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विराट पर्व · अध्याय 23

द्रौपदी का भीम के सामने दुःख-निवेदन

भीम के सामने अपनी व्यथा कहती हुई द्रौपदी सोचती है कि सुख-दुःख पहिये की तरह घूमते हैं और वह दैव के अनुकूल होने तथा अपने पतियों के पुनः उदय की प्रतीक्षा कर रही है। वह बताती है कि पाण्डवों की पटरानी होकर वह आज सुदेष्णा की डरी हुई दासी है और विराट के लिए चन्दन पीसती है, और भीम को अपने घट्ठे पड़े हाथ दिखाती है। भीम की छाती से लगकर रोती हुई वह कहती है कि यदि उन्होंने कीचक को नहीं मारा तो वह विष पी लेगी या अग्नि में प्रवेश कर जाएगी; भीम उसके हाथ मुख से लगाकर रो पड़ते हैं और उत्तर देने को उद्यत होते हैं।

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द्रौपद्युवाच

श्लोक 1 (4.23.1)

अहं सैरन्ध्रिवेषेण वसन्ती राजवेश्मनि । वशगाऽस्मि सुदेष्णाया अक्षधूर्तस्य कारणात् ॥

ahaṃ sairandhriveṣeṇa vasantī rājaveśmani | vaśagā'smi sudeṣṇāyā akṣadhūrtasya kāraṇāt

सैरन्ध्री के वेष में राजभवन में रहती हुई मैं जुए के उस धूर्त के कारण सुदेष्णा के अधीन हूँ।

श्लोक 2 (4.23.2)

विक्रियां पश्य मे तीव्रां राजपुत्र्याः परन्तप । आसे कालमुपासीना सर्वदुःखसहा पुनः ॥

vikriyāṃ paśya me tīvrāṃ rājaputryāḥ parantapa | āse kālamupāsīnā sarvaduḥkhasahā punaḥ

हे शत्रुओं को तपाने वाले, मुझ राजकुमारी की यह कठोर दुर्दशा देखो। सब दुःख सहती हुई मैं फिर से अपने समय की प्रतीक्षा में बैठी हूँ।

श्लोक 3 (4.23.3)

अनित्याः खलु मर्त्यानामर्थाश्च व्यसनानि च । इति मत्वा प्रतीक्षामि भर्तॄणामुदयं पुनः ॥

anityāḥ khalu martyānāmarthāśca vyasanāni ca | iti matvā pratīkṣāmi bhartṝṇāmudayaṃ punaḥ

मनुष्यों के लिए सम्पत्ति और विपत्ति दोनों ही स्थायी नहीं हैं — यही सोचकर मैं अपने पतियों के पुनः उदय की प्रतीक्षा कर रही हूँ।

श्लोक 4 (4.23.4)

चक्रवत्परिवर्तन्ते ह्यर्थाश्च व्यसनानि च । इति कृत्वा प्रतीक्षामि भर्तॄणामुदयं पुनः ॥

cakravatparivartante hyarthāśca vyasanāni ca | iti kṛtvā pratīkṣāmi bhartṝṇāmudayaṃ punaḥ

सम्पत्ति और विपत्ति पहिये की भाँति घूमती रहती हैं — यह मानकर मैं अपने पतियों के पुनः उदय की प्रतीक्षा करती हूँ।

श्लोक 5 (4.23.5)

य एव हेतुर्भवति पुरुषस्य जयावहः । पराजये च हेतुः स इति च प्रतिपालये ॥

ya eva heturbhavati puruṣasya jayāvahaḥ | parājaye ca hetuḥ sa iti ca pratipālaye

जो कारण मनुष्य को विजय दिलाता है, वही उसकी पराजय का भी कारण होता है — यही सोचकर मैं प्रतीक्षा करती हूँ।

श्लोक 6 (4.23.6)

दत्त्वा याचन्ति पुरुषा हत्वा हन्यन्त एव ते । पातयित्वा च पात्यन्ते परैरिति च मे श्रुतम् ॥

dattvā yācanti puruṣā hatvā hanyanta eva te | pātayitvā ca pātyante parairiti ca me śrutam

