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विराट पर्व · अध्याय 43

अर्जुन का उत्तर के सामने प्रकट होना और अपने दस नामों की व्याख्या

बृहन्नला को अब भी न पहचानने वाला उत्तर पूछता है कि जिन पाण्डवों के ये चमकते आयुध हैं वे अब कहाँ रहते हैं, और बृहन्नला उन्हें कैसे जानती है। अर्जुन हँसकर बताते हैं कि वे स्वयं अर्जुन हैं, कङ्क, वलल, अश्वपाल और गोपालक क्रमशः युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव हैं, और सैरन्ध्री द्रौपदी है। उत्तर के प्रमाण माँगने पर अर्जुन अपने दस नाम गिनाकर प्रत्येक का कारण बताते हैं, फिर ब्रह्मा और शिव द्वारा दिए गए ग्यारहवें नाम "कृष्ण", प्राप्त दिव्य अस्त्रों, तथा निवातकवचों, हिरण्यपुरवासियों और गन्धर्वों पर अपनी विजयों का वर्णन करते हैं, और सब कौरवों को हराकर पशु लौटा लाने का वचन देते हैं।

अध्याय 42अध्याय-सूचीअध्याय 44

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.43.1)

एतस्मिन्नन्तरे पार्थं न मूढात्मा व्यजानत । विराटपुत्रः प्रमुखे पप्रच्छ पुनरेव तम् ॥

etasminnantare pārthaṃ na mūḍhātmā vyajānata | virāṭaputraḥ pramukhe papraccha punareva tam

इस बीच विराट का पुत्र, जिसकी बुद्धि मोहित थी, पार्थ को पहचान न सका और उनके सामने खड़ा होकर उसने उनसे फिर पूछा —

उत्तर उवाच

श्लोक 2 (4.43.2)

सुवर्णरुचिराण्येषामायुधानि महात्मनाम् । रुचिराणि प्रकाशन्ते पार्थानामाशुकारिणाम् ॥

suvarṇarucirāṇyeṣāmāyudhāni mahātmanām | rucirāṇi prakāśante pārthānāmāśukāriṇām

शीघ्र पराक्रम करने वाले महात्मा पार्थों के ये सुवर्ण से सजे आयुध अत्यन्त सुन्दर दीख रहे हैं।

श्लोक 3 (4.43.3)

क्वनु ते पाण्डवाः शूराः संग्रामेष्वपराजिताः । येषामिमानि दीप्तानि श्रिया दीप्यन्ति भान्ति च ॥

kvanu te pāṇḍavāḥ śūrāḥ saṃgrāmeṣvaparājitāḥ | yeṣāmimāni dīptāni śriyā dīpyanti bhānti ca

युद्ध में कभी पराजित न होने वाले वे वीर पाण्डव अब कहाँ हैं, जिनके ये आयुध तेज से दमकते और चमकते हैं?

श्लोक 4 (4.43.4)

कस्मिन्वसन्ति देशे च धर्मज्ञा बन्धुवत्सलाः । क्व धर्मराजः कौन्तेयो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

kasminvasanti deśe ca dharmajñā bandhuvatsalāḥ | kva dharmarājaḥ kaunteyo dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ

धर्म के ज्ञाता और स्वजनों से प्रेम करने वाले वे किस देश में रहते हैं? कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर, जो धर्म के पुत्र हैं, कहाँ हैं —

श्लोक 5 (4.43.5)

धर्मशीलश्च धर्मात्मा धर्मवान्धर्मवित्सुधीः । धर्माध्यक्षो धर्मपुत्रो धर्मज्ञो धर्ममूर्तिमान् ॥

dharmaśīlaśca dharmātmā dharmavāndharmavitsudhīḥ | dharmādhyakṣo dharmaputro dharmajño dharmamūrtimān

जो धर्मशील, धर्मात्मा, धर्मवान्, धर्मवेत्ता और बुद्धिमान् हैं; धर्म के अध्यक्ष, धर्मपुत्र, धर्मज्ञ और धर्म की मूर्ति हैं;

श्लोक 6 (4.43.6)

धर्मनिष्ठो धर्मकर्ता धर्मगोप्ता सुधर्मकृत् । सत्यार्जवक्षमाधारो घृणी धर्मपरायणः ॥

dharmaniṣṭho dharmakartā dharmagoptā sudharmakṛt | satyārjavakṣamādhāro ghṛṇī dharmaparāyaṇaḥ

धर्म में निष्ठ, धर्म के कर्ता, धर्म के रक्षक और उत्तम धर्म का आचरण करने वाले; सत्य, सरलता और क्षमा के आधार, दयालु और धर्मपरायण?

