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विराट पर्व · अध्याय 27

भीम द्वारा उपकीचकों का वध

कीचक के भाई उपकीचक उसका कुचला हुआ शव देखते हैं, सैरन्ध्री को दोषी ठहराते हैं और विराट से उसे कीचक की चिता पर जलाने की अनुमति ले लेते हैं; वे द्रौपदी को अर्थी से बाँधकर श्मशान की ओर ले चलते हैं। अपने पतियों को उनके गुप्त नामों से पुकारती द्रौपदी की आवाज़ सुनकर भीम दीवार लाँघकर निकलते हैं, एक वृक्ष उखाड़ते हैं और उन सभी एक सौ पाँच को मार डालते हैं। वे द्रौपदी को मुक्त कर सान्त्वना देते हैं, उसे देवरात की पतिव्रता पत्नी की कथा सुनाते हैं (यह अंश केवल एक पाण्डुलिपि में मिलता है), और उसे अलग मार्ग से सुदेष्णा के भवन भेजकर स्वयं पाकशाला लौट जाते हैं; प्रातः नगरवासी मृतकों को देखकर अवाक् रह जाते हैं।

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.27.1)

तत्काले तु समागम्य सर्वे तत्रास्य बान्धवाः । रुरुदुः कीचकं दृष्ट्वा परिवार्योपतस्थिरे ॥

tatkāle tu samāgamya sarve tatrāsya bāndhavāḥ | ruruduḥ kīcakaṃ dṛṣṭvā parivāryopatasthire

उस समय उसके सभी बन्धु-बान्धव वहाँ एकत्र हुए और कीचक को देखकर रोते हुए उसे घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 2 (4.27.2)

सर्वे संहृष्टरोमाणः संत्रस्ताः प्रेक्ष्य कीचकम् । तथा संभुग्नसर्वाङ्गं कूर्मं स्थल इवोद्धृतम् ॥

sarve saṃhṛṣṭaromāṇaḥ saṃtrastāḥ prekṣya kīcakam | tathā saṃbhugnasarvāṅgaṃ kūrmaṃ sthala ivoddhṛtam

कीचक को देखकर सबके रोंगटे खड़े हो गए और वे भयभीत हो उठे; उसके सारे अंग भीतर धँस गए थे, मानो किसी कछुए को जल से निकालकर सूखी धरती पर डाल दिया गया हो।

श्लोक 3 (4.27.3)

पोथितं भीमसेनेन महेन्द्रेणेव दानवम् । कीचकं बलसंमत्तं दुर्धर्षं येन केन चित् ॥

pothitaṃ bhīmasenena mahendreṇeva dānavam | kīcakaṃ balasaṃmattaṃ durdharṣaṃ yena kena cit

जैसे महेन्द्र किसी दानव को कुचल डालते हैं, वैसे ही भीमसेन ने उसे कुचल डाला था — बल के मद में चूर उस कीचक को, जिसे कोई भी परास्त नहीं कर सकता था।

श्लोक 4 (4.27.4)

गन्धर्वेण हतं श्रुत्वा कीचकं पुरुषर्षभम् । संस्कारयितुमिच्छन्तो बहिर्नेतुं प्रचक्रमुः ॥

gandharveṇa hataṃ śrutvā kīcakaṃ puruṣarṣabham | saṃskārayitumicchanto bahirnetuṃ pracakramuḥ

यह सुनकर कि पुरुषश्रेष्ठ कीचक को किसी गन्धर्व ने मार डाला है, वे उसका अन्त्येष्टि-संस्कार करने की इच्छा से उसे बाहर ले जाने लगे।

श्लोक 5 (4.27.5)

अपश्यन्नथ ते कृष्णां सूतपुत्राः समागताः । अदूरादनवद्याङ्गीं स्तम्भमालिङ्ग्य तिष्ठतीम् ॥

apaśyannatha te kṛṣṇāṃ sūtaputrāḥ samāgatāḥ | adūrādanavadyāṅgīṃ stambhamāliṅgya tiṣṭhatīm

तभी वहाँ एकत्र सूतपुत्रों ने पास ही खम्भे से लिपटकर खड़ी, निर्दोष अंगों वाली कृष्णा को देखा।

श्लोक 6 (4.27.6)

समागतेषु सूतेषु तानुवाचोपकीचकः । हसन्निव तदाऽमर्षान्निर्दहन्निव चक्षुषा ॥

samāgateṣu sūteṣu tānuvācopakīcakaḥ | hasanniva tadā'marṣānnirdahanniva cakṣuṣā

सूतों के एकत्र हो जाने पर कीचक के भाइयों में से एक उपकीचक ने क्रोध में मानो हँसते हुए और आँखों से मानो उसे भस्म करते हुए उनसे कहा —

उपकीचक उवाच

श्लोक 7 (4.27.7)

