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विराट पर्व · अध्याय 38

बृहन्नला का उत्तर की सारथि बनना

राजमहल की स्त्रियों के बीच राजकुमार उत्तर डींग मारता है कि यदि उसे कोई सारथि मिल जाए तो वह कौरवों को भगाकर गायें लौटा लाए। अज्ञातवास का वर्ष पूरा होने पर अर्जुन द्रौपदी से कहलवाते हैं कि बृहन्नला ने कभी खाण्डव में अर्जुन का रथ हाँका था; सैरन्ध्री राजकुमार को अपनी बहन को भेजने के लिए राज़ी करती है, और राजकुमारी उत्तरा बृहन्नला से चलने की विनती करती है, यह कहकर कि अन्यथा वह प्राण दे देगी। बृहन्नला कवच पहनने से अनजान होने का नाटक करती है और स्त्रियाँ हँसती हैं, पर राजकुमार स्वयं उसे कवच पहनाता है, सिंह-ध्वज वाला रथ तैयार होता है और दोनों निकल पड़ते हैं; कन्याएँ लूट में सुन्दर वस्त्र माँगती हैं और नगरवासी उन्हें वैसा ही आशीर्वाद देते हैं जैसा खाण्डव में अर्जुन को मिला था।

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.38.1)

महाजनसमक्षं तु स्त्रीणां मध्ये विशेषतः । गवाध्यक्षेण संप्रोक्तो विराटतनयस्तदा ॥

mahājanasamakṣaṃ tu strīṇāṃ madhye viśeṣataḥ | gavādhyakṣeṇa saṃprokto virāṭatanayastadā

गोशाला के अध्यक्ष ने जब बहुत से लोगों के सामने, और विशेषकर स्त्रियों के बीच, विराट के पुत्र से यह कहा,

श्लोक 2 (4.38.2)

स्त्रीमध्य उक्तस्तेनासौ वाक्यं तेजःप्रवर्धनम् । अन्तःपुरे श्लाघमान इदं वचनमब्रवीत् ॥

strīmadhya uktastenāsau vākyaṃ tejaḥpravardhanam | antaḥpure ślāghamāna idaṃ vacanamabravīt

तब स्त्रियों के बीच उसके तेज बढ़ाने वाले वचन सुनकर वह अन्तःपुर में अपनी बड़ाई करता हुआ यह बोला:

उत्तर उवाच

श्लोक 3 (4.38.3)

अद्याहमनुगच्छेयं दृढधन्वा गवां पदम् । यदि मे सारथिः कश्चिद्भवेदश्वेषु कोविदः ॥

adyāhamanugaccheyaṃ dṛḍhadhanvā gavāṃ padam | yadi me sārathiḥ kaścidbhavedaśveṣu kovidaḥ

"आज मैं दृढ़ धनुष लेकर गायों के पदचिह्नों का पीछा करता, यदि मेरे पास घोड़ों को हाँकने में निपुण कोई सारथि होता।

श्लोक 4 (4.38.4)

तमेव नाधिगच्छामि यो मे यन्ता समो भवेत् । पश्यध्वं सारथिं शीघ्रं मम युक्तं प्रयास्यतः ॥

tameva nādhigacchāmi yo me yantā samo bhavet | paśyadhvaṃ sārathiṃ śīghraṃ mama yuktaṃ prayāsyataḥ

"पर मुझे ऐसा कोई नहीं मिलता जो मेरे योग्य सारथि हो। मैं प्रस्थान करने वाला हूँ, शीघ्र मेरे लिए उपयुक्त सारथि खोजो।

श्लोक 5 (4.38.5)

अष्टाविंशतिरात्रं वा मासं वा नूनमन्ततः । यत्तदासीन्महायुद्धं तत्र मे सारथिर्हतः ॥

aṣṭāviṃśatirātraṃ vā māsaṃ vā nūnamantataḥ | yattadāsīnmahāyuddhaṃ tatra me sārathirhataḥ

"अट्ठाईस रातें, या अधिक से अधिक एक महीना पहले जो बड़ा युद्ध हुआ था, उसमें मेरा सारथि मारा गया।

श्लोक 6 (4.38.6)

यद्यहं त्वधिगच्छेयं यो मे यन्ता भवेद्युधि । त्वरावानद्य यास्यामि समुच्छ्रितमहाध्वजः ॥

yadyahaṃ tvadhigaccheyaṃ yo me yantā bhavedyudhi | tvarāvānadya yāsyāmi samucchritamahādhvajaḥ

"यदि मुझे कोई ऐसा मिल जाए जो युद्ध में मेरा रथ हाँके, तो मैं आज ही ऊँची महाध्वजा फहराकर तेजी से चल पड़ूँ।

श्लोक 7 (4.38.7)

विगाह्य तत्परानीकं गजवाजिरथाकुलम् । शस्त्रप्रतापान्निर्वीर्यान्कुरूञ्जित्वाऽऽनये पशून् ॥

vigāhya tatparānīkaṃ gajavājirathākulam | śastrapratāpānnirvīryānkurūñjitvā''naye paśūn

"हाथियों, घोड़ों और रथों से भरी उस शत्रु-सेना में घुसकर, अपने शस्त्रों के प्रताप से निर्बल हुए कौरवों को जीतकर मैं पशुओं को लौटा लाऊँ।

श्लोक 8 (4.38.8)

दुर्योधनं विकर्णं च कर्णं वैकर्तनं कृपम् । द्रोणं च सह पुत्रेण महेष्वासान्समागतान् ॥

duryodhanaṃ vikarṇaṃ ca karṇaṃ vaikartanaṃ kṛpam | droṇaṃ ca saha putreṇa maheṣvāsānsamāgatān

"दुर्योधन और विकर्ण, वैकर्तन कर्ण, कृप, तथा पुत्र सहित द्रोण, ये सब एकत्र हुए महाधनुर्धर हैं;

श्लोक 9 (4.38.9)

विद्रावयित्वा संग्रामे दानवान्मघवानिव । अनेनैव मुहूर्तेन पुनः प्रत्यानये पशून् ॥

vidrāvayitvā saṃgrāme dānavānmaghavāniva | anenaiva muhūrtena punaḥ pratyānaye paśūn

"जैसे इन्द्र दानवों को भगा देते हैं, वैसे ही युद्ध में इन्हें भगाकर मैं इसी मुहूर्त में पशुओं को लौटा लाऊँ।

श्लोक 10 (4.38.10)

शून्यमाज्ञाय कुरवः प्रयान्त्यादाय गोधनम् । किं न शक्यं च तैः कर्तुं यदहं तत्र नाभवम् ॥

śūnyamājñāya kuravaḥ prayāntyādāya godhanam | kiṃ na śakyaṃ ca taiḥ kartuṃ yadahaṃ tatra nābhavam

"देश को सूना जानकर कौरव गोधन लेकर चले जा रहे हैं। मैं वहाँ नहीं था, तो वे क्या नहीं कर सकते थे?

