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विराट पर्व · अध्याय 28

सुदेष्णा का सैरन्ध्री से नगर छोड़ने का अनुरोध

पुरवासी विराट को सूतों के संहार की सूचना देते हैं और सैरन्ध्री को नगर से निकालने का आग्रह करते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि उसका रूप नगर का नाश कर देगा; राजा कीचकों के दाह का आदेश देते हैं और स्वयं उससे कहने का साहस न होने से सुदेष्णा से उसे विदा करने को कहते हैं। द्रौपदी उन गलियों से लौटती है जहाँ लोग उसे देखने के बजाय आँखें मूँद लेते हैं, पाकशाला के द्वार पर भीम से और नृत्यशाला में बृहन्नला बने अर्जुन से सांकेतिक बातें करती है। सुदेष्णा के जाने को कहने पर वह केवल तेरह दिन और माँगती है, जिसके बाद गन्धर्व अपना कार्य पूरा कर लेंगे; भयभीत रानी मान जाती है और उससे रक्षा की याचना करती है।

अध्याय 27अध्याय-सूचीअध्याय 29

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.28.1)

ते दृष्ट्वा निहतान्सूतान्भीमसेनेन भारत । पौराश्च सहिताः सर्वे राज्ञे गत्वा न्यवेदयन् । गन्धर्वेण हता राजन्सूतपुत्राः परश्शतम् ॥

te dṛṣṭvā nihatānsūtānbhīmasenena bhārata | paurāśca sahitāḥ sarve rājñe gatvā nyavedayan | gandharveṇa hatā rājansūtaputrāḥ paraśśatam

हे भारत! भीमसेन द्वारा मारे गए सूतों को देखकर सब पुरवासी मिलकर राजा के पास गए और निवेदन किया — "राजन्! एक गन्धर्व ने सौ से भी अधिक सूतपुत्रों को मार डाला है।

पौरा ऊचुः

श्लोक 2 (4.28.2)

यथा वज्रेण दीर्णं वै पर्वतस्य महच्छिरः । विनिकीर्णाः प्रदृश्यन्ते तथा सूता महीतले ॥

yathā vajreṇa dīrṇaṃ vai parvatasya mahacchiraḥ | vinikīrṇāḥ pradṛśyante tathā sūtā mahītale

जैसे वज्र से फटा हुआ पर्वत का विशाल शिखर बिखरा पड़ा दिखाई देता है, वैसे ही सूत धरती पर बिखरे पड़े हैं।

श्लोक 3 (4.28.3)

सैरन्ध्री चापि मुक्ता सा पुनरायाति ते गृहम् । सर्वं संशयितं राजन्नगरं ते भविष्यति ॥

sairandhrī cāpi muktā sā punarāyāti te gṛham | sarvaṃ saṃśayitaṃ rājannagaraṃ te bhaviṣyati

और वह सैरन्ध्री भी छूटकर फिर आपके महल में आ रही है। राजन्! आपका सारा नगर संकट में पड़ जाएगा।

श्लोक 4 (4.28.4)

तथारूपा हि सैरन्ध्री गन्धर्वाश्च महाबलाः । पुंसामिष्टश्च विषयो मैथुनाय न संशयः ॥

tathārūpā hi sairandhrī gandharvāśca mahābalāḥ | puṃsāmiṣṭaśca viṣayo maithunāya na saṃśayaḥ

क्योंकि सैरन्ध्री ऐसी रूपवती है और गन्धर्व ऐसे महाबली हैं; और इसमें सन्देह नहीं कि पुरुषों को काम-सुख प्रिय होता है।

श्लोक 5 (4.28.5)

यथा सैरन्ध्रिदोषेण नेदं राजन्पुरं तव । विनाशमेति वै क्षिप्रं तथा साधु विधीयताम् ॥

yathā sairandhridoṣeṇa nedaṃ rājanpuraṃ tava | vināśameti vai kṣipraṃ tathā sādhu vidhīyatām

राजन्! ऐसा उचित उपाय कीजिए जिससे सैरन्ध्री के दोष से आपका यह नगर शीघ्र नष्ट न हो जाए।

श्लोक 6 (4.28.6)

