विराट पर्व · अध्याय 25
द्रौपदी द्वारा कीचक से मिलन का संकेत
भीम उसी रात कीचक को मारने का वचन देते हैं और द्रौपदी से कहते हैं कि वह नृत्यशाला में, जहाँ एक पलंग है, उससे गुप्त मिलन का संकेत ठहरा ले। अगली सुबह कीचक डींग मारता है कि मत्स्यों का असली राजा विराट नहीं, वह स्वयं है, और द्रौपदी को धन का लोभ देता है; द्रौपदी इस शर्त पर हामी भरने का दिखावा करती हैं कि किसी को पता न चले, और रात में सूनी नृत्यशाला को मिलन-स्थान ठहराती हैं। कीचक अन्धे हर्ष में श्रृंगार करता है, उधर द्रौपदी भीम को सब बताती हैं; भीम उसे मारने की शपथ लेते हैं और द्रौपदी विनती करती हैं कि यह काम छिपकर हो, ताकि युधिष्ठिर की प्रतिज्ञा न टूटे।
भीम उवाच
श्लोक 1 (4.25.1)
तथा भद्रे करिष्यामि यथा त्वं भीरु भाषसे । अद्यैनं सूदयिष्यामि कीचकं सह बान्धवैः ॥
tathā bhadre kariṣyāmi yathā tvaṃ bhīru bhāṣase | adyainaṃ sūdayiṣyāmi kīcakaṃ saha bāndhavaiḥ
हे कल्याणी, हे भीरु, जैसा तुम कहती हो, मैं वैसा ही करूँगा। आज ही मैं कीचक को उसके बन्धु-बान्धवों सहित मार डालूँगा।
श्लोक 2 (4.25.2)
अस्याः प्रदोषे शर्वर्याः कुरुष्वानेन संविदम् । दुःखं शोकं च निर्धूय याज्ञसेनि शुचिस्मिते ॥
asyāḥ pradoṣe śarvaryāḥ kuruṣvānena saṃvidam | duḥkhaṃ śokaṃ ca nirdhūya yājñaseni śucismite
हे पवित्र मुस्कान वाली याज्ञसेनी, दुःख और शोक को त्यागकर आज रात साँझ ढलते ही उसके साथ मिलने की बात तय कर लो।
श्लोक 3 (4.25.3)
यैषा नर्तनशालेह मत्स्यराजेन कारिता । दिवात्र कन्या नृत्यन्ति रात्रौ यान्ति तथा गृहं ॥
yaiṣā nartanaśāleha matsyarājena kāritā | divātra kanyā nṛtyanti rātrau yānti tathā gṛhaṃ
यहाँ मत्स्यराज ने जो नृत्यशाला बनवाई है, उसमें दिन में कन्याएँ नाचती हैं और रात को अपने घर चली जाती हैं।
श्लोक 4 (4.25.4)
तत्रास्ति शयनं भीरु दृढाङ्गं सुप्रतिष्ठितम् । तत्रैनं दर्शयिष्यामि पूर्वप्रेतान्पितामहान् । त्वद्दर्शनसमुत्थेन कामेनाकुलितेन्द्रियम् ॥
tatrāsti śayanaṃ bhīru dṛḍhāṅgaṃ supratiṣṭhitam | tatrainaṃ darśayiṣyāmi pūrvapretānpitāmahān | tvaddarśanasamutthena kāmenākulitendriyam
उसमें एक मजबूत और भली-भाँति जमा हुआ पलंग है। तुम्हें देखने से उपजी काम-वासना से जिसकी इन्द्रियाँ व्याकुल हैं, उसे मैं वहीं उसके पहले मर चुके पितामहों के दर्शन करा दूँगा।
श्लोक 5 (4.25.5)
संकेतं सूतपुत्रस्य कारयस्व शुभानने । यथा परे न पश्येयुः कुर्वन्तीं तेन संविदम् ॥
saṃketaṃ sūtaputrasya kārayasva śubhānane | yathā pare na paśyeyuḥ kurvantīṃ tena saṃvidam
हे सुमुखी, सूतपुत्र के लिए मिलने का स्थान ठहरा दो, पर इस प्रकार कि उससे बात तय करते हुए तुम्हें दूसरे लोग न देखें।
श्लोक 6 (4.25.6)
