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विराट पर्व · अध्याय 70

पासों के खेल में विराट का कङ्क पर प्रहार

समाचार से हर्षित विराट पासे मँगवाकर कङ्क को खेलने के लिए बुलाते हैं; कङ्क युधिष्ठिर के सर्वनाश का स्मरण कराकर उन्हें जुए से सावधान करते हैं, फिर भी खेलना स्वीकार कर लेते हैं। जब विराट अपने पुत्र की विजय की डींग मारते हैं, तब कङ्क कहते हैं कि इसका श्रेय बृहन्नला को है, क्योंकि भीष्म, द्रोण, कर्ण और शेष कुरु-सेना के सामने वही टिक सकती थी। क्रुद्ध विराट उनके मुख पर पासा दे मारते हैं; उनकी नाक से रक्त बहने लगता है, और सैरन्ध्री बनी द्रौपदी उसे अपने वस्त्र और सोने की झारी में थाम लेती है, यह समझाते हुए कि यदि किसी संन्यासी का रक्त धरती पर गिरे तो राज्य में अकाल पड़ता है और प्रहार करने वाले के पितर नीचे गिरते हैं।

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.70.1)

प्रस्थाप्य सेनां कन्याश्च गणिकाश्च स्वलंकृताः । मत्स्यराजो महाराजः प्रहृष्ट इदमब्रवीत् ॥

prasthāpya senāṃ kanyāśca gaṇikāśca svalaṃkṛtāḥ | matsyarājo mahārājaḥ prahṛṣṭa idamabravīt

सेना, कन्याओं और सजी-धजी गणिकाओं को भेजकर महाराज मत्स्यराज ने प्रसन्न होकर यह कहा —

विराट उवाच

श्लोक 2 (4.70.2)

त्रिगर्ताः कुरवः सर्वे संग्रामे निर्जिता मया । प्रविश्यान्तःपुरं हृष्टा द्यूतं दीव्याम ब्राह्मण ॥

trigartāḥ kuravaḥ sarve saṃgrāme nirjitā mayā | praviśyāntaḥpuraṃ hṛṣṭā dyūtaṃ dīvyāma brāhmaṇa

"त्रिगर्त और कौरव सब मेरे द्वारा युद्ध में जीत लिए गए हैं। हे ब्राह्मण, आओ, अन्तःपुर में चलकर प्रसन्नता से जुआ खेलें।

श्लोक 3 (4.70.3)

अक्षानाहर सैरन्ध्रि आसनं चोपकल्पय । आदाय व्यजनं त्वं च पार्श्वतोऽनन्तरा भव ॥

akṣānāhara sairandhri āsanaṃ copakalpaya | ādāya vyajanaṃ tvaṃ ca pārśvato'nantarā bhava

सैरन्ध्री, पासे ले आ और आसन बिछा दे; पंखा लेकर तू भी मेरे पास खड़ी रह।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (4.70.4)

तं तथावादिनं दृष्ट्वा पाण्डवः प्रत्यभाषत । न देवितव्यं हृष्टेन कितवेनेति नः श्रुतम् ॥

taṃ tathāvādinaṃ dṛṣṭvā pāṇḍavaḥ pratyabhāṣata | na devitavyaṃ hṛṣṭena kitaveneti naḥ śrutam

उन्हें ऐसा कहते देख पाण्डव युधिष्ठिर ने उत्तर दिया — "हमने सुना है कि हर्ष से उन्मत्त जुआरी के साथ जुआ नहीं खेलना चाहिए।

कङ्क उवाच

श्लोक 5 (4.70.5)

न त्वामद्य मुदा युक्तमहं देवितुमुत्सहे । प्रियं तु ते चिकीर्षामि वर्ततां यदि रोचते । द्यूतं कर्तुं न वाञ्छामि नरेन्द्र जनसंसदि ॥

na tvāmadya mudā yuktamahaṃ devitumutsahe | priyaṃ tu te cikīrṣāmi vartatāṃ yadi rocate | dyūtaṃ kartuṃ na vāñchāmi narendra janasaṃsadi

