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विराट पर्व · अध्याय 32

मत्स्य देश पर गोहरण का दुर्योधन का निश्चय

कृप भीष्म की सलाह का समर्थन करते हुए दुर्योधन से कहते हैं कि पाण्डवों के अज्ञातवास की अवधि पूरी होने से पहले वह अपनी सेना, कोष और मित्रता को दृढ़ कर ले। दुर्योधन तर्क करता है कि कीचक को बिना शस्त्र के केवल भीम ही मार सकता था, इसलिए पाण्डव विराटनगर में छिपे हैं, और वह मत्स्य देश की गायें छीनने का प्रस्ताव रखता है — या तो पाण्डव अवधि से पहले प्रकट होकर फिर बारह वर्षों के लिए वन जाएँगे, या कौरवों को धन मिलेगा। विराट और कीचक से बार-बार सताए गए त्रिगर्तराज सुशर्मा चढ़ाई का आग्रह करते हैं और कर्ण सहमति देता है; तब दुर्योधन दोहरे आक्रमण का आदेश देता है — सुशर्मा कृष्णपक्ष की अष्टमी को गायें पकड़ते हैं और नवमी को कौरव और झुण्ड छीन लेते हैं।

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.32.1)

ततः शारद्वतो वाक्यमित्युवाच कृपस्तदा । युक्तं प्राप्तं च वृद्धेन पाण्डवान्प्रति भाषितम् ॥

tataḥ śāradvato vākyamityuvāca kṛpastadā | yuktaṃ prāptaṃ ca vṛddhena pāṇḍavānprati bhāṣitam

तब शरद्वान् के पुत्र कृप ने यह वचन कहा — "वृद्ध भीष्म ने पाण्डवों के विषय में जो कहा है, वह उचित और समयानुकूल है।"

कृप उवाच

श्लोक 2 (4.32.2)

धर्मार्थसहितं श्लक्ष्णं सर्वं सत्यं सहेतुकम् । तत्रानुरूपं भीष्मस्य ममापि वचनं शृणु ॥

dharmārthasahitaṃ ślakṣṇaṃ sarvaṃ satyaṃ sahetukam | tatrānurūpaṃ bhīṣmasya mamāpi vacanaṃ śṛṇu

वह धर्म और अर्थ से युक्त, मधुर, पूर्णतः सत्य और युक्तिसंगत है। अब भीष्म के कथन के अनुरूप मेरी बात भी सुनो।

श्लोक 3 (4.32.3)

तेषां चैव गतिस्तत्र निवासश्चानुचिन्त्यताम् । नीतिर्विधीयतां तत्र सांप्रतं या हिता भवेत् ॥

teṣāṃ caiva gatistatra nivāsaścānucintyatām | nītirvidhīyatāṃ tatra sāṃprataṃ yā hitā bhavet

उनकी गति और वहाँ उनके निवास पर भली-भाँति विचार किया जाए, और अभी ऐसी नीति अपनाई जाए जो हितकर हो।

श्लोक 4 (4.32.4)

नावज्ञेयो रिपुस्तात प्राकृतोऽपि बुभूषता । किं पुनः पाण्डवाः शूरा विद्वांसो बलिनस्तथा ॥

nāvajñeyo ripustāta prākṛto'pi bubhūṣatā | kiṃ punaḥ pāṇḍavāḥ śūrā vidvāṃso balinastathā

वत्स, जो उन्नति चाहता है उसे साधारण शत्रु की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए; फिर पाण्डव तो शूर, विद्वान और बलवान हैं, उनकी तो बात ही क्या!

श्लोक 5 (4.32.5)

तस्मात्सत्रं प्रविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु । गूढभावेषु छन्नेषु काले चोदयमागते ॥

tasmātsatraṃ praviṣṭeṣu pāṇḍaveṣu mahātmasu | gūḍhabhāveṣu channeṣu kāle codayamāgate

इसलिए जब महात्मा पाण्डव छिपकर रह रहे हैं, उनका स्वभाव गूढ़ है और वे वेश बदले हुए हैं, और उनके प्रकट होने का समय आ पहुँचा है,

श्लोक 6 (4.32.6)

स्वराष्ट्रे परराष्ट्रे च ज्ञातव्यं बलमात्मनः । उदयः पाण्डवानां च प्राप्तकालो न संशयः ॥

svarāṣṭre pararāṣṭre ca jñātavyaṃ balamātmanaḥ | udayaḥ pāṇḍavānāṃ ca prāptakālo na saṃśayaḥ

तब तुम्हें अपने राज्य में भी और पराये राज्यों में भी अपनी शक्ति को जान लेना चाहिए। पाण्डवों के उदय का समय निश्चय ही आ गया है।

श्लोक 7 (4.32.7)