तथा कुरुष्व कल्याणि यथा सन्निहितो भवेत् । तथा कुर्याश्च संकेतं सूतपुत्रस्य संवृतम् ॥
tathā kuruṣva kalyāṇi yathā sannihito bhavet | tathā kuryāśca saṃketaṃ sūtaputrasya saṃvṛtam
हे कल्याणी, ऐसा करो कि वह वहाँ आ पहुँचे; और सूतपुत्र के साथ मिलने की बात गुप्त रूप से तय करना।
श्लोक 7 (4.25.7)
आवयोः संगमं भीरु यथा मर्त्यो न बुध्यति । कीचकस्य विनाशाय तथा कुरु नृपात्मजे ॥
āvayoḥ saṃgamaṃ bhīru yathā martyo na budhyati | kīcakasya vināśāya tathā kuru nṛpātmaje
हे राजकुमारी, हे भीरु, कीचक के विनाश के लिए ऐसा उपाय करो कि हम दोनों के मिलने का किसी मनुष्य को पता न चले।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (4.25.8)
तत्र तौ कथयित्वा तु बाष्पमुत्सृज्य दुःखितौ । रात्रिशेषं तमत्युग्रं धारयामासतुर्हृदि ॥
tatra tau kathayitvā tu bāṣpamutsṛjya duḥkhitau | rātriśeṣaṃ tamatyugraṃ dhārayāmāsaturhṛdi
वहाँ इस प्रकार बातें करके वे दोनों दुःख से आँसू बहाने लगे, और उस अत्यन्त भयंकर रात का शेष भाग उन्होंने मन ही मन सहते हुए बिताया।
श्लोक 9 (4.25.9)
भीमेन च प्रतिज्ञाते कीचकस्य वधे तदा । द्रौपदी च सुदेष्णायाः प्रविवेश पुनर्गृहम् ॥
bhīmena ca pratijñāte kīcakasya vadhe tadā | draupadī ca sudeṣṇāyāḥ praviveśa punargṛham
जब भीम ने उस समय कीचक के वध की प्रतिज्ञा कर ली, तब द्रौपदी फिर सुदेष्णा के भवन में चली गईं।
श्लोक 10 (4.25.10)
तस्यां रजन्यां व्युष्टायां प्रातरुत्थाय कीचकः । गत्वा राजकुलायैव द्रौपदीमिदमब्रवीत् ॥
tasyāṃ rajanyāṃ vyuṣṭāyāṃ prātarutthāya kīcakaḥ | gatvā rājakulāyaiva draupadīmidamabravīt
वह रात बीतने पर कीचक प्रातःकाल उठा और राजमहल में जाकर द्रौपदी से यह बोला—
कीचक उवाच
श्लोक 11 (4.25.11)
यत्त्वाऽहं पश्यतो राज्ञः पातयित्वा पदाऽहनम् । न कंचिल्लभसे नाथमभिपन्ना बलीयसा ॥
yattvā'haṃ paśyato rājñaḥ pātayitvā padā'hanam | na kaṃcillabhase nāthamabhipannā balīyasā
राजा के देखते-देखते मैंने तुम्हें गिराकर लात मारी, और अपने से बलवान् के हाथ में पड़ी तुम्हें कोई रक्षक नहीं मिला।
श्लोक 12 (4.25.12)
प्रवादेन तु मात्स्यानामयं राजेति चोच्यते । अहमेव हि राजा वै मात्स्यानां वाहिनीपतिः ॥
pravādena tu mātsyānāmayaṃ rājeti cocyate | ahameva hi rājā vai mātsyānāṃ vāhinīpatiḥ
मत्स्यों में यह तो केवल कहने भर को राजा कहलाता है; वास्तव में मत्स्यों का राजा और सेनापति तो मैं ही हूँ।
श्लोक 13 (4.25.13)
सा सुखं प्रतिपद्यस्व दासो भीरु भवामि ते । न ह्यहं त्वामृते भीरु चिरं जीवितुमुत्सहे ॥
sā sukhaṃ pratipadyasva dāso bhīru bhavāmi te | na hyahaṃ tvāmṛte bhīru ciraṃ jīvitumutsahe
