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विराट पर्व · अध्याय 29

गुप्तचरों द्वारा दुर्योधन को कीचक-वध का समाचार

कीचक के वध से राजा विराट और उनका दरबार शोक में डूब जाता है, और सब ओर लोग चर्चा करते हैं कि पराई स्त्रियों पर दृष्टि डालने वाले उस घमण्डी सेनापति को सैरन्ध्री के कारण गन्धर्वों ने रात में मार डाला। देश, वन, पर्वत और नगर छान चुके दुर्योधन के गुप्तचर हस्तिनापुर लौटकर भरी सभा में बताते हैं कि पाण्डवों का कहीं पता नहीं है: उनके सारथी उनके बिना ही द्वारका पहुँचे हैं और वे सदा के लिए खो गए जान पड़ते हैं। प्रिय समाचार के रूप में वे यह भी बताते हैं कि त्रिगर्तों को बार-बार हराने वाला मत्स्यों का सेनापति कीचक अपने भाइयों सहित गन्धर्वों द्वारा मारा गया है, और दुर्योधन से पूछते हैं कि अब आगे क्या किया जाए।

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.29.1)

कीचके तु हते राजा विराटः परवीरहा । शोकमाहारयत्तीव्रं सामात्यः सपुरोहितः ॥

kīcake tu hate rājā virāṭaḥ paravīrahā | śokamāhārayattīvraṃ sāmātyaḥ sapurohitaḥ

कीचक के मारे जाने पर शत्रु-वीरों का संहार करने वाले राजा विराट अपने मन्त्रियों और पुरोहित सहित गहरे शोक में डूब गए।

श्लोक 2 (4.29.2)

कीचकस्य वधं घोरं सानुजस्य विशांपते । अत्याहितं चिन्तयित्वा व्यस्मयन्त पृथग्जनाः ॥

kīcakasya vadhaṃ ghoraṃ sānujasya viśāṃpate | atyāhitaṃ cintayitvā vyasmayanta pṛthagjanāḥ

हे प्रजानाथ, छोटे भाइयों सहित कीचक के भयानक वध को — उस अनहोनी विपत्ति को — सोच-सोचकर साधारण लोग विस्मय में पड़ गए।

श्लोक 3 (4.29.3)

तस्मिन्पुरे जनपदे जजल्पुश्चापि सर्वशः । वीर्यवान्दयितो राज्ञो दर्पोत्सिक्तश्च कीचकः ॥

tasminpure janapade jajalpuścāpi sarvaśaḥ | vīryavāndayito rājño darpotsiktaśca kīcakaḥ

उस नगर में और सारे जनपद में लोग सब ओर यही चर्चा करने लगे — 'कीचक बड़ा पराक्रमी था, राजा का प्रिय था और घमण्ड से फूला रहता था।'

श्लोक 4 (4.29.4)

सांपराये परिक्रुष्टो बलवान्दुर्जयो रणे । आसीत्प्रहर्ता शत्रूणां दारदर्शी च दुर्मतिः । स हतः किल गन्धर्वैः सैरन्ध्रीकारणान्निशि ॥

sāṃparāye parikruṣṭo balavāndurjayo raṇe | āsītprahartā śatrūṇāṃ dāradarśī ca durmatiḥ | sa hataḥ kila gandharvaiḥ sairandhrīkāraṇānniśi

'वह युद्ध में विख्यात, बलवान और रण में दुर्जेय था, शत्रुओं पर प्रहार करने वाला था; पर वह दुर्बुद्धि पराई स्त्रियों पर दृष्टि डालता था। सुनते हैं, सैरन्ध्री के कारण गन्धर्वों ने रात में उसे मार डाला।'

श्लोक 5 (4.29.5)

इत्यजल्पन्महाराज कीचकस्य विनाशनम् । देशेदेशे मनुष्याश्च विस्मिताः कीचके हते ॥

ityajalpanmahārāja kīcakasya vināśanam | deśedeśe manuṣyāśca vismitāḥ kīcake hate