निवृत्तसमयाः पार्था महात्मानो महाबलाः । महोत्साहा भविष्यन्ति पाण्डवा ह्यमितौजसः ॥

nivṛttasamayāḥ pārthā mahātmāno mahābalāḥ | mahotsāhā bhaviṣyanti pāṇḍavā hyamitaujasaḥ

प्रतिज्ञा की अवधि पूरी होने पर महात्मा, महाबली और अपार तेज वाले पृथापुत्र पाण्डव बड़े उत्साह से भर उठेंगे।

श्लोक 8 (4.32.8)

तस्माद्बलं च कोशं च नीतिश्चापि विधीयताम् । यथा कालोदये प्राप्ते सम्यक् तैः संदधामहे ॥

tasmādbalaṃ ca kośaṃ ca nītiścāpi vidhīyatām | yathā kālodaye prāpte samyak taiḥ saṃdadhāmahe

इसलिए सेना, कोष और नीति — तीनों को व्यवस्थित किया जाए, जिससे उनके उदय का समय आने पर हम उनसे भली-भाँति सन्धि कर सकें।

श्लोक 9 (4.32.9)

यत्र यन्मन्यसे श्रेयो बुध्यस्व बलमात्मनः । नियतं सर्वमित्रेषु बलवत्स्वबलेषु च ॥

yatra yanmanyase śreyo budhyasva balamātmanaḥ | niyataṃ sarvamitreṣu balavatsvabaleṣu ca

जहाँ तुम्हें अपना हित दिखे, वहाँ अपनी शक्ति को परखो — अपने सभी मित्रों में, बलवानों में भी और निर्बलों में भी, वह कितनी दृढ़ है।

श्लोक 10 (4.32.10)

सारं फल्गु बलं ज्ञात्वा मध्यस्थं चापि भारत । स्वराष्ट्रपरराष्ट्रेषु ज्ञातव्यं बलमात्मनः ॥

sāraṃ phalgu balaṃ jñātvā madhyasthaṃ cāpi bhārata | svarāṣṭrapararāṣṭreṣu jñātavyaṃ balamātmanaḥ

हे भारत, कौन-सी सेना सारवान है, कौन-सी निःसार और कौन तटस्थ है — यह जानकर अपने और पराये राज्यों में अपनी शक्ति को पहचानना चाहिए।

श्लोक 11 (4.32.11)

अप्रहृष्टं प्रहृष्टं वा संदधाम तथा परैः । साम्ना दानेन भेदेन दण्डेन बलिकर्मणा ॥

aprahṛṣṭaṃ prahṛṣṭaṃ vā saṃdadhāma tathā paraiḥ | sāmnā dānena bhedena daṇḍena balikarmaṇā

चाहे दूसरे असन्तुष्ट हों या प्रसन्न, उन्हें इसी प्रकार अपने साथ जोड़ें — साम से, दान से, भेद से, दण्ड से और कर लेकर।

श्लोक 12 (4.32.12)

न्यायेनाक्रम्य च परान्बलाच्चानम्य दुर्बलान् । सान्त्वयित्वा च मित्राणि बलं चाभाष्यतां सुखम् ॥

nyāyenākramya ca parānbalāccānamya durbalān | sāntvayitvā ca mitrāṇi balaṃ cābhāṣyatāṃ sukham

शत्रुओं को नीति से दबाओ, निर्बलों को बल से झुकाओ, मित्रों को सान्त्वना दो, और अपनी सेना से मधुर वचन बोलो।

श्लोक 13 (4.32.13)

स्वकोशबलसंवृद्धः सम्यक्सिद्धिमवाप्स्यसि । योत्स्यसे चापि बलिभिररिभिः प्रत्युपस्थितैः । अन्यैस्त्वं पाण्डवैर्वाऽपि हीनैः स्वबलवाहनैः ॥

svakośabalasaṃvṛddhaḥ samyaksiddhimavāpsyasi | yotsyase cāpi balibhiraribhiḥ pratyupasthitaiḥ | anyaistvaṃ pāṇḍavairvā'pi hīnaiḥ svabalavāhanaiḥ

अपने कोष और सेना से समृद्ध होकर तुम पूर्ण सफलता पाओगे। तब तुम सामने आए बलवान शत्रुओं से भी युद्ध कर सकोगे और दूसरों से भी — या उन पाण्डवों से भी, जो अपनी सेना और वाहनों से रहित हैं।

श्लोक 14 (4.32.14)

एवं सर्वं विनिश्चित्य व्यवहर्तासि न्यायतः । यथाकालं मनुष्येन्द्र चिरं सुखमवाप्स्यसि ॥

evaṃ sarvaṃ viniścitya vyavahartāsi nyāyataḥ | yathākālaṃ manuṣyendra ciraṃ sukhamavāpsyasi

हे नरेन्द्र, इस प्रकार सब कुछ निश्चित करके तुम समयानुसार न्यायपूर्वक व्यवहार करोगे और दीर्घकाल तक सुख पाओगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (4.32.15)