सर्वाङ्गसौष्ठवयुतां रूपलावण्यशालिनीम् । पश्यतामनिमेषेण चक्षुषा वनितां शुभाम् । मनसश्चक्षुषश्चैव प्रतिबन्धो न विद्यते ॥

sarvāṅgasauṣṭhavayutāṃ rūpalāvaṇyaśālinīm | paśyatāmanimeṣeṇa cakṣuṣā vanitāṃ śubhām | manasaścakṣuṣaścaiva pratibandho na vidyate

सर्वांगसुन्दरी, रूप और लावण्य से भरी उस शुभ स्त्री को जो अपलक नेत्रों से देखते हैं, उनके मन और नेत्रों पर कोई अंकुश नहीं रहता।

श्लोक 7 (4.28.7)

तस्मात्तां यः पुमान्दृष्ट्वा रूपेणाप्रतिमां भुवि । गच्छेत्कामवशं मूढो गन्धर्वैः स निहन्यते ॥

tasmāttāṃ yaḥ pumāndṛṣṭvā rūpeṇāpratimāṃ bhuvi | gacchetkāmavaśaṃ mūḍho gandharvaiḥ sa nihanyate

इसलिए पृथ्वी पर अनुपम रूपवती उस स्त्री को देखकर जो मूढ़ पुरुष काम के वश में हो जाता है, वह गन्धर्वों द्वारा मारा जाता है।

श्लोक 8 (4.28.8)

निष्कासयैनां भवनात्पुराच्चैव विशेषतः । कालः प्रविश्य सैरन्ध्रीं पुरं नाशयते ध्रुवम् ॥

niṣkāsayaināṃ bhavanātpurāccaiva viśeṣataḥ | kālaḥ praviśya sairandhrīṃ puraṃ nāśayate dhruvam

इसे अपने भवन से, और विशेषकर नगर से, निकाल दीजिए। काल ही सैरन्ध्री में प्रवेश कर गया है; वह निश्चय ही नगर का नाश कर देगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (4.28.9)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा विराटो वाहिनीपतिः । अब्रवीत्क्रियतामेषां सूतानामपरक्रिया ॥

teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā virāṭo vāhinīpatiḥ | abravītkriyatāmeṣāṃ sūtānāmaparakriyā

उनकी बात सुनकर सेनापति विराट ने कहा — "इन सूतों की अन्त्येष्टि-क्रिया की जाए।

विराट उवाच

श्लोक 10 (4.28.10)

एकस्मिन्नेव ते सर्वे सुसमिद्धे हुताशने । दह्यन्तां कीचकाः सर्वे सर्वगन्धैश्च सर्वशः ॥

ekasminneva te sarve susamiddhe hutāśane | dahyantāṃ kīcakāḥ sarve sarvagandhaiśca sarvaśaḥ

सभी कीचकों को एक ही प्रज्वलित अग्नि में सब प्रकार के सुगन्धित द्रव्यों के साथ विधिपूर्वक जलाया जाए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (4.28.11)

इत्युक्त्वा परमोद्विग्नः प्रविश्यान्तःपुरं शुभम् । सुदेष्णां चाब्रवीद्राजा महिषीं जातसाध्वसः ॥

ityuktvā paramodvignaḥ praviśyāntaḥpuraṃ śubham | sudeṣṇāṃ cābravīdrājā mahiṣīṃ jātasādhvasaḥ

यह कहकर अत्यन्त उद्विग्न और भयभीत राजा सुन्दर अन्तःपुर में गए और अपनी पटरानी सुदेष्णा से बोले —

विराट उवाच

श्लोक 12 (4.28.12)

सैरन्ध्रीमागतां ब्रूया ममैव वचनादिह । गच्छ सैरन्ध्रि भद्रं ते यथाकामं चराधुना । बिभेति राजा सैरन्ध्रि गन्धर्वेभ्यः पराभवात् ॥

sairandhrīmāgatāṃ brūyā mamaiva vacanādiha | gaccha sairandhri bhadraṃ te yathākāmaṃ carādhunā | bibheti rājā sairandhri gandharvebhyaḥ parābhavāt

सैरन्ध्री के लौटने पर मेरी ओर से उससे यह कहना — "सैरन्ध्री! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम जहाँ चाहो वहाँ जाओ। सैरन्ध्री! राजा गन्धर्वों से पराजित होने के भय से डरते हैं।"

श्लोक 13 (4.28.13)

