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विराट पर्व · अध्याय 31

पाण्डवों के निवास पर द्रोण और भीष्म के वचन

द्रोण सभा से कहते हैं कि पाण्डवों जैसे शूर, विद्वान, संयमी और धर्मात्मा लोग, जो युधिष्ठिर के अनुगामी हैं और जिनकी देवता रक्षा करते हैं, नष्ट नहीं हो सकते; उनकी अवधि अभी पूरी नहीं हुई है, इसलिए ब्राह्मणों, गुप्तचरों, सिद्धों और तपस्वियों द्वारा यत्नपूर्वक उनकी खोज होनी चाहिए। भीष्म सहमत होते हैं कि तप और पराक्रम से सुरक्षित, केशव के अनुगामी पाण्डव नष्ट नहीं होंगे। कौरव और पाण्डव दोनों को समान मानते हुए भी वे बताते हैं कि जिस देश में युधिष्ठिर छिपकर रहते हैं उसे कैसे पहचानें: वहाँ के लोग दानी, सत्यवादी और ईर्ष्या से रहित होते हैं, समय पर वर्षा होती है, गायें भरपूर दूध देती हैं, रोग, चोरी और भय नहीं होते, और उत्सवों तथा यज्ञों की भरमार रहती है। वे दुर्योधन से कहते हैं कि इस पर विचार करके कुल के हित में शीघ्र कार्य करे।

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.31.1)

अथाऽब्रवीत्सभामध्ये द्रोणः सूक्ष्मार्थदर्शिवान् । न तादृशा विनश्यन्ति नापि यान्ति पराभवम् ॥

athā'bravītsabhāmadhye droṇaḥ sūkṣmārthadarśivān | na tādṛśā vinaśyanti nāpi yānti parābhavam

तब सूक्ष्म बातों को देखने वाले द्रोण ने सभा के बीच कहा — 'ऐसे लोग नष्ट नहीं होते, न ही पराजित होते हैं।'

द्रोण उवाच

श्लोक 2 (4.31.2)

शूराश्च कृतविद्याश्च बुद्धिमन्तो जितेन्द्रियाः । धर्मज्ञाः सत्यसन्धाश्च युधिष्ठिरमनुव्रताः ॥

śūrāśca kṛtavidyāśca buddhimanto jitendriyāḥ | dharmajñāḥ satyasandhāśca yudhiṣṭhiramanuvratāḥ

वे शूरवीर हैं, विद्याओं में पारंगत हैं, बुद्धिमान और जितेन्द्रिय हैं, धर्मज्ञ और सत्यप्रतिज्ञ हैं, और युधिष्ठिर के अनुगामी हैं —

श्लोक 3 (4.31.3)

नीतिधर्मार्थतत्वज्ञं पितृवच्च समाहितम् । धर्मे स्थितं सत्यधृतिं ज्येष्ठं श्रेष्ठापचायिनम् ॥

nītidharmārthatatvajñaṃ pitṛvacca samāhitam | dharme sthitaṃ satyadhṛtiṃ jyeṣṭhaṃ śreṣṭhāpacāyinam

उन युधिष्ठिर के, जो नीति, धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानते हैं, पिता की भाँति उनकी देखभाल करते हैं, धर्म में स्थित हैं, सत्य में दृढ़ हैं, सबसे बड़े हैं और श्रेष्ठजनों का आदर करते हैं।

श्लोक 4 (4.31.4)

अनुव्रता महात्मानो भ्रातरो भ्रातरं प्रियम् । अजातशत्रुं श्रीमन्तं सर्वभ्रातॄननुव्रतम् ॥

anuvratā mahātmāno bhrātaro bhrātaraṃ priyam | ajātaśatruṃ śrīmantaṃ sarvabhrātṝnanuvratam

वे महात्मा भाई अपने प्रिय भाई, श्रीमान अजातशत्रु के अनुगामी हैं, जो स्वयं भी अपने सब भाइयों के प्रति अनुरक्त हैं।

श्लोक 5 (4.31.5)

तेषां तथाविधेयानां निभृतानां महात्मनाम् । किमर्थं नीतिमान्प्राज्ञः श्रेयो नैषां करिष्यति ॥

teṣāṃ tathāvidheyānāṃ nibhṛtānāṃ mahātmanām | kimarthaṃ nītimānprājñaḥ śreyo naiṣāṃ kariṣyati

ऐसे आज्ञाकारी, संयमी और महात्मा भाइयों का कल्याण वह नीतिज्ञ और बुद्धिमान राजा क्यों नहीं करेगा?