हे महाराज, इस प्रकार देश-देश में लोग कीचक के विनाश की चर्चा करते रहे और कीचक के मारे जाने पर विस्मित होते रहे।

श्लोक 6 (4.29.6)

अथ वै धार्तराष्ट्रेण प्रयुक्ता ये बहिश्चराः । मृगयित्वा बहून्देशान्ग्रामांश्च नगराणि च ॥

atha vai dhārtarāṣṭreṇa prayuktā ye bahiścarāḥ | mṛgayitvā bahūndeśāngrāmāṃśca nagarāṇi ca

इधर धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन ने जिन गुप्तचरों को बाहर भेजा था, वे अनेक देशों, गाँवों और नगरों में खोज करके,

श्लोक 7 (4.29.7)

संविधाय यथाऽऽदिष्टं यथादेशं प्रदर्शकाः । कृतसंकेतनाः सर्वे न्यवर्तन्त पुरं ततः ॥

saṃvidhāya yathā''diṣṭaṃ yathādeśaṃ pradarśakāḥ | kṛtasaṃketanāḥ sarve nyavartanta puraṃ tataḥ

आदेश के अनुसार अपना काम पूरा करके, अपने-अपने नियत प्रदेश की छानबीन करके और आपस में तय किए संकेत के अनुसार, वे सब नगर की ओर लौट पड़े।

श्लोक 8 (4.29.8)

आगम्य हास्तिनपुरं धार्तराष्ट्रमरिन्दमम् । तत्र दृष्ट्वा तु राजानं कौरव्यं धृतराष्ट्रजम् ॥

āgamya hāstinapuraṃ dhārtarāṣṭramarindamam | tatra dṛṣṭvā tu rājānaṃ kauravyaṃ dhṛtarāṣṭrajam

हस्तिनापुर में शत्रुदमन धृतराष्ट्रपुत्र के पास आकर उन्होंने वहाँ धृतराष्ट्र के पुत्र, कुरुवंशी राजा को देखा,

श्लोक 9 (4.29.9)

द्रोणकर्णकृपैः सार्धं भीष्मेण च महात्मना । संगतं भ्रातृभिः सार्धं त्रिगर्तैश्च महारथैः ॥

droṇakarṇakṛpaiḥ sārdhaṃ bhīṣmeṇa ca mahātmanā | saṃgataṃ bhrātṛbhiḥ sārdhaṃ trigartaiśca mahārathaiḥ

जो द्रोण, कर्ण और कृप के साथ, महात्मा भीष्म के साथ, अपने भाइयों के साथ तथा महारथी त्रिगर्तों के साथ बैठे थे।

श्लोक 10 (4.29.10)

प्रणम्य शिरसा भूमौ वर्धयित्वा जयाशिषा । आसीनं सूर्यसंकाशे काञ्चने परमासने ॥

praṇamya śirasā bhūmau vardhayitvā jayāśiṣā | āsīnaṃ sūryasaṃkāśe kāñcane paramāsane

उन्होंने धरती पर सिर रखकर प्रणाम किया और विजय का आशीर्वाद देकर उनका अभिनन्दन किया — जो सूर्य के समान दमकते उत्तम स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान थे,

श्लोक 11 (4.29.11)

उपास्यमानं सचिवैर्मरुद्भिरिव वासवम् । विद्वद्भिर्गायकैः सार्धं कविभिः स्तुतिपाठकैः ॥

upāsyamānaṃ sacivairmarudbhiriva vāsavam | vidvadbhirgāyakaiḥ sārdhaṃ kavibhiḥ stutipāṭhakaiḥ

जिनकी सेवा में मन्त्री वैसे ही लगे थे जैसे मरुद्गण इन्द्र की सेवा में रहते हैं, और साथ में विद्वान, गायक, कवि तथा स्तुति-पाठक भी थे,

