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विराट पर्व · अध्याय 30

दुर्योधन, कर्ण और दुःशासन द्वारा नई खोज की योजना

बहुत देर तक सोचने के बाद दुर्योधन सभा से कहता है कि पाण्डवों के तेरहवें वर्ष का अधिकांश बीत चुका है; यदि उसके पूरा होने से पहले वे न मिले तो क्रुद्ध सर्पों की भाँति लौटेंगे, पर समय रहते पहचान लिए गए तो उन्हें फिर से वन जाना होगा। कर्ण सलाह देता है कि नए, कुशल और छद्मवेशी गुप्तचर — कुछ ब्राह्मण के वेश में — हर देश, तीर्थ, खान, गाँव, आश्रम और पर्वत में खोज करें। दुःशासन कर्ण की योजना का समर्थन करता है, भरोसेमन्द और पुरस्कृत गुप्तचरों को फिर भेजने को कहता है, और यह भी कहता है कि पाण्डव शायद समुद्र पार चले गए हों, हिंसक पशुओं या राक्षसों के ग्रास बन गए हों या सदा के लिए नष्ट हो गए हों, इसलिए दुर्योधन शान्त मन से कार्य करे।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.30.1)

ततो दुर्योधनो राजा श्रुत्वा तेषां वचस्तदा । चिरमन्तर्मना भूत्वा इदमाह सभासदः ॥

tato duryodhano rājā śrutvā teṣāṃ vacastadā | ciramantarmanā bhūtvā idamāha sabhāsadaḥ

तब राजा दुर्योधन ने उनकी बात सुनकर बहुत देर तक मन ही मन विचार किया और फिर सभासदों से यह कहा —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 2 (4.30.2)

अशक्यं खलु कार्यस्य गतिं ज्ञातुं हि तत्वतः । तस्मात्सर्वे परीक्षध्वं क्वनु स्युः पाण्डवा गताः ॥

aśakyaṃ khalu kāryasya gatiṃ jñātuṃ hi tatvataḥ | tasmātsarve parīkṣadhvaṃ kvanu syuḥ pāṇḍavā gatāḥ

किसी कार्य की गति को ठीक-ठीक जान पाना सचमुच असम्भव है। इसलिए आप सब पता लगाइए कि पाण्डव कहाँ चले गए होंगे।

श्लोक 3 (4.30.3)

अल्पावशिष्टः कालस्तु गतो भूयिष्ठ एव च । तेषामज्ञातचर्यायामस्मिन्वर्षे त्रयोदशे ॥

alpāvaśiṣṭaḥ kālastu gato bhūyiṣṭha eva ca | teṣāmajñātacaryāyāmasminvarṣe trayodaśe

इस तेरहवें वर्ष में उनके अज्ञातवास का थोड़ा ही समय बचा है; अधिकांश बीत चुका है।

श्लोक 4 (4.30.4)

अपि वर्षस्य शेषं ते ह्यतीयुरिह पाण्डवाः । निवृत्तसमयास्ते हि सत्यव्रतपरायणाः ॥

api varṣasya śeṣaṃ te hyatīyuriha pāṇḍavāḥ | nivṛttasamayāste hi satyavrataparāyaṇāḥ

यदि पाण्डव यहाँ वर्ष का शेष भाग भी पार कर गए, तो अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके — क्योंकि वे सत्य और व्रत में निष्ठ हैं —

श्लोक 5 (4.30.5)

क्षरन्त इव नागेन्द्राः सर्वे ह्याशीविषोपमाः । दुःखाद्भवेयुः संरब्धाः कौरवान्प्रति ते ध्रुवम् ॥

kṣaranta iva nāgendrāḥ sarve hyāśīviṣopamāḥ | duḥkhādbhaveyuḥ saṃrabdhāḥ kauravānprati te dhruvam

विष उगलते महानागों की भाँति, विषधर सर्पों के समान वे सब अपने दुःखों के कारण निश्चय ही क्रोध से भरकर कौरवों पर टूट पड़ेंगे।

श्लोक 6 (4.30.6)

विज्ञातव्या मनुष्येन्द्रास्तर्कया सुप्रणीतया । निपुणैश्चारपुरुषैः प्राज्ञैर्दक्षैः सुसंवृतैः ॥

vijñātavyā manuṣyendrāstarkayā supraṇītayā | nipuṇaiścārapuruṣaiḥ prājñairdakṣaiḥ susaṃvṛtaiḥ

उन नरश्रेष्ठों का पता भली-भाँति चलाए गए तर्क से और निपुण, बुद्धिमान, दक्ष तथा भली-भाँति छिपे रहने वाले गुप्तचरों द्वारा लगाया जाना चाहिए।

श्लोक 7 (4.30.7)

अज्ञातसमये ज्ञाताः कृच्छ्ररूपसमाश्रिताः । प्रविशेयुर्जितक्रोधास्तावदेव पुनर्वनम् ॥

ajñātasamaye jñātāḥ kṛcchrarūpasamāśritāḥ | praviśeyurjitakrodhāstāvadeva punarvanam