श्लोक 11 (4.38.11)

पश्येयुरद्य मे वीर्यं कुरवस्ते समागताः । किंनु पार्थोऽर्जुनः साक्षादिति मंस्यन्ति मां परे ॥

paśyeyuradya me vīryaṃ kuravaste samāgatāḥ | kiṃnu pārtho'rjunaḥ sākṣāditi maṃsyanti māṃ pare

"आज वहाँ एकत्र हुए कौरव मेरा पराक्रम देखें। शत्रु मुझे देखकर सोचेंगे, 'क्या यह स्वयं पृथापुत्र अर्जुन है?'"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (4.38.12)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स्त्रीषु चात्मप्रशंसनम् । नामर्षयत पाञ्चाली बीभत्सोः परिकीर्तनम् ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā strīṣu cātmapraśaṃsanam | nāmarṣayata pāñcālī bībhatsoḥ parikīrtanam

स्त्रियों के बीच कहे गए उसके ये आत्मप्रशंसा भरे वचन, और उसमें बीभत्सु (अर्जुन) का नाम लेना, पांचाली सहन न कर सकी।

श्लोक 13 (4.38.13)

श्रुत्वा तदर्जुनो वाक्यमुत्तरेण प्रभाषितम् । अतीतसमये काले प्रियां भार्यामभाषत ॥

śrutvā tadarjuno vākyamuttareṇa prabhāṣitam | atītasamaye kāle priyāṃ bhāryāmabhāṣata

उत्तर के कहे वे वचन सुनकर, जब प्रतिज्ञा की अवधि बीत चुकी थी, अर्जुन ने अपनी प्रिय पत्नी से कहा,

श्लोक 14 (4.38.14)

द्रुपदस्य सुतां राज्ञः पाञ्चालीं रूपसंमताम् । सत्यार्जवगुणोपेतां भर्तुः प्रियहितैषिणीम् । उवाच रहसि प्रीतः कृष्णां सर्वार्थकोविदः ॥

drupadasya sutāṃ rājñaḥ pāñcālīṃ rūpasaṃmatām | satyārjavaguṇopetāṃ bhartuḥ priyahitaiṣiṇīm | uvāca rahasi prītaḥ kṛṣṇāṃ sarvārthakovidaḥ

राजा द्रुपद की पुत्री, रूपवती पांचाली से, जो सत्य और सरलता के गुणों से युक्त और पति के प्रिय तथा हित की चाहने वाली थी, उस सब बातों के जानकार अर्जुन ने प्रसन्न होकर एकान्त में कृष्णा से कहा:

अर्जुन उवाच

श्लोक 15 (4.38.15)

उत्तरां ब्रूहि पाञ्चालि गत्वा क्षिप्रं शुचिस्मिते ॥

uttarāṃ brūhi pāñcāli gatvā kṣipraṃ śucismite

"हे पवित्र मुस्कान वाली पांचाली, तुम शीघ्र जाकर उत्तरा से कहो:

श्लोक 16 (4.38.16)

इयं किल पुरा युद्धे खाण्डवे सव्यसाचिनः । सारथिः पाण्डुपुत्रस्य पार्थस्य तु बृहन्नला । महाञ्जयो भवेद्युद्धे सा चेद्यन्ता बृहन्नला ॥

iyaṃ kila purā yuddhe khāṇḍave savyasācinaḥ | sārathiḥ pāṇḍuputrasya pārthasya tu bṛhannalā | mahāñjayo bhavedyuddhe sā cedyantā bṛhannalā

"'कहते हैं, यह बृहन्नला पहले खाण्डव के युद्ध में पाण्डुपुत्र पार्थ सव्यसाची की सारथि थी। यदि बृहन्नला सारथि बने तो युद्ध में बड़ी विजय होगी।'"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (4.38.17)

सा चोदिता तदा तेन ह्यर्जुनेन शुचिस्मिता । पाञ्चाली च तदाऽऽगम्य उत्तराया निवेशनम् ॥

sā coditā tadā tena hyarjunena śucismitā | pāñcālī ca tadā''gamya uttarāyā niveśanam

अर्जुन के इस प्रकार प्रेरित करने पर पवित्र मुस्कान वाली पांचाली उत्तरा के भवन में गई,

श्लोक 18 (4.38.18)

ज्ञात्वा तु समयान्मुक्तं चन्द्रं राहुमुखादिव । युधिष्ठिरं धर्मपरं सत्यार्जवपथे स्थितम् ॥

jñātvā tu samayānmuktaṃ candraṃ rāhumukhādiva | yudhiṣṭhiraṃ dharmaparaṃ satyārjavapathe sthitam

यह जानकर कि धर्मपरायण, सत्य और सरलता के मार्ग पर स्थित युधिष्ठिर अब राहु के मुख से छूटे चन्द्रमा की भाँति प्रतिज्ञा से मुक्त हो चुके हैं।

श्लोक 19 (4.38.19)

अमर्षयन्ती तद्दुःखं कृष्णा कमललोचना । उत्तरामाह वचनं सखीमध्ये विलासिनीम् ॥

amarṣayantī tadduḥkhaṃ kṛṣṇā kamalalocanā | uttarāmāha vacanaṃ sakhīmadhye vilāsinīm

उस दुःख को और न सह पाती हुई कमलनयनी कृष्णा ने सखियों के बीच बैठी सुन्दरी उत्तरा से कहा:

द्रौपद्युवाच

श्लोक 20 (4.38.20)

योऽयं युवा वारणयूथपोपमो बृहन्नलाऽस्मीति जनोऽभ्यभाषत । पुराऽपि पार्थस्य स सारथिस्तदा धनुर्धराणां प्रवरस्य मन्ये ॥

yo'yaṃ yuvā vāraṇayūthapopamo bṛhannalā'smīti jano'bhyabhāṣata | purā'pi pārthasya sa sārathistadā dhanurdharāṇāṃ pravarasya manye

