विराट पर्व · अध्याय 39
उत्तर का पलायन और अर्जुन द्वारा उसे लौटा लाना
राजकुमार उत्तर बृहन्नला (छद्मवेशी अर्जुन) को सारथि बनाकर निकलता है, पर भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृप और दुर्योधन से रक्षित विशाल कुरुसेना को देखते ही उसका साहस टूट जाता है और वह लौट चलने की विनती करता है; जब अर्जुन उसे स्त्रियों के सामने की गई डींगों की याद दिलाते हैं, तो वह रथ से कूदकर भाग खड़ा होता है। लम्बी वेणी लहराते अर्जुन उसके पीछे दौड़ते हैं, और कौरव योद्धा विचार करते हैं कि स्त्री-वेश में यह कौन है — द्रोण उसे निश्चय ही अर्जुन मानते हैं, जबकि कर्ण और दुर्योधन सन्देह करते हैं। उत्तर को बालों से पकड़कर अर्जुन उसके विलाप और धन के प्रलोभनों की परवाह न करते हुए उसे ढाढ़स बँधाते हैं, उसे सारथि बनाकर रथ पर बिठाते हैं और गाण्डीव धनुष लेने के लिए शमी वृक्ष की ओर चल पड़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.39.1)
स राजधान्या निर्याय वैराटिरकुतोभयः । प्रयाहीत्यब्रवीत्सूतं यत्र ते कुरवो गताः ॥
sa rājadhānyā niryāya vairāṭirakutobhayaḥ | prayāhītyabravītsūtaṃ yatra te kuravo gatāḥ
राजधानी से निकलकर निर्भय विराटपुत्र ने सारथि से कहा — "जहाँ वे कौरव गए हैं, वहीं चलो।"
उत्तर उवाच
श्लोक 2 (4.39.2)
समवेतान्कुरून्सर्वाञ्जिगीषूनवजित्य वै । गाश्चैताः क्षिप्रमादाय पुनरेष्याम्यहं पुरम् ॥
samavetānkurūnsarvāñjigīṣūnavajitya vai | gāścaitāḥ kṣipramādāya punareṣyāmyahaṃ puram
विजय की इच्छा से इकट्ठे हुए सब कौरवों को हराकर और इन गौओं को शीघ्र छुड़ाकर मैं फिर नगर लौट आऊँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (4.39.3)
ततस्तांश्चोदयामास सदश्वान्पाण्डुनन्दनः ॥
tatastāṃścodayāmāsa sadaśvānpāṇḍunandanaḥ
तब पाण्डुनन्दन अर्जुन ने उन उत्तम घोड़ों को हाँका।
श्लोक 4 (4.39.4)
ते हया नरसिंहेन चोदिता वातरंहसः । आलिखन्त इवाकाशमूहुः काञ्चनमालिनः ॥
te hayā narasiṃhena coditā vātaraṃhasaḥ | ālikhanta ivākāśamūhuḥ kāñcanamālinaḥ
नरसिंह अर्जुन के हाँकने पर वायु के समान वेगवाले, सोने की मालाएँ पहने वे घोड़े ऐसे दौड़े मानो आकाश पर रेखाएँ खींच रहे हों।
श्लोक 5 (4.39.5)
नातिदूरमथो गत्वा मात्स्यपुत्रधनञ्जयौ । अवैक्षेतामवित्रस्तौ कुरूणां बलिनां बलम् ॥
nātidūramatho gatvā mātsyaputradhanañjayau | avaikṣetāmavitrastau kurūṇāṃ balināṃ balam
थोड़ी ही दूर जाने पर मत्स्यराज के पुत्र और धनंजय ने निर्भय होकर बलवान कौरवों की सेना देखी।
श्लोक 6 (4.39.6)
श्मशानमभितो गत्वा शूरौ ददृशतुःकुरून् ॥
śmaśānamabhito gatvā śūrau dadṛśatuḥkurūn
श्मशान के पास पहुँचकर उन दोनों वीरों ने कौरवों को देखा।
श्लोक 7 (4.39.7)
तदनीकं महत्तेषां विस्तृतं सागरोपमम् । सर्पमाणमिवाकाशे वनं बहुलपादपम् ॥
tadanīkaṃ mahatteṣāṃ vistṛtaṃ sāgaropamam | sarpamāṇamivākāśe vanaṃ bahulapādapam
उनकी वह विशाल सेना सागर के समान फैली हुई थी, मानो घने वृक्षों वाला कोई वन आकाश में चल रहा हो।
श्लोक 8 (4.39.8)
ददृशे पार्थिवो रेणुर्जनितस्तेन सर्पता । दृष्टिप्रणाशो भूतानां दिवस्पृक्कुरुसत्तम ॥
dadṛśe pārthivo reṇurjanitastena sarpatā | dṛṣṭipraṇāśo bhūtānāṃ divaspṛkkurusattama
उस चलती हुई सेना से उठी धरती की धूल आकाश को छूती दिखाई दी, जिसने सब प्राणियों की दृष्टि ढक दी, हे कुरुश्रेष्ठ।
श्लोक 9 (4.39.9)
तदनीकमथो वीक्ष्य गजाश्वरथसंकुलम् । कर्णदुर्योधनकृपैर्गुप्तं शान्तनवेन च । द्रोणेन सह पुत्रेण महेष्वासेन धीमता ॥
tadanīkamatho vīkṣya gajāśvarathasaṃkulam | karṇaduryodhanakṛpairguptaṃ śāntanavena ca | droṇena saha putreṇa maheṣvāsena dhīmatā
तब हाथियों, घोड़ों और रथों से भरी उस सेना को देखकर — जिसकी रक्षा कर्ण, दुर्योधन, कृप, शान्तनुपुत्र भीष्म और पुत्र सहित महाधनुर्धर बुद्धिमान द्रोण कर रहे थे —
श्लोक 10 (4.39.10)
हृष्टरोमा भयोद्विग्नो निमील्य स्वदृशौ तदा । कम्पमानशरीरश्च पार्थं वैराटिरब्रवीत् ॥
hṛṣṭaromā bhayodvigno nimīlya svadṛśau tadā | kampamānaśarīraśca pārthaṃ vairāṭirabravīt
विराटपुत्र के रोंगटे खड़े हो गए, वह भय से व्याकुल हो उठा; उसने अपनी आँखें मूँद लीं और काँपते शरीर से पार्थ से कहा —
उत्तर उवाच
श्लोक 11 (4.39.11)
नोत्सहे कुरुभिर्योद्धुं रोमहर्षं हि पश्य मे । बहुप्रवीरमत्युग्रं देवैरपि दुरासदम् । प्रतियोद्धुं न शक्नोमि कुरुसैन्यं भयानकम् ॥
notsahe kurubhiryoddhuṃ romaharṣaṃ hi paśya me | bahupravīramatyugraṃ devairapi durāsadam | pratiyoddhuṃ na śaknomi kurusainyaṃ bhayānakam
मुझमें कौरवों से लड़ने का साहस नहीं है; देखो, मेरे रोंगटे खड़े हो गए हैं। अनेक वीरों से भरी, अत्यन्त उग्र, देवताओं के लिए भी दुर्जय इस भयानक कुरुसेना का सामना मैं नहीं कर सकता।
श्लोक 12 (4.39.12)
नाशंसे भारतीं सेनां प्रवेष्टुं भीमकार्मुकाम् । देवैरपि सहेन्द्रेण न शक्यं किंपुनर्नरैः ॥
nāśaṃse bhāratīṃ senāṃ praveṣṭuṃ bhīmakārmukām | devairapi sahendreṇa na śakyaṃ kiṃpunarnaraiḥ
भयंकर धनुषों वाली इस भारती सेना में प्रवेश करने की मुझे आशा नहीं। इन्द्र सहित देवता भी ऐसा नहीं कर सकते, फिर मनुष्यों की क्या बात?