श्लोक 6 (4.31.6)

तस्माद्यत्नात्परीक्षध्वं न तावत्समयो गतः । न ते विनाशमृच्छेयुरिति मे नैष्ठिकी मतिः ॥

tasmādyatnātparīkṣadhvaṃ na tāvatsamayo gataḥ | na te vināśamṛccheyuriti me naiṣṭhikī matiḥ

इसलिए यत्नपूर्वक खोज करो; अभी उनकी अवधि पूरी नहीं हुई है। वे विनाश को प्राप्त नहीं होंगे — यह मेरा दृढ़ मत है।

श्लोक 7 (4.31.7)

चिन्त्यतां चैव यत्कार्यं तच्च क्षिप्रमकालिकम् । क्रियतां साधु संचिन्त्य वासश्चैषां प्रचिन्त्यताम् ॥

cintyatāṃ caiva yatkāryaṃ tacca kṣipramakālikam | kriyatāṃ sādhu saṃcintya vāsaścaiṣāṃ pracintyatām

जो करना है उस पर विचार किया जाए, और भली-भाँति सोचकर उसे शीघ्र, बिना विलम्ब किए किया जाए; और उनके निवास-स्थान के बारे में भी विचार किया जाए।

श्लोक 8 (4.31.8)

यथा च पाण्डुपुत्राणां सर्वार्थेषु धृतात्मनाम् । प्रवृत्तिरुपलभ्येत तथा नीतिर्विधीयताम् ॥

yathā ca pāṇḍuputrāṇāṃ sarvārtheṣu dhṛtātmanām | pravṛttirupalabhyeta tathā nītirvidhīyatām

ऐसी नीति बनाई जाए जिससे सब कार्यों में दृढ़चित्त पाण्डुपुत्रों का समाचार मिल सके।

श्लोक 9 (4.31.9)

सर्वोपायैर्यतस्व त्वं यथा पश्यसि पाण्डवान् । दुर्ज्ञेयाः खलु शूरास्ते रक्ष्या नित्यं च दैवतैः ॥

sarvopāyairyatasva tvaṃ yathā paśyasi pāṇḍavān | durjñeyāḥ khalu śūrāste rakṣyā nityaṃ ca daivataiḥ

हर उपाय से यत्न करो, जिससे तुम पाण्डवों को खोज सको। वे शूरवीर सचमुच दुर्ज्ञेय हैं और देवता सदा उनकी रक्षा करते हैं।

श्लोक 10 (4.31.10)

शुद्धात्मा मानवान्पार्थः सत्यवान्नीतिमाञ्शुचिः । तेजोराशिभिरापूर्णो दहेदपि च चक्षुषा ॥

śuddhātmā mānavānpārthaḥ satyavānnītimāñśuciḥ | tejorāśibhirāpūrṇo dahedapi ca cakṣuṣā

पृथापुत्र युधिष्ठिर शुद्धात्मा, स्वाभिमानी, सत्यवादी, नीतिज्ञ और पवित्र हैं। तेज के पुंज से परिपूर्ण वे अपनी दृष्टि से भी भस्म कर सकते हैं।

श्लोक 11 (4.31.11)

तस्माद्यत्नश्च क्रियतां भूयश्च मृगयामहे । ब्राह्मणैश्चारकैः सिद्धैस्तापसैर्निपुणैरपि ॥

tasmādyatnaśca kriyatāṃ bhūyaśca mṛgayāmahe | brāhmaṇaiścārakaiḥ siddhaistāpasairnipuṇairapi

इसलिए यत्न किया जाए और हम फिर से खोज करें — ब्राह्मणों, गुप्तचरों, सिद्धों और निपुण तपस्वियों के द्वारा,

श्लोक 12 (4.31.12)