श्लोक 12 (4.29.12)

अनेकैरपि राजन्यैः सेवितं सपरिच्छदैः । दुर्योधनं सभामध्ये आसीनमिदमब्रुवन् ॥

anekairapi rājanyaiḥ sevitaṃ saparicchadaiḥ | duryodhanaṃ sabhāmadhye āsīnamidamabruvan

और अनेक राजकुमार अपने परिजनों सहित जिनकी सेवा कर रहे थे — सभा के बीच बैठे उन दुर्योधन से उन्होंने यह कहा —

चारा ऊचुः

श्लोक 13 (4.29.13)

कृतोऽस्माभिः परो यत्नस्तेषामन्वेषणे सदा । पाण्डवानां मनुष्येन्द्र तस्मिन्महति कानने ॥

kṛto'smābhiḥ paro yatnasteṣāmanveṣaṇe sadā | pāṇḍavānāṃ manuṣyendra tasminmahati kānane

हे नरेन्द्र, उस विशाल वन में पाण्डवों को खोजने के लिए हमने सदा पूरा प्रयत्न किया है —

श्लोक 14 (4.29.14)

निर्जने व्यालसंकीर्णे नानाभ्रमरसंकुले । लताप्रतानगहने नानागुल्मसमावृते ॥

nirjane vyālasaṃkīrṇe nānābhramarasaṃkule | latāpratānagahane nānāgulmasamāvṛte

जो निर्जन है, हिंसक जन्तुओं से भरा है, नाना प्रकार के भौंरों से गूँजता है, फैली हुई लताओं से घना है और तरह-तरह की झाड़ियों से ढका है।

श्लोक 15 (4.29.15)

न च विद्मो गता येन पार्थाः सुदृढविक्रमाः । मार्गमाणाः पदन्यासमाश्रमेषु वनेषु च ॥

na ca vidmo gatā yena pārthāḥ sudṛḍhavikramāḥ | mārgamāṇāḥ padanyāsamāśrameṣu vaneṣu ca

फिर भी हम नहीं जानते कि दृढ़ पराक्रम वाले पृथापुत्र किस मार्ग से गए, यद्यपि हमने आश्रमों और वनों में उनके पदचिह्न खोजे,

श्लोक 16 (4.29.16)

गिरिकूटेषु तुङ्गेषु नानाजनपदेषु च । जनाकीर्णेषु देशेषु चत्वरेषु पुरेषु च ॥

girikūṭeṣu tuṅgeṣu nānājanapadeṣu ca | janākīrṇeṣu deśeṣu catvareṣu pureṣu ca

ऊँचे पर्वत-शिखरों पर, अनेक जनपदों में, जनसंकुल प्रदेशों में, चौराहों पर और नगरों में भी।

श्लोक 17 (4.29.17)

नरेन्द्र सहसा नष्टान्नैव विद्म च पाण्डवान् । अत्यन्तादर्शनान्नष्टा भद्रं तुभ्यं नरर्षभ ॥

narendra sahasā naṣṭānnaiva vidma ca pāṇḍavān | atyantādarśanānnaṣṭā bhadraṃ tubhyaṃ nararṣabha

हे राजन्, सहसा लुप्त हुए पाण्डवों का हमें कुछ भी पता नहीं है; वे पूरी तरह अदृश्य होकर खो गए हैं। हे नरश्रेष्ठ, आपका कल्याण हो।

श्लोक 18 (4.29.18)

गिरीणां कूटकुञ्जेषु कन्दरोदरसानुषु । नदीप्रस्रवणेष्वेव ह्रदेषु च सरस्सु च ॥

girīṇāṃ kūṭakuñjeṣu kandarodarasānuṣu | nadīprasravaṇeṣveva hradeṣu ca sarassu ca

पर्वतों के शिखरों के कुञ्जों में, कन्दराओं के भीतर और ढलानों पर, नदियों और झरनों के किनारे, सरोवरों और तालाबों में,