आज जब तुम इतने हर्ष में हो, मैं तुम्हारे साथ खेलने का साहस नहीं करता। फिर भी मैं तुम्हारा प्रिय करना चाहता हूँ; यदि तुम्हें अच्छा लगे तो खेल चले। पर हे नरेन्द्र, लोगों की सभा में मैं जुआ खेलना नहीं चाहता।"

विराट उवाच

श्लोक 6 (4.70.6)

स्त्रियो गावो हिरण्यं च यच्चान्यद्वसु किंचन । न मे किंचित्त्वया कार्यमन्तरेणापि देवितम् ॥

striyo gāvo hiraṇyaṃ ca yaccānyadvasu kiṃcana | na me kiṃcittvayā kāryamantareṇāpi devitam

"स्त्रियाँ, गायें, सोना या जो भी दूसरा धन हो — तुम्हें मेरे साथ उसमें से कुछ भी दाँव पर नहीं लगाना है; खेल के अतिरिक्त भी मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए।"

कङ्क उवाच

श्लोक 7 (4.70.7)

किं ते द्यूतेन राजेन्द्र बहुदोषेण मानद । देवने बहवो दोषास्तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥

kiṃ te dyūtena rājendra bahudoṣeṇa mānada | devane bahavo doṣāstasmāttatparivarjayet

"हे मान देने वाले राजेन्द्र, तुम्हें जुए से क्या लेना? जुए में बहुत-से दोष हैं; पासों के खेल में अनेक बुराइयाँ हैं, इसलिए उसे त्याग देना चाहिए।

श्लोक 8 (4.70.8)

श्रुतो वा यदि वा दृष्टो धर्मराजो युधिष्ठिरः । स राज्यं धनमक्षय्यं पणमेकममन्यत ॥

śruto vā yadi vā dṛṣṭo dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | sa rājyaṃ dhanamakṣayyaṃ paṇamekamamanyata

तुमने धर्मराज युधिष्ठिर के बारे में सुना होगा या उन्हें देखा भी होगा। उन्होंने अपने राज्य और अक्षय धन को एक ही दाँव मान लिया,

श्लोक 9 (4.70.9)

कृष्णां च भार्यां दयितां भ्रातॄंश्च त्रिदशोपमान् । निःसंशयं स कितवः पश्चात्तप्यति पाण्डवः ॥

kṛṣṇāṃ ca bhāryāṃ dayitāṃ bhrātṝṃśca tridaśopamān | niḥsaṃśayaṃ sa kitavaḥ paścāttapyati pāṇḍavaḥ

और अपनी प्रिय पत्नी कृष्णा तथा देवताओं के समान भाइयों को भी। वह जुआरी पाण्डव निःसंदेह बाद में पछताता है।

श्लोक 10 (4.70.10)

विविधानां च रत्नानां धनानां च पराजये । अभीप्सितविनाशश्च वाक्पारुष्यमनन्तरम् ॥

vividhānāṃ ca ratnānāṃ dhanānāṃ ca parājaye | abhīpsitavināśaśca vākpāruṣyamanantaram

नाना प्रकार के रत्नों और धन के हार जाने पर मनचाही वस्तुओं का नाश होता है, और उसके बाद कटु वचन सुनने पड़ते हैं।

श्लोक 11 (4.70.11)

अविश्वास्यं बुधैर्नित्यमेकाह्ना द्रव्यनाशनम् । द्यूते हारितवान्सर्वं तस्माद्द्यूतं न रोचये ॥

aviśvāsyaṃ budhairnityamekāhnā dravyanāśanam | dyūte hāritavānsarvaṃ tasmāddyūtaṃ na rocaye

