विराट पर्व · अध्याय 26
नृत्यशाला में भीम द्वारा कीचक-वध
आधी रात को भीम पहले ही अँधेरी नृत्यशाला में जाकर पलंग पर लेट जाते हैं। सज-धजकर आया कीचक उन्हें सैरन्ध्री समझकर अपने उपहारों और अपने रूप की डींग मारता है; भीम उसका उपहास करते हैं और उछलकर उसके बाल पकड़ लेते हैं। दोनों में भयंकर मल्लयुद्ध होता है, अन्त में भीम कीचक को पछाड़कर मुक्के से मार डालते हैं और उसके अंग उसके धड़ में ठूँस देते हैं; फिर आग जलाकर द्रौपदी को वह आकारहीन शव दिखाते हैं और चुपचाप रसोईघर लौट जाते हैं। द्रौपदी रक्षकों से कहती हैं कि उनके गन्धर्व पतियों ने कीचक को मार डाला है, और कीचक के भाई उस क्षत-विक्षत शव को देखकर विस्मित रह जाते हैं।
भीम उवाच
श्लोक 1 (4.26.1)
तथा भद्रे करिष्यामि यथा त्वं भीरु भाषसे । अदृश्यमानस्तस्याहं तमिस्रायां सकुण्डलम् ॥
tathā bhadre kariṣyāmi yathā tvaṃ bhīru bhāṣase | adṛśyamānastasyāhaṃ tamisrāyāṃ sakuṇḍalam
हे कल्याणी, हे भीरु, जैसा तुम कहती हो, मैं वैसा ही करूँगा। अँधेरे में उससे छिपे रहकर मैं कुण्डलों सहित उसके सिर को
श्लोक 2 (4.26.2)
नागो बिल्वमिवाक्रम्य पोथयिष्यामि तच्छिरः । अलभ्यामिच्छतस्तस्य कीचकस्य दुरात्मनः ॥
nāgo bilvamivākramya pothayiṣyāmi tacchiraḥ | alabhyāmicchatastasya kīcakasya durātmanaḥ
उसी प्रकार कुचल डालूँगा जैसे हाथी बेल के फल को पैरों तले रौंद देता है — उस दुष्ट कीचक का सिर, जो उस स्त्री को चाहता है जिसे वह कभी नहीं पा सकता।
श्लोक 3 (4.26.3)
मया यदुक्तं पाञ्चालि धर्मराजसुतं प्रति । कोपादृते किमन्यत्तु नानुवर्तेत को नृपम् ॥
mayā yaduktaṃ pāñcāli dharmarājasutaṃ prati | kopādṛte kimanyattu nānuvarteta ko nṛpam
हे पाञ्चाली, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर के विषय में मैंने जो कहा, वह क्रोध के सिवा और क्या था? राजा की बात कौन नहीं मानेगा?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (4.26.4)
एवमुक्त्वा महाबाहुस्तत्र पाण्डवनन्दनः । अर्धरात्रे तदोत्थाय सत्ववान्भीमविक्रमः ॥
evamuktvā mahābāhustatra pāṇḍavanandanaḥ | ardharātre tadotthāya satvavānbhīmavikramaḥ
ऐसा कहकर पाण्डवों को आनन्द देने वाले, भयंकर पराक्रमी, बलवान् महाबाहु भीम आधी रात को उठे,
श्लोक 5 (4.26.5)
अवदातेन मृदुना पटेनाच्छादितस्तथा । द्रौपदीं पृष्ठतः कृत्वा यत्रासीन्नर्तनालयः ॥
avadātena mṛdunā paṭenācchāditastathā | draupadīṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā yatrāsīnnartanālayaḥ
और कोमल, उजले वस्त्र से स्वयं को ढककर, द्रौपदी को पीछे-पीछे लेकर वहाँ गए जहाँ नृत्यशाला थी।