श्लोक 13 (4.39.13)
रथनागाश्वकलिलं पत्तिध्वजसमाकुलम् । दृष्ट्वैव हि परानीकं मनः प्रव्यथतीव मे ॥
rathanāgāśvakalilaṃ pattidhvajasamākulam | dṛṣṭvaiva hi parānīkaṃ manaḥ pravyathatīva me
रथों, हाथियों और घोड़ों से भरी, पैदल सैनिकों और ध्वजाओं से घिरी शत्रु-सेना को देखते ही मेरा मन काँप उठता है।
श्लोक 14 (4.39.14)
यत्र द्रोणश्च भीष्मश्च कृपः कर्णो विविंशतिः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तश्च बाह्लिकः । दुर्योधनस्तथा राजा वीरो दुर्मर्षणः परः ॥
yatra droṇaśca bhīṣmaśca kṛpaḥ karṇo viviṃśatiḥ | aśvatthāmā vikarṇaśca somadattaśca bāhlikaḥ | duryodhanastathā rājā vīro durmarṣaṇaḥ paraḥ
जहाँ द्रोण और भीष्म, कृप, कर्ण, विविंशति, अश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त और बाह्लीक हैं, और राजा दुर्योधन तथा वीर दुर्मर्षण भी हैं —
श्लोक 15 (4.39.15)
नीतिमन्तो महेष्वासाः सर्वे युद्धविशारदाः । मत्ता इव महानागा युक्तध्वजपताकिनः ॥
nītimanto maheṣvāsāḥ sarve yuddhaviśāradāḥ | mattā iva mahānāgā yuktadhvajapatākinaḥ
वे सब नीतिकुशल, महाधनुर्धर और युद्ध में निपुण हैं; मतवाले महागजों के समान, ध्वजाओं और पताकाओं से युक्त —
श्लोक 16 (4.39.16)
नीतिमन्तो महेष्वासाः सर्वार्थकृतनिश्चयाः । ताञ्जेतुं समरे शूरान्दुर्बुद्धिरहमागतः ॥
nītimanto maheṣvāsāḥ sarvārthakṛtaniścayāḥ | tāñjetuṃ samare śūrāndurbuddhirahamāgataḥ
नीतिकुशल, महाधनुर्धर, हर कार्य में दृढ़ निश्चय वाले — ऐसे शूरवीरों को युद्ध में जीतने मैं अपनी दुर्बुद्धि से यहाँ आ गया हूँ।
श्लोक 17 (4.39.17)
दृष्ट्वैव हि कुरून्सर्वान्व्यूढानीकान्प्रहारिणः । हृषितानि च रोमाणि कश्मलेनाहतं मनः ॥
dṛṣṭvaiva hi kurūnsarvānvyūḍhānīkānprahāriṇaḥ | hṛṣitāni ca romāṇi kaśmalenāhataṃ manaḥ
व्यूह रचकर प्रहार को तैयार इन सब कौरवों को देखते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए हैं और मेरा मन मूर्च्छा से घिर गया है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (4.39.18)
दृष्ट्वा तु महतीं सेनां कुरूणां दृढधन्विनाम् । परिदेवयते मन्दः सकाशे सव्यसाचिनः ॥
dṛṣṭvā tu mahatīṃ senāṃ kurūṇāṃ dṛḍhadhanvinām | paridevayate mandaḥ sakāśe savyasācinaḥ
दृढ़ धनुषधारी कौरवों की विशाल सेना देखकर वह मूढ़ राजकुमार सव्यसाची अर्जुन के सामने विलाप करने लगा —
उत्तर उवाच
श्लोक 19 (4.39.19)
त्रिगर्तान्मे पिता यातः शून्ये वै प्रणिधाय माम् । सर्वां सेनामुपादाय न मे सन्तीह सैनिकाः ॥
trigartānme pitā yātaḥ śūnye vai praṇidhāya mām | sarvāṃ senāmupādāya na me santīha sainikāḥ
मेरे पिता सारी सेना लेकर त्रिगर्तों से लड़ने गए हैं और मुझे सूने नगर में छोड़ गए हैं। यहाँ मेरे पास कोई सैनिक नहीं है।
श्लोक 20 (4.39.20)
अहमेको बहून्बालः कृतास्त्रानकृतश्रमः । प्रतियोद्धुं न शक्नोमि निवर्तय बृहन्नले ॥
ahameko bahūnbālaḥ kṛtāstrānakṛtaśramaḥ | pratiyoddhuṃ na śaknomi nivartaya bṛhannale
मैं अकेला हूँ, बालक हूँ, शस्त्राभ्यास में कभी परिश्रम नहीं किया; अस्त्रों में निपुण इतने योद्धाओं से मैं नहीं लड़ सकता। बृहन्नला, रथ लौटा लो!
