विराट पर्व · अध्याय 33
त्रिगर्तों का गोहरण; पाण्डवों के साथ विराट का प्रस्थान
जब पाण्डवों के अज्ञातवास का तेरहवाँ वर्ष पूरा होने को आता है, तब सुशर्मा के त्रिगर्त राजा विराट के गोधन पर टूट पड़ते हैं, ग्वालों को खदेड़कर साठ हज़ार गायें हाँक ले जाते हैं, और ग्वाले नगर में दौड़कर राजा को समाचार देते हैं। विराट मत्स्य सेना को सजाते हैं, और वे, उनके भाई शतानीक, मदिराक्ष और सूर्यदत्त तथा उनका पुत्र शंख कवच धारण करते हैं। कंक बने युधिष्ठिर युद्ध में चलने का प्रस्ताव रखते हैं और वलल तथा गायों और घोड़ों के रखवालों के लिए भी रथ माँगते हैं; विराट वेश बदले चारों पाण्डवों के लिए रथ, कवच और शस्त्रों का आदेश देते हैं, और वे रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों की विशाल सेना के साथ उनके पीछे-पीछे निकल पड़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.33.1)
ततस्तेषां महाराज तत्रैवामिततेजसाम् । छद्मलिङ्गप्रविष्टानां पाण्डवानां महात्मनाम् ॥
tatasteṣāṃ mahārāja tatraivāmitatejasām | chadmaliṅgapraviṣṭānāṃ pāṇḍavānāṃ mahātmanām
तब, हे महाराज, अपार तेजस्वी महात्मा पाण्डवों के लिए, जो वेश बदलकर वहाँ रह रहे थे,
श्लोक 2 (4.33.2)
व्यतीतः समयः सम्यग्विराटनगरे सताम् । कुर्वतां तस्य कर्माणि विराटस्य महीपतेः ॥
vyatītaḥ samayaḥ samyagvirāṭanagare satām | kurvatāṃ tasya karmāṇi virāṭasya mahīpateḥ
विराटनगर में रहते हुए और राजा विराट का काम करते हुए उन सत्पुरुषों की नियत अवधि भली-भाँति बीत गई।
श्लोक 3 (4.33.3)
कीचके तु हते राजा विराटः परवीरहा । परां संभावनां चक्रे कुन्तीपुत्रे युधिष्ठिरे ॥
kīcake tu hate rājā virāṭaḥ paravīrahā | parāṃ saṃbhāvanāṃ cakre kuntīputre yudhiṣṭhire
कीचक के मारे जाने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले राजा विराट ने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर का अत्यधिक सम्मान किया।
श्लोक 4 (4.33.4)
ततस्त्रयोदशस्यान्ते तस्य वर्षस्य भारत । सुशर्मणा गृहीतं तु गोधनं तरसा बहु ॥
tatastrayodaśasyānte tasya varṣasya bhārata | suśarmaṇā gṛhītaṃ tu godhanaṃ tarasā bahu
फिर, हे भारत, उस तेरहवें वर्ष के अन्त में सुशर्मा ने वेग से बहुत-सा गोधन पकड़ लिया।
श्लोक 5 (4.33.5)
ततः शब्दो महानासीद्रेणुश्च दिवमस्पृशत् । शङ्खदुन्दुभिघोषश्च भेरीणां च महास्वनः । गवाश्वरथनागानां निस्वनश्च पदातिनाम् ॥
tataḥ śabdo mahānāsīdreṇuśca divamaspṛśat | śaṅkhadundubhighoṣaśca bherīṇāṃ ca mahāsvanaḥ | gavāśvarathanāgānāṃ nisvanaśca padātinām
तब बड़ा कोलाहल उठा और धूल आकाश तक छा गई। शंखों और दुन्दुभियों का घोष, भेरियों का महानाद, और गायों, घोड़ों, रथों, हाथियों तथा पैदल सैनिकों का शोर होने लगा।
