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विराट पर्व · अध्याय 35

भीम द्वारा विराट की मुक्ति और सुशर्मा का बन्दी होना

चन्द्रमा के उदय होने पर युद्ध फिर छिड़ता है; सुशर्मा और उसका भाई विराट को परास्त करके अपने रथ पर बन्दी बनाकर ले जाते हैं और मत्स्य-सेना भाग खड़ी होती है। युधिष्ठिर भीम को विराट को छुड़ाने भेजते हैं, पर पहचाने जाने के भय से उन्हें वृक्ष उखाड़कर लड़ने से रोकते हैं। भीम धनुष उठाते हैं, भाइयों के साथ त्रिगर्त-सेना का संहार करते हैं और सुशर्मा के रथ पर कूदकर उसे पीट-पीटकर अचेत कर देते हैं। भीम उसे तभी छोड़ना चाहते हैं जब वह स्वयं को दास कहे, किन्तु युधिष्ठिर उसे मुक्त करवा देते हैं, और पाण्डव वह रात रणभूमि में ही बिताते हैं।

अध्याय 34अध्याय-सूचीअध्याय 36

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.35.1)

तमसाऽभिप्लुते लोके रजसा चैव भारत । व्यतिष्ठन्त मुहूर्तं ते व्यूढानीकाः प्रहारिणः ॥

tamasā'bhiplute loke rajasā caiva bhārata | vyatiṣṭhanta muhūrtaṃ te vyūḍhānīkāḥ prahāriṇaḥ

हे भारत! जब संसार अन्धकार और धूल से भर गया, तब प्रहार को उद्यत वे योद्धा व्यूह बनाए हुए कुछ देर तक ठहरे रहे।

श्लोक 2 (4.35.2)

ततोऽन्धकारं प्रणुदन्नुदतिष्ठन्निशाकरः । कुर्वाणो विमलां रात्रिं दर्शयन्क्षत्रियान्रणे ॥

tato'ndhakāraṃ praṇudannudatiṣṭhanniśākaraḥ | kurvāṇo vimalāṃ rātriṃ darśayankṣatriyānraṇe

तब अन्धकार को दूर करता हुआ चन्द्रमा उदित हुआ; उसने रात को निर्मल कर दिया और रणभूमि में क्षत्रियों को दिखा दिया।

श्लोक 3 (4.35.3)

ततः प्रकाशमासाद्य पुनर्युद्धमवर्तत । घोररूपं तदा तेषामवेक्ष्य तु परस्परम् ॥

tataḥ prakāśamāsādya punaryuddhamavartata | ghorarūpaṃ tadā teṣāmavekṣya tu parasparam

प्रकाश पाकर युद्ध फिर से छिड़ गया, और एक-दूसरे को देख पाने से वह संग्राम भयानक रूप ले बैठा।

श्लोक 4 (4.35.4)

तथैव तेषां तुमुलानि तानि क्रुद्धानि चान्योन्यमभिद्रवन्ति । गदासिपट्टैश्च परश्वथैश्च प्रासैश्च तीक्ष्णाग्रसुधौतधारैः ॥

tathaiva teṣāṃ tumulāni tāni kruddhāni cānyonyamabhidravanti | gadāsipaṭṭaiśca paraśvathaiśca prāsaiśca tīkṣṇāgrasudhautadhāraiḥ

उसी प्रकार उनकी कोलाहल करती सेनाएँ क्रोध में भरकर गदाओं, तलवारों, पट्टिशों, फरसों और तीखी नोक तथा चमकती धार वाले भालों से एक-दूसरे पर टूट पड़ीं।

श्लोक 5 (4.35.5)

बलं तु मात्स्यस्य बलेन राजा सर्वं त्रिगर्ताधिपतिः सुशर्मा । प्रमथ्य जित्वा च निपीड्य मत्स्यान्विराटमोजस्विनमभ्यधावत् ॥

balaṃ tu mātsyasya balena rājā sarvaṃ trigartādhipatiḥ suśarmā | pramathya jitvā ca nipīḍya matsyānvirāṭamojasvinamabhyadhāvat

त्रिगर्तों के अधिपति राजा सुशर्मा ने अपनी सेना से मत्स्यराज की सारी सेना को मथकर पराजित कर दिया, और मत्स्यों को रौंदकर तेजस्वी विराट पर धावा बोल दिया।

श्लोक 6 (4.35.6)

मत्ताविव वृषौ तौ तु गजाविव मदोद्धतौ । सिंहाविव गजग्राहौ शक्रवृत्राविवोद्धतौ ॥

mattāviva vṛṣau tau tu gajāviva madoddhatau | siṃhāviva gajagrāhau śakravṛtrāvivoddhatau

वे दोनों मतवाले साँड़ों के समान, मदोन्मत्त हाथियों के समान, हाथियों को पकड़ने वाले सिंहों के समान और इन्द्र तथा वृत्र के समान उद्धत थे।

श्लोक 7 (4.35.7)

उभौ तुल्यबलोत्साहावुभौ तुल्यपराक्रमौ । उभौ तुल्यास्त्रविक्षेपावुभौ युद्धविशारदौ ॥

ubhau tulyabalotsāhāvubhau tulyaparākramau | ubhau tulyāstravikṣepāvubhau yuddhaviśāradau

