūrṇaṃ kareṇubhiḥ

जब मैं इस देवताओं जैसे रूप वाले को कन्याओं से घिरा, हथिनियों के झुंड में छिपे हाथी के समान देखती हूँ,

श्लोक 101 (4.22.101)

मात्स्यं पार्थं च गायन्तं विराटं समुपस्थितम् । पश्यामि तूर्यमध्यस्थं दृष्ट्वा मुह्यति मे मनः ॥

mātsyaṃ pārthaṃ ca gāyantaṃ virāṭaṃ samupasthitam | paśyāmi tūryamadhyasthaṃ dṛṣṭvā muhyati me manaḥ

और पार्थ को वाद्यों के बीच गाते हुए मत्स्यराज विराट की सेवा में उपस्थित देखती हूँ—तो यह देखकर मेरा मन मोहित हो जाता है।

श्लोक 102 (4.22.102)

नूनमार्या न जानाति कृच्छ्रं प्राप्तं धनंजयम् । अजातशत्रुं कौरव्यं मग्नं दुर्द्यूतदेविनम् ॥

nūnamāryā na jānāti kṛcchraṃ prāptaṃ dhanaṃjayam | ajātaśatruṃ kauravyaṃ magnaṃ durdyūtadevinam

निश्चय ही आर्या कुन्ती नहीं जानतीं कि धनञ्जय इतने कष्ट में पड़ा है, और खोटा जुआ खेलने वाले कुरुवंशी अजातशत्रु दुःख में डूबे हैं।

श्लोक 103 (4.22.103)

ऐन्द्रवारुणवायव्यब्रह्माग्नेयैः सवैष्णवैः । अग्नीन्संतर्पयन्पार्थः सर्वशत्रुनिबर्हणः । दिव्यैरस्त्रैरमेयात्मा सर्वांश्चैकरथोऽजयत् ॥

aindravāruṇavāyavyabrahmāgneyaiḥ savaiṣṇavaiḥ | agnīnsaṃtarpayanpārthaḥ sarvaśatrunibarhaṇaḥ | divyairastrairameyātmā sarvāṃścaikaratho'jayat

जिस सब शत्रुओं का संहार करने वाले पार्थ ने इन्द्र, वरुण, वायु, ब्रह्मा, अग्नि और विष्णु के अस्त्रों से अग्नि को तृप्त किया था, और जिस अपार आत्मबल वाले ने दिव्य अस्त्रों से अकेले एक रथ पर सबको जीत लिया था;

श्लोक 104 (4.22.104)

कौबेरं वैष्णवं शैवमस्त्राण्यन्यानि भारत । दर्शयन्नस्त्रवीर्यं च वासुदेवसहायवान् ॥

kauberaṃ vaiṣṇavaṃ śaivamastrāṇyanyāni bhārata | darśayannastravīryaṃ ca vāsudevasahāyavān

भारत, जिसने वासुदेव की सहायता पाकर कुबेर, विष्णु और शिव के तथा अन्य अस्त्र दिखाकर अपने अस्त्रबल का परिचय दिया था;

श्लोक 105 (4.22.105)

दिव्यं गान्धर्वमस्त्रं च वायव्यमथ वैष्णवम् । ब्राह्मं पाशुपतं चैव स्थूणाकर्णं च दर्शयन् ॥

divyaṃ gāndharvamastraṃ ca vāyavyamatha vaiṣṇavam | brāhmaṃ pāśupataṃ caiva sthūṇākarṇaṃ ca darśayan

जिसने दिव्य गान्धर्व अस्त्र, वायव्य और वैष्णव, ब्राह्म, पाशुपत और स्थूणाकर्ण अस्त्र का प्रदर्शन किया था;

श्लोक 106 (4.22.106)

पौलोमान्कालकेयांश्च इन्द्रशत्रून्महाबलान् । निवातकवचैः सार्धं घोरानेकरथोऽजयत् । सोऽन्तःपुरगतः पार्थः कूपेऽग्निरिव संवृतः ॥

paulomānkālakeyāṃśca indraśatrūnmahābalān | nivātakavacaiḥ sārdhaṃ ghorānekaratho'jayat | so'ntaḥpuragataḥ pārthaḥ kūpe'gniriva saṃvṛtaḥ

