विराट पर्व · अध्याय 69
विराट को उत्तर की विजय का समाचार
त्रिगर्तों पर विजय पाकर विराट हर्ष के साथ नगर लौटते हैं और पाते हैं कि उनका पुत्र उत्तर वहाँ नहीं है; उन्हें पता चलता है कि राजकुमार बृहन्नला को सारथि बनाकर अकेले ही कुरु-सेना से लड़ने निकल गया है। पुत्र के लिए चिंतित विराट उसके पीछे सेना भेजते हैं, जबकि कङ्क (युधिष्ठिर) उन्हें भरोसा दिलाते हैं कि बृहन्नला जिसका सारथि हो वह हार नहीं सकता। तभी दूत विजय का समाचार लेकर आते हैं, और प्रसन्न राजा नगर को सजाने तथा राजकुमारों, पुरवासियों, वादकों, स्त्रियों और ब्राह्मणों की भव्य शोभायात्रा को पुत्र के स्वागत के लिए भेजने का आदेश देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.69.1)
स विजित्य धनं चापि विराटो वाहिनीपतिः । प्राविशन्नगरं हृष्टश्चतुर्भिः सह पाण्डवैः ॥
sa vijitya dhanaṃ cāpi virāṭo vāhinīpatiḥ | prāviśannagaraṃ hṛṣṭaścaturbhiḥ saha pāṇḍavaiḥ
धन को फिर से जीतकर सेनापति विराट चारों पाण्डवों के साथ प्रसन्न मन से अपने नगर में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 2 (4.69.2)
जित्वा त्रिगर्तान्संग्रामे गाश्चैवानाय्य केवलाः । अशोभत महाराजः सह पार्थैः श्रिया वृतः ॥
jitvā trigartānsaṃgrāme gāścaivānāyya kevalāḥ | aśobhata mahārājaḥ saha pārthaiḥ śriyā vṛtaḥ
युद्ध में त्रिगर्तों को जीतकर और सारी गायें वापस लाकर महाराज विराट पृथा-पुत्रों के साथ श्री से घिरे हुए शोभायमान हुए।
श्लोक 3 (4.69.3)
तमासनगतं वीरं सुहृदां प्रीतिवर्धनम् । उपतस्थुः प्रकृतयः समन्ताद्ब्राह्मणैः सह ॥
tamāsanagataṃ vīraṃ suhṛdāṃ prītivardhanam | upatasthuḥ prakṛtayaḥ samantādbrāhmaṇaiḥ saha
मित्रों का आनंद बढ़ाने वाले वे वीर जब आसन पर विराजमान हुए, तब प्रजाजन ब्राह्मणों के साथ चारों ओर से उनकी सेवा में उपस्थित हुए।
श्लोक 4 (4.69.4)
सभाजितः सभासद्भिः प्रतिनन्द्य स मत्स्यराट् । विसर्जयामास तदा द्विजांश्च प्रकृतीस्तथा ॥
sabhājitaḥ sabhāsadbhiḥ pratinandya sa matsyarāṭ | visarjayāmāsa tadā dvijāṃśca prakṛtīstathā
सभासदों द्वारा सम्मानित मत्स्यराज ने उनका प्रत्यभिनंदन किया और फिर ब्राह्मणों तथा प्रजाजनों को विदा किया।
श्लोक 5 (4.69.5)
ततः स राजा मात्स्यानां विराटो वाहिनीपतिः । प्रविश्यान्तःपुरं रम्यं स्त्रीशतैरुपशोभितम् । उत्तरं तत्र नापश्यत्क्व यात इति चाब्रवीत् ॥
tataḥ sa rājā mātsyānāṃ virāṭo vāhinīpatiḥ | praviśyāntaḥpuraṃ ramyaṃ strīśatairupaśobhitam | uttaraṃ tatra nāpaśyatkva yāta iti cābravīt
तब मत्स्यों के राजा सेनापति विराट सैकड़ों स्त्रियों से सुशोभित अपने रमणीय अन्तःपुर में गए। वहाँ उत्तर को न देखकर उन्होंने पूछा — "वह कहाँ गया?"
