विराट पर्व · अध्याय 36
विराट द्वारा पाण्डवों का सम्मान और विजय का सन्देश
बन्धन से छूटकर विराट छद्मवेशी पाण्डवों का सत्कार करते हैं और उन्हें अपने रत्न, अपनी कन्याएँ और मत्स्यदेश का स्वामित्व देना चाहते हैं; पाण्डव कहते हैं कि उनका मुक्त होना ही पर्याप्त पुरस्कार है। विराट कङ्क का राज्याभिषेक करना चाहते हैं और रसोइये वलल के पराक्रम पर चकित होते हैं, पर युधिष्ठिर केवल यही माँगते हैं कि विराट अपने परिवार के पास लौटें और सुशर्मा को जाने दें। कङ्क के कहने पर विराट दूतों को आगे भेजते हैं, जो रात भर चलकर सूर्योदय के समय नगर में उनकी विजय की घोषणा करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.36.1)
ततो विराटः कौन्तेयानतिमानुषविक्रमान् । अर्चयामास वित्तेन मानेन च महारथान् । वचसा चैव सान्त्वेन स्नेहेन च मुदाऽन्वितः ॥
tato virāṭaḥ kaunteyānatimānuṣavikramān | arcayāmāsa vittena mānena ca mahārathān | vacasā caiva sāntvena snehena ca mudā'nvitaḥ
तब विराट ने हर्ष से भरकर अलौकिक पराक्रम वाले महारथी कुन्तीपुत्रों का धन और सम्मान से, मधुर वचनों और स्नेह से सत्कार किया।
विराट उवाच
श्लोक 2 (4.36.2)
यथैव मम रत्नानि युष्माकं तानि वै तथा । कार्यं कुरुत तैः सर्वैर्यथाकामं यथासुखम् ॥
yathaiva mama ratnāni yuṣmākaṃ tāni vai tathā | kāryaṃ kuruta taiḥ sarvairyathākāmaṃ yathāsukham
जैसे ये रत्न मेरे हैं, वैसे ही तुम्हारे भी हैं। तुम सब इनसे अपनी इच्छा और सुख के अनुसार काम लो।
श्लोक 3 (4.36.3)
ददाम्यलंकृताः कन्या वसूनि विविधानि च । मनसा चाप्यभिप्रेतं यद्वः शत्रुनिबर्हणाः ॥
dadāmyalaṃkṛtāḥ kanyā vasūni vividhāni ca | manasā cāpyabhipretaṃ yadvaḥ śatrunibarhaṇāḥ
हे शत्रुसंहारको! मैं तुम्हें आभूषणों से सजी कन्याएँ, अनेक प्रकार के धन और जो कुछ भी तुम्हारे मन को अभीष्ट हो, वह सब दूँगा।
श्लोक 4 (4.36.4)
युष्माकं विक्रमादद्य मुक्तोऽहं स्वस्तिमानिह । तस्माद्भवन्तो मत्स्यानामीश्वराः सर्व एव हि ॥
yuṣmākaṃ vikramādadya mukto'haṃ svastimāniha | tasmādbhavanto matsyānāmīśvarāḥ sarva eva hi
आज तुम्हारे पराक्रम से ही मैं मुक्त होकर यहाँ सकुशल हूँ। इसलिए तुम सभी मत्स्यदेश के स्वामी हो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (4.36.5)
तं तथावादिनं तत्र कौरवेयाः पृथक्पृथक् । ऊचुः प्रहृष्टमनसो युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥
taṃ tathāvādinaṃ tatra kauraveyāḥ pṛthakpṛthak | ūcuḥ prahṛṣṭamanaso yudhiṣṭhirapurogamāḥ
उनके ऐसा कहने पर युधिष्ठिर आदि कुरुवंशियों ने प्रसन्न मन से अलग-अलग उत्तर दिया —
पाण्डवा ऊचुः
श्लोक 6 (4.36.6)
प्रतिनन्दामहे वाचं सर्वथैव विशांपते । एतावताऽद्य प्रीताःस्मो यत्त्वं मुक्तोसि शत्रुभिः ॥