जिसने अकेले एक रथ से इन्द्र के भयानक और महाबली शत्रु पौलोमों और कालकेयों को निवातकवचों सहित जीत लिया था—वही पार्थ आज रनिवास में कुएँ में छिपी आग की तरह ढका पड़ा है।

श्लोक 107 (4.22.107)

यो वै महातपः कुर्वन्महाबलपराक्रमः । युद्धेन तोषयामास शंकरं शूलपाणिनम् ॥

yo vai mahātapaḥ kurvanmahābalaparākramaḥ | yuddhena toṣayāmāsa śaṃkaraṃ śūlapāṇinam

जिस महाबली और पराक्रमी ने महान तप करते हुए युद्ध द्वारा त्रिशूलधारी शंकर को प्रसन्न किया था—

श्लोक 108 (4.22.108)

कन्यापुरगतं दृष्ट्वा गोष्ठेष्विव महावृषम् । स्त्रीवेषविकृतं पार्थं कुन्तीं गच्छति मे मनः ॥

kanyāpuragataṃ dṛṣṭvā goṣṭheṣviva mahāvṛṣam | strīveṣavikṛtaṃ pārthaṃ kuntīṃ gacchati me manaḥ

उस पार्थ को गोशाला में बँधे महावृषभ की तरह कन्याओं के महल में, स्त्री-वेश से विकृत देखकर मेरा मन कुन्ती की ओर चला जाता है।

श्लोक 109 (4.22.109)

यः स्त्रीभिर्नित्यसंपन्नो रूपेणास्त्रेण मेधया । सोऽश्वबन्धो विराटस्य पश्य कालस्य पर्ययम् ॥

yaḥ strībhirnityasaṃpanno rūpeṇāstreṇa medhayā | so'śvabandho virāṭasya paśya kālasya paryayam

जो सदा स्त्रियों से घिरा रहता है और रूप, अस्त्रविद्या तथा बुद्धि से सम्पन्न है, वह आज विराट का अश्वपाल है—समय का यह उलटफेर देखो!

श्लोक 110 (4.22.110)

राजकन्याश्च वेश्याश्च विशां दुहितरश्च याः । सर्वाः सारयुता नार्यो दामग्रन्थिवशं गताः । प्रेष्यकर्मणि तं दृष्ट्वा शोचामि विलपामि च ॥

rājakanyāśca veśyāśca viśāṃ duhitaraśca yāḥ | sarvāḥ sārayutā nāryo dāmagranthivaśaṃ gatāḥ | preṣyakarmaṇi taṃ dṛṣṭvā śocāmi vilapāmi ca

राजकुमारियाँ, गणिकाएँ और वैश्यों की बेटियाँ—सभी सम्पन्न स्त्रियाँ दामग्रन्थि के वश में हो गई हैं। उसे सेवक का काम करते देखकर मैं शोक करती और विलाप करती हूँ।

श्लोक 111 (4.22.111)

विराटमुपतिष्ठन्तं दर्शयन्तं च वाजिनम् । अभ्यकीर्यन्त बृन्दानि दामग्रन्थिमुदीक्षितुम् । विनयन्तं जवेनाश्वान्धर्मराजस्य पश्यतः ॥

virāṭamupatiṣṭhantaṃ darśayantaṃ ca vājinam | abhyakīryanta bṛndāni dāmagranthimudīkṣitum | vinayantaṃ javenāśvāndharmarājasya paśyataḥ

जब वह विराट की सेवा में उपस्थित होकर उन्हें घोड़े दिखाता है और धर्मराज के देखते हुए वेग से घोड़ों को साधता है, तब दामग्रन्थि को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है।

श्लोक 112 (4.22.112)

