विराट पर्व · अध्याय 37
कौरवों द्वारा मत्स्य देश की गायों का हरण
जब विराट त्रिगर्तों से लड़ने गए हुए थे, तब दुर्योधन भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृप, अश्वत्थामा, शकुनि और अन्य कौरव योद्धाओं के साथ दूसरी ओर से मत्स्य देश पर टूट पड़ा, ग्वालों को खदेड़कर एक लाख गायें हाँक ले चला। गोशाला का अध्यक्ष दौड़कर नगर पहुँचा और राजधानी के रक्षक बनाकर छोड़े गए विराटपुत्र भूमिंजय (उत्तर) को इस आक्रमण का समाचार दिया। उसने राजकुमार से आग्रह किया कि वह पिता द्वारा की गई अपनी प्रशंसा को सत्य करे, सिंह-ध्वजा फहराकर निकले और जैसे अर्जुन पाण्डवों के लिए करते हैं वैसे ही गोधन लौटा लाए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.37.1)
याते त्रिगर्तान्मात्स्ये तु पशूंस्तान्वै परीप्सति । दुर्योधनः सहामात्यैर्विराटपुरमभ्यगात् ॥
yāte trigartānmātsye tu paśūṃstānvai parīpsati | duryodhanaḥ sahāmātyairvirāṭapuramabhyagāt
जब मत्स्यराज अपने उन पशुओं को छुड़ाने के लिए त्रिगर्तों की ओर गए हुए थे, तब दुर्योधन अपने मन्त्रियों के साथ विराट के नगर पर चढ़ आया।
श्लोक 2 (4.37.2)
भीष्मद्रोणौ च कर्णश्च कृपश्च परमास्त्रवित् । द्रौणिश्च सौबलश्चैव तथा दुःशासनः शलः ॥
bhīṣmadroṇau ca karṇaśca kṛpaśca paramāstravit | drauṇiśca saubalaścaiva tathā duḥśāsanaḥ śalaḥ
उसके साथ भीष्म और द्रोण, कर्ण, परम अस्त्रवेत्ता कृप, द्रोणपुत्र, सुबलपुत्र, तथा दुःशासन और शल थे;
श्लोक 3 (4.37.3)
विविंशतिर्विकर्णश्च चित्रसेनश्च वीर्यवान् । दुःसहो दुर्मुखश्चैव एते चान्ये महारथाः ॥
viviṃśatirvikarṇaśca citrasenaśca vīryavān | duḥsaho durmukhaścaiva ete cānye mahārathāḥ
विविंशति, विकर्ण, पराक्रमी चित्रसेन, दुःसह और दुर्मुख: ये तथा अन्य महारथी भी।
श्लोक 4 (4.37.4)
सर्वे मत्स्यानुपागम्य विराटस्य महीपतेः । गोपान्विद्राव्य तरसा गोधनं जह्रुरोजसा ॥
sarve matsyānupāgamya virāṭasya mahīpateḥ | gopānvidrāvya tarasā godhanaṃ jahrurojasā
इन सबने राजा विराट के मत्स्य देश पर धावा बोला, ग्वालों को वेग से खदेड़ दिया और बलपूर्वक गोधन छीन लिया।
श्लोक 5 (4.37.5)
गवां शतसहस्राणि कुरवः कालयन्ति च । महता रथवंशेन परिगृह्य समन्ततः ॥
gavāṃ śatasahasrāṇi kuravaḥ kālayanti ca | mahatā rathavaṃśena parigṛhya samantataḥ
कौरव रथों के विशाल समूह से चारों ओर घेरकर एक लाख गायों को हाँक ले चले।
श्लोक 6 (4.37.6)
गोपालानां तु घोषेषु हन्यतां तैर्महारथैः । आरावः सुमहानासीत्संप्रहारे भयंकरे ॥
gopālānāṃ tu ghoṣeṣu hanyatāṃ tairmahārathaiḥ | ārāvaḥ sumahānāsītsaṃprahāre bhayaṃkare
ग्वालों की बस्तियों में, जब वे महारथी ग्वालों को मार रहे थे, उस भयंकर संघर्ष में बड़ा भारी कोलाहल उठा।
श्लोक 7 (4.37.7)
गवाध्यक्षस्तु संत्रस्तो रथमास्थाय सत्वरः । जगाम नगरायैव परिक्रोशंस्तदाऽऽर्तवत् ॥
gavādhyakṣastu saṃtrasto rathamāsthāya satvaraḥ | jagāma nagarāyaiva parikrośaṃstadā''rtavat