श्लोक 7 (4.43.7)

भीमसेनार्जुनौ चापि सर्वे ते मातुला मम । नकुलः सहदेवो वा सर्वास्त्रकुशलौ रणे ॥

bhīmasenārjunau cāpi sarve te mātulā mama | nakulaḥ sahadevo vā sarvāstrakuśalau raṇe

भीमसेन और अर्जुन भी, तथा युद्ध में सब अस्त्रों में कुशल नकुल और सहदेव — वे सभी मेरे मामा हैं।

श्लोक 8 (4.43.8)

सर्व एव महात्मानः सर्वामित्रविनाशनाः । राज्यमक्षैः पराजित्य नः श्रूयन्ते वनं गताः ॥

sarva eva mahātmānaḥ sarvāmitravināśanāḥ | rājyamakṣaiḥ parājitya naḥ śrūyante vanaṃ gatāḥ

वे सभी महात्मा और समस्त शत्रुओं का नाश करने वाले हैं; हमने सुना है कि जुए में राज्य हारकर वे वन को चले गए।

श्लोक 9 (4.43.9)

द्रौपदी चापि पाञ्चाली स्त्रीरत्नमिति मे श्रुता । जिता चाक्षैस्तदा कृष्णा तानेवान्वगमद्वने ॥

draupadī cāpi pāñcālī strīratnamiti me śrutā | jitā cākṣaistadā kṛṣṇā tānevānvagamadvane

पांचालराजकुमारी द्रौपदी भी, जिसे मैंने स्त्रियों में रत्न सुना है, वह कृष्णा तब जुए में जीती गई और उन्हीं के पीछे वन में गई।

श्लोक 10 (4.43.10)

उत्सृज्य राज्यं धर्म्यं ते नः श्रूयन्ते वनं गताः ॥

utsṛjya rājyaṃ dharmyaṃ te naḥ śrūyante vanaṃ gatāḥ

अपना धर्मसम्मत राज्य छोड़कर वे वन चले गए, ऐसा हमने सुना है।

श्लोक 11 (4.43.11)

पाण्डवान्यदि जानीषे क्वनु ते धर्मचारिणः । क्वनु वा निवसन्तीति सत्यं ब्रूहि बृहन्नले ॥

pāṇḍavānyadi jānīṣe kvanu te dharmacāriṇaḥ | kvanu vā nivasantīti satyaṃ brūhi bṛhannale

बृहन्नले! यदि तुम पाण्डवों को जानती हो तो सच-सच बताओ — धर्म का आचरण करने वाले वे अब कहाँ हैं, और कहाँ निवास करते हैं?

श्लोक 12 (4.43.12)

किमर्थमागतान्यत्र शस्त्रास्त्राणि महात्मनाम् । कथं ज्ञातानि भवता तथा मे ब्रूहि शोभने ॥

kimarthamāgatānyatra śastrāstrāṇi mahātmanām | kathaṃ jñātāni bhavatā tathā me brūhi śobhane

उन महात्माओं के शस्त्र और अस्त्र यहाँ किस कारण आए हैं? और तुमने उन्हें कैसे पहचाना? हे शोभने, यह भी मुझे बताओ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (4.43.13)

ततः प्रहस्य बीभत्सुः कौन्तेयः श्वेतवाहनः । उवाच राजपुत्रं तमुत्तरं शृणु मे वचः ॥

tataḥ prahasya bībhatsuḥ kaunteyaḥ śvetavāhanaḥ | uvāca rājaputraṃ tamuttaraṃ śṛṇu me vacaḥ

तब श्वेत अश्वों वाले कुन्तीपुत्र बीभत्सु ने हँसकर राजकुमार उत्तर से कहा — "मेरी बात सुनो।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 14 (4.43.14)