न हि तामुत्सहे वक्तुं स्वयं गन्धर्वरक्षिताम् । स्त्रियास्त्वदोषस्तां वक्तुमतस्त्वां प्रब्रवीम्यहम् ॥

na hi tāmutsahe vaktuṃ svayaṃ gandharvarakṣitām | striyāstvadoṣastāṃ vaktumatastvāṃ prabravīmyaham

गन्धर्वों से रक्षित उस स्त्री से मैं स्वयं यह कहने का साहस नहीं कर सकता। किसी स्त्री के उससे यह कहने में कोई दोष नहीं है, इसलिए मैं तुमसे कह रहा हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (4.28.14)

एकस्मिन्नेव ते सर्वे सुसमिद्धे हुताशने । अदहन्कीचकान्सर्वान्संस्कारैश्चैव सर्वशः ॥

ekasminneva te sarve susamiddhe hutāśane | adahankīcakānsarvānsaṃskāraiścaiva sarvaśaḥ

उन्होंने एक ही प्रज्वलित अग्नि में सभी कीचकों का समस्त संस्कारों के साथ दाह कर दिया।

श्लोक 15 (4.28.15)

अथ मुक्ता भयात्कृष्णा सूतपुत्रान्निरस्य च । मोक्षिता भीमसेनेन जगाम नगरं प्रति ॥

atha muktā bhayātkṛṣṇā sūtaputrānnirasya ca | mokṣitā bhīmasenena jagāma nagaraṃ prati

तब भय से मुक्त, सूतपुत्रों से छुटकारा पाई हुई और भीमसेन द्वारा छुड़ाई गई कृष्णा नगर की ओर चली,

श्लोक 16 (4.28.16)

त्रासितेव मृगी बाला शार्दूलेन मनस्विनी । सा तु गात्राणि वासश्च प्रक्षाल्य प्रविवेश ह ॥

trāsiteva mṛgī bālā śārdūlena manasvinī | sā tu gātrāṇi vāsaśca prakṣālya praviveśa ha

मनस्विनी होते हुए भी बाघ से डरी हुई हिरनी के बच्चे जैसी। अपने अंगों और वस्त्रों को धोकर उसने नगर में प्रवेश किया।

श्लोक 17 (4.28.17)

तां दृष्ट्वा पुरुषा राजन्प्राद्रवन्त दिशो दश । गन्धर्वाणां भयत्रस्ताः केचिद्दृष्टिं न्यमीलयन् ॥

tāṃ dṛṣṭvā puruṣā rājanprādravanta diśo daśa | gandharvāṇāṃ bhayatrastāḥ keciddṛṣṭiṃ nyamīlayan

राजन्! उसे देखकर पुरुष गन्धर्वों के भय से त्रस्त होकर दसों दिशाओं में भाग खड़े हुए; कुछ ने तो अपनी आँखें ही मूँद लीं।

श्लोक 18 (4.28.18)

प्रदुद्रुवुश्चाप्यपरे तथा जना हस्तैश्च चक्षूंषि पिधाय मोहिताः । मा पश्यत स्मेति च तां ब्रुवन्तस्तथा जनाश्चुक्रुशुरार्तरूपाः ॥

pradudruvuścāpyapare tathā janā hastaiśca cakṣūṃṣi pidhāya mohitāḥ | mā paśyata smeti ca tāṃ bruvantastathā janāścukruśurārtarūpāḥ

दूसरे लोग घबराकर हाथों से आँखें ढके भाग गए; और लोग व्याकुल होकर एक-दूसरे से "उसे मत देखो!" कहते हुए चिल्लाने लगे।

श्लोक 19 (4.28.19)

तामद्य यः पश्यति रूपशालिनीं शयीत भग्नोऽत्र यथैव कीचकाः । इति ब्रुवन्तो भयविग्नचेतसो भयेन गन्धर्वगतेन मोहिताः ॥

tāmadya yaḥ paśyati rūpaśālinīṃ śayīta bhagno'tra yathaiva kīcakāḥ | iti bruvanto bhayavignacetaso bhayena gandharvagatena mohitāḥ

"आज जो कोई उस रूपवती को देखेगा, वह कीचकों की ही भाँति यहाँ टूटा पड़ा रहेगा" — ऐसा कहते हुए वे लोग भय से काँपते मन वाले और गन्धर्वों के भय से मोहित हो रहे थे।

श्लोक 20 (4.28.20)