किंनु मां मन्यसे पार्थ सुखितेति परन्तप । तथा दृष्ट्वा यवीयांसं सहदेवं युधांपतिम् ॥

kiṃnu māṃ manyase pārtha sukhiteti parantapa | tathā dṛṣṭvā yavīyāṃsaṃ sahadevaṃ yudhāṃpatim

परन्तप पार्थ, क्या तुम मुझे सुखी समझते हो? उसी प्रकार, सबसे छोटे, योद्धाओं के स्वामी सहदेव को देखकर—

श्लोक 113 (4.22.113)

तं दृष्ट्वा गोषु गोसङ्ख्यं वत्सचर्मक्षितीशयम् । दुःखशोकपरीताङ्गी पाण्डुभूताऽस्मि पाण्डव ॥

taṃ dṛṣṭvā goṣu gosaṅkhyaṃ vatsacarmakṣitīśayam | duḥkhaśokaparītāṅgī pāṇḍubhūtā'smi pāṇḍava

उसे गायों के बीच गिनती करने वाला बना, बछड़े की खाल पर धरती पर सोता देखकर, पाण्डव, मेरे अंग-अंग दुःख और शोक से भर गए हैं और मैं पीली पड़ गई हूँ।

श्लोक 114 (4.22.114)

सहदेवस्य वृत्तानि चिन्तयन्ती पुनःपुनः । न पश्यामि महाभाग सहदेवस्य दुष्कृतम् । यस्मादेवंविधं क्लेशं प्राप्नुयात्सत्यविक्रमः ॥

sahadevasya vṛttāni cintayantī punaḥpunaḥ | na paśyāmi mahābhāga sahadevasya duṣkṛtam | yasmādevaṃvidhaṃ kleśaṃ prāpnuyātsatyavikramaḥ

सहदेव के आचरण पर बार-बार विचार करके भी, हे महाभाग, मुझे सहदेव का कोई ऐसा दुष्कर्म दिखाई नहीं देता जिसके कारण उस सत्यपराक्रमी को ऐसा क्लेश भोगना पड़े।

श्लोक 115 (4.22.115)

दूयामि भरतश्रेष्ठ दृष्ट्वा ते भ्रातरं प्रियम् । गोषु गोवृषसंकाशं मात्स्येनापि निवेशितम् ॥

dūyāmi bharataśreṣṭha dṛṣṭvā te bhrātaraṃ priyam | goṣu govṛṣasaṃkāśaṃ mātsyenāpi niveśitam

भरतश्रेष्ठ, तुम्हारे प्रिय भाई को मत्स्यराज द्वारा गायों के बीच, गोवृषभ के समान, नियुक्त किया देखकर मैं दुःख से जलती हूँ।

श्लोक 116 (4.22.116)

संरब्धतररक्ताक्षं गोपालानां पुरोगमम् । विराटमभिनन्दन्तं चित्ते मे भवति ज्वरः ॥

saṃrabdhatararaktākṣaṃ gopālānāṃ purogamam | virāṭamabhinandantaṃ citte me bhavati jvaraḥ

जब मैं उसे क्रोध से लाल आँखें किए, ग्वालों के आगे-आगे चलते हुए विराट का अभिवादन करते देखती हूँ, तो मेरे मन में ज्वर-सा उठ आता है।

श्लोक 117 (4.22.117)

सहदेवं हि मे नित्यं वीरमार्या प्रशंसति । महाभिजनसंपन्नो नीतिमान्कुलवानपि ॥

sahadevaṃ hi me nityaṃ vīramāryā praśaṃsati | mahābhijanasaṃpanno nītimānkulavānapi

आर्या कुन्ती मुझसे सदा वीर सहदेव की प्रशंसा करती थीं—'यह उच्च कुल में जन्मा, नीतिमान और कुलीन है;

श्लोक 118 (4.22.118)

ह्रीनिषेवो ह्यनवमो धार्मिकश्च प्रियश्च मे । स तेऽरण्येषु वोढव्यः पाञ्चालि रजनीष्वपि ॥

hrīniṣevo hyanavamo dhārmikaśca priyaśca me | sa te'raṇyeṣu voḍhavyaḥ pāñcāli rajanīṣvapi