मा भैस्त्वं राजशार्दूल सर्वं ते वर्णयाम्यहम् । नात्र भेतव्यमद्यापि राजपुत्र यथातथा ॥

mā bhaistvaṃ rājaśārdūla sarvaṃ te varṇayāmyaham | nātra bhetavyamadyāpi rājaputra yathātathā

हे राजसिंह, डरो मत; मैं तुम्हें सब कुछ बताता हूँ। राजकुमार, यहाँ अब भी किसी प्रकार डरने की कोई बात नहीं है।

श्लोक 15 (4.43.15)

वयं ते पाण्डवा नाम वनवासस्य पारगाः । अतीते द्वादशे वर्षे च्छन्नवासमिहोषिताः । तस्मादशङ्कितमनाः शृणुष्वावहितोत्तर ॥

vayaṃ te pāṇḍavā nāma vanavāsasya pāragāḥ | atīte dvādaśe varṣe cchannavāsamihoṣitāḥ | tasmādaśaṅkitamanāḥ śṛṇuṣvāvahitottara

हम वही पाण्डव हैं जो वनवास पूरा कर चुके हैं; बारहवाँ वर्ष बीत जाने पर हम यहाँ छिपकर रहे। इसलिए उत्तर, निःशंक मन से ध्यान लगाकर सुनो।

श्लोक 16 (4.43.16)

अहमस्म्यर्जुनो नाम कङ्को नाम युधिष्ठिरः । भीमसेनस्तु वललः पितुस्ते रसपाचकः । अश्वबन्धस्तु नकुलः सहदेवस्तु गोपतिः ॥

ahamasmyarjuno nāma kaṅko nāma yudhiṣṭhiraḥ | bhīmasenastu valalaḥ pituste rasapācakaḥ | aśvabandhastu nakulaḥ sahadevastu gopatiḥ

मैं अर्जुन हूँ; कङ्क नामक व्यक्ति युधिष्ठिर हैं; तुम्हारे पिता का रसोइया वलल भीमसेन है; अश्वपाल नकुल है और गोपालक सहदेव है।

श्लोक 17 (4.43.17)

सैरन्ध्रीं द्रौपदीं विद्धि यदर्थे कीचको हतः । भीमसेनेन दुर्वृत्तः सहभ्रातृभिराहवे ॥

sairandhrīṃ draupadīṃ viddhi yadarthe kīcako hataḥ | bhīmasenena durvṛttaḥ sahabhrātṛbhirāhave

सैरन्ध्री को द्रौपदी जानो, जिसके कारण दुष्ट कीचक अपने भाइयों सहित भीमसेन के हाथों युद्ध में मारा गया।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (4.43.18)

श्रुत्वैतद्वचनं जिष्णोर्विस्मयस्फारितेक्षणः । पश्यन्ननिमिषः पार्थं शनैर्वाचमुवाच ह ॥

śrutvaitadvacanaṃ jiṣṇorvismayasphāritekṣaṇaḥ | paśyannanimiṣaḥ pārthaṃ śanairvācamuvāca ha

जिष्णु के ये वचन सुनकर, विस्मय से आँखें फैलाए, एकटक पार्थ को देखते हुए उत्तर ने धीरे से कहा —

उत्तर उवाच

श्लोक 19 (4.43.19)

दश पार्थस्य नामानि श्रूयन्ते मे कथासु च । प्रब्रूयास्तानि यदि मे श्रद्दध्यां सर्वमेव ते ॥

daśa pārthasya nāmāni śrūyante me kathāsu ca | prabrūyāstāni yadi me śraddadhyāṃ sarvameva te

कथाओं में मैंने पार्थ के दस नाम सुने हैं। यदि तुम वे मुझे बता दो, तो मैं तुम्हारी सारी बात पर विश्वास कर लूँगा।

अर्जुन उवाच

श्लोक 20 (4.43.20)

अहं तर्हि तवाचक्षे दश नामानि तानि मे । वैराटे शृणु तानि त्वं यानि पूर्वं श्रुतानि ते । ईशानो विदधे देवस्त्रिदिवस्येश्वरो दिवि ॥

ahaṃ tarhi tavācakṣe daśa nāmāni tāni me | vairāṭe śṛṇu tāni tvaṃ yāni pūrvaṃ śrutāni te | īśāno vidadhe devastridivasyeśvaro divi

