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विराट पर्व · अध्याय 42

अर्जुन द्वारा आयुधों के स्वामियों का परिचय

अर्जुन भयभीत उत्तर को कोमल वाणी से आश्वस्त करते हैं और उसके प्रश्नों का उत्तर देते हैं। वे पार्थ के गाण्डीव धनुष की पहचान कराते हैं और उसका इतिहास बताते हैं — कैसे ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, सोम और वरुण ने क्रम से उसे धारण किया, फिर अग्नि ने उसे वरुण से प्राप्त करके पार्थ को दिया। इसके बाद वे युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव के धनुषों, उनके बाणों, विभिन्न कोशों में रखी तलवारों और भीम की विशाल गदा का परिचय देते हैं, और एक-एक आयुध तथा उसके स्वामी को बताते हैं।

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.42.1)

उत्तरेणैवमुक्तस्तु पार्थो वैराटिमब्रवीत् । मृद्व्या प्रत्याययन्वाचा भीतं शङ्कावशं गतम् ॥

uttareṇaivamuktastu pārtho vairāṭimabravīt | mṛdvyā pratyāyayanvācā bhītaṃ śaṅkāvaśaṃ gatam

उत्तर के ऐसा कहने पर पार्थ ने भयभीत और शंका से ग्रस्त विराटपुत्र को कोमल वाणी से विश्वास दिलाते हुए कहा —

अर्जुन उवाच

श्लोक 2 (4.42.2)

यत्त्वया प्रथमं पृष्टं शत्रुसेनाङ्गमर्दनम् । पार्थस्येदं धनुर्दिव्यं गाण्डीवमिति विश्रुतम् ॥

yattvayā prathamaṃ pṛṣṭaṃ śatrusenāṅgamardanam | pārthasyedaṃ dhanurdivyaṃ gāṇḍīvamiti viśrutam

"तुमने सबसे पहले जिसके बारे में पूछा, जो शत्रु-सेना के अंगों को रौंद डालता है, वह पार्थ का दिव्य धनुष है, जो गाण्डीव नाम से प्रसिद्ध है।

श्लोक 3 (4.42.3)

अभेद्यमभयं श्रीमद्दिव्यमच्छेद्यमव्रणम् । सर्वायुधमहामात्रं शातकुम्भमयं धनुः ॥

abhedyamabhayaṃ śrīmaddivyamacchedyamavraṇam | sarvāyudhamahāmātraṃ śātakumbhamayaṃ dhanuḥ

यह अभेद्य, निर्भय, शोभायुक्त, दिव्य, अच्छेद्य और दोषरहित है; स्वर्णमय यह धनुष सब आयुधों में सबसे बड़ा है।

श्लोक 4 (4.42.4)

एतच्छतसहस्रेण संमितं राष्ट्रवर्धनम् । देवदानवगन्धर्वैः पूजितं शाश्वतीः समाः ॥

etacchatasahasreṇa saṃmitaṃ rāṣṭravardhanam | devadānavagandharvaiḥ pūjitaṃ śāśvatīḥ samāḥ

यह अकेला एक लाख धनुषों के बराबर है और राज्य को बढ़ाने वाला है; देवता, दानव और गन्धर्व अनगिनत वर्षों से इसकी पूजा करते आए हैं।

श्लोक 5 (4.42.5)

येन देवासुरान्पार्थः सर्वान्विषहते रणे । एतद्वर्षसहस्रं तु ब्रह्मा पूर्वमधारयत् ॥

yena devāsurānpārthaḥ sarvānviṣahate raṇe | etadvarṣasahasraṃ tu brahmā pūrvamadhārayat

इसी से पार्थ युद्ध में सब देवताओं और असुरों का सामना करता है। पहले इसे ब्रह्मा ने एक हजार वर्ष तक धारण किया था।

श्लोक 6 (4.42.6)

उमापतिश्चतुःषष्टिं शक्रोऽशीतिं च पञ्च च । सोमः पञ्चसहस्राणि तथा च वरुणः शतम् ॥

umāpatiścatuḥṣaṣṭiṃ śakro'śītiṃ ca pañca ca | somaḥ pañcasahasrāṇi tathā ca varuṇaḥ śatam

