विराट पर्व · अध्याय 67
सम्मोहन अस्त्र और कौरवों के वस्त्रों का हरण
अर्जुन के व्यंग्य से चुभकर दुर्योधन फिर युद्ध के लिए लौटता है, और कर्ण, शकुनि, अश्वत्थामा, भीष्म, द्रोण, कृप, विविंशति तथा दुःशासन उसकी रक्षा के लिए उसे घेर लेते हैं। अर्जुन उनके अस्त्रों का उत्तर इन्द्र के सम्मोहन अस्त्र और शंखनाद से देते हैं, और कौरव योद्धा अचेत हो जाते हैं; उनके कहने पर उत्तर राजकुमारी उत्तरा के लिए उनके वस्त्र और आभूषण उतार लाता है, पर भीष्म से बचकर रहता है, जो अकेले मोहित नहीं हुए। होश में आने पर दुर्योधन अर्जुन को पकड़ने को कहता है, तो भीष्म उसे फटकारते हैं, अर्जुन के संयम की प्रशंसा करते हैं और लौट जाने की सलाह देते हैं; कौरव लौट जाते हैं, अर्जुन बाणों से गुरुजनों को प्रणाम करते हैं, दुर्योधन का मुकुट काट गिराते हैं और उत्तर से विजयी होकर घर लौटने को कहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.67.1)
आहूयमानस्तु स तेन सङ्ख्ये महात्मना वै धृतराष्ट्रपुत्रः । निवर्तितश्चापि गिराङ्कुशेन गजो मदोन्मत्त इवाङ्कुशेन ॥
āhūyamānastu sa tena saṅkhye mahātmanā vai dhṛtarāṣṭraputraḥ | nivartitaścāpi girāṅkuśena gajo madonmatta ivāṅkuśena
उस महात्मा के ललकारने पर धृतराष्ट्रपुत्र उनके वचन रूपी अंकुश से ऐसे लौट पड़ा जैसे मदोन्मत्त हाथी अंकुश से मोड़ा जाता है।
श्लोक 2 (4.67.2)
सोऽमृष्यमाणो वचसाऽभिमृष्टो महारथेनातिरथस्तरस्वी । ततः स पर्याववृते रथेन भोगी यथा पादतलाभिमृष्टः ॥
so'mṛṣyamāṇo vacasā'bhimṛṣṭo mahārathenātirathastarasvī | tataḥ sa paryāvavṛte rathena bhogī yathā pādatalābhimṛṣṭaḥ
उस महारथी के वचनों से चुभा हुआ वह बलवान् अतिरथी यह सहन न कर सका और पैर के तलवे से कुचले गए सर्प की तरह अपने रथ सहित पलट पड़ा।
श्लोक 3 (4.67.3)
ततो दुर्योधनः क्रुद्धो विक्षिपन्धनुरुत्तमम् । धृतिं कृत्वा सुविपुलां प्रत्युवाच धनञ्जयम् ॥
tato duryodhanaḥ kruddho vikṣipandhanuruttamam | dhṛtiṃ kṛtvā suvipulāṃ pratyuvāca dhanañjayam
तब क्रुद्ध दुर्योधन ने अपना उत्तम धनुष हिलाते हुए पूरा धैर्य जुटाकर धनञ्जय को उत्तर दिया:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 4 (4.67.4)
सोऽहमिन्द्रादभिक्रुद्धान्न बिभेमीह भारत । भुक्त्वा सुविपुलं राज्यं वित्तानि च सुखानि च । किमर्थं युद्धसमये पलायिष्ये नरोत्तम ॥
so'hamindrādabhikruddhānna bibhemīha bhārata | bhuktvā suvipulaṃ rājyaṃ vittāni ca sukhāni ca | kimarthaṃ yuddhasamaye palāyiṣye narottama
"हे भारत, मैं क्रुद्ध इन्द्र से भी नहीं डरता। विशाल राज्य, धन और सुखों का भोग कर लेने के बाद, हे नरश्रेष्ठ, युद्ध के समय मैं क्यों भागूँगा?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (4.67.5)
एवमुक्त्वा महाराजः प्रत्ययुध्यत भारत । संन्यवर्तत शीघ्राश्वस्तोत्रार्दित इव द्विपः ॥