मैंने सुना है कि जो दान देते हैं वे स्वयं भी माँगते हैं, जो मारते हैं वे स्वयं मारे जाते हैं, और जो दूसरों को गिराते हैं वे दूसरों द्वारा गिराए जाते हैं।

श्लोक 7 (4.23.7)

न दैवस्यातिभारोस्ति न चैवास्यातिवर्तनम् । इति चाप्यागमं भूयो दैवस्य प्रतिपालये ॥

na daivasyātibhārosti na caivāsyātivartanam | iti cāpyāgamaṃ bhūyo daivasya pratipālaye

दैव के लिए कोई भार अधिक नहीं, और न उसका उल्लंघन ही सम्भव है। इसलिए मैं फिर से दैव के अनुकूल होने की प्रतीक्षा करती हूँ।

श्लोक 8 (4.23.8)

स्थितं पूर्वं जलं यत्र न पुनस्तत्र तिष्ठति । इति पर्यायमिच्छन्ति प्रतीक्षाम्युदयं पुनः ॥

sthitaṃ pūrvaṃ jalaṃ yatra na punastatra tiṣṭhati | iti paryāyamicchanti pratīkṣāmyudayaṃ punaḥ

जहाँ पहले जल ठहरा था, वहाँ वह फिर नहीं ठहरता — लोग ऐसा ही परिवर्तन-क्रम मानते हैं; इसलिए मैं फिर से उदय की प्रतीक्षा करती हूँ।

श्लोक 9 (4.23.9)

दैवेन किल यस्यार्थः सुनीतोपि विपद्यते । सदा दैवागमे यत्नस्तेन कार्यो विजानता ॥

daivena kila yasyārthaḥ sunītopi vipadyate | sadā daivāgame yatnastena kāryo vijānatā

दैव प्रतिकूल हो तो भली भाँति सोचा हुआ प्रयोजन भी विफल हो जाता है; इसलिए समझदार मनुष्य को सदा दैव के अनुकूल होने के लिए यत्न करना चाहिए।

श्लोक 10 (4.23.10)

किंनु मे वचनस्याद्य कथितस्य प्रयोजनम् । पृच्छ मां दुःखितामेनामपृष्टाऽपि ब्रवीमि ते ॥

kiṃnu me vacanasyādya kathitasya prayojanam | pṛccha māṃ duḥkhitāmenāmapṛṣṭā'pi bravīmi te

किन्तु आज यह सब कहने का मेरा क्या प्रयोजन? मुझ दुखिया से पूछो — यद्यपि बिना पूछे भी मैं तुमसे कह रही हूँ।

श्लोक 11 (4.23.11)

महिषी पाण्डुपुत्राणां दुहिता द्रुपदस्य च । इमामवस्थां संप्राप्ता मदन्या का जिजीविषेत् ॥

mahiṣī pāṇḍuputrāṇāṃ duhitā drupadasya ca | imāmavasthāṃ saṃprāptā madanyā kā jijīviṣet

पाण्डुपुत्रों की पटरानी और द्रुपद की पुत्री होकर ऐसी दशा को प्राप्त — मेरे सिवा कौन स्त्री जीना चाहेगी?

श्लोक 12 (4.23.12)

कुरून्परिहरन्सर्वान्पाञ्चालानपि भारत । पाण्डवेयांश्च संप्राप्तो मम शोको ह्यरिन्दम ॥

kurūnpariharansarvānpāñcālānapi bhārata | pāṇḍaveyāṃśca saṃprāpto mama śoko hyarindama

हे भारत, हे शत्रुदमन, मेरा यह शोक समस्त कुरुओं और पांचालों को भी लज्जित करता हुआ पाण्डवों तक आ पहुँचा है।

श्लोक 13 (4.23.13)

भ्रातृभिः श्वशुरैः पुत्रैर्बहुभिः परिवारिता । एवं समुदिता नारी कान्येयं दुःखभागिनी ॥

bhrātṛbhiḥ śvaśuraiḥ putrairbahubhiḥ parivāritā | evaṃ samuditā nārī kānyeyaṃ duḥkhabhāginī

अनेक भाइयों, ससुरों और पुत्रों से घिरी हुई ऐसी सौभाग्यशालिनी नारी — कौन दूसरी स्त्री इतने दुःख की भागी हुई है?