दोनों बल और उत्साह में समान थे, दोनों पराक्रम में समान थे, दोनों अस्त्र चलाने में समान थे और दोनों युद्ध-कला में निपुण थे।

श्लोक 8 (4.35.8)

तौ निहत्य पृथग्धुर्यानुभयोः पार्ष्णिसारथी । आस्तां तुल्यधनुर्ग्राहौ कृष्णकंसाविवोद्धतौ ॥

tau nihatya pṛthagdhuryānubhayoḥ pārṣṇisārathī | āstāṃ tulyadhanurgrāhau kṛṣṇakaṃsāvivoddhatau

उन्होंने एक-दूसरे के रथ के घोड़ों और दोनों पार्श्व-सारथियों को मार डाला, और फिर कृष्ण और कंस की भाँति उग्र, धनुष चलाने में बराबर, वे आमने-सामने डटे रहे।

श्लोक 9 (4.35.9)

ततः सुशर्मा त्रैगर्तः सह भ्रात्रा सुवर्मणा । अभ्यद्रवन्मत्स्यराजं रथव्रातेन सर्वशः ॥

tataḥ suśarmā traigartaḥ saha bhrātrā suvarmaṇā | abhyadravanmatsyarājaṃ rathavrātena sarvaśaḥ

तब त्रिगर्तराज सुशर्मा अपने भाई सुवर्मा के साथ रथों के समूह लेकर चारों ओर से मत्स्यराज पर टूट पड़ा।

श्लोक 10 (4.35.10)

ततो रथाभ्यां प्रस्कन्द्य भ्रातरौ क्षत्रियर्षभौ । गदापाणी सुसंरब्धौ समभ्यद्रवतां जवात् ॥

tato rathābhyāṃ praskandya bhrātarau kṣatriyarṣabhau | gadāpāṇī susaṃrabdhau samabhyadravatāṃ javāt

फिर क्षत्रियों में श्रेष्ठ वे दोनों भाई रथों से कूदकर, हाथों में गदा लिए, क्रोध में भरे बड़े वेग से झपटे।

श्लोक 11 (4.35.11)

सुशर्मा परवीरघ्नो बलवान्वीर्यवान्गदी । विरथं मत्स्यराजानं जीवग्राहमथाग्रहीत् ॥

suśarmā paravīraghno balavānvīryavāngadī | virathaṃ matsyarājānaṃ jīvagrāhamathāgrahīt

शत्रुवीरों का संहार करने वाले, बलवान और पराक्रमी गदाधारी सुशर्मा ने रथहीन मत्स्यराज को जीवित ही पकड़ लिया।

श्लोक 12 (4.35.12)

तमुन्मथ्य सुशर्मा तु युवतीमिव कामुकः । स्यन्दनं स्वं समारोप्य प्रययौ भीमविक्रमः ॥

tamunmathya suśarmā tu yuvatīmiva kāmukaḥ | syandanaṃ svaṃ samāropya prayayau bhīmavikramaḥ

भयंकर पराक्रमी सुशर्मा ने उसे दबोच लिया और, जैसे कोई कामी पुरुष किसी युवती को उठा ले जाए, वैसे ही उसे अपने रथ पर बिठाकर चल पड़ा।

श्लोक 13 (4.35.13)

तस्मिन्गृहीते विरथे विराटे बलवत्तरे । बलं सर्वं विभग्नं तन्निरुत्साहं निराशकम् ॥

tasmingṛhīte virathe virāṭe balavattare | balaṃ sarvaṃ vibhagnaṃ tannirutsāhaṃ nirāśakam

बलवान विराट के रथहीन होकर पकड़े जाते ही उसकी सारी सेना तितर-बितर हो गई; उसका उत्साह और आशा दोनों टूट गए।

श्लोक 14 (4.35.14)

प्राद्रवन्त भयान्मात्स्यास्त्रिगर्तैरर्दिता रणे । विदिक्षु दिक्षु सर्वासु पलायन्ति च यान्ति च ॥

prādravanta bhayānmātsyāstrigartairarditā raṇe | vidikṣu dikṣu sarvāsu palāyanti ca yānti ca

रणभूमि में त्रिगर्तों से पीड़ित मत्स्य भय से भाग खड़े हुए; वे सभी दिशाओं और उपदिशाओं में भागते-दौड़ते चले गए।

श्लोक 15 (4.35.15)

तेषु विद्राव्यमाणेषु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अभ्यभाषत धर्मात्मा भीमसेनमरिन्दमम् ॥

teṣu vidrāvyamāṇeṣu kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | abhyabhāṣata dharmātmā bhīmasenamarindamam

जब वे इस प्रकार भगाए जा रहे थे, तब कुन्तीपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिर ने शत्रुदमन भीमसेन से कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 16 (4.35.16)

मात्स्यराजस्त्रिगर्तेन परामृष्टः सुशर्मणा । तं मोक्षय महाबाहो मा गमद्द्विषतां वशम् ॥

mātsyarājastrigartena parāmṛṣṭaḥ suśarmaṇā | taṃ mokṣaya mahābāho mā gamaddviṣatāṃ vaśam