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (4.39.21)
तं तथा वादिनं तत्र बीभत्सुः प्रत्यभाषत । संप्रहस्य पुनस्तं वै सर्वलोकमहारथः ॥
taṃ tathā vādinaṃ tatra bībhatsuḥ pratyabhāṣata | saṃprahasya punastaṃ vai sarvalokamahārathaḥ
उसे ऐसा कहते देख सम्पूर्ण लोक के महारथी बीभत्सु ने हँसकर उससे फिर कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 22 (4.39.22)
भयेन दीनरूपोऽसि द्विषतां हर्षवर्धनः । न च तावत्कृतं किंचित्परैः कर्म रणाजिरे ॥
bhayena dīnarūpo'si dviṣatāṃ harṣavardhanaḥ | na ca tāvatkṛtaṃ kiṃcitparaiḥ karma raṇājire
भय के कारण तुम दीन दिख रहे हो, जिससे शत्रुओं का हर्ष बढ़ता है। अभी तो रणभूमि में शत्रुओं ने कुछ भी नहीं किया है।
श्लोक 23 (4.39.23)
स्वयमेव च मामात्थ नय मां कौरवान्प्रति । सोहं त्वां तत्र नेष्यामि यत्रैते बहुला ध्वजाः ॥
svayameva ca māmāttha naya māṃ kauravānprati | sohaṃ tvāṃ tatra neṣyāmi yatraite bahulā dhvajāḥ
तुमने स्वयं मुझसे कहा था — "मुझे कौरवों की ओर ले चलो।" इसलिए मैं तुम्हें वहीं ले चलूँगा जहाँ ये अनेक ध्वजाएँ हैं।
श्लोक 24 (4.39.24)
मध्यमामिषगृध्राणां कुरूणामाततायिनाम् । नेष्यामि त्वां महाबाहो मा त्वं हि विमना भव । समुद्रमिव गम्भीरं कुरुसैन्यमरिन्दम ॥
madhyamāmiṣagṛdhrāṇāṃ kurūṇāmātatāyinām | neṣyāmi tvāṃ mahābāho mā tvaṃ hi vimanā bhava | samudramiva gambhīraṃ kurusainyamarindama
मांस के लोभी गिद्धों जैसे इन आततायी कौरवों के बीच मैं तुम्हें ले चलूँगा, हे महाबाहु; तुम उदास मत हो। हे शत्रुदमन, यह कुरुसेना समुद्र के समान गहरी है।
श्लोक 25 (4.39.25)
स्त्रीसकाशे प्रतिज्ञाय पुरुषाणां हि शृण्वताम् । विकत्थमानो निर्यात्वा ब्रूषि किं नात्र युद्ध्यसे ॥
strīsakāśe pratijñāya puruṣāṇāṃ hi śṛṇvatām | vikatthamāno niryātvā brūṣi kiṃ nātra yuddhyase
स्त्रियों के सामने, पुरुषों के सुनते हुए, तुमने प्रतिज्ञा की और डींग मारते हुए निकले। बताओ, अब यहाँ क्यों नहीं लड़ते?
श्लोक 26 (4.39.26)
तथा स्त्रीषु प्रतिश्रुत्य पौरुषं पुरुषेषु च । रथमारुह्य निर्यात्वा किमर्थं नावबुध्यसे ॥
tathā strīṣu pratiśrutya pauruṣaṃ puruṣeṣu ca | rathamāruhya niryātvā kimarthaṃ nāvabudhyase
स्त्रियों और पुरुषों के सामने पराक्रम का वचन देकर, रथ पर चढ़कर तुम निकल आए हो — फिर क्यों नहीं समझते कि तुम्हें क्या करना है?
श्लोक 27 (4.39.27)
न चेद्विजित्य गास्त्वं हि नगरं प्रतियास्यसि । प्रहसिष्यन्ति वीरास्त्वां नरा नार्यश्च संगताः ॥
na cedvijitya gāstvaṃ hi nagaraṃ pratiyāsyasi | prahasiṣyanti vīrāstvāṃ narā nāryaśca saṃgatāḥ
यदि तुम गौओं को जीते बिना नगर लौटोगे, तो वीर पुरुष और वहाँ इकट्ठे हुए स्त्री-पुरुष तुम्हारी हँसी उड़ाएँगे।
श्लोक 28 (4.39.28)
अहमप्यस्मि सैरन्ध्र्या स्तुतः सारथ्यकर्मणि । नाहं शक्नोम्यनिर्जित्य गाः प्रयातुं पुरं प्रति ॥
ahamapyasmi sairandhryā stutaḥ sārathyakarmaṇi | nāhaṃ śaknomyanirjitya gāḥ prayātuṃ puraṃ prati
सैरन्ध्री ने मेरी भी सारथि-कर्म में प्रशंसा की है; मैं गौओं को जीते बिना नगर नहीं लौट सकता।
श्लोक 29 (4.39.29)
स्तोत्रेण चैव सैरन्ध्र्यास्तव वाक्येन चोदितः । कथं न युद्ध्येयमहं कुरूनेतान्स्थिरो भव ॥
stotreṇa caiva sairandhryāstava vākyena coditaḥ | kathaṃ na yuddhyeyamahaṃ kurūnetānsthiro bhava
सैरन्ध्री की प्रशंसा और तुम्हारे वचनों से प्रेरित होकर मैं इन कौरवों से क्यों न लड़ूँ? तुम स्थिर रहो।
उत्तर उवाच
श्लोक 30 (4.39.30)
कामं हरन्तु मात्स्यानां भूयांसः कुरवो धनम् । प्रहसन्तु च मां नार्यो नरा वाऽपि बृहन्नले ॥
kāmaṃ harantu mātsyānāṃ bhūyāṃsaḥ kuravo dhanam | prahasantu ca māṃ nāryo narā vā'pi bṛhannale
कौरव मत्स्यों का जितना चाहें धन हर ले जाएँ; बृहन्नला, स्त्रियाँ और पुरुष भी चाहें तो मेरी हँसी उड़ाएँ।