श्लोक 6 (4.26.6)
स भीमः प्रथमं गत्वा तमिस्रायामुपाविशत् । मृगं सिंह इवादृश्यः प्रत्याकाङ्क्षत्स कीचकम् ॥
sa bhīmaḥ prathamaṃ gatvā tamisrāyāmupāviśat | mṛgaṃ siṃha ivādṛśyaḥ pratyākāṅkṣatsa kīcakam
भीम सबसे पहले वहाँ पहुँचकर अँधेरे में बैठ गए; जैसे सिंह छिपकर हिरन की बाट जोहता है, वैसे ही अदृश्य रहकर वे कीचक की प्रतीक्षा करने लगे।
श्लोक 7 (4.26.7)
कीचकस्तु शिरःस्नातो निशायां समलंकृतः । सङ्केतमगमत्तूर्णं शून्यागारमपावृतम् ॥
kīcakastu śiraḥsnāto niśāyāṃ samalaṃkṛtaḥ | saṅketamagamattūrṇaṃ śūnyāgāramapāvṛtam
उधर कीचक सिर से स्नान करके और भली-भाँति सज-धजकर रात में शीघ्रता से मिलन-स्थान पर पहुँचा — उस सूने भवन में, जिसके द्वार खुले थे,
श्लोक 8 (4.26.8)
तदेव नर्तनागारं पाञ्चाली यदभाषत । तां मन्यमानः संकेते सैरन्ध्रीं काममोहितः ॥
tadeva nartanāgāraṃ pāñcālī yadabhāṣata | tāṃ manyamānaḥ saṃkete sairandhrīṃ kāmamohitaḥ
वही नृत्यशाला जिसका नाम पाञ्चाली ने बताया था; काम से मोहित वह यह सोच रहा था कि सैरन्ध्री मिलन-स्थान पर होगी।
श्लोक 9 (4.26.9)
प्रविश्य नर्तनागारं ततस्तं पुरुषर्षभम् । पूर्वागतं भीमसेनं दृप्तमप्रतिमौजसम् ॥
praviśya nartanāgāraṃ tatastaṃ puruṣarṣabham | pūrvāgataṃ bhīmasenaṃ dṛptamapratimaujasam
नृत्यशाला में प्रवेश करके वह उस पुरुषश्रेष्ठ भीमसेन के पास पहुँचा, जो अभिमानी और अतुलनीय तेज वाले थे और उससे पहले ही वहाँ आ चुके थे,
श्लोक 10 (4.26.10)
शयानं शयने तत्र मृत्युं मूढः परामृशत् । जाज्वल्यमानं कोपेन कृष्णाधर्षणजेन च ॥
śayānaṃ śayane tatra mṛtyuṃ mūḍhaḥ parāmṛśat | jājvalyamānaṃ kopena kṛṣṇādharṣaṇajena ca
और वहाँ पलंग पर लेटे थे, द्रौपदी के अपमान से उपजे क्रोध से धधकते हुए; उस मूर्ख ने अपनी मृत्यु को ही छू लिया।
श्लोक 11 (4.26.11)
एकान्ते भीममासाद्य कीचकः कालचोदितः । हर्षोन्मथितचित्तात्मा स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥
ekānte bhīmamāsādya kīcakaḥ kālacoditaḥ | harṣonmathitacittātmā smayamāno'bhyabhāṣata
उस एकान्त में भीम के पास पहुँचकर काल से प्रेरित कीचक, जिसका मन हर्ष से मथा जा रहा था, मुस्कराते हुए बोला—
कीचक उवाच
श्लोक 12 (4.26.12)
प्रहितं ते मया भद्रे बहुवित्तं शुचिस्मिते । त्वयि तिष्ठतु तत्सर्वं यथाऽसि स्वयमागता ॥
prahitaṃ te mayā bhadre bahuvittaṃ śucismite | tvayi tiṣṭhatu tatsarvaṃ yathā'si svayamāgatā
हे पवित्र मुस्कान वाली कल्याणी, मैंने तुम्हारे पास बहुत धन भेजा है; वह सब तुम्हारे ही पास रहे, क्योंकि तुम स्वयं मेरे पास आई हो।
श्लोक 13 (4.26.13)