pratinandāmahe vācaṃ sarvathaiva viśāṃpate | etāvatā'dya prītāḥsmo yattvaṃ muktosi śatrubhiḥ
हे प्रजापालक! हम आपके वचनों का सब प्रकार से अभिनन्दन करते हैं। आज हमें इतने से ही प्रसन्नता है कि आप शत्रुओं से छूट गए।
श्लोक 7 (4.36.7)
यत्त्वं मुक्तोसि शत्रुभ्यो ह्येतत्कार्यं हितं हि नः । न किंचित्कार्यमस्माकं न धनं मृगयामहे ॥
yattvaṃ muktosi śatrubhyo hyetatkāryaṃ hitaṃ hi naḥ | na kiṃcitkāryamasmākaṃ na dhanaṃ mṛgayāmahe
आप शत्रुओं से मुक्त हुए, यही हमारा अभीष्ट और हितकर कार्य था। हमें और कुछ नहीं चाहिए, न हम धन की खोज में हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (4.36.8)
अथाब्रवीत्प्रीतमना मात्स्यराजो युधिष्ठिरम् । निर्भरः प्रीतिपूरेण हर्षगद्गदया गिरा ॥
athābravītprītamanā mātsyarājo yudhiṣṭhiram | nirbharaḥ prītipūreṇa harṣagadgadayā girā
तब प्रसन्न मन वाले मत्स्यराज ने प्रेम से भरकर, हर्ष से गद्गद वाणी में युधिष्ठिर से कहा।
श्लोक 9 (4.36.9)
पुनरेव महाबाहुर्विराटो राजसत्तमः । एहि त्वामभिषेक्ष्यामि मत्स्यराजस्तु नो भवान् ॥
punareva mahābāhurvirāṭo rājasattamaḥ | ehi tvāmabhiṣekṣyāmi matsyarājastu no bhavān
राजाओं में श्रेष्ठ महाबाहु विराट ने फिर कहा — "आइए, मैं आपका अभिषेक करूँगा; आप ही हमारे मत्स्यराज हों।"
विराट उवाच
श्लोक 10 (4.36.10)
मनसा चाप्यभिप्रेतं यत्ते शत्रुनिबर्हण । तत्तेऽहं संप्रदास्यामि सर्वमर्हति नो भवान् ॥
manasā cāpyabhipretaṃ yatte śatrunibarhaṇa | tatte'haṃ saṃpradāsyāmi sarvamarhati no bhavān
हे शत्रुसंहारक! आपके मन को जो भी अभीष्ट हो, वह सब मैं आपको दूँगा; हमारा सब कुछ पाने के आप योग्य हैं।
श्लोक 11 (4.36.11)
रत्नानि गाः सुवर्णं च मणिमुक्तमथापि वा । वैयाघ्रपद्य विप्रेन्द्र सर्वथैव नमोस्तु ते ॥
ratnāni gāḥ suvarṇaṃ ca maṇimuktamathāpi vā | vaiyāghrapadya viprendra sarvathaiva namostu te
रत्न, गौएँ, सुवर्ण, मणि और मोती, या जो कुछ भी — हे वैयाघ्रपद्य! हे विप्रश्रेष्ठ! मैं सब प्रकार से आपको नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 12 (4.36.12)
त्वत्कृते ह्यद्य पश्यामि राज्यमात्मानमेव च । यतश्च जातः संरम्भः स च शत्रुर्वशं गतः ॥
tvatkṛte hyadya paśyāmi rājyamātmānameva ca | yataśca jātaḥ saṃrambhaḥ sa ca śatrurvaśaṃ gataḥ
आपके कारण ही आज मैं अपना राज्य और अपना जीवन फिर से देख रहा हूँ, और जिसके कारण यह सारा उपद्रव खड़ा हुआ था, वह शत्रु भी वश में आ गया है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (4.36.13)
ततो युधिष्ठिरो मात्स्यं पुनरेवाब्रवीद्वचः । प्रतिनन्दामि ते वाचं मनोज्ञां मात्स्य भाषितां ॥
tato yudhiṣṭhiro mātsyaṃ punarevābravīdvacaḥ | pratinandāmi te vācaṃ manojñāṃ mātsya bhāṣitāṃ