श्लोक 14 (4.23.14)

नूनं बालतया धातुर्मया वै विप्रियं कृतम् । तस्य प्रभावाद्दुर्नीतं प्राप्ताऽस्मि भरतर्षभ ॥

nūnaṃ bālatayā dhāturmayā vai vipriyaṃ kṛtam | tasya prabhāvāddurnītaṃ prāptā'smi bharatarṣabha

निश्चय ही बचपन में मैंने विधाता का कोई अप्रिय किया होगा, जिसके प्रभाव से हे भरतश्रेष्ठ, मैं इस दुर्गति को प्राप्त हुई हूँ।

श्लोक 15 (4.23.15)

वर्णं विकारमपि मे पश्य पाण्डव यादृशम् । ईदृशो मे न तत्रासीद्दुःखे परमके पुरा ॥

varṇaṃ vikāramapi me paśya pāṇḍava yādṛśam | īdṛśo me na tatrāsīdduḥkhe paramake purā

हे पाण्डुनन्दन, देखो मेरा वर्ण कैसा बदल गया है। पहले वहाँ घोर दुःख में भी मेरी ऐसी दशा नहीं हुई थी।

श्लोक 16 (4.23.16)

त्वमेव भीम जानीषे यन्मे पार्थ सुखं पुरा । साऽहं दासीत्वमापन्ना न शान्तिं मनसा लभे ॥

tvameva bhīma jānīṣe yanme pārtha sukhaṃ purā | sā'haṃ dāsītvamāpannā na śāntiṃ manasā labhe

हे भीम, हे पार्थ, तुम ही जानते हो कि पहले मुझे कैसा सुख था। वही मैं आज दासी बनकर मन में शान्ति नहीं पाती।

श्लोक 17 (4.23.17)

तद्दैविकमिदं मन्ये यत्र पार्थो धनञ्जयः । भीमधन्वा महारङ्गे चास्ते शान्त इवानलः ॥

taddaivikamidaṃ manye yatra pārtho dhanañjayaḥ | bhīmadhanvā mahāraṅge cāste śānta ivānalaḥ

मैं इसे दैव का ही विधान मानती हूँ कि भयंकर धनुष वाले पार्थ धनंजय विशाल नृत्यशाला में बुझी हुई-सी आग की भाँति शान्त बैठे हैं।

श्लोक 18 (4.23.18)

अशक्या वेदितुं पार्थ प्राणिनां वै गतिर्नरैः । विनिपातमिमं पश्य युष्माकमविचिन्तितम् ॥

aśakyā vedituṃ pārtha prāṇināṃ vai gatirnaraiḥ | vinipātamimaṃ paśya yuṣmākamavicintitam

हे पार्थ, प्राणियों की गति को मनुष्य नहीं जान सकते। तुम लोगों का यह पतन देखो, जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की गई थी।

श्लोक 19 (4.23.19)

यस्या मम मुखप्रेक्षा यूयमिन्द्रसमाः सदा । सा प्रेक्षे मुखमन्यासामवराणां वरा सती ॥

yasyā mama mukhaprekṣā yūyamindrasamāḥ sadā | sā prekṣe mukhamanyāsāmavarāṇāṃ varā satī

जिस मेरे मुख की ओर इन्द्र के समान तुम सब सदा निहारते थे, वही मैं श्रेष्ठ होकर भी आज अपने से हीन स्त्रियों का मुख ताकती हूँ।

श्लोक 20 (4.23.20)

पश्य पाण्डव मेऽवस्थां यथा नार्हामि वै तथा । युष्मासु ध्रियमाणेषु पाञ्चालेषु च मानद ॥

paśya pāṇḍava me'vasthāṃ yathā nārhāmi vai tathā | yuṣmāsu dhriyamāṇeṣu pāñcāleṣu ca mānada