श्लोक 31 (4.39.31)
संग्रामेण न मे कार्यं गावो गच्छन्तु चापि मे । नगरं च प्रवेक्ष्यामि पश्यतस्ते बृहन्नले ॥
saṃgrāmeṇa na me kāryaṃ gāvo gacchantu cāpi me | nagaraṃ ca pravekṣyāmi paśyataste bṛhannale
मुझे युद्ध से कोई काम नहीं; गौएँ भी जाती हैं तो जाएँ। बृहन्नला, तुम्हारे देखते-देखते मैं नगर में लौट जाऊँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 32 (4.39.32)
इत्युक्त्वा प्राद्रवद्भीतो रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली । त्यक्त्वा मानं सुसंत्रस्तो विसृज्य सशरं धनुः ॥
ityuktvā prādravadbhīto rathātpraskandya kuṇḍalī | tyaktvā mānaṃ susaṃtrasto visṛjya saśaraṃ dhanuḥ
यह कहकर कुण्डलधारी राजकुमार डर के मारे रथ से कूदकर भाग चला; अत्यन्त भयभीत होकर उसने मान छोड़ दिया और बाणों सहित धनुष फेंक दिया।
अर्जुन उवाच
श्लोक 33 (4.39.33)
नैष शूरैः स्मृतो धर्मः क्षत्रियस्य पलायनम् । श्रेयो हि मरणं युद्धे न भीतस्य पलायनम् ॥
naiṣa śūraiḥ smṛto dharmaḥ kṣatriyasya palāyanam | śreyo hi maraṇaṃ yuddhe na bhītasya palāyanam
शूरवीर क्षत्रिय के लिए पलायन को धर्म नहीं मानते। युद्ध में मर जाना श्रेष्ठ है, डरकर भागना नहीं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 34 (4.39.34)
एवमुक्त्वा तु कौरव्यः सोऽवप्लुत्य रथोत्तमात् । तमन्वधावद्धावन्तं राजपुत्रं धनञ्जयः । दीर्घां वेणीं विधून्वानः साधु रक्ते च वाससी ॥
evamuktvā tu kauravyaḥ so'vaplutya rathottamāt | tamanvadhāvaddhāvantaṃ rājaputraṃ dhanañjayaḥ | dīrghāṃ veṇīṃ vidhūnvānaḥ sādhu rakte ca vāsasī
यह कहकर कुरुवंशी धनंजय उस श्रेष्ठ रथ से कूद पड़े और भागते हुए राजकुमार के पीछे दौड़े; उनकी लम्बी वेणी लहरा रही थी और दोनों सुन्दर लाल वस्त्र फहरा रहे थे।
श्लोक 35 (4.39.35)
विक्रमन्तं पदन्यासैर्नमयन्तं च भूतलम् । विधूय वेणीं धावन्तमजानन्तोऽर्जुनं तदा । सैनिकाः प्राहसन्केचिद्योषिद्रूपमवेक्ष्य तम् ॥
vikramantaṃ padanyāsairnamayantaṃ ca bhūtalam | vidhūya veṇīṃ dhāvantamajānanto'rjunaṃ tadā | sainikāḥ prāhasankecidyoṣidrūpamavekṣya tam
लम्बे डग भरते, मानो धरती को झुकाते हुए, वेणी लहराते दौड़ते उस पुरुष को अर्जुन न पहचानकर कुछ सैनिक उसका स्त्री जैसा रूप देखकर हँसने लगे।
श्लोक 36 (4.39.36)
तं च शीघ्रं प्रधावन्तं संप्रेक्ष्य कुरवोऽब्रुवन् । कोऽयं धावत्यसङ्गेन पूर्वं मुक्त्वा रथोत्तमम् ॥
taṃ ca śīghraṃ pradhāvantaṃ saṃprekṣya kuravo'bruvan | ko'yaṃ dhāvatyasaṅgena pūrvaṃ muktvā rathottamam
उसे तेज़ी से दौड़ते देख कौरव बोले — "यह कौन है, जो उस श्रेष्ठ रथ को छोड़कर बेरोक-टोक दौड़ा जा रहा है?"
सैनिका ऊचुः
श्लोक 37 (4.39.37)
क एष वेषसंच्छन्नो भस्मनेव हुताशनः । किंचिदस्य यथा पुंसः किंचिदस्य यथा स्त्रियः ॥
ka eṣa veṣasaṃcchanno bhasmaneva hutāśanaḥ | kiṃcidasya yathā puṃsaḥ kiṃcidasya yathā striyaḥ
राख से ढकी अग्नि के समान वेश में छिपा यह कौन है? इसका कुछ रूप पुरुष जैसा है और कुछ स्त्री जैसा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 38 (4.39.38)
इत्येवं सैनिकाः प्राहुर्द्रोणस्तानिदमब्रवीत् । आचार्यः कुरुपाण्डूनां मतौ शुक्राङ्गिरोपमः ॥
ityevaṃ sainikāḥ prāhurdroṇastānidamabravīt | ācāryaḥ kurupāṇḍūnāṃ matau śukrāṅgiropamaḥ
सैनिक इस प्रकार कह रहे थे, तब कौरवों और पाण्डवों के आचार्य, बुद्धि में शुक्र और अंगिरा के समान द्रोण ने उनसे यह कहा —
द्रोण उवाच
श्लोक 39 (4.39.39)
किं विचारेण वः कार्यमेतेनानुसृतेन वा । धावन्तमनुधावंश्च निर्भयो भयविप्लुतम् । वेणीकलापं निर्धूय प्रविभाति नरर्षभः ॥
kiṃ vicāreṇa vaḥ kāryametenānusṛtena vā | dhāvantamanudhāvaṃśca nirbhayo bhayaviplutam | veṇīkalāpaṃ nirdhūya pravibhāti nararṣabhaḥ