अकस्मान्मां प्रशंसन्ति सदा गृहगताः स्त्रियः । बलवान्दर्शनीयश्च नान्यस्ते सदृशः पुमान् ॥
akasmānmāṃ praśaṃsanti sadā gṛhagatāḥ striyaḥ | balavāndarśanīyaśca nānyaste sadṛśaḥ pumān
मेरे घर की स्त्रियाँ बिना कहे ही सदा मेरी प्रशंसा करती हैं: "तुम बलवान् हो और देखने में सुन्दर हो; तुम्हारे जैसा कोई दूसरा पुरुष नहीं।"
श्लोक 14 (4.26.14)
अहं रूपेण संपन्नः स्नातोऽगुरुविभूषितः । नित्यमेव प्रियः स्त्रीणां सौभाग्यात्प्रियदर्शनः । रूपस्य तन्मया प्राप्तं फलं कमललोचने ॥
ahaṃ rūpeṇa saṃpannaḥ snāto'guruvibhūṣitaḥ | nityameva priyaḥ strīṇāṃ saubhāgyātpriyadarśanaḥ | rūpasya tanmayā prāptaṃ phalaṃ kamalalocane
मैं रूपवान् हूँ, स्नान करके अगुरु से सुवासित और सजा हुआ हूँ; अपने सौभाग्य से मैं सदा स्त्रियों का प्रिय और देखने में मनोहर रहा हूँ। हे कमललोचने, आज मुझे अपने उस रूप का फल मिल गया है।
भीम उवाच
श्लोक 15 (4.26.15)
दिष्ट्या त्वं दर्शनीयोऽसि दिष्ट्याऽऽत्मानं प्रशंससि ॥
diṣṭyā tvaṃ darśanīyo'si diṣṭyā''tmānaṃ praśaṃsasi
सौभाग्य की बात है कि तुम सुन्दर हो! सौभाग्य की बात है कि तुम अपनी प्रशंसा स्वयं करते हो!
श्लोक 16 (4.26.16)
त्वयाऽपीदृग्गुणा नारी रूपशीलसमन्विता । अदृष्टपूर्वा पश्य त्वं यतो जानासि सूतज । द्रक्ष्यसि त्वं मुहूर्तेन यथेयं स्त्री गुणान्विता ॥
tvayā'pīdṛgguṇā nārī rūpaśīlasamanvitā | adṛṣṭapūrvā paśya tvaṃ yato jānāsi sūtaja | drakṣyasi tvaṃ muhūrtena yatheyaṃ strī guṇānvitā
रूप और शील से सम्पन्न ऐसे गुणों वाली स्त्री तुमने पहले कभी नहीं देखी; तो हे सूतपुत्र, तुम तो पारखी हो, देखो। क्षण भर में तुम देख लोगे कि यह स्त्री कैसे गुणों वाली है।
श्लोक 17 (4.26.17)
उपरंस्यसि कामाच्च शीघ्रं त्वं स्प्रष्टुमर्हसि । ईदृशस्तु त्वया स्पर्शः स्पृष्टपूर्वो न कर्हिचित् ॥
uparaṃsyasi kāmācca śīghraṃ tvaṃ spraṣṭumarhasi | īdṛśastu tvayā sparśaḥ spṛṣṭapūrvo na karhicit
तुम शीघ्र ही काम-वासना से छुटकारा पा जाओगे; जल्दी से मुझे छू लो। ऐसा स्पर्श तुमने पहले कभी अनुभव नहीं किया होगा।
श्लोक 18 (4.26.18)
स्पर्शं वेत्सि विदग्धस्त्वं कामधर्मविचक्षणः । स्त्रीणां प्रीतिकरो नान्यस्त्वत्समः पुरुषस्त्विह ॥
sparśaṃ vetsi vidagdhastvaṃ kāmadharmavicakṣaṇaḥ | strīṇāṃ prītikaro nānyastvatsamaḥ puruṣastviha
तुम स्पर्श को पहचानते हो, चतुर हो और काम-कला में निपुण हो; यहाँ स्त्रियों को प्रसन्न करने वाला तुम्हारे समान कोई दूसरा पुरुष नहीं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (4.26.19)