हे पाण्डुनन्दन, हे मान देने वाले, मेरी यह दशा देखो, जिसके मैं कदापि योग्य नहीं — और वह भी तब, जब तुम लोग और पांचाल जीवित हैं।

श्लोक 21 (4.23.21)

यस्याः सागरपर्यन्ता पृथिवी वशवर्तिनी । आसीत्साऽद्य सुदेष्णायाः पाञ्चाली वशवर्तिनी ॥

yasyāḥ sāgaraparyantā pṛthivī vaśavartinī | āsītsā'dya sudeṣṇāyāḥ pāñcālī vaśavartinī

जिसके वश में समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी थी, वही पांचाली आज सुदेष्णा के वश में है।

श्लोक 22 (4.23.22)

यस्याः पुरश्चरा ह्यासन्पृष्ठतश्चानुगामिनः । साहमद्य सुदेष्णायाः पुरः पश्चाच्च गामिनी ॥

yasyāḥ puraścarā hyāsanpṛṣṭhataścānugāminaḥ | sāhamadya sudeṣṇāyāḥ puraḥ paścācca gāminī

जिसके आगे-आगे और पीछे-पीछे सेवक चलते थे, वही मैं आज सुदेष्णा के आगे-पीछे चलती हूँ।

श्लोक 23 (4.23.23)

इदं तु दुःखं कौन्तेय ममासह्यं निबोध तत् । या न जातु स्वयं पिंषे गात्रोद्वर्तनमात्मनः । अन्यत्र कुन्त्या भद्रं ते सा पिनष्म्यद्य चन्दनं ॥

idaṃ tu duḥkhaṃ kaunteya mamāsahyaṃ nibodha tat | yā na jātu svayaṃ piṃṣe gātrodvartanamātmanaḥ | anyatra kuntyā bhadraṃ te sā pinaṣmyadya candanaṃ

हे कुन्तीनन्दन, मेरा यह असह्य दुःख सुनो। जो मैं कुन्ती को छोड़कर कभी अपने शरीर के उबटन के लिए भी स्वयं कुछ नहीं पीसती थी — तुम्हारा कल्याण हो — वही आज चन्दन पीसती हूँ।

श्लोक 24 (4.23.24)

पश्य कौन्तेय पाणी मे नैवं वै भवतः पुरा । इत्यस्मै दर्शयामास किणवन्तौ करावुभौ ॥

paśya kaunteya pāṇī me naivaṃ vai bhavataḥ purā | ityasmai darśayāmāsa kiṇavantau karāvubhau

“हे कुन्तीनन्दन, मेरे हाथ देखो — पहले ये ऐसे नहीं थे।” यह कहकर उसने उसे घट्ठे पड़े अपने दोनों हाथ दिखाए।

श्लोक 25 (4.23.25)

बिभेमि कुन्त्या या नाऽहं युष्माकं वा कदाचन । साऽद्याग्रतो विराटस्य भीता तिष्ठामि किंकरी ॥

bibhemi kuntyā yā nā'haṃ yuṣmākaṃ vā kadācana | sā'dyāgrato virāṭasya bhītā tiṣṭhāmi kiṃkarī

जो मैं कभी कुन्ती से या तुम लोगों से भी नहीं डरती थी, वही आज विराट के सामने डरी हुई दासी बनकर खड़ी रहती हूँ।

श्लोक 26 (4.23.26)

किंनु वक्ष्यति सम्राण्मां वर्णकः सुकृतो न वा । नान्यपिष्टं विराटस्य चन्दनं किल रोचते ॥

kiṃnu vakṣyati samrāṇmāṃ varṇakaḥ sukṛto na vā | nānyapiṣṭaṃ virāṭasya candanaṃ kila rocate

“सम्राट् मुझसे क्या कहेंगे? उबटन ठीक बना है या नहीं?” — क्योंकि कहते हैं, विराट को किसी दूसरे का पीसा चन्दन अच्छा नहीं लगता।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (4.23.27)