"यह जो हाथियों के यूथपति जैसा युवक है, जिसने लोगों से कहा कि 'मैं बृहन्नला हूँ', मेरी समझ में वही पहले धनुर्धारियों में श्रेष्ठ पार्थ का सारथि था।

श्लोक 21 (4.38.21)

एतेन वा सारथिना तदाऽर्जुनः सदेवगन्धर्वमहासुरोरगान् । सर्वाणि भूतान्यजयत्स वीर्यवानतर्पयच्चापि हिरण्यरेतसम् ॥

etena vā sārathinā tadā'rjunaḥ sadevagandharvamahāsuroragān | sarvāṇi bhūtānyajayatsa vīryavānatarpayaccāpi hiraṇyaretasam

"इसी को सारथि बनाकर उस पराक्रमी अर्जुन ने देवता, गन्धर्व, महान असुर और नाग, सब प्राणियों को जीता था और अग्नि को भी तृप्त किया था।

श्लोक 22 (4.38.22)

यदस्य संस्थामपि तस्य संयुगे जानामि वीर्यं परवीरमध्यगम् । संगृह्य रश्मीनपि चास्य वीर्यवानादाय चापं प्रययौ रथे स्थितः ॥

yadasya saṃsthāmapi tasya saṃyuge jānāmi vīryaṃ paravīramadhyagam | saṃgṛhya raśmīnapi cāsya vīryavānādāya cāpaṃ prayayau rathe sthitaḥ

"मैं युद्ध में इसकी स्थिति और शत्रु-वीरों के बीच पहुँचने वाले इसके पराक्रम को जानती हूँ; इसी के लगाम थामने पर पराक्रमी अर्जुन धनुष लेकर रथ पर खड़े होकर युद्ध के लिए निकलते थे।

श्लोक 23 (4.38.23)

न सर्वभूतानि न देवदानवा न चापि सर्वे कुरवः समागताः । धनं हरेयुस्तव जातु धन्विनो बृहन्नला तूत्तरसारथिर्यदि ॥

na sarvabhūtāni na devadānavā na cāpi sarve kuravaḥ samāgatāḥ | dhanaṃ hareyustava jātu dhanvino bṛhannalā tūttarasārathiryadi

"यदि बृहन्नला उत्तर की सारथि हो, तो न सब प्राणी, न देवता और दानव, और न सब धनुर्धारी कौरव मिलकर भी कभी तुम्हारा धन हर सकते हैं।

श्लोक 24 (4.38.24)

धनुष्यनवमश्चासीत्तस्य शिष्यो महात्मनः । सुदृष्टपूर्वो हि मया चरन्त्या पाण्डवालये ॥

dhanuṣyanavamaścāsīttasya śiṣyo mahātmanaḥ | sudṛṣṭapūrvo hi mayā carantyā pāṇḍavālaye

"यह उन महात्मा का शिष्य था और धनुर्विद्या में किसी से कम न था; पाण्डवों के घर में रहते हुए मैंने इसे बहुत बार देखा था।

श्लोक 25 (4.38.25)

स चानेन सहायेन खाण्डवं चादहत्पुरा । अर्जुनस्य तदाऽनेन संगृहीता हयोत्तमाः ॥

sa cānena sahāyena khāṇḍavaṃ cādahatpurā | arjunasya tadā'nena saṃgṛhītā hayottamāḥ

"इसी की सहायता से अर्जुन ने पहले खाण्डव वन को जलाया था; तब इसी ने अर्जुन के उत्तम घोड़ों की लगाम सँभाली थी।

श्लोक 26 (4.38.26)

तेन सारथिना पार्थः सर्वभूतानि सर्वशः । अजयत्खाण्डवप्रस्थे न हि यन्ताऽस्ति तादृशः ॥

tena sārathinā pārthaḥ sarvabhūtāni sarvaśaḥ | ajayatkhāṇḍavaprasthe na hi yantā'sti tādṛśaḥ

"इसी सारथि के सहारे पार्थ ने खाण्डवप्रस्थ में सब ओर के सब प्राणियों को जीत लिया था; इसके समान कोई सारथि नहीं है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (4.38.27)

ततः सैरन्ध्रिसहिता उत्तरा भ्रातुरब्रवीत् । अभ्यर्थयैनां सारथ्ये वीर शीघ्रं बृहन्नलाम् ॥

tataḥ sairandhrisahitā uttarā bhrāturabravīt | abhyarthayaināṃ sārathye vīra śīghraṃ bṛhannalām

तब सैरन्ध्री के साथ उत्तरा ने अपने भाई से कहा, "हे वीर, इस बृहन्नला से शीघ्र सारथि बनने की प्रार्थना करो।

उत्तरोवाच

श्लोक 28 (4.38.28)

शिक्षितैषा हि सारथ्ये नर्तने गीतवादिते । सैरन्ध्र्याह महाप्राज्ञा स्तुवन्ती वै बृहन्नलाम् ॥

śikṣitaiṣā hi sārathye nartane gītavādite | sairandhryāha mahāprājñā stuvantī vai bṛhannalām

"यह सारथ्य में भी शिक्षित है और नाच, गाने तथा बाजे में भी: बुद्धिमती सैरन्ध्री बृहन्नला की प्रशंसा करती हुई ऐसा कहती है।"

उत्तर उवाच

श्लोक 29 (4.38.29)

सैरन्ध्रि जानासि मम व्रतं हि क्लीबेन पुंसा न हि संवदाम्यहम् । सोऽहं न शक्ष्यामि बृहन्नलां शुभे वक्तुं स्वयं यच्छ हयान्ममेति ॥

sairandhri jānāsi mama vrataṃ hi klībena puṃsā na hi saṃvadāmyaham | so'haṃ na śakṣyāmi bṛhannalāṃ śubhe vaktuṃ svayaṃ yaccha hayānmameti

"सैरन्ध्री, तुम मेरा व्रत जानती हो कि मैं नपुंसक से बात नहीं करता। इसलिए हे शुभे, मैं स्वयं बृहन्नला से नहीं कह सकूँगा कि 'मेरे घोड़े हाँको।'"

सैरन्ध्र्युवाच

श्लोक 30 (4.38.30)

