विराट पर्व · अध्याय 68
अर्जुन द्वारा भागते सैनिकों को अभयदान और फिर से बृहन्नला का वेष
विराट की गौएँ लौट आने के बाद बिखरे हुए कौरव सैनिक वन से निकलकर हाथ जोड़े प्राणों की भीख माँगते हैं, और अर्जुन उन्हें अभय देते हुए कहते हैं कि वे असहायों और शरणागतों को नहीं मारते। वे उत्तर से कहते हैं कि वह पिता के दरबार में पाण्डवों के रहने का भेद न खोले और विजय को अपनी ही बताए; उत्तर वचन देता है कि जब तक अर्जुन अनुमति न दें, वह चुप रहेगा। शमी वृक्ष के पास अर्जुन शस्त्र रख देते हैं, वानर-ध्वज चला जाता है और सिंह-ध्वज फिर लग जाता है, और वे बृहन्नला बनकर फिर से लगाम थाम लेते हैं; घोड़ों को विश्राम देकर वे उत्तर की विजय की घोषणा के लिए ग्वालों को आगे नगर भेजते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.68.1)
ततो विजित्य संग्रामे कुरून्गोवृषभेक्षणः । समानयामास तदा विराटस्य धनं महत् ॥
tato vijitya saṃgrāme kurūngovṛṣabhekṣaṇaḥ | samānayāmāsa tadā virāṭasya dhanaṃ mahat
इस प्रकार युद्ध में कौरवों को जीतकर बैल जैसी बड़ी आँखों वाले अर्जुन विराट का विशाल धन लौटा लाए।
श्लोक 2 (4.68.2)
गतेषु च प्रभग्नेषु धार्तराष्ट्रेषु सर्वशः । वनान्निष्क्रम्य गहनाद्बहवः कुरुसैनिकाः । भयात्संत्रस्तमनसः समाजग्मुस्ततस्ततः ॥
gateṣu ca prabhagneṣu dhārtarāṣṭreṣu sarvaśaḥ | vanānniṣkramya gahanādbahavaḥ kurusainikāḥ | bhayātsaṃtrastamanasaḥ samājagmustatastataḥ
जब धृतराष्ट्र के पुत्र सब ओर से पराजित होकर चले गए, तब बहुत-से कुरु सैनिक घने वन से निकलकर, भय से त्रस्त मन लिए, इधर-उधर से इकट्ठे हुए।
श्लोक 3 (4.68.3)
मुक्तकेशाः प्रदृश्यन्ते स्थिताः प्राञ्जलयस्तदा । क्षुत्पिपासापरिश्रान्ता विदेशस्था विचेतसः । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे पार्थ किं करवामहे ॥
muktakeśāḥ pradṛśyante sthitāḥ prāñjalayastadā | kṣutpipāsāpariśrāntā videśasthā vicetasaḥ | ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve pārtha kiṃ karavāmahe
वे बाल खोले, हाथ जोड़े खड़े दिखाई दिए; भूख-प्यास से थके, परदेश में पड़े और बदहवास। सबने हाथ जोड़कर कहा, "पार्थ, हम क्या करें?