इत्युक्त्वा तं महाबाहुर्भीमो भीमपराक्रमः । सहसोत्पत्य कौन्तेयः प्रहस्येदमुवाच ह ॥
ityuktvā taṃ mahābāhurbhīmo bhīmaparākramaḥ | sahasotpatya kaunteyaḥ prahasyedamuvāca ha
उससे ऐसा कहकर भयंकर पराक्रमी महाबाहु कुन्तीपुत्र भीम सहसा उछलकर खड़े हो गए और हँसते हुए यह बोले—
भीम उवाच
श्लोक 20 (4.26.20)
अद्य त्वां भगिनी पापं कृष्यमाणं मया भुवि । द्रक्ष्यतेऽद्रिप्रतीकाशं सिंहेनेव महागजम् ॥
adya tvāṃ bhaginī pāpaṃ kṛṣyamāṇaṃ mayā bhuvi | drakṣyate'dripratīkāśaṃ siṃheneva mahāgajam
आज तुम्हारी बहन देखेगी कि पर्वत जैसे विशाल तुम पापी को मैं धरती पर वैसे ही घसीट रहा हूँ जैसे सिंह किसी बड़े हाथी को घसीटता है।
श्लोक 21 (4.26.21)
निराबाधा त्वयि हते सैरन्ध्री विचरिष्यति । सुखमेव चरिष्यन्ति सैरन्ध्र्याः पतयः सदा ॥
nirābādhā tvayi hate sairandhrī vicariṣyati | sukhameva cariṣyanti sairandhryāḥ patayaḥ sadā
तुम्हारे मारे जाने पर सैरन्ध्री निर्बाध घूमेगी, और सैरन्ध्री के पति सदा सुख से रहेंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (4.26.22)
ततो जग्राह केशेषु माल्यवत्सु सुगन्धिषु ॥
tato jagrāha keśeṣu mālyavatsu sugandhiṣu
फिर भीम ने मालाओं से सजे, सुगन्धित केशों से उसे पकड़ लिया।
श्लोक 23 (4.26.23)
गृहीत्वा कीचकं भीमो विरराज महाबलः । गृहीत्वा ग्रासकामस्तु सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥
gṛhītvā kīcakaṃ bhīmo virarāja mahābalaḥ | gṛhītvā grāsakāmastu siṃhaḥ kṣudramṛgaṃ yathā
कीचक को पकड़े हुए महाबली भीम ऐसे शोभित हुए जैसे भोजन की इच्छा से छोटे हिरन को पकड़े हुए सिंह।
श्लोक 24 (4.26.24)
स केशेषु परामृष्टो बलेन बलिनां वरः । आक्षिप्य केशान्वेगेन बाह्वोर्जग्राह पाण्डवम् ॥
sa keśeṣu parāmṛṣṭo balena balināṃ varaḥ | ākṣipya keśānvegena bāhvorjagrāha pāṇḍavam
बलपूर्वक बाल पकड़े जाने पर बलवानों में श्रेष्ठ कीचक ने झटके से अपने केश छुड़ा लिए और पाण्डव को अपनी भुजाओं में जकड़ लिया।
श्लोक 25 (4.26.25)
बाहुयुद्धं तयोरासीत्क्रुद्धयोर्नरसिंहयोः । वसन्ते वासिताहेतोर्बलिनोर्नागयोरिव ॥
bāhuyuddhaṃ tayorāsītkruddhayornarasiṃhayoḥ | vasante vāsitāhetorbalinornāgayoriva
तब क्रोध से भरे उन दोनों नरसिंहों में बाहुयुद्ध छिड़ गया, जैसे वसन्त ऋतु में हथिनी के लिए दो बलवान् हाथी लड़ते हैं —
श्लोक 26 (4.26.26)
कीचकानां तु मुख्यस्य नराणामुत्तमस्य च । वालिसुग्रीवयोर्भ्रात्रोः पुरेव कपिसिंहयोः ॥
kīcakānāṃ tu mukhyasya narāṇāmuttamasya ca | vālisugrīvayorbhrātroḥ pureva kapisiṃhayoḥ