भयकाले तु संप्राप्ते न व्रतं नाव्रतं पुनः । यथा दुःखं प्रतरति कर्तुं युक्तं चरेद्बुधः । इति धर्मविदः प्राहुस्तस्माद्वाच्या बृहन्नला ॥

bhayakāle tu saṃprāpte na vrataṃ nāvrataṃ punaḥ | yathā duḥkhaṃ pratarati kartuṃ yuktaṃ caredbudhaḥ | iti dharmavidaḥ prāhustasmādvācyā bṛhannalā

"भय का समय आ जाने पर न व्रत रहता है, न अव्रत। बुद्धिमान को वही करना चाहिए जिससे वह दुःख से पार हो सके: धर्म के जानकार ऐसा कहते हैं। इसलिए बृहन्नला से कहना ही चाहिए।

श्लोक 31 (4.38.31)

येयं कुमारी सुश्रोणी भगिनी ते यवीयसी । अस्यास्तु वचनं वीर करिष्यति न संशयः ॥

yeyaṃ kumārī suśroṇī bhaginī te yavīyasī | asyāstu vacanaṃ vīra kariṣyati na saṃśayaḥ

"हे वीर, यह जो सुन्दर कटि वाली कुमारी तुम्हारी छोटी बहन है, इसकी बात वह निःसन्देह मानेगी।

श्लोक 32 (4.38.32)

यदि ते सारथिः सा स्यात्कुरून्सर्वान्न संशयः । जित्वा गाश्च समादाय ध्रुवमागमनं भवेत् ॥

yadi te sārathiḥ sā syātkurūnsarvānna saṃśayaḥ | jitvā gāśca samādāya dhruvamāgamanaṃ bhavet

"यदि वह तुम्हारी सारथि हो जाए, तो तुम निःसन्देह सब कौरवों को जीतकर और गायें लेकर अवश्य लौट आओगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 33 (4.38.33)

एवमुक्तः स सैरन्ध्र्या भगिनीं प्रत्यभाषत । गच्छ त्वमनवद्याङ्गि तामानय बृहन्नलाम् ॥

evamuktaḥ sa sairandhryā bhaginīṃ pratyabhāṣata | gaccha tvamanavadyāṅgi tāmānaya bṛhannalām

सैरन्ध्री के ऐसा कहने पर उसने अपनी बहन से कहा, "हे अनिन्द्य अंगों वाली, तुम जाओ और उस बृहन्नला को ले आओ।"

श्लोक 34 (4.38.34)

सा प्राद्रवत्काञ्चनमाल्यधारिणी ज्येष्ठेन भ्रात्रा प्रहिता यशस्विनी । भ्रातुर्नियोगं तु निशम्य सुभ्रूः शुभानना हाटकवज्रभूषिता ॥

sā prādravatkāñcanamālyadhāriṇī jyeṣṭhena bhrātrā prahitā yaśasvinī | bhrāturniyogaṃ tu niśamya subhrūḥ śubhānanā hāṭakavajrabhūṣitā

बड़े भाई के भेजने पर सोने की माला पहने वह यशस्विनी कन्या दौड़ पड़ी; भाई की आज्ञा सुनकर सुन्दर भौंहों और सुन्दर मुख वाली, सोने और हीरों से सजी वह,

श्लोक 35 (4.38.35)

सा वज्रमुक्तामणिहेमकुण्डला मृदुक्रमा भ्रातृनियोगचोदिता । प्रदक्षिणावर्ततनुः शिखण्डिनी पद्मानना पद्मदलायताक्षी ॥

sā vajramuktāmaṇihemakuṇḍalā mṛdukramā bhrātṛniyogacoditā | pradakṣiṇāvartatanuḥ śikhaṇḍinī padmānanā padmadalāyatākṣī

हीरे, मोती, मणि और सोने के कुण्डल पहने, कोमल चाल वाली, भाई की आज्ञा से प्रेरित, दाहिनी ओर घूमी शुभ रेखाओं से युक्त शरीर वाली, मोरपंख के आभूषण धारण किए, कमलमुखी और कमलदल जैसे बड़े नेत्रों वाली,

श्लोक 36 (4.38.36)

तन्वी समाङ्गी मृदुमन्द्रलोचना मात्स्यस्य राज्ञो दुहिता विलासिनी । सा नर्तनागारमरालपक्ष्मा शतह्रदा मेघमिवान्वपद्यत ॥

tanvī samāṅgī mṛdumandralocanā mātsyasya rājño duhitā vilāsinī | sā nartanāgāramarālapakṣmā śatahradā meghamivānvapadyata

छरहरी, सुडौल अंगों वाली, कोमल और शान्त नेत्रों वाली, मत्स्यराज की वह विलासिनी पुत्री, घुमावदार पलकों वाली, नृत्यशाला में वैसे ही पहुँची जैसे बिजली मेघ के पास पहुँचती है।

श्लोक 37 (4.38.37)

सा नागनासोपमसंहितोरूरनिन्दिता वेदिविलग्नमध्या । आसाद्य तस्थौ वरमाल्यधारिणी पार्थं शुभा नागवधूरिव द्विपम् ॥

sā nāganāsopamasaṃhitorūraninditā vedivilagnamadhyā | āsādya tasthau varamālyadhāriṇī pārthaṃ śubhā nāgavadhūriva dvipam

हाथी की सूँड जैसी सटी हुई जाँघों वाली, निर्दोष, वेदी के मध्य जैसी पतली कमर वाली, उत्तम माला पहने वह सुन्दरी पार्थ के पास आकर वैसे ही खड़ी हो गई जैसे हथिनी गजराज के पास।

श्लोक 38 (4.38.38)

तामागतामायतताम्रलोचनामवेक्ष्य पार्थः समयेऽभ्यभाषत ॥

tāmāgatāmāyatatāmralocanāmavekṣya pārthaḥ samaye'bhyabhāṣata

लम्बे, ताँबे जैसे लाल नेत्रों वाली उस कन्या को आया देखकर पार्थ ने अवसर के अनुसार उससे कहा:

अर्जुन उवाच

श्लोक 39 (4.38.39)

