विराट पर्व · अध्याय 24
भीम का धैर्य-उपदेश और द्रौपदी की कीचक-वध की माँग
भीम द्रौपदी को बताते हैं कि जब विराट की सभा में कीचक ने उसका अपमान किया था, तब वे मत्स्यों का संहार करना चाहते थे, पर युधिष्ठिर ने कनखियों से उन्हें रोक दिया; और यह बात उन्हें जलाती है कि कौरव अब भी जीवित हैं। सरस्वती-तट पर युधिष्ठिर के उपदेश को याद करते हुए वे उसे धर्म पर टिके रहने को कहते हैं, सीता, लोपामुद्रा, सुकन्या, इन्द्रसेना और दमयन्ती जैसी पतिव्रताओं के उदाहरण देते हैं, और आश्वासन देते हैं कि तीस रातों में तेरहवाँ वर्ष पूरा होगा और वह फिर रानी बनेगी। द्रौपदी कहती है कि वह राजा को दोष नहीं देती, कीचक की बार-बार की कुचेष्टाओं और धमकियों का वर्णन करती है, और माँग करती है कि भीम सूर्योदय से पहले उसे मार डालें, नहीं तो वह विष पी लेगी। भीम उसे गले लगाकर सान्त्वना देते हैं और मन ही मन कीचक के वध का निश्चय कर लेते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.24.1)
आश्वासयंस्तां पाञ्चालीं भीमसेन उवाच ह । शृणु भद्रे वरारोहे क्रोधात्तत्र तु चिन्तितम् ॥
āśvāsayaṃstāṃ pāñcālīṃ bhīmasena uvāca ha | śṛṇu bhadre varārohe krodhāttatra tu cintitam
पांचाली को सान्त्वना देते हुए भीमसेन ने कहा — “हे भद्रे, हे सुन्दरी, सुनो, वहाँ क्रोध में मैंने क्या सोचा था।”
भीमसेन उवाच
श्लोक 2 (4.24.2)
त्वां वै सभागतां दृष्ट्वा मात्स्यानां कदनं महत् । कर्तुकामेन भद्रं ते वृक्षश्चावेक्षितो मया ॥
tvāṃ vai sabhāgatāṃ dṛṣṭvā mātsyānāṃ kadanaṃ mahat | kartukāmena bhadraṃ te vṛkṣaścāvekṣito mayā
तुम्हें सभा में आई देखकर मैं मत्स्यों का भारी संहार करना चाहता था — तुम्हारा कल्याण हो — और इसके लिए मैंने एक वृक्ष की ओर देखा भी था।
श्लोक 3 (4.24.3)
तत्र मां धर्मराजस्तु कटाक्षेण न्यवारयत् । तज्ज्ञात्वाऽवाङ्मुखस्तूष्णीमास्थितोस्मि महानसं ॥
tatra māṃ dharmarājastu kaṭākṣeṇa nyavārayat | tajjñātvā'vāṅmukhastūṣṇīmāsthitosmi mahānasaṃ
किन्तु वहाँ धर्मराज ने कनखियों से मुझे रोक दिया। यह समझकर मैं सिर झुकाए चुपचाप रसोईघर में चला गया।
श्लोक 4 (4.24.4)
शृणुष्वान्यत्प्रतिज्ञातं यद्वदामीह भामिनि । धिगस्तु मे बाहुबलं गाण्डीवं फल्गुनस्य च । यत्ते रक्तौ पुरा भूत्वा पाणी कृतकिणाविमौ ॥
śṛṇuṣvānyatpratijñātaṃ yadvadāmīha bhāmini | dhigastu me bāhubalaṃ gāṇḍīvaṃ phalgunasya ca | yatte raktau purā bhūtvā pāṇī kṛtakiṇāvimau
हे भामिनी, एक और बात सुनो जिसकी मैंने प्रतिज्ञा की है और जो मैं यहाँ कहता हूँ — मेरे बाहुबल को और फाल्गुन के गाण्डीव को धिक्कार है कि तुम्हारे ये हाथ, जो पहले लाल और कोमल थे, अब घट्ठों से भर गए हैं।
श्लोक 5 (4.24.5)