भीष्मद्रोणकृपैरुक्ते कर्णदुःशासनादिभिः । ततो दुर्योधनो वाक्यं श्रुत्वा तेषां महात्मनाम् । मुहूर्तमनुसंचिन्त्य सचिवानिदमब्रवीत् ॥

bhīṣmadroṇakṛpairukte karṇaduḥśāsanādibhiḥ | tato duryodhano vākyaṃ śrutvā teṣāṃ mahātmanām | muhūrtamanusaṃcintya sacivānidamabravīt

जब भीष्म, द्रोण, कृप तथा कर्ण, दुःशासन आदि अपनी बात कह चुके, तब उन महात्माओं के वचन सुनकर दुर्योधन ने क्षण भर विचार किया और अपने मन्त्रियों से यह कहा —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 16 (4.32.16)

श्रुतमेतन्मया पूर्वं कथासु जनसंसदि । धीराणां शास्त्रविदुषां प्राज्ञानां मतिनिश्चये । कृतिनां सारफल्गुत्वे जानामि नयचक्षुषा ॥

śrutametanmayā pūrvaṃ kathāsu janasaṃsadi | dhīrāṇāṃ śāstraviduṣāṃ prājñānāṃ matiniścaye | kṛtināṃ sāraphalgutve jānāmi nayacakṣuṣā

मैंने पहले जनसभाओं की चर्चाओं में और धीर, शास्त्रज्ञ, बुद्धिमान लोगों के निश्चित मतों में यह सुना है, और नीति की दृष्टि से मैं कुशल पुरुषों का बल-अबल पहचानता हूँ।

श्लोक 17 (4.32.17)

सत्त्वे बाहुबले धैर्ये प्राणे शारीरसंभवे । सांप्रतं मानुषे लोके सदैत्यनरराक्षसे ॥

sattve bāhubale dhairye prāṇe śārīrasaṃbhave | sāṃprataṃ mānuṣe loke sadaityanararākṣase

सत्त्व, भुजबल, धैर्य और शरीर से उत्पन्न प्राणशक्ति में, आज इस मनुष्यलोक में — दैत्यों, मनुष्यों और राक्षसों समेत —

श्लोक 18 (4.32.18)

चत्वारस्तु नरव्याघ्रा बले शक्रोपमा भुवि । उत्तमाः प्राणिनां तेषां नास्ति कश्चिद्बले समः ॥

catvārastu naravyāghrā bale śakropamā bhuvi | uttamāḥ prāṇināṃ teṣāṃ nāsti kaścidbale samaḥ

पृथ्वी पर चार नरव्याघ्र हैं जो बल में इन्द्र के समान हैं; वे प्राणियों में श्रेष्ठ हैं और बल में उनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता —

श्लोक 19 (4.32.19)

बलदेवश्च भीमश्च मद्रराजश्च वीर्यवान् । चतुर्थः कीचकस्तेषां पञ्चमं नानुशुश्रुमः ॥

baladevaśca bhīmaśca madrarājaśca vīryavān | caturthaḥ kīcakasteṣāṃ pañcamaṃ nānuśuśrumaḥ

बलदेव, भीम, पराक्रमी मद्रराज और चौथा कीचक। पाँचवें के विषय में हमने कभी नहीं सुना।

श्लोक 20 (4.32.20)

अन्योन्यानन्तरबलाः परस्परजयैषिणः । बाहुयुद्धमभीप्सन्तो नित्यं संरब्धमानसाः ॥

anyonyānantarabalāḥ parasparajayaiṣiṇaḥ | bāhuyuddhamabhīpsanto nityaṃ saṃrabdhamānasāḥ

उनका बल लगभग एक-सा है; वे एक-दूसरे को जीतना चाहते हैं, सदा बाहुयुद्ध के इच्छुक रहते हैं और उनके मन सदा उत्तेजित रहते हैं।

श्लोक 21 (4.32.21)

तेनाहमवगच्छामि प्रत्ययेन वृकोदरम् । मनस्यभिनिविष्टं मे व्यक्तं जीवन्ति पाण्डवाः ॥

tenāhamavagacchāmi pratyayena vṛkodaram | manasyabhiniviṣṭaṃ me vyaktaṃ jīvanti pāṇḍavāḥ

इसी प्रमाण से मैं वृकोदर को पहचानता हूँ; यह विचार मेरे मन में बैठ गया है। स्पष्ट है कि पाण्डव जीवित हैं।

श्लोक 22 (4.32.22)

तत्राहं कीचकं मन्ये भीमसेनेन मारितम् । सैरन्ध्रीं द्रौपदीं मन्ये नात्र कार्या विचारणा ॥

tatrāhaṃ kīcakaṃ manye bhīmasenena māritam | sairandhrīṃ draupadīṃ manye nātra kāryā vicāraṇā