यदि अज्ञातवास की अवधि में ही वे पहचान लिए गए, तो कष्टमय वेश धारण किए हुए और क्रोध को जीतकर उन्हें उतने ही समय के लिए फिर वन में जाना होगा।

श्लोक 8 (4.30.8)

तस्मात्क्षिप्रं विचिन्वध्वं यथा चात्यन्तमव्ययम् । राज्यं निर्द्वन्द्वमव्यग्रं निःसपत्नं चिरं भवेत् ॥

tasmātkṣipraṃ vicinvadhvaṃ yathā cātyantamavyayam | rājyaṃ nirdvandvamavyagraṃ niḥsapatnaṃ ciraṃ bhavet

इसलिए शीघ्र ही उन्हें खोजो, जिससे हमारा राज्य दीर्घकाल तक अक्षय, द्वन्द्वरहित, निश्चिन्त और शत्रुहीन बना रहे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (4.30.9)

दुर्योधनेनैवमुक्ते वचनेऽतीव दुःखिना । ततः कर्णोऽब्रवीद्वाक्यं सत्यधर्मार्थसंयुतम् ॥

duryodhanenaivamukte vacane'tīva duḥkhinā | tataḥ karṇo'bravīdvākyaṃ satyadharmārthasaṃyutam

जब अत्यन्त दुखी दुर्योधन ने ये वचन कहे, तब कर्ण ने सत्य, धर्म और अर्थ से युक्त वचन कहा —

कर्ण उवाच

श्लोक 10 (4.30.10)

एते पुनर्न गच्छन्तु अन्ये गच्छन्तु भारत । शीघ्रवृत्ता नरा योग्या निपुणाश्छन्नचारिणः ॥

ete punarna gacchantu anye gacchantu bhārata | śīghravṛttā narā yogyā nipuṇāśchannacāriṇaḥ

हे भारत, ये लोग फिर न जाएँ; दूसरे लोग जाएँ — शीघ्रगामी, योग्य, निपुण और छिपकर घूमने वाले।

श्लोक 11 (4.30.11)

चरन्तु देशान्विविधान्स्फीताञ्जनपदाकुलान् । तत्र गोष्ठीषु रम्यासु सिद्धा ब्राह्मणरूपिणः ॥

carantu deśānvividhānsphītāñjanapadākulān | tatra goṣṭhīṣu ramyāsu siddhā brāhmaṇarūpiṇaḥ

वे समृद्ध और जनसंकुल विविध देशों में घूमें; और वहाँ सुन्दर गोष्ठियों में ब्राह्मण का वेश धारण किए सिद्ध पुरुष,

श्लोक 12 (4.30.12)

परिवाहेषु तीर्थेषु विविधेष्वाकरेषु च । अन्वेष्टव्या मनुष्येन्द्र पाण्डवाश्छन्नचारिणः ॥

parivāheṣu tīrtheṣu vividheṣvākareṣu ca | anveṣṭavyā manuṣyendra pāṇḍavāśchannacāriṇaḥ

जल-प्रवाहों के किनारे, तीर्थों में और विविध खानों में, हे नरेन्द्र, छिपकर विचरने वाले पाण्डवों को खोजें —

श्लोक 13 (4.30.13)

नदीकुञ्जेषु तीर्थेषु ग्रामेषु नगरेषु च । आश्रमेषु च रम्येषु पर्वतेषु गुहासु च ॥

nadīkuñjeṣu tīrtheṣu grāmeṣu nagareṣu ca | āśrameṣu ca ramyeṣu parvateṣu guhāsu ca

नदियों के कुञ्जों में, तीर्थों में, गाँवों और नगरों में, रमणीय आश्रमों में, पर्वतों पर और गुफाओं में।

श्लोक 14 (4.30.14)

विज्ञातव्या मनुष्येन्द्र तर्कया सुविनीतया । विविधैस्तत्परैः सम्यङ्निपुणैस्तज्ज्ञसंमतैः ॥

vijñātavyā manuṣyendra tarkayā suvinītayā | vividhaistatparaiḥ samyaṅnipuṇaistajjñasaṃmataiḥ

हे नरेन्द्र, भली-भाँति संयत तर्क से, कार्य में तत्पर, विविध, भली-भाँति निपुण और जानकारों द्वारा सम्मानित पुरुषों के द्वारा उनका पता लगाया जाना चाहिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (4.30.15)

अथाग्रजानन्तरजो भ्रातुः प्रियहिते रतः । ज्येष्ठं दुःशासनस्तत्र भ्राता भ्रातरमब्रवीत् ॥

athāgrajānantarajo bhrātuḥ priyahite rataḥ | jyeṣṭhaṃ duḥśāsanastatra bhrātā bhrātaramabravīt