विविधैस्तत्परैः सम्यङ्निर्भीकैस्तज्ज्ञसंमतैः । अन्वेष्टव्या मनुष्येन्द्र पाण्डवाश्छन्नचारिणः ॥

vividhaistatparaiḥ samyaṅnirbhīkaistajjñasaṃmataiḥ | anveṣṭavyā manuṣyendra pāṇḍavāśchannacāriṇaḥ

और कार्य में तत्पर, विविध, सर्वथा निर्भीक तथा जानकारों द्वारा सम्मानित पुरुषों के द्वारा। हे नरेन्द्र, छिपकर विचरने वाले पाण्डवों को खोजा जाना चाहिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (4.31.13)

ततः शान्तनवो धीमान्भारतानां पितामहः । श्रुतवान्देशकालज्ञो नीतिमांश्च महामतिः ॥

tataḥ śāntanavo dhīmānbhāratānāṃ pitāmahaḥ | śrutavāndeśakālajño nītimāṃśca mahāmatiḥ

तब शान्तनुपुत्र, भरतवंशियों के पितामह भीष्म ने — जो बुद्धिमान, विद्वान, देश-काल के ज्ञाता, नीतिज्ञ और महामति थे —

श्लोक 14 (4.31.14)

तस्मिन्नुपरते वाक्ये आचार्यस्य महात्मनः । अनन्तरमुवाचेदं वाक्यं हेत्वर्थसंमितम् ॥

tasminnuparate vākye ācāryasya mahātmanaḥ | anantaramuvācedaṃ vākyaṃ hetvarthasaṃmitam

महात्मा आचार्य की बात समाप्त होने पर उसके बाद यह युक्ति और प्रयोजन से भरी बात कही।

श्लोक 15 (4.31.15)

युधिष्ठिरे समायुक्तां धर्मज्ञे धर्मसंहिताम् । पाण्डवे नित्यमव्यग्रां गिरं भीष्मः समाददे ॥

yudhiṣṭhire samāyuktāṃ dharmajñe dharmasaṃhitām | pāṇḍave nityamavyagrāṃ giraṃ bhīṣmaḥ samādade

भीष्म ने धर्मज्ञ युधिष्ठिर से सम्बद्ध, धर्मसम्मत और पाण्डव के विषय में सदा संयत वाणी आरम्भ की —

श्लोक 16 (4.31.16)

असत्सु दुर्लभां नित्यं सतां चाभिमतां सदा । भीष्मस्त्वभ्यवदत्तत्र गिरं साधुभिरर्चिताम् ॥

asatsu durlabhāṃ nityaṃ satāṃ cābhimatāṃ sadā | bhīṣmastvabhyavadattatra giraṃ sādhubhirarcitām

ऐसी वाणी जो दुष्टों में सदा दुर्लभ और सज्जनों को सदा प्रिय होती है। वहाँ भीष्म ने सज्जनों द्वारा आदृत यह वाणी कही —

भीष्म उवाच

श्लोक 17 (4.31.17)

यथा नो ब्राह्मणोऽवादीदाचार्यः सर्वधर्मवित् । श्रुतवृत्तोपसंपन्ना नाशं नायान्ति पाण्डवाः ॥

yathā no brāhmaṇo'vādīdācāryaḥ sarvadharmavit | śrutavṛttopasaṃpannā nāśaṃ nāyānti pāṇḍavāḥ

जैसा सब धर्मों के ज्ञाता ब्राह्मण आचार्य ने हमसे कहा है, विद्या और सदाचार से सम्पन्न पाण्डव नष्ट नहीं होते।

श्लोक 18 (4.31.18)

सर्वलक्षणसंपन्नाः साधुवृत्तसमन्विताः । वृद्धानुशासने यत्ताः सत्यधर्मपरायणाः ॥

sarvalakṣaṇasaṃpannāḥ sādhuvṛttasamanvitāḥ | vṛddhānuśāsane yattāḥ satyadharmaparāyaṇāḥ

वे सब शुभ लक्षणों से सम्पन्न और सदाचार से युक्त हैं; वृद्धों के अनुशासन में सावधान रहते हैं और सत्य तथा धर्म में निष्ठ हैं।

श्लोक 19 (4.31.19)

समयं समयज्ञास्ते पालयन्तः शुभव्रताः । न विषीदन्ति ते पार्था उद्वहन्तः सतां धुरम् ॥

samayaṃ samayajñāste pālayantaḥ śubhavratāḥ | na viṣīdanti te pārthā udvahantaḥ satāṃ dhuram

