विराट पर्व · अध्याय 45
अर्जुन का वानरध्वज धारण करना और शंखनाद
उत्तर को सारथि बनाकर अर्जुन शमी वृक्ष की प्रदक्षिणा करते हैं, मत्स्य की सिंहध्वजा और भाइयों के आयुध वहीं रख देते हैं, और अपनी दिव्य वानरध्वजा का स्मरण करते हैं, जिसे अग्निदेव रथ पर उतार देते हैं। वे उत्तर दिशा में कौरव सेना की ओर बढ़ते हैं और पूरी शक्ति से देवदत्त शंख बजाते हैं; घोड़े धरती पर गिर पड़ते हैं और उत्तर रथ में दुबक जाता है। अर्जुन उसे डाँटकर ढाढ़स बँधाते हैं; उत्तर मान लेता है कि उसने ऐसे शब्द न कभी सुने, न ऐसी ध्वजा देखी। अर्जुन उसे सँभलकर बैठने को कहकर फिर शंख बजाते हैं, और शंख, रथ तथा गाण्डीव के घोष से पृथ्वी काँप उठती है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.45.1)
उत्तरं सारथिं कृत्वा शमीं कृत्वा प्रदक्षिणम् । आयुधं सर्वमादाय ततः प्रायाद्धनञ्जयः ॥
uttaraṃ sārathiṃ kṛtvā śamīṃ kṛtvā pradakṣiṇam | āyudhaṃ sarvamādāya tataḥ prāyāddhanañjayaḥ
उत्तर को सारथि बनाकर और शमी वृक्ष की प्रदक्षिणा करके, धनञ्जय सब आयुध लेकर चल पड़े।
श्लोक 2 (4.45.2)
ध्वजं च सिंहं मात्स्यस्य भ्रातॄणामायुधानि च । प्रणिधाय शमीमध्ये प्रयातुमुपचक्रमे ॥
dhvajaṃ ca siṃhaṃ mātsyasya bhrātṝṇāmāyudhāni ca | praṇidhāya śamīmadhye prayātumupacakrame
मत्स्यराजकुमार की सिंहध्वजा और अपने भाइयों के आयुधों को शमी वृक्ष के भीतर रखकर वे प्रस्थान को उद्यत हुए।
श्लोक 3 (4.45.3)
ततः काञ्चनलाङ्गूलं ध्वजं वानरलक्षणम् । दिव्यं मायामयं युक्तं विहितं विश्वकर्मणा । मनसा चिन्तयामास प्रसादं पावकस्य च ॥
tataḥ kāñcanalāṅgūlaṃ dhvajaṃ vānaralakṣaṇam | divyaṃ māyāmayaṃ yuktaṃ vihitaṃ viśvakarmaṇā | manasā cintayāmāsa prasādaṃ pāvakasya ca
तब उन्होंने मन में उस ध्वजा का स्मरण किया जिसकी पूँछ स्वर्णमयी थी और जिस पर वानर का चिह्न था — दिव्य, मायामयी, विश्वकर्मा द्वारा निर्मित — और अग्निदेव की कृपा का भी चिन्तन किया।
श्लोक 4 (4.45.4)
स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा ध्वजे भूतान्ययोजयत् । रथे वानरमुच्छ्रित्य गाण्डीवं व्याक्षिपद्धनुः ॥
sa ca taccintitaṃ jñātvā dhvaje bhūtānyayojayat | rathe vānaramucchritya gāṇḍīvaṃ vyākṣipaddhanuḥ
उनके चिन्तन को जानकर अग्निदेव ने ध्वजा पर भूतों को नियुक्त कर दिया; और रथ पर वानरध्वज ऊँचा करके अर्जुन ने गाण्डीव धनुष खींचा।
श्लोक 5 (4.45.5)
सपताकं विचित्राङ्गं सोपासङ्गं महाबलम् । खात्पपात रथे तूर्णं दिव्यरूपं मनोरमम् ॥
sapatākaṃ vicitrāṅgaṃ sopāsaṅgaṃ mahābalam | khātpapāta rathe tūrṇaṃ divyarūpaṃ manoramam
पताका से युक्त, विचित्र अंगों वाली, तूणीरों से सम्पन्न, महाबली, दिव्य रूप वाली और मनोहर वह ध्वजा शीघ्र ही आकाश से रथ पर आ उतरी।
श्लोक 6 (4.45.6)
रथमास्थाय बीभत्सुः कौन्तेयः श्वेतवाहनः । बद्धासिः सतलत्राणः प्रगृहीतशरासनः । ततः प्रायादुदीचीं स कपिप्रवरकेतनः ॥
rathamāsthāya bībhatsuḥ kaunteyaḥ śvetavāhanaḥ | baddhāsiḥ satalatrāṇaḥ pragṛhītaśarāsanaḥ | tataḥ prāyādudīcīṃ sa kapipravaraketanaḥ