त्रिगर्तराज सुशर्मा ने मत्स्यराज को पकड़ लिया है। हे महाबाहु! उन्हें छुड़ाओ, जिससे वे शत्रुओं के वश में न पड़ें।

श्लोक 17 (4.35.17)

भीमसेन महाबाहो गृहीतं तु सुशर्मणा । त्रायस्व मोचय क्षिप्रमस्मत्प्रीतिकरं नृपम् ॥

bhīmasena mahābāho gṛhītaṃ tu suśarmaṇā | trāyasva mocaya kṣipramasmatprītikaraṃ nṛpam

हे महाबाहु भीमसेन! सुशर्मा द्वारा पकड़े गए राजा की रक्षा करो; हमारा प्रिय करने वाले उस राजा को शीघ्र छुड़ाओ।

श्लोक 18 (4.35.18)

उषिताः स्म सुखं सर्वे सर्वकामैः सुपूजिताः । भीमसेन त्वया कार्या तस्य वासस्य निष्कृतिः ॥

uṣitāḥ sma sukhaṃ sarve sarvakāmaiḥ supūjitāḥ | bhīmasena tvayā kāryā tasya vāsasya niṣkṛtiḥ

हम सब यहाँ सुख से रहे हैं और हर प्रकार की इच्छित वस्तुओं से हमारा सत्कार हुआ है। भीमसेन! उस निवास का ऋण तुम्हें चुकाना है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (4.35.19)

तं तथावादिनं तत्र भीमसेनो महाबलः । अभ्यभाषत दुर्धर्षो रणमध्ये युधिष्ठिरम् ॥

taṃ tathāvādinaṃ tatra bhīmaseno mahābalaḥ | abhyabhāṣata durdharṣo raṇamadhye yudhiṣṭhiram

उनके ऐसा कहने पर दुर्धर्ष महाबली भीमसेन ने रणभूमि के बीच युधिष्ठिर से कहा —

भीमसेन उवाच

श्लोक 20 (4.35.20)

अहमेनं परित्रास्ये शासनात्तव पार्थिव । पश्येदं सुमहत्कर्म युध्यतो मम शत्रुभिः ॥

ahamenaṃ paritrāsye śāsanāttava pārthiva | paśyedaṃ sumahatkarma yudhyato mama śatrubhiḥ

हे राजन्! आपकी आज्ञा से मैं इन्हें छुड़ा लाऊँगा। शत्रुओं से लड़ते हुए मेरा यह महान् पराक्रम देखिए।

श्लोक 21 (4.35.21)

स्वबाहुबलमाश्रित्य परेषामसमं रणे । एकान्तमाश्रितो राजंस्तिष्ठ त्वं भ्रातृभिः सह ॥

svabāhubalamāśritya pareṣāmasamaṃ raṇe | ekāntamāśrito rājaṃstiṣṭha tvaṃ bhrātṛbhiḥ saha

मैं अपने बाहुबल का सहारा लूँगा, जिसकी रणभूमि में शत्रुओं से कोई बराबरी नहीं। हे राजन्! आप अपने भाइयों के साथ एक ओर हटकर खड़े रहिए।

श्लोक 22 (4.35.22)

अयं वृक्षो महाशाखो गिरिमात्रो वनस्पतिः । अहमेनं समारुज्य पोथयिष्यामि शात्रवान् ॥

ayaṃ vṛkṣo mahāśākho girimātro vanaspatiḥ | ahamenaṃ samārujya pothayiṣyāmi śātravān

यह विशाल शाखाओं वाला, पर्वत जैसा बड़ा वृक्ष है; मैं इसे उखाड़कर इसी से शत्रुओं को कुचल डालूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (4.35.23)

तं मत्तमिव मातङ्गं वीक्षमाणं वनस्पतिम् । अब्रवीद्भ्रातरं वीरं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

taṃ mattamiva mātaṅgaṃ vīkṣamāṇaṃ vanaspatim | abravīdbhrātaraṃ vīraṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

उसे मतवाले हाथी की तरह उस वृक्ष की ओर देखते पाकर धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने वीर भाई से कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 24 (4.35.24)

भीम मा साहसं कार्षीस्तिष्ठत्वेष वनस्पतिः ॥

bhīma mā sāhasaṃ kārṣīstiṣṭhatveṣa vanaspatiḥ

भीम! दुस्साहस मत करो। यह वृक्ष जहाँ है, वहीं रहने दो।

श्लोक 25 (4.35.25)

मा त्वां वृक्षेण कर्माणि कुर्वन्तमतिमानुषम् । जनाः समवबुध्येरन्भीमोऽयमिति भारत ॥

mā tvāṃ vṛkṣeṇa karmāṇi kurvantamatimānuṣam | janāḥ samavabudhyeranbhīmo'yamiti bhārata

हे भारत! यदि तुम वृक्ष से अलौकिक कर्म करोगे, तो लोग जान जाएँगे कि 'यह भीम है'।

श्लोक 26 (4.35.26)