तदद्य मां तु तपति यत्कृतं न मया पुरा । सभायां स्म विराटस्य करोमि कदनं महत् ॥
tadadya māṃ tu tapati yatkṛtaṃ na mayā purā | sabhāyāṃ sma virāṭasya karomi kadanaṃ mahat
आज मुझे यही बात संताप देती है कि मैंने वह पहले नहीं किया — मैं तो विराट की सभा में ही भारी संहार कर डालता।
श्लोक 6 (4.24.6)
तत्र मे कारणं भाति कौन्तेयो यत्प्रतीक्षते । तदहं तस्य विज्ञाय स्थितो धर्मस्य शासने ॥
tatra me kāraṇaṃ bhāti kaunteyo yatpratīkṣate | tadahaṃ tasya vijñāya sthito dharmasya śāsane
पर वहाँ मुझे एक कारण दिखाई दिया — कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनका अभिप्राय जानकर मैं धर्म की आज्ञा में स्थिर रहा।
श्लोक 7 (4.24.7)
यच्च राज्यात्प्रच्यवनं कुरूणामवधश्च यः । सुयोधनस्य कर्णस्य शकुनेः सौबलस्य च ॥
yacca rājyātpracyavanaṃ kurūṇāmavadhaśca yaḥ | suyodhanasya karṇasya śakuneḥ saubalasya ca
और यह कि हम राज्य से च्युत हुए, और कौरवों का वध नहीं हुआ — सुयोधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि का,
श्लोक 8 (4.24.8)
दुःशासनस्य पापस्य यन्मया न हृतं शिरः । तन्मां दहति कल्याणि हृदि शल्यमिवार्पितम् ॥
duḥśāsanasya pāpasya yanmayā na hṛtaṃ śiraḥ | tanmāṃ dahati kalyāṇi hṛdi śalyamivārpitam
और यह कि पापी दुःशासन का सिर मैंने नहीं उतारा — हे कल्याणी, यह बात मुझे हृदय में गड़े काँटे की तरह जलाती है।
श्लोक 9 (4.24.9)
अपि चान्यद्वरारोहे स्मरिष्यसि वचो मम । पुण्ये तीरे सरस्वत्या यत्प्रतिष्ठाम संगताः । तत्राहमब्रवं कृष्णे सर्वक्लेशाननुस्मरन् ॥
api cānyadvarārohe smariṣyasi vaco mama | puṇye tīre sarasvatyā yatpratiṣṭhāma saṃgatāḥ | tatrāhamabravaṃ kṛṣṇe sarvakleśānanusmaran
हे सुन्दरी, तुम्हें मेरी एक और बात याद होगी — जब हम सरस्वती के पवित्र तट पर एकत्र होकर ठहरे थे, तब हे कृष्णे, सारे कष्टों को याद करते हुए मैंने कहा था —
श्लोक 10 (4.24.10)
न चाहमनुगच्छेयं धर्मराजं युधिष्ठिरम् । धनञ्जयं च पाञ्चालि माद्रिपुत्रौ च भ्रातरौ । कृत्वैतां च मतिं कृष्णे युधिष्ठिरमगर्हयम् ॥
na cāhamanugaccheyaṃ dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | dhanañjayaṃ ca pāñcāli mādriputrau ca bhrātarau | kṛtvaitāṃ ca matiṃ kṛṣṇe yudhiṣṭhiramagarhayam
“मैं धर्मराज युधिष्ठिर का अनुसरण नहीं करूँगा, न धनंजय का, हे पांचाली, न माद्री के दोनों पुत्रों — अपने भाइयों — का।” हे कृष्णे, ऐसा निश्चय करके मैंने युधिष्ठिर की निन्दा की थी।
श्लोक 11 (4.24.11)
परुषं वचनं श्रुत्वा मम धर्मात्मजस्तदा । ह्रीमान्वाक्यमहीनार्थं ब्रुवन्राजा युधिष्ठिरः । सर्वानन्वनयद्भ्रातॄन्मुनेर्धौम्यस्य पश्यतः ॥