तो मैं तुम्हें अपने वे दस नाम बताता हूँ। हे विराटपुत्र, उन्हें सुनो — वही जो तुमने पहले सुने हैं; स्वर्ग के अधिपति ईशान देव ने द्युलोक में उनका विधान किया था।

श्लोक 21 (4.43.21)

अर्जुनः फल्गुनो जिष्णुः किरीटी श्वेतवाहनः । बीभत्सुर्विजयः पार्थः सव्यसाची धनञ्जयः । एतानि मम नामानि स्थापितानि सुरोत्तमैः ॥

arjunaḥ phalguno jiṣṇuḥ kirīṭī śvetavāhanaḥ | bībhatsurvijayaḥ pārthaḥ savyasācī dhanañjayaḥ | etāni mama nāmāni sthāpitāni surottamaiḥ

अर्जुन, फाल्गुन, जिष्णु, किरीटी, श्वेतवाहन, बीभत्सु, विजय, पार्थ, सव्यसाची और धनञ्जय — ये मेरे नाम हैं, जिन्हें श्रेष्ठ देवताओं ने स्थापित किया है।

उत्तर उवाच

श्लोक 22 (4.43.22)

गुणतो दश नामानि समवेतानि पाण्डवे । चरन्ति लोके ख्यातानि विदितानि ममानघ ॥

guṇato daśa nāmāni samavetāni pāṇḍave | caranti loke khyātāni viditāni mamānagha

हे निष्पाप, पाण्डव के गुणों के अनुसार उनके जो दस नाम हैं, वे संसार में प्रसिद्ध हैं और मुझे भी ज्ञात हैं।

श्लोक 23 (4.43.23)

केनासि विजयो नाम केनासि श्वेतवाहनः । सव्यसाची च केनासि जिष्णुर्बीभत्सुरेव च ॥

kenāsi vijayo nāma kenāsi śvetavāhanaḥ | savyasācī ca kenāsi jiṣṇurbībhatsureva ca

तुम किस कारण विजय कहलाते हो? किस कारण श्वेतवाहन? और सव्यसाची, जिष्णु तथा बीभत्सु किस कारण?

श्लोक 24 (4.43.24)

अर्जुनः फल्गुनः पार्थः किरीटी केन सारथे । धनञ्जयश्च केनासि शीघ्रं वद बृहन्नले ॥

arjunaḥ phalgunaḥ pārthaḥ kirīṭī kena sārathe | dhanañjayaśca kenāsi śīghraṃ vada bṛhannale

हे सारथि, अर्जुन, फाल्गुन, पार्थ और किरीटी किस कारण? और धनञ्जय किस कारण हो? बृहन्नले, शीघ्र बताओ।

श्लोक 25 (4.43.25)

श्रुता मे तस्य वीरस्य केवला नामहेतवः । इतस्ततश्चलत्येतन्मनो मे चञ्चलं त्वयि । अर्जुनो वा भवान्नेति वद शीघ्रं बृहन्नले ॥

śrutā me tasya vīrasya kevalā nāmahetavaḥ | itastataścalatyetanmano me cañcalaṃ tvayi | arjuno vā bhavānneti vada śīghraṃ bṛhannale

मैंने उस वीर के नामों के पूरे कारण सुने हैं। तुम्हारे विषय में मेरा यह चंचल मन इधर-उधर डोल रहा है। तुम अर्जुन हो या नहीं — बृहन्नले, शीघ्र बताओ।

अर्जुन उवाच

श्लोक 26 (4.43.26)

सर्वाञ्जित्वा जनपदान्धनं चाच्छिद्य सर्वशः । मध्ये धनस्य तिष्ठन्तं तन्मामाहुर्धनञ्जयम् ॥

sarvāñjitvā janapadāndhanaṃ cācchidya sarvaśaḥ | madhye dhanasya tiṣṭhantaṃ tanmāmāhurdhanañjayam