फिर उमापति शिव ने इसे चौंसठ वर्ष, इन्द्र ने पचासी वर्ष, सोम ने पाँच हजार वर्ष और वरुण ने सौ वर्ष तक धारण किया।

श्लोक 7 (4.42.7)

तस्माच्च वरुणादग्निः प्रेम्णा प्राहृत्य तच्छुभम् । अग्निना प्रातिभाव्येन दत्तं पार्थाय गाण्डिवम् । पञ्चषष्टिं च वर्षाणि कौन्तेयो धारयिष्यति ॥

tasmācca varuṇādagniḥ premṇā prāhṛtya tacchubham | agninā prātibhāvyena dattaṃ pārthāya gāṇḍivam | pañcaṣaṣṭiṃ ca varṣāṇi kaunteyo dhārayiṣyati

उस वरुण से अग्नि ने प्रेमपूर्वक वह सुन्दर धनुष प्राप्त किया, और अग्नि की जमानत पर वह गाण्डीव पार्थ को दिया गया; कुन्तीपुत्र इसे पैंसठ वर्ष तक धारण करेगा।

श्लोक 8 (4.42.8)

एवंवीर्यं महावेगमेतच्च धनुरुत्तमम् । नीलोत्पलसमं राज्ञः कौरव्यस्य महात्मनः ॥

evaṃvīryaṃ mahāvegametacca dhanuruttamam | nīlotpalasamaṃ rājñaḥ kauravyasya mahātmanaḥ

ऐसा पराक्रमी और महावेगशाली है यह उत्तम धनुष। नीले कमल जैसा जो धनुष है, वह महात्मा कुरुवंशी राजा युधिष्ठिर का है।

श्लोक 9 (4.42.9)

बिन्दवश्चात्र सौवर्णाः पृष्ठे साधुनियोजिताः । विश्रुतं भीमसेनस्य जातरूपग्रहं दृढम् ॥

bindavaścātra sauvarṇāḥ pṛṣṭhe sādhuniyojitāḥ | viśrutaṃ bhīmasenasya jātarūpagrahaṃ dṛḍham

इसकी पीठ पर सोने के बिन्दु सुन्दर ढंग से जड़े हैं। सोने की मूठ वाला वह प्रसिद्ध दृढ़ धनुष भीमसेन का है,

श्लोक 10 (4.42.10)

सहस्रगोधाः सौवर्णा द्वीपिनश्च चतुर्दश । ऋषभा यत्र सौवर्णाः पृष्ठे तिष्ठन्ति शृङ्गिणः ॥

sahasragodhāḥ sauvarṇā dvīpinaśca caturdaśa | ṛṣabhā yatra sauvarṇāḥ pṛṣṭhe tiṣṭhanti śṛṅgiṇaḥ

जिस पर सोने की एक हजार गोह और चौदह चीते बने हैं, और जिसकी पीठ पर सींगों वाले सोने के बैल खड़े हैं,

श्लोक 11 (4.42.11)

येन भीमोऽजयत्कृत्स्नां दिशं प्राचीं परंतपः । पृष्ठे विभक्ताः शोभन्ते कुशाग्निप्रतिदीपिताः ॥

yena bhīmo'jayatkṛtsnāṃ diśaṃ prācīṃ paraṃtapaḥ | pṛṣṭhe vibhaktāḥ śobhante kuśāgnipratidīpitāḥ

जिससे शत्रुओं को तपाने वाले भीम ने सम्पूर्ण पूर्व दिशा को जीता था; उसकी पीठ पर अलग-अलग बनी आकृतियाँ कुश की अग्नि जैसी दमकती हुई शोभा पाती हैं।

श्लोक 12 (4.42.12)

पूजितं सुरमर्त्येषु प्रथितं धनुरुत्तमम् । तालप्रमाणं भीमस्य रत्नरुक्मविभूषितम् ॥

pūjitaṃ suramartyeṣu prathitaṃ dhanuruttamam | tālapramāṇaṃ bhīmasya ratnarukmavibhūṣitam

देवताओं और मनुष्यों में पूजित यह उत्तम धनुष प्रसिद्ध है। ताड़ के वृक्ष जितना ऊँचा, रत्नों और स्वर्ण से सजा धनुष भीम का है —

श्लोक 13 (4.42.13)