paruṣaṃ vacanaṃ śrutvā mama dharmātmajastadā | hrīmānvākyamahīnārthaṃ bruvanrājā yudhiṣṭhiraḥ | sarvānanvanayadbhrātṝnmunerdhaumyasya paśyataḥ
तब मेरे कठोर वचन सुनकर लज्जाशील धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने सार्थक वचन कहते हुए मुनि धौम्य के देखते-देखते सब भाइयों को मना लिया।
श्लोक 12 (4.24.12)
मा रोदी राज्ञि लोकानां सर्वागमगुणान्विता । रक्षितव्यं सहास्माभिः सत्यमप्रतिमं भुवि ॥
mā rodī rājñi lokānāṃ sarvāgamaguṇānvitā | rakṣitavyaṃ sahāsmābhiḥ satyamapratimaṃ bhuvi
हे रानी, रोओ मत; तुम संसार के समस्त शास्त्रों के गुणों से सम्पन्न हो। पृथ्वी पर अनुपम सत्य की रक्षा तुम्हें हमारे साथ करनी है।
श्लोक 13 (4.24.13)
अनुनीतेषु चास्मासु अनुनीता त्वमप्यसि । मा धर्मं जहि सुश्रोणि क्रोधं जहि महामते ॥
anunīteṣu cāsmāsu anunītā tvamapyasi | mā dharmaṃ jahi suśroṇi krodhaṃ jahi mahāmate
जब हम मान गए हैं, तो तुम भी मानी हुई हो। हे सुन्दरी, धर्म को मत छोड़ो; हे बुद्धिमती, क्रोध को छोड़ दो।
श्लोक 14 (4.24.14)
इमं तु समुपालम्भं त्वत्तो राजा युधिष्ठिरः । शृणुयाद्यदि कल्याणि कृत्स्नं जह्यात्स जीवितं ॥
imaṃ tu samupālambhaṃ tvatto rājā yudhiṣṭhiraḥ | śṛṇuyādyadi kalyāṇi kṛtsnaṃ jahyātsa jīvitaṃ
हे कल्याणी, यदि राजा युधिष्ठिर तुम्हारे मुख से यह उलाहना सुन लें, तो वे अपने प्राण ही त्याग देंगे।
श्लोक 15 (4.24.15)
धनञ्जयो वा सुश्रोणि यमौ चापि सुमध्यमे । लोकान्तरगतेष्वेषु नाहं शक्ष्यामि जीवितुम् ॥
dhanañjayo vā suśroṇi yamau cāpi sumadhyame | lokāntaragateṣveṣu nāhaṃ śakṣyāmi jīvitum
हे सुन्दरी, धनंजय भी और हे सुमध्यमा, दोनों जुड़वाँ भाई भी प्राण त्याग देंगे; और इनके परलोक चले जाने पर मैं भी जी नहीं सकूँगा।
श्लोक 16 (4.24.16)
धर्मं शृणुष्व पाञ्चालि यत्ते वक्ष्यामि मानिनि ॥
dharmaṃ śṛṇuṣva pāñcāli yatte vakṣyāmi mānini
हे मानिनी पांचाली, जो धर्म मैं तुमसे कहता हूँ, उसे सुनो।
श्लोक 17 (4.24.17)
दुहिता जनकस्यासीद्वैदेही यदि ते श्रुता । पतिमन्वचरत्सीता महारण्यनिवासिनम् ॥
duhitā janakasyāsīdvaidehī yadi te śrutā | patimanvacaratsītā mahāraṇyanivāsinam
जनक की पुत्री वैदेही सीता ने — यदि तुमने सुना हो — महावन में रहने वाले अपने पति का अनुसरण किया था।
श्लोक 18 (4.24.18)
वसन्ती च महारण्ये रामस्य महिषी प्रिया । रावणेन हृता सीता राक्षसीभिश्च तर्जिता । सा क्लिश्यमाना सुश्रोणी राममेवान्वपद्यत ॥
vasantī ca mahāraṇye rāmasya mahiṣī priyā | rāvaṇena hṛtā sītā rākṣasībhiśca tarjitā | sā kliśyamānā suśroṇī rāmamevānvapadyata
महावन में रहते हुए राम की प्रिय पत्नी सीता को रावण हर ले गया और राक्षसियों ने उन्हें धमकाया; फिर भी क्लेश सहती हुई उस सुन्दरी ने राम का ही आश्रय लिया।