हन्यतां शीघ्रमसती यत्कृते कीचको हतः । अथवा नैव हन्तव्या दह्यतां कामिना सह ॥

hanyatāṃ śīghramasatī yatkṛte kīcako hataḥ | athavā naiva hantavyā dahyatāṃ kāminā saha

इस कुलटा को तुरन्त मार डालो, जिसके कारण कीचक मारा गया। अथवा इसे मारने की भी आवश्यकता नहीं — इसे इसके कामी के साथ ही जला दिया जाए।

श्लोक 8 (4.27.8)

मृतस्यापि प्रियं कार्यं सूतपुत्रस्य सर्वथा । इयं हि दुष्टचरिता मम भ्रातुरमित्रिणी ॥

mṛtasyāpi priyaṃ kāryaṃ sūtaputrasya sarvathā | iyaṃ hi duṣṭacaritā mama bhrāturamitriṇī

मरे हुए सूतपुत्र का भी हर प्रकार से प्रिय करना चाहिए। यह दुष्ट आचरण वाली स्त्री मेरे भाई की शत्रु है।

श्लोक 9 (4.27.9)

यत्कृते मरणं प्राप्तो नेयं जीवितुमर्हति । सहेयं दह्यतां सूता आमन्त्र्य च जनाधिपम् । हतस्यापि हि गन्धर्वैः कीचकस्य प्रियं भवेत् ॥

yatkṛte maraṇaṃ prāpto neyaṃ jīvitumarhati | saheyaṃ dahyatāṃ sūtā āmantrya ca janādhipam | hatasyāpi hi gandharvaiḥ kīcakasya priyaṃ bhavet

जिसके कारण उसे मृत्यु मिली, वह जीवित रहने योग्य नहीं है। सूतो! राजा से अनुमति लेकर इसे उसके साथ जला दिया जाए; गन्धर्वों द्वारा मारे गए कीचक का भी इससे प्रिय होगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (4.27.10)

ततो विराटमासाद्य सूताः प्राञ्जलयोऽब्रुवन् । कीचकोऽयं हतः शेते गन्धर्वैः कामरूपिभिः ॥

tato virāṭamāsādya sūtāḥ prāñjalayo'bruvan | kīcako'yaṃ hataḥ śete gandharvaiḥ kāmarūpibhiḥ

तब सूतों ने विराट के पास जाकर हाथ जोड़कर कहा — "इच्छानुसार रूप धारण करने वाले गन्धर्वों ने कीचक को मार डाला है; वह यहाँ मरा पड़ा है।

सूता ऊचुः

श्लोक 11 (4.27.11)

सैरन्ध्र्या घातितो रात्रौ तं दहेम सहानया । मानिताः स्मस्त्वया वीर तदनुज्ञातुमर्हसि ॥

sairandhryā ghātito rātrau taṃ dahema sahānayā | mānitāḥ smastvayā vīra tadanujñātumarhasi

सैरन्ध्री के कारण रात में उसका वध हुआ है; हम उसे इसके साथ ही जला दें। वीर! आपने सदा हमारा सम्मान किया है, अतः इसकी अनुमति दीजिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (4.27.12)

पराक्रमं तु सूतानां ज्ञात्वा राजाऽन्वमन्यत । सैरन्ध्र्याः सूतपुत्रेण सह दाहं नराधिपः ॥

parākramaṃ tu sūtānāṃ jñātvā rājā'nvamanyata | sairandhryāḥ sūtaputreṇa saha dāhaṃ narādhipaḥ

सूतों के पराक्रम को जानकर नरेश ने सूतपुत्र के साथ सैरन्ध्री को जलाने की अनुमति दे दी।

श्लोक 13 (4.27.13)

ततस्ते समनुज्ञाताः सर्वे तत्रास्य बान्धवाः । रुरुदुः कीचकं दृष्ट्वा परिवार्याभितः स्थिताः ॥

tataste samanujñātāḥ sarve tatrāsya bāndhavāḥ | ruruduḥ kīcakaṃ dṛṣṭvā parivāryābhitaḥ sthitāḥ

अनुमति मिल जाने पर उसके सभी बन्धु-बान्धव कीचक को देखकर रोते हुए उसे चारों ओर से घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 14 (4.27.14)

आरोप्य कृष्णां सह कीचकेन निबध्य केशेषु च पादयोश्च । ते चापि सूता वचनैरवोचन्नुद्दिश्य चैनामभिवीक्ष्य कृष्णाम् ॥

āropya kṛṣṇāṃ saha kīcakena nibadhya keśeṣu ca pādayośca | te cāpi sūtā vacanairavocannuddiśya caināmabhivīkṣya kṛṣṇām

उन्होंने कृष्णा को कीचक के साथ अर्थी पर चढ़ा दिया और उसके केशों तथा पैरों को बाँध दिया; फिर वे सूत कृष्णा की ओर देखकर और उसकी ओर संकेत करके ये वचन बोले —

सूता ऊचुः

श्लोक 15 (4.27.15)

