विराट पर्व · अध्याय 41
आयुधों को देखकर उत्तर का विस्मय
शमी वृक्ष से उतारे गए पाण्डवों के आयुधों को देखकर उत्तर अपने सारथि बृहन्नला से पूछता है कि ये किसके हैं। वह एक-एक करके पाँच भव्य धनुषों का वर्णन करता है — उन पर बने सोने के कमल, बिन्दु, बैल, वानर, हंस, मछलियाँ, गोह और मोर — फिर तरकश और अनेक प्रकार के बाणों का, और अंत में गोचर्म, चीते, बाघ, सिंह और मृग की खाल के कोशों में रखी तलवारों का। विस्मय से भरकर वह बृहन्नला से ठीक-ठीक बताने का आग्रह करता है कि ये सब किसके हैं।
उत्तर उवाच
श्लोक 1 (4.41.1)
सारथे किमिदं दिव्यं नागो वा यदि वा धनुः । सौवर्णान्यत्र पद्मानि शतपत्राणि भागशः । कुशाग्निप्रतितप्तानि भानुमन्ति बृहन्ति च ॥
sārathe kimidaṃ divyaṃ nāgo vā yadi vā dhanuḥ | sauvarṇānyatra padmāni śatapatrāṇi bhāgaśaḥ | kuśāgnipratitaptāni bhānumanti bṛhanti ca
"हे सारथि, यह दिव्य वस्तु क्या है — कोई नाग है या धनुष? इस पर अलग-अलग स्थानों पर सौ पंखुड़ियों वाले सोने के कमल बने हैं, जो कुश की अग्नि में तपाए गए हैं, चमकीले और बड़े हैं।
श्लोक 2 (4.41.2)
बिन्दवश्चात्र सौवर्णा मणिप्रोताः समन्ततः । शशिसूर्यप्रभाः पृष्ठे भान्ति रुक्मपरिष्कृताः ॥
bindavaścātra sauvarṇā maṇiprotāḥ samantataḥ | śaśisūryaprabhāḥ pṛṣṭhe bhānti rukmapariṣkṛtāḥ
और इस पर चारों ओर मणियों से जड़े सोने के बिन्दु हैं, जो इसकी पीठ पर चन्द्रमा और सूर्य की प्रभा से चमकते हैं और स्वर्ण से सजे हैं।
श्लोक 3 (4.41.3)
पुष्पाण्यत्र सुवर्णानि शतपत्राणि भागशः । विस्मापनीयरूपं च भीमं भीमप्रदर्शनम् ॥
puṣpāṇyatra suvarṇāni śatapatrāṇi bhāgaśaḥ | vismāpanīyarūpaṃ ca bhīmaṃ bhīmapradarśanam
इस पर अलग-अलग स्थानों पर सौ पंखुड़ियों वाले सोने के फूल हैं; इसका रूप विस्मयकारी, भयंकर और देखने में डरावना है।
श्लोक 4 (4.41.4)
नीलोत्पलनिभं कस्य शातकुम्भपरिष्कृतम् । ऋषभा यस्य सौवर्णाः पृष्ठे तिष्ठन्ति शृङ्गिणः ॥
nīlotpalanibhaṃ kasya śātakumbhapariṣkṛtam | ṛṣabhā yasya sauvarṇāḥ pṛṣṭhe tiṣṭhanti śṛṅgiṇaḥ
नीले कमल के समान और सोने से सजा यह धनुष किसका है, जिसकी पीठ पर सींगों वाले सोने के बैल खड़े हैं?
श्लोक 5 (4.41.5)
तालप्रमाणं कस्येदं मणिरुक्मविभूषितम् । हाटकस्य सुवर्णस्य यस्मिञ्शाखामृगा दश ॥
tālapramāṇaṃ kasyedaṃ maṇirukmavibhūṣitam | hāṭakasya suvarṇasya yasmiñśākhāmṛgā daśa
ताड़ के वृक्ष जितना ऊँचा, मणियों और स्वर्ण से विभूषित यह धनुष किसका है, जिस पर शुद्ध सोने के दस वानर बने हैं?
श्लोक 6 (4.41.6)
दुरानमं महादीर्घं सुरूपं दुष्प्रधर्षणम् । कस्येदमीदृशं चित्रं धनुः सर्वे च दंशिताः ॥
durānamaṃ mahādīrghaṃ surūpaṃ duṣpradharṣaṇam | kasyedamīdṛśaṃ citraṃ dhanuḥ sarve ca daṃśitāḥ
जिसे झुकाना कठिन है, जो बहुत लम्बा, सुन्दर और दुर्जेय है, और जिस पर सारी आकृतियाँ दृढ़ता से जड़ी हैं — यह ऐसा विचित्र धनुष किसका है?