श्लोक 19 (4.29.19)

गह्वरेषु च दुर्गेषु ग्रामेषूपवनेषु च । दुर्विज्ञेया गतिस्तेषां मृग्यतेऽस्माभिरेव च । गजव्याघ्रसमीपेषु सिंहान्ते शरभान्तरे ॥

gahvareṣu ca durgeṣu grāmeṣūpavaneṣu ca | durvijñeyā gatisteṣāṃ mṛgyate'smābhireva ca | gajavyāghrasamīpeṣu siṃhānte śarabhāntare

गहरी घाटियों और दुर्गम स्थानों में, गाँवों और उपवनों में — हमने खोज की, पर उनकी गति का पता लगना कठिन है; हाथियों और बाघों के आस-पास, सिंहों और शरभों के बीच भी हमने उन्हें ढूँढा।

श्लोक 20 (4.29.20)

वर्त्मन्यन्विच्छमानास्तु रथानां रथिसत्तम । कंचित्कालं मनुष्येन्द्र सूताननुगता वयम् ॥

vartmanyanvicchamānāstu rathānāṃ rathisattama | kaṃcitkālaṃ manuṣyendra sūtānanugatā vayam

हे रथियों में श्रेष्ठ, रथों के मार्गों पर खोज करते हुए हम कुछ समय तक उनके सारथियों के पीछे-पीछे चलते रहे, हे नरेन्द्र।

श्लोक 21 (4.29.21)

मृगयित्वा यथान्यायं विदितार्थाश्च तत्वतः । प्राप्ता द्वारवतीं सूता विना पार्थैः परंतप ॥

mṛgayitvā yathānyāyaṃ viditārthāśca tatvataḥ | prāptā dvāravatīṃ sūtā vinā pārthaiḥ paraṃtapa

विधिपूर्वक खोज करके हमने सच्ची बात जान ली — हे परंतप, सारथी पृथापुत्रों के बिना ही द्वारका पहुँचे हैं।

श्लोक 22 (4.29.22)

न तत्र कृष्णा राजेन्द्र पाण्डवाश्च महाव्रताः । नरदेव यथोद्दिष्टं न च विद्मात्र पाण्डवान् ॥

na tatra kṛṣṇā rājendra pāṇḍavāśca mahāvratāḥ | naradeva yathoddiṣṭaṃ na ca vidmātra pāṇḍavān

हे राजेन्द्र, वहाँ न कृष्णा (द्रौपदी) हैं, न महान व्रतधारी पाण्डव। हे नरदेव, आपके निर्देश के अनुसार खोजने पर भी हमें पाण्डवों का कोई पता नहीं चला।

श्लोक 23 (4.29.23)

निर्वृतो भव नष्टास्ते स्वस्थो भव परंतप । सर्वथैव प्रणष्टास्ते नमस्ते भरतर्षभ ॥

nirvṛto bhava naṣṭāste svastho bhava paraṃtapa | sarvathaiva praṇaṣṭāste namaste bharatarṣabha

आप निश्चिन्त हो जाइए, वे खो गए हैं; हे परंतप, स्वस्थचित्त रहिए — वे सर्वथा नष्ट हो चुके हैं। हे भरतश्रेष्ठ, आपको नमस्कार है।

श्लोक 24 (4.29.24)

सर्वा च पृथिवी कृत्स्ना सशैलवनकानना । सराष्ट्रनगरग्रामा पत्तनैश्च समन्विता । अन्वेषिता च सर्वत्र न च पश्याम पाण्डवान् ॥

sarvā ca pṛthivī kṛtsnā saśailavanakānanā | sarāṣṭranagaragrāmā pattanaiśca samanvitā | anveṣitā ca sarvatra na ca paśyāma pāṇḍavān

पर्वतों, वनों और काननों सहित, राष्ट्रों, नगरों, गाँवों और पत्तनों से भरी यह सारी पृथ्वी हमने सब ओर छान डाली, फिर भी पाण्डव हमें दिखाई नहीं दिए।