अपनी प्रतिज्ञा को जानने और उसका पालन करने वाले वे शुभव्रती पृथापुत्र सज्जनों का भार उठाते हुए कभी हताश नहीं होते।

श्लोक 20 (4.31.20)

तपसा चैव गुप्तास्ते स्ववीर्येण च पाण्डवाः । न नाशमभिगच्छेयुरिति मे नैष्ठिकी मतिः ॥

tapasā caiva guptāste svavīryeṇa ca pāṇḍavāḥ | na nāśamabhigaccheyuriti me naiṣṭhikī matiḥ

अपने तप और अपने पराक्रम से सुरक्षित पाण्डव विनाश को प्राप्त नहीं हो सकते — यह मेरा दृढ़ मत है।

श्लोक 21 (4.31.21)

क्षत्रधर्मरता नित्यं केशवानुगताः सदा । प्रवीरपुरुषास्ते वै महात्मानो महाबलाः ॥

kṣatradharmaratā nityaṃ keśavānugatāḥ sadā | pravīrapuruṣāste vai mahātmāno mahābalāḥ

वे सदा क्षत्रिय-धर्म में रत रहते हैं, सदा केशव के अनुगामी हैं; वे वीरों में श्रेष्ठ, महात्मा और महाबली हैं।

श्लोक 22 (4.31.22)

तत्र बुद्धिं प्रवक्ष्यामि पाण्डवान्वेषणे शृणु । न तु नीतिः सुनीतस्य शक्यते वेदितुं परैः ॥

tatra buddhiṃ pravakṣyāmi pāṇḍavānveṣaṇe śṛṇu | na tu nītiḥ sunītasya śakyate vedituṃ paraiḥ

इस विषय में पाण्डवों की खोज के सम्बन्ध में मैं अपना विचार बताता हूँ, सुनो। परन्तु जिसकी नीति उत्तम है, उसकी नीति को दूसरे नहीं जान सकते।

श्लोक 23 (4.31.23)

यत्तु शक्यमिहास्माभिस्तान्वै संचिन्त्य पाण्डवान् । बुद्ध्या प्रणेतुं तत्तेऽहं प्रवक्ष्यामि निबोध तत् ॥

yattu śakyamihāsmābhistānvai saṃcintya pāṇḍavān | buddhyā praṇetuṃ tatte'haṃ pravakṣyāmi nibodha tat

किन्तु उन पाण्डवों के विषय में सोचकर बुद्धि से जो कुछ हम यहाँ निकाल सकते हैं, वह मैं तुम्हें बताऊँगा; उसे समझो।

श्लोक 24 (4.31.24)

न त्वियं साधु वक्तव्या तस्य नीतिः कथंचन । वृद्धानुशासने तात तिष्ठतः सत्यशीलिनः ॥

na tviyaṃ sādhu vaktavyā tasya nītiḥ kathaṃcana | vṛddhānuśāsane tāta tiṣṭhataḥ satyaśīlinaḥ

परन्तु हे तात, जो वृद्धों के अनुशासन में स्थित है और सत्यशील है, उसकी इस नीति को किसी प्रकार भी प्रकट करना उचित नहीं है।

श्लोक 25 (4.31.25)

अयुक्तं तु मया वक्तुं तुल्या मे कुरुपाण्डवाः । निवासं पाण्डुपुत्राणां संचिन्त्य च वदाम्यहम् । बहुना किं प्रलापेन यतो धर्मस्ततो जयः ॥

ayuktaṃ tu mayā vaktuṃ tulyā me kurupāṇḍavāḥ | nivāsaṃ pāṇḍuputrāṇāṃ saṃcintya ca vadāmyaham | bahunā kiṃ pralāpena yato dharmastato jayaḥ

मेरे लिए यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि मेरे लिए कौरव और पाण्डव एक समान हैं; फिर भी पाण्डुपुत्रों के निवास के विषय में सोचकर मैं कहता हूँ। अधिक कहने से क्या लाभ? जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।

श्लोक 26 (4.31.26)