श्लोक 19 (4.24.19)
लोपामुद्रा तथा भीरु भर्तारमृषिसत्तमम् । भगवन्तमगस्त्यं सा वनायैवान्वपद्यत ॥
lopāmudrā tathā bhīru bhartāramṛṣisattamam | bhagavantamagastyaṃ sā vanāyaivānvapadyata
हे भीरु, उसी प्रकार लोपामुद्रा ने अपने पति, ऋषिश्रेष्ठ भगवान् अगस्त्य का वन में भी अनुसरण किया।
श्लोक 20 (4.24.20)
सुकन्या नाम शर्यातेर्भार्गवच्यवनं वने । वल्मीकभूतं साध्वी तमन्वपद्यत भामिनी ॥
sukanyā nāma śaryāterbhārgavacyavanaṃ vane | valmīkabhūtaṃ sādhvī tamanvapadyata bhāminī
शर्याति की पुत्री साध्वी और सुन्दर सुकन्या ने वन में भृगुवंशी च्यवन की सेवा की, जो दीमक की बाँबी जैसे हो गए थे।
श्लोक 21 (4.24.21)
नालायनी चेन्द्रसेना रूपेणाप्रतिमा भुवि । पतिमन्वचरद्वृद्धं पुरा वर्षसहस्रिणम् ॥
nālāyanī cendrasenā rūpeṇāpratimā bhuvi | patimanvacaradvṛddhaṃ purā varṣasahasriṇam
रूप में पृथ्वी पर अनुपम नालायनी इन्द्रसेना ने प्राचीन काल में अपने हजार वर्ष के वृद्ध पति का अनुसरण किया था।
श्लोक 22 (4.24.22)
नलं राजानमेवाथ दमयन्ती वनान्तरे । अन्वगच्छत्पुरा कृष्णे तथा भर्तॄंस्त्वमन्वगाः ॥
nalaṃ rājānamevātha damayantī vanāntare | anvagacchatpurā kṛṣṇe tathā bhartṝṃstvamanvagāḥ
और हे कृष्णे, प्राचीन काल में दमयन्ती वन के भीतर राजा नल के पीछे गई थी — जैसे तुम अपने पतियों के पीछे आई हो।
श्लोक 23 (4.24.23)
यथैताः कीर्तिता नार्यो रूपवत्यः पतिव्रताः । तथा त्वमपि कल्याणि सर्वैः समुदिता गुणैः ॥
yathaitāḥ kīrtitā nāryo rūpavatyaḥ pativratāḥ | tathā tvamapi kalyāṇi sarvaiḥ samuditā guṇaiḥ
जैसे इन रूपवती पतिव्रता नारियों का यश गाया जाता है, वैसे ही हे कल्याणी, तुम भी सब गुणों से सम्पन्न हो।
श्लोक 24 (4.24.24)
मा दीर्घं क्षम कालं त्वं त्रिंशद्रात्रमनिन्दिते । पूर्णे त्रयोदशे वर्षे राज्ञां राज्ञी भविष्यसि ॥
mā dīrghaṃ kṣama kālaṃ tvaṃ triṃśadrātramanindite | pūrṇe trayodaśe varṣe rājñāṃ rājñī bhaviṣyasi
हे अनिन्दिते, इस समय को सह लो — यह लम्बा नहीं, केवल तीस रातें शेष हैं। तेरहवाँ वर्ष पूरा होते ही तुम राजाओं की रानी बनोगी।
श्लोक 25 (4.24.25)
सत्येन ते शपे चाहं भविता नान्यथेति च ॥
satyena te śape cāhaṃ bhavitā nānyatheti ca
मैं सत्य की शपथ खाकर तुमसे कहता हूँ — यह होकर रहेगा, अन्यथा नहीं।
श्लोक 26 (4.24.26)
सर्वासां परमस्त्रीणां प्रामाण्यं कर्तुमर्हसि । सर्वेषां च नरेन्द्राणां मूर्ध्नि स्थास्यसि भामिनि ॥
sarvāsāṃ paramastrīṇāṃ prāmāṇyaṃ kartumarhasi | sarveṣāṃ ca narendrāṇāṃ mūrdhni sthāsyasi bhāmini
तुम्हें सब श्रेष्ठ स्त्रियों के लिए आदर्श बनना चाहिए। हे भामिनी, तुम सब राजाओं के सिर पर विराजोगी।
श्लोक 27 (4.24.27)