मैंने सब देशों को जीतकर सब ओर से धन छीन लिया और धन के बीच खड़ा रहा; इसलिए लोग मुझे धनञ्जय कहते हैं।

श्लोक 27 (4.43.27)

अभिप्रयामि संग्रामे यदाऽहं युद्धदुर्मदान् । अजित्वा न निवर्तेयं तेन वै विजयं विदुः ॥

abhiprayāmi saṃgrāme yadā'haṃ yuddhadurmadān | ajitvā na nivarteyaṃ tena vai vijayaṃ viduḥ

जब मैं युद्ध में रणोन्मत्त शत्रुओं पर चढ़ाई करता हूँ, तब उन्हें जीते बिना नहीं लौटता; इसलिए मुझे विजय कहते हैं।

श्लोक 28 (4.43.28)

श्वेताः काञ्चनसन्नाहा रथे युज्यन्ति मे हयाः । शत्रुभिर्युध्यमानस्य तेनाहं श्वेतवाहनः ॥

śvetāḥ kāñcanasannāhā rathe yujyanti me hayāḥ | śatrubhiryudhyamānasya tenāhaṃ śvetavāhanaḥ

जब मैं शत्रुओं से युद्ध करता हूँ, तब मेरे रथ में सोने के साज वाले श्वेत घोड़े जोते जाते हैं; इसलिए मैं श्वेतवाहन हूँ।

श्लोक 29 (4.43.29)

किरीटं सूर्यसंकाशं भ्राजते मे शिरोगतम् । रणमध्ये रथस्थस्य सूर्यपावकसन्निभम् ॥

kirīṭaṃ sūryasaṃkāśaṃ bhrājate me śirogatam | raṇamadhye rathasthasya sūryapāvakasannibham

युद्ध के बीच रथ पर खड़े रहते समय मेरे सिर पर सूर्य के समान मुकुट चमकता है, जो सूर्य और अग्नि जैसा दीप्त है;

श्लोक 30 (4.43.30)

अच्छेद्यं रुचिरं चित्रं जाम्बूनदपरिष्कृतम् । इन्द्रदत्तमनाहार्यं तेनाहुर्मां किरीटिनम् ॥

acchedyaṃ ruciraṃ citraṃ jāmbūnadapariṣkṛtam | indradattamanāhāryaṃ tenāhurmāṃ kirīṭinam

वह अच्छेद्य, सुन्दर, विचित्र और जाम्बूनद सुवर्ण से अलंकृत है; इन्द्र का दिया हुआ है और कोई उसे छीन नहीं सकता; इसलिए मुझे किरीटी कहते हैं।

श्लोक 31 (4.43.31)

न कुर्यां कर्म बीभत्सं युध्यमानः कदाचन । तेन देवमनुष्येषु बीभत्सुरिति मां विदुः ॥

na kuryāṃ karma bībhatsaṃ yudhyamānaḥ kadācana | tena devamanuṣyeṣu bībhatsuriti māṃ viduḥ

युद्ध करते समय मैं कभी कोई घृणित कर्म नहीं करता; इसलिए देवताओं और मनुष्यों में मैं बीभत्सु नाम से जाना जाता हूँ।

श्लोक 32 (4.43.32)

उभौ मे तुल्यकर्माणौ गाण्डीवस्य विकर्षणे । भुजौ मे भवतः सङ्ख्ये परसैन्यविनाशिनौ । तयोः सव्योऽधिकस्तस्मात्सव्यसाचीति मां विदुः ॥

ubhau me tulyakarmāṇau gāṇḍīvasya vikarṣaṇe | bhujau me bhavataḥ saṅkhye parasainyavināśinau | tayoḥ savyo'dhikastasmātsavyasācīti māṃ viduḥ

गाण्डीव खींचने में मेरी दोनों भुजाएँ समान काम करती हैं और युद्ध में दोनों ही शत्रुसेना का नाश करती हैं; उनमें बायाँ हाथ अधिक है, इसलिए मुझे सव्यसाची कहते हैं।

श्लोक 33 (4.43.33)