मेरा मानना है कि वहाँ कीचक को भीमसेन ने मारा है, और सैरन्ध्री द्रौपदी ही है — इसमें विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं।

श्लोक 23 (4.32.23)

शङ्के कृष्णानिमित्तं तु भीमसेनेन कीचकः । गन्धर्वव्यपदेशेन हतो निशि महाबलः ॥

śaṅke kṛṣṇānimittaṃ tu bhīmasenena kīcakaḥ | gandharvavyapadeśena hato niśi mahābalaḥ

मुझे सन्देह है कि कृष्णा के कारण ही भीमसेन ने गन्धर्वों के बहाने रात में महाबली कीचक का वध किया।

श्लोक 24 (4.32.24)

को हि शक्तः परो भीमात्कीचकं हन्तुमोजसा । शस्त्रं विना बाहुबलात्तथा सर्वाङ्गचूर्णने ॥

ko hi śaktaḥ paro bhīmātkīcakaṃ hantumojasā | śastraṃ vinā bāhubalāttathā sarvāṅgacūrṇane

भीम के सिवा और कौन ऐसा समर्थ है जो बिना शस्त्र के, केवल भुजबल से, सारे अंग चूर-चूर करके अपने ओज से कीचक को मार सके,

श्लोक 25 (4.32.25)

मर्दितुं वा तथा तीव्रं चर्ममांसास्थिचूर्णनम् । रूपमन्यत्समास्थाय भीमस्यैतद्विचेष्टितम् ॥

mardituṃ vā tathā tīvraṃ carmamāṃsāsthicūrṇanam | rūpamanyatsamāsthāya bhīmasyaitadviceṣṭitam

या उसे इतनी भयंकरता से मसलकर उसकी चमड़ी, मांस और हड्डियाँ पीस डाले? दूसरा रूप धारण करके यह भीम का ही किया हुआ काम है।

श्लोक 26 (4.32.26)

ध्रुवं कृष्णानिमित्तं तु भीमसेनेन सूतजाः । गन्धर्वव्यपदेशेन हता निशि न संशयः ॥

dhruvaṃ kṛṣṇānimittaṃ tu bhīmasenena sūtajāḥ | gandharvavyapadeśena hatā niśi na saṃśayaḥ

निश्चय ही कृष्णा के कारण भीमसेन ने गन्धर्वों के बहाने रात में सूतपुत्रों का वध किया; इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 27 (4.32.27)

पितामहेन ये चोक्ता देशस्य च जनस्य च । गुणास्ते मत्स्यराष्ट्रेषु बहुशोऽपि मया श्रुताः ॥

pitāmahena ye coktā deśasya ca janasya ca | guṇāste matsyarāṣṭreṣu bahuśo'pi mayā śrutāḥ

पितामह ने देश और प्रजा के जो गुण बताए थे, वे मत्स्य राज्य के विषय में मैंने बार-बार सुने हैं।

श्लोक 28 (4.32.28)

विराटनगरे मन्ये पाण्डवाश्छन्नचारिणः । निवसन्ति पुरे रम्ये तत्र यात्रा विधीयताम् ॥

virāṭanagare manye pāṇḍavāśchannacāriṇaḥ | nivasanti pure ramye tatra yātrā vidhīyatām

मेरा मानना है कि पाण्डव छिपे वेश में विराट के रमणीय नगर में रह रहे हैं। वहीं चढ़ाई की जाए।

श्लोक 29 (4.32.29)

मत्स्यराष्ट्रं गमिष्यामो ग्रहीष्यामश्च गोधनम् । गृहीते गोधने नूनं तेऽपि योत्स्यन्ति पाण्डवाः ॥

matsyarāṣṭraṃ gamiṣyāmo grahīṣyāmaśca godhanam | gṛhīte godhane nūnaṃ te'pi yotsyanti pāṇḍavāḥ

हम मत्स्य राज्य पर चलेंगे और उसका गोधन छीन लेंगे। गोधन छिन जाने पर पाण्डव भी निश्चय ही युद्ध करेंगे।

श्लोक 30 (4.32.30)

अपूर्णे समये चापि यदि पश्येम पाण्डवान् । द्वादशान्यानि वर्षाणि प्रवेक्ष्यन्ति पुनर्वनम् ॥

apūrṇe samaye cāpi yadi paśyema pāṇḍavān | dvādaśānyāni varṣāṇi pravekṣyanti punarvanam

और यदि अवधि पूरी होने से पहले ही हम पाण्डवों को देख लें, तो वे फिर बारह वर्षों के लिए वन में जाएँगे।

श्लोक 31 (4.32.31)

तस्मादन्यतरेणापि लाभोऽस्माकं भविष्यति । कोशवृद्धिरिहास्माकं शत्रूणां निधनं भवेत् ॥

tasmādanyatareṇāpi lābho'smākaṃ bhaviṣyati | kośavṛddhirihāsmākaṃ śatrūṇāṃ nidhanaṃ bhavet