यस्याः कृतेऽयं निहतो महात्मा तस्माद्धि सा कीचकमार्गमेतु । अवार्यसत्वेन च कीचकेन गतासुना सुन्दरी स्वर्गलोकम् ॥

yasyāḥ kṛte'yaṃ nihato mahātmā tasmāddhi sā kīcakamārgametu | avāryasatvena ca kīcakena gatāsunā sundarī svargalokam

जिसके कारण यह महामना मारा गया, वह भी कीचक के ही मार्ग पर जाए। अजेय बल वाले इस मृत कीचक के साथ यह सुन्दरी भी स्वर्गलोक को जाए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (4.27.16)

सा तेन कृष्णा शयने निबद्धा यशस्विनी चैव मनस्विनी च । अनार्यसत्त्वेन महार्यसत्त्वा गतासुना सा प्ररुरोद कृष्णा । विलम्बमाना विवशा हि दुष्टैस्तत्रैव पर्यङ्कवरे शुभाङ्गी ॥

sā tena kṛṣṇā śayane nibaddhā yaśasvinī caiva manasvinī ca | anāryasattvena mahāryasattvā gatāsunā sā praruroda kṛṣṇā | vilambamānā vivaśā hi duṣṭaistatraiva paryaṅkavare śubhāṅgī

इस प्रकार यशस्विनी और मनस्विनी कृष्णा उसके साथ शय्या पर बाँध दी गई। उदात्त स्वभाव वाली वह उस नीच स्वभाव वाले मृतक के साथ बँधी हुई फूट-फूटकर रोने लगी; दुष्टों के वश में पड़ी वह सुन्दर अंगों वाली विवश होकर उसी उत्तम पलंग पर लटकी रही।

श्लोक 17 (4.27.17)

ह्रियमाणाऽथ सुश्रोणी सूतपुत्रैरनिन्दिता । प्राक्रोशन्नाथमिच्छन्ती कृष्णा नाथवती सती ॥

hriyamāṇā'tha suśroṇī sūtaputrairaninditā | prākrośannāthamicchantī kṛṣṇā nāthavatī satī

सूतपुत्रों द्वारा ले जाई जाती हुई सुन्दर नितम्बों वाली निर्दोष कृष्णा — जो स्वयं सनाथ थी — रक्षक की चाह में ज़ोर से पुकारने लगी।

श्लोक 18 (4.27.18)

मृतेन सह बद्धाङ्गी निराशा जीविते तदा । श्मशानाभिमुखं नीता करेणुरिव रौति सा ॥

mṛtena saha baddhāṅgī nirāśā jīvite tadā | śmaśānābhimukhaṃ nītā kareṇuriva rauti sā

मृतक के साथ अंग-अंग से बँधी, जीवन से निराश, श्मशान की ओर ले जाई जाती हुई वह हथिनी की भाँति चीत्कार करने लगी।

द्रौपद्युवाच

श्लोक 19 (4.27.19)

जयो जयेशो विजयो जयत्सेनो जयद्बलः । ते मे वाचं विजानन्तु सूतपुत्रा नयन्ति माम् ॥

jayo jayeśo vijayo jayatseno jayadbalaḥ | te me vācaṃ vijānantu sūtaputrā nayanti mām

जय, जयेश, विजय, जयत्सेन और जयद्बल — वे मेरी पुकार सुनें! सूतपुत्र मुझे लिये जा रहे हैं।

श्लोक 20 (4.27.20)

येषां दुन्दुभिनिर्घोषो ज्याघोषः श्रूयते महान् । ते मे वाचं विजानन्तु सूतपुत्रा नयन्ति माम् ॥

yeṣāṃ dundubhinirghoṣo jyāghoṣaḥ śrūyate mahān | te me vācaṃ vijānantu sūtaputrā nayanti mām

जिनकी दुन्दुभियों का निनाद और धनुष की प्रत्यंचा का महान् घोष सुनाई देता है, वे मेरी पुकार सुनें! सूतपुत्र मुझे लिये जा रहे हैं।

श्लोक 21 (4.27.21)

येषां ज्यातलनिर्घोषो विस्फूर्जितमिवाशनेः । अश्रूयत महान्युद्धे भीमघोषस्तरस्विनाम् ॥

yeṣāṃ jyātalanirghoṣo visphūrjitamivāśaneḥ | aśrūyata mahānyuddhe bhīmaghoṣastarasvinām

जिन वेगशाली वीरों की प्रत्यंचा की टंकार वज्र की कड़क के समान महान् युद्ध में भयानक घोष के साथ सुनाई देती थी,

श्लोक 22 (4.27.22)

रथघोषश्च बलवान्गन्धर्वाणां तरस्विनाम् । ते मे वाचं विजानन्तु सूतपुत्रा नयन्ति माम् ॥

rathaghoṣaśca balavāngandharvāṇāṃ tarasvinām | te me vācaṃ vijānantu sūtaputrā nayanti mām