पृथिव्यां सागरान्तायां वर्णो मे दुर्लभः समः । शुद्धत्वाद्रूपवत्त्वाच्च तेन मामर्जुनं विदुः ॥

pṛthivyāṃ sāgarāntāyāṃ varṇo me durlabhaḥ samaḥ | śuddhatvādrūpavattvācca tena māmarjunaṃ viduḥ

समुद्र तक फैली पृथ्वी पर मेरे जैसा वर्ण दुर्लभ है; अपनी शुद्धता और रूप के कारण मुझे अर्जुन कहते हैं।

श्लोक 34 (4.43.34)

उत्तराभ्यां तु पूर्वाभ्यां फल्गुनीभ्यामहं दिवा । जातो हिमवतः पृष्ठे तेन मां फल्गुनं विदुः ॥

uttarābhyāṃ tu pūrvābhyāṃ phalgunībhyāmahaṃ divā | jāto himavataḥ pṛṣṭhe tena māṃ phalgunaṃ viduḥ

मेरा जन्म हिमालय की पीठ पर दिन के समय पूर्वा और उत्तरा, दोनों फाल्गुनी नक्षत्रों में हुआ; इसलिए मुझे फाल्गुन कहते हैं।

श्लोक 35 (4.43.35)

यो ममाङ्गे व्रणं कुर्याद्भ्रातुर्ज्येष्ठस्य पश्यतः । युधिष्ठिरस्य रुधिरं दर्शयेद्वा कदाचन । पराभवमहं तस्य कुले कुर्यां न संशयः ॥

yo mamāṅge vraṇaṃ kuryādbhrāturjyeṣṭhasya paśyataḥ | yudhiṣṭhirasya rudhiraṃ darśayedvā kadācana | parābhavamahaṃ tasya kule kuryāṃ na saṃśayaḥ

जो मेरे बड़े भाई के देखते-देखते मेरे अंग पर घाव करे, या कभी युधिष्ठिर का रक्त बहाए, उसके कुल का मैं निःसन्देह विनाश कर दूँगा।

श्लोक 36 (4.43.36)

योत्स्यामि तैरहं सर्वैर्न मे तेभ्यः पराभवः । तेन देवमनुष्येषु जिष्णुर्नामास्मि विश्रुतः ॥

yotsyāmi tairahaṃ sarvairna me tebhyaḥ parābhavaḥ | tena devamanuṣyeṣu jiṣṇurnāmāsmi viśrutaḥ

मैं उन सबसे युद्ध करूँगा, और उनमें से कोई मुझे पराजित नहीं कर सकता; इसलिए देवताओं और मनुष्यों में मैं जिष्णु नाम से विख्यात हूँ।

श्लोक 37 (4.43.37)

माता मम पृथा नाम तेन मां पार्थमब्रुवन् ॥

mātā mama pṛthā nāma tena māṃ pārthamabruvan

मेरी माता का नाम पृथा है; इसलिए मुझे पार्थ कहा गया।

श्लोक 38 (4.43.38)

देवदानवगन्धर्वपिशाचोरगराक्षसान् । अहं पुरा रणे जित्वा खाण्डवेऽग्निमतर्पयम् ॥

devadānavagandharvapiśācoragarākṣasān | ahaṃ purā raṇe jitvā khāṇḍave'gnimatarpayam

पहले मैंने युद्ध में देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, पिशाचों, नागों और राक्षसों को जीतकर खाण्डव वन में अग्नि को तृप्त किया था।

श्लोक 39 (4.43.39)

हुताशनं तर्पयित्वा सहितः शार्ङ्गधन्वना । त्रिविष्टपगतौ दृष्ट्वा पितामहमहेश्वरौ ॥

hutāśanaṃ tarpayitvā sahitaḥ śārṅgadhanvanā | triviṣṭapagatau dṛṣṭvā pitāmahamaheśvarau

शार्ङ्गधनुषधारी श्रीकृष्ण के साथ अग्नि को तृप्त करके मैंने स्वर्ग में रहने वाले पितामह ब्रह्मा और महेश्वर के दर्शन किए।

श्लोक 40 (4.43.40)

मूर्च्छया पतितं भूमावागतौ देवसत्तमौ । दृष्ट्वा तौ वरदौ देवौ संज्ञां लब्ध्वोत्थितः पुनः ॥

mūrcchayā patitaṃ bhūmāvāgatau devasattamau | dṛṣṭvā tau varadau devau saṃjñāṃ labdhvotthitaḥ punaḥ