इसलिए मुझे स्वीकार करके सुख पाओ; हे भीरु, मैं तुम्हारा दास बन जाता हूँ। तुम्हारे बिना, हे भीरु, मैं अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता।
श्लोक 14 (4.25.14)
अहन्यहनि सुश्रोणि शतनिष्कं ददामि ते । दासीशतं च ते दद्यां दासानामपि चापरम् ॥
ahanyahani suśroṇi śataniṣkaṃ dadāmi te | dāsīśataṃ ca te dadyāṃ dāsānāmapi cāparam
हे सुन्दरी, मैं प्रतिदिन तुम्हें सौ निष्क (स्वर्ण-मुद्राएँ) दूँगा; सौ दासियाँ और उतने ही दास भी तुम्हें दूँगा,
श्लोक 15 (4.25.15)
रथांश्चाश्वतरीयुक्तानस्तु नौ भीरु संगमः । सुदासानां सहस्रं च महिषाणां सहस्रकम् ॥
rathāṃścāśvatarīyuktānastu nau bhīru saṃgamaḥ | sudāsānāṃ sahasraṃ ca mahiṣāṇāṃ sahasrakam
खच्चरियों से जुते रथ भी दूँगा (बस, हे भीरु, हमारा मिलन हो जाए), साथ ही एक हज़ार अच्छे सेवक और एक हज़ार भैंसें भी,
श्लोक 16 (4.25.16)
अन्तःपुरसहस्रं च हेमकूटसहस्रकम् । तुभ्यं दास्यामि सर्वाणि राजार्हाण्यम्बराणि च ॥
antaḥpurasahasraṃ ca hemakūṭasahasrakam | tubhyaṃ dāsyāmi sarvāṇi rājārhāṇyambarāṇi ca
अन्तःपुर के लिए एक हज़ार स्त्रियाँ और सोने के एक हज़ार ढेर — ये सब मैं तुम्हें दूँगा, और राजाओं के योग्य वस्त्र भी।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 17 (4.25.17)
एतन्मे वचनं सत्यं प्रतिपद्यस्व कीचक । न ते सखा वा भ्राता वा जानीयात्संगमं मया ॥
etanme vacanaṃ satyaṃ pratipadyasva kīcaka | na te sakhā vā bhrātā vā jānīyātsaṃgamaṃ mayā
हे कीचक, मेरी यह बात सच्चे मन से स्वीकार करो कि मेरे साथ तुम्हारे मिलन का तुम्हारे किसी मित्र या भाई को भी पता न चले।
श्लोक 18 (4.25.18)
अनुप्रवादाद्भीताऽस्मि गन्धर्वाणां यशस्विनाम् । अनुबोधादनर्थः स्यादयशश्च महद्भवेत् । एतन्मे प्रतिजानीहि ततोऽहं वशगा तव ॥
anupravādādbhītā'smi gandharvāṇāṃ yaśasvinām | anubodhādanarthaḥ syādayaśaśca mahadbhavet | etanme pratijānīhi tato'haṃ vaśagā tava
मुझे यशस्वी गन्धर्वों में होने वाली चर्चा का डर है; बात खुल गई तो अनर्थ होगा और बड़ा अपयश भी। मुझे यह वचन दो, तब मैं तुम्हारे वश में हूँ।
कीचक उवाच
श्लोक 19 (4.25.19)
एवमेतत्करिष्यामि यथा सुश्रोणि भाषसे । एकोऽहमागमिष्यामि शून्यमावसथं तव ॥
evametatkariṣyāmi yathā suśroṇi bhāṣase | eko'hamāgamiṣyāmi śūnyamāvasathaṃ tava
हे सुन्दरी, जैसा तुम कहती हो, मैं वैसा ही करूँगा। मैं अकेला ही तुम्हारे सूने निवास पर आऊँगा,
श्लोक 20 (4.25.20)
समागमार्थं रम्भोरु त्वया मदनदर्पितः । यथा त्वां नैव पश्येयुर्गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः ॥
samāgamārthaṃ rambhoru tvayā madanadarpitaḥ | yathā tvāṃ naiva paśyeyurgandharvāḥ sūryavarcasaḥ