ततो महानसद्वारे भीमसेनमवस्थितम् । ददर्श राजन्पाञ्चाली यथा मत्तं महाद्विपम् ॥

tato mahānasadvāre bhīmasenamavasthitam | dadarśa rājanpāñcālī yathā mattaṃ mahādvipam

राजन्! तब पाञ्चाली ने पाकशाला के द्वार पर मतवाले महागज के समान खड़े भीमसेन को देखा।

श्लोक 21 (4.28.21)

सोपहासं तु शनकैः संज्ञाभिरिदमब्रवीत् । नमो गन्धर्वराजाय येनास्मि परिमोक्षिता ॥

sopahāsaṃ tu śanakaiḥ saṃjñābhiridamabravīt | namo gandharvarājāya yenāsmi parimokṣitā

उसने उपहासपूर्वक धीरे से संकेतों में यह कहा — "उन गन्धर्वराज को नमस्कार है, जिन्होंने मुझे छुड़ाया है!

द्रौपद्युवाच

श्लोक 22 (4.28.22)

कीचकेभ्यो विनिर्दोषामनाथां वसतीं गृहे । यो मां रक्षति सन्त्रस्तां गन्धर्वाय नमोस्तु ते ॥

kīcakebhyo vinirdoṣāmanāthāṃ vasatīṃ gṛhe | yo māṃ rakṣati santrastāṃ gandharvāya namostu te

हे गन्धर्व! कीचकों से भयभीत, निर्दोष और अनाथ होकर इस घर में रहने वाली मेरी जो रक्षा करते हैं, उन आपको नमस्कार है!"

भीम उवाच

श्लोक 23 (4.28.23)

ये यस्या विचरन्तीह पुरुषा वशवर्तिनः । तेषां च वशगा नित्यं विचर त्वं यथेष्टतः ॥

ye yasyā vicarantīha puruṣā vaśavartinaḥ | teṣāṃ ca vaśagā nityaṃ vicara tvaṃ yatheṣṭataḥ

जो पुरुष यहाँ जिस स्त्री के वश में रहकर विचरते हैं, उन्हीं के वश में रहती हुई तुम सदा अपनी इच्छा से विचरो।

श्लोक 24 (4.28.24)

ये पुरा विचरन्तीह पुरुषा वशवर्तिनः । तस्यास्ते वचनं श्रुत्वा ह्यनृणा विहरन्त्वितः ॥

ye purā vicarantīha puruṣā vaśavartinaḥ | tasyāste vacanaṃ śrutvā hyanṛṇā viharantvitaḥ

जो पुरुष पहले यहाँ उसके वश में रहकर विचरते थे, वे उसकी बात सुनकर अब ऋणमुक्त होकर यहाँ से विचरें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (4.28.25)

तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा जज्ञिरे नेतरे जनाः । ततः पाञ्चालराजस्य सुता चापि जगाम ह ॥

tayostadvacanaṃ śrutvā jajñire netare janāḥ | tataḥ pāñcālarājasya sutā cāpi jagāma ha

उन दोनों की बात सुनकर भी दूसरे लोग उसका आशय न समझ सके। फिर पाञ्चालराज की पुत्री आगे चली गई।

श्लोक 26 (4.28.26)

ततः सा नर्तनागारे धनंजयमपश्यत । राज्ञः कन्या विराटस्य नर्तयन्तं महाभुजम् ॥

tataḥ sā nartanāgāre dhanaṃjayamapaśyata | rājñaḥ kanyā virāṭasya nartayantaṃ mahābhujam

तब उसने नृत्यशाला में महाबाहु धनंजय को राजा विराट की कन्याओं को नृत्य सिखाते हुए देखा।

श्लोक 27 (4.28.27)

ततस्ता नर्तनागाराद्विनिष्क्रम्य सहार्जुनाः । कन्या ददृशुरायान्तीं कृष्णां क्लिष्टामनागसम् ॥

tatastā nartanāgārādviniṣkramya sahārjunāḥ | kanyā dadṛśurāyāntīṃ kṛṣṇāṃ kliṣṭāmanāgasam

तब वे कन्याएँ अर्जुन के साथ नृत्यशाला से बाहर निकलीं और उन्होंने निरपराध होकर भी क्लेश पाई कृष्णा को आते देखा।

कन्या ऊचुः

श्लोक 28 (4.28.28)