श्लोक 6 (4.69.6)
आचख्युस्तत्र संहृष्टाः स्त्रियः कन्याश्च वेश्मनि । अन्तःपुरचराश्चैव कुरुभिर्गोधनं हृतम् ॥
ācakhyustatra saṃhṛṣṭāḥ striyaḥ kanyāśca veśmani | antaḥpuracarāścaiva kurubhirgodhanaṃ hṛtam
महल की स्त्रियों, कन्याओं और अन्तःपुर के सेवकों ने उत्साह से उन्हें बताया — "कौरव हमारा गोधन हर ले गए हैं।
श्लोक 7 (4.69.7)
ताञ्जेतुमभिसंरब्ध एक एवातिसाहसात् । बृहन्नलासहायश्च निर्यातः पृथिवींजयः ॥
tāñjetumabhisaṃrabdha eka evātisāhasāt | bṛhannalāsahāyaśca niryātaḥ pṛthivīṃjayaḥ
उन्हें जीतने के लिए उत्तेजित होकर राजकुमार पृथिवींजय अत्यन्त साहस के कारण अकेले ही, केवल बृहन्नला को साथ लेकर निकल पड़े हैं,
श्लोक 8 (4.69.8)
उपयातानतिरथान्द्रोणं शान्तनवं कृपम् । कर्णं दुर्योधनं चैव द्रोणपुत्रं च षड्रथान् ॥
upayātānatirathāndroṇaṃ śāntanavaṃ kṛpam | karṇaṃ duryodhanaṃ caiva droṇaputraṃ ca ṣaḍrathān
उन छह अतिरथियों से लड़ने, जो चढ़ आए हैं — द्रोण, शान्तनुपुत्र भीष्म, कृप, कर्ण, दुर्योधन और द्रोणपुत्र अश्वत्थामा।"
श्लोक 9 (4.69.9)
ततो विराटः परमाभितप्तः । पुत्रं निशम्यैकरथेन यातम् । बृहन्नलासारथिमाजिमर्दनं । प्रोवाच सर्वानथ मन्त्रिमुख्यान् ॥
tato virāṭaḥ paramābhitaptaḥ | putraṃ niśamyaikarathena yātam | bṛhannalāsārathimājimardanaṃ | provāca sarvānatha mantrimukhyān
यह सुनकर कि युद्ध में शत्रुओं को कुचलने वाला उनका पुत्र बृहन्नला को सारथि बनाकर एक ही रथ से गया है, विराट अत्यन्त संतप्त हुए और अपने सब प्रमुख मंत्रियों से बोले —
विराट उवाच
श्लोक 10 (4.69.10)
गवां शतसहस्राणि अभिभूय ममात्मजम् । कुरवः कालयन्ति स्म सर्वे युद्धविशारदाः ॥
gavāṃ śatasahasrāṇi abhibhūya mamātmajam | kuravaḥ kālayanti sma sarve yuddhaviśāradāḥ
"युद्ध-कला में निपुण सब कौरव मेरे पुत्र को परास्त करके लाखों गायें हाँके लिए जा रहे हैं।
श्लोक 11 (4.69.11)
तस्माद्गच्छन्तु मे योधा बलेन महता वृताः । उत्तरस्य परीप्सार्थं ये त्रिगर्तैरविक्षताः ॥
tasmādgacchantu me yodhā balena mahatā vṛtāḥ | uttarasya parīpsārthaṃ ye trigartairavikṣatāḥ
इसलिए मेरे जो योद्धा त्रिगर्तों से घायल नहीं हुए हैं, वे बड़ी सेना के साथ उत्तर की रक्षा के लिए जाएँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 12 (4.69.12)
हयांश्च नागांश्च रथांश्च शीघ्रं । वादित्रसङ्घांश्च ततः प्रभूतान् । प्रस्थापयामास सुतस्य हेतो- । र्विचित्रचित्राभरणोपपन्नान् ॥
hayāṃśca nāgāṃśca rathāṃśca śīghraṃ | vāditrasaṅghāṃśca tataḥ prabhūtān | prasthāpayāmāsa sutasya heto- | rvicitracitrābharaṇopapannān
उन्होंने पुत्र के लिए शीघ्र ही घोड़े, हाथी और रथ, तथा रंग-बिरंगे आभूषणों से सजे वादकों के बहुत-से दल भी रवाना किए।
श्लोक 13 (4.69.13)
एवं स राजा मात्स्यानां महानक्षौहिणीपतिः । व्यादिदेशाथ स क्षिप्रं वाहिनीं चतुरङ्गिणीम् ॥
evaṃ sa rājā mātsyānāṃ mahānakṣauhiṇīpatiḥ | vyādideśātha sa kṣipraṃ vāhinīṃ caturaṅgiṇīm
इस प्रकार अक्षौहिणी सेना के महान स्वामी मत्स्यराज ने शीघ्र ही अपनी चतुरंगिणी सेना को आदेश दिया —
