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विराट पर्व · अध्याय 34

मत्स्यों और त्रिगर्तों का युद्ध

मत्स्यों की सेना नगर से निकलकर सूर्य ढलते समय त्रिगर्तों से जा भिड़ती है, और भीषण युद्ध छिड़ जाता है; उसकी धूल और बाणों से सूर्य छिप जाता है और रणभूमि शवों से पट जाती है। युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ बाज़ के आकार का व्यूह रचकर विराट के पक्ष में हज़ारों योद्धाओं का संहार करते हैं, और शतानीक, मदिराश्व, सूर्यदत्त, वलल तथा राजकुमार शंख त्रिगर्तों की सेना में घुस जाते हैं। विराट लड़ते-लड़ते त्रिगर्तराज सुशर्मा तक पहुँचते हैं; दोनों देर तक एक-दूसरे को घायल करते रहते हैं, यहाँ तक कि रात और धूल के कारण सेनाएँ अपने-पराए को पहचान नहीं पातीं।

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.34.1)

निर्याय नगराच्छूरा व्यूढानीकाः प्रहारिणः । त्रिगर्तानस्पृशन्मात्स्याः सूर्येऽस्तंगमिते सति ॥

niryāya nagarācchūrā vyūḍhānīkāḥ prahāriṇaḥ | trigartānaspṛśanmātsyāḥ sūrye'staṃgamite sati

नगर से निकलकर, व्यूह बनाए हुए और प्रहार को उद्यत शूरवीर मत्स्य योद्धा सूर्य ढलते-ढलते त्रिगर्तों से जा भिड़े।

श्लोक 2 (4.34.2)

ते त्रिगर्ताश्च मात्स्याश्च व्यूढानीकाः प्रहारिणः । अन्योन्यमभिवर्तन्ते गोषु गृद्धा महाबलाः ॥

te trigartāśca mātsyāśca vyūḍhānīkāḥ prahāriṇaḥ | anyonyamabhivartante goṣu gṛddhā mahābalāḥ

त्रिगर्त और मत्स्य दोनों ही व्यूहबद्ध, प्रहार को उद्यत और महाबली थे; गौओं के लोभ में वे एक-दूसरे पर टूट पड़े।

श्लोक 3 (4.34.3)

भीमाश्च मत्तमातङ्गास्तोमराङ्कुशचोदिताः । ग्रामणीयैः समारूढाः कुशलैर्हस्तिसादिभिः ॥

bhīmāśca mattamātaṅgāstomarāṅkuśacoditāḥ | grāmaṇīyaiḥ samārūḍhāḥ kuśalairhastisādibhiḥ

भयंकर मतवाले हाथी, जिन्हें तोमरों और अंकुशों से हाँका जा रहा था, सेनानायकों के कुशल महावतों द्वारा चलाए जा रहे थे।

श्लोक 4 (4.34.4)

तेषां समागमो घोरस्तुमुलो रोमहर्षणः । घ्नतां परस्परं राजन्यमराष्ट्रविवर्धनः ॥

teṣāṃ samāgamo ghorastumulo romaharṣaṇaḥ | ghnatāṃ parasparaṃ rājanyamarāṣṭravivardhanaḥ

हे राजन्! उनकी वह भिड़न्त घोर, कोलाहलपूर्ण और रोंगटे खड़े कर देने वाली थी; एक-दूसरे को मारते हुए वे यमराज के राज्य को बढ़ा रहे थे।

श्लोक 5 (4.34.5)

देवासुरसमो राजन्नासीत्सूर्येऽवलम्बति । पदातिरथनागेन्द्रहयारोहबलौघवान् ॥

devāsurasamo rājannāsītsūrye'valambati | padātirathanāgendrahayārohabalaughavān

हे राजन्! ढलते सूर्य के समय वह युद्ध देवताओं और असुरों के संग्राम जैसा हो गया, जिसमें पैदल सैनिकों, रथों, गजराजों और घुड़सवारों की सेनाएँ उमड़ रही थीं।

श्लोक 6 (4.34.6)