हे रम्भोरु, काम के मद से भरा मैं तुमसे मिलने ऐसे आऊँगा कि सूर्य के समान तेजस्वी गन्धर्व तुम्हें देख भी न पाएँ।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 21 (4.25.21)
यदेतन्नर्तनागारं मात्स्यराजेन कारितम् । दिवात्र कन्या नृत्यन्ति रात्रौ यान्ति स्वकं गृहं ॥
yadetannartanāgāraṃ mātsyarājena kāritam | divātra kanyā nṛtyanti rātrau yānti svakaṃ gṛhaṃ
मत्स्यराज ने जो यह नृत्यशाला बनवाई है, उसमें दिन में कन्याएँ नाचती हैं और रात को अपने-अपने घर चली जाती हैं।
श्लोक 22 (4.25.22)
निशायां तत्र गच्छेथा गन्धर्वास्तन्न जानते । तत्र दोषः परिहृतो भविष्यति न संशयः ॥
niśāyāṃ tatra gacchethā gandharvāstanna jānate | tatra doṣaḥ parihṛto bhaviṣyati na saṃśayaḥ
रात में तुम वहीं जाना; गन्धर्व उस स्थान के बारे में नहीं जानते। इस प्रकार दोष टल जाएगा, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 23 (4.25.23)
एकस्त्वं नर्तनागारं रात्रौ संकेतमाव्रज । तत्राहं भविता तुभ्यं वशगा नात्र संशयः ॥
ekastvaṃ nartanāgāraṃ rātrau saṃketamāvraja | tatrāhaṃ bhavitā tubhyaṃ vaśagā nātra saṃśayaḥ
रात में अकेले ही नृत्यशाला में, तय किए हुए स्थान पर आ जाना। वहाँ मैं तुम्हारे वश में रहूँगी, इसमें सन्देह नहीं।
कीचक उवाच
श्लोक 24 (4.25.24)
तथा भद्रे करिष्यामि यथा त्वं भीरु वक्ष्यसि । एकः सन्नर्तनागारमागमिष्यामि भामिनि । समागमार्थं सुश्रोणि शपे च सुकृतेन मे ॥
tathā bhadre kariṣyāmi yathā tvaṃ bhīru vakṣyasi | ekaḥ sannartanāgāramāgamiṣyāmi bhāmini | samāgamārthaṃ suśroṇi śape ca sukṛtena me
हे कल्याणी, हे भीरु, जैसा तुम कहोगी, मैं वैसा ही करूँगा। हे भामिनी, तुमसे मिलने के लिए मैं अकेला ही नृत्यशाला में आऊँगा; हे सुन्दरी, मैं अपने पुण्यकर्मों की शपथ खाता हूँ।
श्लोक 25 (4.25.25)
यथा त्वां नावबुध्यन्ति गन्धर्वा वरवर्णिनि । सत्यं ते प्रतिजानामि गन्धर्वेभ्यो न ते भयम् । अलंकरिष्याम्यद्याहं त्वत्समागमनाय वै ॥
yathā tvāṃ nāvabudhyanti gandharvā varavarṇini | satyaṃ te pratijānāmi gandharvebhyo na te bhayam | alaṃkariṣyāmyadyāhaṃ tvatsamāgamanāya vai
और ऐसे आऊँगा कि हे सुन्दरी, गन्धर्वों को तुम्हारा पता न चले। मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम्हें गन्धर्वों से कोई भय नहीं। तुमसे मिलने के लिए आज मैं स्वयं को सजाऊँगा,
श्लोक 26 (4.25.26)
वासांसि च विचित्राणि मनोज्ञानि तवापि च । यथा मां न त्यजेथास्त्वं तथा रंस्ये त्वया सह ॥
vāsāṃsi ca vicitrāṇi manojñāni tavāpi ca | yathā māṃ na tyajethāstvaṃ tathā raṃsye tvayā saha
और तुम्हारे लिए भी मनोहर, रंग-बिरंगे वस्त्र लाऊँगा। मैं तुम्हारे साथ ऐसा रमण करूँगा कि तुम मुझे कभी न छोड़ो।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 27 (4.25.27)