evamuktvā mahārājaḥ pratyayudhyata bhārata | saṃnyavartata śīghrāśvastotrārdita iva dvipaḥ
हे भारत, ऐसा कहकर वह महाराज पलटकर लड़ने लगा; तेज़ घोड़ों वाला वह अंकुश से पीड़ित हाथी की तरह लौट पड़ा।
श्लोक 6 (4.67.6)
आक्रान्तभोगस्तेजस्वी धनुर्वक्र इवोरगः । रथं रथेन संगम्य योधयामास पाण्डवम् ॥
ākrāntabhogastejasvī dhanurvakra ivoragaḥ | rathaṃ rathena saṃgamya yodhayāmāsa pāṇḍavam
जिसकी कुण्डली दबा दी गई हो और जो धनुष की तरह टेढ़ा हो उठा हो, ऐसे सर्प के समान तेजस्वी दुर्योधन ने रथ से रथ भिड़ाकर पाण्डुपुत्र से युद्ध किया।
श्लोक 7 (4.67.7)
तं प्रेक्ष्य कर्णः परिवर्तमानं निवृत्य संस्तम्भितसर्वगात्रम् । दुर्योधनं दक्षिणतोऽन्वरक्षत्पार्थान्महाबाहुरधिज्यधन्वा ॥
taṃ prekṣya karṇaḥ parivartamānaṃ nivṛtya saṃstambhitasarvagātram | duryodhanaṃ dakṣiṇato'nvarakṣatpārthānmahābāhuradhijyadhanvā
उसे लौटते देखकर कर्ण भी अपने सब अंगों को सँभालकर लौट पड़ा, और धनुष चढ़ाए उस महाबाहु ने दाहिनी ओर से पार्थ के विरुद्ध दुर्योधन की रक्षा की।
श्लोक 8 (4.67.8)
गान्धारराजः शकुनिर्निवृत्य द्रौणिश्च सर्वास्त्रविदां वरिष्ठः । ररक्षतुः कौरवमभ्युपेत्य पार्थान्नृवीरौ युधि सव्यतश्च ॥
gāndhārarājaḥ śakunirnivṛtya drauṇiśca sarvāstravidāṃ variṣṭhaḥ | rarakṣatuḥ kauravamabhyupetya pārthānnṛvīrau yudhi savyataśca
गान्धारराज शकुनि और सब अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ द्रोणपुत्र भी लौट पड़े; उन दोनों वीरों ने कौरव के पास आकर युद्ध में बाईं ओर से पार्थ के विरुद्ध उसकी रक्षा की।
श्लोक 9 (4.67.9)
भीष्मस्ततः शान्तनवो विवृत्य हिरण्यकक्ष्यांस्त्वरया तुरंगान् । दुर्योधनं पश्चिमतो ररक्ष पार्थान्महाबाहुरधिज्यधन्वा ॥
bhīṣmastataḥ śāntanavo vivṛtya hiraṇyakakṣyāṃstvarayā turaṃgān | duryodhanaṃ paścimato rarakṣa pārthānmahābāhuradhijyadhanvā
तब शान्तनुपुत्र भीष्म ने सुनहरी पेटियों वाले अपने घोड़ों को शीघ्रता से मोड़ा, और धनुष चढ़ाए उस महाबाहु ने पीछे की ओर से पार्थ के विरुद्ध दुर्योधन की रक्षा की।
श्लोक 10 (4.67.10)
द्रोणः कृपश्चैव विविंशतिश्च दुःशासनश्चैव निवृत्य शीघ्रम् । सर्वे पुरस्तात्प्रणिधाय बाणान्दुर्योधनार्थं त्वरिताऽभ्युपेयुः ॥
droṇaḥ kṛpaścaiva viviṃśatiśca duḥśāsanaścaiva nivṛtya śīghram | sarve purastātpraṇidhāya bāṇānduryodhanārthaṃ tvaritā'bhyupeyuḥ
द्रोण, कृप, विविंशति और दुःशासन भी शीघ्र लौट पड़े, और सब आगे की ओर बाण साधकर दुर्योधन की रक्षा के लिए तेज़ी से आ पहुँचे।
श्लोक 11 (4.67.11)
सर्वाण्यनीकानि निवर्तितानि संप्रेक्ष्य पूर्णौघनिभानि पार्थः । हंसो महामेघमिवापतन्तं धनञ्जयः प्रत्यपतत्तरस्वी ॥
sarvāṇyanīkāni nivartitāni saṃprekṣya pūrṇaughanibhāni pārthaḥ | haṃso mahāmeghamivāpatantaṃ dhanañjayaḥ pratyapatattarasvī