दुरानमं महद्दीर्घं सुरूपं दुष्प्रधर्षणम् । बर्हिणश्चात्र सौवर्णाः शतचन्द्रकभूषणाः ॥

durānamaṃ mahaddīrghaṃ surūpaṃ duṣpradharṣaṇam | barhiṇaścātra sauvarṇāḥ śatacandrakabhūṣaṇāḥ

जिसे झुकाना कठिन है, जो विशाल, लम्बा, सुन्दर और दुर्जेय है। और यह जिस पर सौ चन्द्रकों से सजे सोने के मोर बने हैं,

श्लोक 14 (4.42.14)

नकुलस्य धनुस्त्वेतन्माद्रीपुत्रस्य धीमतः । एतेन सदृशं चित्रं धनुरेतद्यवीयसः । हारिद्रवर्णं राज्ञस्तु कौरव्यस्य महात्मनः ॥

nakulasya dhanustvetanmādrīputrasya dhīmataḥ | etena sadṛśaṃ citraṃ dhanuretadyavīyasaḥ | hāridravarṇaṃ rājñastu kauravyasya mahātmanaḥ

वह माद्री के बुद्धिमान पुत्र नकुल का धनुष है। उसी के समान यह विचित्र धनुष सबसे छोटे भाई का है। हल्दी के रंग वाला महात्मा कुरुवंशी राजा का है।

श्लोक 15 (4.42.15)

विपाठा भीमसेनस्य गिरीणामपि दारणाः । सुप्रभाः सुमहाकायास्तीक्ष्णाग्राः सुतरां दृढाः । भीमेन प्रहिता ह्येते वारणानां निवारणाः ॥

vipāṭhā bhīmasenasya girīṇāmapi dāraṇāḥ | suprabhāḥ sumahākāyāstīkṣṇāgrāḥ sutarāṃ dṛḍhāḥ | bhīmena prahitā hyete vāraṇānāṃ nivāraṇāḥ

पर्वतों को भी चीर देने वाले विपाठ बाण भीमसेन के हैं — अत्यन्त चमकीले, बहुत बड़े, तीखी नोक वाले और अत्यन्त दृढ़। भीम द्वारा छोड़े गए ये बाण हाथियों को भी रोक देते हैं।

श्लोक 16 (4.42.16)

सुवर्णदण्डरुचिराः कालदण्डोपमाः शुभाः । नकुलस्य शरा ह्येते वज्राशनिसमप्रभाः ॥

suvarṇadaṇḍarucirāḥ kāladaṇḍopamāḥ śubhāḥ | nakulasya śarā hyete vajrāśanisamaprabhāḥ

सोने के दण्डों से सुन्दर, काल के दण्ड जैसे, शुभ, और वज्र तथा बिजली जैसी चमक वाले ये बाण नकुल के हैं।

श्लोक 17 (4.42.17)

यांश्च त्वं पृच्छसे दीप्तान्समधारान्समाहितान् । वराहकर्णास्तीक्ष्णाग्राः सहदेवस्य ते शराः ॥

yāṃśca tvaṃ pṛcchase dīptānsamadhārānsamāhitān | varāhakarṇāstīkṣṇāgrāḥ sahadevasya te śarāḥ

और जिनके बारे में तुम पूछ रहे हो — वे दमकते हुए, समान धार वाले, सुगठित, सूअर के कान जैसे फलक और तीखी नोक वाले बाण सहदेव के हैं।

श्लोक 18 (4.42.18)

यस्त्वयं सायको दीर्घो गव्ये कोशे च दंशितः । पार्थस्यायं महाघोरः सर्वभारसहो महान् ॥

yastvayaṃ sāyako dīrgho gavye kośe ca daṃśitaḥ | pārthasyāyaṃ mahāghoraḥ sarvabhārasaho mahān

गोचर्म के कोश में रखी यह लम्बी तलवार पार्थ की है — अत्यन्त भयानक, विशाल और हर भार सहने वाली।

श्लोक 19 (4.42.19)

यस्त्वयं निर्मलः खड्गो द्वीपिचर्मणि दंशितः । राज्ञो युधिष्ठिरस्यायं कुन्तीपुत्रस्य धीमतः ॥

yastvayaṃ nirmalaḥ khaḍgo dvīpicarmaṇi daṃśitaḥ | rājño yudhiṣṭhirasyāyaṃ kuntīputrasya dhīmataḥ

