विराट पर्व · अध्याय 40
द्रोण द्वारा अर्जुन की पहचान; उत्तर का शमी वृक्ष पर चढ़ना
वेश बदले हुए अर्जुन जब उत्तर को रथ पर लेकर शमी वृक्ष की ओर बढ़ते हैं, तो कौरव योद्धा भयभीत हो उठते हैं, और अशुभ लक्षण देखकर द्रोण उन्हें युद्ध के लिए तैयार रहने को कहते हैं — रथ पर बैठा नपुंसक अर्जुन ही है। द्रोण और भीष्म संकेतों और गूढ़ वचनों में बात करते हैं, और द्रोण दुर्योधन को अर्जुन के पुराने पराक्रम गिनाते हैं; कर्ण उपहास करता है, और दुर्योधन कहता है कि यदि यह अर्जुन है तो पाण्डवों को फिर बारह वर्ष वनवास भोगना होगा। वृक्ष के पास अर्जुन उत्तर को उस पर चढ़कर पाण्डवों के आयुध उतारने का आदेश देते हैं; राजकुमार कहता है कि वहाँ एक शव बँधा है, पर आश्वासन पाकर वह चढ़ता है, धनुषों के आवरण खोलता है और उनकी दीप्ति से पहले डरकर फिर संभलता है और अर्जुन से बोलता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.40.1)
तं दृष्ट्वा क्लीबरूपेण रथस्थं रथिपुङ्गवम् । शमीमभिमुखं यान्तं रथमारोप्य चोत्तरम् ॥
taṃ dṛṣṭvā klībarūpeṇa rathasthaṃ rathipuṅgavam | śamīmabhimukhaṃ yāntaṃ rathamāropya cottaram
जब उन्होंने रथियों में श्रेष्ठ उस वीर को नपुंसक के रूप में रथ पर खड़ा, उत्तर को रथ पर बिठाकर शमी वृक्ष की ओर जाते देखा,
श्लोक 2 (4.40.2)
द्रोणभीष्मादयः शूराः कुरूणां रथिसत्तमाः । वित्रस्तमनसश्चासन्धनञ्जयकृताद्भयात् ॥
droṇabhīṣmādayaḥ śūrāḥ kurūṇāṃ rathisattamāḥ | vitrastamanasaścāsandhanañjayakṛtādbhayāt
तो द्रोण, भीष्म आदि कुरुओं के श्रेष्ठ रथी वीर धनंजय के भय से मन ही मन घबरा उठे।
श्लोक 3 (4.40.3)
तानवेक्ष्य हतोत्साहानुत्पातानपि चाद्भुतान् । गुरुः शस्त्रभृतांश्रेष्ठो भारद्वाजोऽभ्यभाषत ॥
tānavekṣya hatotsāhānutpātānapi cādbhutān | guruḥ śastrabhṛtāṃśreṣṭho bhāradvājo'bhyabhāṣata
उन्हें हतोत्साह देखकर और अद्भुत उत्पातों को भी देखकर, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ गुरु भरद्वाजपुत्र द्रोण बोले —
द्रोण उवाच
श्लोक 4 (4.40.4)
स्वराश्च वाताः संयान्ति रूक्षाः परुषनिस्वनाः । भस्मवर्षप्रकाशेन तमसा संवृतं नभः ॥
svarāśca vātāḥ saṃyānti rūkṣāḥ paruṣanisvanāḥ | bhasmavarṣaprakāśena tamasā saṃvṛtaṃ nabhaḥ
"गरजती हुई रूखी हवाएँ कठोर स्वर के साथ बह रही हैं; आकाश राख की वर्षा जैसे अंधकार से ढक गया है।
श्लोक 5 (4.40.5)
रूक्षवर्णाश्च जलदा दृश्यन्तेऽद्भुतदर्शनाः । निःसरन्ति च कोशेभ्यः शस्त्राणि विविधानि च ॥
rūkṣavarṇāśca jaladā dṛśyante'dbhutadarśanāḥ | niḥsaranti ca kośebhyaḥ śastrāṇi vividhāni ca
रूखे रंग के, देखने में विचित्र बादल दिखाई दे रहे हैं, और नाना प्रकार के शस्त्र अपने कोशों से बाहर निकल रहे हैं।
श्लोक 6 (4.40.6)
शिवाश्च विनदन्त्येता दीप्तायां दिशि दारुणाः । हयाश्चाश्रूणि मुञ्चन्ति ध्वजाः कम्पन्त्यकम्पिताः ॥
śivāśca vinadantyetā dīptāyāṃ diśi dāruṇāḥ | hayāścāśrūṇi muñcanti dhvajāḥ kampantyakampitāḥ