सैनिका ऊचुः
श्लोक 4 (4.68.4)
प्राणानन्तर्मनोयातान्प्रयाचिष्यामहे वयम् । वयं चार्जुन ते दासा ह्यनुरक्ष्या ह्यनाथकाः ॥
prāṇānantarmanoyātānprayāciṣyāmahe vayam | vayaṃ cārjuna te dāsā hyanurakṣyā hyanāthakāḥ
हम अपने उन प्राणों की भीख माँगते हैं जो भय से भीतर ही सिमट गए हैं। अर्जुन, हम आपके दास हैं; हम अनाथ हैं, हमारी रक्षा कीजिए।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 5 (4.68.5)
अनाथान्दुःखितान्दीनान्कृशान्वृद्धान्पराजितान् । न्यस्तशस्त्रान्निराशांश्च नाहं हन्मि कृताञ्जलीन् ॥
anāthānduḥkhitāndīnānkṛśānvṛddhānparājitān | nyastaśastrānnirāśāṃśca nāhaṃ hanmi kṛtāñjalīn
"मैं अनाथों, दुःखियों, दीनों, दुर्बलों, बूढ़ों, पराजितों, शस्त्र डाल देने वालों, निराशों और हाथ जोड़े खड़े लोगों को नहीं मारता।
श्लोक 6 (4.68.6)
भवन्तो यान्तु विस्रब्धा निर्भया अमृता यथा । मम पादरजोलक्ष्म्या जीवन्तु सुचिरं भुवि ॥
bhavanto yāntu visrabdhā nirbhayā amṛtā yathā | mama pādarajolakṣmyā jīvantu suciraṃ bhuvi
आप लोग निश्चिन्त और निर्भय होकर ऐसे जाइए मानो अमर हों। मेरे चरणों की धूलि के प्रताप से आप पृथ्वी पर दीर्घकाल तक जीवित रहें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (4.68.7)
तस्य तामभयां वाचं श्रुत्वा योधाः समागताः । आयुः कीर्तियशोभिस्ते तमाशीर्भिरवर्धयन् ॥
tasya tāmabhayāṃ vācaṃ śrutvā yodhāḥ samāgatāḥ | āyuḥ kīrtiyaśobhiste tamāśīrbhiravardhayan
उनकी अभय देने वाली वाणी सुनकर वहाँ एकत्र योद्धाओं ने उन्हें दीर्घायु, कीर्ति और यश के आशीर्वाद दिए।
श्लोक 8 (4.68.8)
ततो निवृत्ताः कुरवो भग्नाश्च वशमास्थिताः । प्रयाताः सर्वतस्तत्र नमस्कृत्य धनञ्जयम् ॥
tato nivṛttāḥ kuravo bhagnāśca vaśamāsthitāḥ | prayātāḥ sarvatastatra namaskṛtya dhanañjayam
तब पराजित और वश में आए कौरव लौट पड़े और धनञ्जय को प्रणाम करके सब दिशाओं में चले गए।
श्लोक 9 (4.68.9)
एवं दत्ताभयास्तेन ततो याताः कुरून्प्रति ॥
evaṃ dattābhayāstena tato yātāḥ kurūnprati
इस प्रकार उनसे अभय पाकर वे कौरवों की ओर चले गए।
श्लोक 10 (4.68.10)
स कर्म कृत्वा परमार्यकर्मा निहत्य शत्रून्द्विषतां निहन्ता । यातो महामेघ इवातपान्ते विद्राव्य पार्थः कुरुसैन्यमेकः ॥
sa karma kṛtvā paramāryakarmā nihatya śatrūndviṣatāṃ nihantā | yāto mahāmegha ivātapānte vidrāvya pārthaḥ kurusainyamekaḥ
वह कर्म करके, श्रेष्ठ कर्मों वाले और शत्रुओं का संहार करने वाले पार्थ शत्रुओं को मारकर और अकेले ही कौरव सेना को खदेड़कर ग्रीष्म के अन्त में उमड़े महामेघ की तरह आगे बढ़े।
श्लोक 11 (4.68.11)
तं मात्स्यपुत्रं द्विषतां निहन्ता वचोऽब्रवीत्संपरिगृह्य राजन् ॥
taṃ mātsyaputraṃ dviṣatāṃ nihantā vaco'bravītsaṃparigṛhya rājan
हे राजन्, शत्रुओं का संहार करने वाले उन्होंने मत्स्यराज के पुत्र को अपने पास लेकर उससे यह वचन कहा:
अर्जुन उवाच
श्लोक 12 (4.68.12)
पितुः सकाशे तव तात सर्वे वसन्ति पार्था विदितं त्वयेति । तान्मास्म शंसीर्नगरं प्रविश्य भीतः प्रणश्येत्स च मत्स्यराजः ॥