अवश्यं तु नियुक्तेन सभामध्ये विवक्षता । यथार्हमिह वक्तव्यं सर्वथा धर्मलिप्सया ॥

avaśyaṃ tu niyuktena sabhāmadhye vivakṣatā | yathārhamiha vaktavyaṃ sarvathā dharmalipsayā

फिर भी जिसे नियुक्त किया गया हो और जो सभा के बीच बोलना चाहता हो, उसे धर्म की कामना से यहाँ सर्वथा उचित बात ही कहनी चाहिए।

श्लोक 27 (4.31.27)

यत्र नाहं तथा मन्ये यथाऽन्ये मेनिरे जनाः । निवासं पाण्डुपुत्राणां शृणुष्व मनुजाधिप ॥

yatra nāhaṃ tathā manye yathā'nye menire janāḥ | nivāsaṃ pāṇḍuputrāṇāṃ śṛṇuṣva manujādhipa

इस विषय में मैं वैसा नहीं सोचता जैसा दूसरे लोगों ने सोचा है। हे मनुजाधिप, पाण्डुपुत्रों के निवास के विषय में सुनो।

श्लोक 28 (4.31.28)

भ्रातृभिः सहितो वीरैः कृष्णया च महायशाः । किमर्थं स महाराजो नात्मश्रेयो भविष्यति ॥

bhrātṛbhiḥ sahito vīraiḥ kṛṣṇayā ca mahāyaśāḥ | kimarthaṃ sa mahārājo nātmaśreyo bhaviṣyati

अपने वीर भाइयों और कृष्णा के साथ रहने वाले वे महायशस्वी महाराज अपना कल्याण क्यों नहीं कर पाएँगे?

श्लोक 29 (4.31.29)

पाण्डवो निकृतः पूर्वं यथावद्विदितं तव । क्लेशितश्च पुरे नित्यं राज्यकामैश्च सांप्रतम् । छन्नश्चरति तस्मात्स प्रकृत्या नीतिमान्नृपः ॥

pāṇḍavo nikṛtaḥ pūrvaṃ yathāvadviditaṃ tava | kleśitaśca pure nityaṃ rājyakāmaiśca sāṃpratam | channaścarati tasmātsa prakṛtyā nītimānnṛpaḥ

पाण्डव युधिष्ठिर के साथ पहले छल किया गया, यह तुम भली-भाँति जानते हो; नगर में भी उन्हें सदा सताया गया और अब राज्य के लोभियों द्वारा भी। इसलिए स्वभाव से नीतिमान वह राजा वेश बदलकर विचर रहे हैं।

श्लोक 30 (4.31.30)

वर्षमेकं सुसंच्छन्नमुष्य वासमनुत्तमम् । आयाति चोदये काले क्षिप्रं द्रक्ष्यसि पाण्डवम् ॥

varṣamekaṃ susaṃcchannamuṣya vāsamanuttamam | āyāti codaye kāle kṣipraṃ drakṣyasi pāṇḍavam

एक वर्ष तक भली-भाँति छिपकर उत्तम निवास करके समय आने पर वे लौट आएँगे, और तुम शीघ्र ही पाण्डव को देखोगे —

श्लोक 31 (4.31.31)

सोदरैः सहितं वीरं द्रौपद्या च परंतप । संविधत्स्व महाबाहो यथा नः स्यात्सुखोदयः ॥

sodaraiḥ sahitaṃ vīraṃ draupadyā ca paraṃtapa | saṃvidhatsva mahābāho yathā naḥ syātsukhodayaḥ

हे परंतप, अपने सगे भाइयों और द्रौपदी के साथ उस वीर को। हे महाबाहु, ऐसा प्रबन्ध करो जिससे हमारे लिए सुखद परिणाम निकले।

श्लोक 32 (4.31.32)

यस्मिन्स राजा वसति च्छन्नः सत्त्वभृतांवरः । भविष्यन्ति नरास्तत्र रागमोहविवर्जिताः ॥

yasminsa rājā vasati cchannaḥ sattvabhṛtāṃvaraḥ | bhaviṣyanti narāstatra rāgamohavivarjitāḥ

सत्त्ववानों में श्रेष्ठ वह राजा जहाँ छिपकर रहता है, वहाँ के लोग राग और मोह से रहित होंगे।

श्लोक 33 (4.31.33)