मा ग्रहीस्त्वमिमं वृक्षं सिंहनादं च मा नद । कर्मणा सिंहनादेन विज्ञास्यन्ति जना ध्रुवम् ॥

mā grahīstvamimaṃ vṛkṣaṃ siṃhanādaṃ ca mā nada | karmaṇā siṃhanādena vijñāsyanti janā dhruvam

इस वृक्ष को मत उठाओ और सिंहनाद भी मत करो। ऐसे कर्म और सिंहनाद से लोग निश्चय ही तुम्हें पहचान लेंगे।

श्लोक 27 (4.35.27)

इमं वृक्षं गृहीत्वा त्वं नेमां सेनामभिद्रव । वृक्षं च त्वां रुजन्तं वै विज्ञास्यति जनो ध्रुवं ॥

imaṃ vṛkṣaṃ gṛhītvā tvaṃ nemāṃ senāmabhidrava | vṛkṣaṃ ca tvāṃ rujantaṃ vai vijñāsyati jano dhruvaṃ

इस वृक्ष को लेकर इस सेना पर मत टूटो। तुम्हें वृक्ष उखाड़ते देखकर लोग निश्चय ही पहचान जाएँगे।

श्लोक 28 (4.35.28)

अन्यदेवायुधं गृह्य प्रतिपद्यस्व मानुषम् । चापं वा यदि वा शक्तिं निस्त्रिंशं वा परश्वथम् ॥

anyadevāyudhaṃ gṛhya pratipadyasva mānuṣam | cāpaṃ vā yadi vā śaktiṃ nistriṃśaṃ vā paraśvatham

कोई दूसरा, मनुष्यों के योग्य अस्त्र उठाओ — धनुष, या शक्ति, या तलवार, या फरसा।

श्लोक 29 (4.35.29)

यदेव मानुषं भीम भवेदन्यैरलक्षितम् । तदेवायुधमादाय मोचयाशु महीपतिम् ॥

yadeva mānuṣaṃ bhīma bhavedanyairalakṣitam | tadevāyudhamādāya mocayāśu mahīpatim

भीम! जो अस्त्र मनुष्यों का हो और दूसरों का ध्यान न खींचे, वही लेकर शीघ्र राजा को छुड़ाओ।

श्लोक 30 (4.35.30)

यमौ च चक्ररक्षौ ते भवितारौ महाबलौ । व्यायच्छतस्ते समरे मत्स्यराजं परीप्सतः ॥

yamau ca cakrarakṣau te bhavitārau mahābalau | vyāyacchataste samare matsyarājaṃ parīpsataḥ

जब तुम मत्स्यराज को छुड़ाने के लिए रणभूमि में जूझोगे, तब महाबली दोनों जुड़वाँ भाई तुम्हारे रथ के पहियों की रक्षा करेंगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (4.35.31)

भ्रातुर्वचनमादाय भीमो वृक्षं विसृज्य च । चापमादाय संप्राप्तो रथमास्थाय पाण्डवः ॥

bhrāturvacanamādāya bhīmo vṛkṣaṃ visṛjya ca | cāpamādāya saṃprāpto rathamāsthāya pāṇḍavaḥ

भाई की बात मानकर भीम ने वृक्ष छोड़ दिया, और वह पाण्डुपुत्र धनुष उठाकर रथ पर सवार होकर चल पड़ा।

श्लोक 32 (4.35.32)

व्यमुञ्चच्छरवर्षाणि सतोय इव तोयदः । तं भीमो भीमकर्माणं सुशर्माणमथाऽऽद्रवत् ॥

vyamuñcaccharavarṣāṇi satoya iva toyadaḥ | taṃ bhīmo bhīmakarmāṇaṃ suśarmāṇamathā''dravat

वह जल से भरे मेघ की तरह बाणों की वर्षा करने लगा। फिर भयंकर कर्म करने वाले भीम ने सुशर्मा पर धावा बोला,

श्लोक 33 (4.35.33)

विराटमभिवीक्ष्यैनं तिष्ठतिष्ठेति चावदत् ॥

virāṭamabhivīkṣyainaṃ tiṣṭhatiṣṭheti cāvadat

और विराट को देखकर ललकारा — "ठहर! ठहर!"

श्लोक 34 (4.35.34)

सुशर्मा चिन्तयामास कालान्तकयमोपमम् । तिष्ठतिष्ठेति भाषन्तं पृष्ठतो रथपुङ्गवः ॥

suśarmā cintayāmāsa kālāntakayamopamam | tiṣṭhatiṣṭheti bhāṣantaṃ pṛṣṭhato rathapuṅgavaḥ

रथियों में श्रेष्ठ सुशर्मा ने पीछे से "ठहर! ठहर!" पुकारते भीम को प्रलयकाल के यमराज के समान समझा।

श्लोक 35 (4.35.35)

पश्यतां सुमहत्कर्म महद्युद्धमुपस्थितम् । परावृत्तो धनुर्गृह्य सुशर्मा भ्रातृभिः सह ॥

paśyatāṃ sumahatkarma mahadyuddhamupasthitam | parāvṛtto dhanurgṛhya suśarmā bhrātṛbhiḥ saha