इसलिए दोनों में से किसी भी स्थिति में हमारा लाभ होगा — या तो यहाँ हमारा कोष बढ़ेगा, या शत्रुओं का नाश होगा।

श्लोक 32 (4.32.32)

कथं सुयोधनं गच्छेद्युधिष्ठिरभृतः पुरा । एतच्चापि वदत्येष मात्स्यः परिभवान्मयि ॥

kathaṃ suyodhanaṃ gacchedyudhiṣṭhirabhṛtaḥ purā | etaccāpi vadatyeṣa mātsyaḥ paribhavānmayi

"जिसने युधिष्ठिर का भरण-पोषण किया हो, वह सुयोधन के पास कैसे जाए?" — यह बात भी मत्स्यराज मेरा तिरस्कार करते हुए कहता है।

श्लोक 33 (4.32.33)

तस्मात्कर्तव्यमेतद्वै तत्र यात्रा विधीयताम् । एतत्सुनीतं मन्येऽहं सर्वेषां यदि रोचते ॥

tasmātkartavyametadvai tatra yātrā vidhīyatām | etatsunītaṃ manye'haṃ sarveṣāṃ yadi rocate

इसलिए यही करना चाहिए — वहाँ चढ़ाई की जाए। यदि आप सबको अच्छा लगे, तो मैं इसे उत्तम नीति मानता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 34 (4.32.34)

ततो राजा त्रिगर्तानां सुशर्मा रथयूथपः । पूर्वमाभाष्य कर्णेन तथा दुःशासनेन च । प्राप्तकालमिदं वाक्यमुवाच त्वरितो बली ॥

tato rājā trigartānāṃ suśarmā rathayūthapaḥ | pūrvamābhāṣya karṇena tathā duḥśāsanena ca | prāptakālamidaṃ vākyamuvāca tvarito balī

तब रथसमूहों के नायक, त्रिगर्तों के बलवान राजा सुशर्मा ने पहले कर्ण और दुःशासन से बात करके शीघ्रता से यह समयोचित वचन कहा।

श्लोक 35 (4.32.35)

असकृन्निकृतः पूर्वं मात्स्यसाल्वेयकेकयैः । सूतेनैव च मात्स्यस्य कीचकेन पुनः पुनः ॥

asakṛnnikṛtaḥ pūrvaṃ mātsyasālveyakekayaiḥ | sūtenaiva ca mātsyasya kīcakena punaḥ punaḥ

वह पहले बार-बार मत्स्यों, साल्वेयों और केकयों द्वारा, और मत्स्यराज के सूत कीचक द्वारा भी बार-बार सताया गया था;

श्लोक 36 (4.32.36)

बाधितो बन्धुभिः सार्धं बलाद्बलवता विभो । स कर्णमभिवीक्ष्याथ दुर्योधनमभाषत ॥

bādhito bandhubhiḥ sārdhaṃ balādbalavatā vibho | sa karṇamabhivīkṣyātha duryodhanamabhāṣata

हे प्रभो, उस बलवान ने उसे और उसके बन्धुओं को बलपूर्वक पीड़ित किया था। उसने कर्ण की ओर देखकर दुर्योधन से कहा —

सुशर्मोवाच

श्लोक 37 (4.32.37)

राष्ट्रं ममासकृद्राजन्राज्ञा मात्स्येन बाधितम् ॥

rāṣṭraṃ mamāsakṛdrājanrājñā mātsyena bādhitam

हे राजन्, मत्स्यराज ने मेरे राज्य को बार-बार पीड़ित किया है।

श्लोक 38 (4.32.38)

प्रणेता कीचकस्तस्य बलोत्सिक्तोऽभवत्पुरा । अमर्षी दुर्जयो जेता प्रख्यातबलपौरुषः । स हतस्तत्र गन्धर्वैः पापकर्मा नृशंसकृत् ॥

praṇetā kīcakastasya balotsikto'bhavatpurā | amarṣī durjayo jetā prakhyātabalapauruṣaḥ | sa hatastatra gandharvaiḥ pāpakarmā nṛśaṃsakṛt

उसका सेनानायक कीचक था, जो पहले अपने बल के मद में चूर रहता था — क्रोधी, दुर्जय, विजयी और बल-पौरुष के लिए विख्यात। वह पापी और क्रूरकर्मा वहाँ गन्धर्वों द्वारा मारा गया है।

श्लोक 39 (4.32.39)

तस्मिन्विनिहते राजन्हीनदर्पो निराश्रयः । भविष्यति निरुत्साहो विराट इति मे मतिः ॥

tasminvinihate rājanhīnadarpo nirāśrayaḥ | bhaviṣyati nirutsāho virāṭa iti me matiḥ