ये सियारिनें प्रज्वलित दिशा में भयानक रूप से चिल्ला रही हैं; घोड़े आँसू बहा रहे हैं, और बिना हिलाए ही ध्वजाएँ काँप रही हैं।
श्लोक 7 (4.40.7)
यादृशान्यत्र दृश्यन्ते रूपाणि विविधानि च । यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु युद्धं स्यात्समुपस्थितम् ॥
yādṛśānyatra dṛśyante rūpāṇi vividhāni ca | yattā bhavantastiṣṭhantu yuddhaṃ syātsamupasthitam
यहाँ जैसे-जैसे अनेक लक्षण दिखाई दे रहे हैं, उनसे लगता है कि युद्ध आ पहुँचा है; आप सब सावधान होकर डटे रहें।
श्लोक 8 (4.40.8)
रक्षध्वमपि राजानं व्यूहध्वं वाहिनीमपि । वैशसं च प्रतीक्षध्वं रक्षध्वं चापि गोधनम् ॥
rakṣadhvamapi rājānaṃ vyūhadhvaṃ vāhinīmapi | vaiśasaṃ ca pratīkṣadhvaṃ rakṣadhvaṃ cāpi godhanam
राजा की रक्षा करो, सेना का व्यूह रचो, संहार के लिए तैयार रहो, और गौओं की भी रक्षा करो।
श्लोक 9 (4.40.9)
एष वीरो महेष्वासः सर्वशस्त्रभृतांवरः । आगतः क्लीबवेषेण पार्थो नास्त्यत्र संशयः ॥
eṣa vīro maheṣvāsaḥ sarvaśastrabhṛtāṃvaraḥ | āgataḥ klībaveṣeṇa pārtho nāstyatra saṃśayaḥ
यह वीर, महाधनुर्धर, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, नपुंसक का वेश धरकर आया है — यह पार्थ ही है, इसमें कोई संदेह नहीं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (4.40.10)
एतावदुक्त्वा वचनं भीष्ममालोक्य चाब्रवीत् ॥
etāvaduktvā vacanaṃ bhīṣmamālokya cābravīt
इतना कहकर उन्होंने भीष्म की ओर देखा और कहा —
श्लोक 11 (4.40.11)
नदीज लङ्केशवनारिकेतुर्नगाह्वयो नाम नगारिसूनुः । गत्या सुरेशः क्वचिदङ्गनेव गुरुर्बभाषे वचनं तदानीम् ॥
nadīja laṅkeśavanāriketurnagāhvayo nāma nagārisūnuḥ | gatyā sureśaḥ kvacidaṅganeva gururbabhāṣe vacanaṃ tadānīm
"हे गंगापुत्र! जिसकी ध्वजा पर लंकापति की वाटिका का विध्वंसक विराजता है, जो वृक्ष के नाम वाला है और पर्वतों के शत्रु का पुत्र है, जो चाल में कभी देवराज जैसा और कभी स्त्री जैसा है" — गुरु ने उस समय ऐसा वचन कहा।
श्लोक 12 (4.40.12)
इत्युक्त्वा संज्ञया द्रोणस्तूष्णीमासीद्विशांपते । भारद्वाजवचः श्रुत्वा गाङ्गेयः संज्ञयाऽब्रवीत् ॥
ityuktvā saṃjñayā droṇastūṣṇīmāsīdviśāṃpate | bhāradvājavacaḥ śrutvā gāṅgeyaḥ saṃjñayā'bravīt
हे प्रजानाथ, संकेत से यह कहकर द्रोण चुप हो गए। भरद्वाजपुत्र के वचन सुनकर गंगापुत्र भीष्म ने भी संकेत से कहा —
भीष्म उवाच
श्लोक 13 (4.40.13)
अतीतं चक्रमस्माकं विषयान्तरमागताः । अतीतः समयश्चोक्त अस्माभिर्यः सभातले । न भयं शत्रुतः कार्यं शङ्कां त्यज नरर्षभ ॥
atītaṃ cakramasmākaṃ viṣayāntaramāgatāḥ | atītaḥ samayaścokta asmābhiryaḥ sabhātale | na bhayaṃ śatrutaḥ kāryaṃ śaṅkāṃ tyaja nararṣabha
"हमारा समय-चक्र बीत चुका है; वे दूसरे के राज्य में आ गए हैं। सभा-भवन में हमने जो शर्त कही थी, उसकी अवधि पूरी हो गई है। शत्रु से कोई भय नहीं करना चाहिए; हे नरश्रेष्ठ, शंका छोड़ दो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (4.40.14)