इस पर विचार करने या इसके पीछे पड़ने से तुम्हें क्या लेना? भय से व्याकुल होकर भागते हुए के पीछे निर्भय होकर दौड़ता, अपना केशपाश झटकता यह नरश्रेष्ठ शोभा पा रहा है।
श्लोक 40 (4.39.40)
आकारमर्जुनस्येव क्लीबरूपं बिभर्ति च । रूपेण पार्थसदृशः स्त्रीवेषसमलंकृतः ॥
ākāramarjunasyeva klībarūpaṃ bibharti ca | rūpeṇa pārthasadṛśaḥ strīveṣasamalaṃkṛtaḥ
इसकी आकृति अर्जुन जैसी है, यद्यपि यह नपुंसक का रूप धारण किए है; रूप में यह पार्थ के समान है, भले ही स्त्री-वेश से सजा हो।
श्लोक 41 (4.39.41)
तदेवैतच्छिरोग्रीवं तौ बाहू परिघोपमौ । तत्तदेवास्य विक्रान्तं नायमन्यो धनञ्जयात् ॥
tadevaitacchirogrīvaṃ tau bāhū parighopamau | tattadevāsya vikrāntaṃ nāyamanyo dhanañjayāt
वही सिर और गर्दन, परिघ के समान वे ही दोनों भुजाएँ, वैसी ही चाल — यह धनंजय के सिवा और कोई नहीं।
श्लोक 42 (4.39.42)
अमरेष्विव देवेन्द्रो मनुष्येषु धनञ्जयः । एकः कोस्मानुपायायादन्यो लोके धनञ्जयात् ॥
amareṣviva devendro manuṣyeṣu dhanañjayaḥ | ekaḥ kosmānupāyāyādanyo loke dhanañjayāt
जैसे देवताओं में इन्द्र हैं, वैसे ही मनुष्यों में धनंजय हैं। संसार में धनंजय के सिवा और कौन अकेला हम पर चढ़ आएगा?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 43 (4.39.43)
द्रोणेन चैवमुक्तस्तु कर्णः प्रोवाच बुद्धिमान् । एकः पुत्रो विराटस्य शून्ये संनिहितः पुरे ॥
droṇena caivamuktastu karṇaḥ provāca buddhimān | ekaḥ putro virāṭasya śūnye saṃnihitaḥ pure
द्रोण के ऐसा कहने पर बुद्धिमान कर्ण बोला — "विराट का एक ही पुत्र सूने नगर में रह गया था।"
कर्ण उवाच
श्लोक 44 (4.39.44)
स एष किल निर्यातो बालभावान्न पौरुषात् । क्लीबं वै सारथिं कृत्वा निर्यातो नगराद्बहिः ॥
sa eṣa kila niryāto bālabhāvānna pauruṣāt | klībaṃ vai sārathiṃ kṛtvā niryāto nagarādbahiḥ
वही बचपने के कारण, न कि पौरुष से, निकल आया होगा; एक नपुंसक को सारथि बनाकर वह नगर से बाहर आया है।
श्लोक 45 (4.39.45)
छन्नं सत्रेण वै नूनं जानीध्वं यान्तमर्जुनम् । ते हि नः प्रतिसंयातुं संग्रामे न हि शक्नुयुः । कथमेकतरस्तेषां समस्तान्योधयेत्कुरून् ॥
channaṃ satreṇa vai nūnaṃ jānīdhvaṃ yāntamarjunam | te hi naḥ pratisaṃyātuṃ saṃgrāme na hi śaknuyuḥ | kathamekatarasteṣāṃ samastānyodhayetkurūn
निश्चय ही जान लो कि छद्मवेश में छिपा जाने वाला यह अर्जुन है। पर पाण्डव तो युद्ध में हमारा सामना कर ही नहीं सकते; उनमें से अकेला कोई एक सारे कौरवों से कैसे लड़ेगा?
श्लोक 46 (4.39.46)
उत्तरः सारथिं कृत्वा निर्यातो नगराद्बहिः । स नो मन्ये ध्वजं दृष्ट्वा भीत एष पलायति ॥
uttaraḥ sārathiṃ kṛtvā niryāto nagarādbahiḥ | sa no manye dhvajaṃ dṛṣṭvā bhīta eṣa palāyati
उत्तर उसे सारथि बनाकर नगर से बाहर आया है, और मेरा विचार है कि हमारी ध्वजा देखकर वह डर के मारे भाग रहा है।
कृप उवाच
श्लोक 47 (4.39.47)
नूनं तमेव धावन्तं जिघृक्षति धनञ्जयः । सारथिं ह्युत्तरं कृत्वा स्वयं योद्धुमिहेच्छति ॥
nūnaṃ tameva dhāvantaṃ jighṛkṣati dhanañjayaḥ | sārathiṃ hyuttaraṃ kṛtvā svayaṃ yoddhumihecchati
निश्चय ही धनंजय उसी भागते हुए को पकड़ना चाहता है; वह उत्तर को सारथि बनाकर स्वयं यहाँ युद्ध करना चाहता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 48 (4.39.48)
इति स्म कुरवः सर्वे विमृशन्तः पृथक्पृथक् । न च व्यवसितुं वीरा अर्जुनं शक्नुवन्ति ते ॥
iti sma kuravaḥ sarve vimṛśantaḥ pṛthakpṛthak | na ca vyavasituṃ vīrā arjunaṃ śaknuvanti te
इस प्रकार सब कौरव अलग-अलग विचार करते रहे, पर वे वीर यह निश्चय न कर सके कि वह अर्जुन ही है।
श्लोक 49 (4.39.49)
दुर्योधन उवाचेदं सैनिकान्रथसत्तमान् । अर्जुनो वासुदेवो वा रामः प्रद्युम्न एव वा । ते हि नः प्रतिसंयातुं संग्रामे न हि शक्नुयुः ॥
duryodhana uvācedaṃ sainikānrathasattamān | arjuno vāsudevo vā rāmaḥ pradyumna eva vā | te hi naḥ pratisaṃyātuṃ saṃgrāme na hi śaknuyuḥ