बुद्धिमान लोग जुए को कभी विश्वास के योग्य नहीं मानते; वह एक ही दिन में धन का नाश कर देता है। उन्होंने जुए में सब कुछ हार दिया था; इसलिए मुझे जुआ अच्छा नहीं लगता।

श्लोक 12 (4.70.12)

अथवा मन्यसे राजन्दीव्याव यदि रोचते । एवमाभाष्य वाक्यैस्तु क्रीडतस्तौ नरोत्तमौ ॥

athavā manyase rājandīvyāva yadi rocate | evamābhāṣya vākyaistu krīḍatastau narottamau

या फिर, हे राजन्, यदि तुम उचित समझो और तुम्हें रुचे तो हम दोनों खेलें।" ऐसा कहकर वे दोनों नरश्रेष्ठ खेलने लगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (4.70.13)

प्रवर्तमाने द्यूते तु मात्स्यः पाण्डवमब्रवीत् ॥

pravartamāne dyūte tu mātsyaḥ pāṇḍavamabravīt

खेल चलते समय मत्स्यराज ने पाण्डव युधिष्ठिर से कहा —

विराट उवाच

श्लोक 14 (4.70.14)

पश्य पुत्रेण मे युद्धे तादृशाः कुरवो जिताः । कुरवोऽतिरथाः सर्वे देवैरपि सुदुर्जयाः ॥

paśya putreṇa me yuddhe tādṛśāḥ kuravo jitāḥ | kuravo'tirathāḥ sarve devairapi sudurjayāḥ

"देखो, मेरे पुत्र ने युद्ध में वैसे-वैसे कौरवों को जीत लिया — वे कौरव जो सब अतिरथी हैं और देवताओं के लिए भी दुर्जय हैं!"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (4.70.15)

ततोऽब्रवीद्धर्मराजो द्यूते मात्स्यं युधिष्ठिरः । दिष्ट्या ते विजिता गावः कुरवश्च पराजिताः ॥

tato'bravīddharmarājo dyūte mātsyaṃ yudhiṣṭhiraḥ | diṣṭyā te vijitā gāvaḥ kuravaśca parājitāḥ

तब खेलते-खेलते धर्मराज युधिष्ठिर ने मत्स्यराज से कहा — "सौभाग्य से तुम्हारी गायें जीत ली गईं और कौरव पराजित हुए।

कङ्क उवाच

श्लोक 16 (4.70.16)

अत्यद्भुततमं मन्ये उत्तरश्चेत्कुरूञ्जयेत् । यन्ता बृहन्नला यस्य स कथंचिद्विजेष्यते ॥

atyadbhutatamaṃ manye uttaraścetkurūñjayet | yantā bṛhannalā yasya sa kathaṃcidvijeṣyate

यदि उत्तर अकेले कौरवों को जीत ले तो मैं उसे सबसे बड़ा आश्चर्य मानूँ; पर जिसका सारथि बृहन्नला हो, वह किसी-न-किसी प्रकार जीत ही लेगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (4.70.17)

ततो विराटः क्षुभितो मन्युना च परिप्लुतः । उवाच वचनं क्रुद्धः परिव्राजमनन्तरम् ॥

tato virāṭaḥ kṣubhito manyunā ca pariplutaḥ | uvāca vacanaṃ kruddhaḥ parivrājamanantaram

यह सुनकर विराट क्षुब्ध हो उठे और क्रोध से भरकर तुरंत उस संन्यासी से क्रुद्ध वचन बोले —

विराट उवाच

श्लोक 18 (4.70.18)

तादृशेन तु योधेन महेष्वासेन धीमता । कुरवो निर्जिता युद्धे तत्र किं ब्राह्मणाद्भुतम् ॥

tādṛśena tu yodhena maheṣvāsena dhīmatā | kuravo nirjitā yuddhe tatra kiṃ brāhmaṇādbhutam

"ऐसे महाधनुर्धर और बुद्धिमान योद्धा ने युद्ध में कौरवों को हराया है — हे ब्राह्मण, इसमें आश्चर्य की क्या बात है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 19 (4.70.19)