देवव्रतेनैवमुक्ते वचने हितकारिणा । दुर्योधनमथालोक्य संज्ञया द्रोण अब्रवीत् ॥
devavratenaivamukte vacane hitakāriṇā | duryodhanamathālokya saṃjñayā droṇa abravīt
हितैषी देवव्रत के ऐसा कहने पर द्रोण ने दुर्योधन की ओर देखा और संकेत से कहा —
द्रोण उवाच
श्लोक 15 (4.40.15)
एष वीरो महेष्वासः सर्वशस्त्रभृतांवरः । आगतः क्लीबरूपेण पार्थो नास्त्यत्र संशयः ॥
eṣa vīro maheṣvāsaḥ sarvaśastrabhṛtāṃvaraḥ | āgataḥ klībarūpeṇa pārtho nāstyatra saṃśayaḥ
"यह वीर, महाधनुर्धर, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, नपुंसक के रूप में आया है — यह पार्थ ही है, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 16 (4.40.16)
एष पार्थो हि विक्रान्तः सव्यसाची परन्तपः । ये जेतारो महीपानाममुना कुरवो हताः ॥
eṣa pārtho hi vikrāntaḥ savyasācī parantapaḥ | ye jetāro mahīpānāmamunā kuravo hatāḥ
यही वह पराक्रमी, शत्रुओं को तपाने वाला सव्यसाची पार्थ है, जिसने राजाओं को जीतने वाले कुरुओं को भी परास्त किया था।
श्लोक 17 (4.40.17)
यस्मिञ्जाते मही कृत्स्ना निर्भरोच्छ्वासिताऽभवत् । येन मे दक्षिणा दत्ता बद्ध्वा द्रुपदमोजसा ॥
yasmiñjāte mahī kṛtsnā nirbharocchvāsitā'bhavat | yena me dakṣiṇā dattā baddhvā drupadamojasā
जिसके जन्म लेते ही सारी पृथ्वी मानो भार से मुक्त होकर उच्छ्वसित हो उठी; जिसने अपने बल से द्रुपद को बाँधकर मुझे गुरुदक्षिणा दी;
श्लोक 18 (4.40.18)
विद्ध्वा वियद्गतं लक्ष्यं विनिर्जित्य च पार्थिवान् । निर्जिता येन पाञ्चाली पुरा येन स्वयंवरे ॥
viddhvā viyadgataṃ lakṣyaṃ vinirjitya ca pārthivān | nirjitā yena pāñcālī purā yena svayaṃvare
जिसने आकाश में स्थित लक्ष्य को बेधकर और राजाओं को परास्त करके पहले स्वयंवर में पांचाली को जीता था;
श्लोक 19 (4.40.19)
खाण्डवे येन संतृप्तो वह्निर्जित्वा सुरासुरान् । परिणीता सुभद्रा च येन निर्जित्य यादवान् ॥
khāṇḍave yena saṃtṛpto vahnirjitvā surāsurān | pariṇītā subhadrā ca yena nirjitya yādavān
जिसने देवताओं और असुरों को जीतकर खाण्डव वन में अग्नि को तृप्त किया; जिसने यादवों को परास्त करके सुभद्रा से विवाह किया;
श्लोक 20 (4.40.20)
निर्जितो येन युद्धेन त्रिपुरारिः स्मरार्दनः ॥
nirjito yena yuddhena tripurāriḥ smarārdanaḥ
जिसने युद्ध में त्रिपुर के शत्रु, कामदेव का दमन करने वाले शिव को भी परास्त किया;
श्लोक 21 (4.40.21)
गत्वा त्रिविष्टपं येन जितेन्द्रा दानवा युधि । निवातकवचा राजन्दानवानां त्रिकोटयः । निर्जिताः कालकेयाश्च हिरण्यपुरवासिनः ॥
gatvā triviṣṭapaṃ yena jitendrā dānavā yudhi | nivātakavacā rājandānavānāṃ trikoṭayaḥ | nirjitāḥ kālakeyāśca hiraṇyapuravāsinaḥ
जिसने स्वर्ग जाकर युद्ध में इन्द्र को जीतने वाले दानवों को जीता — हे राजन्, निवातकवच नामक तीन करोड़ दानवों को, और हिरण्यपुर में रहने वाले कालकेयों को;