सारी सेनाओं को उमड़ती बाढ़ की तरह लौटते देखकर बलवान् पार्थ धनञ्जय उन पर ऐसे झपटे जैसे हंस सामने आते महामेघ की ओर उड़ता है।
श्लोक 12 (4.67.12)
ते सर्वतः संपरिवार्य पार्थमस्त्राणि दिव्यानि समाददानाः । ववर्षुरभ्येत्य शरैः समग्रैर्मेघा यथा भूधरमम्बुवेगैः ॥
te sarvataḥ saṃparivārya pārthamastrāṇi divyāni samādadānāḥ | vavarṣurabhyetya śaraiḥ samagrairmeghā yathā bhūdharamambuvegaiḥ
उन्होंने चारों ओर से पार्थ को घेरकर दिव्य अस्त्र उठाए और पास आकर उन पर पूरे वेग से बाणों की ऐसी वर्षा की जैसे मेघ पर्वत पर जल की धाराएँ बरसाते हैं।
श्लोक 13 (4.67.13)
ततोऽस्त्रमस्त्रेण निवार्य तेषां गाण्डीवधन्वा कुरुपुङ्गवानाम् । संमोहनं शत्रुसहोऽन्यदस्त्रं प्रादुश्चकारैन्द्रमवारणीयम् ॥
tato'stramastreṇa nivārya teṣāṃ gāṇḍīvadhanvā kurupuṅgavānām | saṃmohanaṃ śatrusaho'nyadastraṃ prāduścakāraindramavāraṇīyam
तब हर शत्रु को सहने में समर्थ गाण्डीवधारी ने अपने अस्त्रों से उन कुरुश्रेष्ठों के अस्त्रों को रोक दिया और एक दूसरा अस्त्र प्रकट किया, इन्द्र का अनिवार्य सम्मोहन अस्त्र।
श्लोक 14 (4.67.14)
ततो दिशश्चानुदिशो निवार्य शरैः सुघोरैर्निशितैः सुपुङ्खैः । गाण्डीवशब्देन मनांसि तेषां महाबलं प्रव्यथयांचकार ॥
tato diśaścānudiśo nivārya śaraiḥ sughorairniśitaiḥ supuṅkhaiḥ | gāṇḍīvaśabdena manāṃsi teṣāṃ mahābalaṃ pravyathayāṃcakāra
फिर भयंकर, पैने और सुन्दर पंखों वाले बाणों से दिशाओं और उपदिशाओं को रोककर उन्होंने गाण्डीव की टंकार से बड़े वेग से उनके मन को व्याकुल कर दिया।
श्लोक 15 (4.67.15)
ततः पुनर्भीमरवं निगृह्य दोर्भ्यां महाशङ्खमुदारघोषम् । व्यनादयत्संप्रदिशो दिशः खं भुवं च पार्थो द्विषतां निहन्ता ॥
tataḥ punarbhīmaravaṃ nigṛhya dorbhyāṃ mahāśaṅkhamudāraghoṣam | vyanādayatsaṃpradiśo diśaḥ khaṃ bhuvaṃ ca pārtho dviṣatāṃ nihantā
तब शत्रुओं का संहार करने वाले पार्थ ने दोनों हाथों में भयानक गम्भीर ध्वनि वाला अपना महाशंख उठाया और दिशाओं, उपदिशाओं, आकाश और पृथ्वी को गुँजा दिया।
श्लोक 16 (4.67.16)
संमोहनास्त्रप्रभवैः शरौघैर्विनष्टदेहाश्च निपत्य योधाः । निःसत्ववेगाः कुरुराजसैन्याः कुड्योपमास्तस्थुरनीहमानाः ॥
saṃmohanāstraprabhavaiḥ śaraughairvinaṣṭadehāśca nipatya yodhāḥ | niḥsatvavegāḥ kururājasainyāḥ kuḍyopamāstasthuranīhamānāḥ
सम्मोहन अस्त्र से उत्पन्न बाणों की बौछारों से योद्धा ऐसे गिर पड़े मानो उनके शरीर नष्ट हो गए हों; कुरुराज की सेनाएँ बल और वेग से रहित होकर दीवारों की तरह निश्चेष्ट खड़ी रह गईं।
श्लोक 17 (4.67.17)
ते शङ्खनादेन कुरुप्रवीराः संमोहिताः पार्थसमीरितेन । उत्सृज्य चापानि दुरासदानि सर्वे तदा मोहपरा बभूवुः ॥
te śaṅkhanādena kurupravīrāḥ saṃmohitāḥ pārthasamīritena | utsṛjya cāpāni durāsadāni sarve tadā mohaparā babhūvuḥ
पार्थ के बजाए शंख के नाद से मोहित होकर सब कुरुवीरों ने अपने दुर्जय धनुष छोड़ दिए और मोह में डूब गए।