उस रथ पर चढ़कर श्वेत अश्वों वाले कुन्तीपुत्र बीभत्सु तलवार बाँधे, तलत्राण पहने और धनुष हाथ में लिए, श्रेष्ठ वानर की ध्वजा के साथ उत्तर दिशा की ओर चल पड़े।
श्लोक 7 (4.45.7)
सैन्याभ्याशं स संप्राप्य गृहीत्वा शङ्खमुत्तमम् । स्वनवन्तं महाशब्दं देवदत्तं धनञ्जयः । शशाङ्करूपं बीभत्सुः प्राध्मापयदरिंदमः ॥
sainyābhyāśaṃ sa saṃprāpya gṛhītvā śaṅkhamuttamam | svanavantaṃ mahāśabdaṃ devadattaṃ dhanañjayaḥ | śaśāṅkarūpaṃ bībhatsuḥ prādhmāpayadariṃdamaḥ
सेना के निकट पहुँचकर धनञ्जय ने अपना उत्तम, गूँजने वाला, महाघोष करने वाला, चन्द्रमा के समान श्वेत देवदत्त शंख उठाया, और शत्रुदमन बीभत्सु ने उसे बजाया।
श्लोक 8 (4.45.8)
शशाङ्ककुन्दधवलं मुखे निक्षिप्य वासविः । उच्छ्वसद्गण्डयुगलं सिराल्याचितफालकम् ॥
śaśāṅkakundadhavalaṃ mukhe nikṣipya vāsaviḥ | ucchvasadgaṇḍayugalaṃ sirālyācitaphālakam
चन्द्रमा और कुन्द के समान श्वेत शंख को मुख से लगाकर इन्द्रपुत्र ने उसे बजाया — उनके दोनों गाल फूल उठे, ललाट पर नसों की पंक्तियाँ उभर आईं,
श्लोक 9 (4.45.9)
आरक्तनिम्ननयनं ह्रस्वस्थूलशिरोधरम् । अतिश्लिष्टोदरोरस्कं तिर्यगाननशोभितम् ॥
āraktanimnanayanaṃ hrasvasthūlaśirodharam | atiśliṣṭodaroraskaṃ tiryagānanaśobhitam
आँखें लाल होकर भीतर धँस गईं, गर्दन छोटी और मोटी हो गई, पेट और छाती कसकर सिमट गए, और तिरछा मुख दमक उठा;
श्लोक 10 (4.45.10)
यावत्स्वशक्तिसामग्र्यं त्रैलोक्यं क्षोभयन्निव । मरुद्भिर्दशभिश्चैव प्राध्मापयदरिंदमः ॥
yāvatsvaśaktisāmagryaṃ trailokyaṃ kṣobhayanniva | marudbhirdaśabhiścaiva prādhmāpayadariṃdamaḥ
अपनी पूरी शक्ति लगाकर, मानो तीनों लोकों को क्षुब्ध करते हुए, उन शत्रुदमन ने दसों प्राणवायुओं से उसे फूँका।
श्लोक 11 (4.45.11)
शङ्खशब्दोस्य सोत्यर्थं श्रूयते कालमेघवत् ॥
śaṅkhaśabdosya sotyarthaṃ śrūyate kālameghavat
उनके शंख का शब्द प्रलयकाल के मेघ के समान अत्यन्त भीषण सुनाई दिया।
श्लोक 12 (4.45.12)
तस्य शङ्खस्य शब्देन धनुषो निस्वनेन च । वानरस्य निनादेन रथनेमिस्वनेन च । जङ्गमस्य भयं घोरमकरोत्पाकशासनिः ॥
tasya śaṅkhasya śabdena dhanuṣo nisvanena ca | vānarasya ninādena rathanemisvanena ca | jaṅgamasya bhayaṃ ghoramakarotpākaśāsaniḥ
उस शंख के शब्द, धनुष की टंकार, वानर की गर्जना और रथ के पहियों की घरघराहट से इन्द्रपुत्र ने सब जीवों के मन में भयंकर भय उत्पन्न कर दिया।
श्लोक 13 (4.45.13)
शङ्खशब्देन पार्थस्य मुखेनाश्वाः पतन्क्षितौ । उत्तरश्चापि संत्रस्तो रथोपस्थ उपाविशत् ॥
śaṅkhaśabdena pārthasya mukhenāśvāḥ patankṣitau | uttaraścāpi saṃtrasto rathopastha upāviśat
पार्थ के शंखनाद से घोड़े मुँह के बल धरती पर गिर पड़े, और उत्तर भी भयभीत होकर रथ के भीतर बैठ गया।
श्लोक 14 (4.45.14)
अथाश्वान्रश्मिभिः पार्थः समुद्यम्य परंतपः । अभ्राजत रथोपस्थे भानुर्मेराविवोत्तरे ॥