श्लोक 6 (4.33.6)
एवं तैस्त्वभिनिर्याय मत्स्यराजस्य गोधने । त्रिगर्तैर्गृह्यमाणे तु गोपालाः प्रत्यषेधयन् ॥
evaṃ taistvabhiniryāya matsyarājasya godhane | trigartairgṛhyamāṇe tu gopālāḥ pratyaṣedhayan
जब त्रिगर्त इस प्रकार चढ़ आए और मत्स्यराज का गोधन पकड़ने लगे, तब ग्वालों ने उन्हें रोकने का प्रयत्न किया।
श्लोक 7 (4.33.7)
अथ त्रिगर्ता बहवः परिगृह्य धनं बहु । परिक्षिप्य हयैः शीघ्रै रथव्रातैश्च भारत । गोपालान्प्रत्ययुध्यन्त रणे कृत्वा जये धृतिम् ॥
atha trigartā bahavaḥ parigṛhya dhanaṃ bahu | parikṣipya hayaiḥ śīghrai rathavrātaiśca bhārata | gopālānpratyayudhyanta raṇe kṛtvā jaye dhṛtim
तब बहुत-से त्रिगर्तों ने बहुत-सा धन पकड़कर, हे भारत, तेज़ घोड़ों और रथसमूहों से ग्वालों को घेर लिया और विजय का दृढ़ निश्चय करके रण में उनसे लड़ने लगे।
श्लोक 8 (4.33.8)
ते हन्यमाना बहुभिः प्रासतोमरपाणिभिः । गोपाला गोकुले भक्ता वारयामासुरोजसा ॥
te hanyamānā bahubhiḥ prāsatomarapāṇibhiḥ | gopālā gokule bhaktā vārayāmāsurojasā
हाथों में प्रास और तोमर लिए बहुत-से योद्धाओं की मार सहते हुए भी अपने गोकुल के प्रति निष्ठावान ग्वालों ने बड़े पराक्रम से उन्हें रोके रखा।
श्लोक 9 (4.33.9)
परश्वथैश्च मुसलैर्भिण्डिपालैश्च मुद्गरैः । गोपालाः कर्षणैश्चित्रैर्जघ्नुरश्वान्समन्ततः ॥
paraśvathaiśca musalairbhiṇḍipālaiśca mudgaraiḥ | gopālāḥ karṣaṇaiścitrairjaghnuraśvānsamantataḥ
फरसों, मूसलों, भिन्दिपालों, मुद्गरों और तरह-तरह के खींचने वाले औज़ारों से ग्वालों ने चारों ओर घोड़ों पर प्रहार किया।
श्लोक 10 (4.33.10)
ते हन्यमानाः संक्रुद्धास्त्रिगर्ता रथयोधिनः । विसृज्य शरवर्षाणि गोपानद्रावयन्बलात् ॥
te hanyamānāḥ saṃkruddhāstrigartā rathayodhinaḥ | visṛjya śaravarṣāṇi gopānadrāvayanbalāt
इस प्रकार मार खाकर रथ पर लड़ने वाले त्रिगर्त क्रुद्ध हो उठे और बाणों की वर्षा करके उन्होंने ग्वालों को बलपूर्वक भगा दिया।
श्लोक 11 (4.33.11)
हन्यमानेषु गोपेषु विमुखेषु विशांपते । ततो युवानः संभीताः श्वसन्तो रेणुगुण्ठिताः ॥
hanyamāneṣu gopeṣu vimukheṣu viśāṃpate | tato yuvānaḥ saṃbhītāḥ śvasanto reṇuguṇṭhitāḥ
हे प्रजानाथ, जब ग्वाले मारे जा रहे थे और पीठ दिखा रहे थे, तब डरे हुए, हाँफते हुए और धूल से सने युवक
श्लोक 12 (4.33.12)
जवेन महता चैव गोपालाः पुरमाव्रजन् । विराटनगरं प्राप्य नरा राजानमब्रुवन् ॥
javena mahatā caiva gopālāḥ puramāvrajan | virāṭanagaraṃ prāpya narā rājānamabruvan
ग्वाले बड़े वेग से नगर की ओर भागे; विराटनगर पहुँचकर उन लोगों ने राजा से कहा।
श्लोक 13 (4.33.13)
सभायां राजशार्दूलमासीनं पाण्डवैः सह । शूरैः परिवृतं योधैः कुण्डलाङ्गदधारिभिः ॥