कीचकों के प्रधान और मनुष्यों में श्रेष्ठ भीम के बीच वैसा ही युद्ध हुआ जैसा प्राचीन काल में वानरों में सिंह के समान दोनों भाइयों वाली और सुग्रीव के बीच हुआ था।
श्लोक 27 (4.26.27)
शार्दूलाविव गर्जन्तौ तार्क्ष्यनागाविवोद्यतौ । समयत्नौ समक्रोधौ पतितौ भीमकीचकौ ॥
śārdūlāviva garjantau tārkṣyanāgāvivodyatau | samayatnau samakrodhau patitau bhīmakīcakau
दो बाघों की भाँति गरजते, गरुड़ और नाग की भाँति एक-दूसरे पर झपटते, समान प्रयत्न और समान क्रोध वाले भीम और कीचक भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 28 (4.26.28)
गजाविव मदोन्मत्तौ नदन्तौ पतितौ क्षितौ । वृषभाविव वल्मीकं मृद्नन्तौ समविक्रमौ ॥
gajāviva madonmattau nadantau patitau kṣitau | vṛṣabhāviva valmīkaṃ mṛdnantau samavikramau
मद से उन्मत्त दो हाथियों की भाँति चिंघाड़ते हुए वे धरती पर गिरे; समान पराक्रम वाले वे मानो दो साँड़ थे जो बाँबी को रौंद रहे हों।
श्लोक 29 (4.26.29)
ईषदागलितं चापि क्रोधाच्चावाङ्मुखं स्थितम् । कीचको बलवान्भीमं जानुभ्यां पातयद्भुवि ॥
īṣadāgalitaṃ cāpi krodhāccāvāṅmukhaṃ sthitam | kīcako balavānbhīmaṃ jānubhyāṃ pātayadbhuvi
जब भीम क्रोध में कुछ डगमगाते हुए मुँह नीचे किए खड़े थे, तब बलवान् कीचक ने घुटनों के प्रहार से उन्हें धरती पर गिरा दिया।
श्लोक 30 (4.26.30)
पातितो भीमसेनस्तु कीचकेन बलीयसा । उत्पपाताथ वेगेन दण्डाहत इवोरगः ॥
pātito bhīmasenastu kīcakena balīyasā | utpapātātha vegena daṇḍāhata ivoragaḥ
बलशाली कीचक द्वारा गिराए गए भीमसेन डंडे की चोट खाए साँप की भाँति वेग से फिर उछलकर खड़े हो गए।
श्लोक 31 (4.26.31)
स्पर्धया च बलोन्मत्तौ तावुभौ भीमकीचकौ । निश्शब्दं पर्यकर्षेतामन्योन्यस्य विनिर्जये ॥
spardhayā ca balonmattau tāvubhau bhīmakīcakau | niśśabdaṃ paryakarṣetāmanyonyasya vinirjaye
होड़ और बल के मद में चूर भीम और कीचक दोनों, एक-दूसरे को जीतने के लिए, बिना कोई शब्द किए एक-दूसरे को खींचने लगे।
श्लोक 32 (4.26.32)
ततस्तद्भवनश्रेष्ठं प्राकम्पत तदा भृशम् । तौ क्रोधवशमापन्नावन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥
tatastadbhavanaśreṣṭhaṃ prākampata tadā bhṛśam | tau krodhavaśamāpannāvanyonyamabhijaghnatuḥ
तब वह श्रेष्ठ भवन ज़ोर से काँप उठा, क्योंकि क्रोध के वश में हुए वे दोनों एक-दूसरे पर प्रहार कर रहे थे।
श्लोक 33 (4.26.33)
तलाभ्यां भीमसेनेन वक्षस्यभिहतो बली । कीचको रोषरक्ताक्षो न चचाल पदात्पदम् ॥
talābhyāṃ bhīmasenena vakṣasyabhihato balī | kīcako roṣaraktākṣo na cacāla padātpadam
भीमसेन ने हथेलियों से बलवान् कीचक की छाती पर प्रहार किया, पर क्रोध से लाल आँखों वाला कीचक एक पग भी नहीं हटा।