दुर्योधन ने श्रेष्ठ रथी सैनिकों से यह कहा — "अर्जुन हो या वासुदेव, बलराम हो या प्रद्युम्न — वे भी युद्ध में हमारा सामना नहीं कर सकते।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 50 (4.39.50)
अन्यो वै क्लीबरूपेण यद्यागच्छेद्गवां पदम् । शस्त्रैस्तीक्ष्णैरर्पयित्वा पातयिष्यामि भूतले । कथमेकतरस्तेषां समस्तान्योधयेत्कुरून् ॥
anyo vai klībarūpeṇa yadyāgacchedgavāṃ padam | śastraistīkṣṇairarpayitvā pātayiṣyāmi bhūtale | kathamekatarasteṣāṃ samastānyodhayetkurūn
यदि कोई और नपुंसक के रूप में गौओं के स्थान पर आए, तो मैं उसे तीखे शस्त्रों से बींधकर धरती पर गिरा दूँगा। उनमें से अकेला कोई एक सारे कौरवों से कैसे लड़ सकता है?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 51 (4.39.51)
छन्नं तथा तं वेषेण पाण्डवं प्रेक्ष्य सैनिकाः । अर्जुनेति च नेत्येव न व्यवस्यन्ति ते पुनः । इति स्म कुरवः सर्वे विमृशन्तः पुनः पुनः ॥
channaṃ tathā taṃ veṣeṇa pāṇḍavaṃ prekṣya sainikāḥ | arjuneti ca netyeva na vyavasyanti te punaḥ | iti sma kuravaḥ sarve vimṛśantaḥ punaḥ punaḥ
वेश में इस प्रकार छिपे पाण्डव को देखकर सैनिक फिर भी निश्चय न कर सके कि यह अर्जुन है या नहीं; इस प्रकार सब कौरव बार-बार विचार करते रहे।
कुरव ऊचुः
श्लोक 52 (4.39.52)
दृढवेधी महासत्त्वः शक्रतुल्यपराक्रमः । अद्यागच्छति चेद्योद्धुं सर्वं संशयितं बलम् ॥
dṛḍhavedhī mahāsattvaḥ śakratulyaparākramaḥ | adyāgacchati cedyoddhuṃ sarvaṃ saṃśayitaṃ balam
वह अचूक और दृढ़ प्रहार करने वाला, महाबली और इन्द्र के समान पराक्रमी है। यदि वह आज युद्ध करने आता है, तो हमारी सारी सेना संकट में है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 53 (4.39.53)
न चाप्यन्यतरं तत्र व्यवस्यन्ति धनञ्जयात् ॥
na cāpyanyataraṃ tatra vyavasyanti dhanañjayāt
पर वे धनंजय के अतिरिक्त किसी और का भी निश्चय न कर सके।
श्लोक 54 (4.39.54)
उत्तरं तु प्रधावन्तमनुद्रुत्य धनञ्जयः । गत्वा शतपदं तूर्णं केशपक्षे परामृशत् ॥
uttaraṃ tu pradhāvantamanudrutya dhanañjayaḥ | gatvā śatapadaṃ tūrṇaṃ keśapakṣe parāmṛśat
भागते हुए उत्तर का पीछा करते हुए धनंजय ने तेज़ी से सौ कदम जाकर उसे बालों से पकड़ लिया।
श्लोक 55 (4.39.55)
मा मा गृहाण भद्रं ते दासोऽहं ते बृहन्नले । इति वादिनमेवाशु धावन्तं तरसाऽग्रहीत् । विराटपुत्रं बीभत्सुर्बलवानरिमर्दनः ॥
mā mā gṛhāṇa bhadraṃ te dāso'haṃ te bṛhannale | iti vādinamevāśu dhāvantaṃ tarasā'grahīt | virāṭaputraṃ bībhatsurbalavānarimardanaḥ
"मुझे मत पकड़ो, तुम्हारा भला हो! बृहन्नला, मैं तुम्हारा दास हूँ!" ऐसा कहते हुए भागते विराटपुत्र को शत्रुनाशक बलवान बीभत्सु ने शीघ्र ही बलपूर्वक पकड़ लिया।
श्लोक 56 (4.39.56)
सोऽर्जुनेन परामृष्टः पर्यदेवयदार्तवत् । बहुलं कृपणं चैव वित्तं प्रावेदयद्बहु ॥
so'rjunena parāmṛṣṭaḥ paryadevayadārtavat | bahulaṃ kṛpaṇaṃ caiva vittaṃ prāvedayadbahu
अर्जुन के पकड़ लेने पर वह दुखी मनुष्य की भाँति बहुत दीनता से विलाप करने लगा और बहुत-सा धन देने की बात कहने लगा —
उत्तर उवाच
श्लोक 57 (4.39.57)
सुवर्णमणिमुक्तानां यद्यदिच्छसि दद्मि ते । हस्तिनोश्वान्रथान्गावः स्त्रियश्च समलङ्कृताः ॥
suvarṇamaṇimuktānāṃ yadyadicchasi dadmi te | hastinośvānrathāngāvaḥ striyaśca samalaṅkṛtāḥ
सोना, मणि, मोती — जो-जो तुम चाहो, मैं तुम्हें दूँगा; हाथी, घोड़े, रथ, गौएँ और खूब सजी हुई स्त्रियाँ भी।
श्लोक 58 (4.39.58)
शातकुम्भस्य शुद्धस्य श्रेष्ठस्य रजतस्य च । ददामि शतनिष्कं ते मुञ्च मां त्वं बृहन्नले ॥
śātakumbhasya śuddhasya śreṣṭhasya rajatasya ca | dadāmi śataniṣkaṃ te muñca māṃ tvaṃ bṛhannale
मैं तुम्हें शुद्ध तपे सोने और उत्तम चाँदी के सौ निष्क दूँगा। बृहन्नला, मुझे छोड़ दो।
श्लोक 59 (4.39.59)