हे राजन्, उसके मारे जाने से विराट का दर्प टूट गया है और वह निराश्रय हो गया है; मेरा विचार है कि अब वह उत्साहहीन हो जाएगा।

श्लोक 40 (4.32.40)

तत्र यात्रा मम मता यदि ते रोचतेऽनघ । कौरवाणां च सर्वेषां कर्णस्य च महात्मनः ॥

tatra yātrā mama matā yadi te rocate'nagha | kauravāṇāṃ ca sarveṣāṃ karṇasya ca mahātmanaḥ

इसलिए, हे निष्पाप, यदि आपको, सभी कौरवों को और महात्मा कर्ण को अच्छा लगे, तो मेरी राय में वहाँ चढ़ाई करनी चाहिए।

श्लोक 41 (4.32.41)

एतत्कार्यमहं मन्ये परमात्ययिकं महत् । राष्ट्रं तस्याभियास्यामो धनधान्यसमाकुलम् ॥

etatkāryamahaṃ manye paramātyayikaṃ mahat | rāṣṭraṃ tasyābhiyāsyāmo dhanadhānyasamākulam

मैं इसे एक बड़ा और अत्यन्त आवश्यक कार्य मानता हूँ। हम उसके धन-धान्य से भरे राज्य पर चढ़ाई करें।

श्लोक 42 (4.32.42)

आददामोऽस्य रत्नानि विविधानि वसूनि च । ग्रामान्राष्ट्राणि वा तस्य हरिष्यामो विभागशः ॥

ādadāmo'sya ratnāni vividhāni vasūni ca | grāmānrāṣṭrāṇi vā tasya hariṣyāmo vibhāgaśaḥ

हम उसके रत्न और नाना प्रकार का धन ले लें, या उसके गाँवों और प्रदेशों को हरकर आपस में बाँट लें।

श्लोक 43 (4.32.43)

अथवा गोसहस्राणि बहूनि शुभदर्शन । विविधानि हरिष्यामः प्रतिपीड्य पुरं बलात् ॥

athavā gosahasrāṇi bahūni śubhadarśana | vividhāni hariṣyāmaḥ pratipīḍya puraṃ balāt

अथवा, हे सुदर्शन, बलपूर्वक उसके नगर को दबाकर हम उसकी नाना प्रकार की हज़ारों गायें हर ले चलें।

श्लोक 44 (4.32.44)

कौरवैः सह संगम्य त्रिगर्तैश्च विशांपते । गास्तस्यापहरिष्यामः सह सर्वैर्महारथैः ॥

kauravaiḥ saha saṃgamya trigartaiśca viśāṃpate | gāstasyāpahariṣyāmaḥ saha sarvairmahārathaiḥ

हे प्रजानाथ, कौरव और त्रिगर्त मिलकर सब महारथियों के साथ उसकी गायें हर लेंगे।

श्लोक 45 (4.32.45)

सन्धिं वा तेन कृत्वा तु निबध्नीमोऽस्य पौरुषम् । हत्वा चास्य चमूं कृत्स्नां वशमेवानयामहे ॥

sandhiṃ vā tena kṛtvā tu nibadhnīmo'sya pauruṣam | hatvā cāsya camūṃ kṛtsnāṃ vaśamevānayāmahe

या उससे सन्धि करके उसके पौरुष को बाँध देंगे, या उसकी सारी सेना को नष्ट करके उसे अपने वश में कर लेंगे।

श्लोक 46 (4.32.46)

तं वशे न्यायतः कृत्वा सुखं वत्स्यामहे वयम् । भवतां बलवृद्धिश्च भविष्यति न संशयः ॥

taṃ vaśe nyāyataḥ kṛtvā sukhaṃ vatsyāmahe vayam | bhavatāṃ balavṛddhiśca bhaviṣyati na saṃśayaḥ

उसे न्यायपूर्वक वश में करके हम सुख से रहेंगे, और आपकी शक्ति भी निःसन्देह बढ़ेगी।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 47 (4.32.47)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कर्णो राजानमब्रवीत् ॥

tacchrutvā vacanaṃ tasya karṇo rājānamabravīt

उसके वचन सुनकर कर्ण ने राजा से कहा —

कर्ण उवाच

श्लोक 48 (4.32.48)

सूक्तं सुशर्मणा वाक्यं प्राप्तकालमिदं वचः । तस्मात्क्षिप्रं विनिर्यामो योजयित्वा वरूथिनीम् ॥

sūktaṃ suśarmaṇā vākyaṃ prāptakālamidaṃ vacaḥ | tasmātkṣipraṃ viniryāmo yojayitvā varūthinīm

सुशर्मा ने ठीक कहा है; यह वचन समयोचित है। इसलिए सेना सजाकर हम शीघ्र निकल पड़ें,

श्लोक 49 (4.32.49)