pituḥ sakāśe tava tāta sarve vasanti pārthā viditaṃ tvayeti | tānmāsma śaṃsīrnagaraṃ praviśya bhītaḥ praṇaśyetsa ca matsyarājaḥ
"तात, तुम जानते हो कि सब पाण्डव तुम्हारे पिता के पास ही रहते हैं। नगर में पहुँचकर उनका भेद मत खोलना; कहीं भयभीत होकर मत्स्यराज प्राण न त्याग दें।
श्लोक 13 (4.68.13)
मया जिता सा ध्वजिनी कुरूणां मया हि गावो विजिता द्विषद्भ्यः । एवं तु कामं नगरं प्रविश्य त्वमात्मना कर्म कृतं ब्रवीहि ॥
mayā jitā sā dhvajinī kurūṇāṃ mayā hi gāvo vijitā dviṣadbhyaḥ | evaṃ tu kāmaṃ nagaraṃ praviśya tvamātmanā karma kṛtaṃ bravīhi
बल्कि नगर में प्रवेश करके तुम निःसंकोच यही कहना, 'कौरवों की उस सेना को मैंने जीता, शत्रुओं से गौएँ मैंने लौटाईं,' और इस कर्म को अपना ही किया हुआ बताना।"
उत्तर उवाच
श्लोक 14 (4.68.14)
यत्ते कृतं कर्म न वारणीयं तत्कर्म कर्तुं मम नास्ति शक्तिः । न त्वां प्रवक्ष्यामि पितुः सकाशे यावन्न मां वक्ष्यसि सव्यसाचिन् ॥
yatte kṛtaṃ karma na vāraṇīyaṃ tatkarma kartuṃ mama nāsti śaktiḥ | na tvāṃ pravakṣyāmi pituḥ sakāśe yāvanna māṃ vakṣyasi savyasācin
"आपने जो कर्म किया है उसे कोई रोक नहीं सकता था; ऐसा कर्म करने की मुझमें शक्ति नहीं है। फिर भी, सव्यसाची, जब तक आप मुझसे न कहें, मैं पिताजी के सामने आपके विषय में कुछ नहीं कहूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (4.68.15)
स शत्रुसेनां तरसा विजित्य आच्छिद्य सर्वं तु धनं कुरूणाम् । श्मशानमागम्य पुनः शमीं तामभ्येत्य तस्थौ शरविक्षताङ्गः ॥
sa śatrusenāṃ tarasā vijitya ācchidya sarvaṃ tu dhanaṃ kurūṇām | śmaśānamāgamya punaḥ śamīṃ tāmabhyetya tasthau śaravikṣatāṅgaḥ
बलपूर्वक शत्रु-सेना को जीतकर और कौरवों से सारा धन छीनकर वे फिर श्मशान में आए और उस शमी वृक्ष के पास जाकर खड़े हो गए; उनका शरीर बाणों से घायल था।
श्लोक 16 (4.68.16)
ततः स वह्निप्रतिमो महाकपिः सहैव भूतैर्दिवमुत्पपात । तथा च माया विहिता बभूव सा ध्वजं च सिंहं युयुजे रथे पुनः ॥
tataḥ sa vahnipratimo mahākapiḥ sahaiva bhūtairdivamutpapāta | tathā ca māyā vihitā babhūva sā dhvajaṃ ca siṃhaṃ yuyuje rathe punaḥ
तब अग्नि के समान तेजस्वी वह महाकपि भूतों के साथ ही आकाश में उड़ गया; पहले की तरह माया ने अपना काम किया, और उन्होंने फिर से सिंह-ध्वज रथ में जोड़ दिया।
श्लोक 17 (4.68.17)
निधाय तच्चायुधमाजिमर्दनः कुरूत्तमानामिषुधीन्ध्वजांस्तथा । प्रायात्स मात्स्यो नगरं प्रवेष्टुं किरीटिना सारथिना महात्मा ॥
nidhāya taccāyudhamājimardanaḥ kurūttamānāmiṣudhīndhvajāṃstathā | prāyātsa mātsyo nagaraṃ praveṣṭuṃ kirīṭinā sārathinā mahātmā
उस अस्त्र को तथा श्रेष्ठ कौरवों के तूणीरों और ध्वजों को रखकर, युद्ध में शत्रुओं को कुचलने वाला महात्मा मत्स्यराजकुमार किरीटी को सारथि बनाकर नगर में प्रवेश करने के लिए चल पड़ा।
श्लोक 18 (4.68.18)