और जिन वेगशाली गन्धर्वों के रथों का प्रबल घोष सुनाई देता था, वे मेरी पुकार सुनें! सूतपुत्र मुझे लिये जा रहे हैं।

श्लोक 23 (4.27.23)

येषां वीर्यमतुल्यं तु शक्रस्येव बलं यशः । राजसिंहा इवाग्र्यास्ते मां जानन्तु सुदुःखितां ॥

yeṣāṃ vīryamatulyaṃ tu śakrasyeva balaṃ yaśaḥ | rājasiṃhā ivāgryāste māṃ jānantu suduḥkhitāṃ

जिनका पराक्रम अतुलनीय है, जिनका बल और यश इन्द्र के समान है, जो राजाओं में सिंहों के समान अग्रणी हैं — वे मुझ अत्यन्त दुःखिनी की सुध लें!

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 24 (4.27.24)

इत्यस्याः कृपणा वाचः कृष्णायाः परिदेविताः । श्रुत्वैवाभ्युत्थितो भीमः शयनादविचारयन् ॥

ityasyāḥ kṛpaṇā vācaḥ kṛṣṇāyāḥ paridevitāḥ | śrutvaivābhyutthito bhīmaḥ śayanādavicārayan

कृष्णा के ये करुण विलाप-वचन सुनते ही भीम बिना कुछ सोचे-विचारे अपनी शय्या से उठ खड़े हुए।

भीम उवाच

श्लोक 25 (4.27.25)

अहं सैरन्ध्रि ते वाचः शृणोमि तव भाषिताः । तस्मात्ते सूतपुत्रेभ्यो न भयं जातु विद्यते ॥

ahaṃ sairandhri te vācaḥ śṛṇomi tava bhāṣitāḥ | tasmātte sūtaputrebhyo na bhayaṃ jātu vidyate

सैरन्ध्री! तुमने जो वचन कहे हैं, उन्हें मैं सुन रहा हूँ। इसलिए तुम्हें सूतपुत्रों से कदापि कोई भय नहीं है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (4.27.26)

इत्युक्त्वा स महाबाहुर्विजजृम्भे जिघांसया ॥

ityuktvā sa mahābāhurvijajṛmbhe jighāṃsayā

यह कहकर उन महाबाहु ने उन्हें मार डालने की इच्छा से अँगड़ाई ली।

श्लोक 27 (4.27.27)

ततः स व्यायतं बद्ध्वा वस्त्रं विपरिवेष्ट्य च । अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्य निर्जगाम बहिस्तदा ॥

tataḥ sa vyāyataṃ baddhvā vastraṃ vipariveṣṭya ca | advāreṇābhyavaskandya nirjagāma bahistadā

फिर वस्त्र को कसकर बाँधकर और शरीर पर लपेटकर वे बिना द्वार के ही (दीवार) लाँघकर बाहर निकल गए।

श्लोक 28 (4.27.28)

स लङ्घयित्वा प्राकारमारुह्य तरसा द्रुमम् । श्मशानाभिमुखः प्रायाद्यत्र ते कीचका गताः ॥

sa laṅghayitvā prākāramāruhya tarasā drumam | śmaśānābhimukhaḥ prāyādyatra te kīcakā gatāḥ

परकोटा लाँघकर और वेग से एक वृक्ष पर चढ़कर वे श्मशान की ओर चल पड़े, जहाँ वे कीचक गए थे।

श्लोक 29 (4.27.29)

स लङ्घयित्वा प्राकारं निःसृत्य च पुरोत्तमात् । जवेनोत्पतितो भीमः सूतानामग्रतस्तदा ॥

sa laṅghayitvā prākāraṃ niḥsṛtya ca purottamāt | javenotpatito bhīmaḥ sūtānāmagratastadā

परकोटा लाँघकर और उस श्रेष्ठ नगर से निकलकर भीम वेग से उछलते हुए सूतों के आगे जा पहुँचे।

श्लोक 30 (4.27.30)

चितासमीपं गत्वा स तत्रापश्यन्महाबलः । तालमात्रं महास्कन्धमूर्ध्वशुष्कं वनस्पतिम् ॥

citāsamīpaṃ gatvā sa tatrāpaśyanmahābalaḥ | tālamātraṃ mahāskandhamūrdhvaśuṣkaṃ vanaspatim

चिता के पास जाकर उन महाबली ने वहाँ ताड़ जितना ऊँचा, विशाल शाखाओं वाला और ऊपर से सूखा हुआ एक वृक्ष देखा।

श्लोक 31 (4.27.31)

तं नागवदुपक्रम्य बाहुभ्यां परिरभ्य च । वृक्षमुत्पाटयामास भीमो भीमपराक्रमः ॥

taṃ nāgavadupakramya bāhubhyāṃ parirabhya ca | vṛkṣamutpāṭayāmāsa bhīmo bhīmaparākramaḥ

हाथी की भाँति उस पर झपटकर और दोनों भुजाओं में जकड़कर भयंकर पराक्रमी भीम ने उस वृक्ष को उखाड़ डाला।