अन्योन्यमभ्यापततां निघ्नतां चेतरेतरम् । उदतिष्ठद्रजो भौमं न प्राज्ञायत किंचन ॥

anyonyamabhyāpatatāṃ nighnatāṃ cetaretaram | udatiṣṭhadrajo bhaumaṃ na prājñāyata kiṃcana

एक-दूसरे पर झपटते और परस्पर प्रहार करते योद्धाओं से धरती की धूल उठी, जिससे कुछ भी दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 7 (4.34.7)

पक्षिणश्चापतन्भूमौ सैन्येन रजसा वृताः । इषुभिर्व्यतिसर्पद्भिरादित्योऽन्तरधीयत ॥

pakṣiṇaścāpatanbhūmau sainyena rajasā vṛtāḥ | iṣubhirvyatisarpadbhirādityo'ntaradhīyata

सेना से उठी धूल में घिरकर पक्षी धरती पर गिरने लगे, और इधर-उधर उड़ते बाणों से सूर्य छिप गया।

श्लोक 8 (4.34.8)

खद्योतैरिव संयुक्तमन्तरिक्षमजायत ॥

khadyotairiva saṃyuktamantarikṣamajāyata

आकाश ऐसा हो गया मानो जुगनुओं से भर गया हो।

श्लोक 9 (4.34.9)

रुक्मपृष्ठानि चापानि विचेरुर्विद्युतो यथा । नर्दतां लोकवीराणां सव्यं दक्षिणमस्यताम् ॥

rukmapṛṣṭhāni cāpāni vicerurvidyuto yathā | nardatāṃ lokavīrāṇāṃ savyaṃ dakṣiṇamasyatām

संसार-प्रसिद्ध वीर गरजते हुए बाएँ-दाएँ बाण छोड़ रहे थे, और उनके सोने से मढ़ी पीठ वाले धनुष बिजली की तरह चमकते घूम रहे थे।

श्लोक 10 (4.34.10)

रथा रथैः समाजग्मुः पत्तयश्च पदातिभिः । सादिनः सादिभिर्जग्मुर्गजैश्चापि महागजाः ॥

rathā rathaiḥ samājagmuḥ pattayaśca padātibhiḥ | sādinaḥ sādibhirjagmurgajaiścāpi mahāgajāḥ

रथ रथों से, पैदल पैदलों से, घुड़सवार घुड़सवारों से और बड़े-बड़े हाथी हाथियों से भिड़ गए।

श्लोक 11 (4.34.11)

असिभिः पट्टसैश्चापि शक्तिभिस्तोमरैरपि । संरब्धाः समरे योधा निजघ्नुरितरेतरम् ॥

asibhiḥ paṭṭasaiścāpi śaktibhistomarairapi | saṃrabdhāḥ samare yodhā nijaghnuritaretaram

तलवारों, पट्टिशों, शक्तियों और तोमरों से क्रोध में भरे योद्धा रणभूमि में एक-दूसरे को मारने लगे।

श्लोक 12 (4.34.12)

निघ्नन्तः समरेऽन्योन्यं हृष्टाः परिघपाणयः । न शेकुरतिसंक्रुद्धाः शूराः कर्तुं पराङ्मुखम् ॥

nighnantaḥ samare'nyonyaṃ hṛṣṭāḥ parighapāṇayaḥ | na śekuratisaṃkruddhāḥ śūrāḥ kartuṃ parāṅmukham

हाथों में परिघ लिए, हर्ष से भरे वे वीर रणभूमि में एक-दूसरे पर प्रहार करते रहे; अत्यन्त क्रुद्ध वे शूर एक-दूसरे को पीठ दिखाने पर विवश नहीं कर सके।

श्लोक 13 (4.34.13)

रक्ताधरोष्ठं सुनसं क्लृप्तश्मश्रु स्वलंकृतम् । अदृश्यत शिरश्छिन्नं रजोविध्वस्तकुण्डलम् ॥

raktādharoṣṭhaṃ sunasaṃ klṛptaśmaśru svalaṃkṛtam | adṛśyata śiraśchinnaṃ rajovidhvastakuṇḍalam