athāśvānraśmibhiḥ pārthaḥ samudyamya paraṃtapaḥ | abhrājata rathopasthe bhānurmerāvivottare
तब शत्रुतापन पार्थ ने लगाम खींचकर घोड़ों को उठाया और रथ पर ऐसे शोभित हुए जैसे उत्तर में मेरु पर्वत पर सूर्य।
श्लोक 15 (4.45.15)
शङ्खघोषेण वित्रस्तं ज्याघातेन च मूर्छितम् । उत्तरं संपरिष्वज्य समाश्वासयदर्जुनः ॥
śaṅkhaghoṣeṇa vitrastaṃ jyāghātena ca mūrchitam | uttaraṃ saṃpariṣvajya samāśvāsayadarjunaḥ
शंख की ध्वनि से भयभीत और प्रत्यंचा के आघात से मूर्च्छित उत्तर को अर्जुन ने गले लगाकर ढाढ़स बँधाया —
अर्जुन उवाच
श्लोक 16 (4.45.16)
मा भैस्त्वं राजपुत्राग्र्य क्षत्रियोसि परन्तप । कथं पुरुषशार्दूल शत्रुमध्ये विषीदसि ॥
mā bhaistvaṃ rājaputrāgrya kṣatriyosi parantapa | kathaṃ puruṣaśārdūla śatrumadhye viṣīdasi
हे राजकुमारों में श्रेष्ठ, डरो मत; हे शत्रुतापन, तुम क्षत्रिय हो। हे पुरुषसिंह, शत्रुओं के बीच तुम विषाद में कैसे पड़ गए?
श्लोक 17 (4.45.17)
श्रुतास्ते शङ्खशब्दाश्च भेरीशब्दाश्च सर्वशः । कुञ्जराणां च निनदा व्यूढानीकेषु नित्यशः ॥
śrutāste śaṅkhaśabdāśca bherīśabdāśca sarvaśaḥ | kuñjarāṇāṃ ca ninadā vyūḍhānīkeṣu nityaśaḥ
तुमने सब ओर शंखों और भेरियों के शब्द सुने हैं, और व्यूह में खड़ी सेनाओं के बीच हाथियों की चिंघाड़ भी बार-बार सुनी है।
श्लोक 18 (4.45.18)
स त्वं कथमिवानेन शङ्खशब्देन भीषितः । विषण्णरूपो वित्रस्तः पुरुषः प्राकृतो यथा ॥
sa tvaṃ kathamivānena śaṅkhaśabdena bhīṣitaḥ | viṣaṇṇarūpo vitrastaḥ puruṣaḥ prākṛto yathā
फिर तुम इस शंखध्वनि से कैसे डर गए, और किसी साधारण मनुष्य की भाँति उदास और भयभीत हो गए?
उत्तर उवाच
श्लोक 19 (4.45.19)
श्रुता मे शङ्खशब्दाश्च भेरीशब्दाश्च नित्यशः । कुञ्जराणां च निनदा व्यूढानीकेषु तिष्ठतः ॥
śrutā me śaṅkhaśabdāśca bherīśabdāśca nityaśaḥ | kuñjarāṇāṃ ca ninadā vyūḍhānīkeṣu tiṣṭhataḥ
मैंने शंखों और भेरियों के शब्द अनेक बार सुने हैं, और व्यूह में खड़ी सेनाओं के बीच खड़े रहकर हाथियों की चिंघाड़ भी सुनी है;
श्लोक 20 (4.45.20)
नैवंविधाः शङ्खशब्दाः पुरा जातु मया श्रुताः । ध्वजस्य चापि रूपं मे दृष्टपूर्वं नहीदृशम् । धनुषश्चापि घोषश्च श्रुतपूर्वो न मे क्वचित् ॥
naivaṃvidhāḥ śaṅkhaśabdāḥ purā jātu mayā śrutāḥ | dhvajasya cāpi rūpaṃ me dṛṣṭapūrvaṃ nahīdṛśam | dhanuṣaścāpi ghoṣaśca śrutapūrvo na me kvacit
पर ऐसे शंखनाद मैंने पहले कभी नहीं सुने, न ऐसी ध्वजा का रूप पहले कभी देखा, और न धनुष का ऐसा घोष ही कहीं सुना।
श्लोक 21 (4.45.21)
अस्य शङ्खस्य शब्देन धनुषो निस्वनेन च । अमानुषाणां शब्देन भूतानां निस्वनेन च । रथनेमिप्रणादेन मनो मे मुह्यते भृशम् ॥
asya śaṅkhasya śabdena dhanuṣo nisvanena ca | amānuṣāṇāṃ śabdena bhūtānāṃ nisvanena ca | rathanemipraṇādena mano me muhyate bhṛśam
इस शंख के शब्द, धनुष की टंकार, अमानवीय प्राणियों के कोलाहल, भूतों के नाद और रथ के पहियों की घरघराहट से मेरा मन अत्यन्त मोहित हो रहा है।
श्लोक 22 (4.45.22)