श्लोक 32 (4.27.32)

ततो वृक्षं दशव्यामं निष्पत्रमकरोत्तदा ॥

tato vṛkṣaṃ daśavyāmaṃ niṣpatramakarottadā

फिर उन्होंने दस पुरसा लम्बे उस वृक्ष को पत्तों से रहित कर दिया।

श्लोक 33 (4.27.33)

तं महाकायमुद्यम्य भ्रामयित्वा च वेगितः । प्रगृह्याभ्यपतत्सूतान्दण्डपाणिरिवान्तकः ॥

taṃ mahākāyamudyamya bhrāmayitvā ca vegitaḥ | pragṛhyābhyapatatsūtāndaṇḍapāṇirivāntakaḥ

उस विशाल तने को उठाकर और वेग से घुमाकर, उसे थामे हुए वे हाथ में दण्ड लिये यमराज की भाँति सूतों पर टूट पड़े।

श्लोक 34 (4.27.34)

ऊरुवेगेन तस्याथ न्यग्रोधाश्वत्थकिंशुकाः । भूमौ निपतिता वृक्षाः संभग्नास्तत्र शेरते ॥

ūruvegena tasyātha nyagrodhāśvatthakiṃśukāḥ | bhūmau nipatitā vṛkṣāḥ saṃbhagnāstatra śerate

उनकी जाँघों के वेग से बरगद, पीपल और ढाक के वृक्ष टूटकर भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 35 (4.27.35)

तं सिंहमिव संक्रुद्धं दृष्ट्वा गन्धर्वमागतम् । वित्रेसुश्च तदा सूता विषादभयपीडिताः ॥

taṃ siṃhamiva saṃkruddhaṃ dṛṣṭvā gandharvamāgatam | vitresuśca tadā sūtā viṣādabhayapīḍitāḥ

क्रुद्ध सिंह के समान उस गन्धर्व को आया देखकर सूत विषाद और भय से पीड़ित होकर काँप उठे।

श्लोक 36 (4.27.36)

तमन्तकमिव क्रुद्धं गन्धर्वभयशङ्किताः । दिधक्षन्तस्तथा ज्येष्ठं भ्रातरं चोपकीचकाः । परस्परमथोचुस्ते विषादभयमोहिताः ॥

tamantakamiva kruddhaṃ gandharvabhayaśaṅkitāḥ | didhakṣantastathā jyeṣṭhaṃ bhrātaraṃ copakīcakāḥ | parasparamathocuste viṣādabhayamohitāḥ

यमराज के समान क्रुद्ध उस गन्धर्व से भयभीत होकर, बड़े भाई के साथ (उसे) जलाने को उद्यत उपकीचक विषाद और भय से मोहित हो आपस में कहने लगे —

उपकीचका ऊचुः

श्लोक 37 (4.27.37)

गन्धर्वो बलवानेति क्रुद्ध उद्यम्य पादपम् । प्रबुद्धाः सुमहाभागा गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः । सैरन्ध्री मुच्यतां शीघ्रं भयं नो महदागतम् ॥

gandharvo balavāneti kruddha udyamya pādapam | prabuddhāḥ sumahābhāgā gandharvāḥ sūryavarcasaḥ | sairandhrī mucyatāṃ śīghraṃ bhayaṃ no mahadāgatam

बलवान् गन्धर्व क्रोध में वृक्ष उठाए आ रहा है! सूर्य के समान तेजस्वी, महाभाग गन्धर्व जाग उठे हैं। सैरन्ध्री को शीघ्र छोड़ दो; हम पर महान् भय आ पड़ा है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 38 (4.27.38)

ते दृष्ट्वाऽथ समाविद्धं भीमसेनेन पादपम् । विमुच्य द्रौपदीं त्रस्ताः प्राद्रवन्नगरं प्रति ॥

te dṛṣṭvā'tha samāviddhaṃ bhīmasenena pādapam | vimucya draupadīṃ trastāḥ prādravannagaraṃ prati

भीमसेन द्वारा घुमाए जाते उस वृक्ष को देखकर वे डरकर द्रौपदी को छोड़ नगर की ओर भागे।

श्लोक 39 (4.27.39)

द्रवतस्तांश्च संप्रेक्ष्य स वज्री दानवानिव । अथ भीमः समुत्पत्य द्रवतां पुरतोऽभवत् ॥

dravatastāṃśca saṃprekṣya sa vajrī dānavāniva | atha bhīmaḥ samutpatya dravatāṃ purato'bhavat

उन्हें भागते देखकर, जैसे वज्रधारी इन्द्र दानवों पर झपटते हैं, वैसे ही भीम उछलकर भागते हुए उन लोगों के आगे जा खड़े हुए।

श्लोक 40 (4.27.40)