किमागता काञ्चनमाल्यधारिणी सुगात्रि किंचित्त्वरिताऽसि सुभ्रु । किं ते मुखं सुन्दरि न प्रसन्नमाचक्ष्व शीघ्रं मम चारुहासिनि ॥

kimāgatā kāñcanamālyadhāriṇī sugātri kiṃcittvaritā'si subhru | kiṃ te mukhaṃ sundari na prasannamācakṣva śīghraṃ mama cāruhāsini

"हे सोने की माला वाली, तुम क्यों आई हो? हे सुन्दर अंगों और सुन्दर भौंहों वाली, तुम इतनी उतावली क्यों हो? हे सुन्दरी, तुम्हारा मुख प्रसन्न क्यों नहीं है? हे मनोहर मुस्कान वाली, मुझे शीघ्र बताओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 40 (4.38.40)

सा वज्रवैडूर्यविकारकुण्डला विनिद्रपद्मोत्पलपत्रगन्धिनी । प्रसन्नताराधिपसंनिभानना पार्थे कुमारी वचनं बभाषे ॥

sā vajravaiḍūryavikārakuṇḍalā vinidrapadmotpalapatragandhinī | prasannatārādhipasaṃnibhānanā pārthe kumārī vacanaṃ babhāṣe

हीरे और वैदूर्य से बने कुण्डलों वाली, खिले हुए कमलों और उत्पलों की पंखुड़ियों जैसी सुगन्ध वाली, निर्मल चन्द्रमा जैसे मुख वाली वह कुमारी पार्थ से बोली:

उत्तरोवाच

श्लोक 41 (4.38.41)

हरन्ति वित्तं कुरवः पितुर्मे शतं सहस्राणि गवां बृहन्नले । सा भ्रातुरश्वान्मम संयमस्व पुरा परे दूरतरं हरन्ति गाः ॥

haranti vittaṃ kuravaḥ piturme śataṃ sahasrāṇi gavāṃ bṛhannale | sā bhrāturaśvānmama saṃyamasva purā pare dūrataraṃ haranti gāḥ

"बृहन्नला, कौरव मेरे पिता का धन, एक लाख गायें, हरे लिए जा रहे हैं। तुम मेरे भाई के घोड़े सँभालो, इससे पहले कि शत्रु गायों को और दूर ले जाएँ।

श्लोक 42 (4.38.42)

सैरन्ध्रिराख्याति बृहन्नले त्वां सुशिक्षिता संग्रहणे रथाश्वयोः । अहं मरिष्यामि न मेऽत्र संशयो मया वृता तत्र न चेद्गमिष्यसि ॥

sairandhrirākhyāti bṛhannale tvāṃ suśikṣitā saṃgrahaṇe rathāśvayoḥ | ahaṃ mariṣyāmi na me'tra saṃśayo mayā vṛtā tatra na cedgamiṣyasi

"बृहन्नला, सैरन्ध्री कहती है कि तुम रथ और घोड़ों को सँभालने में भली भाँति शिक्षित हो। यदि मेरे माँगने पर भी तुम वहाँ नहीं जाओगी, तो मैं प्राण दे दूँगी, इसमें मुझे कोई संशय नहीं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 43 (4.38.43)

तथा नियुक्तो नरदेवकन्यया नरोत्तमः प्रीतमना धनञ्जयः । उवाच पार्थः शुभमन्द्रया गिरा शुभाननां शुक्लदतीं शुचिस्मिताम् ॥

tathā niyukto naradevakanyayā narottamaḥ prītamanā dhanañjayaḥ | uvāca pārthaḥ śubhamandrayā girā śubhānanāṃ śukladatīṃ śucismitām

राजकुमारी के इस प्रकार कहने पर नरश्रेष्ठ धनंजय मन में प्रसन्न हुए और उस सुन्दर मुख, उजले दाँतों और पवित्र मुस्कान वाली कन्या से मधुर, गम्भीर वाणी में बोले:

अर्जुन उवाच

श्लोक 44 (4.38.44)

गच्छामि यत्रेच्छसि चारुहासिनि हुताशनं प्रज्वलितं विशामि वा । इच्छामि तेऽहं वरगात्रि जीवितं करोमि किं ते प्रियमद्य सुन्दरि । न मत्कृते द्रक्ष्यसि तत्पुरं प्रिये वैवस्वतं प्रेतपतेर्महाभयम् ॥

gacchāmi yatrecchasi cāruhāsini hutāśanaṃ prajvalitaṃ viśāmi vā | icchāmi te'haṃ varagātri jīvitaṃ karomi kiṃ te priyamadya sundari | na matkṛte drakṣyasi tatpuraṃ priye vaivasvataṃ pretapatermahābhayam

"हे मनोहर मुस्कान वाली, तुम जहाँ चाहो मैं जाऊँगी, चाहे जलती आग में ही क्यों न प्रवेश करना पड़े। हे सुन्दर अंगों वाली, मैं तुम्हारा जीवन चाहती हूँ; हे सुन्दरी, बोलो, आज मैं तुम्हारा कौन सा प्रिय काम करूँ? मेरे कारण तुम्हें प्रेतों के स्वामी वैवस्वत यम का वह महाभयंकर नगर नहीं देखना पड़ेगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 45 (4.38.45)

एतावदुक्त्वा कुरुवीरपुङ्गवो विलासिनीं शुक्लदतीं शुचिस्मिताम् । बृहन्नलारूपविभूषिताननो विराटपुत्रस्य समीपमाव्रजत् ॥

etāvaduktvā kuruvīrapuṅgavo vilāsinīṃ śukladatīṃ śucismitām | bṛhannalārūpavibhūṣitānano virāṭaputrasya samīpamāvrajat

उस उजले दाँतों और पवित्र मुस्कान वाली विलासिनी से इतना कहकर, बृहन्नला के रूप से सजे मुख वाले कुरुवीरों में श्रेष्ठ अर्जुन विराटपुत्र के पास गए।

श्लोक 46 (4.38.46)

तथा व्रजन्तं वरभूषणैर्वृतं महाप्रभं वारणयूथपोपमम् । गजेन्द्रबाहुं कमलायतेक्षणं कवाटवक्षस्थलमुन्नतांसम् ॥

tathā vrajantaṃ varabhūṣaṇairvṛtaṃ mahāprabhaṃ vāraṇayūthapopamam | gajendrabāhuṃ kamalāyatekṣaṇaṃ kavāṭavakṣasthalamunnatāṃsam