श्लोक 7 (4.41.7)
चन्द्रार्कविमलाभासः सुरूपाः सुप्रदर्शनाः । हंसाः पृष्ठं श्रिता यस्य कुशाग्निप्रतिमार्चिषः । शार्ङ्गगाण्डीवसदृशं कस्येदं सारथे धनुः ॥
candrārkavimalābhāsaḥ surūpāḥ supradarśanāḥ | haṃsāḥ pṛṣṭhaṃ śritā yasya kuśāgnipratimārciṣaḥ | śārṅgagāṇḍīvasadṛśaṃ kasyedaṃ sārathe dhanuḥ
हे सारथि, शार्ङ्ग और गाण्डीव के समान यह धनुष किसका है, जिसकी पीठ पर चन्द्रमा और सूर्य जैसी निर्मल आभा वाले, सुन्दर, दर्शनीय और कुश की अग्नि जैसी दीप्ति वाले हंस बैठे हैं?
श्लोक 8 (4.41.8)
चतुर्थं काञ्चनवपुर्भाति विद्युद्गणोपमम् । नीलोपलिप्तमच्छिद्रं जातरूपमयं धनुः । मत्स्याश्चास्य हिरण्यस्य पृष्ठे तिष्ठन्ति दंशिताः ॥
caturthaṃ kāñcanavapurbhāti vidyudgaṇopamam | nīlopaliptamacchidraṃ jātarūpamayaṃ dhanuḥ | matsyāścāsya hiraṇyasya pṛṣṭhe tiṣṭhanti daṃśitāḥ
चौथा धनुष, जिसका शरीर स्वर्णमय है, बिजलियों के समूह जैसा चमक रहा है; यह स्वर्णमय धनुष नीली आभा से युक्त और निर्दोष है, और इसकी पीठ पर सोने की मछलियाँ जड़ी हुई हैं।
श्लोक 9 (4.41.9)
शक्रचापोपमं दिव्यं कस्येदं सारथे धनुः । उच्छ्रितं फणिवद्दिव्यं सारवत्त्वाद्दुरानमम् ॥
śakracāpopamaṃ divyaṃ kasyedaṃ sārathe dhanuḥ | ucchritaṃ phaṇivaddivyaṃ sāravattvāddurānamam
हे सारथि, इन्द्रधनुष के समान यह दिव्य धनुष किसका है, जो फन उठाए सर्प की तरह ऊँचा है और अपनी दृढ़ता के कारण झुकाया नहीं जा सकता?
श्लोक 10 (4.41.10)
सहस्रगोधाः सौवर्णा द्वीपिनश्च चतुर्दश । बर्हिणश्चात्र सौवर्णाः शतचन्द्रार्कभूषिताः । जाम्बूनदविचित्राङ्गं कस्येदं पञ्चमं धनुः ॥
sahasragodhāḥ sauvarṇā dvīpinaśca caturdaśa | barhiṇaścātra sauvarṇāḥ śatacandrārkabhūṣitāḥ | jāmbūnadavicitrāṅgaṃ kasyedaṃ pañcamaṃ dhanuḥ
एक हजार सोने की गोह, चौदह चीते, और सौ चन्द्रमाओं और सूर्यों से सजे सोने के मोर — जाम्बूनद स्वर्ण से चित्रित अंगों वाला यह पाँचवाँ धनुष किसका है?
श्लोक 11 (4.41.11)
कस्येमे क्षुरनाराचाः सहस्रं लोमवापिनः । प्रक्षिप्तास्तीक्ष्णतुण्डाग्रा उपासङ्गे हिरण्मये ॥
kasyeme kṣuranārācāḥ sahasraṃ lomavāpinaḥ | prakṣiptāstīkṣṇatuṇḍāgrā upāsaṅge hiraṇmaye
सोने के तरकश में भरे हुए, पंखों वाले, तीखी चोंच जैसी नोक वाले ये एक हजार क्षुर-नाराच बाण किसके हैं?
श्लोक 12 (4.41.12)
हारिद्रवर्णाः कस्येमे शिताः पञ्चशतं शराः । आशीविषसमस्पर्शाः शिताश्चाजिह्मगा दृढाः ॥
hāridravarṇāḥ kasyeme śitāḥ pañcaśataṃ śarāḥ | āśīviṣasamasparśāḥ śitāścājihmagā dṛḍhāḥ
हल्दी के रंग के ये पाँच सौ पैने बाण किसके हैं, जिनका स्पर्श विषधर सर्पों जैसा है, जो तीखे, सीधे जाने वाले और दृढ़ हैं?
श्लोक 13 (4.41.13)
विपाठाः पृथवः कस्य गृध्रपत्रार्धवाजिताः । वराहकर्णास्तीक्ष्णाग्राः कस्येमे रुचिराः शराः ॥
vipāṭhāḥ pṛthavaḥ kasya gṛdhrapatrārdhavājitāḥ | varāhakarṇāstīkṣṇāgrāḥ kasyeme rucirāḥ śarāḥ
गिद्ध के पंखों से आधे सजे ये चौड़े विपाठ बाण किसके हैं? सूअर के कान जैसे फलक वाले, तीखी नोक के ये सुन्दर बाण किसके हैं?