तथा चेदप्यहं सूत दर्शयिष्यामि ते सुखम् । यन्नानुभूतं भवता जन्मप्रभृति कीचक ॥
tathā cedapyahaṃ sūta darśayiṣyāmi te sukham | yannānubhūtaṃ bhavatā janmaprabhṛti kīcaka
हे सूत, यदि ऐसा है तो मैं भी तुम्हें ऐसा सुख दिखाऊँगी, जैसा हे कीचक, तुमने जन्म से लेकर आज तक कभी अनुभव नहीं किया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 28 (4.25.28)
तमर्थमपि जल्पन्त्या द्रौपद्याः कीचकस्य ह । क्षणमात्रं तदभवन्मासेनैव समं नृप ॥
tamarthamapi jalpantyā draupadyāḥ kīcakasya ha | kṣaṇamātraṃ tadabhavanmāsenaiva samaṃ nṛpa
हे राजन्, कीचक से इस विषय में बात करते समय द्रौपदी को, और कीचक को भी, एक-एक क्षण महीने के समान लंबा लगा।
श्लोक 29 (4.25.29)
कीचकोऽथ गृहं गत्वा भृशं हर्षपरिप्लुतः । सैरन्ध्रीरूपिणीं मूढो मृत्युं तां नावबुद्धवान् ॥
kīcako'tha gṛhaṃ gatvā bhṛśaṃ harṣapariplutaḥ | sairandhrīrūpiṇīṃ mūḍho mṛtyuṃ tāṃ nāvabuddhavān
तब कीचक अत्यन्त हर्ष से भरा अपने घर गया। उस मूर्ख ने नहीं समझा कि सैरन्ध्री के रूप में यह उसकी मृत्यु ही है।
श्लोक 30 (4.25.30)
गन्धाभरणमाल्येषु व्यासक्तः स विशेषतः । अलंचक्रे तदाऽऽत्मानं सत्वरः काममोहितः ॥
gandhābharaṇamālyeṣu vyāsaktaḥ sa viśeṣataḥ | alaṃcakre tadā''tmānaṃ satvaraḥ kāmamohitaḥ
सुगन्धित द्रव्यों, आभूषणों और मालाओं में विशेष रूप से रमा हुआ वह काम से मोहित होकर उस समय जल्दी-जल्दी अपना श्रृंगार करने लगा।
श्लोक 31 (4.25.31)
तस्य तत्कुर्वतः कर्म कालो दीर्घ इवाभवत् । अनुचिन्तयतश्चापि तामेवायतलोचनाम् ॥
tasya tatkurvataḥ karma kālo dīrgha ivābhavat | anucintayataścāpi tāmevāyatalocanām
यह काम करते हुए और उसी विशाल नेत्रों वाली का ध्यान करते हुए उसे समय बहुत लंबा प्रतीत होने लगा।
श्लोक 32 (4.25.32)
आसीदभ्यधिका चापि श्रीः श्रियं प्रमुमुक्षतः । निर्वाणकाले दीपस्य वर्तीमिव दिधक्षतः ॥
āsīdabhyadhikā cāpi śrīḥ śriyaṃ pramumukṣataḥ | nirvāṇakāle dīpasya vartīmiva didhakṣataḥ
जो अपनी श्री को खोने ही वाला था, उसकी शोभा और भी बढ़ गई — जैसे बुझने के समय दीपक की बत्ती भभक उठती है।
श्लोक 33 (4.25.33)
कृतसंप्रत्ययस्तस्याः कीचकः काममोहितः । नाजानात्पतनं स्वस्य चिन्तयंस्तां शुभाननाम् ॥
kṛtasaṃpratyayastasyāḥ kīcakaḥ kāmamohitaḥ | nājānātpatanaṃ svasya cintayaṃstāṃ śubhānanām
उसकी बात पर भरोसा किए, काम से मोहित कीचक उस सुमुखी का ही चिन्तन करता रहा और अपने पतन को नहीं जान सका।
श्लोक 34 (4.25.34)
ततस्तु द्रौपदी गत्वा भीमसेनं महानसे । उपातिष्ठत कल्याणी कौरव्यं पतिमन्तिकात् ॥
tatastu draupadī gatvā bhīmasenaṃ mahānase | upātiṣṭhata kalyāṇī kauravyaṃ patimantikāt