नाधयो हि महाराज न व्याधिः क्षत्रियर्षभ । पुरे जनपदे वाऽपि यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥

nādhayo hi mahārāja na vyādhiḥ kṣatriyarṣabha | pure janapade vā'pi yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ

हे महाराज, हे क्षत्रियश्रेष्ठ, जिस नगर या जनपद में राजा युधिष्ठिर हैं, वहाँ न मानसिक कष्ट होते हैं, न रोग।

श्लोक 34 (4.31.34)

दानशीलो वदान्यश्च निभृतो ह्रीनिषेवकः । प्रियवाक्सत्यवाक्शूरो धर्मशीलो जितेन्द्रियः । हृष्टः पुष्टः शुचिर्दक्षो यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥

dānaśīlo vadānyaśca nibhṛto hrīniṣevakaḥ | priyavāksatyavākśūro dharmaśīlo jitendriyaḥ | hṛṣṭaḥ puṣṭaḥ śucirdakṣo yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ

जहाँ राजा युधिष्ठिर हैं, वहाँ के लोग दानशील, उदार, विनम्र और लज्जाशील, प्रिय और सत्य बोलने वाले, शूर, धर्मपरायण और जितेन्द्रिय होते हैं; वे प्रसन्न, हृष्ट-पुष्ट, पवित्र और कुशल होते हैं।

श्लोक 35 (4.31.35)

नासूयको न चापीर्ष्युर्नाभिमानी न मत्सरी । भविष्यति जनस्तत्र स्वयं धर्ममनुव्रतः ॥

nāsūyako na cāpīrṣyurnābhimānī na matsarī | bhaviṣyati janastatra svayaṃ dharmamanuvrataḥ

वहाँ के लोग न दूसरों में दोष ढूँढ़ने वाले होंगे, न ईर्ष्यालु, न अभिमानी, न डाह करने वाले; वे स्वयं ही धर्म का पालन करेंगे।

श्लोक 36 (4.31.36)

ब्रह्मघोषाश्च भूयांसः पुण्यशब्दास्तथैव च । क्रतवश्च भविष्यन्ति भूयांसो भूरिदक्षिणाः ॥

brahmaghoṣāśca bhūyāṃsaḥ puṇyaśabdāstathaiva ca | kratavaśca bhaviṣyanti bhūyāṃso bhūridakṣiṇāḥ

वहाँ वेद-पाठ की ध्वनि बहुत होगी, पुण्य शब्द भी गूँजेंगे, और भरपूर दक्षिणा वाले बहुत-से यज्ञ होंगे।

श्लोक 37 (4.31.37)

सदा च तत्र पर्जन्यः सम्यग्वर्षी न संशयः । संपन्नसस्या च मही भविष्यति निरामया ॥

sadā ca tatra parjanyaḥ samyagvarṣī na saṃśayaḥ | saṃpannasasyā ca mahī bhaviṣyati nirāmayā

वहाँ मेघ सदा उचित वर्षा करेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं, और पृथ्वी अन्न से भरपूर तथा रोगरहित होगी।

श्लोक 38 (4.31.38)

रसवन्ति च धान्यानि गुणवन्ति फलानि च । गन्धवन्ति च माल्यानि शुभशब्दा च भारती ॥

rasavanti ca dhānyāni guṇavanti phalāni ca | gandhavanti ca mālyāni śubhaśabdā ca bhāratī

अन्न रसीले होंगे, फल गुणकारी होंगे, मालाएँ सुगन्धित होंगी और वाणी शुभ शब्दों से भरी होगी।

श्लोक 39 (4.31.39)

वायुश्च सुखसंस्पर्शो यत्र राजा युधिष्ठिरः । नीरोगास्तत्र विद्यन्ते वधबन्धा न सन्ति च ॥

vāyuśca sukhasaṃsparśo yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ | nīrogāstatra vidyante vadhabandhā na santi ca

जहाँ राजा युधिष्ठिर हैं, वहाँ वायु का स्पर्श सुखद होता है। वहाँ कोई रोगी नहीं होता, और न वध होता है न बन्धन।

श्लोक 40 (4.31.40)

न चोरा न च दण्डाश्च न च बाधा भवन्त्युत । नाशक्ता न च दुष्टाश्च यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥

na corā na ca daṇḍāśca na ca bādhā bhavantyuta | nāśaktā na ca duṣṭāśca yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ

जहाँ राजा युधिष्ठिर हैं, वहाँ न चोर होते हैं, न दण्ड, न कोई बाधा; वहाँ न कोई असहाय होता है, न दुष्ट।

श्लोक 41 (4.31.41)

भयं च नाविशेत्तत्र निष्प्रतीपं च दर्शनम् । बहुक्षीरास्तथा गावः सुपुष्टाश्च सुदोहनाः ॥

bhayaṃ ca nāviśettatra niṣpratīpaṃ ca darśanam | bahukṣīrāstathā gāvaḥ supuṣṭāśca sudohanāḥ

वहाँ भय प्रवेश नहीं करता और कुछ भी प्रतिकूल दिखाई नहीं देता। वहाँ की गायें बहुत दूध देने वाली, खूब पुष्ट और सहज दुही जाने वाली होती हैं।

श्लोक 42 (4.31.42)

पयांसि दधिसर्पींषि रसवन्ति हितानि च । सलिलानि प्रसन्नानि सर्वे भावाश्च शोभनाः ॥

payāṃsi dadhisarpīṃṣi rasavanti hitāni ca | salilāni prasannāni sarve bhāvāśca śobhanāḥ

दूध, दही और घी रसीले और हितकारी होते हैं; जल निर्मल होता है और सभी पदार्थ सुन्दर होते हैं।

श्लोक 43 (4.31.43)

गुणवन्ति च पानानि भोज्यानि विविधानि च । तत्र देशे भविष्यन्ति यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥

guṇavanti ca pānāni bhojyāni vividhāni ca | tatra deśe bhaviṣyanti yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ

जिस देश में राजा युधिष्ठिर हैं, वहाँ उत्तम पेय और अनेक प्रकार के भोजन होंगे।

श्लोक 44 (4.31.44)

रसाः स्पर्शाश्च गन्धाश्च शब्दाश्चापि गुणान्विताः । दृश्यानि च प्रसन्नानि यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥

rasāḥ sparśāśca gandhāśca śabdāścāpi guṇānvitāḥ | dṛśyāni ca prasannāni yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ

जहाँ राजा युधिष्ठिर हैं, वहाँ रस, स्पर्श, गन्ध और शब्द सभी उत्तम गुणों से युक्त होते हैं, और दृश्य निर्मल तथा मनोहर होते हैं।

श्लोक 45 (4.31.45)

धर्माश्च तत्र सर्वैस्तु सेविताश्च द्विजातिभिः । स्वैःस्वैर्गुणैश्च संयुक्तास्तस्मिन्वर्षे त्रयोदशे । देशे तस्मिन्भविष्यन्ति तात पाण्डवसंश्रिते ॥

dharmāśca tatra sarvaistu sevitāśca dvijātibhiḥ | svaiḥsvairguṇaiśca saṃyuktāstasminvarṣe trayodaśe | deśe tasminbhaviṣyanti tāta pāṇḍavasaṃśrite

वहाँ सभी द्विज धर्म के सब कर्तव्यों का पालन करते हैं; और हे तात, उस तेरहवें वर्ष में, जिस देश में पाण्डवों ने आश्रय लिया है, वहाँ सभी धर्म अपने-अपने गुणों से युक्त होकर फलेंगे-फूलेंगे।

श्लोक 46 (4.31.46)

संप्रीतिमाञ्जनस्तत्र संतुष्टः शुचिरव्ययः । देवतातिथिभूयांस्तु सर्वभूतानुरागवान् ॥

saṃprītimāñjanastatra saṃtuṣṭaḥ śuciravyayaḥ | devatātithibhūyāṃstu sarvabhūtānurāgavān

वहाँ के लोग प्रीति से भरे, सन्तुष्ट, पवित्र और अविचल होते हैं; देवताओं और अतिथियों के सत्कार में बढ़-चढ़कर रहते हैं और सब प्राणियों से प्रेम करते हैं।

श्लोक 47 (4.31.47)

इष्टदानमहोत्साहा नित्यं धर्मपरायणाः । व्यक्तवाक्यास्ततस्तात शुभकल्याणमङ्गलाः ॥

iṣṭadānamahotsāhā nityaṃ dharmaparāyaṇāḥ | vyaktavākyāstatastāta śubhakalyāṇamaṅgalāḥ