श्लोक 18 (4.67.18)
ततो विसंज्ञानि परेषु पार्थः संस्मृत्य संदेशमथोत्तरायाः । निर्याहि वाहादिति मात्स्यपुत्रमुवाच यावत्कुरवो विसंज्ञाः ॥
tato visaṃjñāni pareṣu pārthaḥ saṃsmṛtya saṃdeśamathottarāyāḥ | niryāhi vāhāditi mātsyaputramuvāca yāvatkuravo visaṃjñāḥ
शत्रुओं को अचेत देखकर पार्थ को राजकुमारी उत्तरा का अनुरोध याद आया और उन्होंने मत्स्यराज के पुत्र से कहा, "जब तक कौरव अचेत हैं, तब तक रथ से उतरकर जाओ।
अर्जुन उवाच
श्लोक 19 (4.67.19)
आचार्यशारद्वतयोः सुशुक्ले कर्णस्य पीतं रुचिरं च वस्त्रम् । द्रौणेश्च राज्ञश्च तथैव नीले वस्त्रे समादत्स्व नरप्रवीर ॥
ācāryaśāradvatayoḥ suśukle karṇasya pītaṃ ruciraṃ ca vastram | drauṇeśca rājñaśca tathaiva nīle vastre samādatsva narapravīra
हे नरवीर, आचार्य (द्रोण) और कृप के उजले श्वेत वस्त्र, कर्ण का सुन्दर पीला वस्त्र, और द्रोणपुत्र तथा राजा के दोनों नीले वस्त्र ले आओ।
श्लोक 20 (4.67.20)
भीष्मस्य संज्ञां तु तथैव मन्ये जानाति मेऽस्त्रप्रतिघातमेषः । एतस्य वाहान्कुरु सव्यतस्त्वमेवं प्रयातव्यममूढसंज्ञैः ॥
bhīṣmasya saṃjñāṃ tu tathaiva manye jānāti me'strapratighātameṣaḥ | etasya vāhānkuru savyatastvamevaṃ prayātavyamamūḍhasaṃjñaiḥ
मैं समझता हूँ कि भीष्म सचेत हैं, क्योंकि वे मेरे अस्त्र का प्रतिकार जानते हैं। उनके घोड़ों को अपनी बाईं ओर रखो; जिसकी चेतना न गई हो, उसके पास से ऐसे ही निकलना चाहिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (4.67.21)
रश्मीन्समुत्सृज्य ततो महात्मा रथादवप्लुत्य विराटपुत्रः । वस्त्राण्युपादाय महारथानां नानाविधान्यद्भुतवर्णकानि ॥
raśmīnsamutsṛjya tato mahātmā rathādavaplutya virāṭaputraḥ | vastrāṇyupādāya mahārathānāṃ nānāvidhānyadbhutavarṇakāni
तब महात्मा विराटपुत्र ने लगाम छोड़ दी, रथ से कूदकर उतरा और महारथियों के अनेक प्रकार के, अद्भुत रंगों वाले वस्त्र ले लिए:
श्लोक 22 (4.67.22)
महान्ति चीनांशुदुकूलकानि पट्टांशुकानि विविधानि मनोज्ञकानि । हारांश्च राज्ञां मणिभूषणानि सुवर्णनिष्काभरणानि मारिष ॥
mahānti cīnāṃśudukūlakāni paṭṭāṃśukāni vividhāni manojñakāni | hārāṃśca rājñāṃ maṇibhūṣaṇāni suvarṇaniṣkābharaṇāni māriṣa
चीनी रेशम और महीन दुकूल के बड़े-बड़े वस्त्र, अनेक प्रकार के मनोहर पट्टवस्त्र, राजाओं के हार और मणियों के आभूषण, तथा स्वर्ण-मुद्राओं के गहने, हे आर्य;
श्लोक 23 (4.67.23)
माणिक्यबाह्वङ्गदकङ्कणानि अन्यानि राज्ञां मणिभूषणानि । वस्त्राण्युपादाय महारथानां तूर्णं पुनः स्वं रथमारुरोह ॥
māṇikyabāhvaṅgadakaṅkaṇāni anyāni rājñāṃ maṇibhūṣaṇāni | vastrāṇyupādāya mahārathānāṃ tūrṇaṃ punaḥ svaṃ rathamāruroha
माणिक्य के बाजूबन्द, अंगद और कंगन, और राजाओं के अन्य मणि-भूषण भी। महारथियों के वस्त्र लेकर वह तुरन्त फिर अपने रथ पर चढ़ गया।
श्लोक 24 (4.67.24)