श्लोक 25 (4.29.25)

पुनः शाधि मनुष्येन्द्र अत ऊर्ध्वं विशांपते । अन्वेषणे पाण्डवानां भूयः किं करवामहे ॥

punaḥ śādhi manuṣyendra ata ūrdhvaṃ viśāṃpate | anveṣaṇe pāṇḍavānāṃ bhūyaḥ kiṃ karavāmahe

हे नरेन्द्र, हे प्रजापालक, आप हमें फिर आज्ञा दीजिए — अब आगे पाण्डवों की खोज में हम और क्या करें?

श्लोक 26 (4.29.26)

इमां च नः प्रियां वीर वाचं भद्रवतीं शृणु ॥

imāṃ ca naḥ priyāṃ vīra vācaṃ bhadravatīṃ śṛṇu

हे वीर, हमारी यह प्रिय और मंगलकारी बात भी सुनिए।

श्लोक 27 (4.29.27)

येन त्रिगर्ता निहता बलेन बहुशो नृप । सूतेन राज्ञो मत्स्यस्य कीचकेन बलीयसा । स हतः पतितः शेते गन्धर्वैर्निशि भारत ॥

yena trigartā nihatā balena bahuśo nṛpa | sūtena rājño matsyasya kīcakena balīyasā | sa hataḥ patitaḥ śete gandharvairniśi bhārata

हे राजन्, जिसके बल से त्रिगर्त अनेक बार मारे गए, वह मत्स्यराज का बलशाली सूत कीचक, हे भारत, रात में गन्धर्वों द्वारा मारा जाकर धरती पर पड़ा है।

श्लोक 28 (4.29.28)

स्यालो राज्ञो विराटस्य सेनापतिरुदारधीः । सुदेष्णायानुजः क्रूरः शूरो वीरो गतव्यथः ॥

syālo rājño virāṭasya senāpatirudāradhīḥ | sudeṣṇāyānujaḥ krūraḥ śūro vīro gatavyathaḥ

वह राजा विराट का साला और सेनापति था, उदार बुद्धि वाला; सुदेष्णा का छोटा भाई — क्रूर, शूर, वीर और कभी व्यथित न होने वाला;

श्लोक 29 (4.29.29)

उत्साहवान्महावीर्यो नीतिमान्बलवानपि । युद्धज्ञो रिपुवीर्यघ्नः सिंहतुल्यपराक्रमः ॥

utsāhavānmahāvīryo nītimānbalavānapi | yuddhajño ripuvīryaghnaḥ siṃhatulyaparākramaḥ

उत्साही, महापराक्रमी, नीतिज्ञ और बलवान भी; युद्ध-कला का ज्ञाता, शत्रुओं के पराक्रम का नाश करने वाला और सिंह के समान पराक्रमी;

श्लोक 30 (4.29.30)

प्रजारक्षणदक्षश्च शत्रुग्रहणशक्तिमान् । विजितारिर्महायुद्धे प्रचण्डो मानतत्परः ॥

prajārakṣaṇadakṣaśca śatrugrahaṇaśaktimān | vijitārirmahāyuddhe pracaṇḍo mānatatparaḥ

प्रजा की रक्षा में कुशल, शत्रुओं को बन्दी बनाने में समर्थ, महायुद्ध में शत्रुओं को जीतने वाला, प्रचण्ड और अपने मान का ध्यान रखने वाला;

श्लोक 31 (4.29.31)

नरनारीमनोह्लादी धीरो वाग्मी रणप्रियः । पुण्यकर्माऽर्थकामानां भाजनं मनुजोत्तमः ॥

naranārīmanohlādī dhīro vāgmī raṇapriyaḥ | puṇyakarmā'rthakāmānāṃ bhājanaṃ manujottamaḥ