सबके देखते-देखते, जब एक महान् कर्म और भीषण युद्ध सामने आ खड़ा हुआ, तब सुशर्मा धनुष उठाकर अपने भाइयों के साथ लौट पड़ा।

श्लोक 36 (4.35.36)

निमेषान्तरमात्रेण भीमसेनेन ते रथाः । रथानां च गजानां च वाजिनां च ससादिनां ॥

nimeṣāntaramātreṇa bhīmasenena te rathāḥ | rathānāṃ ca gajānāṃ ca vājināṃ ca sasādināṃ

पलक झपकते ही भीमसेन ने वे रथ गिरा दिए — रथों, हाथियों और सवारों सहित घोड़ों के,

श्लोक 37 (4.35.37)

सहस्रशतसंघाताः शूराणामुग्रधन्विनाम् । पातिता भीमसेनेन विराटस्य समीपतः ॥

sahasraśatasaṃghātāḥ śūrāṇāmugradhanvinām | pātitā bhīmasenena virāṭasya samīpataḥ

सैकड़ों-हज़ारों के समूह और उग्र धनुर्धर शूरवीर — सबको भीमसेन ने विराट के पास ही धराशायी कर दिया।

श्लोक 38 (4.35.38)

पत्तयो निहतास्तेषां गदां गृह्य महात्मना ॥

pattayo nihatāsteṣāṃ gadāṃ gṛhya mahātmanā

उस महात्मा ने गदा उठाकर उनके पैदल सैनिकों को भी मार डाला।

श्लोक 39 (4.35.39)

तद्दृष्ट्वा तादृशं युद्धं सुशर्मा युद्धदुर्मदः । चिन्तयामास मनसा किं शेषं हि बलस्य मे ॥

taddṛṣṭvā tādṛśaṃ yuddhaṃ suśarmā yuddhadurmadaḥ | cintayāmāsa manasā kiṃ śeṣaṃ hi balasya me

ऐसा युद्ध देखकर रणोन्मत्त सुशर्मा मन ही मन सोचने लगा — "मेरी सेना में अब बचा ही क्या है?"

श्लोक 40 (4.35.40)

अपरो दृश्यते सैन्ये पुरा मग्नो महाबले । आकर्णपूर्णेन तदा धनुषा प्रत्यदृश्यत ॥

aparo dṛśyate sainye purā magno mahābale | ākarṇapūrṇena tadā dhanuṣā pratyadṛśyata

सेना में एक और योद्धा दिखाई दिया, जो पहले उस विशाल सेना में डूबा हुआ-सा था; अब वह कान तक खिंचे धनुष के साथ प्रकट हुआ।

श्लोक 41 (4.35.41)

सुशर्मा सायकांस्तीक्ष्णान्क्षिपते च पुनःपुनः ॥

suśarmā sāyakāṃstīkṣṇānkṣipate ca punaḥpunaḥ

सुशर्मा बार-बार तीखे बाण छोड़ने लगा।

श्लोक 42 (4.35.42)

ततः समस्तास्ते सर्वे तुरगानभ्यचोदयन् । दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणास्त्रिगर्तान्प्रत्यमर्षणाः ॥

tataḥ samastāste sarve turagānabhyacodayan | divyamastraṃ vikurvāṇāstrigartānpratyamarṣaṇāḥ

तब वे सब एक साथ अपने घोड़ों को हाँकते हुए, दिव्य अस्त्रों का प्रयोग करते हुए, क्रोध में भरकर त्रिगर्तों पर टूट पड़े।

श्लोक 43 (4.35.43)

तान्निवृत्तरथान्दृष्ट्वा पाण्डवास्तां महाचमूम् । वैराटिः परमक्रुद्धो युयुधे परमाद्भुतम् ॥

tānnivṛttarathāndṛṣṭvā pāṇḍavāstāṃ mahācamūm | vairāṭiḥ paramakruddho yuyudhe paramādbhutam

उन्हें रथ लौटाते देखकर पाण्डव उस विशाल सेना पर टूट पड़े, और विराट का पुत्र अत्यन्त क्रुद्ध होकर अद्भुत युद्ध करने लगा।

श्लोक 44 (4.35.44)

त्रिगर्ताः समभिक्रम्य अयुध्यन्त जयैषिणः । तान्भीमसेनः संक्रुद्धः सर्वशस्त्रभृतांवरः । भीमः सप्तशतान्योधान्परलोकमदर्शयत् ॥

trigartāḥ samabhikramya ayudhyanta jayaiṣiṇaḥ | tānbhīmasenaḥ saṃkruddhaḥ sarvaśastrabhṛtāṃvaraḥ | bhīmaḥ saptaśatānyodhānparalokamadarśayat

विजय की इच्छा वाले त्रिगर्त आगे बढ़कर युद्ध करने लगे। तब समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ भीमसेन क्रोध में भरकर उन पर टूटे, और भीम ने सात सौ योद्धाओं को परलोक दिखा दिया।

श्लोक 45 (4.35.45)

सहस्रं प्राहिणोद्राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । नकुलश्चापि सप्तैव शतानि प्राहिणोच्छरैः ॥

sahasraṃ prāhiṇodrājā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | nakulaścāpi saptaiva śatāni prāhiṇoccharaiḥ