पार्थश्च कृत्वा परमार्यकर्म निहत्य शत्रून्द्विषतां निहन्ता । विधाय भूयश्च तथैव वेषं जग्राह रश्मीन्पुनरुत्तरस्य । बृहन्नलारूपमथो विधाय प्रायात्स मात्स्यो नगरं प्रवेष्टुम् ॥
pārthaśca kṛtvā paramāryakarma nihatya śatrūndviṣatāṃ nihantā | vidhāya bhūyaśca tathaiva veṣaṃ jagrāha raśmīnpunaruttarasya | bṛhannalārūpamatho vidhāya prāyātsa mātsyo nagaraṃ praveṣṭum
और शत्रुओं का संहार करने वाले पार्थ ने वह श्रेष्ठ कर्म करके तथा शत्रुओं को मारकर फिर से वही वेष धारण किया और पुनः उत्तर के घोड़ों की लगाम थाम ली; इस प्रकार उनके फिर बृहन्नला का रूप धर लेने पर मत्स्यराजकुमार नगर में प्रवेश करने के लिए चल पड़ा।
श्लोक 19 (4.68.19)
ततो निवृत्ताः कुरवः प्रभग्नाः शममास्थिताः । परस्परमवेक्ष्यैव जग्मुस्ते हृतवाससः ॥
tato nivṛttāḥ kuravaḥ prabhagnāḥ śamamāsthitāḥ | parasparamavekṣyaiva jagmuste hṛtavāsasaḥ
तब पराजित कौरव लौट पड़े और शान्त हो गए; वस्त्र छिन जाने से वे एक-दूसरे की ओर देखते हुए चले गए।
श्लोक 20 (4.68.20)
पन्थानमुपसंगम्य फल्गुनो वाक्यमब्रवीत् । राजपुत्र प्रपद्यस्व धनानीमानि सर्वशः । गोकुलानि महाबाहो वीरगोपालकैः सह ॥
panthānamupasaṃgamya phalguno vākyamabravīt | rājaputra prapadyasva dhanānīmāni sarvaśaḥ | gokulāni mahābāho vīragopālakaiḥ saha
मार्ग पर पहुँचकर फाल्गुन ने कहा, "हे राजपुत्र, महाबाहु, यह सारा धन और वीर ग्वालों के साथ ये गोसमूह सँभाल लो।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 21 (4.68.21)
ततोऽपराह्णे यास्यामो विराटनगरं प्रति । आश्वास्य पाययित्वा च परिप्लाव्य च वाजिनः ॥
tato'parāhṇe yāsyāmo virāṭanagaraṃ prati | āśvāsya pāyayitvā ca pariplāvya ca vājinaḥ
"घोड़ों को विश्राम देकर, पानी पिलाकर और नहलाकर हम दोपहर ढलने पर विराटनगर की ओर चलेंगे।
श्लोक 22 (4.68.22)
गच्छन्तु त्वरितं दूता गोपालाः प्रेषितास्त्वया । नगरे प्रियमाख्यातुं घोषयन्तु च ते जयम् ॥
gacchantu tvaritaṃ dūtā gopālāḥ preṣitāstvayā | nagare priyamākhyātuṃ ghoṣayantu ca te jayam
तुम्हारे भेजे हुए ग्वाले दूत बनकर शीघ्र नगर जाएँ, वहाँ यह प्रिय समाचार सुनाएँ और तुम्हारी विजय की घोषणा करें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (4.68.23)
उत्तरस्त्वरमाणोऽथ दूतानाज्ञापयत्ततः । वचनादर्जुनस्यैव ह्याचक्षध्वं जयं मम ॥
uttarastvaramāṇo'tha dūtānājñāpayattataḥ | vacanādarjunasyaiva hyācakṣadhvaṃ jayaṃ mama
तब उत्तर ने शीघ्रता करते हुए अर्जुन के कहने पर दूतों को आज्ञा दी, "मेरी विजय का समाचार सुनाओ।
उत्तर उवाच
श्लोक 24 (4.68.24)
मया जिता सा ध्वजिनी कुरूणां मया च गावो विजिता द्विषद्भ्यः । एवं तु कामं नगरं प्रविश्य मयाऽऽत्मना कर्म कृतं ब्रवीत ॥
mayā jitā sā dhvajinī kurūṇāṃ mayā ca gāvo vijitā dviṣadbhyaḥ | evaṃ tu kāmaṃ nagaraṃ praviśya mayā''tmanā karma kṛtaṃ bravīta
नगर में पहुँचकर निःसंकोच यही कहना, 'कौरवों की सेना मैंने जीती, शत्रुओं से गौएँ मैंने जीतीं'; कहना कि यह कर्म मैंने स्वयं किया है।"