sabhāyāṃ rājaśārdūlamāsīnaṃ pāṇḍavaiḥ saha | śūraiḥ parivṛtaṃ yodhaiḥ kuṇḍalāṅgadadhāribhiḥ
राजाओं में सिंह के समान राजा विराट सभा में पाण्डवों के साथ बैठे थे, कुण्डल और बाजूबन्द धारण किए शूर योद्धाओं से घिरे हुए,
श्लोक 14 (4.33.14)
सद्भिश्च पण्डितैः सार्धं मन्त्रिभिश्चापि संवृतम् । दृष्ट्वा शीघ्रं तु गोपाला विराटमिदमब्रुवन् ॥
sadbhiśca paṇḍitaiḥ sārdhaṃ mantribhiścāpi saṃvṛtam | dṛṣṭvā śīghraṃ tu gopālā virāṭamidamabruvan
और सज्जन विद्वानों तथा मन्त्रियों से भी घिरे हुए। उन्हें देखकर ग्वालों ने तुरन्त विराट से यह कहा —
गोपाला ऊचुः
श्लोक 15 (4.33.15)
अस्मान्युधि विनिर्जित्य परिभूय सबान्धवान् । षष्टिं गवां सहस्राणि त्रिगर्ताः कालयन्ति ते । ता निवर्तय राजेन्द्र मा नेशुः पशवस्तव ॥
asmānyudhi vinirjitya paribhūya sabāndhavān | ṣaṣṭiṃ gavāṃ sahasrāṇi trigartāḥ kālayanti te | tā nivartaya rājendra mā neśuḥ paśavastava
त्रिगर्त युद्ध में हमें हराकर और बन्धुओं सहित हमारा अपमान करके आपकी साठ हज़ार गायें हाँक ले जा रहे हैं। हे राजेन्द्र, उन्हें लौटाइए; आपके पशु नष्ट न होने पाएँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (4.33.16)
श्रुत्वा तु वचनं तेषां गोपालानामरिंदमः । स राजा महतीं सेनां मात्स्यानां समवाहयत् । रथनागाश्वकलिलां पत्तिध्वजसमाकुलाम् ॥
śrutvā tu vacanaṃ teṣāṃ gopālānāmariṃdamaḥ | sa rājā mahatīṃ senāṃ mātsyānāṃ samavāhayat | rathanāgāśvakalilāṃ pattidhvajasamākulām
ग्वालों के वचन सुनकर शत्रुदमन राजा ने मत्स्यों की एक विशाल सेना को कूच कराया, जो रथों, हाथियों और घोड़ों से भरी तथा पैदल सैनिकों और ध्वजाओं से व्याप्त थी।
श्लोक 17 (4.33.17)
राजानो राजपुत्राश्च तनुत्राण्यथ भेजिरे । भानुमन्ति विवातानि सूपसेव्यानि भागशः ॥
rājāno rājaputrāśca tanutrāṇyatha bhejire | bhānumanti vivātāni sūpasevyāni bhāgaśaḥ
राजाओं और राजकुमारों ने अपने-अपने कवच धारण किए — चमकते हुए, कसे हुए और पहनने में सुखद।
श्लोक 18 (4.33.18)
पृथक्काञ्चनसन्नाहान्रथेष्वश्वानयोजयन् । उत्कृष्य पाशान्मौर्वीणां शूराश्चापेष्वयोजयन् ॥
pṛthakkāñcanasannāhānratheṣvaśvānayojayan | utkṛṣya pāśānmaurvīṇāṃ śūrāścāpeṣvayojayan
उन्होंने सुनहरे साज़ वाले घोड़े अलग-अलग अपने रथों में जोते, और शूरों ने प्रत्यंचाएँ खींचकर अपने धनुषों पर चढ़ा दीं।
श्लोक 19 (4.33.19)
दृढमायसगर्भं तु कवचं तप्तकाञ्चनम् । विराटस्य प्रियो भ्राता शतानीकोऽभ्यहारयत् ॥
dṛḍhamāyasagarbhaṃ tu kavacaṃ taptakāñcanam | virāṭasya priyo bhrātā śatānīko'bhyahārayat
विराट के प्रिय भाई शतानीक ने तपाए सोने का, लोहे के भीतरी भाग वाला दृढ़ कवच पहना।