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने एक हज़ार योद्धाओं को परलोक भेजा, और नकुल ने भी अपने बाणों से सात सौ को भेज दिया।

श्लोक 46 (4.35.46)

शतानि त्रीणि शूराणां सहदेवः प्रतापवान् । युधिष्ठिरसमादिष्टो निजघ्ने पुरुषर्षभः ॥

śatāni trīṇi śūrāṇāṃ sahadevaḥ pratāpavān | yudhiṣṭhirasamādiṣṭo nijaghne puruṣarṣabhaḥ

युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर पुरुषश्रेष्ठ प्रतापी सहदेव ने तीन सौ वीरों को मार डाला।

श्लोक 47 (4.35.47)

प्रविश्य महतीं सेनां त्रिगर्तानां महाबलः । क्षोभयन्सर्वभूतानि सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥

praviśya mahatīṃ senāṃ trigartānāṃ mahābalaḥ | kṣobhayansarvabhūtāni siṃhaḥ kṣudramṛgāniva

उस महाबली ने त्रिगर्तों की विशाल सेना में घुसकर सब प्राणियों को वैसे ही व्याकुल कर दिया, जैसे सिंह छोटे मृगों को कर देता है।

श्लोक 48 (4.35.48)

ततो युधिष्ठिरो राजा त्वरमाणो महाबलः । अभिद्रुत्य सुशर्माणं शरैरभ्यहनद्धृशम् ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā tvaramāṇo mahābalaḥ | abhidrutya suśarmāṇaṃ śarairabhyahanaddhṛśam

तब महाबली राजा युधिष्ठिर ने शीघ्रता से सुशर्मा पर धावा बोलकर उसे बाणों से बुरी तरह घायल किया।

श्लोक 49 (4.35.49)

सुशर्माऽपि सुसंक्रुद्धस्त्वरमाणो युधिष्ठिरम् । अविध्यद्दशभिर्बाणैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥

suśarmā'pi susaṃkruddhastvaramāṇo yudhiṣṭhiram | avidhyaddaśabhirbāṇaiścaturbhiścaturo hayān

सुशर्मा ने भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर फुर्ती से युधिष्ठिर को दस बाणों से और उनके चारों घोड़ों को चार बाणों से बींध दिया।

श्लोक 50 (4.35.50)

ततो राजन्क्षिप्रकारी कुन्तीपुत्रो वृकोदरः । समासाद्य सुशर्माणमश्वांस्तस्य न्यपातयत् ॥

tato rājankṣiprakārī kuntīputro vṛkodaraḥ | samāsādya suśarmāṇamaśvāṃstasya nyapātayat

हे राजन्! तब फुर्तीले कुन्तीपुत्र वृकोदर ने सुशर्मा के पास पहुँचकर उसके घोड़ों को मार गिराया।

श्लोक 51 (4.35.51)

पृष्ठगोपौ च तस्याथ हत्वा परमसायकैः । अथास्य सारथिं क्रुद्धो रथोपस्थादपातयत् ॥

pṛṣṭhagopau ca tasyātha hatvā paramasāyakaiḥ | athāsya sārathiṃ kruddho rathopasthādapātayat

उत्तम बाणों से सुशर्मा के दोनों पृष्ठरक्षकों को मारकर उसने क्रोध में भरकर उसके सारथि को भी रथ की बैठक से नीचे गिरा दिया।

श्लोक 52 (4.35.52)

चक्ररक्षस्तु शूरश्च शोणाश्वो नाम नामतः । स भयाद्विरथं दृष्ट्वा त्रैगर्तं व्याजहात्तदा ॥

cakrarakṣastu śūraśca śoṇāśvo nāma nāmataḥ | sa bhayādvirathaṃ dṛṣṭvā traigartaṃ vyājahāttadā

उसका चक्ररक्षक, शोणाश्व नामक शूरवीर, उसे रथहीन देखकर भय के मारे त्रिगर्तराज को छोड़कर चला गया।

श्लोक 53 (4.35.53)

ततो विराटः प्रस्कन्द्य रथादथ सुशर्मणः । गदामस्य परामृश्य तमेवाभ्यहनद्बली ॥

tato virāṭaḥ praskandya rathādatha suśarmaṇaḥ | gadāmasya parāmṛśya tamevābhyahanadbalī

तब बलवान विराट सुशर्मा के रथ से कूद पड़ा और उसी की गदा उठाकर उसी पर प्रहार किया।

श्लोक 54 (4.35.54)

स चचार गदापाणिर्वृद्धोऽपि तरुणो यथा ॥

sa cacāra gadāpāṇirvṛddho'pi taruṇo yathā

बूढ़ा होते हुए भी वह गदा हाथ में लिए किसी युवक की भाँति रणभूमि में विचरने लगा।

श्लोक 55 (4.35.55)

भीमस्तु भीमसंकाशो रथात्प्रस्कन्द्य वीर्यवान् । उत्प्लुत्य गत्वा वेगेन तद्रथे विनिपत्य च । सुशर्मणः शिरोऽगृह्णात्पुनराश्वास्य युध्यतः ॥

bhīmastu bhīmasaṃkāśo rathātpraskandya vīryavān | utplutya gatvā vegena tadrathe vinipatya ca | suśarmaṇaḥ śiro'gṛhṇātpunarāśvāsya yudhyataḥ