दिष्ट्या सैरन्ध्रि मुक्ताऽसि दिष्ट्याऽसि पुनरागता । दिष्ट्या च निहताः सूता ये त्वां क्लिश्यन्त्यनागसम् ॥

diṣṭyā sairandhri muktā'si diṣṭyā'si punarāgatā | diṣṭyā ca nihatāḥ sūtā ye tvāṃ kliśyantyanāgasam

सैरन्ध्री! सौभाग्य से तुम छूट गईं, सौभाग्य से तुम लौट आईं, और सौभाग्य से वे सूत मारे गए जो तुम निरपराध को सताते थे।

बृहन्नलोवाच

श्लोक 29 (4.28.29)

कथं सैरन्ध्रि मुक्ताऽसि कथं पापाश्च ते हताः । इच्छामि ते कथां श्रोतुं कथयस्व यथातथम् ॥

kathaṃ sairandhri muktā'si kathaṃ pāpāśca te hatāḥ | icchāmi te kathāṃ śrotuṃ kathayasva yathātatham

सैरन्ध्री! तुम कैसे छूटीं? और वे पापी कैसे मारे गए? मैं तुम्हारी कथा सुनना चाहती हूँ; जैसा हुआ वैसा ही बताओ।

सैरन्ध्र्युवाच

श्लोक 30 (4.28.30)

बृहन्नले किंनु तव सैरन्ध्र्या कार्यमद्य वै । या त्वं रंस्यसि कल्याणि सदा कन्यापुरे सुखं ॥

bṛhannale kiṃnu tava sairandhryā kāryamadya vai | yā tvaṃ raṃsyasi kalyāṇi sadā kanyāpure sukhaṃ

बृहन्नले! अब तुम्हें सैरन्ध्री से क्या काम, कल्याणी? तुम तो सदा कन्याओं के अन्तःपुर में सुख से रमती हो।

श्लोक 31 (4.28.31)

न हि दुःखं समाप्नोषि सैरन्ध्री यदुपाश्नुते । सुखेन वर्तसे येह न तद्दुःखमवाप्यते । तेन मां दुःखितामेवं पृच्छसि प्रहसन्त्यपि ॥

na hi duḥkhaṃ samāpnoṣi sairandhrī yadupāśnute | sukhena vartase yeha na tadduḥkhamavāpyate | tena māṃ duḥkhitāmevaṃ pṛcchasi prahasantyapi

सैरन्ध्री जो दुःख भोगती है, वह तुम्हें नहीं मिलता; तुम यहाँ सुख से रहती हो, जहाँ वह दुःख नहीं पहुँचता। इसीलिए तुम मुझ दुःखिनी से हँसती हुई ऐसे पूछ रही हो।

बृहन्नलोवाच

श्लोक 32 (4.28.32)

बृहन्नलाऽपि कल्याणि दुःखमाप्नोत्यनन्तकम् । तिर्यग्योनिगतेवेयं न चैनामवबुध्यसे ॥

bṛhannalā'pi kalyāṇi duḥkhamāpnotyanantakam | tiryagyonigateveyaṃ na caināmavabudhyase

कल्याणी! बृहन्नला भी अनन्त दुःख पाती है। यह मानो पशु-योनि में पड़ी हुई है, और तुम इसे समझ नहीं पातीं।

श्लोक 33 (4.28.33)

त्वया सहोषिता चास्मि त्वं च सर्वैः सहोषिता । त्वत्तः कृच्छ्रतरं वासं वसेयमहमङ्गने । क्लिश्यन्त्यां त्वयि सुश्रोणि कोनु दुःखं न चिन्तयेत् ॥

tvayā sahoṣitā cāsmi tvaṃ ca sarvaiḥ sahoṣitā | tvattaḥ kṛcchrataraṃ vāsaṃ vaseyamahamaṅgane | kliśyantyāṃ tvayi suśroṇi konu duḥkhaṃ na cintayet

मैं तुम्हारे साथ रही हूँ और तुम हम सबके साथ रही हो। अंगने! हो सकता है मैं तुमसे भी अधिक कष्ट में रह रही होऊँ। सुश्रोणि! तुम्हारे क्लेश पाने पर कौन दुःखी न होगा?