भर्तृभक्त्या च वृत्तेन भोगानाप्स्यसि दुर्लभान् । यातायां तु प्रतिज्ञायां महान्तं भोगमाप्नुयाः ॥
bhartṛbhaktyā ca vṛttena bhogānāpsyasi durlabhān | yātāyāṃ tu pratijñāyāṃ mahāntaṃ bhogamāpnuyāḥ
पतिभक्ति और सदाचार से तुम दुर्लभ सुख-भोग प्राप्त करोगी; प्रतिज्ञा का समय बीत जाने पर तुम्हें महान् सुख मिलेगा।
श्लोक 28 (4.24.28)
गुरुभक्तिकृतं ज्ञात्वा राज्ञां मूर्ध्नि स्थिता भवेः ॥
gurubhaktikṛtaṃ jñātvā rājñāṃ mūrdhni sthitā bhaveḥ
गुरुजनों की भक्ति का फल जानकर तुम राजाओं के सिर पर स्थित होगी।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 29 (4.24.29)
आर्तप्रलापा कौन्तेय न राजानमुपालभे । अपारयन्त्या दुःखानि कृतं बाष्पप्रमोचनम् ॥
ārtapralāpā kaunteya na rājānamupālabhe | apārayantyā duḥkhāni kṛtaṃ bāṣpapramocanam
हे कुन्तीनन्दन, वह तो पीड़ा में किया गया विलाप था; मैं राजा को दोष नहीं देती। अपने दुःख सह न पाने के कारण ही मेरे आँसू बह निकले।
श्लोक 30 (4.24.30)
इदं तु दुःखं कौन्तेय ममासह्यं निबोध तत् ॥
idaṃ tu duḥkhaṃ kaunteya mamāsahyaṃ nibodha tat
किन्तु हे कुन्तीनन्दन, मेरा यह असह्य दुःख सुनो।
श्लोक 31 (4.24.31)
योऽयं राज्ञो विराटस्य सूतपुत्रस्तु कीचकः । स्यालो नाम प्रवादेन भोजस्त्रैगर्तदेशजः ॥
yo'yaṃ rājño virāṭasya sūtaputrastu kīcakaḥ | syālo nāma pravādena bhojastraigartadeśajaḥ
यह जो राजा विराट का सूतपुत्र कीचक है — जिसे लोग उनका साला कहते हैं, जो त्रिगर्त देश में जन्मा भोज है —
श्लोक 32 (4.24.32)
त्यक्तधर्मो नृशंसश्च सर्वार्थेषु च वल्लभः । नित्यमेवाह दुष्टात्मा भार्या मे भव शोभने । अविनीतः सुदुष्टात्मा मामनाथेति चिन्तयन् ॥
tyaktadharmo nṛśaṃsaśca sarvārtheṣu ca vallabhaḥ | nityamevāha duṣṭātmā bhāryā me bhava śobhane | avinītaḥ suduṣṭātmā māmanātheti cintayan
उसने धर्म को त्याग दिया है, वह क्रूर है और हर बात में राजा का प्रिय है। वह दुष्ट मुझसे सदा कहता है — “हे सुन्दरी, मेरी पत्नी बन जाओ।” वह उद्दण्ड और अत्यन्त दुष्ट मुझे अनाथ समझता है।
श्लोक 33 (4.24.33)
किमुक्तेन व्यतीतेन भीमसेन महाबल । प्रत्युपस्थितकालस्य कार्यस्यानन्तरो भव ॥
kimuktena vyatītena bhīmasena mahābala | pratyupasthitakālasya kāryasyānantaro bhava
हे महाबली भीमसेन, बीती बातें कहने से क्या लाभ? जिस कार्य का समय आ पहुँचा है, उसमें तुरन्त लग जाओ।
श्लोक 34 (4.24.34)
ममेह भीम कैकेयी रूपाद्धि भयशङ्किता । नित्यमुद्विजते राजा कथं नेयादिमामिति ॥
mameha bhīma kaikeyī rūpāddhi bhayaśaṅkitā | nityamudvijate rājā kathaṃ neyādimāmiti
हे भीम, यहाँ रानी कैकेयी मेरे रूप से आशंकित होकर सदा इस भय से व्याकुल रहती है कि “राजा इसके पास जाने से कैसे रुकेंगे?”