चीते की खाल में रखी यह निर्मल तलवार कुन्ती के बुद्धिमान पुत्र राजा युधिष्ठिर की है।

श्लोक 20 (4.42.20)

वैयाघ्रकोशो भीमस्य पञ्चशार्दूललक्षणः । वारणानां सुदृप्तानां शिक्षितः स्कन्धशातने ॥

vaiyāghrakośo bhīmasya pañcaśārdūlalakṣaṇaḥ | vāraṇānāṃ sudṛptānāṃ śikṣitaḥ skandhaśātane

बाघ की खाल के कोश वाली, पाँच बाघों के चिह्न वाली तलवार भीम की है, जो मदमत्त हाथियों के कंधे काटने में अभ्यस्त है।

श्लोक 21 (4.42.21)

नीलोत्पलसवर्णाभः खड्गः पार्थस्य धीमतः । मृगेन्द्रचर्मपिहितस्तीक्ष्णधारः सुनिर्मलः ॥

nīlotpalasavarṇābhaḥ khaḍgaḥ pārthasya dhīmataḥ | mṛgendracarmapihitastīkṣṇadhāraḥ sunirmalaḥ

नीले कमल के रंग वाली तलवार बुद्धिमान पार्थ की है; वह सिंह की खाल से ढकी, तीखी धार वाली और अत्यन्त निर्मल है।

श्लोक 22 (4.42.22)

दर्शनीयः सुतीक्ष्णाग्रः कुन्तीपुत्रस्य धीमतः । अर्जुनस्यैष निस्त्रिंशः परसैन्याग्रदूषणः ॥

darśanīyaḥ sutīkṣṇāgraḥ kuntīputrasya dhīmataḥ | arjunasyaiṣa nistriṃśaḥ parasainyāgradūṣaṇaḥ

देखने में सुन्दर और अत्यन्त तीखी नोक वाली यह तलवार कुन्ती के बुद्धिमान पुत्र की है — यह अर्जुन का खड्ग है, जो शत्रु-सेना के अग्रभाग का संहार करता है।

श्लोक 23 (4.42.23)

यस्त्वयं पार्षते कोशे निक्षिप्तो रुचिरत्सरुः । नकुलस्यैष निस्त्रिंशो वैश्वानरसमप्रभः ॥

yastvayaṃ pārṣate kośe nikṣipto ruciratsaruḥ | nakulasyaiṣa nistriṃśo vaiśvānarasamaprabhaḥ

मृगचर्म के कोश में रखी, सुन्दर मूठ वाली यह तलवार नकुल की है, जो अग्नि के समान दीप्तिमान है।

श्लोक 24 (4.42.24)

यस्त्वयं पिङ्गलः खड्गश्चित्रो मणिमयत्सरुः । सहदेवस्य खड्गोऽयं भारसाहोऽतिदंशितः । भीमस्यायं महादण्डः सर्वामित्रविनाशनः ॥

yastvayaṃ piṅgalaḥ khaḍgaścitro maṇimayatsaruḥ | sahadevasya khaḍgo'yaṃ bhārasāho'tidaṃśitaḥ | bhīmasyāyaṃ mahādaṇḍaḥ sarvāmitravināśanaḥ

यह भूरी, रंग-बिरंगी, मणिजटित मूठ वाली तलवार सहदेव की है, जो भारी भार सह सकती है और भली-भाँति कोश में रखी है। और सब शत्रुओं का नाश करने वाली यह विशाल गदा भीम की है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (4.42.25)

भेदतो ह्यर्जुनस्तूर्णं कथयामास तत्त्वतः । आयुधानि कलापांश्च निस्त्रिंशांश्चातुलप्रभान् ॥

bhedato hyarjunastūrṇaṃ kathayāmāsa tattvataḥ | āyudhāni kalāpāṃśca nistriṃśāṃścātulaprabhān

इस प्रकार अर्जुन ने शीघ्र ही उसे एक-एक करके ठीक-ठीक सारे आयुध, तरकश और अनुपम कान्ति वाली तलवारें बता दीं।

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