श्लोक 34 (4.28.34)

न तु केनचिदत्यन्तं कस्यचिद्धृदयं क्वचित् । वेदितुं शक्यते नूनं तेन मां नावबुध्यसे ॥

na tu kenacidatyantaṃ kasyaciddhṛdayaṃ kvacit | vedituṃ śakyate nūnaṃ tena māṃ nāvabudhyase

परन्तु कोई भी कभी किसी के हृदय को पूरी तरह नहीं जान सकता; निश्चय ही इसीलिए तुम मुझे नहीं समझ पातीं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (4.28.35)

ततः सहैव कन्याभिर्द्रौपदी राजवेश्म तत् । प्रविवेश सुदेष्णायाः समीपमनसूयिनी ॥

tataḥ sahaiva kanyābhirdraupadī rājaveśma tat | praviveśa sudeṣṇāyāḥ samīpamanasūyinī

तब द्रौपदी कन्याओं के साथ ही, मन में कोई द्वेष रखे बिना, उस राजभवन में सुदेष्णा के पास गई।

श्लोक 36 (4.28.36)

तामब्रवीद्राजपत्नी विराटवचनादिदम् । सैरन्ध्रि गम्यतां शीघ्रं यत्र कामयसे गतिम् । राजा बिभेति सैरन्ध्रि गन्धर्वेभ्यः पराभवात् ॥

tāmabravīdrājapatnī virāṭavacanādidam | sairandhri gamyatāṃ śīghraṃ yatra kāmayase gatim | rājā bibheti sairandhri gandharvebhyaḥ parābhavāt

रानी ने विराट के कहने से उससे यह कहा — "सैरन्ध्री! तुम जहाँ जाना चाहो, शीघ्र चली जाओ। सैरन्ध्री! राजा गन्धर्वों से पराजित होने के भय से डरते हैं।

सुदेष्णोवाच

श्लोक 37 (4.28.37)

त्वं चापि तरुणी सुभ्रू रूपेणाप्रतिमा भुवि । चित्तानि च नृणां भद्रे रक्तानि स्पर्शजे सुखे ॥

tvaṃ cāpi taruṇī subhrū rūpeṇāpratimā bhuvi | cittāni ca nṛṇāṃ bhadre raktāni sparśaje sukhe

तुम युवती हो, सुन्दर भौंहों वाली हो और पृथ्वी पर अनुपम रूपवती हो; और भद्रे! पुरुषों का मन स्पर्श से उत्पन्न सुख में आसक्त रहता है।

श्लोक 38 (4.28.38)

तस्मात्त्वत्तो भयं मह्यं राष्ट्रस्य नगरस्य च । गच्छाद्यैव यथेष्टं त्वं नगराद्यत्र रंस्यसे ॥

tasmāttvatto bhayaṃ mahyaṃ rāṣṭrasya nagarasya ca | gacchādyaiva yatheṣṭaṃ tvaṃ nagarādyatra raṃsyase

इसलिए तुम्हारे कारण मुझे अपने लिए, राष्ट्र के लिए और नगर के लिए भय है। तुम आज ही इस नगर से जहाँ चाहो, जहाँ तुम्हारा मन रमे, वहाँ चली जाओ।

श्लोक 39 (4.28.39)

त्वन्निमित्तं शुभे मह्यं सर्वो बन्धुजनो हतः । नृशंसा खलु ते बुद्धिर्भ्रातॄणां मे कृतो वधः ॥

tvannimittaṃ śubhe mahyaṃ sarvo bandhujano hataḥ | nṛśaṃsā khalu te buddhirbhrātṝṇāṃ me kṛto vadhaḥ

शुभे! तुम्हारे कारण मेरे सभी बन्धु-बान्धव मारे गए। तुम्हारी बुद्धि सचमुच क्रूर है, जो तुमने मेरे भाइयों का वध करवाया।

श्लोक 40 (4.28.40)

तस्माद्गन्धर्वराजेभ्यो भयमद्य प्रवर्तते । यथेष्टं गच्छ सैरन्ध्रि स्वस्ति चेह यथा भवेत् ॥

tasmādgandharvarājebhyo bhayamadya pravartate | yatheṣṭaṃ gaccha sairandhri svasti ceha yathā bhavet

इसलिए अब गन्धर्वराजों से भय उत्पन्न हो गया है। सैरन्ध्री! जहाँ चाहो चली जाओ, जिससे यहाँ कुशल बना रहे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 41 (4.28.41)