विराट उवाच
श्लोक 14 (4.69.14)
कुमारमाशु जानीत यदि जीवति वा नवा । यस्य यन्ता गतः षण्डो मन्येऽहं स न जीवति ॥
kumāramāśu jānīta yadi jīvati vā navā | yasya yantā gataḥ ṣaṇḍo manye'haṃ sa na jīvati
"शीघ्र पता लगाओ कि राजकुमार जीवित है या नहीं। जिसके साथ एक नपुंसक सारथि बनकर गया है, मुझे लगता है वह जीवित नहीं है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (4.69.15)
तमब्रवीद्धर्मसुतो विराट- । मार्तं विदित्वा कुरुभिः प्रतप्तम् । बृहन्नला सारथिश्चेन्नरेन्द्र । परे न नेष्यन्ति तवाद्य गाश्च ॥
tamabravīddharmasuto virāṭa- | mārtaṃ viditvā kurubhiḥ prataptam | bṛhannalā sārathiścennarendra | pare na neṣyanti tavādya gāśca
विराट को कौरवों के कारण दुःखी और संतप्त जानकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने उनसे कहा — "हे नरेन्द्र, यदि बृहन्नला सारथि है तो शत्रु आज तुम्हारी गायें नहीं ले जा सकेंगे।
कङ्क उवाच
श्लोक 16 (4.69.16)
सर्वान्महीपान्सहितान्कुरूंश्च । तथैव देवासुरनागयक्षान् । अलं विजेतुं समरे सुतस्ते । अनुष्ठितः सारथिना हि तेन ॥
sarvānmahīpānsahitānkurūṃśca | tathaiva devāsuranāgayakṣān | alaṃ vijetuṃ samare sutaste | anuṣṭhitaḥ sārathinā hi tena
उस सारथि के सहारे तुम्हारा पुत्र युद्ध में एकत्र हुए सब राजाओं और कौरवों को, और देवताओं, असुरों, नागों तथा यक्षों को भी जीतने में समर्थ है।
श्लोक 17 (4.69.17)
सर्वथा कुरवश्चापि ये चान्ये वसुधाधिपाः । त्रिगर्तान्निर्जिताञ्श्रुत्वा न स्थास्यन्ति कथंचन ॥
sarvathā kuravaścāpi ye cānye vasudhādhipāḥ | trigartānnirjitāñśrutvā na sthāsyanti kathaṃcana
और फिर, त्रिगर्तों के पराजित होने का समाचार सुनकर कौरव तथा दूसरे राजा किसी भी तरह टिक नहीं पाएँगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (4.69.18)
अथोत्तरेण प्रहिता दूतास्ते शीघ्रगामिनः । विराटनगरं प्राप्य जयं प्रावेदयंस्तदा ॥
athottareṇa prahitā dūtāste śīghragāminaḥ | virāṭanagaraṃ prāpya jayaṃ prāvedayaṃstadā
इधर उत्तर के भेजे हुए शीघ्रगामी दूत विराटनगर पहुँचे और उन्होंने विजय का समाचार सुनाया।
श्लोक 19 (4.69.19)
राजानं वृतमाचख्युर्मन्त्रिभिर्जयमुत्तमम् । पराजयं कुरूणां च उपायान्तं तथोत्तरम् ॥
rājānaṃ vṛtamācakhyurmantribhirjayamuttamam | parājayaṃ kurūṇāṃ ca upāyāntaṃ tathottaram
उन्होंने मंत्रियों से घिरे राजा को उस उत्तम विजय, कौरवों की पराजय और उत्तर के लौट आने का समाचार दिया —
दूता ऊचुः
श्लोक 20 (4.69.20)
सर्वा विनिर्जिता गावः कुरवश्च पराजिताः । उत्तरः सह सूतेन कुशली च परंतपः ॥
sarvā vinirjitā gāvaḥ kuravaśca parājitāḥ | uttaraḥ saha sūtena kuśalī ca paraṃtapaḥ
"सारी गायें जीत ली गई हैं और कौरव हार गए हैं। शत्रुओं को तपाने वाले उत्तर अपने सारथि के साथ सकुशल हैं।"
कङ्क उवाच
श्लोक 21 (4.69.21)
दिष्ट्या ते निर्जिता गावः कुरवश्च पराजिताः । दिष्ट्या ते विजयी पुत्रः श्रूयते पार्थिवर्षभः ॥