व्याकुलाश्च दिशः सर्वा हृदयं व्यथतीव च । ध्वजेन पिहिताः सर्वा दिशो न प्रतिभान्ति मे । गाण्डीवस्य च शब्देन कर्णौ मे बधिरीकृतौ ॥
vyākulāśca diśaḥ sarvā hṛdayaṃ vyathatīva ca | dhvajena pihitāḥ sarvā diśo na pratibhānti me | gāṇḍīvasya ca śabdena karṇau me badhirīkṛtau
सब दिशाएँ व्याकुल हो गई हैं और मेरा हृदय मानो काँप रहा है; ध्वजा से ढकी होने के कारण मुझे कोई दिशा दिखाई नहीं देती, और गाण्डीव की ध्वनि से मेरे दोनों कान बहरे हो गए हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (4.45.23)
पुनर्ध्वजं पुनः शङ्खं धनुश्चैव पुनः पुनः । स मूढचेता वैराटिरर्जुनं समुदैक्षत ॥
punardhvajaṃ punaḥ śaṅkhaṃ dhanuścaiva punaḥ punaḥ | sa mūḍhacetā vairāṭirarjunaṃ samudaikṣata
मूढ़चित्त विराटपुत्र बार-बार कभी ध्वजा को, कभी शंख को, कभी धनुष को, और कभी अर्जुन को देखता रहा।
श्लोक 24 (4.45.24)
स मुहूर्तं प्रयातं तु पार्थो वैराटिमब्रवीत् ॥
sa muhūrtaṃ prayātaṃ tu pārtho vairāṭimabravīt
थोड़ी देर आगे बढ़ने पर पार्थ ने विराटपुत्र से कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 25 (4.45.25)
स्थिरो भव महाबाहो संज्ञां चात्मानमानय । एकान्ते रथमास्थाय पद्भ्यां त्वमवपीड्य च । दृढं च रश्मीन्संयच्छ शङ्खं ध्मास्याम्यहं पुनः ॥
sthiro bhava mahābāho saṃjñāṃ cātmānamānaya | ekānte rathamāsthāya padbhyāṃ tvamavapīḍya ca | dṛḍhaṃ ca raśmīnsaṃyaccha śaṅkhaṃ dhmāsyāmyahaṃ punaḥ
हे महाबाहु, स्थिर हो जाओ, होश सँभालो और अपने-आप को संयत करो। रथ पर एक ओर जमकर बैठो, पैरों से दृढ़ता से दबाव बनाए रखो और लगाम कसकर पकड़ो; मैं फिर शंख बजाऊँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (4.45.26)
एवमुक्त्वा महाबाहुः सव्यसाची परन्तपः । ततः शङ्खमुपाध्मासीद्दारयन्निव पर्वतान् । गुहा गिरीणां च तदा दिशः शैलांस्तथैव च ॥
evamuktvā mahābāhuḥ savyasācī parantapaḥ | tataḥ śaṅkhamupādhmāsīddārayanniva parvatān | guhā girīṇāṃ ca tadā diśaḥ śailāṃstathaiva ca
ऐसा कहकर शत्रुतापन महाबाहु सव्यसाची ने फिर शंख बजाया, मानो पर्वतों को, पहाड़ों की गुफाओं को, दिशाओं को और चट्टानों को भी फाड़ रहे हों।
श्लोक 27 (4.45.27)
ज्याघोषं तलघोषं च कृत्वा भूतान्यमोहयत् । उत्तरश्चापि संलीनो रथोपस्थ उपाविशत् । तं समाश्वासयामास पुनरेव धनञ्जयः ॥
jyāghoṣaṃ talaghoṣaṃ ca kṛtvā bhūtānyamohayat | uttaraścāpi saṃlīno rathopastha upāviśat | taṃ samāśvāsayāmāsa punareva dhanañjayaḥ
प्रत्यंचा की टंकार और तलत्राण की ध्वनि करके उन्होंने सब प्राणियों को मोहित कर दिया। उत्तर भी सिमटकर रथ के भीतर बैठ गया, और धनञ्जय ने उसे फिर से ढाढ़स बँधाया।
श्लोक 28 (4.45.28)
तस्य शङ्खस्य शब्देन रथनेमिस्वनेन च । गाण्डीवस्य च शब्देन पृथिवी समकम्पत ॥
tasya śaṅkhasya śabdena rathanemisvanena ca | gāṇḍīvasya ca śabdena pṛthivī samakampata
उस शंख के शब्द, रथ के पहियों की घरघराहट और गाण्डीव की टंकार से पृथ्वी काँप उठी।