सुदेष्णाया वचः श्रुत्वा सैरन्ध्री चेदमब्रवीत् । त्रयोदशाहमात्रं तु राजा क्षाम्यतु भामिनि ॥

sudeṣṇāyā vacaḥ śrutvā sairandhrī cedamabravīt | trayodaśāhamātraṃ tu rājā kṣāmyatu bhāmini

सुदेष्णा की बात सुनकर सैरन्ध्री ने यह कहा — "भामिनि! राजा केवल तेरह दिन और मुझे सह लें।

सैरन्ध्र्युवाच

श्लोक 42 (4.28.42)

कृतकृत्या भविष्यन्ति गन्धर्वास्ते न संशयः । ततो मामुपनेष्यन्ति करिष्यन्ति च ते प्रियम् ॥

kṛtakṛtyā bhaviṣyanti gandharvāste na saṃśayaḥ | tato māmupaneṣyanti kariṣyanti ca te priyam

तब तक गन्धर्व निःसन्देह अपना कार्य पूरा कर लेंगे। फिर वे मुझे ले जाएँगे और तुम्हारा भी प्रिय करेंगे।

श्लोक 43 (4.28.43)

ध्रुवं च श्रेयसा राजा योक्ष्यते सह बान्धवैः । राज्ञः कृतोपकाराश्च कृतज्ञाश्च सदा शुभे । साधवश्च बलोत्सिक्ताः कृतप्रतिकृतेप्सवः ॥

dhruvaṃ ca śreyasā rājā yokṣyate saha bāndhavaiḥ | rājñaḥ kṛtopakārāśca kṛtajñāśca sadā śubhe | sādhavaśca balotsiktāḥ kṛtapratikṛtepsavaḥ

और निश्चय ही राजा अपने बन्धुओं सहित कल्याण को प्राप्त होंगे। शुभे! राजा ने उनका उपकार किया है और वे सदा कृतज्ञ रहते हैं; वे सज्जन हैं, बल से गर्वित हैं और किए हुए उपकार का बदला चुकाने को उत्सुक रहते हैं।

श्लोक 44 (4.28.44)

अर्थिनी मा ब्रवीत्येषा यद्वातद्वेति चिन्तय । भरस्व तदहर्मात्रं तत्ते श्रेयो भविष्यति ॥

arthinī mā bravītyeṣā yadvātadveti cintaya | bharasva tadaharmātraṃ tatte śreyo bhaviṣyati

यह मत सोचो कि यह याचिका जो मन में आए वही कह रही है। उतने दिनों तक मुझे निभा लो; इसी में तुम्हारा कल्याण होगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 45 (4.28.45)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा कैकेयी दुःखमोहिता । उवाच द्रौपदीमार्ता भ्रातृव्यसनकर्शिता ॥

tasyāstadvacanaṃ śrutvā kaikeyī duḥkhamohitā | uvāca draupadīmārtā bhrātṛvyasanakarśitā

उसकी बात सुनकर शोक से मोहित, भाइयों के विनाश से दुर्बल और व्यथित कैकेयी (सुदेष्णा) ने द्रौपदी से कहा —

सुदेष्णोवाच

श्लोक 46 (4.28.46)

वस भद्रे यथेष्टं त्वं त्वामहं शरणं गता । त्रायस्व मम भर्तारं पुत्रांश्चैव विशेषतः ॥

vasa bhadre yatheṣṭaṃ tvaṃ tvāmahaṃ śaraṇaṃ gatā | trāyasva mama bhartāraṃ putrāṃścaiva viśeṣataḥ

भद्रे! तुम जैसे चाहो रहो; मैं तुम्हारी शरण में आई हूँ। मेरे पति की, और विशेष रूप से मेरे पुत्रों की रक्षा करना।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 47 (4.28.47)

इत्युक्त्वा राजशार्दूल राज्ञे सर्वं न्यवेदयत् । त्रिंशद्रात्रिमिमां भीरुः कृतकृत्या निवासये ॥

ityuktvā rājaśārdūla rājñe sarvaṃ nyavedayat | triṃśadrātrimimāṃ bhīruḥ kṛtakṛtyā nivāsaye

हे राजसिंह! यह कहकर उसने राजा को सब कुछ बता दिया — "जब तक इसका कार्य पूरा न हो जाए, मैं इस भीरु स्त्री को तीस रातों तक यहाँ रहने दूँगी।"

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