तब कल्याणी द्रौपदी रसोईघर में जाकर अपने कुरुवंशी पति भीमसेन के पास जा खड़ी हुईं।
श्लोक 35 (4.25.35)
तमुवाच सुकेशान्ता कीचकस्य कृतो मया । सङ्गमो नर्तनागारे यथाऽवोचः परन्तप ॥
tamuvāca sukeśāntā kīcakasya kṛto mayā | saṅgamo nartanāgāre yathā'vocaḥ parantapa
सुन्दर केशों वाली द्रौपदी ने उनसे कहा— "हे परन्तप, जैसा तुमने कहा था, मैंने कीचक का मिलन नृत्यशाला में ठहरा दिया है।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 36 (4.25.36)
कालेन नियतं बद्धः कामेन च बलात्कृतः । शून्यं स नर्तनागारमागमिष्यति कीचकः । एको निशि महाबाहो कीचकं तं निषूदय ॥
kālena niyataṃ baddhaḥ kāmena ca balātkṛtaḥ | śūnyaṃ sa nartanāgāramāgamiṣyati kīcakaḥ | eko niśi mahābāho kīcakaṃ taṃ niṣūdaya
काल से बँधा और काम से विवश कीचक रात में अकेला सूनी नृत्यशाला में आएगा। हे महाबाहु, उस कीचक को मार डालो।
श्लोक 37 (4.25.37)
तं सूतपुत्रं कौन्तेय कीचकं मददर्पितम् । गत्वा त्वं नर्तनागारं निर्जीवं कुरु पाण्डव ॥
taṃ sūtaputraṃ kaunteya kīcakaṃ madadarpitam | gatvā tvaṃ nartanāgāraṃ nirjīvaṃ kuru pāṇḍava
हे कुन्तीनन्दन, हे पाण्डव, नृत्यशाला में जाकर उस मद से उन्मत्त सूतपुत्र कीचक को निष्प्राण कर दो।
श्लोक 38 (4.25.38)
गर्वितः सूतपुत्रोऽसौ गन्धर्वानवमन्यते । स त्वं प्रहरतांश्रेष्ठ नालं नाग इवोद्धर ॥
garvitaḥ sūtaputro'sau gandharvānavamanyate | sa tvaṃ praharatāṃśreṣṭha nālaṃ nāga ivoddhara
गर्व से भरा वह सूतपुत्र गन्धर्वों का अपमान करता है। हे योद्धाओं में श्रेष्ठ, जैसे हाथी कमलनाल को उखाड़ फेंकता है, वैसे ही तुम उसे उखाड़ फेंको।
श्लोक 39 (4.25.39)
अस्रं दुःखाभिभूताया मम मार्जस्व भारत । बाहुवीर्यानुरूपं च दर्शयाद्य पराक्रमम् । आत्मनश्चैव भद्रं ते कुरु मानं कुलस्य च ॥
asraṃ duḥkhābhibhūtāyā mama mārjasva bhārata | bāhuvīryānurūpaṃ ca darśayādya parākramam | ātmanaścaiva bhadraṃ te kuru mānaṃ kulasya ca
हे भारत, दुःख से व्याकुल मेरे आँसू पोंछ दो, और आज अपनी भुजाओं के बल के अनुरूप पराक्रम दिखाओ। तुम्हारा कल्याण हो — अपना और अपने कुल का मान रखो।"
भीम उवाच
श्लोक 40 (4.25.40)
स्वागतं ते वरारोहे यन्मां वेदयसे प्रियम् । नह्यस्य कंचिदिच्छामि सहायं वरवर्णिनि ॥
svāgataṃ te varārohe yanmāṃ vedayase priyam | nahyasya kaṃcidicchāmi sahāyaṃ varavarṇini
हे सुन्दरी, तुम्हारा स्वागत है, जो तुमने मुझे यह प्रिय समाचार सुनाया। हे वरवर्णिनी, उससे निपटने के लिए मुझे किसी सहायक की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 41 (4.25.41)
सा मे प्रीतिस्त्वयाऽऽख्याता कीचकस्य समागमे । हत्वा हिडिम्बं या प्रीतिर्ममासीत्सा शुचिस्मिते ॥