तब युधिष्ठिर ने मत्स्यराज से फिर कहा — "हे मत्स्यराज! आपके कहे हुए मनोहर वचनों का मैं अभिनन्दन करता हूँ।"
श्लोक 14 (4.36.14)
आनृशंस्यपरो नित्यं सुमुखः सततं भवान् । पुनरेव विराटश्च राजा कङ्कमभाषत ॥
ānṛśaṃsyaparo nityaṃ sumukhaḥ satataṃ bhavān | punareva virāṭaśca rājā kaṅkamabhāṣata
"आप सदा दया-परायण और सदा प्रसन्नमुख रहते हैं।" तब राजा विराट ने कङ्क से फिर कहा —
विराट उवाच
श्लोक 15 (4.36.15)
अहो शूद्रस्य कर्माणि वललस्य द्विजोत्तम । सोहं शूद्रेण संग्रामे वललेनाभिरक्षितः ॥
aho śūdrasya karmāṇi valalasya dvijottama | sohaṃ śūdreṇa saṃgrāme valalenābhirakṣitaḥ
हे द्विजश्रेष्ठ! अहो, शूद्र वलल के कैसे अद्भुत कर्म हैं! उस शूद्र वलल ने ही युद्ध में मेरी रक्षा की।
श्लोक 16 (4.36.16)
त्वत्कृते सर्वमेवैतदुपपन्नं ममानघ । वरं वृणीष्व भद्रं ते ब्रूहि किं करवाणि ते ॥
tvatkṛte sarvamevaitadupapannaṃ mamānagha | varaṃ vṛṇīṣva bhadraṃ te brūhi kiṃ karavāṇi te
हे निष्पाप! यह सब आपके ही कारण मुझे प्राप्त हुआ है। आपका कल्याण हो, कोई वर माँगिए; बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ।
श्लोक 17 (4.36.17)
ददामि ते महाप्रीत्या रत्नान्युच्चावचान्यहम् । शयनासनयानानि कन्याश्च समलंकृताः ॥
dadāmi te mahāprītyā ratnānyuccāvacānyaham | śayanāsanayānāni kanyāśca samalaṃkṛtāḥ
मैं बड़े प्रेम से आपको भाँति-भाँति के रत्न, शय्याएँ, आसन, वाहन और भली-भाँति सजी हुई कन्याएँ दूँगा,
श्लोक 18 (4.36.18)
हस्त्यश्वरथसङ्घाश्च राष्ट्राणि विविधानि च । एतानि च मम प्रीत्या प्रतिगृह्ण ममान्तिके ॥
hastyaśvarathasaṅghāśca rāṣṭrāṇi vividhāni ca | etāni ca mama prītyā pratigṛhṇa mamāntike
हाथियों, घोड़ों और रथों के समूह तथा अनेक प्रकार के राष्ट्र भी। मेरे प्रेम के लिए इन्हें यहाँ मेरे सामने स्वीकार कीजिए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (4.36.19)
तं तथावादिनं तत्र कौरव्यः प्रत्यभाषत । एषैव तु मम प्रीतिर्यत्त्वं मुक्तोसि शत्रुभिः ॥
taṃ tathāvādinaṃ tatra kauravyaḥ pratyabhāṣata | eṣaiva tu mama prītiryattvaṃ muktosi śatrubhiḥ
उनके ऐसा कहने पर कुरुवंशी युधिष्ठिर ने वहाँ उत्तर दिया — "मेरी प्रसन्नता तो बस इसी में है कि आप शत्रुओं से मुक्त हो गए।"
कङ्क उवाच
श्लोक 20 (4.36.20)
प्रतीतश्चेत्पुरं तुष्टः प्रविशाद्य परंतप । दारैः पुत्रैश्च संश्लिष्य सा हि प्रीतिर्ममातुला ॥
pratītaścetpuraṃ tuṣṭaḥ praviśādya paraṃtapa | dāraiḥ putraiśca saṃśliṣya sā hi prītirmamātulā
हे शत्रुतापन! यदि आप सन्तुष्ट और आश्वस्त हैं, तो आज ही अपने नगर में प्रवेश कीजिए और अपनी पत्नियों तथा पुत्रों से मिलिए — यही मेरे लिए अनुपम प्रसन्नता है।
श्लोक 21 (4.36.21)
सुशर्माणं तु राजेन्द्र सभृत्यबलवाहनम् । विसर्जय नरश्रेष्ठं वरमेतदहं वृणे ॥