गोशाला का अध्यक्ष भयभीत होकर तुरन्त रथ पर चढ़ा और दुःखी होकर पुकार मचाता हुआ नगर की ओर चल पड़ा।
श्लोक 8 (4.37.8)
स प्रविश्य पुरं राज्ञो नृपवेश्माभ्ययात्ततः । अवतीर्य रथात्तूर्णमाख्यातुं प्रविवेश ह ॥
sa praviśya puraṃ rājño nṛpaveśmābhyayāttataḥ | avatīrya rathāttūrṇamākhyātuṃ praviveśa ha
राजा के नगर में प्रवेश करके वह राजभवन पहुँचा और शीघ्र रथ से उतरकर समाचार सुनाने के लिए भीतर गया।
श्लोक 9 (4.37.9)
दृष्ट्वा भूमिंजयं नाम पुत्रं मात्स्यस्य मानिनम् । तस्मै च सर्वमाचष्ट राष्ट्रस्य पशुकर्षणम् ॥
dṛṣṭvā bhūmiṃjayaṃ nāma putraṃ mātsyasya māninam | tasmai ca sarvamācaṣṭa rāṣṭrasya paśukarṣaṇam
मत्स्यराज के अभिमानी पुत्र भूमिंजय को देखकर उसने राज्य के पशुओं के हरे जाने का सारा वृत्तान्त उसे कह सुनाया।
गवाध्यक्ष उवाच
श्लोक 10 (4.37.10)
गवां शतसहस्राणि कुरवः कालयन्ति ते । प्रतिजेतुं समुत्तिष्ठ गोधनं राष्ट्रवर्धन ॥
gavāṃ śatasahasrāṇi kuravaḥ kālayanti te | pratijetuṃ samuttiṣṭha godhanaṃ rāṣṭravardhana
"कौरव आपकी एक लाख गायों को हाँके लिए जा रहे हैं। हे राष्ट्र की समृद्धि बढ़ाने वाले, उस गोधन को फिर से जीतने के लिए उठिए!
श्लोक 11 (4.37.11)
राजपुत्र हितप्रेप्सुः क्षिप्रं निर्याहि वै स्वयम् । त्वां हि मत्स्यो महीपालः शून्यपालमिहाकरोत् ॥
rājaputra hitaprepsuḥ kṣipraṃ niryāhi vai svayam | tvāṃ hi matsyo mahīpālaḥ śūnyapālamihākarot
"हे राजकुमार, यदि आप राज्य का हित चाहते हैं तो स्वयं तुरन्त निकल पड़िए, क्योंकि पृथ्वीपति मत्स्यराज ने आपको ही यहाँ सूने नगर का रक्षक बनाया है।
श्लोक 12 (4.37.12)
त्वां वै परिषदो मध्ये श्लाघते स नराधिपः । पुत्रो ममानुरूपश्च शूरश्चेति कुलोद्वहः ॥
tvāṃ vai pariṣado madhye ślāghate sa narādhipaḥ | putro mamānurūpaśca śūraśceti kulodvahaḥ
"वे नरेश सभा के बीच आपकी प्रशंसा करते हैं: 'मेरा पुत्र मेरे योग्य है, शूरवीर है और कुल को धारण करने वाला है;
श्लोक 13 (4.37.13)
इष्वस्त्रनिपुणो योधः सदा वीरश्च मे सुतः । समर्थः समरे योद्धुं कौरवैः सह तादृशैः ॥
iṣvastranipuṇo yodhaḥ sadā vīraśca me sutaḥ | samarthaḥ samare yoddhuṃ kauravaiḥ saha tādṛśaiḥ
"'मेरा पुत्र बाण और अस्त्रों में निपुण योद्धा है, सदा वीर है, और ऐसे कौरवों से भी युद्ध में लड़ने में समर्थ है।'
श्लोक 14 (4.37.14)
तस्य तत्सत्यमेवास्तु मनुष्येन्द्रस्य भाषितम् । जयश्च नियतो युद्धे कौरवाश्च ध्रुवं हताः ॥
tasya tatsatyamevāstu manuṣyendrasya bhāṣitam | jayaśca niyato yuddhe kauravāśca dhruvaṃ hatāḥ
"नरेश्वर का वह कथन आज सत्य हो। युद्ध में विजय निश्चित है और कौरव अवश्य मारे जाएँगे।
श्लोक 15 (4.37.15)
आवर्तय कुरूञ्जित्वा पशून्पशुपतिर्यथा । निर्दहैषामनीकानि भीमेन शरतेजसा ॥
āvartaya kurūñjitvā paśūnpaśupatiryathā | nirdahaiṣāmanīkāni bhīmena śaratejasā