ते तं दृष्ट्वा भयोद्विग्ना निश्चेष्टाः समवस्थिताः ॥

te taṃ dṛṣṭvā bhayodvignā niśceṣṭāḥ samavasthitāḥ

उन्हें देखकर वे भय से व्याकुल हो निश्चेष्ट खड़े रह गए।

श्लोक 41 (4.27.41)

दृष्ट्वा ताञ्शतसङ्ख्यकान्स वज्री दानवानिव । एकेनैव प्रहारेण दश सप्त च विंशतिम् । अष्टादश च पञ्चाशञ्जघान स वृकोदरः ॥

dṛṣṭvā tāñśatasaṅkhyakānsa vajrī dānavāniva | ekenaiva prahāreṇa daśa sapta ca viṃśatim | aṣṭādaśa ca pañcāśañjaghāna sa vṛkodaraḥ

उन सौ की संख्या वाले सूतों को देखकर, दानवों के बीच वज्रधारी इन्द्र की भाँति वृकोदर ने एक-एक प्रहार में ही दस, सात, बीस, अठारह और पचास को मार गिराया।

श्लोक 42 (4.27.42)

शतं पञ्चाधिकं भीमः प्राहिणोद्यमसादनम् । वृक्षेणैकेन राजेन्द्र प्रभञ्जनसुतो बली । वायुवेगसमः श्रीमान्सर्वान्सूतानशेषतः ॥

śataṃ pañcādhikaṃ bhīmaḥ prāhiṇodyamasādanam | vṛkṣeṇaikena rājendra prabhañjanasuto balī | vāyuvegasamaḥ śrīmānsarvānsūtānaśeṣataḥ

हे राजेन्द्र! वायु के समान वेगशाली, श्रीमान् और बलवान् पवनपुत्र भीम ने एक ही वृक्ष से एक सौ पाँच सूतों को — सबको, बिना किसी को छोड़े — यमलोक भेज दिया।

श्लोक 43 (4.27.43)

तान्निहत्य महाबाहुर्भीमसेनो महाबलः । आश्वासयत्तदा कृष्णां प्रतिमुच्य च बन्धनात् ॥

tānnihatya mahābāhurbhīmaseno mahābalaḥ | āśvāsayattadā kṛṣṇāṃ pratimucya ca bandhanāt

उन्हें मारकर महाबली महाबाहु भीमसेन ने कृष्णा को बन्धन से मुक्त किया और उसे सान्त्वना दी।

श्लोक 44 (4.27.44)

उवाच श्लक्ष्णया वाचा पाञ्चालीं भरतर्षभः । अश्रुपूर्णमुखीं भीतामुद्धरन्स वृकोदरः ॥

uvāca ślakṣṇayā vācā pāñcālīṃ bharatarṣabhaḥ | aśrupūrṇamukhīṃ bhītāmuddharansa vṛkodaraḥ

आँसुओं से भीगे मुख वाली, डरी हुई पाञ्चाली को उठाते हुए भरतश्रेष्ठ वृकोदर ने कोमल वाणी में उससे कहा —

भीम उवाच

श्लोक 45 (4.27.45)

मा खिदस्त्वं याज्ञसेनि पातिव्रत्यव्रते स्थिता । पातिव्रत्ये स्थिता नारी व्रतं रक्षेत्सदाऽत्मनः ॥

mā khidastvaṃ yājñaseni pātivratyavrate sthitā | pātivratye sthitā nārī vrataṃ rakṣetsadā'tmanaḥ

याज्ञसेनी! तुम पातिव्रत्य के व्रत में स्थित हो, दुःखी मत होओ। पातिव्रत्य में स्थित नारी को सदा अपने व्रत की रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 46 (4.27.46)

पुरा स्त्री देवरातस्य पतिप्रीता शिरोमणिः । कदाचिद्भर्तृरूपेण रक्षसाऽपहृता सती ॥

purā strī devarātasya patiprītā śiromaṇiḥ | kadācidbhartṛrūpeṇa rakṣasā'pahṛtā satī

प्राचीन काल में देवरात की पत्नी, जो पतिव्रताओं में शिरोमणि थी, एक बार एक राक्षस द्वारा हर ली गई, जिसने उसके पति का रूप धारण कर लिया था।

श्लोक 47 (4.27.47)

कस्यचित्सरसस्तीरे तां निवेश्य स राक्षसः । तद्भर्तृरूपं संत्यज्य रक्षो भूत्वा सुदारुणम् ॥

kasyacitsarasastīre tāṃ niveśya sa rākṣasaḥ | tadbhartṛrūpaṃ saṃtyajya rakṣo bhūtvā sudāruṇam

किसी सरोवर के तट पर उसे बिठाकर उस राक्षस ने उसके पति का रूप त्याग दिया और अत्यन्त भयंकर राक्षस बन गया।

श्लोक 48 (4.27.48)

साम्ना दानेन भेदेन सा यदा नान्वमन्यत । तदा तां पातयित्वा स मैथुनायोपचक्रमे ॥

sāmnā dānena bhedena sā yadā nānvamanyata | tadā tāṃ pātayitvā sa maithunāyopacakrame