श्लोक 35 (4.24.35)
तस्या विदित्वा तं भावं स्वयं चानृतदर्शनः । कीचकोपि च दुष्टात्मा पुनः प्रार्थयते च मां ॥
tasyā viditvā taṃ bhāvaṃ svayaṃ cānṛtadarśanaḥ | kīcakopi ca duṣṭātmā punaḥ prārthayate ca māṃ
उसका यह भाव जानकर स्वयं मिथ्याचारी दुष्ट कीचक भी बार-बार मुझसे प्रणय-याचना करता है।
श्लोक 36 (4.24.36)
तमहं कुपिता भीम पुनः कोपं नियम्य च । अब्रवं कामसंमूढमात्मानं रक्ष कीचक ॥
tamahaṃ kupitā bhīma punaḥ kopaṃ niyamya ca | abravaṃ kāmasaṃmūḍhamātmānaṃ rakṣa kīcaka
हे भीम, मैंने उस पर क्रुद्ध होकर भी फिर क्रोध रोककर उस काममोहित से कहा — “कीचक, अपनी रक्षा करो।”
श्लोक 37 (4.24.37)
गन्धर्वाणामहं भार्या पञ्चानां महिषी प्रिया । ते त्वां निहन्युर्दुर्धर्षाः शूराः साहसकारिणः ॥
gandharvāṇāmahaṃ bhāryā pañcānāṃ mahiṣī priyā | te tvāṃ nihanyurdurdharṣāḥ śūrāḥ sāhasakāriṇaḥ
“मैं पाँच गन्धर्वों की पत्नी और उनकी प्रिय पटरानी हूँ। वे दुर्जय, साहसी शूरवीर तुम्हें मार डालेंगे।”
श्लोक 38 (4.24.38)
एवमुक्तस्तु दुष्टात्मा कीचकः प्रत्युवाच ह । नाहं बिभेमि सैरन्ध्रि गन्धर्वाणां शुचिस्मिते ॥
evamuktastu duṣṭātmā kīcakaḥ pratyuvāca ha | nāhaṃ bibhemi sairandhri gandharvāṇāṃ śucismite
यह सुनकर दुष्टात्मा कीचक ने उत्तर दिया — “हे पवित्र मुस्कान वाली सैरन्ध्री, मैं गन्धर्वों से नहीं डरता।”
श्लोक 39 (4.24.39)
शतं सहस्रमपि वा गन्धर्वाणामहं रणे । समागतं हनिष्यामि त्वं भीरु कुरु मे क्षणम् ॥
śataṃ sahasramapi vā gandharvāṇāmahaṃ raṇe | samāgataṃ haniṣyāmi tvaṃ bhīru kuru me kṣaṇam
“सौ क्या, हजार गन्धर्व भी इकट्ठे होकर आ जाएँ, तो मैं उन्हें युद्ध में मार डालूँगा। हे भीरु, मेरी इच्छा पूरी करो।”
श्लोक 40 (4.24.40)
इत्युक्ता चाब्रवं सूतं कामातुरमहं पुनः । न त्वं प्रतिबलस्तेषां गन्धर्वाणां यशस्विनाम् ॥
ityuktā cābravaṃ sūtaṃ kāmāturamahaṃ punaḥ | na tvaṃ pratibalasteṣāṃ gandharvāṇāṃ yaśasvinām
उसके ऐसा कहने पर मैंने फिर उस कामातुर सूत से कहा — “तुम उन यशस्वी गन्धर्वों के बराबर बलवान नहीं हो।”
श्लोक 41 (4.24.41)
धर्मे स्थिताऽस्मि सततं कुलशीलसमन्विता । नेच्छामि किंचिद्वध्यं त्वां तस्माज्जीवसि कीचक ॥
dharme sthitā'smi satataṃ kulaśīlasamanvitā | necchāmi kiṃcidvadhyaṃ tvāṃ tasmājjīvasi kīcaka
“मैं कुल और शील से युक्त होकर सदा धर्म में स्थित रहती हूँ। मैं किसी का वध नहीं चाहती; इसीलिए, कीचक, तुम अब तक जीवित हो।”
श्लोक 42 (4.24.42)
एवमुक्तस्तु दुष्टात्मा प्रहस्य स्वनवत्ततः । न तिष्ठति स सन्मार्गे न च धर्मं बुभूषति ॥