उत्तम आभूषणों से सजे, महान तेजस्वी, हाथियों के यूथपति जैसे, गजराज की सूँड जैसी भुजाओं, कमल जैसे बड़े नेत्रों, किवाड़ जैसी चौड़ी छाती और ऊँचे कन्धों वाले, इस प्रकार आते हुए उनको,

श्लोक 47 (4.38.47)

तमागतं पार्थममित्रकर्शनं महाबलं नागमिव प्रमाथिनम् । वैराटिरामन्त्र्य ततो बृहन्नलां गवां निनीषन्पदमुत्तरोऽब्रवीत् ॥

tamāgataṃ pārthamamitrakarśanaṃ mahābalaṃ nāgamiva pramāthinam | vairāṭirāmantrya tato bṛhannalāṃ gavāṃ ninīṣanpadamuttaro'bravīt

शत्रुओं को सताने वाले, मतवाले हाथी जैसे महाबली पार्थ को आया देखकर, गायों के पदचिह्नों का पीछा करने को उत्सुक विराटपुत्र उत्तर ने बृहन्नला को सम्बोधित करके कहा।

श्लोक 48 (4.38.48)

तमाव्रजन्तं त्वरितं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् । अन्वगच्छद्विशालाक्षी गजं गजवधूरिव ॥

tamāvrajantaṃ tvaritaṃ prabhinnamiva kuñjaram | anvagacchadviśālākṣī gajaṃ gajavadhūriva

मतवाले हाथी की भाँति तेजी से जाते हुए उनके पीछे वह विशाल नेत्रों वाली कन्या वैसे ही चली जैसे हथिनी हाथी के पीछे चलती है।

श्लोक 49 (4.38.49)

दूरादेव तु संप्रेक्ष्य राजपुत्रोऽभ्यभाषत । त्वया सारथिना पार्थः खाण्डवेऽग्निमतर्पयत् ॥

dūrādeva tu saṃprekṣya rājaputro'bhyabhāṣata | tvayā sārathinā pārthaḥ khāṇḍave'gnimatarpayat

दूर से ही उन्हें देखकर राजकुमार बोला: "तुम्हें ही सारथि बनाकर पार्थ ने खाण्डव वन में अग्नि को तृप्त किया था,

उत्तर उवाच

श्लोक 50 (4.38.50)

पृथिवीं चाजयत्कृत्स्नां कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । सैरन्ध्री त्वां ममाचष्ट सा हि जानाति पाण्डवान् ॥

pṛthivīṃ cājayatkṛtsnāṃ kuntīputro dhanañjayaḥ | sairandhrī tvāṃ mamācaṣṭa sā hi jānāti pāṇḍavān

"और कुन्तीपुत्र धनंजय ने सारी पृथ्वी जीती थी। सैरन्ध्री ने मुझे तुम्हारे विषय में बताया है, क्योंकि वह पाण्डवों को जानती है।

श्लोक 51 (4.38.51)

देवेन्द्रसारथिर्वीरो मातलिः ख्यातविक्रमः । सुमहो जामदग्नेश्च विष्णोर्यन्ता च दारुकः ॥

devendrasārathirvīro mātaliḥ khyātavikramaḥ | sumaho jāmadagneśca viṣṇoryantā ca dārukaḥ

"देवराज इन्द्र का वीर सारथि मातलि, जिसका पराक्रम प्रसिद्ध है; जमदग्निपुत्र का सारथि सुमह; विष्णु का सारथि दारुक;

श्लोक 52 (4.38.52)

सुमन्त्रो वा दाशरथेः सूर्ययन्ता तथाऽरुणः । सर्वे सारथयः ख्याता न बृहन्नलया समाः ॥

sumantro vā dāśaratheḥ sūryayantā tathā'ruṇaḥ | sarve sārathayaḥ khyātā na bṛhannalayā samāḥ

"दशरथपुत्र का सारथि सुमन्त्र और सूर्य का सारथि अरुण: ये सब प्रसिद्ध सारथि हैं, पर कोई भी बृहन्नला के समान नहीं।

श्लोक 53 (4.38.53)

इत्युक्तोऽहं च सैरन्ध्र्या तेन त्वामाह्वयामि वै । आहुता त्वं मया सार्धं योद्धुं याहि बृहन्नले ॥

ityukto'haṃ ca sairandhryā tena tvāmāhvayāmi vai | āhutā tvaṃ mayā sārdhaṃ yoddhuṃ yāhi bṛhannale

"सैरन्ध्री ने मुझसे ऐसा कहा है, इसीलिए मैं तुम्हें बुला रहा हूँ। बृहन्नला, मेरे बुलाने पर तुम मेरे साथ युद्ध के लिए चलो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 54 (4.38.54)

दूराद्दूरतरं गावो भवन्ति कुरुभिर्हृताः । तथोक्ता प्रत्युवाचेदं राजपुत्रं बृहन्नला ॥

dūrāddūrataraṃ gāvo bhavanti kurubhirhṛtāḥ | tathoktā pratyuvācedaṃ rājaputraṃ bṛhannalā

"कौरवों द्वारा हरी गई गायें दूर से दूर होती जा रही हैं।" ऐसा कहे जाने पर बृहन्नला ने राजकुमार को यह उत्तर दिया:

बृहन्नलोवाच

श्लोक 55 (4.38.55)

का शक्तिर्मम सारथ्यं कर्तुं संग्राममूर्धनि । नृत्तं वा यदि वा गीतं वादित्रं वा पृथग्विधम् । तत्करिष्यामि भद्रं ते सारथ्यं तु कुतो मम ॥

kā śaktirmama sārathyaṃ kartuṃ saṃgrāmamūrdhani | nṛttaṃ vā yadi vā gītaṃ vāditraṃ vā pṛthagvidham | tatkariṣyāmi bhadraṃ te sārathyaṃ tu kuto mama

"युद्ध के मुहाने पर सारथि का काम करने की मुझमें क्या शक्ति है? नाच हो, गाना हो या तरह-तरह के बाजे हों, वह मैं कर दूँगी, तुम्हारा भला हो; पर मुझसे सारथ्य कैसे होगा?"