suśarmāṇaṃ tu rājendra sabhṛtyabalavāhanam | visarjaya naraśreṣṭhaṃ varametadahaṃ vṛṇe
और हे राजेन्द्र! उस नरश्रेष्ठ सुशर्मा को उसके सेवकों, सेना और वाहनों सहित जाने दीजिए — यही वर मैं माँगता हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (4.36.22)
एवमुक्ते तु कङ्केन विराटो राजसत्तमः । प्रत्युवाच ततः कङ्कं सुशर्मा यातु चेष्टतः ॥
evamukte tu kaṅkena virāṭo rājasattamaḥ | pratyuvāca tataḥ kaṅkaṃ suśarmā yātu ceṣṭataḥ
कङ्क के ऐसा कहने पर राजाओं में श्रेष्ठ विराट ने उत्तर दिया — "सुशर्मा अपनी इच्छा से चला जाए।"
कङ्क उवाच
श्लोक 23 (4.36.23)
गच्छन्तु दूतास्त्वरिता नगरं तव पार्थिव । सुहृदां प्रियमाख्यातुं घोषयन्तु च ते जयम् ॥
gacchantu dūtāstvaritā nagaraṃ tava pārthiva | suhṛdāṃ priyamākhyātuṃ ghoṣayantu ca te jayam
हे राजन्! शीघ्रगामी दूत आपके नगर में जाएँ और आपके सुहृदों को यह शुभ समाचार सुनाकर आपकी विजय की घोषणा करें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (4.36.24)
ततस्तद्वचनान्मात्स्यो दूतान्राजा समादिशत् । आचक्षध्वं पुरं गत्वा संग्रामे विजयं मम ॥
tatastadvacanānmātsyo dūtānrājā samādiśat | ācakṣadhvaṃ puraṃ gatvā saṃgrāme vijayaṃ mama
उनके कहने पर मत्स्यराज ने दूतों को आज्ञा दी — "नगर में जाकर संग्राम में मेरी विजय का समाचार सुनाओ।"
विराट उवाच
श्लोक 25 (4.36.25)
कुमार्यः समलंकृत्य पर्यागच्छन्तु मे पुरात् । वादित्राणि च सर्वाणि गणिकाश्च स्वलंकृताः । प्रत्यायान्तु च मे शीघ्रं नागराः सर्व एव ते ॥
kumāryaḥ samalaṃkṛtya paryāgacchantu me purāt | vāditrāṇi ca sarvāṇi gaṇikāśca svalaṃkṛtāḥ | pratyāyāntu ca me śīghraṃ nāgarāḥ sarva eva te
कुमारियाँ सज-धजकर मेरे नगर से मेरी अगवानी के लिए आएँ; सब प्रकार के बाजे और सजी हुई गणिकाएँ भी आएँ, और सभी नगरवासी शीघ्र मेरे स्वागत के लिए निकल आएँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (4.36.26)
एवमुक्तास्तथा दूता रात्रौ यात्वा तु केवलम् । ततोऽन्तरे चानुषिता दूताः शीघ्रानुयायिनः ॥
evamuktāstathā dūtā rātrau yātvā tu kevalam | tato'ntare cānuṣitā dūtāḥ śīghrānuyāyinaḥ
ऐसी आज्ञा पाकर वे शीघ्रगामी दूत पूरी रात चलते रहे और बीच में कहीं नहीं रुके;
श्लोक 27 (4.36.27)
नगरं प्राविशंस्ते वै सूर्ये सम्यगथोदिते । विराटनगरं प्राप्य शीघ्रं नान्दीमघोषयन् । पताकोच्छ्रयमाल्याढ्यं पुरमप्रतिमं यथा ॥
nagaraṃ prāviśaṃste vai sūrye samyagathodite | virāṭanagaraṃ prāpya śīghraṃ nāndīmaghoṣayan | patākocchrayamālyāḍhyaṃ puramapratimaṃ yathā
सूर्य के भली-भाँति उदित होते ही उन्होंने नगर में प्रवेश किया। विराट के नगर में पहुँचकर उन्होंने शीघ्र ही मंगल-घोषणा करवाई, और ऊँची पताकाओं तथा मालाओं से सजा वह नगर अनुपम दिखने लगा।