diṣṭyā te nirjitā gāvaḥ kuravaśca parājitāḥ | diṣṭyā te vijayī putraḥ śrūyate pārthivarṣabhaḥ
"सौभाग्य से तुम्हारी गायें जीत ली गईं और कौरव पराजित हुए। सौभाग्य से राजाओं में श्रेष्ठ तुम्हारा पुत्र विजयी सुना जा रहा है।
श्लोक 22 (4.69.22)
नाद्भुतं त्विह मन्येऽहं यत्ते पुत्रोऽजयत्कुरून् । ध्रुव एव जयस्तस्य यस्य यन्ता बृहन्नला ॥
nādbhutaṃ tviha manye'haṃ yatte putro'jayatkurūn | dhruva eva jayastasya yasya yantā bṛhannalā
तुम्हारे पुत्र ने कौरवों को जीत लिया, इसमें मैं कोई आश्चर्य नहीं मानता। जिसका सारथि बृहन्नला हो, उसकी विजय तो निश्चित ही है।
श्लोक 23 (4.69.23)
देवेन्द्रसारथिश्चैव मातलिः ख्यातविक्रमः । कृष्णस्य सारथिश्चैव न बृहन्नलया समौ ॥
devendrasārathiścaiva mātaliḥ khyātavikramaḥ | kṛṣṇasya sārathiścaiva na bṛhannalayā samau
न तो देवराज इन्द्र का प्रसिद्ध पराक्रमी सारथि मातलि, और न कृष्ण का सारथि ही बृहन्नला की बराबरी कर सकते हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (4.69.24)
ततो विराटो नृपतिः संप्रहृष्टतनूरुहः । श्रुत्वा तु विजयं तस्य कुमारस्यामितौजसः । संतोषयित्वा दूतांस्तान्धनरत्नैश्च सर्वशः ॥
tato virāṭo nṛpatiḥ saṃprahṛṣṭatanūruhaḥ | śrutvā tu vijayaṃ tasya kumārasyāmitaujasaḥ | saṃtoṣayitvā dūtāṃstāndhanaratnaiśca sarvaśaḥ
तब अमित तेजस्वी राजकुमार की विजय सुनकर राजा विराट हर्ष से पुलकित हो उठे और उन्होंने उन दूतों को धन और रत्नों से भरपूर संतुष्ट किया।
श्लोक 25 (4.69.25)
गते त्वनुजने तस्मिन्दूतवाक्यं निशम्य च । उत्तरस्य जयात्प्रीतो विराटः प्रत्यभाषत ॥
gate tvanujane tasmindūtavākyaṃ niśamya ca | uttarasya jayātprīto virāṭaḥ pratyabhāṣata
जब वह अनुचर-दल चला गया, तब दूतों की बात सुनकर और उत्तर की विजय से प्रसन्न होकर विराट बोले —
विराट उवाच
श्लोक 26 (4.69.26)
राजमार्गाः क्रियन्तां वै पताकाभिरलंकृताः । पुष्पोपहारैरर्च्यन्तां देवताश्चापि सर्वशः ॥
rājamārgāḥ kriyantāṃ vai patākābhiralaṃkṛtāḥ | puṣpopahārairarcyantāṃ devatāścāpi sarvaśaḥ
"राजमार्ग पताकाओं से सजाए जाएँ और सब देवताओं की पुष्पों की भेंट से पूजा की जाए।
श्लोक 27 (4.69.27)
कुमारा योधमुख्याश्च गणिकाश्च स्वलंकृताः । वादित्राणि च सर्वाणि प्रत्युद्यान्तु सुतं मम ॥
kumārā yodhamukhyāśca gaṇikāśca svalaṃkṛtāḥ | vāditrāṇi ca sarvāṇi pratyudyāntu sutaṃ mama
राजकुमार, प्रमुख योद्धा, सजी-धजी गणिकाएँ और सब प्रकार के बाजे मेरे पुत्र की अगवानी के लिए जाएँ।
श्लोक 28 (4.69.28)
भवन्तु ते लब्धजये सुते मे । पौराश्च मर्त्याश्च परे च नार्यः । ते शुक्लवस्त्राः प्रभवन्तु मार्गे । सुगन्धमाल्याभरणाश्च नार्यः ॥
bhavantu te labdhajaye sute me | paurāśca martyāśca pare ca nāryaḥ | te śuklavastrāḥ prabhavantu mārge | sugandhamālyābharaṇāśca nāryaḥ
विजय पाकर लौटते मेरे पुत्र के लिए पुरवासी, साधारण जन, अन्य लोग और स्त्रियाँ तैयार रहें; वे श्वेत वस्त्र पहनकर मार्ग में आएँ, और स्त्रियाँ सुगंधित मालाओं तथा आभूषणों से सजी हों।