श्लोक 22 (4.40.22)
येन त्वं मोचितो बद्धश्चित्रसेनेन तद्वने ॥
yena tvaṃ mocito baddhaścitrasenena tadvane
जिसने उस वन में चित्रसेन द्वारा बाँधे गए तुम्हें छुड़ाया था;
श्लोक 23 (4.40.23)
येन गत्वोत्तरं मेरोरानिनाय महद्धनम् । याजितो धर्मसूनुश्च नृपान्सर्वान्विजित्य च ॥
yena gatvottaraṃ merorānināya mahaddhanam | yājito dharmasūnuśca nṛpānsarvānvijitya ca
जिसने मेरु के उत्तर में जाकर विपुल धन लाया, और सब राजाओं को जीतकर धर्मपुत्र से यज्ञ करवाया;
श्लोक 24 (4.40.24)
यस्मिञ्शौर्यं च वीर्यं च तेजो धैर्यं पराक्रमः । औदार्यं चैव गाम्भीर्यं श्रीर्ह्रीर्धर्मो दयाऽऽर्जवम् । एवमादिगुणोपेतः सोयं पार्थो न संशयः ॥
yasmiñśauryaṃ ca vīryaṃ ca tejo dhairyaṃ parākramaḥ | audāryaṃ caiva gāmbhīryaṃ śrīrhrīrdharmo dayā''rjavam | evamādiguṇopetaḥ soyaṃ pārtho na saṃśayaḥ
जिसमें शौर्य और वीर्य, तेज, धैर्य और पराक्रम, उदारता और गम्भीरता, श्री, लज्जा, धर्म, दया और सरलता है — ऐसे गुणों से युक्त यही वह पार्थ है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 25 (4.40.25)
नाजित्वा विनिवर्तेत सर्वानपि मरुद्गणान् ॥
nājitvā vinivarteta sarvānapi marudgaṇān
वह बिना जीते लौटेगा नहीं, चाहे सामने मरुद्गणों के सारे समूह ही क्यों न हों।
श्लोक 26 (4.40.26)
क्लेशितश्च वने शूरो वासवेन च शिक्षितः । अमर्षवशमापन्नो योत्स्यते नात्र संशयः । न ह्यस्य प्रतियोद्धारमन्यं पश्यामि कौरव ॥
kleśitaśca vane śūro vāsavena ca śikṣitaḥ | amarṣavaśamāpanno yotsyate nātra saṃśayaḥ | na hyasya pratiyoddhāramanyaṃ paśyāmi kaurava
यह वीर वन में क्लेश भोग चुका है और वासव (इन्द्र) से शिक्षा पा चुका है; क्रोध के वशीभूत होकर यह अवश्य युद्ध करेगा, इसमें संदेह नहीं। हे कौरव, इसका सामना करने वाला मैं किसी दूसरे को नहीं देखता।
श्लोक 27 (4.40.27)
महादेवोपि पार्थेन श्रूयते युद्धतोषितः । किरातवेषप्रच्छन्नो गिरौ हिमवति प्रभुः ॥
mahādevopi pārthena śrūyate yuddhatoṣitaḥ | kirātaveṣapracchanno girau himavati prabhuḥ
सुना जाता है कि स्वयं प्रभु महादेव भी, हिमालय पर्वत पर किरात के वेश में छिपकर, युद्ध में पार्थ से संतुष्ट हुए थे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 28 (4.40.28)
इत्येवंवादिनं द्रोणं कर्णः क्रुद्धोऽभ्यभाषत ॥
ityevaṃvādinaṃ droṇaṃ karṇaḥ kruddho'bhyabhāṣata
द्रोण के ऐसा कहने पर कर्ण क्रोधित होकर बोला —
कर्ण उवाच
श्लोक 29 (4.40.29)
सदा भवान्फल्गुनस्य गुणानस्मासु कत्थसे । न चार्जुनः कलापूर्णो मम दुर्योधनस्य वा ॥
sadā bhavānphalgunasya guṇānasmāsu katthase | na cārjunaḥ kalāpūrṇo mama duryodhanasya vā
"आप सदा हमारे सामने फाल्गुन के गुणों की बड़ाई करते रहते हैं, पर अर्जुन तो मेरी या दुर्योधन की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं है।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 30 (4.40.30)