भयानक रूप वाले पराक्रमी भीम अपने रथ से कूद पड़े, वेग से छलाँग लगाकर सुशर्मा के रथ पर जा गिरे, और सँभलकर फिर से लड़ते हुए सुशर्मा का सिर पकड़ लिया।

श्लोक 56 (4.35.56)

अग्राद्गिरेर्विनिक्षिप्य सिंहः क्षुद्रमृगं यथा । ऊर्ध्वमुत्प्लुत्य मार्जार आखोर्यद्वच्छिरो रुषा ॥

agrādgirervinikṣipya siṃhaḥ kṣudramṛgaṃ yathā | ūrdhvamutplutya mārjāra ākhoryadvacchiro ruṣā

जैसे सिंह पर्वत की चोटी से छोटे मृग को पटक देता है, और जैसे बिल्ली उछलकर क्रोध से चूहे का सिर दबोच लेती है,

श्लोक 57 (4.35.57)

समुद्यम्य तु रोषात्तं निष्पिपेष महीतले । यदा मूर्ध्नि महाबाहुः प्राहरद्विलपिष्यतः ॥

samudyamya tu roṣāttaṃ niṣpipeṣa mahītale | yadā mūrdhni mahābāhuḥ prāharadvilapiṣyataḥ

वैसे ही भीम ने क्रोध में भरकर उसे उठाया और धरती पर पटककर रगड़ डाला। जब उस महाबाहु ने विलाप करते सुशर्मा के सिर पर प्रहार किया,

श्लोक 58 (4.35.58)

तस्य जानु ददौ भीमो जघ्ने चैनमरत्निना । स मोहमगमद्राजा प्रहारवरपीडितः ॥

tasya jānu dadau bhīmo jaghne cainamaratninā | sa mohamagamadrājā prahāravarapīḍitaḥ

तब भीम ने उस पर घुटना टिका दिया और कोहनी से प्रहार किया; उन भारी प्रहारों से पीड़ित होकर वह राजा मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 59 (4.35.59)

तस्मिन्वीरे गृहीते तु त्रिगर्तानां महारथे । अभज्यत बलं सर्वं त्रिगर्तानां भयातुरम् ॥

tasminvīre gṛhīte tu trigartānāṃ mahārathe | abhajyata balaṃ sarvaṃ trigartānāṃ bhayāturam

त्रिगर्तों के उस महारथी वीर के पकड़े जाते ही त्रिगर्तों की सारी सेना भय से व्याकुल होकर बिखर गई।

श्लोक 60 (4.35.60)

निवृत्य गास्ततः सर्वाः पाण्डुपुत्रा महारथाः । अवजित्य सुशर्माणं धनं चादाय सर्वशः ॥

nivṛtya gāstataḥ sarvāḥ pāṇḍuputrā mahārathāḥ | avajitya suśarmāṇaṃ dhanaṃ cādāya sarvaśaḥ

तब महारथी पाण्डुपुत्रों ने सारी गौओं को लौटा लिया और सुशर्मा को पराजित करके उसका सारा धन भी ले लिया।

श्लोक 61 (4.35.61)

स्वबाहुबलसंपन्ना ह्रीनिषेवा यतव्रताः । विराटस्य महात्मानः परिक्लेशविनाशनाः । स्थिताः समक्षं ते सर्वे त्वथ भीमोऽभ्यभाषत ॥

svabāhubalasaṃpannā hrīniṣevā yatavratāḥ | virāṭasya mahātmānaḥ parikleśavināśanāḥ | sthitāḥ samakṣaṃ te sarve tvatha bhīmo'bhyabhāṣata

अपने बाहुबल से सम्पन्न, लज्जाशील और व्रतों में दृढ़ वे सब महात्मा, जिन्होंने विराट का संकट दूर किया था, उसके सामने खड़े हुए। तब भीम ने कहा —

श्लोक 62 (4.35.62)

नायं पापसमाचारो मत्तो जीवितुमर्हति । किंनु शक्यं मया कर्तुं यद्राजा सततं घृणी । गले गृहीत्वा राजानमानीय विवशं वशम् ॥

nāyaṃ pāpasamācāro matto jīvitumarhati | kiṃnu śakyaṃ mayā kartuṃ yadrājā satataṃ ghṛṇī | gale gṛhītvā rājānamānīya vivaśaṃ vaśam

"यह पापाचारी मेरे हाथों जीवित रहने योग्य नहीं है। किन्तु मैं क्या कर सकता हूँ, जब राजा सदा दयालु हैं?" फिर उस राजा को गले से पकड़कर, विवश करके अपने वश में लाकर —

श्लोक 63 (4.35.63)

तत एनं विचेष्टन्तं बद्ध्वा पार्थो वृकोदरः । रथमारोपयामास विसंज्ञं पांसुगुण्ठितम् ॥

tata enaṃ viceṣṭantaṃ baddhvā pārtho vṛkodaraḥ | rathamāropayāmāsa visaṃjñaṃ pāṃsuguṇṭhitam