श्लोक 20 (4.33.20)
सर्वभारसहं वर्म कल्याणपटलं दृढम् । शतानीकादवरजो मदिराक्षोऽभ्यहारयत् ॥
sarvabhārasahaṃ varma kalyāṇapaṭalaṃ dṛḍham | śatānīkādavarajo madirākṣo'bhyahārayat
शतानीक के छोटे भाई मदिराक्ष ने हर भार सहने में समर्थ, सुन्दर आवरण वाला दृढ़ कवच पहना।
श्लोक 21 (4.33.21)
उत्सेधे यस्य पद्मानि शतं सौगन्धिकानि च । मृष्टहाटकपर्यन्तं सूर्यदत्तोऽभ्यहारयत् ॥
utsedhe yasya padmāni śataṃ saugandhikāni ca | mṛṣṭahāṭakaparyantaṃ sūryadatto'bhyahārayat
सूर्यदत्त ने ऐसा कवच पहना जिसकी उभरी सतह पर सौ कमल और सौगन्धिक पुष्प बने थे, और जिसके किनारे चमकते सोने के थे।
श्लोक 22 (4.33.22)
दृढमायसगर्भं च श्वेतं रुक्मपरिष्कृतम् । विराटस्य सुतो ज्येष्ठो वीरः शङ्खोऽभ्यहारयत् ॥
dṛḍhamāyasagarbhaṃ ca śvetaṃ rukmapariṣkṛtam | virāṭasya suto jyeṣṭho vīraḥ śaṅkho'bhyahārayat
विराट के ज्येष्ठ पुत्र वीर शंख ने लोहे के भीतरी भाग वाला, सोने से सजा दृढ़ श्वेत कवच पहना।
श्लोक 23 (4.33.23)
शतसूर्यं शतावर्तं शतबिन्दु शताक्षिमत् । अभेद्यकल्पं मत्स्यानां राजा कवचमाहरत् ॥
śatasūryaṃ śatāvartaṃ śatabindu śatākṣimat | abhedyakalpaṃ matsyānāṃ rājā kavacamāharat
मत्स्यराज ने ऐसा कवच धारण किया जो लगभग अभेद्य था, जिस पर सौ सूर्य, सौ भँवर, सौ बिन्दु और सौ नेत्र बने थे।
श्लोक 24 (4.33.24)
ततो नानातनुत्राणि स्वानि स्वानि महाबलाः । युयुत्सवोऽभ्यनह्यन्त देवकल्पाः प्रहारिणः ॥
tato nānātanutrāṇi svāni svāni mahābalāḥ | yuyutsavo'bhyanahyanta devakalpāḥ prahāriṇaḥ
तब युद्ध के इच्छुक, देवताओं जैसे प्रहारकुशल महाबली योद्धाओं ने अपने-अपने नाना प्रकार के कवच बाँध लिए।
श्लोक 25 (4.33.25)
सोपस्करेषु शुभ्रेषु महत्सु च महारथाः । पृथक्काञ्चनसन्नाहान्रथेष्वश्वानयोजयन् ॥
sopaskareṣu śubhreṣu mahatsu ca mahārathāḥ | pṛthakkāñcanasannāhānratheṣvaśvānayojayan
महारथियों ने अपने बड़े, उज्ज्वल और साज़-सामान से युक्त रथों में अलग-अलग सुनहरे साज़ वाले घोड़े जोते।
श्लोक 26 (4.33.26)
सूर्यचन्द्रप्रतीकाशे मणिहेमविभूषिते । महाप्रमाणं मत्स्यस्य ध्वजमुच्छ्रियते रथे ॥
sūryacandrapratīkāśe maṇihemavibhūṣite | mahāpramāṇaṃ matsyasya dhvajamucchriyate rathe
सूर्य और चन्द्रमा के समान चमकते, मणियों और सोने से सजे मत्स्यराज के रथ पर उनका विशाल ध्वज फहराया गया।
श्लोक 27 (4.33.27)
ध्वजान्बहुविधाकारान्सौवर्णान्हेममालिनः । यथास्वं क्षत्रियाः शूरा रथेषु समयोजयन् ॥
dhvajānbahuvidhākārānsauvarṇānhemamālinaḥ | yathāsvaṃ kṣatriyāḥ śūrā ratheṣu samayojayan
शूर क्षत्रियों ने अपने-अपने रथों पर नाना आकारों वाले, सोने की मालाओं से सजे स्वर्णिम ध्वज लगाए।
श्लोक 28 (4.33.28)