राज्ञश्च सर्वान्कृतसंनिकाशान्संमोहनास्त्रेण विसंज्ञकल्पान् । नासाग्रविन्यस्तकराङ्गुलीकः पार्थो जहास स्मयमानचेताः ॥
rājñaśca sarvānkṛtasaṃnikāśānsaṃmohanāstreṇa visaṃjñakalpān | nāsāgravinyastakarāṅgulīkaḥ pārtho jahāsa smayamānacetāḥ
सम्मोहन अस्त्र से अचेत हुए सब राजाओं को पुतलों जैसा निश्चेष्ट देखकर पार्थ नाक के अग्रभाग पर अँगुली रखकर मन ही मन मुसकराते हुए हँस पड़े।
श्लोक 25 (4.67.25)
ततोऽन्वशात्तांश्चतुरः सदश्वान्पुत्रो विराटस्य हिरण्यकक्ष्यान् । ते तद्व्यतीयुर्द्विषतामनीकं श्वेता वहन्तोऽर्जुनमाजिमध्यात् ॥
tato'nvaśāttāṃścaturaḥ sadaśvānputro virāṭasya hiraṇyakakṣyān | te tadvyatīyurdviṣatāmanīkaṃ śvetā vahanto'rjunamājimadhyāt
तब विराटपुत्र ने सुनहरी पेटियों वाले उन चार उत्तम घोड़ों को हाँका, और वे श्वेत अश्व अर्जुन को रणभूमि के बीच से निकालकर शत्रुओं की सेना के पार ले गए।
श्लोक 26 (4.67.26)
तथा प्रयान्तं पुरुषप्रवीरं भीष्मः शरैरभ्यहनत्तरस्वी । स चापि भीष्मस्य हयान्निहत्य विव्याध भीष्मं दशभिः पृषत्कैः ॥
tathā prayāntaṃ puruṣapravīraṃ bhīṣmaḥ śarairabhyahanattarasvī | sa cāpi bhīṣmasya hayānnihatya vivyādha bhīṣmaṃ daśabhiḥ pṛṣatkaiḥ
उस नरश्रेष्ठ को जाते देख बलवान् भीष्म ने उन पर बाणों से प्रहार किया; और उन्होंने भी भीष्म के घोड़ों को मारकर दस बाणों से भीष्म को बींध दिया।
श्लोक 27 (4.67.27)
ततोऽर्जुनो भीष्ममपास्य युद्धे विद्ध्वाऽस्य यन्तारमरिष्टधन्वा । तस्थौ विमुक्तो रथवृन्दमध्याद्राहुं विदार्येव सहस्ररश्मिः ॥
tato'rjuno bhīṣmamapāsya yuddhe viddhvā'sya yantāramariṣṭadhanvā | tasthau vimukto rathavṛndamadhyādrāhuṃ vidāryeva sahasraraśmiḥ
तब अचूक धनुष वाले अर्जुन ने भीष्म के सारथि को बींधकर युद्ध में भीष्म को पीछे छोड़ दिया और रथों के समूह से मुक्त होकर ऐसे खड़े हुए जैसे राहु को चीरकर निकला सहस्ररश्मि सूर्य।
श्लोक 28 (4.67.28)
लब्ध्वा तु संज्ञां पुरुषप्रवीरः पार्थं निरीक्ष्याथ महेन्द्रकल्पम् । रणात्प्रमुक्तं पुरुषप्रवीरं स धार्तराष्ट्रस्त्वरितो बभाषे ॥
labdhvā tu saṃjñāṃ puruṣapravīraḥ pārthaṃ nirīkṣyātha mahendrakalpam | raṇātpramuktaṃ puruṣapravīraṃ sa dhārtarāṣṭrastvarito babhāṣe
होश में आने पर वीर धृतराष्ट्रपुत्र ने महेन्द्र के समान पार्थ को रणभूमि से छूटकर खड़े देखा और तुरन्त कहा:
श्लोक 29 (4.67.29)
अयं कथंचिद्भवतो विमुक्तस्तं वै प्रबध्नीत यथा न मुच्येत् । तमब्रवीच्छान्तनवः प्रहस्य क्व ते गता बुद्धिरभूत्क्व वीर्यम् ॥
ayaṃ kathaṃcidbhavato vimuktastaṃ vai prabadhnīta yathā na mucyet | tamabravīcchāntanavaḥ prahasya kva te gatā buddhirabhūtkva vīryam
"यह किसी प्रकार आपसे छूट निकला है; इसे ऐसे पकड़ो कि यह बच न सके।" शान्तनुपुत्र ने हँसकर उससे कहा, "तब तुम्हारी बुद्धि कहाँ चली गई थी, तुम्हारा पराक्रम कहाँ था?