सा कीर्तयन्ती दुःखानि भीमसेनस्य भामिनी । रुरोद शनकैः कृष्णा भीमस्योरस्समाश्रिता ॥

sā kīrtayantī duḥkhāni bhīmasenasya bhāminī | ruroda śanakaiḥ kṛṣṇā bhīmasyorassamāśritā

भीमसेन से अपने दुःख कहती हुई सुन्दरी कृष्णा भीम की छाती से लगकर धीरे-धीरे रोने लगी।

श्लोक 28 (4.23.28)

सा बाष्पकलया वाचा निश्वसन्ती पुनःपुनः । हृदयं भीमसेनस्य घटयन्तीदमब्रवीत् ॥

sā bāṣpakalayā vācā niśvasantī punaḥpunaḥ | hṛdayaṃ bhīmasenasya ghaṭayantīdamabravīt

आँसुओं से रुँधी वाणी में बार-बार निःश्वास लेती हुई, भीमसेन के हृदय को झकझोरती हुई वह बोली —

द्रौपद्युवाच

श्लोक 29 (4.23.29)

नाल्पं कृतं मया भीम देवानां किल्बिषं पुरा । अभाग्या या तु जीवामि मर्तव्ये सति पाण्डव ॥

nālpaṃ kṛtaṃ mayā bhīma devānāṃ kilbiṣaṃ purā | abhāgyā yā tu jīvāmi martavye sati pāṇḍava

हे भीम, पहले मैंने देवताओं का कोई छोटा अपराध नहीं किया होगा; हे पाण्डुनन्दन, मैं कैसी अभागिन हूँ कि मर जाना उचित होने पर भी जी रही हूँ।

श्लोक 30 (4.23.30)

कीचकं चेन्न हन्यास्त्वं स्वात्मानं नाशयाम्यहम् । विषमालोड्य पास्यामि प्रवेक्ष्याम्यथवाऽनलम् । अभाग्याऽहमपुण्याऽहं नित्यदुःखा च विक्लवा ॥

kīcakaṃ cenna hanyāstvaṃ svātmānaṃ nāśayāmyaham | viṣamāloḍya pāsyāmi pravekṣyāmyathavā'nalam | abhāgyā'hamapuṇyā'haṃ nityaduḥkhā ca viklavā

यदि तुम कीचक को नहीं मारोगे तो मैं अपने को नष्ट कर दूँगी — विष घोलकर पी लूँगी या अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी। मैं अभागिन हूँ, पुण्यहीन हूँ, सदा दुखी और व्याकुल हूँ।

श्लोक 31 (4.23.31)

पापे निपतितायाश्च किं फलं जीवितेन मे । इत्यस्मै दर्शयामास किणबद्धौ करावुभौ ॥

pāpe nipatitāyāśca kiṃ phalaṃ jīvitena me | ityasmai darśayāmāsa kiṇabaddhau karāvubhau

“इस विपत्ति में गिरी हुई मुझे जीने से क्या फल?” — यह कहकर उसने उसे घट्ठों से भरे अपने दोनों हाथ दिखाए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 32 (4.23.32)

ततस्तस्याः करौ पीनौ किणबद्धौ वृकोदरः । मुखमानीय वेपन्त्या रुरोद परवीरहा ॥

tatastasyāḥ karau pīnau kiṇabaddhau vṛkodaraḥ | mukhamānīya vepantyā ruroda paravīrahā

तब शत्रुवीरों का संहार करने वाले वृकोदर ने काँपती हुई द्रौपदी के कोमल, घट्ठे पड़े हाथों को अपने मुख से लगाया और रो पड़े।

श्लोक 33 (4.23.33)

तौ गृहीत्वा च कौन्तेयो बाष्पमुत्सृज्य वीर्यवान् । ततः परमदुःखार्त इदं वचनमब्रवीत् ॥

tau gṛhītvā ca kaunteyo bāṣpamutsṛjya vīryavān | tataḥ paramaduḥkhārta idaṃ vacanamabravīt

उन हाथों को पकड़े हुए पराक्रमी कुन्तीपुत्र ने आँसू बहाए और फिर अत्यन्त दुःख से व्याकुल होकर यह वचन कहा —

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