यद्येष पार्थो राधेय कृतं कार्यं भवेन्मम । ज्ञाताः पुनश्चरिष्यन्ति द्वादशान्यांश्च वत्सरान् ॥
yadyeṣa pārtho rādheya kṛtaṃ kāryaṃ bhavenmama | jñātāḥ punaścariṣyanti dvādaśānyāṃśca vatsarān
"हे राधेय, यदि यह पार्थ है, तो मेरा काम बन गया; पहचाने जाने पर वे फिर बारह वर्ष तक वन में भटकेंगे।
श्लोक 31 (4.40.31)
अथवा कश्चिदेवान्यः क्लीबरूपेण देवराट् । शरैरेनं सुनिशितैः पातयिष्यामि भूतले ॥
athavā kaścidevānyaḥ klībarūpeṇa devarāṭ | śarairenaṃ suniśitaiḥ pātayiṣyāmi bhūtale
और यदि नपुंसक के रूप में कोई दूसरा है — चाहे स्वयं देवराज ही हो — तो मैं उसे अपने तीखे बाणों से धरती पर गिरा दूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 32 (4.40.32)
तस्मिन्वदति तां वाचं धार्तराष्ट्रे परन्तपे । भीष्मो द्रोणः कृपो द्रौणिः पौरुषं तदपूजयन् ॥
tasminvadati tāṃ vācaṃ dhārtarāṣṭre parantape | bhīṣmo droṇaḥ kṛpo drauṇiḥ pauruṣaṃ tadapūjayan
शत्रुओं को तपाने वाले धृतराष्ट्रपुत्र के ऐसा कहने पर भीष्म, द्रोण, कृप और द्रोणपुत्र ने उसके पौरुष की प्रशंसा की।
श्लोक 33 (4.40.33)
तां शमीमभिसंगम्य पार्थो वैराटिमब्रवीत् । सुखसंवर्धितं पित्रा समराणामकोविदम् ॥
tāṃ śamīmabhisaṃgamya pārtho vairāṭimabravīt | sukhasaṃvardhitaṃ pitrā samarāṇāmakovidam
उस शमी वृक्ष के पास पहुँचकर पार्थ ने विराटपुत्र से कहा, जिसे पिता ने सुख-सुविधा में पाला था और जो युद्धों से अनभिज्ञ था —
अर्जुन उवाच
श्लोक 34 (4.40.34)
एहि भूमिंजयारुह्य वैराटे महतीं शमीम् । समादिष्टो मया क्षिप्रं धनुर्गाण्डीवमानय ॥
ehi bhūmiṃjayāruhya vairāṭe mahatīṃ śamīm | samādiṣṭo mayā kṣipraṃ dhanurgāṇḍīvamānaya
"आओ भूमिंजय, हे विराटपुत्र, इस विशाल शमी वृक्ष पर चढ़ो, और मेरी आज्ञा से शीघ्र गाण्डीव धनुष ले आओ।
श्लोक 35 (4.40.35)
नेमानीष्वासनानीह सोढुं शक्ष्यन्ति मे बलम् । नालं भारं गुरुं भेत्तुं कुञ्जरं वा प्रमर्दितुम् ॥
nemānīṣvāsanānīha soḍhuṃ śakṣyanti me balam | nālaṃ bhāraṃ guruṃ bhettuṃ kuñjaraṃ vā pramarditum
तुम्हारे ये धनुष मेरे बल को नहीं सह सकेंगे; ये न भारी बोझ को तोड़ने में समर्थ हैं, न हाथी को कुचलने में,
श्लोक 36 (4.40.36)
मम वा बाहुविक्षेपं शत्रूनिह विजेष्यतः । नेच्छामि तैरहं कर्तुं कर्म वैजयिकं त्विह ॥
mama vā bāhuvikṣepaṃ śatrūniha vijeṣyataḥ | necchāmi tairahaṃ kartuṃ karma vaijayikaṃ tviha
और न ही यहाँ शत्रुओं को जीतते समय मेरी भुजाओं के प्रहार को सह सकते हैं। मैं इनसे यहाँ विजय का कार्य नहीं करना चाहता।
श्लोक 37 (4.40.37)
अतिसूक्ष्माणि ह्रस्वानि सर्वाणि च मृदूनि च । आयुधानि महाबाहो तवैतानि महाबल ॥
atisūkṣmāṇi hrasvāni sarvāṇi ca mṛdūni ca | āyudhāni mahābāho tavaitāni mahābala
हे महाबाहु, हे महाबली, तुम्हारे ये सब आयुध बहुत पतले, छोटे और कोमल हैं।
श्लोक 38 (4.40.38)