वे मनचाहा दान देने वाले, बड़े उत्साही और सदा धर्मपरायण होते हैं; हे तात, वे स्पष्ट वाणी बोलने वाले और शुभ, कल्याणकारी तथा मंगलमय होते हैं।

श्लोक 48 (4.31.48)

शुभत्विषः शुभेच्छाश्च नित्यतुष्टाः श्रियाऽन्विताः । भविष्यन्ति जनास्तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥

śubhatviṣaḥ śubhecchāśca nityatuṣṭāḥ śriyā'nvitāḥ | bhaviṣyanti janāstatra yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ

जहाँ राजा युधिष्ठिर हैं, वहाँ के लोग शुभ कान्ति वाले, शुभ की कामना करने वाले, सदा सन्तुष्ट और श्री से सम्पन्न होंगे।

श्लोक 49 (4.31.49)

नित्योत्सवप्रमुदितो नित्यहृष्टः श्रिया वृतः । भविष्यति निवासोऽयं यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥

nityotsavapramudito nityahṛṣṭaḥ śriyā vṛtaḥ | bhaviṣyati nivāso'yaṃ yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ

जहाँ राजा युधिष्ठिर हैं, वह निवास-स्थान सदा उत्सवों से आनन्दित, सदा हर्षित और श्री से घिरा रहेगा।

श्लोक 50 (4.31.50)

धर्मज्ञः स तु दुर्ज्ञेयः सर्वज्ञैश्च द्विजातिभिः । किंपुनः प्राकृतैस्तात पार्थो विज्ञायते क्वचित् ॥

dharmajñaḥ sa tu durjñeyaḥ sarvajñaiśca dvijātibhiḥ | kiṃpunaḥ prākṛtaistāta pārtho vijñāyate kvacit

वे धर्मज्ञ सर्वज्ञ ब्राह्मणों के लिए भी दुर्ज्ञेय हैं; फिर हे तात, साधारण लोग उन पृथापुत्र को कहीं कैसे पहचान सकते हैं?

श्लोक 51 (4.31.51)

यस्मिन्सत्यं धृतिर्दानं परा शान्तिर्ध्रुवा क्षमा । ह्रीः श्रीः कीर्तिः परं तेज आनृशंस्यमथार्जवम् ॥

yasminsatyaṃ dhṛtirdānaṃ parā śāntirdhruvā kṣamā | hrīḥ śrīḥ kīrtiḥ paraṃ teja ānṛśaṃsyamathārjavam

उनमें सत्य, धैर्य, दान, परम शान्ति, अटल क्षमा, लज्जा, श्री, कीर्ति, परम तेज, दयालुता और सरलता निवास करती हैं।

श्लोक 52 (4.31.52)

तस्मान्निवासः पार्थानां चिन्त्यतां यद्ब्रवीमि वः । गतिर्वा परमा तत्र नोत्सहे वक्तुमन्यथा ॥

tasmānnivāsaḥ pārthānāṃ cintyatāṃ yadbravīmi vaḥ | gatirvā paramā tatra notsahe vaktumanyathā

इसलिए मैं जैसा कहता हूँ, उसी के अनुसार पृथापुत्रों के निवास का विचार करो; उनका परम आश्रय वहीं होगा। मैं इससे भिन्न कुछ नहीं कह सकता।

श्लोक 53 (4.31.53)

एवमेतत्तु संचिन्त्य यत्कृत्यं साधु मन्यसे । तत्क्षिप्रं कुरु कौरव्य यद्येतच्छ्रद्दधासि मे । कुलस्य हि क्षमं तात यदहं प्रब्रवीमि ते ॥

evametattu saṃcintya yatkṛtyaṃ sādhu manyase | tatkṣipraṃ kuru kauravya yadyetacchraddadhāsi me | kulasya hi kṣamaṃ tāta yadahaṃ prabravīmi te

हे कौरव्य, यदि तुम्हें मेरी बात पर श्रद्धा है, तो इस पर भली-भाँति विचार करके जो उचित समझो, वह शीघ्र करो। हे तात, मैं जो कह रहा हूँ, वह कुल के हित में है।

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