उत्तर उवाच

श्लोक 56 (4.38.56)

त्वं नर्तको वा यदि वाऽपि गायकः क्षिप्रं तनुत्रं परिधत्स्व भानुमत् । अभीक्ष्णमाहुस्तव कर्म पौरुषं स्त्रियः प्रशंसन्ति ममाद्य चान्तिके ॥

tvaṃ nartako vā yadi vā'pi gāyakaḥ kṣipraṃ tanutraṃ paridhatsva bhānumat | abhīkṣṇamāhustava karma pauruṣaṃ striyaḥ praśaṃsanti mamādya cāntike

"तुम नर्तक हो या गायक, शीघ्र यह चमकता कवच पहन लो। लोग सदा तुम्हारे पौरुष के कामों की चर्चा करते हैं, और आज स्त्रियाँ भी मेरे सामने उनकी प्रशंसा कर रही हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 57 (4.38.57)

इत्येवमुक्त्वा नृपसूनुसत्तमस्तदा स्मयित्वाऽर्जुनमभ्यनन्दयत् । अथोत्तरः पारशवं शताक्षिमत्सुवर्णचित्रं परिगृह्य भानुमत् ॥

ityevamuktvā nṛpasūnusattamastadā smayitvā'rjunamabhyanandayat | athottaraḥ pāraśavaṃ śatākṣimatsuvarṇacitraṃ parigṛhya bhānumat

ऐसा कहकर राजपुत्रों में श्रेष्ठ उत्तर ने मुस्कुराकर अर्जुन का उत्साह बढ़ाया। फिर उसने लोहे का बना, सौ आँखों वाला, सोने से चित्रित, चमकता हुआ कवच उठाया,

श्लोक 58 (4.38.58)

बृहन्नलायै प्रददौ स्वयं तदा विराटपुत्रः परवीरघातिने । तदाज्ञया मात्स्यसुतस्य वीर्यवानकर्तुकामेव समाददे तदा ॥

bṛhannalāyai pradadau svayaṃ tadā virāṭaputraḥ paravīraghātine | tadājñayā mātsyasutasya vīryavānakartukāmeva samādade tadā

और विराटपुत्र ने स्वयं वह कवच शत्रुवीरों का संहार करने वाली बृहन्नला को दे दिया। मत्स्यराजकुमार की आज्ञा से उस पराक्रमी ने उसे ऐसे लिया मानो लेना ही न चाहती हो।

बृहन्नलोवाच

श्लोक 59 (4.38.59)

यद्यस्ति च रणे शौर्यं शक्यः स्याद्द्विषतां वधः । अहं त्वामभिगच्छामि यत्र त्वं यासि तत्र भो ॥

yadyasti ca raṇe śauryaṃ śakyaḥ syāddviṣatāṃ vadhaḥ | ahaṃ tvāmabhigacchāmi yatra tvaṃ yāsi tatra bho

"यदि युद्ध में शौर्य है और शत्रुओं का वध सम्भव है, तो मैं तुम्हारे साथ चलती हूँ; हे राजकुमार, जहाँ तुम जाओगे, वहीं मैं चलूँगी।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 60 (4.38.60)

ततः स नर्मसंयुक्तमकरोत्पाण्डवो बहु । उत्तरायाः प्रमुखतः सर्वं जानन्नरिन्दमः ॥

tataḥ sa narmasaṃyuktamakarotpāṇḍavo bahu | uttarāyāḥ pramukhataḥ sarvaṃ jānannarindamaḥ

तब शत्रुओं का दमन करने वाले पाण्डुपुत्र ने सब कुछ जानते हुए भी उत्तरा के सामने बहुत सी हँसी-ठिठोली की।

श्लोक 61 (4.38.61)

तमाददानं प्रमदा जहासिरे ह्यधोमुखं वीरवरोऽभ्यधारयत् । ततस्तिरश्चीनकृतं सपत्नहा ह्यधोमुखं कवचमथाभ्यकर्षत ॥

tamādadānaṃ pramadā jahāsire hyadhomukhaṃ vīravaro'bhyadhārayat | tatastiraścīnakṛtaṃ sapatnahā hyadhomukhaṃ kavacamathābhyakarṣata

जब उन्होंने कवच उठाया तो स्त्रियाँ हँस पड़ीं, क्योंकि उस श्रेष्ठ वीर ने उसे उलटा पकड़ा था; फिर शत्रुहन्ता ने उलटे कवच को तिरछा करके खींचा।

श्लोक 62 (4.38.62)

सम्यक्प्रजानन्नपि सत्यविक्रमो ह्यज्ञातवत्सर्वकुरुप्रवीरः । ऊर्ध्वं क्षिपन्वीरतरोऽभ्यधारयत्पुनश्च यन्ता कवचं धनञ्जयः ॥

samyakprajānannapi satyavikramo hyajñātavatsarvakurupravīraḥ | ūrdhvaṃ kṣipanvīrataro'bhyadhārayatpunaśca yantā kavacaṃ dhanañjayaḥ

भली भाँति जानते हुए भी सच्चे पराक्रम वाले, समस्त कुरुवंश के उस प्रमुख वीर ने अनजान जैसा व्यवहार किया: सारथि धनंजय ने कवच को ऊपर उछालकर फिर से थामा।

श्लोक 63 (4.38.63)

एवंप्रकाराणि बहूनि कुर्वति तस्मिन्कुमार्यः प्रमदा जहासिरे । तथापि कुर्वन्तममित्रकर्शनं नैवोत्तरः पर्यभवद्धनञ्जयम् ॥

evaṃprakārāṇi bahūni kurvati tasminkumāryaḥ pramadā jahāsire | tathāpi kurvantamamitrakarśanaṃ naivottaraḥ paryabhavaddhanañjayam

उनके ऐसे बहुत से काम करने पर कुमारियाँ और स्त्रियाँ हँसती रहीं; फिर भी शत्रुओं को सताने वाले धनंजय के ऐसा करते रहने पर भी उत्तर ने उनका अपमान नहीं किया।

श्लोक 64 (4.38.64)

तं राजपुत्रः समनाहयत्स्वयं जाम्बूनदान्तेन शुभेन वर्मणा । कृशानुतप्तप्रतिमेन भास्वता जाज्वल्यमानेन सहस्ररश्मिना ॥

taṃ rājaputraḥ samanāhayatsvayaṃ jāmbūnadāntena śubhena varmaṇā | kṛśānutaptapratimena bhāsvatā jājvalyamānena sahasraraśminā

राजकुमार ने स्वयं उन्हें सोने की किनारी वाला सुन्दर कवच पहनाया, जो आग में तपाए धातु की भाँति चमकता और सहस्र किरणों वाले सूर्य की तरह जगमगाता था।