भीष्म उवाच
श्लोक 30 (4.67.30)
शान्तिं परां प्राप्य यथा स्थितस्त्वमुत्सृज्य बाणांश्च धनुश्च चित्रम् । न त्वेव बीभत्सुरलं नृशंसं कर्तुं न पापेऽस्य मनो निविष्टम् ॥
śāntiṃ parāṃ prāpya yathā sthitastvamutsṛjya bāṇāṃśca dhanuśca citram | na tveva bībhatsuralaṃ nṛśaṃsaṃ kartuṃ na pāpe'sya mano niviṣṭam
तुम अपने बाण और सुन्दर धनुष गिराकर पूरी तरह निश्चेष्ट खड़े थे। फिर भी बीभत्सु क्रूर कर्म करने वाले नहीं हैं; उनका मन पाप में नहीं लगता।
श्लोक 31 (4.67.31)
जह्यान्न धर्मं त्रिदिवस्य हेतोः सर्वे तु तस्मान्न हता रणेऽस्मिन् । क्षिप्रं कुरून्याहि कुरुप्रवीर विजित्य गाश्च प्रतियातु पार्थः ॥
jahyānna dharmaṃ tridivasya hetoḥ sarve tu tasmānna hatā raṇe'smin | kṣipraṃ kurūnyāhi kurupravīra vijitya gāśca pratiyātu pārthaḥ
वे स्वर्ग के लिए भी धर्म नहीं छोड़ेंगे; इसी कारण इस युद्ध में तुम सब नहीं मारे गए। हे कुरुवीर, शीघ्र कुरुओं के पास लौट चलो, और पार्थ गौएँ जीतकर लौट जाएँ।
श्लोक 32 (4.67.32)
संमोहनास्त्रप्रतिमोहिताः स्थ यूयं न जानीथ धनापहारम् । पश्यामि वस्त्राभरणानि राजन्विराटपुत्रेण समाहृतानि ॥
saṃmohanāstrapratimohitāḥ stha yūyaṃ na jānītha dhanāpahāram | paśyāmi vastrābharaṇāni rājanvirāṭaputreṇa samāhṛtāni
तुम सब सम्मोहन अस्त्र से मोहित थे और तुम्हें पता भी नहीं चला कि तुम्हारा धन हरा जा रहा है। हे राजन्, मैं देख रहा हूँ कि विराटपुत्र तुम्हारे वस्त्र और आभूषण उठा ले गया है।
श्लोक 33 (4.67.33)
नृपेषु सर्वेषु च मोहितेषु हन्तुं यदीच्छेत्स हनिष्यतीति । तदा तु धर्मात्मतया नृवीरो न चाहनद्वो बलभित्तनूजः ॥
nṛpeṣu sarveṣu ca mohiteṣu hantuṃ yadīcchetsa haniṣyatīti | tadā tu dharmātmatayā nṛvīro na cāhanadvo balabhittanūjaḥ
जब सब राजा मोहित पड़े थे, तब वह जिसे चाहता मार सकता था; फिर भी धर्मात्मा होने के कारण बल-नाशक इन्द्र के उस वीर पुत्र ने तुम्हें नहीं मारा।
श्लोक 34 (4.67.34)
भाग्येन युष्मानवधीन्न पार्थः संधिं कुरूणामनुमन्यमानः । तद्यात यूयं सहसैनिकैस्तैर्हतावशिष्टैर्गजसाह्वयं पुरम् ॥
bhāgyena yuṣmānavadhīnna pārthaḥ saṃdhiṃ kurūṇāmanumanyamānaḥ | tadyāta yūyaṃ sahasainikaistairhatāvaśiṣṭairgajasāhvayaṃ puram
सौभाग्य से पार्थ ने तुम्हें नहीं मारा, क्योंकि वह कौरवों से संधि का पक्षधर है। अतः अब तुम बचे हुए सैनिकों के साथ हस्तिनापुर चले जाओ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 35 (4.67.35)
दुर्योधनस्तस्य निशम्य वाक्यं पितामहस्यात्महितं प्रशस्य । अतीतकामो युधि सोऽत्यमर्षी राजा विनिश्वस्य बभूव तूष्णीम् ॥
duryodhanastasya niśamya vākyaṃ pitāmahasyātmahitaṃ praśasya | atītakāmo yudhi so'tyamarṣī rājā viniśvasya babhūva tūṣṇīm
पितामह के वे वचन सुनकर दुर्योधन ने उन्हें अपने हित का बताकर सराहा; अत्यन्त असहिष्णु, पर युद्ध की इच्छा खो चुका वह राजा लंबी साँस लेकर चुप हो गया।