sā me prītistvayā''khyātā kīcakasya samāgame | hatvā hiḍimbaṃ yā prītirmamāsītsā śucismite
हे पवित्र मुस्कान वाली, कीचक से मिलन की जो बात तुमने बताई है, उससे मुझे वैसा ही आनन्द हुआ है जैसा हिडिम्ब को मारकर हुआ था।
श्लोक 42 (4.25.42)
सत्यं भ्रातॄंश्च पुत्रांश्च पुरस्कृत्य शपामि ते । कीचकं निहनिष्यामि वृत्रं देवपतिर्यथा ॥
satyaṃ bhrātṝṃśca putrāṃśca puraskṛtya śapāmi te | kīcakaṃ nihaniṣyāmi vṛtraṃ devapatiryathā
मैं अपने भाइयों और पुत्रों को आगे रखकर तुमसे सच्ची शपथ खाता हूँ कि जैसे देवराज इन्द्र ने वृत्र को मारा था, वैसे ही मैं कीचक को मार डालूँगा।
श्लोक 43 (4.25.43)
प्रसह्य निहनिष्यामि केशवः केशिनं यथा । रहस्यं वा प्रकाशं वा सूदयिष्यामि कीचकम् ॥
prasahya nihaniṣyāmi keśavaḥ keśinaṃ yathā | rahasyaṃ vā prakāśaṃ vā sūdayiṣyāmi kīcakam
जैसे केशव ने केशी को मारा था, वैसे ही मैं उसे बलपूर्वक मार डालूँगा; छिपकर हो या खुले में, मैं कीचक का वध करूँगा।
श्लोक 44 (4.25.44)
अहं भद्रे हनिष्यामि कीचकं मदनान्वितम् । यस्त्वां कामाभिभूतात्मा दुर्लभामभिमन्यते ॥
ahaṃ bhadre haniṣyāmi kīcakaṃ madanānvitam | yastvāṃ kāmābhibhūtātmā durlabhāmabhimanyate
हे कल्याणी, मैं काम से उन्मत्त उस कीचक को मार डालूँगा, जो वासना के वश में होकर तुम जैसी दुर्लभ स्त्री को पाने की इच्छा करता है।
श्लोक 45 (4.25.45)
अथ चेदवबुध्यन्ति सूतपुत्रं मया हतम् । निर्मनुष्यं करिष्यामि मत्स्यानामिदमालयम् ॥
atha cedavabudhyanti sūtaputraṃ mayā hatam | nirmanuṣyaṃ kariṣyāmi matsyānāmidamālayam
और यदि लोगों को पता चल गया कि सूतपुत्र मेरे हाथ से मारा गया है, तो मैं मत्स्यों के इस नगर को मनुष्यों से सूना कर दूँगा।
श्लोक 46 (4.25.46)
मया हतांश्चेन्मात्स्यांस्तु धार्तराष्ट्रो विबुध्यति । दुर्योधनं ततो हत्वा सानुबन्धं सबान्धवम् । कुरूणामखिलं राज्यं प्रतिपत्स्यामि भामिनि ॥
mayā hatāṃścenmātsyāṃstu dhārtarāṣṭro vibudhyati | duryodhanaṃ tato hatvā sānubandhaṃ sabāndhavam | kurūṇāmakhilaṃ rājyaṃ pratipatsyāmi bhāmini
और यदि धृतराष्ट्र के पुत्र को पता चले कि मत्स्य मेरे हाथों मारे गए हैं, तो हे भामिनी, मैं दुर्योधन को उसके अनुयायियों और बान्धवों सहित मारकर कुरुओं का सारा राज्य ले लूँगा।
श्लोक 47 (4.25.47)
नाहं शक्तोऽनुनयितुं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । कामं सत्यमुपासीत कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । काममन्ये ह्युपासन्तु विनीता धर्मचारिणः ॥
nāhaṃ śakto'nunayituṃ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | kāmaṃ satyamupāsīta kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | kāmamanye hyupāsantu vinītā dharmacāriṇaḥ