कहीं कटा हुआ सिर दिखाई देता था — लाल होंठों और सुन्दर नाक वाला, सँवरी हुई दाढ़ी वाला, भली-भाँति अलंकृत, जिसके कुण्डल धूल से मलिन हो गए थे।

श्लोक 14 (4.34.14)

दृश्यन्ते तत्र गात्राणि वीरैश्छिन्नानि सर्वशः । सालस्कन्धनिकाशानि क्षत्रियाणां महामृधे ॥

dṛśyante tatra gātrāṇi vīraiśchinnāni sarvaśaḥ | sālaskandhanikāśāni kṣatriyāṇāṃ mahāmṛdhe

उस महासंग्राम में वीरों द्वारा सब ओर से काटे गए क्षत्रियों के अंग शाल वृक्षों के तनों के समान पड़े दिखाई देते थे।

श्लोक 15 (4.34.15)

नागभोगनिकाशैश्च बाहुभिश्चन्दनोक्षितैः । आकीर्णा वसुधा तत्र शिरोभिश्च सकुण्डलैः ॥

nāgabhoganikāśaiśca bāhubhiścandanokṣitaiḥ | ākīrṇā vasudhā tatra śirobhiśca sakuṇḍalaiḥ

वहाँ की धरती चन्दन से लिपी, नागों के शरीर जैसी भुजाओं और कुण्डलों सहित सिरों से पट गई थी।

श्लोक 16 (4.34.16)

यथा वा वाससी श्लक्ष्णे महारजतरञ्जिते । बिभ्रती युवती श्यामा तद्वद्भाति वसुन्धरा ॥

yathā vā vāsasī ślakṣṇe mahārajatarañjite | bibhratī yuvatī śyāmā tadvadbhāti vasundharā

धरती ऐसी शोभा पा रही थी जैसे कोई साँवली युवती लाल रंग में रँगे दो महीन वस्त्र पहने हो।

श्लोक 17 (4.34.17)

उपाशाम्यद्रजो भौमं रुधिरेण प्रवर्षता । कश्मलं प्राविशद्धोरं निर्मर्यादमवर्तत ॥

upāśāmyadrajo bhaumaṃ rudhireṇa pravarṣatā | kaśmalaṃ prāviśaddhoraṃ nirmaryādamavartata

बरसते रक्त से धरती की धूल बैठ गई; सब पर घोर मोह छा गया और युद्ध सारी मर्यादाएँ तोड़कर चलने लगा।

श्लोक 18 (4.34.18)

युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितस्तदा । व्यूहं कृत्वा विराटस्य अन्वयुध्यत पाण्डवः ॥

yudhiṣṭhiro'pi dharmātmā bhrātṛbhiḥ sahitastadā | vyūhaṃ kṛtvā virāṭasya anvayudhyata pāṇḍavaḥ

तब धर्मात्मा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर भी अपने भाइयों के साथ व्यूह रचकर विराट के पक्ष में युद्ध करने लगे।

श्लोक 19 (4.34.19)

आत्मानं श्येनवत्कृत्वा तुण्डमासीद्युधिष्ठिरः । पक्षौ यमौ च भवतः पुच्छमासीद्वृकोदरः ॥

ātmānaṃ śyenavatkṛtvā tuṇḍamāsīdyudhiṣṭhiraḥ | pakṣau yamau ca bhavataḥ pucchamāsīdvṛkodaraḥ

उन्होंने व्यूह को बाज़ के आकार का बनाया; स्वयं युधिष्ठिर उसकी चोंच बने, दोनों जुड़वाँ भाई उसके दो पंख बने और वृकोदर उसकी पूँछ बने।

श्लोक 20 (4.34.20)

सहस्रं न्यहनत्तत्र कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । भीमसेनस्तु संक्रुद्धः सर्वशस्त्रभृतांवरः । द्विसहस्रं रथान्वीरः परलोकं प्रवेशयत् ॥

sahasraṃ nyahanattatra kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | bhīmasenastu saṃkruddhaḥ sarvaśastrabhṛtāṃvaraḥ | dvisahasraṃ rathānvīraḥ paralokaṃ praveśayat