"कौरवों को जीतकर पशुओं को वैसे ही लौटा लाइए जैसे पशुओं का स्वामी उन्हें लौटा लाता है; अपने बाणों के भयंकर तेज से इनकी सेनाओं को भस्म कर दीजिए।
श्लोक 16 (4.37.16)
धनुश्च्युतै रुक्मपुङ्खैश्चित्रैः संनतपर्वभिः । द्विषतां भिन्ध्यनीकानि गजानामिव यूथपः ॥
dhanuścyutai rukmapuṅkhaiścitraiḥ saṃnataparvabhiḥ | dviṣatāṃ bhindhyanīkāni gajānāmiva yūthapaḥ
"धनुष से छूटे सोने के पंखों वाले, चमकीले, झुकी गाँठों वाले बाणों से शत्रुओं की सेनाओं को वैसे ही छिन्न-भिन्न कर दीजिए जैसे यूथपति हाथी हाथियों के झुंड को।
श्लोक 17 (4.37.17)
पाशोपधानां ज्यातन्त्रीं चापदण्डां महास्वनाम् । शरवर्णां धनुर्वीणां शत्रुमध्ये प्रवादय ॥
pāśopadhānāṃ jyātantrīṃ cāpadaṇḍāṃ mahāsvanām | śaravarṇāṃ dhanurvīṇāṃ śatrumadhye pravādaya
"शत्रुओं के बीच अपने धनुष रूपी वीणा को बजाइए, जिसकी खूँटियाँ प्रत्यंचा के फंदे हैं, तार प्रत्यंचा है, दण्ड धनुष का डंडा है, स्वर बाण हैं और जिसकी ध्वनि बड़ी गम्भीर है।
श्लोक 18 (4.37.18)
निर्याहि नगराच्छीघ्रं राजपुत्र किमास्यते । श्वेताः काञ्चनसंनाहा रथे युज्यन्तु ते हयाः । ध्वजं च सिंहं सौवर्णमुच्छ्रयस्व तथा विभो ॥
niryāhi nagarācchīghraṃ rājaputra kimāsyate | śvetāḥ kāñcanasaṃnāhā rathe yujyantu te hayāḥ | dhvajaṃ ca siṃhaṃ sauvarṇamucchrayasva tathā vibho
"हे राजकुमार, शीघ्र नगर से निकलिए, यहाँ क्यों बैठे हैं? आपके रथ में सोने के कवच वाले श्वेत घोड़े जोते जाएँ, और हे प्रभो, अपनी सोने की सिंह-ध्वजा फहराइए।
श्लोक 19 (4.37.19)
रुक्मपुङ्खाः प्रसन्नाग्रा मुक्ता हस्तवता त्वया । छादयन्तु शराः सूर्यं राज्ञामायुर्निरोधकाः ॥
rukmapuṅkhāḥ prasannāgrā muktā hastavatā tvayā | chādayantu śarāḥ sūryaṃ rājñāmāyurnirodhakāḥ
"आपके कुशल हाथ से छोड़े गए, सोने के पंखों और चमकती नोकों वाले बाण सूर्य को ढक दें और राजाओं के प्राण हर लें।
श्लोक 20 (4.37.20)
रणे जित्वा कुरून्सर्वान्वज्रपाणिरिवासुरान् । यशो महदवाप्य त्वं प्रविशेदं पुरं पुनः ॥
raṇe jitvā kurūnsarvānvajrapāṇirivāsurān | yaśo mahadavāpya tvaṃ praviśedaṃ puraṃ punaḥ
"जैसे वज्रधारी इन्द्र ने असुरों को जीता था, वैसे ही युद्ध में सब कौरवों को जीतकर और महान यश पाकर आप फिर इस नगर में प्रवेश कीजिए।
श्लोक 21 (4.37.21)
त्वं हि राष्ट्रस्य परमा गतिर्मात्स्यपतेः सुतः । गतिमन्तो भवन्त्वद्य सर्वे विषयवासिनः ॥
tvaṃ hi rāṣṭrasya paramā gatirmātsyapateḥ sutaḥ | gatimanto bhavantvadya sarve viṣayavāsinaḥ
"मत्स्यराज के पुत्र आप ही इस राष्ट्र के परम आश्रय हैं; आज इस देश के सब निवासी आपके सहारे सुरक्षित हों।
श्लोक 22 (4.37.22)
यथा हि पाण्डुपुत्राणामर्जुनो जयतांवरः । एवमेव गतिर्नूनं भवान्विषयवासिनाम् ॥
yathā hi pāṇḍuputrāṇāmarjuno jayatāṃvaraḥ | evameva gatirnūnaṃ bhavānviṣayavāsinām
"जैसे विजेताओं में श्रेष्ठ अर्जुन पाण्डुपुत्रों के आश्रय हैं, वैसे ही निश्चय ही आप इस देश के निवासियों के आश्रय हैं।"