जब मैं मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा, तब वे दोनों श्रेष्ठ देव मेरे पास आए; उन वरदायक देवों को देखकर मैं होश में आया और फिर उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 41 (4.43.41)

मूर्ध्ना हि प्रणतं भूमौ तौ देवौ वरदौ वरौ । कृष्णेत्येकादशं नाम प्रीत्या मे चक्रतुस्तदा । तुष्टौ च मम वीर्येण कर्मणा चाभिराधितौ ॥

mūrdhnā hi praṇataṃ bhūmau tau devau varadau varau | kṛṣṇetyekādaśaṃ nāma prītyā me cakratustadā | tuṣṭau ca mama vīryeṇa karmaṇā cābhirādhitau

जब मैंने भूमि पर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया, तब उन दोनों श्रेष्ठ वरदायक देवों ने प्रेम से मुझे "कृष्ण" नाम का ग्यारहवाँ नाम दिया; वे मेरे पराक्रम से सन्तुष्ट और मेरे कर्म से आराधित हुए थे।

श्लोक 42 (4.43.42)

सर्वदेवैः परिवृतौ भूयो मां स्वयमूचतुः । वरं तात वृणीष्वेति यं प्रार्थयसि पाण्डव ॥

sarvadevaiḥ parivṛtau bhūyo māṃ svayamūcatuḥ | varaṃ tāta vṛṇīṣveti yaṃ prārthayasi pāṇḍava

सब देवताओं से घिरे हुए उन दोनों ने स्वयं मुझसे फिर कहा — "वत्स पाण्डव, जो चाहो वह वर माँग लो।"

श्लोक 43 (4.43.43)

ततोऽहमस्त्राण्यलभं दिव्यानि च दृढानि च । ब्राह्मं पाशुपतं चैव स्थूणाकर्णं च दुर्जयम् । ऐन्द्रं वारुणमाग्नेयं वायव्यमथ वैष्णवम् ॥

tato'hamastrāṇyalabhaṃ divyāni ca dṛḍhāni ca | brāhmaṃ pāśupataṃ caiva sthūṇākarṇaṃ ca durjayam | aindraṃ vāruṇamāgneyaṃ vāyavyamatha vaiṣṇavam

तब मुझे दिव्य और दृढ़ अस्त्र प्राप्त हुए — ब्रह्मास्त्र, पाशुपत, दुर्जय स्थूणाकर्ण, तथा ऐन्द्र, वारुण, आग्नेय, वायव्य और वैष्णव अस्त्र।

श्लोक 44 (4.43.44)

ततोऽहमजयं भूयो रथेनैन्द्रेण दुर्जयान् । मातलिं सारथिं कृत्वा निवातकवचान्रणे । अवध्यकवचान्देवैर्वरदृप्तान्महासुरान् ॥

tato'hamajayaṃ bhūyo rathenaindreṇa durjayān | mātaliṃ sārathiṃ kṛtvā nivātakavacānraṇe | avadhyakavacāndevairvaradṛptānmahāsurān

फिर मातलि को सारथि बनाकर इन्द्र के रथ से मैंने युद्ध में उन दुर्जय निवातकवचों को जीता — वरदान के गर्व से भरे वे महान् असुर, जिनके कवच को देवता भी नहीं भेद सकते थे।

श्लोक 45 (4.43.45)

तिस्रः कोटीर्दानवानां संयुगेष्वनिवर्तिनाम् । एको निर्जित्य संग्रामे भूयो देवानतोषयम् ॥

tisraḥ koṭīrdānavānāṃ saṃyugeṣvanivartinām | eko nirjitya saṃgrāme bhūyo devānatoṣayam

युद्ध से कभी पीछे न हटने वाले तीन करोड़ दानवों को मैंने अकेले ही संग्राम में जीतकर देवताओं को फिर प्रसन्न किया।

श्लोक 46 (4.43.46)