षष्टिं स्वलंकृताः कन्या ग्राममेकं ददामि ते । मुञ्च मां त्वं भृशं दीनं विह्वलं भयकम्पितम् ॥
ṣaṣṭiṃ svalaṃkṛtāḥ kanyā grāmamekaṃ dadāmi te | muñca māṃ tvaṃ bhṛśaṃ dīnaṃ vihvalaṃ bhayakampitam
साठ सजी-धजी कन्याएँ और एक गाँव मैं तुम्हें दूँगा। मुझे छोड़ दो, मैं बहुत दीन, व्याकुल और भय से काँप रहा हूँ।
श्लोक 60 (4.39.60)
मणीनष्टौ च वैडूर्यान्हेमबद्धान्महाप्रभान् । हेमदण्डप्रतिच्छन्नं रथं युक्तं तु वाजिभिः ॥
maṇīnaṣṭau ca vaiḍūryānhemabaddhānmahāprabhān | hemadaṇḍapraticchannaṃ rathaṃ yuktaṃ tu vājibhiḥ
सोने में जड़ी हुई आठ चमचमाती वैदूर्य मणियाँ, सोने के दण्ड से सजा और घोड़ों से जुता रथ,
श्लोक 61 (4.39.61)
मत्तांश्च दश मातङ्गान्मुञ्च मां त्वं बृहन्नले । गमिष्यामि पुरं षण्ड द्रष्टुं मातरमद्य ताम् ॥
mattāṃśca daśa mātaṅgānmuñca māṃ tvaṃ bṛhannale | gamiṣyāmi puraṃ ṣaṇḍa draṣṭuṃ mātaramadya tām
और दस मतवाले हाथी — बृहन्नला, मुझे छोड़ दो। हे षण्ड, मैं आज ही नगर जाकर अपनी माता से मिलूँगा।
श्लोक 62 (4.39.62)
एकोऽहमेव मे मातुः कुमारः किं ब्रुवे ततः । विधिरेवंविधे काले त्वद्वशं कुरुते हि माम् ॥
eko'hameva me mātuḥ kumāraḥ kiṃ bruve tataḥ | vidhirevaṃvidhe kāle tvadvaśaṃ kurute hi mām
मैं अपनी माता का इकलौता पुत्र हूँ; इससे अधिक क्या कहूँ? ऐसे समय में विधाता ने मुझे तुम्हारे वश में कर दिया है।
श्लोक 63 (4.39.63)
मात्स्यस्य पुत्रो बालोऽहं तेन चास्मि सुपोषितः । मातृपार्श्वशयानोऽहमस्पृष्टातपवायुमान् ॥
mātsyasya putro bālo'haṃ tena cāsmi supoṣitaḥ | mātṛpārśvaśayāno'hamaspṛṣṭātapavāyumān
मैं मत्स्यराज का बालक पुत्र हूँ, उन्होंने मुझे बड़े लाड़ से पाला है; मैं माता के पास सोता रहा हूँ, धूप और हवा ने भी मुझे नहीं छुआ।
श्लोक 64 (4.39.64)
अदृष्टबलयुद्धोऽहं कुतस्ते कुरवः कुतः । मातृपार्श्वं गमिष्यामि मुञ्च मां त्वं बृहन्नले ॥
adṛṣṭabalayuddho'haṃ kutaste kuravaḥ kutaḥ | mātṛpārśvaṃ gamiṣyāmi muñca māṃ tvaṃ bṛhannale
मैंने कभी सेनाओं का युद्ध नहीं देखा — कहाँ मैं और कहाँ ये कौरव? मैं माता के पास जाऊँगा; बृहन्नला, मुझे छोड़ दो।
श्लोक 65 (4.39.65)
प्रलयार्णवसंकाशं दृश्यते कौरवं बलम् ॥
pralayārṇavasaṃkāśaṃ dṛśyate kauravaṃ balam
कौरवों की सेना प्रलयकाल के समुद्र जैसी दिखाई देती है।
श्लोक 66 (4.39.66)
स्त्रीणां मध्येऽहमज्ञानाद्वीर्यशौर्याङ्कितां गिरम् । उक्तो यौवनगर्वेण को जेतुं शक्नुयात्कुरून् । अमुक्त्वा मां यदि नयेर्मरिष्यामि तवाग्रतः ॥
strīṇāṃ madhye'hamajñānādvīryaśauryāṅkitāṃ giram | ukto yauvanagarveṇa ko jetuṃ śaknuyātkurūn | amuktvā māṃ yadi nayermariṣyāmi tavāgrataḥ
स्त्रियों के बीच मैंने अज्ञान और यौवन के घमंड में वीरता और शौर्य से भरी बातें कह दीं — पर कौरवों को कौन जीत सकता है? यदि मुझे छोड़े बिना आगे ले चलोगे तो मैं तुम्हारे सामने ही मर जाऊँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 67 (4.39.67)
एवमादीनि वाक्यानि विलपन्तमचेतसम् । प्रसभं पुरुषव्याघ्रो रथस्यान्तिकमानयत् ॥
evamādīni vākyāni vilapantamacetasam | prasabhaṃ puruṣavyāghro rathasyāntikamānayat
ऐसी-ऐसी बातें कहकर बेसुध होकर विलाप करते हुए उत्तर को पुरुषसिंह अर्जुन बलपूर्वक रथ के पास ले आए।
श्लोक 68 (4.39.68)
अथैनमब्रवीत्पार्थो भयार्तं नष्टचेतसम् ॥
athainamabravītpārtho bhayārtaṃ naṣṭacetasam
तब भय से पीड़ित और बेसुध उत्तर से पार्थ ने कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 69 (4.39.69)
अहं योत्स्यामि कौरव्यैर्हयान्संयच्छ मेति माम् । आददानः किमर्थं त्वं पलायनपरोऽभवः ॥
ahaṃ yotsyāmi kauravyairhayānsaṃyaccha meti mām | ādadānaḥ kimarthaṃ tvaṃ palāyanaparo'bhavaḥ
"मैं कौरवों से लड़ूँगा, तुम मेरे लिए घोड़ों को सँभालो" — यह कहकर तुम मुझे साथ लाए थे; फिर तुम भागने पर क्यों उतारू हो गए?