मैं कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को और मना नहीं सकता। कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर चाहें तो सत्य का पालन करते रहें, और दूसरे विनीत, धर्म पर चलने वाले लोग भी चाहें तो उसका पालन करें;
श्लोक 48 (4.25.48)
त्वां तु दुःखमिदं प्राप्तां नाहं शक्नोम्युपेक्षितुम् । निर्वृता भव पाञ्चालि कीचकस्य वधात्पुनः ॥
tvāṃ tu duḥkhamidaṃ prāptāṃ nāhaṃ śaknomyupekṣitum | nirvṛtā bhava pāñcāli kīcakasya vadhātpunaḥ
किन्तु तुम्हें इस दुःख में पड़ी देखकर मैं चुप नहीं बैठ सकता। हे पाञ्चाली, कीचक के वध से तुम फिर से निश्चिन्त हो जाओ।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 49 (4.25.49)
कीचकस्य वधं भीम यदि जानन्ति नागराः । त्वया कृतं महाबाहो नाहं जीवितुमुत्सहे ॥
kīcakasya vadhaṃ bhīma yadi jānanti nāgarāḥ | tvayā kṛtaṃ mahābāho nāhaṃ jīvitumutsahe
हे भीम, हे महाबाहु, यदि नगरवासियों को पता चल गया कि कीचक का वध तुमने किया है, तो मैं जीना नहीं चाहूँगी।
श्लोक 50 (4.25.50)
कथं सत्याच्च नापेयाद्राजाऽयं मत्कृते प्रभो । निशि गूढं तथा भीम कीचकं तं निपातय ॥
kathaṃ satyācca nāpeyādrājā'yaṃ matkṛte prabho | niśi gūḍhaṃ tathā bhīma kīcakaṃ taṃ nipātaya
हे प्रभो, ऐसा करो कि मेरे कारण राजा अपने सत्य से न डिगें; हे भीम, रात में छिपकर उस कीचक को मार गिराओ।
श्लोक 51 (4.25.51)
अनुबुद्धे हि कौन्तेयो धर्मराजो युधिष्ठिरः । पुनर्वनं व्रजेद्धीमाननुजैः परिवारितः ॥
anubuddhe hi kaunteyo dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | punarvanaṃ vrajeddhīmānanujaiḥ parivāritaḥ
क्योंकि बात खुल जाने पर बुद्धिमान् धर्मराज कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर अपने छोटे भाइयों के साथ फिर वन को चले जाएँगे।
श्लोक 52 (4.25.52)
कश्च धर्मपरं ज्येष्ठमतिवर्तेत भारत । भीम भीताऽस्मि संबोधात्साधु मा चापलं कृथाः ॥
kaśca dharmaparaṃ jyeṣṭhamativarteta bhārata | bhīma bhītā'smi saṃbodhātsādhu mā cāpalaṃ kṛthāḥ
और हे भारत, धर्मपरायण बड़े भाई की बात कौन टालेगा? हे भीम, मुझे भेद खुलने का डर है; कृपया कोई उतावली न करना।
श्लोक 53 (4.25.53)
यथा न कश्चिज्जानीते सूतपुत्रं त्वया हतम् । तथा कुरुष्व कौरव्य बलवन्नरिमर्दन । अदृश्यमानस्त्वं तस्य भिन्धि प्राणानरिन्दम ॥
yathā na kaścijjānīte sūtaputraṃ tvayā hatam | tathā kuruṣva kauravya balavannarimardana | adṛśyamānastvaṃ tasya bhindhi prāṇānarindama
हे बलवान् कुरुवंशी, शत्रुओं का मर्दन करने वाले, ऐसा करो कि किसी को पता न चले कि सूतपुत्र तुम्हारे हाथों मारा गया है; हे अरिन्दम, उससे छिपे रहकर उसके प्राण ले लो।