तस्माद्भूमिंजयारुह्य शमीमेतां पलाशिनीम् । अस्यां हि पाण्डुपुत्राणां धनूंषि निहितान्युत ॥
tasmādbhūmiṃjayāruhya śamīmetāṃ palāśinīm | asyāṃ hi pāṇḍuputrāṇāṃ dhanūṃṣi nihitānyuta
इसलिए, हे भूमिंजय, इस पत्तों से भरे शमी वृक्ष पर चढ़ो; इसी पर पाण्डुपुत्रों के धनुष रखे हुए हैं,
श्लोक 39 (4.40.39)
युधिष्ठिरस्य भीमस्य बीभत्सोर्यमयोस्तथा । ध्वजाः शराश्च शूराणां दिव्यानि कवचानि च ॥
yudhiṣṭhirasya bhīmasya bībhatsoryamayostathā | dhvajāḥ śarāśca śūrāṇāṃ divyāni kavacāni ca
और उन वीरों — युधिष्ठिर, भीम, बीभत्सु और दोनों यमजों — के ध्वज, बाण और दिव्य कवच भी।
श्लोक 40 (4.40.40)
अत्रैव तु महावीर्यं धनुः पार्थस्य गाण्डिवम् । एकं शतसहस्रेण संमितं राष्ट्रवर्धनम् ॥
atraiva tu mahāvīryaṃ dhanuḥ pārthasya gāṇḍivam | ekaṃ śatasahasreṇa saṃmitaṃ rāṣṭravardhanam
यहीं पार्थ का महाशक्तिशाली गाण्डीव धनुष भी है, जो अकेला ही एक लाख धनुषों के बराबर है और राज्य की वृद्धि करने वाला है,
श्लोक 41 (4.40.41)
व्यायामसहमत्यर्थं तृणराजसमं महत् । सर्वायुधमहामात्रं सर्वारिक्षयकारकम् ॥
vyāyāmasahamatyarthaṃ tṛṇarājasamaṃ mahat | sarvāyudhamahāmātraṃ sarvārikṣayakārakam
जो अत्यधिक खिंचाव सह सकता है, ताड़ के वृक्ष जैसा विशाल है, सब आयुधों में सबसे बड़ा और सब शत्रुओं का नाश करने वाला है,
श्लोक 42 (4.40.42)
सुवर्णविकृतं दिव्यं श्लक्ष्णमायतमव्रणम् । अलं भारं गुरुं सोढुं वारुणं च सुदर्शनम् ॥
suvarṇavikṛtaṃ divyaṃ ślakṣṇamāyatamavraṇam | alaṃ bhāraṃ guruṃ soḍhuṃ vāruṇaṃ ca sudarśanam
जो सोने से अलंकृत, दिव्य, चिकना, लम्बा और दोषरहित है, भारी भार सह सकता है, वरुण का है और देखने में सुन्दर है।
श्लोक 43 (4.40.43)
तादृशान्येव सर्वाणि बलवन्ति दृढानि च । युधिष्ठिरस्य भीमस्य बीभत्सोर्यमयोस्तथा । प्रथितानि विशिष्टानि दुर्दर्शानि भवन्त्युत ॥
tādṛśānyeva sarvāṇi balavanti dṛḍhāni ca | yudhiṣṭhirasya bhīmasya bībhatsoryamayostathā | prathitāni viśiṣṭāni durdarśāni bhavantyuta
युधिष्ठिर, भीम, बीभत्सु और दोनों यमजों के बाकी सभी धनुष भी वैसे ही बलवान और दृढ़ हैं — प्रसिद्ध, श्रेष्ठ और देखने में दुःसह।"
उत्तर उवाच
श्लोक 44 (4.40.44)
शरीरमिह चासक्तं शम्यां शुष्कं पुरा किल । तदहं राजपुत्रः सन्स्पृशेयं पाणिना कथम् ॥
śarīramiha cāsaktaṃ śamyāṃ śuṣkaṃ purā kila | tadahaṃ rājaputraḥ sanspṛśeyaṃ pāṇinā katham
"कहते हैं कि यहाँ शमी पर एक शव बँधा है, जो बहुत पहले सूख चुका है। मैं राजकुमार होकर उसे हाथ से कैसे छू सकता हूँ?
श्लोक 45 (4.40.45)
न मामेवंविधं कर्म कारयस्व बृहन्नले । कथं वा शक्यते कर्तुं बुद्ध्या त्वं मन्यसे कथं ॥
na māmevaṃvidhaṃ karma kārayasva bṛhannale | kathaṃ vā śakyate kartuṃ buddhyā tvaṃ manyase kathaṃ
हे बृहन्नला, मुझसे ऐसा काम मत करवाओ। यह कैसे किया जा सकता है? तुम अपनी बुद्धि से इसे ठीक कैसे मानती हो?