श्लोक 34 (4.26.34)
मुहूर्तमशकत्सोढुं वेगं तस्य महात्मनः । कीचको भीमसेनेन पश्चात्पश्चादहीयत ॥
muhūrtamaśakatsoḍhuṃ vegaṃ tasya mahātmanaḥ | kīcako bhīmasenena paścātpaścādahīyata
कुछ क्षण तक वह उस महात्मा के वेग को सह सका; फिर कीचक भीमसेन के सामने पग-पग पीछे हटने लगा।
श्लोक 35 (4.26.35)
तं हीयमानं विज्ञाय भीमसेनो महाबलः । वक्षस्यानीय वेगेन प्रममाथ विचेतसम् ॥
taṃ hīyamānaṃ vijñāya bhīmaseno mahābalaḥ | vakṣasyānīya vegena pramamātha vicetasam
उसे कमज़ोर पड़ता जानकर महाबली भीमसेन ने उसे वेग से अपनी छाती से भींचकर इतना मसला कि वह अचेत हो गया।
श्लोक 36 (4.26.36)
क्रोधाविष्टो विनिःश्वस्य पुनश्चैनं वृकोदरः । जग्राह जयतांश्रेष्ठः केशेष्वेव भृशं तदा ॥
krodhāviṣṭo viniḥśvasya punaścainaṃ vṛkodaraḥ | jagrāha jayatāṃśreṣṭhaḥ keśeṣveva bhṛśaṃ tadā
क्रोध से भरे, विजेताओं में श्रेष्ठ वृकोदर ने लंबी साँस भरकर फिर से उसे कसकर बालों से पकड़ लिया।
श्लोक 37 (4.26.37)
गृहीत्वा कीचकं भीमो विरराज महाबलः । आमिषार्थे गृहीत्वैव शार्दूलो मृगयूथपम् ॥
gṛhītvā kīcakaṃ bhīmo virarāja mahābalaḥ | āmiṣārthe gṛhītvaiva śārdūlo mṛgayūthapam
कीचक को पकड़े हुए महाबली भीम ऐसे शोभित हुए जैसे मांस के लिए हिरनों के झुंड के सरदार को पकड़े हुए बाघ।
श्लोक 38 (4.26.38)
पुनश्चातिबलस्तत्र कीचको बलदर्पितः । व्यायच्छन्नेव दुर्धर्षः पाण्डवेन तरस्विना ॥
punaścātibalastatra kīcako baladarpitaḥ | vyāyacchanneva durdharṣaḥ pāṇḍavena tarasvinā
फिर भी अत्यन्त बलवान्, बल के घमंड में चूर और दुर्जेय कीचक वहाँ वेगशाली पाण्डव से जूझता ही रहा।
श्लोक 39 (4.26.39)
मुष्टिना भीमसेनेन शिरस्यभिहतो भृशम् । कीचको वृत्तरक्ताक्षो गतासुरपतद्भुवि ॥
muṣṭinā bhīmasenena śirasyabhihato bhṛśam | kīcako vṛttaraktākṣo gatāsurapatadbhuvi
भीमसेन के मुक्के से सिर पर ज़ोर का प्रहार खाकर, लाल आँखें घुमाता हुआ कीचक प्राणहीन होकर धरती पर गिर पड़ा।
श्लोक 40 (4.26.40)
आस्ये पाणी च पादौ च शिरोग्रीवां सकुण्डलाम् । काये प्रवेशयामास मृदित्वाऽङ्गानि सर्वशः ॥
āsye pāṇī ca pādau ca śirogrīvāṃ sakuṇḍalām | kāye praveśayāmāsa mṛditvā'ṅgāni sarvaśaḥ
उसके सब अंगों को मसलकर भीम ने उसके हाथ-पैर उसके मुँह में, और कुण्डलों सहित सिर और गर्दन उसके धड़ में घुसा दिए।
श्लोक 41 (4.26.41)
स तं मथितसर्वाङ्गं मांसपिण्डमथाकरोत् ॥
sa taṃ mathitasarvāṅgaṃ māṃsapiṇḍamathākarot
उसके सारे अंग मसलकर भीम ने उसे मांस का एक लोथड़ा बना दिया।
श्लोक 42 (4.26.42)