evamuktastu duṣṭātmā prahasya svanavattataḥ | na tiṣṭhati sa sanmārge na ca dharmaṃ bubhūṣati
यह सुनकर वह दुष्ट जोर से हँस पड़ा। वह न सन्मार्ग पर टिकता है, न धर्म की इच्छा रखता है।
श्लोक 43 (4.24.43)
पापात्मा पापकारी च कामराजवशानुगः । अविनीतश्च दुष्टात्मा प्रत्याख्यातः पुनः पुनः ॥
pāpātmā pāpakārī ca kāmarājavaśānugaḥ | avinītaśca duṣṭātmā pratyākhyātaḥ punaḥ punaḥ
वह पापात्मा और पापकर्मी है, कामदेव के वश में चलता है; उद्दण्ड और दुष्ट है, और बार-बार ठुकराया जा चुका है।
श्लोक 44 (4.24.44)
दर्शनेदर्शने हन्याद्यदि जह्यां च जीवितम् । धर्मे प्रयतमानानां महान्धर्मो नशिष्यति ॥
darśanedarśane hanyādyadi jahyāṃ ca jīvitam | dharme prayatamānānāṃ mahāndharmo naśiṣyati
वह जब भी मुझे देखे, मुझे मार सकता है; और यदि मेरे प्राण चले गए, तो धर्म के लिए यत्न करने वाले तुम लोगों का महान् धर्म नष्ट हो जाएगा।
श्लोक 45 (4.24.45)
समयं रक्षमाणानां दारा वो न भवन्ति च । भार्यायां रक्ष्यमाणायां प्रजा भवति रक्षिता । प्रजायां रक्ष्यमाणायामात्मा भवति रक्षितः ॥
samayaṃ rakṣamāṇānāṃ dārā vo na bhavanti ca | bhāryāyāṃ rakṣyamāṇāyāṃ prajā bhavati rakṣitā | prajāyāṃ rakṣyamāṇāyāmātmā bhavati rakṣitaḥ
अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करते-करते तुम्हारी पत्नी ही नहीं रहेगी। पत्नी की रक्षा होने पर सन्तान की रक्षा होती है, और सन्तान की रक्षा होने पर स्वयं अपनी रक्षा होती है।
श्लोक 46 (4.24.46)
वदतां वर्णधर्मांश्च ब्राह्मणानां च मे श्रुतम् । क्षत्रियस्य सदा धर्मो नान्यो दस्युनिबर्हणात् ॥
vadatāṃ varṇadharmāṃśca brāhmaṇānāṃ ca me śrutam | kṣatriyasya sadā dharmo nānyo dasyunibarhaṇāt
वर्णधर्मों का उपदेश करने वाले ब्राह्मणों से मैंने सुना है कि क्षत्रिय का धर्म सदा दस्युओं का संहार करना ही है, और कुछ नहीं।
श्लोक 47 (4.24.47)
पश्यतो धर्मराजस्य कीचको माऽन्वधावत । तवैव च समक्षं वै भीमसेन महाबल ॥
paśyato dharmarājasya kīcako mā'nvadhāvata | tavaiva ca samakṣaṃ vai bhīmasena mahābala
धर्मराज के देखते-देखते, और हे महाबली भीमसेन, तुम्हारी आँखों के सामने भी, कीचक ने मेरा पीछा किया।
श्लोक 48 (4.24.48)
त्वया चाहं परित्राता भीम तस्माज्जटासुरात् ॥
tvayā cāhaṃ paritrātā bhīma tasmājjaṭāsurāt
हे भीम, तुम्हीं ने मुझे उस जटासुर से बचाया था।
श्लोक 49 (4.24.49)
जयद्रथं तथैव त्वमजैषीर्भ्रातृभिः सह । जहीममपि पापिष्ठं योयं मामवमन्यते । कीचको राजवाल्लभ्याच्छोककृन्मम भारत ॥