श्लोक 46 (4.40.46)
नैवंविधं मया युक्तमालब्धुं क्षत्रयोनिना । महता राजपुत्रेण मन्त्रयज्ञविदा सता ॥
naivaṃvidhaṃ mayā yuktamālabdhuṃ kṣatrayoninā | mahatā rājaputreṇa mantrayajñavidā satā
क्षत्रिय कुल में जन्मे, मन्त्रों और यज्ञों के ज्ञाता, मुझ जैसे महान राजकुमार के लिए ऐसी वस्तु को छूना उचित नहीं।
श्लोक 47 (4.40.47)
स्पृष्टवन्तं शरीरं मां शववाहमिवाशुचिम् । कथं वा व्यवहार्यं वै कुर्वीथास्त्वं बृहन्नले ॥
spṛṣṭavantaṃ śarīraṃ māṃ śavavāhamivāśucim | kathaṃ vā vyavahāryaṃ vai kurvīthāstvaṃ bṛhannale
हे बृहन्नला, शव को छूकर जब मैं शव ढोने वाले के समान अपवित्र हो जाऊँगा, तब तुम मुझसे व्यवहार कैसे करोगी?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 48 (4.40.48)
तमुवाच ततः शूरः पार्थः परपुरंजयः । दायादं सर्वमत्स्यानां कुले जातं विशारदम् ॥
tamuvāca tataḥ śūraḥ pārthaḥ parapuraṃjayaḥ | dāyādaṃ sarvamatsyānāṃ kule jātaṃ viśāradam
तब शत्रुओं के नगरों को जीतने वाले वीर पार्थ ने समस्त मत्स्यों के उत्तराधिकारी, उत्तम कुल में जन्मे, उस कुशल राजकुमार से कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 49 (4.40.49)
जानामि त्वां महाप्राज्ञ शुभं जात्या कुलेन च । कथं नु पापकं कर्म ब्रूयां त्वाऽहं परन्तप ॥
jānāmi tvāṃ mahāprājña śubhaṃ jātyā kulena ca | kathaṃ nu pāpakaṃ karma brūyāṃ tvā'haṃ parantapa
"हे महाप्राज्ञ, मैं जानता हूँ कि तुम जन्म और कुल दोनों से श्रेष्ठ हो। हे परंतप, मैं तुमसे कोई पापकर्म करने को कैसे कह सकता हूँ?
श्लोक 50 (4.40.50)
व्यवहार्यश्च राजेन्द्र शुद्धश्चैव भविष्यसि । धनूंष्येतानि मा भैस्त्वं शरीरं नात्र विद्यते ॥
vyavahāryaśca rājendra śuddhaścaiva bhaviṣyasi | dhanūṃṣyetāni mā bhaistvaṃ śarīraṃ nātra vidyate
हे राजेन्द्र, तुम व्यवहार के योग्य भी रहोगे और शुद्ध भी। ये धनुष हैं, डरो मत; यहाँ कोई शव नहीं है।
श्लोक 51 (4.40.51)
दायादं मत्स्यराजस्य कुले जातं मनस्विनम् । कथं वा निन्दितं कर्म कारये त्वां नृपात्मज ॥
dāyādaṃ matsyarājasya kule jātaṃ manasvinam | kathaṃ vā ninditaṃ karma kāraye tvāṃ nṛpātmaja
तुम मत्स्यराज के उत्तराधिकारी हो, उनके कुल में जन्मे हो और मनस्वी हो; हे राजकुमार, मैं तुमसे कोई निन्दित कर्म कैसे करवा सकता हूँ?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 52 (4.40.52)
एवमुक्तः स पार्थेन रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली । आरुरोह शमीवृक्षं वैराटिरवशस्तदा ॥
evamuktaḥ sa pārthena rathātpraskandya kuṇḍalī | āruroha śamīvṛkṣaṃ vairāṭiravaśastadā
पार्थ के ऐसा कहने पर कुण्डलधारी विराटपुत्र रथ से कूद पड़ा और विवश होकर शमी वृक्ष पर चढ़ गया।
श्लोक 53 (4.40.53)
तमन्वशासच्छत्रुघ्नो रथे तिष्ठन्धनञ्जयः । अवरोपय वृक्षाग्राद्धनूंष्येतानि माचिरम् ॥