तत्राग्निं स्वयमुज्ज्वाल्य पाणिसंघर्षजं बली । कृष्णायै दर्शयामास भीमसेनो महाबलः ॥
tatrāgniṃ svayamujjvālya pāṇisaṃgharṣajaṃ balī | kṛṣṇāyai darśayāmāsa bhīmaseno mahābalaḥ
फिर महाबली भीमसेन ने वहीं अपने हाथों की रगड़ से स्वयं आग जलाकर कृष्णा को उसे दिखाया।
श्लोक 43 (4.26.43)
उवाच च महातेजा द्रौपदीं योषितां वराम् । त्वयि कामुकमत्यन्तं पापिनं पारदारिकम् । पश्यैनमेहि पाञ्चालि कामुकोऽयं मया हतः ॥
uvāca ca mahātejā draupadīṃ yoṣitāṃ varām | tvayi kāmukamatyantaṃ pāpinaṃ pāradārikam | paśyainamehi pāñcāli kāmuko'yaṃ mayā hataḥ
और उस महातेजस्वी ने स्त्रियों में श्रेष्ठ द्रौपदी से कहा— "हे पाञ्चाली, आओ, इस कामी को देखो, जो तुम पर अत्यन्त आसक्त था, पापी और पराई स्त्री का लोभी। यह कामी मेरे हाथों मारा गया है।
भीम उवाच
श्लोक 44 (4.26.44)
प्रार्थयन्ते सुकेशान्ते ये त्वां शीलसमन्विताम् । एवं स्वपन्ति ते भीरु शेतेऽयं कीचको यथा । यस्त्वामभ्यहनद्भद्रे पदा भूमौ निपात्य च ॥
prārthayante sukeśānte ye tvāṃ śīlasamanvitām | evaṃ svapanti te bhīru śete'yaṃ kīcako yathā | yastvāmabhyahanadbhadre padā bhūmau nipātya ca
हे सुन्दर केशों वाली, शील से सम्पन्न तुम्हें जो लोग चाहेंगे, हे भीरु, वे सब इसी तरह सोएँगे जैसे यह कीचक सो रहा है — वही जिसने, हे कल्याणी, तुम्हें धरती पर गिराकर लात मारी थी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (4.26.45)
एवमुक्त्वा महाबाहुर्गन्धर्वेण हतं तदा । विज्ञापनार्थमन्येषां विरराम महाहवात् ॥
evamuktvā mahābāhurgandharveṇa hataṃ tadā | vijñāpanārthamanyeṣāṃ virarāma mahāhavāt
ऐसा कहकर महाबाहु भीम उस महासंग्राम से हट गए, ताकि दूसरों को यही ज्ञात हो कि कीचक को किसी गन्धर्व ने मारा है।
श्लोक 46 (4.26.46)
तथा स कीचकं हत्वा गत्वा रोषस्य निष्कृतिम् । आमन्त्र्य द्रौपदीं पश्चात्क्षिप्रमायान्महानसम् ॥
tathā sa kīcakaṃ hatvā gatvā roṣasya niṣkṛtim | āmantrya draupadīṃ paścātkṣipramāyānmahānasam
इस प्रकार कीचक को मारकर और अपने क्रोध का बदला चुकाकर भीम द्रौपदी से विदा लेकर शीघ्र रसोईघर लौट आए।
श्लोक 47 (4.26.47)
स्नात्वाऽनुलेपनं कृत्वा व्यापूर्य च मनोरथम् । सुखोपविष्टः शयने भीमो भीमपराक्रमः ॥
snātvā'nulepanaṃ kṛtvā vyāpūrya ca manoratham | sukhopaviṣṭaḥ śayane bhīmo bhīmaparākramaḥ
स्नान करके, अंगों पर लेप लगाकर और अपना मनोरथ पूरा करके भयंकर पराक्रमी भीम सुख से अपनी शय्या पर लेट गए।
श्लोक 48 (4.26.48)
ततः कृष्णा यदा मेने गतं भीमं महानसम् । कीचकं घातयित्वा च द्रौपदी योषितां वरा । प्रहृष्टा गतसंत्रासा सभापालानुवाच ह ॥