पृथापुत्र वृकोदर ने छटपटाते हुए उसे बाँध दिया और धूल से सने, अचेत सुशर्मा को रथ पर डाल दिया।

श्लोक 64 (4.35.64)

अभ्येत्य रणमध्यस्थमभ्यगच्छद्युधिष्ठिरम् । दर्शयामास भीमस्तु सुशर्माणं नराधिपम् ॥

abhyetya raṇamadhyasthamabhyagacchadyudhiṣṭhiram | darśayāmāsa bhīmastu suśarmāṇaṃ narādhipam

रणभूमि के बीच खड़े युधिष्ठिर के पास जाकर भीम ने उन्हें नरपति सुशर्मा को दिखाया।

श्लोक 65 (4.35.65)

प्रोवाच पुरुषव्याघ्रो भीममाहवशोभिनम् । तं राजा प्राहसद्दृष्ट्वा मुच्यतां वै नराधमः ॥

provāca puruṣavyāghro bhīmamāhavaśobhinam | taṃ rājā prāhasaddṛṣṭvā mucyatāṃ vai narādhamaḥ

उसे देखकर राजा युधिष्ठिर हँस पड़े, और उस पुरुषसिंह ने युद्ध में शोभा पाने वाले भीम से कहा — "इस नीच पुरुष को छोड़ दो।"

श्लोक 66 (4.35.66)

एवमुक्तोऽब्रवीद्भीमः सुशर्माणं महाबलम् । जीवितुं चेच्छसे मूढ हेतुं मे गदतः शृणु ॥

evamukto'bravīdbhīmaḥ suśarmāṇaṃ mahābalam | jīvituṃ cecchase mūḍha hetuṃ me gadataḥ śṛṇu

ऐसा कहे जाने पर भीम ने महाबली सुशर्मा से कहा — "मूर्ख! यदि जीना चाहता है, तो मेरी बताई शर्त सुन।"

भीमसेन उवाच

श्लोक 67 (4.35.67)

दासोस्मीति त्वया वाच्यं संसत्सु च सभासु च । एवं ते जीवितं दद्यामेष युद्धजितो विधिः ॥

dāsosmīti tvayā vācyaṃ saṃsatsu ca sabhāsu ca | evaṃ te jīvitaṃ dadyāmeṣa yuddhajito vidhiḥ

तुझे राजसभाओं और जनसभाओं में कहना होगा कि 'मैं दास हूँ'। इसी शर्त पर मैं तुझे जीवनदान दूँगा; युद्ध में हारे हुए के लिए यही विधान है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 68 (4.35.68)

तमुवाच ततो ज्येष्ठो भ्राता सप्रणयं वचः । मुञ्चमुञ्चाधमाचारं प्रमाणं यदि ते वयम् ॥

tamuvāca tato jyeṣṭho bhrātā sapraṇayaṃ vacaḥ | muñcamuñcādhamācāraṃ pramāṇaṃ yadi te vayam

तब बड़े भाई ने उससे स्नेहपूर्वक कहा — "यदि तुम हमें प्रमाण मानते हो, तो इस नीच आचरण वाले को छोड़ दो, छोड़ दो।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 69 (4.35.69)

दासभावं गतो ह्येष विराटस्य महीपतेः । अदासो गच्छ मुक्तोसि मैवं कार्षीः कदाचन ॥

dāsabhāvaṃ gato hyeṣa virāṭasya mahīpateḥ | adāso gaccha muktosi maivaṃ kārṣīḥ kadācana

यह तो राजा विराट का दास बन ही चुका है। जाओ, तुम दास नहीं हो, तुम मुक्त हो। फिर कभी ऐसा मत करना।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 70 (4.35.70)

एवमुक्ते तु सव्रीडः सुशर्माऽसीदधोमुखः । स मुक्तोऽभ्येत्य राजानमभिवाद्य प्रतस्थिवान् ॥

evamukte tu savrīḍaḥ suśarmā'sīdadhomukhaḥ | sa mukto'bhyetya rājānamabhivādya pratasthivān

ये वचन सुनकर सुशर्मा लज्जा से मुँह नीचा किए बैठा रहा। फिर मुक्त होकर वह राजा के पास गया, उन्हें प्रणाम किया और चला गया।

श्लोक 71 (4.35.71)

विसृज्य तु सुशर्माणं पाण्डवास्ते हतद्विषः । स्वबाहुबलसंपन्ना ह्रीनिषेवा यतव्रताः । संग्रामशिरसो मध्ये तां रात्रिं सुखिनोऽवसन् ॥

visṛjya tu suśarmāṇaṃ pāṇḍavāste hatadviṣaḥ | svabāhubalasaṃpannā hrīniṣevā yatavratāḥ | saṃgrāmaśiraso madhye tāṃ rātriṃ sukhino'vasan

सुशर्मा को विदा करके, शत्रुओं का संहार कर चुके, अपने बाहुबल से सम्पन्न, लज्जाशील और व्रत में दृढ़ पाण्डवों ने वह रात रणभूमि के बीच सुखपूर्वक बिताई।

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