tamanvaśāsacchatrughno rathe tiṣṭhandhanañjayaḥ | avaropaya vṛkṣāgrāddhanūṃṣyetāni māciram
रथ पर खड़े शत्रुनाशक धनंजय ने उसे निर्देश दिया — "इन धनुषों को वृक्ष की चोटी से शीघ्र नीचे उतारो।"
श्लोक 54 (4.40.54)
सोपहृत्य महार्हाणि धनूंषि पृथुवक्षसाम् । परिवेष्टनपत्राणि विमुच्य समुपानयत् ॥
sopahṛtya mahārhāṇi dhanūṃṣi pṛthuvakṣasām | pariveṣṭanapatrāṇi vimucya samupānayat
उसने चौड़ी छाती वाले वीरों के उन बहुमूल्य धनुषों को उतारा और उन पर लिपटे पत्तों को खोलकर उन्हें अर्जुन के पास ले आया।
श्लोक 55 (4.40.55)
परिवेष्टनमेतेषां सर्वं मुञ्चस्व माचिरम् । तेषां संनहनीयानि परिमुच्य परन्तपः । अपश्यत्तत्र गाण्डीवं चतुर्भिरपरैः सह ॥
pariveṣṭanameteṣāṃ sarvaṃ muñcasva māciram | teṣāṃ saṃnahanīyāni parimucya parantapaḥ | apaśyattatra gāṇḍīvaṃ caturbhiraparaiḥ saha
"इन सबके आवरण शीघ्र खोल दो।" उनके बन्धन खोलकर उस परंतप ने वहाँ चार अन्य धनुषों के साथ गाण्डीव को देखा।
श्लोक 56 (4.40.56)
तेषां विमुच्यमानानां धनुषामर्कवर्चसाम् । विनिश्चेरुः प्रभा दिव्या ग्रहाणामुदयेष्विव ॥
teṣāṃ vimucyamānānāṃ dhanuṣāmarkavarcasām | viniśceruḥ prabhā divyā grahāṇāmudayeṣviva
सूर्य के समान तेजस्वी उन धनुषों के खोले जाते ही उनमें से दिव्य प्रभा फूट निकली, जैसे उदय होते ग्रहों की।
श्लोक 57 (4.40.57)
स तेषां रूपमालोक्य भोगिनामिव जृम्भताम् । हृष्टरोमा भयोद्विग्नः प्रवेपिततनुस्तदा ॥
sa teṣāṃ rūpamālokya bhogināmiva jṛmbhatām | hṛṣṭaromā bhayodvignaḥ pravepitatanustadā
जम्हाई लेते सर्पों जैसे उनके रूप को देखकर वह भय से व्याकुल हो गया; उसके रोंगटे खड़े हो गए और सारा शरीर काँपने लगा।
श्लोक 58 (4.40.58)
अर्जुनेन समाश्वस्तः किंचिद्धृष्टो नृपात्मजः । तेषां संदर्शनाभ्यासं स्पर्शाभ्यासं पुनः पुनः ॥
arjunena samāśvastaḥ kiṃciddhṛṣṭo nṛpātmajaḥ | teṣāṃ saṃdarśanābhyāsaṃ sparśābhyāsaṃ punaḥ punaḥ
अर्जुन के आश्वासन से राजकुमार कुछ प्रसन्न हुआ। वह बार-बार उन्हें देखने और छूने का अभ्यास करने लगा;
श्लोक 59 (4.40.59)
आमील्य पुनरुन्मील्य स्पृष्ट्वास्पृष्ट्वा चकार सः । सम्यग्दृष्ट्वा तदाऽऽश्वस्तः क्षणेन समपद्यत ॥
āmīlya punarunmīlya spṛṣṭvāspṛṣṭvā cakāra saḥ | samyagdṛṣṭvā tadā''śvastaḥ kṣaṇena samapadyata
आँखें मूँदकर, फिर खोलकर, बार-बार छू-छूकर उसने ऐसा किया; और भली-भाँति देख लेने पर वह क्षण भर में आश्वस्त हो गया।
श्लोक 60 (4.40.60)
संस्पृश्य तानि चापानि भानुमन्ति बृहन्ति च । वैराटिरर्जुनं राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥
saṃspṛśya tāni cāpāni bhānumanti bṛhanti ca | vairāṭirarjunaṃ rājannidaṃ vacanamabravīt
हे राजन्, उन चमकीले और विशाल धनुषों को छूकर विराटपुत्र ने अर्जुन से यह वचन कहा —