श्लोक 36 (4.67.36)
तद्भीष्मवाक्यं हि निशम्य सर्वे धनञ्जयाग्निं च विवर्धमानम् । निवर्तनायैव मतिं निदध्युर्दुर्योधनं तं परिरक्षमाणाः ॥
tadbhīṣmavākyaṃ hi niśamya sarve dhanañjayāgniṃ ca vivardhamānam | nivartanāyaiva matiṃ nidadhyurduryodhanaṃ taṃ parirakṣamāṇāḥ
भीष्म के वचन सुनकर और धनञ्जय रूपी अग्नि को बढ़ते देखकर सबने लौटने का ही निश्चय किया और वे दुर्योधन की रक्षा करते हुए चल पड़े।
श्लोक 37 (4.67.37)
तान्प्रस्थितान्प्रीतमनाः समर्थो धनञ्जयः सर्वकुरुप्रवीरः । आमन्त्र्य वीरोऽनुययौ मुहूर्तं गाण्डीवघोषेण विनद्य लोकम् ॥
tānprasthitānprītamanāḥ samartho dhanañjayaḥ sarvakurupravīraḥ | āmantrya vīro'nuyayau muhūrtaṃ gāṇḍīvaghoṣeṇa vinadya lokam
उन्हें जाते देखकर प्रसन्नचित्त, सामर्थ्यवान्, सब कुरुओं में श्रेष्ठ वीर धनञ्जय उनसे विदा लेते हुए थोड़ी दूर उनके पीछे चले और गाण्डीव की टंकार से लोक को गुँजा दिया।
श्लोक 38 (4.67.38)
तेषामनीकानि निरीक्ष्य पार्थो विकीर्णयानध्वजकार्मुकाणि । गाण्डीवधन्वा प्रहसन्कुरूणां शङ्खं प्रदध्मौ बलवान्बलेन ॥
teṣāmanīkāni nirīkṣya pārtho vikīrṇayānadhvajakārmukāṇi | gāṇḍīvadhanvā prahasankurūṇāṃ śaṅkhaṃ pradadhmau balavānbalena
कौरवों की सेनाओं को, जिनके रथ, ध्वज और धनुष बिखरे पड़े थे, देखकर बलवान् गाण्डीवधारी ने हँसते हुए पूरी शक्ति से शंख बजाया।
श्लोक 39 (4.67.39)
ते शङ्खशब्दं तुमुलं निशम्य ध्वजस्य शब्दं च ततोऽन्तरिक्षे । गाण्डीवशब्देन मुहुर्मुहुस्ते भीता ययुः सर्वधनं विहाय ॥
te śaṅkhaśabdaṃ tumulaṃ niśamya dhvajasya śabdaṃ ca tato'ntarikṣe | gāṇḍīvaśabdena muhurmuhuste bhītā yayuḥ sarvadhanaṃ vihāya
शंख की प्रचण्ड ध्वनि, आकाश में ध्वज की गर्जना और बार-बार गाण्डीव की टंकार सुनकर वे भयभीत होकर सारा धन छोड़कर भाग गए।
श्लोक 40 (4.67.40)
तानर्जुनो दूरतरं विभज्य धनं च सर्वं निखिलं निवर्त्य । आपृच्छ्य तान्दूरमनुप्रयात्वा धनञ्जयस्तत्र कुरून्महात्मा । गुरूंश्च सर्वानभिवाद्य बाणैर्न्यवर्ततोदग्रमनाः शरैः सह ॥
tānarjuno dūrataraṃ vibhajya dhanaṃ ca sarvaṃ nikhilaṃ nivartya | āpṛcchya tāndūramanuprayātvā dhanañjayastatra kurūnmahātmā | gurūṃśca sarvānabhivādya bāṇairnyavartatodagramanāḥ śaraiḥ saha
अर्जुन ने उन्हें दूर तक खदेड़ दिया और सारा धन पूरा का पूरा लौटा लिया; फिर महात्मा धनञ्जय दूर तक कौरवों के पीछे जाकर उनसे विदा लेते हुए, वहाँ सब गुरुजनों को बाणों से प्रणाम करके, उत्साह भरे मन से अपने बाणों के साथ लौट पड़े।
श्लोक 41 (4.67.41)
पितामहं शान्तनवं महात्मा द्वाभ्यां शराभ्यामभिवाद्य वीरः । द्रोणं कृपं चैव कुरूंश्च मान्याञ्शरैश्च सर्वानभिवाद्य सङ्ख्ये । दुर्योधनस्योत्तमरत्नचित्रं चिच्छेद पार्थो मकुटं शरौघैः ॥
pitāmahaṃ śāntanavaṃ mahātmā dvābhyāṃ śarābhyāmabhivādya vīraḥ | droṇaṃ kṛpaṃ caiva kurūṃśca mānyāñśaraiśca sarvānabhivādya saṅkhye | duryodhanasyottamaratnacitraṃ ciccheda pārtho makuṭaṃ śaraughaiḥ