यदेतत्तेऽभिरुचितं मम चैतद्धि रोचते । प्रविभज्य च सैन्यानि यथा वा मन्यते भवान् ॥

yadetatte'bhirucitaṃ mama caitaddhi rocate | pravibhajya ca sainyāni yathā vā manyate bhavān

यदि आपको यह अच्छा लगे — मुझे तो यह अच्छा लगता ही है — सेनाओं को बाँटकर, या जैसा आप उचित समझें।

श्लोक 50 (4.32.50)

प्रज्ञावान्कुलवृद्धश्च सर्वेषां नः पितामहः । आचार्यश्च कृपो विद्वाञ्शकुनिश्चापि सौबलः ॥

prajñāvānkulavṛddhaśca sarveṣāṃ naḥ pitāmahaḥ | ācāryaśca kṛpo vidvāñśakuniścāpi saubalaḥ

हम सबके पितामह बुद्धिमान और कुल में सबसे बड़े हैं; विद्वान आचार्य कृप हैं, और सुबलपुत्र शकुनि भी हैं।

श्लोक 51 (4.32.51)

मन्यन्ते ते यथा सर्वे तथा यात्रा विधीयताम् । संमन्त्र्य चाशु गच्छामः साधनार्थं महीपते ॥

manyante te yathā sarve tathā yātrā vidhīyatām | saṃmantrya cāśu gacchāmaḥ sādhanārthaṃ mahīpate

वे सब जैसा उचित समझें, वैसे ही चढ़ाई की व्यवस्था हो। हे पृथ्वीपति, परामर्श करके हम अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए शीघ्र चलें।

श्लोक 52 (4.32.52)

किंनु नः पाण्डवैः कार्यं हीनार्थबलपौरुषैः । अत्यन्तं हि प्रनष्टास्ते प्राप्ता वाऽपि यमक्षयम् ॥

kiṃnu naḥ pāṇḍavaiḥ kāryaṃ hīnārthabalapauruṣaiḥ | atyantaṃ hi pranaṣṭāste prāptā vā'pi yamakṣayam

धन, बल और पौरुष से हीन पाण्डवों से हमें क्या लेना? वे या तो पूरी तरह नष्ट हो गए हैं या यमलोक पहुँच गए हैं।

श्लोक 53 (4.32.53)

तद्भवांश्चतुरङ्गेण बलेन महता वृतः । विराटनगरं यातु सर्वसैन्येन भारत । आदास्यामोऽथ गास्तस्य विविधानि वसूनि च ॥

tadbhavāṃścaturaṅgeṇa balena mahatā vṛtaḥ | virāṭanagaraṃ yātu sarvasainyena bhārata | ādāsyāmo'tha gāstasya vividhāni vasūni ca

इसलिए, हे भारत, आप विशाल चतुरंगिणी सेना से घिरकर पूरी सेना के साथ विराटनगर पर चढ़ाई करें। तब हम उसकी गायें और नाना प्रकार का धन ले लेंगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 54 (4.32.54)

ततो दुर्योधनो राजा वचः श्रुत्वा तु तस्य तत् । वैकर्तनस्य कर्णस्य क्षिप्रमाज्ञापयत्स्वयम् । शासने नित्ययुक्तं तु दुःशासनमनन्तरम् ॥

tato duryodhano rājā vacaḥ śrutvā tu tasya tat | vaikartanasya karṇasya kṣipramājñāpayatsvayam | śāsane nityayuktaṃ tu duḥśāsanamanantaram

तब राजा दुर्योधन ने विकर्तनपुत्र कर्ण का वह वचन सुनकर स्वयं तुरन्त अपने अनुज दुःशासन को, जो सदा उसकी आज्ञा के पालन में तत्पर रहता था, आदेश दिया —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 55 (4.32.55)

सह वृद्धैस्तु संमन्त्र्य क्षिप्रं योजय वाहिनीम् । यथोद्देशं तु गच्छामः सहिताः सर्वकौरवैः ॥

saha vṛddhaistu saṃmantrya kṣipraṃ yojaya vāhinīm | yathoddeśaṃ tu gacchāmaḥ sahitāḥ sarvakauravaiḥ

वृद्धों से परामर्श करके शीघ्र सेना तैयार करो। हम सब कौरवों के साथ मिलकर निर्धारित स्थान पर चलेंगे।

श्लोक 56 (4.32.56)

सुशर्मा तु यथोद्दिष्टं देशं यातु महारथः । त्रिगर्तैः सहितः सर्वैः प्रख्यातबलपौरुषैः । प्रागेव हि सुसंयत्तो विराटनगरं प्रति ॥

suśarmā tu yathoddiṣṭaṃ deśaṃ yātu mahārathaḥ | trigartaiḥ sahitaḥ sarvaiḥ prakhyātabalapauruṣaiḥ | prāgeva hi susaṃyatto virāṭanagaraṃ prati