jayadrathaṃ tathaiva tvamajaiṣīrbhrātṛbhiḥ saha | jahīmamapi pāpiṣṭhaṃ yoyaṃ māmavamanyate | kīcako rājavāllabhyācchokakṛnmama bhārata
उसी प्रकार तुमने भाइयों के साथ जयद्रथ को भी जीता था। हे भारत, इस महापापी को भी मार डालो, जो मेरा अपमान करता है — वह कीचक, जो राजा का प्रिय होने के बल पर मुझे शोक देता है।
श्लोक 50 (4.24.50)
कीचकं कामसन्तप्तं भिन्धि कुम्भमिवाश्मनि । यो निमित्तमनर्थानां बहूनां मम भारत ॥
kīcakaṃ kāmasantaptaṃ bhindhi kumbhamivāśmani | yo nimittamanarthānāṃ bahūnāṃ mama bhārata
हे भारत, काम से संतप्त कीचक को वैसे ही चूर कर दो जैसे पत्थर पर घड़ा फोड़ा जाता है — वही मेरे अनेक अनर्थों का कारण है।
श्लोक 51 (4.24.51)
तं चेज्जीवन्तमादित्यः प्रातरभ्युदयिष्यति । विषमालोड्य पास्यामि मा कीचकवशंगमम् ॥
taṃ cejjīvantamādityaḥ prātarabhyudayiṣyati | viṣamāloḍya pāsyāmi mā kīcakavaśaṃgamam
यदि कल प्रातः सूर्य उसे जीवित देखते हुए उदित हुआ, तो मैं विष घोलकर पी लूँगी, पर कीचक के वश में नहीं जाऊँगी।
श्लोक 52 (4.24.52)
श्रेयो हि मरणं मह्यं भीमसेन तवाग्रतः । इत्युक्त्वा प्रारुदत्कृष्णा भीमस्योरसि संश्रिता ॥
śreyo hi maraṇaṃ mahyaṃ bhīmasena tavāgrataḥ | ityuktvā prārudatkṛṣṇā bhīmasyorasi saṃśritā
“हे भीमसेन, तुम्हारे सामने मर जाना ही मेरे लिए अच्छा है।” यह कहकर कृष्णा भीम की छाती से लगकर फूट-फूटकर रोने लगी।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 53 (4.24.53)
भीमश्च तां परिष्वज्य महत्सान्त्वं प्रयुज्य च । कीचकं मनसाऽगच्छत्सृक्किणी परिलेलिहन् ॥
bhīmaśca tāṃ pariṣvajya mahatsāntvaṃ prayujya ca | kīcakaṃ manasā'gacchatsṛkkiṇī parilelihan
भीम ने उसे गले लगाकर बहुत सान्त्वना दी, और मन ही मन होंठों के कोने चाटते हुए कीचक पर जा झपटे।
श्लोक 54 (4.24.54)
आश्वासयित्वा बहुशो भृशमार्तां सुमध्यमाम् । हेतुतत्त्वार्थसंयुक्तैर्वचोभिर्द्रुपदात्मजाम् ॥
āśvāsayitvā bahuśo bhṛśamārtāṃ sumadhyamām | hetutattvārthasaṃyuktairvacobhirdrupadātmajām
अत्यन्त व्याकुल सुमध्यमा द्रुपदपुत्री को कारण, तत्त्व और अर्थ से युक्त वचनों द्वारा बार-बार ढाढ़स बँधाकर,
श्लोक 55 (4.24.55)
प्रमृज्य वदनं तस्याः पाणिनाऽश्रुसमाकुलम् । उवाच चैनां दुःखार्तां भीमः क्रोधसमन्वितः ॥
pramṛjya vadanaṃ tasyāḥ pāṇinā'śrusamākulam | uvāca caināṃ duḥkhārtāṃ bhīmaḥ krodhasamanvitaḥ
और अपने हाथ से उसका आँसुओं से भीगा मुख पोंछकर, क्रोध से भरे भीम ने उस दुखिया से कहा —