tataḥ kṛṣṇā yadā mene gataṃ bhīmaṃ mahānasam | kīcakaṃ ghātayitvā ca draupadī yoṣitāṃ varā | prahṛṣṭā gatasaṃtrāsā sabhāpālānuvāca ha
जब कृष्णा ने समझ लिया कि भीम रसोईघर में पहुँच गए हैं, तब कीचक को मरवाकर स्त्रियों में श्रेष्ठ द्रौपदी ने प्रसन्न और भयमुक्त होकर सभा के रक्षकों से कहा—
द्रौपद्युवाच
श्लोक 49 (4.26.49)
कीचको निहतः शेते गन्धर्वैः पतिभिर्मम । परस्त्रीकामसंतप्तं समागच्छत पश्यत ॥
kīcako nihataḥ śete gandharvaiḥ patibhirmama | parastrīkāmasaṃtaptaṃ samāgacchata paśyata
मेरे पति गन्धर्वों ने कीचक को मार डाला है, वह यहाँ पड़ा है। पराई स्त्री की कामना में जलने वाले इस कीचक को सब आकर देखो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 50 (4.26.50)
तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्या नर्तनागाररक्षिणः । सहसैव समुत्तस्थुरुल्कामादाय सर्वशः ॥
tacchrutvā bhāṣitaṃ tasyā nartanāgārarakṣiṇaḥ | sahasaiva samuttasthurulkāmādāya sarvaśaḥ
उसकी बात सुनकर नृत्यशाला के सभी रक्षक मशालें लेकर तुरन्त उठ खड़े हुए।
श्लोक 51 (4.26.51)
तस्यास्तं निहतं श्रुत्वा कीचकस्य सहोदराः । ततो गत्वा तु तद्वेश्म कीचकं विनिपातितम् । गतासुं ददृशुर्भूमौ रुधिरेण समुक्षितम् ॥
tasyāstaṃ nihataṃ śrutvā kīcakasya sahodarāḥ | tato gatvā tu tadveśma kīcakaṃ vinipātitam | gatāsuṃ dadṛśurbhūmau rudhireṇa samukṣitam
उससे कीचक के मारे जाने की बात सुनकर उसके सगे भाई भी आए, और उस भवन में जाकर उन्होंने देखा कि कीचक मारा जाकर प्राणहीन धरती पर पड़ा है और रक्त से लथपथ है।
श्लोक 52 (4.26.52)
पार्ष्णिपाणिशिरोहीनं दृष्ट्वा ते विस्मिताऽभवन् ॥
pārṣṇipāṇiśirohīnaṃ dṛṣṭvā te vismitā'bhavan
उसे एड़ियों, हाथों और सिर से रहित देखकर वे विस्मित हो गए।
श्लोक 53 (4.26.53)
क्वास्य ग्रीवा क्व चरणौ क्व पाणी क्व शिरः क्व दृक् । इति स्म ते परीक्षन्ते गन्धर्वेण हतं तदा ॥
kvāsya grīvā kva caraṇau kva pāṇī kva śiraḥ kva dṛk | iti sma te parīkṣante gandharveṇa hataṃ tadā
"इसकी गर्दन कहाँ है? पैर कहाँ हैं? हाथ कहाँ हैं, सिर कहाँ है, आँखें कहाँ हैं?" — इस प्रकार वे गन्धर्व द्वारा मारे गए उस कीचक को जाँचने लगे।
श्लोक 54 (4.26.54)
अमानुषं कृतं कर्म तं दृष्ट्वा विनिपातितम् । निरीक्षन्ते ततः सर्वे परं विस्मयमागताः ॥
amānuṣaṃ kṛtaṃ karma taṃ dṛṣṭvā vinipātitam | nirīkṣante tataḥ sarve paraṃ vismayamāgatāḥ
उसे इस प्रकार मारा गया देखकर — यह किसी मनुष्य का किया काम नहीं लगता था — वे सब अत्यन्त विस्मित होकर उसे देखते रह गए।