श्लोक 70 (4.39.70)
युध्यस्व कौरवैः सार्धं विजयस्ते भविष्यति । यस्य यन्तास्म्यहं युद्धे संयच्छामि हयोत्तमान् । राज्ञो वा राजपुत्रस्य तस्य युद्धे जयो ध्रुवम् ॥
yudhyasva kauravaiḥ sārdhaṃ vijayaste bhaviṣyati | yasya yantāsmyahaṃ yuddhe saṃyacchāmi hayottamān | rājño vā rājaputrasya tasya yuddhe jayo dhruvam
कौरवों से युद्ध करो, तुम्हारी विजय होगी। युद्ध में मैं जिस राजा या राजकुमार का सारथि बनकर उत्तम घोड़ों को सँभालता हूँ, उसकी विजय निश्चित है।
श्लोक 71 (4.39.71)
सर्वथोत्तर युध्यस्व यन्त्रा सह मया कुरून् । जित्वा महीं यशः प्राप्य भोक्ष्यसे सकलामिमाम् ॥
sarvathottara yudhyasva yantrā saha mayā kurūn | jitvā mahīṃ yaśaḥ prāpya bhokṣyase sakalāmimām
उत्तर, हर हाल में मुझ सारथि के साथ कौरवों से लड़ो। पृथ्वी को जीतकर और यश पाकर तुम इस सारी धरती का भोग करोगे।
श्लोक 72 (4.39.72)
हतो वा प्राप्स्यसे स्वर्गं न श्रेयस्ते पलायनम् ॥
hato vā prāpsyase svargaṃ na śreyaste palāyanam
और यदि मारे गए तो स्वर्ग पाओगे; भागने में तुम्हारा कोई कल्याण नहीं।
श्लोक 73 (4.39.73)
अद्य सर्वान्कुरूञ्जित्वा यथा जयमवाप्स्यसि । तथाऽहं प्रयतिष्येऽत्र सहायोऽत्र मतो ह्यहम् ॥
adya sarvānkurūñjitvā yathā jayamavāpsyasi | tathā'haṃ prayatiṣye'tra sahāyo'tra mato hyaham
मैं यहाँ ऐसा प्रयत्न करूँगा कि आज तुम सब कौरवों को जीतकर विजय पाओ; मुझे यहाँ अपना सहायक समझो।
श्लोक 74 (4.39.74)
यदि नोत्सहसे योद्धुं शत्रुभिः शत्रुकर्शन । एहि मे त्वं हयान्यच्छ युध्यमानस्य शत्रुभिः ॥
yadi notsahase yoddhuṃ śatrubhiḥ śatrukarśana | ehi me tvaṃ hayānyaccha yudhyamānasya śatrubhiḥ
हे शत्रुनाशक, यदि तुम शत्रुओं से लड़ने का साहस नहीं रखते, तो आओ, जब मैं शत्रुओं से लड़ूँ तब तुम मेरे घोड़े सँभालो।
श्लोक 75 (4.39.75)
प्रयाह्येतद्रथानीकं मद्बाहुपरिरक्षितः । अप्रधृष्यतमं घोरं गुप्तं घोरैर्महारथैः । मा भैस्त्वं राजपुत्राग्र्य क्षत्रियोसि परंतप ॥
prayāhyetadrathānīkaṃ madbāhuparirakṣitaḥ | apradhṛṣyatamaṃ ghoraṃ guptaṃ ghorairmahārathaiḥ | mā bhaistvaṃ rājaputrāgrya kṣatriyosi paraṃtapa
मेरी भुजाओं से रक्षित होकर इस रथ-सेना की ओर चलो, जो अत्यन्त दुर्धर्ष और भयानक है और भीषण महारथियों से रक्षित है। हे श्रेष्ठ राजकुमार, डरो मत; हे परंतप, तुम क्षत्रिय हो।
श्लोक 76 (4.39.76)
अहं तैः कुरुभिर्योत्स्ये प्रत्यानेष्यामि ते पशून् । प्रविशैतद्रथानीकमप्रधृष्यं दुरासदम् ॥
ahaṃ taiḥ kurubhiryotsye pratyāneṣyāmi te paśūn | praviśaitadrathānīkamapradhṛṣyaṃ durāsadam
मैं उन कौरवों से लड़ूँगा और तुम्हारे पशु वापस ले आऊँगा। इस दुर्धर्ष और दुर्गम रथ-सेना में प्रवेश करो।
श्लोक 77 (4.39.77)
यन्ता भव नरश्रेष्ठ योत्स्येऽहं कुरुभिः सह । शूरान्समरचण्डांश्च नयिष्ये यमसादनम् ॥
yantā bhava naraśreṣṭha yotsye'haṃ kurubhiḥ saha | śūrānsamaracaṇḍāṃśca nayiṣye yamasādanam
हे नरश्रेष्ठ, तुम सारथि बनो; मैं कौरवों से लड़ूँगा और युद्ध में प्रचण्ड उन शूरवीरों को यमलोक भेज दूँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 78 (4.39.78)
एवं ब्रुवाणो वैराटिं बीभत्सुरपराजितः । समाश्वास्य भयार्तं तमुत्तरं भरतर्षभः ॥
evaṃ bruvāṇo vairāṭiṃ bībhatsuraparājitaḥ | samāśvāsya bhayārtaṃ tamuttaraṃ bharatarṣabhaḥ
विराटपुत्र से ऐसा कहकर अपराजित भरतश्रेष्ठ बीभत्सु ने भय से पीड़ित उत्तर को ढाढ़स बँधाया।
श्लोक 79 (4.39.79)
इतस्ततो विवेष्टन्तमकामं भयपीडितम् । रथमारोपयामास पार्थः परपुरंजयः ॥
itastato viveṣṭantamakāmaṃ bhayapīḍitam | rathamāropayāmāsa pārthaḥ parapuraṃjayaḥ
फिर शत्रुनगरों को जीतने वाले पार्थ ने इधर-उधर छटपटाते, अनिच्छुक और भय से पीड़ित उत्तर को रथ पर चढ़ा दिया।
श्लोक 80 (4.39.80)
तमारोप्य रथोपस्थे विलपन्तं धनञ्जयः । गाण्डीवं धनुरादातुमुपायात्तां शमीं प्रति । उत्तरं तं समाश्वास्य कृत्वा यन्तारमर्जुनः ॥
tamāropya rathopasthe vilapantaṃ dhanañjayaḥ | gāṇḍīvaṃ dhanurādātumupāyāttāṃ śamīṃ prati | uttaraṃ taṃ samāśvāsya kṛtvā yantāramarjunaḥ
विलाप करते उत्तर को रथ के आसन पर बिठाकर, उसे ढाढ़स बँधाकर और सारथि बनाकर धनंजय अर्जुन गाण्डीव धनुष लेने के लिए उस शमी वृक्ष की ओर चल पड़े।