श्लोक 29 (4.69.29)
भजन्तु सर्वा गणिकाः सुतं मे । नार्यश्च कन्याः सहसैनिकाश्च । स्वलंकृतास्ताः सुभगाः सुवेषाः । पुत्रस्य पन्थानमनुव्रजन्तु ॥
bhajantu sarvā gaṇikāḥ sutaṃ me | nāryaśca kanyāḥ sahasainikāśca | svalaṃkṛtāstāḥ subhagāḥ suveṣāḥ | putrasya panthānamanuvrajantu
सब गणिकाएँ मेरे पुत्र की सेवा में रहें, और स्त्रियाँ तथा कन्याएँ सैनिकों के साथ; सुंदर अलंकारों और सुंदर वेश से सजी वे सौभाग्यवती स्त्रियाँ मेरे पुत्र के मार्ग में उसके पीछे-पीछे चलें।
श्लोक 30 (4.69.30)
घण्टापणवकाः शीघ्रं मत्तमारुह्य कुञ्जरम् । शृङ्गाटकेषु सर्वेषु समाख्यान्तु जयं मम ॥
ghaṇṭāpaṇavakāḥ śīghraṃ mattamāruhya kuñjaram | śṛṅgāṭakeṣu sarveṣu samākhyāntu jayaṃ mama
घंटा और ढोल बजाने वाले घोषक शीघ्र ही मतवाले हाथी पर चढ़कर सब चौराहों पर मेरी विजय की घोषणा करें।
श्लोक 31 (4.69.31)
उत्तरा च कुमारीभिर्बह्वाभरणभूषिता । सखीं विजितसंग्रामां प्रत्युद्यातु बृहन्नलाम् ॥
uttarā ca kumārībhirbahvābharaṇabhūṣitā | sakhīṃ vijitasaṃgrāmāṃ pratyudyātu bṛhannalām
और अनेक आभूषणों से सजी उत्तरा कुमारियों के साथ संग्राम जीतने वाली अपनी सखी बृहन्नला की अगवानी करने जाए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 32 (4.69.32)
श्रुत्वा तु वचनं तस्य पार्थिवस्य महात्मनः । तथैव चक्रुः संहृष्टाः पौराः स्वस्तिकपाणयः ॥
śrutvā tu vacanaṃ tasya pārthivasya mahātmanaḥ | tathaiva cakruḥ saṃhṛṣṭāḥ paurāḥ svastikapāṇayaḥ
उस महात्मा राजा के वचन सुनकर हर्षित पुरवासियों ने हाथों में मंगल-चिह्न लेकर वैसा ही किया।
श्लोक 33 (4.69.33)
सूताश्च सर्वे सहमागधाश्च । हृष्टा विराटस्य पुरे जनौघाः । भेर्यश्च तूर्याणि च वारिजाश्च । वेषैः परार्ध्यैः प्रमदाजनाश्च ॥
sūtāśca sarve sahamāgadhāśca | hṛṣṭā virāṭasya pure janaughāḥ | bheryaśca tūryāṇi ca vārijāśca | veṣaiḥ parārdhyaiḥ pramadājanāśca
सब सूत और मागध, विराट के नगर की हर्षित भीड़ें, भेरियाँ, तुरहियाँ और शंख, तथा बहुमूल्य वेश में सजी स्त्रियाँ;
श्लोक 34 (4.69.34)
वन्दिप्रवादाः पणवादिकाश्च । तथैव वाद्यानि च वंशशब्दाः । कांस्यं सतालं मधुरं च गीत- । मादाय नार्यो नगरान्निरीयुः ॥
vandipravādāḥ paṇavādikāśca | tathaiva vādyāni ca vaṃśaśabdāḥ | kāṃsyaṃ satālaṃ madhuraṃ ca gīta- | mādāya nāryo nagarānnirīyuḥ
बन्दीजनों के स्तुति-गान, ढोल आदि, अन्य बाजे और बाँसुरियों की ध्वनि; और काँसे के मंजीरों तथा मधुर गीतों के साथ स्त्रियाँ नगर से बाहर निकलीं।
श्लोक 35 (4.69.35)
प्रत्युद्ययुः पुत्रमनन्तवीर्यं । ते ब्राह्मणाः शान्तिपराः प्रधानाः । स्वाध्यायवेदाध्ययनक्रमज्ञाः । स्वस्तिक्रियागीतजपप्रधानाः ॥
pratyudyayuḥ putramanantavīryaṃ | te brāhmaṇāḥ śāntiparāḥ pradhānāḥ | svādhyāyavedādhyayanakramajñāḥ | svastikriyāgītajapapradhānāḥ
शान्ति-कर्मों में लगे, स्वाध्याय और वेदाध्ययन के क्रम को जानने वाले, तथा स्वस्तिवाचन, स्तुति-गान और जप में निष्ठ प्रधान ब्राह्मण भी उस अनन्त पराक्रमी राजकुमार की अगवानी को निकले।