जब वह साम, दान और भेद से भी नहीं मानी, तब उसने उसे भूमि पर गिरा दिया और उसका शील भंग करने को उद्यत हुआ।

श्लोक 49 (4.27.49)

ततः सा धैर्यमास्थाय विवरं न ददौ तदा । ततः स खड्गमुत्कृष्य भीषयामास तां सतीम् ॥

tataḥ sā dhairyamāsthāya vivaraṃ na dadau tadā | tataḥ sa khaḍgamutkṛṣya bhīṣayāmāsa tāṃ satīm

पर उसने धैर्य धारण करके उसे कोई अवसर नहीं दिया। तब उसने तलवार खींचकर उस सती को डराना चाहा।

श्लोक 50 (4.27.50)

साऽपि त्यक्तभया साध्वी प्राणत्यागे सुनिश्चिता । प्रतिज्ञामकरोत्कृष्णे पातिव्रत्यपरायणा ॥

sā'pi tyaktabhayā sādhvī prāṇatyāge suniścitā | pratijñāmakarotkṛṣṇe pātivratyaparāyaṇā

कृष्णे! पर उस साध्वी ने भय त्यागकर, प्राण देने का दृढ़ निश्चय करके, पातिव्रत्य में तत्पर रहते हुए यह प्रतिज्ञा की —

श्लोक 51 (4.27.51)

आराधितो यदि मया भर्ता मे दैवतं महत् । कर्मणा मनसा वाचा गुरवस्तोषिता मया । तेन सत्येन योनिर्मे भवत्वद्य शिला दृढा ॥

ārādhito yadi mayā bhartā me daivataṃ mahat | karmaṇā manasā vācā guravastoṣitā mayā | tena satyena yonirme bhavatvadya śilā dṛḍhā

"यदि मैंने अपने पति को महान् देवता मानकर उसकी आराधना की है, और कर्म, मन तथा वाणी से गुरुजनों को सन्तुष्ट किया है, तो उस सत्य के प्रभाव से आज मेरी योनि कठोर शिला बन जाए।"

श्लोक 52 (4.27.52)

एवं तया प्रतिज्ञाते तद्योनिः सा शिलाऽभवत् । अन्तरा नाभिजान्वोर्यत्तत्सर्वं च शिलाऽभवत् ॥

evaṃ tayā pratijñāte tadyoniḥ sā śilā'bhavat | antarā nābhijānvoryattatsarvaṃ ca śilā'bhavat

उसके ऐसी प्रतिज्ञा करते ही उसकी योनि शिला बन गई; नाभि और घुटनों के बीच का सारा भाग पत्थर हो गया।

श्लोक 53 (4.27.53)

ततः स खड्गमुद्धृत्य वेगेनास्याः शिरोऽहरत् ॥

tataḥ sa khaḍgamuddhṛtya vegenāsyāḥ śiro'harat

तब उसने तलवार उठाकर वेग से उसका सिर काट डाला।

श्लोक 54 (4.27.54)

जया नाम सखी साऽभूत्पार्वत्या नखमांसवत् । तस्मात्पतिव्रतायाश्च दुःखमल्पं सुखं बहु ॥

jayā nāma sakhī sā'bhūtpārvatyā nakhamāṃsavat | tasmātpativratāyāśca duḥkhamalpaṃ sukhaṃ bahu

वह पार्वती की जया नाम की सखी बनी, जो नख और मांस की भाँति उनसे अभिन्न है। इसलिए पतिव्रता के लिए दुःख थोड़ा और सुख बहुत होता है।

श्लोक 55 (4.27.55)

एवं ते भीरु वध्यन्ते ये त्वां हिंसन्ति मानवाः । गच्छ त्वं नगरं कृष्णे न भयं विद्यते तव ॥

evaṃ te bhīru vadhyante ye tvāṃ hiṃsanti mānavāḥ | gaccha tvaṃ nagaraṃ kṛṣṇe na bhayaṃ vidyate tava

भीरु! जो लोग तुम्हें सताते हैं, वे इसी प्रकार मारे जाते हैं। कृष्णे! तुम नगर को जाओ; अब तुम्हें कोई भय नहीं है।

श्लोक 56 (4.27.56)

अन्येन त्वं पथा शीघ्रं सुदेष्णाया निवेशनम् । अन्येनाहं गमिष्यामि विराटस्य महानसम् । यथा नौ नावबुध्येरन्रात्रावेवं व्यवस्थितौ ॥

anyena tvaṃ pathā śīghraṃ sudeṣṇāyā niveśanam | anyenāhaṃ gamiṣyāmi virāṭasya mahānasam | yathā nau nāvabudhyeranrātrāvevaṃ vyavasthitau