महारथी सुशर्मा बल और पौरुष के लिए विख्यात सभी त्रिगर्तों के साथ, भली-भाँति सन्नद्ध होकर, पहले ही विराटनगर की ओर अपने निर्धारित प्रदेश में जाएँ।

श्लोक 57 (4.32.57)

जघन्यतो वयं तत्र यास्यामो दिवसान्तरे । विषयं मत्स्यराजस्य सुसमृद्धं सुसंहितम् ॥

jaghanyato vayaṃ tatra yāsyāmo divasāntare | viṣayaṃ matsyarājasya susamṛddhaṃ susaṃhitam

हम एक दिन बाद पीछे से मत्स्यराज के उस समृद्ध और सुव्यवस्थित प्रदेश में जाएँगे।

श्लोक 58 (4.32.58)

सुशर्मणा गृहीते तु मत्स्यराजस्य गोधने । विराटः सैन्यमादाय त्रिगर्तैः सह योत्स्यति ॥

suśarmaṇā gṛhīte tu matsyarājasya godhane | virāṭaḥ sainyamādāya trigartaiḥ saha yotsyati

जब सुशर्मा मत्स्यराज का गोधन पकड़ लेंगे, तब विराट अपनी सेना लेकर त्रिगर्तों से युद्ध करेगा।

श्लोक 59 (4.32.59)

अपरं दिवसं गास्तु तत्र गृह्णन्तु कौरवाः । गवार्थे पाण्डवास्तत्र योत्स्यन्ति कुरुभिः सह ॥

aparaṃ divasaṃ gāstu tatra gṛhṇantu kauravāḥ | gavārthe pāṇḍavāstatra yotsyanti kurubhiḥ saha

अगले दिन कौरव वहाँ गायें पकड़ें; तब गायों के लिए पाण्डव वहाँ कुरुओं से युद्ध करेंगे।

श्लोक 60 (4.32.60)

तथा गत्वा यथोद्देशं विराटनगरान्तिके । क्षिप्रं गोष्ठं समासाद्य गृह्णन्तु विपुलं धनम् ॥

tathā gatvā yathoddeśaṃ virāṭanagarāntike | kṣipraṃ goṣṭhaṃ samāsādya gṛhṇantu vipulaṃ dhanam

इस प्रकार विराटनगर के निकट निर्धारित स्थान पर पहुँचकर वे शीघ्र गोशालाओं पर धावा बोलें और विपुल धन पकड़ लें।

श्लोक 61 (4.32.61)

गवां शतसहस्राणि श्रीमन्ति गुणवन्ति च । वयमस्य निगृह्णीमो द्विधा कृत्वा च वाहिनीम् ॥

gavāṃ śatasahasrāṇi śrīmanti guṇavanti ca | vayamasya nigṛhṇīmo dvidhā kṛtvā ca vāhinīm

अपनी सेना को दो भागों में बाँटकर हम उसकी लाखों सुन्दर और उत्तम गायें पकड़ लेंगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 62 (4.32.62)

ते स्म गत्वा यथोद्दिष्टं देशं मत्स्यमहीपतेः । संनद्धा रथिनः सर्वे सपताका बलोत्कटाः । प्रतिवैरं चिकीर्षन्तो गोषु गृद्धा महाबलाः ॥

te sma gatvā yathoddiṣṭaṃ deśaṃ matsyamahīpateḥ | saṃnaddhā rathinaḥ sarve sapatākā balotkaṭāḥ | prativairaṃ cikīrṣanto goṣu gṛddhā mahābalāḥ

वे निर्देश के अनुसार मत्स्यराज के प्रदेश में पहुँचे — सब रथी कवच धारण किए, पताकाओं सहित, बल में प्रचण्ड; वे महाबली गायों के लोभी थे और पुराने वैर का बदला चुकाना चाहते थे।

श्लोक 63 (4.32.63)

आदत्त गाः सुशर्माऽथ कृष्णपक्षस्य चाष्टमीम् ॥

ādatta gāḥ suśarmā'tha kṛṣṇapakṣasya cāṣṭamīm

तब सुशर्मा ने कृष्णपक्ष की अष्टमी को गायें पकड़ लीं।

श्लोक 64 (4.32.64)

अपरे दिवसे सर्वे राजन्संभूय कौरवाः । नवम्यां ते न्यगृह्णन्त गोकुलानि सहस्रशः । कौरवास्तु महावीर्या मत्स्यानां विषयान्तरे ॥

apare divase sarve rājansaṃbhūya kauravāḥ | navamyāṃ te nyagṛhṇanta gokulāni sahasraśaḥ | kauravāstu mahāvīryā matsyānāṃ viṣayāntare

हे राजन्, अगले दिन नवमी को महापराक्रमी कौरवों ने एकत्र होकर मत्स्यों के प्रदेश के दूसरे भाग में हज़ारों गायों के झुण्ड पकड़ लिए।

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