तब बड़े भाई के ठीक बाद जन्मे और भाई के प्रिय तथा हित में लगे रहने वाले दुःशासन ने वहाँ अपने बड़े भाई से कहा —

दुःशासन उवाच

श्लोक 16 (4.30.16)

येषु नः प्रत्ययो राजंश्चारेषु मनुजाधिप । ते यान्तु दत्तदेया वै भूयस्तान्परिमार्गितुम् ॥

yeṣu naḥ pratyayo rājaṃścāreṣu manujādhipa | te yāntu dattadeyā vai bhūyastānparimārgitum

हे राजन्, हे मनुजाधिप, जिन गुप्तचरों पर हमें भरोसा है, उन्हें उनका पारिश्रमिक देकर फिर से उनकी खोज के लिए भेजा जाए।

श्लोक 17 (4.30.17)

यदाह कर्णो राजेन्द्र सर्वमेतदवेक्ष्यताम् । यथोद्दिष्टं चराः सर्वे मृगयन्तु यतस्ततः ॥

yadāha karṇo rājendra sarvametadavekṣyatām | yathoddiṣṭaṃ carāḥ sarve mṛgayantu yatastataḥ

हे राजेन्द्र, कर्ण ने जो कुछ कहा है उस सब पर ध्यान दिया जाए। सब गुप्तचर निर्देश के अनुसार इधर-उधर खोज करें।

श्लोक 18 (4.30.18)

घ्राणैः पश्यन्ति पशवो वेदैरेव द्विजोत्तमाः । चारैः पश्यन्ति राजानश्चक्षुर्भ्यामितरे जनाः ॥

ghrāṇaiḥ paśyanti paśavo vedaireva dvijottamāḥ | cāraiḥ paśyanti rājānaścakṣurbhyāmitare janāḥ

पशु गन्ध से देखते हैं, श्रेष्ठ ब्राह्मण वेदों से, राजा गुप्तचरों से और अन्य लोग अपनी दोनों आँखों से।

श्लोक 19 (4.30.19)

यथोक्ताश्चारपुरुषा मृगयन्तु पुनःपुनः । एते चान्ये च बहवो देशांश्च नगराणि च ॥

yathoktāścārapuruṣā mṛgayantu punaḥpunaḥ | ete cānye ca bahavo deśāṃśca nagarāṇi ca

निर्देश पाए हुए गुप्तचर बार-बार खोजें — ये भी और दूसरे बहुत-से भी — देशों और नगरों में।

श्लोक 20 (4.30.20)

न हि तेषां गतिर्वासः प्रवृत्तिर्वोपलभ्यते । अत्यन्तं वा निगूढास्ते पारं वोर्मिमतो गताः ॥

na hi teṣāṃ gatirvāsaḥ pravṛttirvopalabhyate | atyantaṃ vā nigūḍhāste pāraṃ vormimato gatāḥ

क्योंकि उनकी गति, निवास या गतिविधि का कोई पता नहीं मिलता। या तो वे पूरी तरह छिपे हुए हैं, या समुद्र के उस पार चले गए हैं।

श्लोक 21 (4.30.21)

व्यालैर्वाऽपि महारण्ये भक्षिताः शूरमानिनः । द्वीपं वा परमं प्राप्ता गिरिदुर्गवनेष्वपि ॥

vyālairvā'pi mahāraṇye bhakṣitāḥ śūramāninaḥ | dvīpaṃ vā paramaṃ prāptā giridurgavaneṣvapi

अथवा अपने को शूर मानने वाले वे विशाल वन में हिंसक पशुओं का ग्रास बन गए हैं; या किसी दूर के द्वीप में पहुँच गए हैं, या पर्वतों के दुर्गम स्थानों और वनों में हैं।

श्लोक 22 (4.30.22)

हीनदर्पा निराशास्ते भक्षिता वाऽपि राक्षसैः । अथवा विषमं प्राप्य विनष्टाः शाश्वतीः समाः ॥

hīnadarpā nirāśāste bhakṣitā vā'pi rākṣasaiḥ | athavā viṣamaṃ prāpya vinaṣṭāḥ śāśvatīḥ samāḥ

या दर्प टूट जाने और निराश हो जाने पर राक्षसों ने उन्हें खा लिया है; अथवा किसी विपत्ति में पड़कर वे सदा के लिए नष्ट हो गए हैं।

श्लोक 23 (4.30.23)

तस्मान्मानसमव्यग्रं कृत्वाऽऽत्मानं नियम्य च । कुरु कार्यं महोत्साहं मन्यसे यन्नराधिप ॥

tasmānmānasamavyagraṃ kṛtvā''tmānaṃ niyamya ca | kuru kāryaṃ mahotsāhaṃ manyase yannarādhipa

इसलिए हे नराधिप, मन को स्थिर रखिए, अपने को संयम में रखिए और बड़े उत्साह से वह कार्य कीजिए जो आप उचित समझते हैं।

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