तुम शीघ्र किसी दूसरे मार्ग से सुदेष्णा के भवन को जाओ; मैं दूसरे मार्ग से विराट की पाकशाला को जाऊँगा। आज रात हम दोनों ऐसा प्रबन्ध करें कि लोग हमें पहचान न पाएँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 57 (4.27.57)

साऽगच्छन्नगरं कृष्णा भीमेनाश्वासिता सती ॥

sā'gacchannagaraṃ kṛṣṇā bhīmenāśvāsitā satī

भीम से सान्त्वना पाकर वह सती कृष्णा नगर को चली गई।

श्लोक 58 (4.27.58)

कृतकृत्या सुदेष्णाया भवनं शुभलक्षणा । शचीव नहुषे शप्ते प्रविवेश त्रिविष्टपम् ॥

kṛtakṛtyā sudeṣṇāyā bhavanaṃ śubhalakṣaṇā | śacīva nahuṣe śapte praviveśa triviṣṭapam

कृतार्थ होकर वह शुभ लक्षणों वाली सुदेष्णा के भवन में वैसे ही प्रविष्ट हुई, जैसे नहुष के शापग्रस्त होने पर शची स्वर्ग में प्रविष्ट हुई थीं।

श्लोक 59 (4.27.59)

भीमोऽप्यमितवीर्यस्तु बलवानरिमर्दनः । सर्वांस्तान्कीचकांस्तत्र हत्वा धर्मात्मजानुजः ॥

bhīmo'pyamitavīryastu balavānarimardanaḥ | sarvāṃstānkīcakāṃstatra hatvā dharmātmajānujaḥ

अमित पराक्रमी, बलवान्, शत्रुमर्दन, धर्मपुत्र के अनुज भीम भी वहाँ उन सब कीचकों को मारकर —

श्लोक 60 (4.27.60)

निःशेषं कीचकान्हत्वा रामो रात्रिचरानिव । जितशत्रुरदीनात्मा प्रविवेश पुरं ततः ॥

niḥśeṣaṃ kīcakānhatvā rāmo rātricarāniva | jitaśatruradīnātmā praviveśa puraṃ tataḥ

जैसे राम ने निशाचरों का संहार किया था, वैसे ही कीचकों का निःशेष संहार करके, शत्रुओं को जीतकर, अदीन मन से नगर में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 61 (4.27.61)

पञ्चाधिकं शतं तत्र निहतं तेन भारत । महावनमिव छिन्नं शिश्ये विगलितद्रुमम् ॥

pañcādhikaṃ śataṃ tatra nihataṃ tena bhārata | mahāvanamiva chinnaṃ śiśye vigalitadrumam

हे भारत! वहाँ उनके द्वारा मारे गए एक सौ पाँच (सूत) ऐसे पड़े थे, मानो कोई महावन काट डाला गया हो और उसके वृक्ष बिखरे पड़े हों।

श्लोक 62 (4.27.62)

एवं ते निहता राजञ्शतं पञ्चोपकीचकाः । स च सेनापतिः सूत इत्येतत्सूतषट्शतम् ॥

evaṃ te nihatā rājañśataṃ pañcopakīcakāḥ | sa ca senāpatiḥ sūta ityetatsūtaṣaṭśatam

हे राजन्! इस प्रकार एक सौ पाँच उपकीचक मारे गए; और वह सूत सेनापति (कीचक) भी — इस तरह कुल एक सौ छह सूत मारे गए।

श्लोक 63 (4.27.63)

न गन्धर्वभयात्किंचिद्वक्तुं कीचकबान्धवाः । अशक्नुवन्तस्तां तत्र भयादप्यभिवीक्षितुम् ॥

na gandharvabhayātkiṃcidvaktuṃ kīcakabāndhavāḥ | aśaknuvantastāṃ tatra bhayādapyabhivīkṣitum

गन्धर्व के भय से कीचक के बन्धु-बान्धव वहाँ उससे कुछ भी न कह सके; डर के मारे वे उसकी ओर देख भी न सके।

श्लोक 64 (4.27.64)

विराटनगरे चापि सर्वे मात्स्याः समागताः । काल्यं पञ्चशतं चैतानपश्यन्सारथीन्हतान् ॥

virāṭanagare cāpi sarve mātsyāḥ samāgatāḥ | kālyaṃ pañcaśataṃ caitānapaśyansārathīnhatān

विराट नगर में एकत्र हुए सभी मत्स्यवासियों ने प्रातःकाल उन एक सौ पाँच सूतों को मरा पड़ा देखा।

श्लोक 65 (4.27.65)

तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं नरा नार्यश्च नागराः । विस्मयं परमं गत्वा नोचुः किंचन भारत ॥

taddṛṣṭvā mahadāścaryaṃ narā nāryaśca nāgarāḥ | vismayaṃ paramaṃ gatvā nocuḥ kiṃcana bhārata

हे भारत! वह महान् आश्चर्य देखकर नगर के स्त्री-पुरुष अत्यन्त विस्मित हो गए और कुछ भी न बोल सके।

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