रथेषु युज्यमानेषु कङ्को राजानमब्रवीत् । मया ह्यस्त्रं चतुर्वर्गमवाप्तमृषिसत्तमात् ॥
ratheṣu yujyamāneṣu kaṅko rājānamabravīt | mayā hyastraṃ caturvargamavāptamṛṣisattamāt
जब रथ जोते जा रहे थे, तब कंक ने राजा से कहा — "मैंने एक श्रेष्ठ ऋषि से चारों प्रकार की अस्त्रविद्या प्राप्त की है।
कङ्क उवाच
श्लोक 29 (4.33.29)
दंशितो रथमास्थाय पदं निर्याम्यहं गवाम् । अयं च बलवाञ्छूरो वललो दृश्यतेऽनघ ॥
daṃśito rathamāsthāya padaṃ niryāmyahaṃ gavām | ayaṃ ca balavāñchūro valalo dṛśyate'nagha
मैं कवच पहनकर रथ पर चढ़ गायों के पदचिह्नों पर निकलूँगा। हे निष्पाप, यह बलवान और शूर वलल भी यहाँ है।
श्लोक 30 (4.33.30)
गोसङ्ख्यमश्वबन्धं च संयोजय रथेषु वै । नैते न जातु युध्येयुर्गवार्थमिति मे मतिः ॥
gosaṅkhyamaśvabandhaṃ ca saṃyojaya ratheṣu vai | naite na jātu yudhyeyurgavārthamiti me matiḥ
गायों की गिनती रखने वाले और घोड़ों के रखवाले को भी रथों पर नियुक्त कीजिए। मेरा विचार है कि ये गायों के लिए युद्ध किए बिना कभी नहीं रहेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 31 (4.33.31)
अथ मात्स्योऽब्रवीद्राजा शतानीकं जघन्यजम् । कङ्कश्च वललः सूदो दामग्रन्थिश्च वीर्यवान् ॥
atha mātsyo'bravīdrājā śatānīkaṃ jaghanyajam | kaṅkaśca valalaḥ sūdo dāmagranthiśca vīryavān
तब मत्स्यराज ने अपने छोटे भाई शतानीक से कहा — "कंक, रसोइया वलल, पराक्रमी दामग्रन्थि
विराट उवाच
श्लोक 32 (4.33.32)
तन्त्रिपालश्च गोसङ्ख्यो यथा ते पुरुषर्षभाः । शूराः सुवीराः पुरुषा नागराजवरोपमाः । युध्येयुरिति मे बुद्धिर्वर्तते नात्र संशयः ॥
tantripālaśca gosaṅkhyo yathā te puruṣarṣabhāḥ | śūrāḥ suvīrāḥ puruṣā nāgarājavaropamāḥ | yudhyeyuriti me buddhirvartate nātra saṃśayaḥ
और गायों की गिनती रखने वाला तन्त्रिपाल — ये नरश्रेष्ठ, शूर, वीर पुरुष, जो श्रेष्ठ गजराजों के समान हैं, अवश्य युद्ध करेंगे, यह मेरा विश्वास है; इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 33 (4.33.33)
एतेषामपि दीयन्तां रथा ध्वजपताकिनः । कवचानि विचित्राणि दृढानि च लघूनि च ॥
eteṣāmapi dīyantāṃ rathā dhvajapatākinaḥ | kavacāni vicitrāṇi dṛḍhāni ca laghūni ca
इन्हें भी ध्वजा-पताकाओं से युक्त रथ और रंग-बिरंगे, दृढ़ तथा हल्के कवच दिए जाएँ।
श्लोक 34 (4.33.34)
प्रतिमुञ्चन्तु गात्रेषु दीयन्तामायुधानि च । नेमे जातु न युध्येयुरिति मे धीयते मतिः ॥
pratimuñcantu gātreṣu dīyantāmāyudhāni ca | neme jātu na yudhyeyuriti me dhīyate matiḥ
वे उन्हें अपने शरीरों पर धारण करें और उन्हें अस्त्र-शस्त्र भी दिए जाएँ। ये युद्ध न करें, ऐसा कभी नहीं हो सकता — यही मेरा विचार है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 35 (4.33.35)