श्लोक 14 (4.41.14)
वज्राशनिसमस्पर्शा वैश्वानरशिखार्चिषः । सुवर्णपुङ्खास्तीक्ष्णाग्राः कस्य सप्तशतं शराः ॥
vajrāśanisamasparśā vaiśvānaraśikhārciṣaḥ | suvarṇapuṅkhāstīkṣṇāgrāḥ kasya saptaśataṃ śarāḥ
वज्र और बिजली जैसे आघात वाले, अग्नि की शिखा जैसी दीप्ति वाले, सोने के पुंखों और तीखी नोक वाले ये सात सौ बाण किसके हैं?
श्लोक 15 (4.41.15)
कस्यायं सायको दीर्घो गव्ये कोशे च दंशितः । कस्य दण्डो दृढः श्लक्ष्णो रुचिरोऽयं प्रकाशते ॥
kasyāyaṃ sāyako dīrgho gavye kośe ca daṃśitaḥ | kasya daṇḍo dṛḍhaḥ ślakṣṇo ruciro'yaṃ prakāśate
गोचर्म के कोश में रखी यह लम्बी तलवार किसकी है? यह दृढ़, चिकना और सुन्दर चमकता दण्ड किसका है?
श्लोक 16 (4.41.16)
वैयाघ्रकोशः कस्यायं दिव्यः खड्गो महाप्रभः । कस्यार्थमसयश्चैते पञ्च शार्दूललक्षणाः ॥
vaiyāghrakośaḥ kasyāyaṃ divyaḥ khaḍgo mahāprabhaḥ | kasyārthamasayaścaite pañca śārdūlalakṣaṇāḥ
बाघ की खाल के कोश वाली यह दिव्य, तेजस्वी तलवार किसकी है? और बाघ के चिह्न वाली ये पाँच तलवारें किसके लिए हैं?
श्लोक 17 (4.41.17)
कस्यायं निर्मलः खड्गो द्वीपिचर्मनिवासितः । नीलोत्पलसवर्णोऽयं कस्य खड्गः पृथुर्महान् ॥
kasyāyaṃ nirmalaḥ khaḍgo dvīpicarmanivāsitaḥ | nīlotpalasavarṇo'yaṃ kasya khaḍgaḥ pṛthurmahān
चीते की खाल में रखी यह निर्मल तलवार किसकी है? नीले कमल के रंग वाली यह चौड़ी, बड़ी तलवार किसकी है?
श्लोक 18 (4.41.18)
मृगेन्द्रचर्मावसितस्तीक्ष्णधारः सुनिर्मलः । ऋषभाजिनकोशस्तु कस्य खड्गो महानयम् ॥
mṛgendracarmāvasitastīkṣṇadhāraḥ sunirmalaḥ | ṛṣabhājinakośastu kasya khaḍgo mahānayam
सिंह की खाल में लिपटी, तीखी धार वाली, अत्यन्त निर्मल और बैल की खाल के कोश वाली यह बड़ी तलवार किसकी है?
श्लोक 19 (4.41.19)
यस्यापिधाने दृश्यन्ते सूर्याः पञ्च परिष्कृताः । कस्यायं विपुलः खड्गः शृङ्गत्सरुमनोहरः ॥
yasyāpidhāne dṛśyante sūryāḥ pañca pariṣkṛtāḥ | kasyāyaṃ vipulaḥ khaḍgaḥ śṛṅgatsarumanoharaḥ
सींग की सुन्दर मूठ वाली यह चौड़ी तलवार किसकी है, जिसके कोश पर पाँच सजे हुए सूर्य दिखाई देते हैं?
श्लोक 20 (4.41.20)
निहितः पार्षते कोशे तैलधौतः समाहितः । प्रमाणवर्णयुक्तश्च कस्य खड्गो महानयम् । एतेन प्रतिविद्धः सञ्जीवेत्कश्चिन्न कुञ्जरः ॥
nihitaḥ pārṣate kośe tailadhautaḥ samāhitaḥ | pramāṇavarṇayuktaśca kasya khaḍgo mahānayam | etena pratividdhaḥ sañjīvetkaścinna kuñjaraḥ
चितकबरे मृग की खाल के कोश में रखी, तेल से धुली, भली-भाँति सँभाली हुई, उचित माप और रंग वाली यह बड़ी तलवार किसकी है? इससे बिंधकर कोई हाथी जीवित नहीं बचेगा।
श्लोक 21 (4.41.21)
निर्दिशस्व यथामार्गं मया पृष्टा बृहन्नले । विस्मयो मे परो जातो दृष्ट्वा सर्वमिदं महत् ॥
nirdiśasva yathāmārgaṃ mayā pṛṣṭā bṛhannale | vismayo me paro jāto dṛṣṭvā sarvamidaṃ mahat
हे बृहन्नला, मैंने जो पूछा है वह मुझे ठीक-ठीक क्रम से बताओ। यह सब महान वस्तुएँ देखकर मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है।"