महात्मा वीर ने दो बाणों से शान्तनुपुत्र पितामह को प्रणाम किया; और युद्धभूमि में द्रोण, कृप तथा सब माननीय कौरवों को बाणों से प्रणाम करके पार्थ ने बाणों की बौछार से दुर्योधन का उत्तम रत्नों से जड़ा मुकुट काट दिया।
श्लोक 42 (4.67.42)
अराजवंशस्य किमर्थमेतन्नित्यं न धार्यं मकुटं त्वयेति । संपातितं भूमितले सरत्नं प्रीतस्ततो मात्स्यसुतो बभूव ॥
arājavaṃśasya kimarthametannityaṃ na dhāryaṃ makuṭaṃ tvayeti | saṃpātitaṃ bhūmitale saratnaṃ prītastato mātsyasuto babhūva
"जो राजवंश का नहीं, वह यह मुकुट सदा क्यों पहने? यह तुम्हारे धारण करने योग्य नहीं," उन्होंने कहा। और जब रत्नों सहित वह मुकुट भूमि पर गिरा दिया गया, तब मत्स्यराजकुमार प्रसन्न हो उठा।
श्लोक 43 (4.67.43)
धनञ्जयं नागमिव प्रभिन्नं विजित्य शत्रून्परिवर्तमानम् । गास्ता विजित्याभिमुखं प्रयान्तं न शक्नुवन्तः कुरवः प्रयाताः ॥
dhanañjayaṃ nāgamiva prabhinnaṃ vijitya śatrūnparivartamānam | gāstā vijityābhimukhaṃ prayāntaṃ na śaknuvantaḥ kuravaḥ prayātāḥ
शत्रुओं को जीतकर मदमत्त हाथी की तरह लौटते और गौएँ जीतकर घर की ओर जाते धनञ्जय का सामना न कर सकने के कारण कौरव चले गए।
श्लोक 44 (4.67.44)
धनञ्जयं सिंहमिवात्तशस्त्रं गा वै विजित्याभिमुखं प्रयान्तम् । उदीक्षितुं पार्थिवास्ते न शेकुर्यथैव मध्याह्नगतं हि सूर्यम् ॥
dhanañjayaṃ siṃhamivāttaśastraṃ gā vai vijityābhimukhaṃ prayāntam | udīkṣituṃ pārthivāste na śekuryathaiva madhyāhnagataṃ hi sūryam
शस्त्र लिए सिंह के समान, गौएँ जीतकर लौटते धनञ्जय की ओर वे राजा वैसे ही नहीं देख सके जैसे दोपहर के सूर्य की ओर कोई नहीं देख पाता।
श्लोक 45 (4.67.45)
रक्तानि वासांसि च तानि गृह्य रणोत्कटो नाग इव प्रभिन्नः । जित्वा च वैराटिमुवाच पार्थः प्रहृष्टरूपो रथिनां वरिष्ठः ॥
raktāni vāsāṃsi ca tāni gṛhya raṇotkaṭo nāga iva prabhinnaḥ | jitvā ca vairāṭimuvāca pārthaḥ prahṛṣṭarūpo rathināṃ variṣṭhaḥ
वे लाल वस्त्र लेकर, युद्ध में मदमत्त हाथी के समान प्रचण्ड, रथियों में श्रेष्ठ पार्थ ने विजय पाकर प्रसन्न होकर विराटपुत्र से कहा:
अर्जुन उवाच
श्लोक 46 (4.67.46)
आवर्तयाश्वान्पशवो जितास्ते याताः परे प्रैहि पुरं प्रहृष्टः । उद्धुष्यतां ते विजयोऽद्य शीघ्रं गात्रं तु ते सेवतु माल्यगन्धः । माता तु ते नन्दतु बान्धवाश्च त्वामद्य दृष्ट्वा समुदीर्णहर्षम् ॥
āvartayāśvānpaśavo jitāste yātāḥ pare praihi puraṃ prahṛṣṭaḥ | uddhuṣyatāṃ te vijayo'dya śīghraṃ gātraṃ tu te sevatu mālyagandhaḥ | mātā tu te nandatu bāndhavāśca tvāmadya dṛṣṭvā samudīrṇaharṣam
"घोड़ों को लौटाओ; तुम्हारे पशु जीत लिए गए हैं और शत्रु चले गए हैं। प्रसन्न होकर नगर को चलो। आज ही शीघ्र तुम्हारी विजय की घोषणा हो, तुम्हारा शरीर मालाओं और सुगन्ध से सजे, और आज तुम्हें इतना हर्षित देखकर तुम्हारी माता और बन्धु-बान्धव आनन्दित हों।"