श्लोक 65 (4.38.65)

अथास्य शीघ्रं प्रसमीक्ष्य योजयद्रथे हयान्काञ्चनजालसंवृतान् । सुवर्णजालान्तरयोक्तृभूषणं सिंहं च सौवर्णमुपाश्रयद्रथे ॥

athāsya śīghraṃ prasamīkṣya yojayadrathe hayānkāñcanajālasaṃvṛtān | suvarṇajālāntarayoktṛbhūṣaṇaṃ siṃhaṃ ca sauvarṇamupāśrayadrathe

फिर शीघ्र सब देख-भालकर उसने रथ में सोने की जालियों से ढके घोड़े जोते और रथ पर सोने की जालियों के बीच साज-सज्जा से सुशोभित सोने का सिंह-ध्वज लगाया।

श्लोक 66 (4.38.66)

धनूंषि च विचित्राणि बाणांश्च रुचिरान्बहून् । आयुधानि च वै तत्र रथोपस्थे च स न्यसत् ॥

dhanūṃṣi ca vicitrāṇi bāṇāṃśca rucirānbahūn | āyudhāni ca vai tatra rathopasthe ca sa nyasat

तरह-तरह के धनुष, बहुत से सुन्दर बाण और अन्य शस्त्र भी उसने वहाँ रथ के भीतर रख दिए।

श्लोक 67 (4.38.67)

आरुह्य प्रययौ वीरः सबृहन्नलसारथिः । अथोत्तरा च कन्याश्च सख्यश्चैवाब्रुवंस्तदा ॥

āruhya prayayau vīraḥ sabṛhannalasārathiḥ | athottarā ca kanyāśca sakhyaścaivābruvaṃstadā

उस पर चढ़कर वह वीर बृहन्नला को सारथि बनाकर चल पड़ा। तब उत्तरा, कन्याएँ और सखियाँ बोलीं:

कन्या ऊचुः

श्लोक 68 (4.38.68)

बृहन्नले आनयेथा वासांसि रुचिराणि नः । पाञ्चालिकार्थं सूक्ष्माणि रत्नानि विविधानि च । विजित्य संग्रामगतान्भीष्मद्रोणमुखान्कुरून् ॥

bṛhannale ānayethā vāsāṃsi rucirāṇi naḥ | pāñcālikārthaṃ sūkṣmāṇi ratnāni vividhāni ca | vijitya saṃgrāmagatānbhīṣmadroṇamukhānkurūn

"बृहन्नला, युद्ध में आए भीष्म, द्रोण आदि कौरवों को जीतकर हमारे लिए सुन्दर वस्त्र, हमारी गुड़ियों के लिए महीन कपड़े और तरह-तरह के रत्न ले आना।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 69 (4.38.69)

अथ ता ब्रुवतीः कन्याः सहिताः कुरुनन्दनः । प्रत्युवाच हसन्पार्थो मेघदुन्दुभिनिस्वनः ॥

atha tā bruvatīḥ kanyāḥ sahitāḥ kurunandanaḥ | pratyuvāca hasanpārtho meghadundubhinisvanaḥ

उन कन्याओं के एक साथ ऐसा कहने पर कुरुनन्दन पार्थ ने हँसते हुए मेघ और नगाड़े जैसी गम्भीर वाणी में उत्तर दिया:

अर्जुन उवाच

श्लोक 70 (4.38.70)

यद्युत्तरोऽयं संग्रामे विजेष्यति महारथान् । अथाहरिष्ये वासांसि सूक्ष्माण्याभरणानि च ॥

yadyuttaro'yaṃ saṃgrāme vijeṣyati mahārathān | athāhariṣye vāsāṃsi sūkṣmāṇyābharaṇāni ca

"यदि यह उत्तर युद्ध में महारथियों को जीत लेगा, तो मैं महीन वस्त्र और आभूषण ले आऊँगी।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 71 (4.38.71)

अथोत्तरो वर्म महाप्रभावं सुवर्णवैडूर्यपरिष्कृतं शुभम् । आमुच्य वीरः प्रययौ रथोत्तमं धनञ्जयं सारथिनं प्रगृह्य ॥

athottaro varma mahāprabhāvaṃ suvarṇavaiḍūryapariṣkṛtaṃ śubham | āmucya vīraḥ prayayau rathottamaṃ dhanañjayaṃ sārathinaṃ pragṛhya

तब वीर उत्तर ने सोने और वैदूर्य से जड़ा, बड़े प्रभाव वाला सुन्दर कवच पहना और धनंजय को सारथि बनाकर उत्तम रथ पर चल पड़ा।

श्लोक 72 (4.38.72)

तमुत्तरं प्रेक्ष्य रथोत्तमे स्थितं बृहन्नलां चैव महाजनस्तदा । स्त्रियश्च कन्याश्च द्विजाश्च सुव्रताः प्रदक्षिणं मङ्गलिनोऽभ्यपूजयन् ॥

tamuttaraṃ prekṣya rathottame sthitaṃ bṛhannalāṃ caiva mahājanastadā | striyaśca kanyāśca dvijāśca suvratāḥ pradakṣiṇaṃ maṅgalino'bhyapūjayan

उत्तम रथ पर खड़े उत्तर को और बृहन्नला को भी देखकर बड़ी भीड़ ने, स्त्रियों, कन्याओं और उत्तम व्रत वाले ब्राह्मणों ने, उनकी प्रदक्षिणा की और मंगल-द्रव्यों से उनका सम्मान किया:

महाजन उवाच

श्लोक 73 (4.38.73)

यदर्जुनस्यर्षभतुल्यगामिनः पुराऽभवत्खाण्डवदाहमङ्गलम् । कुरून्समासाद्य रणे बृहन्नले सहोत्तरेणास्तु तवाद्य मङ्गलम् ॥

yadarjunasyarṣabhatulyagāminaḥ purā'bhavatkhāṇḍavadāhamaṅgalam | kurūnsamāsādya raṇe bṛhannale sahottareṇāstu tavādya maṅgalam

"बृहन्नला, बैल जैसी चाल वाले अर्जुन का जो मंगल पहले खाण्डव-दाह के समय हुआ था, युद्ध में कौरवों से भिड़ने पर उत्तर के साथ आज वही मंगल तुम्हारा भी हो।"

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