वहाँ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने एक हज़ार योद्धाओं को मार डाला; और समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ वीर भीमसेन ने क्रोध में भरकर दो हज़ार रथों को परलोक पहुँचा दिया।

श्लोक 21 (4.34.21)

नकुलस्त्रिशतं जघ्ने सहदेवश्चतुःशतम् । शतानीकः शतं जघ्ने मदिराश्वश्चतुःशतम् ॥

nakulastriśataṃ jaghne sahadevaścatuḥśatam | śatānīkaḥ śataṃ jaghne madirāśvaścatuḥśatam

नकुल ने तीन सौ और सहदेव ने चार सौ को मारा; शतानीक ने सौ और मदिराश्व ने चार सौ को मार गिराया।

श्लोक 22 (4.34.22)

प्रहृष्टां महतीं सेनां त्रिगर्तानां महाबलौ । आर्च्छतां बहुसंरब्धौ केशाकेशि रथारथि ॥

prahṛṣṭāṃ mahatīṃ senāṃ trigartānāṃ mahābalau | ārcchatāṃ bahusaṃrabdhau keśākeśi rathārathi

उन दोनों महाबलियों ने अत्यन्त क्रोध में भरकर त्रिगर्तों की हर्ष से भरी विशाल सेना पर धावा बोल दिया और बाल से बाल, रथ से रथ भिड़ाकर लड़ने लगे।

श्लोक 23 (4.34.23)

लक्षयित्वा त्रिगर्तानां तौ प्रविष्टौ महाचमूम् । जग्मतुः सूर्यदत्तश्च वललश्चापि पृष्ठतः ॥

lakṣayitvā trigartānāṃ tau praviṣṭau mahācamūm | jagmatuḥ sūryadattaśca valalaścāpi pṛṣṭhataḥ

उन दोनों को त्रिगर्तों की विशाल सेना में घुसा देखकर सूर्यदत्त और वलल भी उनके पीछे-पीछे गए।

श्लोक 24 (4.34.24)

शङ्खो विराटपुत्रश्च महेष्वासो महाबलः । विनिघ्नन्समरे शूरान्प्रविवेश महाचमूम् ॥

śaṅkho virāṭaputraśca maheṣvāso mahābalaḥ | vinighnansamare śūrānpraviveśa mahācamūm

विराट के पुत्र, महाधनुर्धर और महाबली शंख ने भी रणभूमि में वीरों का संहार करते हुए उस विशाल सेना में प्रवेश किया।

श्लोक 25 (4.34.25)

विराटस्तत्र संग्रामे हत्वा पञ्चशतं रथान् । कुञ्जराणां शतं चैव सहस्रं वाजिनां तथा ॥

virāṭastatra saṃgrāme hatvā pañcaśataṃ rathān | kuñjarāṇāṃ śataṃ caiva sahasraṃ vājināṃ tathā

उस संग्राम में विराट ने पाँच सौ रथों, सौ हाथियों और एक हज़ार घोड़ों का संहार करके,

श्लोक 26 (4.34.26)

चरन्स विविधान्मार्गान्रथेन रथिनांवरः । त्रिगर्तानां सुशर्माणमार्च्छद्रुक्मरथं रणे ॥

caransa vividhānmārgānrathena rathināṃvaraḥ | trigartānāṃ suśarmāṇamārcchadrukmarathaṃ raṇe

रथियों में श्रेष्ठ उस राजा ने अपने रथ से अनेक प्रकार के पैंतरे बदलते हुए रणभूमि में त्रिगर्तराज सुशर्मा पर आक्रमण किया, जिसका रथ सोने का था।

श्लोक 27 (4.34.27)

तौ तु प्राहरतां तत्र महेष्वासौ महाबलौ । अन्योन्यमभिनिघ्नन्तौ गोषु गोवृषभाविव ॥

tau tu prāharatāṃ tatra maheṣvāsau mahābalau | anyonyamabhinighnantau goṣu govṛṣabhāviva