लज्जाशील, निर्दोष, धर्मात्मा और मुझे प्रिय है। पाञ्चालि, वनों में रातों में भी तुम्हें इसकी देखभाल करनी होगी।

श्लोक 119 (4.22.119)

सुकुमारश्च शूरश्च राजानं चाप्यनुव्रतः । ज्येष्ठापचायिनं वीरं स्वयं पाञ्चालि भोजयेः ॥

sukumāraśca śūraśca rājānaṃ cāpyanuvrataḥ | jyeṣṭhāpacāyinaṃ vīraṃ svayaṃ pāñcāli bhojayeḥ

यह कोमल भी है और शूर भी, राजा का अनुगामी है और बड़ों का आदर करने वाला है; पाञ्चालि, इस वीर को तुम स्वयं भोजन कराना।'

श्लोक 120 (4.22.120)

इत्युवाच हि मां कुन्ती रुदती पुत्रगृद्धिनी । प्रव्रजन्तं महारण्यं तं परिष्वज्य तिष्ठती ॥

ityuvāca hi māṃ kuntī rudatī putragṛddhinī | pravrajantaṃ mahāraṇyaṃ taṃ pariṣvajya tiṣṭhatī

पुत्र के प्रेम में व्याकुल कुन्ती ने रोते हुए, महावन को जाते हुए उसे गले लगाकर खड़े-खड़े मुझसे ऐसा कहा था।

श्लोक 121 (4.22.121)

तं दृष्ट्वा गोषु गोपालवेषमास्थाय विष्ठितम् । सहदेवं युधांश्रेष्ठं किंनु जीवामि पाण्डव ॥

taṃ dṛṣṭvā goṣu gopālaveṣamāsthāya viṣṭhitam | sahadevaṃ yudhāṃśreṣṭhaṃ kiṃnu jīvāmi pāṇḍava

योद्धाओं में श्रेष्ठ सहदेव को ग्वाले का वेश धारण कर गायों के बीच रहते देखकर, पाण्डव, मैं कैसे जीवित रहूँ?

श्लोक 122 (4.22.122)

एवं दुःखशताविष्टा युधिष्ठिरनिमित्ततः ॥

evaṃ duḥkhaśatāviṣṭā yudhiṣṭhiranimittataḥ

इस प्रकार युधिष्ठिर के कारण मैं सैकड़ों दुःखों से घिरी हुई हूँ।

श्लोक 123 (4.22.123)

पुनः प्रतिविशिष्टानि दुःखानि शृणु भारत । वर्धन्ते मयि कौन्तेय वक्ष्याम्यन्यानि तानि वै ॥

punaḥ prativiśiṣṭāni duḥkhāni śṛṇu bhārata | vardhante mayi kaunteya vakṣyāmyanyāni tāni vai

भारत, मुझमें बढ़ते हुए उनसे भी बड़े दुःखों को सुनो; कुन्तीपुत्र, मैं तुम्हें वे दूसरे दुःख भी बताती हूँ।

श्लोक 124 (4.22.124)

युष्मासु ध्रियमाणेषु दुःखानि विविधान्युत । शोषयन्ति शरीरं मे किंनु दुःखतरं ततः ॥

yuṣmāsu dhriyamāṇeṣu duḥkhāni vividhānyuta | śoṣayanti śarīraṃ me kiṃnu duḥkhataraṃ tataḥ

तुम सबके जीवित रहते हुए भी तरह-तरह के दुःख मेरे शरीर को सुखा रहे हैं। इससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?

श्लोक 125 (4.22.125)

एकभर्ता तु या नारी सा सुखेनैव वर्तते । पञ्च मे पतयः सन्ति मम दुःखमनन्तकम् ॥

ekabhartā tu yā nārī sā sukhenaiva vartate | pañca me patayaḥ santi mama duḥkhamanantakam

जिस स्त्री का एक पति होता है, वह सुख से रहती है; मेरे पाँच पति हैं, फिर भी मेरे दुःख का कोई अन्त नहीं।"

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