ततो मे भगवानिन्द्रः किरीटमददात्स्वयम् । देवाश्च शङ्खमददुः शत्रुसैन्यनिवारणम् ॥

tato me bhagavānindraḥ kirīṭamadadātsvayam | devāśca śaṅkhamadaduḥ śatrusainyanivāraṇam

तब भगवान् इन्द्र ने स्वयं मुझे किरीट दिया, और देवताओं ने शत्रुसेना को रोकने वाला शंख दिया।

श्लोक 47 (4.43.47)

अहं पारे समुद्रस्य हिरण्यपुरवासिनाम् । हत्वा षष्टिं सहस्राणि जयं संप्राप्तवान्रणे ॥

ahaṃ pāre samudrasya hiraṇyapuravāsinām | hatvā ṣaṣṭiṃ sahasrāṇi jayaṃ saṃprāptavānraṇe

समुद्र के पार मैंने हिरण्यपुर के साठ हज़ार निवासियों को मारकर युद्ध में विजय पाई।

श्लोक 48 (4.43.48)

असंभ्रान्तो रथे तिष्ठन्सहस्रेषु शतेषु च । शत्रुमध्ये दुराधर्षो न मुह्यन्ति च मे दिशः ॥

asaṃbhrānto rathe tiṣṭhansahasreṣu śateṣu ca | śatrumadhye durādharṣo na muhyanti ca me diśaḥ

सैकड़ों और हज़ारों के बीच भी मैं रथ पर अविचल खड़ा रहता हूँ; शत्रुओं के बीच मुझे कोई दबा नहीं सकता और मुझे दिशाओं का भ्रम नहीं होता।

श्लोक 49 (4.43.49)

अहं गन्धर्वराजेन ह्रियमाणं सुयोधनम् । भ्रातृभिः सहितं तात गन्धर्वैः समरे जितम् । चतुर्दश सहस्राणि हत्वा चैनममोचयम् ॥

ahaṃ gandharvarājena hriyamāṇaṃ suyodhanam | bhrātṛbhiḥ sahitaṃ tāta gandharvaiḥ samare jitam | caturdaśa sahasrāṇi hatvā cainamamocayam

वत्स, जब गन्धर्वों ने युद्ध में सुयोधन को उसके भाइयों सहित जीत लिया था और गन्धर्वराज उसे ले जा रहा था, तब मैंने चौदह हज़ार गन्धर्वों को मारकर उसे छुड़ाया था।

श्लोक 50 (4.43.50)

एतानि मम नामानि योऽहन्यहनि कीर्तयेत् । तं न पश्यन्ति सत्त्वानि न तं निघ्नन्ति शत्रवः ॥

etāni mama nāmāni yo'hanyahani kīrtayet | taṃ na paśyanti sattvāni na taṃ nighnanti śatravaḥ

जो मेरे इन नामों का प्रतिदिन कीर्तन करता है, उसे कोई प्राणी देख नहीं पाते और शत्रु उसे मार नहीं सकते।

श्लोक 51 (4.43.51)

अद्य पश्य महाबाहो मम वीर्यं सुदुःसहम् । मा भैर्विगतसंत्रासः कुरूनेतान्समागतान् ॥

adya paśya mahābāho mama vīryaṃ suduḥsaham | mā bhairvigatasaṃtrāsaḥ kurūnetānsamāgatān

हे महाबाहु, आज मेरा अत्यन्त दुःसह पराक्रम देखो। डरो मत; इन एकत्र हुए कौरवों से निर्भय हो जाओ।

श्लोक 52 (4.43.52)

सुयोधनस्य मिषतः कर्णस्य च कृपस्य च । पितामहस्य भीष्मस्य द्रौणेर्द्रोणस्य च स्वयम् । सर्वानेव कुरूञ्जित्वा प्रत्यानेष्यामि ते पशून् ॥

suyodhanasya miṣataḥ karṇasya ca kṛpasya ca | pitāmahasya bhīṣmasya drauṇerdroṇasya ca svayam | sarvāneva kurūñjitvā pratyāneṣyāmi te paśūn

सुयोधन, कर्ण, कृप, पितामह भीष्म, अश्वत्थामा और स्वयं द्रोण के देखते-देखते मैं सब कौरवों को जीतकर तुम्हारे पशु लौटा लाऊँगा।

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