तब वे दोनों महाबली महाधनुर्धर वहाँ एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे, जैसे गौओं के बीच दो साँड़ एक-दूसरे पर सींग चलाते हों।

श्लोक 28 (4.34.28)

राजसिंहौ सुसंरब्धौ विरेजतुरमर्षणौ । कृतास्त्रौ निशितैर्बाणैरसिशक्तिपरश्वथैः ॥

rājasiṃhau susaṃrabdhau virejaturamarṣaṇau | kṛtāstrau niśitairbāṇairasiśaktiparaśvathaiḥ

राजाओं में सिंह के समान वे दोनों क्रुद्ध, असहिष्णु और अस्त्रविद्या में निपुण योद्धा अपने तीखे बाणों, तलवारों, शक्तियों और फरसों के साथ शोभा पा रहे थे।

श्लोक 29 (4.34.29)

ततो रथाभ्यां रथिनौ व्यतीयातां समन्ततः । शरान्ससृजतुः शीघ्रं तोयधारा घनाविव ॥

tato rathābhyāṃ rathinau vyatīyātāṃ samantataḥ | śarānsasṛjatuḥ śīghraṃ toyadhārā ghanāviva

फिर वे दोनों रथी अपने रथों से चारों ओर एक-दूसरे के आर-पार घूमते हुए, जलधारा बरसाने वाले दो मेघों की तरह शीघ्रता से बाण बरसाने लगे।

श्लोक 30 (4.34.30)

अन्योन्यमभिसंरब्धौ दन्ताभ्यामिव कुञ्जरौ । कृतास्त्रौ निशितैर्बाणैर्दारयामासतू रणे ॥

anyonyamabhisaṃrabdhau dantābhyāmiva kuñjarau | kṛtāstrau niśitairbāṇairdārayāmāsatū raṇe

दाँतों से लड़ते दो हाथियों की भाँति एक-दूसरे पर क्रुद्ध वे अस्त्रविद् योद्धा रणभूमि में तीखे बाणों से एक-दूसरे को विदीर्ण करने लगे।

श्लोक 31 (4.34.31)

मात्स्यो राजा सुशर्माणं विव्याध निशितैः शरैः । पञ्चभिः पञ्चभिर्बाणैर्विव्याध चतुरो हयान् ॥

mātsyo rājā suśarmāṇaṃ vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ | pañcabhiḥ pañcabhirbāṇairvivyādha caturo hayān

मत्स्यराज ने सुशर्मा को तीखे बाणों से बींध दिया और उसके चारों घोड़ों को पाँच-पाँच बाणों से घायल किया।

श्लोक 32 (4.34.32)

द्वाभ्यां सूतं च विव्याध केतुं च त्रिभिराशुगैः । तथैव मात्स्यराजं तु सुशर्मा युद्धदुर्मदः । पञ्चाशद्भिः शितैर्बाणैर्विव्याध परमास्त्रवित् ॥

dvābhyāṃ sūtaṃ ca vivyādha ketuṃ ca tribhirāśugaiḥ | tathaiva mātsyarājaṃ tu suśarmā yuddhadurmadaḥ | pañcāśadbhiḥ śitairbāṇairvivyādha paramāstravit

उसने दो शीघ्रगामी बाणों से सारथि को और तीन से ध्वजा को बींध दिया। उसी प्रकार रणोन्मत्त और श्रेष्ठ अस्त्रों के ज्ञाता सुशर्मा ने भी मत्स्यराज को पचास तीखे बाणों से बींध डाला।

श्लोक 33 (4.34.33)

तयोर्बलानि राजेन्द्र समस्तानि महारणे । नाजानन्त तदाऽन्योन्यं प्रदोषे रजसा वृते ॥

tayorbalāni rājendra samastāni mahāraṇe | nājānanta tadā'nyonyaṃ pradoṣe rajasā vṛte

हे राजेन्द्र! तब उस महासंग्राम में दोनों की सारी सेनाएँ एक-दूसरे को पहचान न सकीं, क्योंकि सन्ध्या हो चुकी थी और सब कुछ धूल से ढक गया था।

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