तच्छ्रुत्वा नृपतेर्वाक्यं शीघ्रं त्वरितमानसः । शतानीकः स पार्थेभ्यो रथान्राजन्समादिशत् ॥
tacchrutvā nṛpatervākyaṃ śīghraṃ tvaritamānasaḥ | śatānīkaḥ sa pārthebhyo rathānrājansamādiśat
राजा के वचन सुनकर शीघ्रता से भरे मन वाले शतानीक ने, हे राजन्, तुरन्त पृथापुत्रों के लिए रथों का आदेश दिया —
श्लोक 36 (4.33.36)
सहदेवाय राज्ञे च भीमाय नकुलाय च । तान्दृष्ट्वा सहसा सूता राजभक्तिपुरस्कृताः ॥
sahadevāya rājñe ca bhīmāya nakulāya ca | tāndṛṣṭvā sahasā sūtā rājabhaktipuraskṛtāḥ
सहदेव, राजा, भीम और नकुल के लिए। उन्हें देखकर राजभक्ति से प्रेरित सारथियों ने तुरन्त,
श्लोक 37 (4.33.37)
निर्दिष्टा नरदेवेन रथाञ्छीघ्रमयोजयन् । कवचानि विचित्राणि नवानि च दृढानि च ॥
nirdiṣṭā naradevena rathāñchīghramayojayan | kavacāni vicitrāṇi navāni ca dṛḍhāni ca
नरदेव के आदेशानुसार शीघ्र रथ जोत दिए। रंग-बिरंगे, नए और दृढ़ कवच,
श्लोक 38 (4.33.38)
विराटः प्रददौ यानि तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । तान्यामुच्य शरीरेषु दंशितास्ते महारथाः ॥
virāṭaḥ pradadau yāni teṣāmakliṣṭakarmaṇām | tānyāmucya śarīreṣu daṃśitāste mahārathāḥ
जो विराट ने उन अक्लिष्टकर्मा वीरों को दिए, उन्हें अपने शरीरों पर बाँधकर वे महारथी कवचधारी हो गए।
श्लोक 39 (4.33.39)
तरस्विनश्छन्नरूपाः सर्वशस्त्रविशारदाः । रथान्हेमपरिष्कारान्समास्थाय महारथाः । पाण्डवा निर्ययुर्हृष्टा दंशिता राजसत्तम ॥
tarasvinaśchannarūpāḥ sarvaśastraviśāradāḥ | rathānhemapariṣkārānsamāsthāya mahārathāḥ | pāṇḍavā niryayurhṛṣṭā daṃśitā rājasattama
हे राजश्रेष्ठ, वेगवान, छिपे रूप वाले और सब शस्त्रों में निपुण वे महारथी पाण्डव सोने से सजे रथों पर चढ़कर, कवच पहने, हर्षपूर्वक निकल पड़े।
श्लोक 40 (4.33.40)
विराटमन्वयुः पश्चात्सहिताः कुरुपुङ्गवाः । चत्वारो भ्रातरः शूराः पाण्डवाः सत्यविक्रमाः ॥
virāṭamanvayuḥ paścātsahitāḥ kurupuṅgavāḥ | catvāro bhrātaraḥ śūrāḥ pāṇḍavāḥ satyavikramāḥ
कुरुश्रेष्ठ, सत्यपराक्रमी चारों शूर पाण्डव भाई एक साथ विराट के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 41 (4.33.41)
दीर्घानां च दृढानां च धनुषां ते यथाबलम् । उत्कृष्य पाशान्मौर्वीणां वीराश्चापेष्वयोजयन् ॥
dīrghānāṃ ca dṛḍhānāṃ ca dhanuṣāṃ te yathābalam | utkṛṣya pāśānmaurvīṇāṃ vīrāścāpeṣvayojayan
उन वीरों ने अपने बल के अनुसार अपने लम्बे और दृढ़ धनुषों की प्रत्यंचाएँ खींचकर उन्हें धनुषों पर चढ़ा दिया।
श्लोक 42 (4.33.42)
ततः सुवाससः सर्वे वीराश्चन्दनरूषिताः । चोदिता नरदेवेन क्षिप्रमश्वानचोदयन् ॥