स्त्री-पुरुषों के मन को आनन्द देने वाला, धीर, वाक्पटु, युद्धप्रेमी, पुण्यकर्मा, अर्थ और काम का पात्र — मनुष्यों में श्रेष्ठ।

श्लोक 32 (4.29.32)

स हतो निशि गन्धर्वैः स्त्रीनिमित्तं नराधिप । अमृष्यमाणो दुष्टात्मा निशीथे सह सोदरैः । सुहृदश्चास्य निहता योधाश्च प्रहरैर्हताः ॥

sa hato niśi gandharvaiḥ strīnimittaṃ narādhipa | amṛṣyamāṇo duṣṭātmā niśīthe saha sodaraiḥ | suhṛdaścāsya nihatā yodhāśca praharairhatāḥ

हे नराधिप, उसे एक स्त्री के कारण रात में गन्धर्वों ने मार डाला — वह दुष्टात्मा अपने को रोक न सका — आधी रात को, उसके भाइयों के साथ; उसके मित्र भी मारे गए और उसके योद्धा भी प्रहारों से मारे गए।

श्लोक 33 (4.29.33)

गन्धर्वाणां च महिषी काचिदस्ति नितम्बिनी । सैरन्ध्री नाम तां दृप्तो दुष्टात्माऽकामयद्बली ॥

gandharvāṇāṃ ca mahiṣī kācidasti nitambinī | sairandhrī nāma tāṃ dṛpto duṣṭātmā'kāmayadbalī

गन्धर्वों की एक पटरानी है, सुन्दर नितम्बों वाली, जिसका नाम सैरन्ध्री है। उस घमण्डी, बलवान दुष्टात्मा ने उसकी कामना की थी।

श्लोक 34 (4.29.34)

इत्येवं श्रुतमस्माभिर्गन्धर्वैर्निहतो निशि ॥

ityevaṃ śrutamasmābhirgandharvairnihato niśi

हमने यही सुना है कि रात में गन्धर्वों ने उसे मार डाला।

श्लोक 35 (4.29.35)

बान्धवैर्बहुभिः सार्धं कीचको निहतो यतः । अद्यप्रभृति राजेन्द्र पाण्डवान्वेषणं प्रति । चारांश्च सर्वतश्चर्तुं प्रेषयेति मतिर्हि नः ॥

bāndhavairbahubhiḥ sārdhaṃ kīcako nihato yataḥ | adyaprabhṛti rājendra pāṇḍavānveṣaṇaṃ prati | cārāṃśca sarvataścartuṃ preṣayeti matirhi naḥ

चूँकि कीचक अपने बहुत-से बन्धु-बान्धवों सहित मारा गया है, इसलिए हे राजेन्द्र, हमारी राय यह है कि आज से पाण्डवों की खोज के लिए सब ओर गुप्तचर भेजिए।

श्लोक 36 (4.29.36)

निहतो निशि गन्धर्वैर्दुष्टात्मा भ्रातृभिः सह । एतावच्छ्रुतमस्माभिर्भद्रं तेऽस्तु नराधिप ॥

nihato niśi gandharvairduṣṭātmā bhrātṛbhiḥ saha | etāvacchrutamasmābhirbhadraṃ te'stu narādhipa

वह दुष्टात्मा अपने भाइयों सहित रात में गन्धर्वों द्वारा मारा गया। हमने इतना ही सुना है। हे नराधिप, आपका कल्याण हो।

श्लोक 37 (4.29.37)

प्रियमेतदुपश्रुत्य शत्रूणां च पराभवम् । कृतकृत्यश्च कौरव्य विधत्स्व यदनन्तरम् ॥

priyametadupaśrutya śatrūṇāṃ ca parābhavam | kṛtakṛtyaśca kauravya vidhatsva yadanantaram

हे कौरव्य, शत्रुओं की पराजय का यह प्रिय समाचार सुनकर और कृतार्थ होकर अब आगे जो करना हो उसका प्रबन्ध कीजिए।

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