tataḥ suvāsasaḥ sarve vīrāścandanarūṣitāḥ | coditā naradevena kṣipramaśvānacodayan
तब सुन्दर वस्त्र पहने, चन्दन से लिपे उन सब वीरों ने नरदेव की प्रेरणा से शीघ्र अपने घोड़े हाँक दिए।
श्लोक 43 (4.33.43)
ते हया हेमसंच्छन्ना बृहन्तः साधुवाहिनः । चोदिताः प्रत्यदृश्यन्त पत्रिणामिव पङ्क्तयः ॥
te hayā hemasaṃcchannā bṛhantaḥ sādhuvāhinaḥ | coditāḥ pratyadṛśyanta patriṇāmiva paṅktayaḥ
सोने से ढके, अच्छी चाल वाले वे बड़े-बड़े घोड़े हाँके जाने पर पक्षियों की पंक्तियों जैसे दिखाई देते थे।
श्लोक 44 (4.33.44)
भीमरूपाश्च मातङ्गाः प्रभिन्नकरटामुखाः । स्वारूढा युद्धकुशलैर्महामात्राधिरोहिताः ॥
bhīmarūpāśca mātaṅgāḥ prabhinnakaraṭāmukhāḥ | svārūḍhā yuddhakuśalairmahāmātrādhirohitāḥ
भयानक रूप वाले हाथी, जिनकी कनपटियों से मद बह रहा था, युद्धकुशल योद्धाओं और महावतों द्वारा भली-भाँति सवार किए हुए,
श्लोक 45 (4.33.45)
क्षरन्त इव जीमूताः सुदन्ताः षष्टिहायनाः । राजानमन्वयुः पश्चात्क्रामन्त इव पर्वताः ॥
kṣaranta iva jīmūtāḥ sudantāḥ ṣaṣṭihāyanāḥ | rājānamanvayuḥ paścātkrāmanta iva parvatāḥ
बरसते बादलों की तरह मद बहाते, साठ वर्ष की आयु के, सुन्दर दाँतों वाले वे हाथी चलते पर्वतों के समान राजा के पीछे चले।
श्लोक 46 (4.33.46)
दृढायुधजनाकीर्णं रथाश्वगजसंकुलम् । तद्बलाग्रं विराटस्य शक्रस्येव तदा बभौ ॥
dṛḍhāyudhajanākīrṇaṃ rathāśvagajasaṃkulam | tadbalāgraṃ virāṭasya śakrasyeva tadā babhau
दृढ़ आयुधधारी लोगों से भरी और रथों, घोड़ों तथा हाथियों से संकुल विराट की वह अग्रिम सेना तब इन्द्र की सेना की भाँति शोभित हुई।
श्लोक 47 (4.33.47)
तं प्रयान्तं महाराज निनीषन्तं गवां पदम् । विशारदानां वैश्यानां प्रकृष्टानां तदा नृप ॥
taṃ prayāntaṃ mahārāja ninīṣantaṃ gavāṃ padam | viśāradānāṃ vaiśyānāṃ prakṛṣṭānāṃ tadā nṛpa
हे महाराज, जब वह गायों के स्थान तक पहुँचने के लिए निकला, तब, हे नृप, कुशल और श्रेष्ठ वैश्यों में से
श्लोक 48 (4.33.48)
विंशतिस्तु सहस्राणि नराणामनुयायिनाम् । अष्टौ रथसहस्राणि दश नागशतानि च । विंशच्चाश्वसहस्राणि मात्स्यानां त्वरितं ययुः ॥
viṃśatistu sahasrāṇi narāṇāmanuyāyinām | aṣṭau rathasahasrāṇi daśa nāgaśatāni ca | viṃśaccāśvasahasrāṇi mātsyānāṃ tvaritaṃ yayuḥ
बीस हज़ार अनुयायी पुरुष; और मत्स्यों के आठ हज़ार रथ, दस सौ हाथी और बीस हज़ार घोड़े शीघ्रता से चल पड़े।
श्लोक 49 (4.33.49)
तदनीकं विराटस्य शुशुभेऽतीव भारत । वसन्ते बहुपुष्पाढ्यं काननं चित्रितं यथा ॥
tadanīkaṃ virāṭasya śuśubhe'tīva bhārata | vasante bahupuṣpāḍhyaṃ kānanaṃ citritaṃ yathā
हे भारत, विराट की वह सेना वसन्त ऋतु में बहुत-से फूलों से भरे रंग-बिरंगे वन के समान अत्यन्त शोभित हुई।