यन्ता तथाविधो यस्य रथे तिष्ठति वीर्यवान् । यदेतद्दुष्करं कुर्यात्तत्र किं नाद्भुतं भवेत् ॥

yantā tathāvidho yasya rathe tiṣṭhati vīryavān | yadetadduṣkaraṃ kuryāttatra kiṃ nādbhutaṃ bhavet

"जिसके रथ में ऐसा पराक्रमी सारथि खड़ा हो और वह ऐसा दुष्कर काम कर दिखाए — उसमें आश्चर्य की बात क्यों नहीं होगी?"

विराट उवाच

श्लोक 20 (4.70.20)

समं षण्डेन मे पुत्रं ब्रह्मबन्धो प्रशंससि । वाच्यावाच्यं न जानीषे नूनं मामवमन्यसे ॥

samaṃ ṣaṇḍena me putraṃ brahmabandho praśaṃsasi | vācyāvācyaṃ na jānīṣe nūnaṃ māmavamanyase

"अरे अधम ब्राह्मण, तू मेरे पुत्र की एक नपुंसक के बराबर प्रशंसा करता है! तू नहीं जानता कि क्या कहना चाहिए और क्या नहीं; निश्चय ही तू मेरा अपमान करता है।

श्लोक 21 (4.70.21)

पुमांसो बहवो दृष्टाः सूताश्च बहवो मया । विक्रम्य यन्ता योद्धा च न मे दृष्टः कदाचन ॥

pumāṃso bahavo dṛṣṭāḥ sūtāśca bahavo mayā | vikramya yantā yoddhā ca na me dṛṣṭaḥ kadācana

मैंने बहुत-से पुरुष और बहुत-से सारथि देखे हैं, पर ऐसा सारथि कभी नहीं देखा जो पराक्रम करके योद्धा भी बन जाए।

श्लोक 22 (4.70.22)

विप्रियं न चरेद्राज्ञामनुकूलं प्रियं वदेत् । आचरन्विप्रियं राज्ञां न जातु सुखमेधते ॥

vipriyaṃ na caredrājñāmanukūlaṃ priyaṃ vadet | ācaranvipriyaṃ rājñāṃ na jātu sukhamedhate

राजाओं का अप्रिय नहीं करना चाहिए; अनुकूल और प्रिय वचन ही बोलना चाहिए। जो राजाओं का अप्रिय करता है, वह कभी सुख से नहीं बढ़ता।

श्लोक 23 (4.70.23)

वयस्यत्वात्तु ते सर्वमपराधमिमं क्षमे । नेदृशीं प्रवदेर्वाचं यदि जीवितुमिच्छसि ॥

vayasyatvāttu te sarvamaparādhamimaṃ kṣame | nedṛśīṃ pravadervācaṃ yadi jīvitumicchasi

तू मेरा मित्र है, इसलिए मैं तेरा यह सारा अपराध क्षमा करता हूँ; पर यदि जीना चाहता है तो फिर ऐसी बात मत कहना।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 24 (4.70.24)

ततोऽब्रवीत्पुनः कङ्कः प्रहस्य कुरुवर्धनः । बृहन्नलाया राजेन्द्र घुष्यतां नगरे जयः ॥

tato'bravītpunaḥ kaṅkaḥ prahasya kuruvardhanaḥ | bṛhannalāyā rājendra ghuṣyatāṃ nagare jayaḥ

तब कुरुवंश को बढ़ाने वाले कङ्क ने हँसकर फिर कहा — "हे राजेन्द्र, नगर में बृहन्नला की विजय की घोषणा कराइए।

कङ्क उवाच

श्लोक 25 (4.70.25)

उत्तरेण तु सारथ्यं कृतं नूनं भविष्यति । निमित्तं किंचिदुत्पन्नं तर्कश्चापि दृढो मम । यतो जानामि राजेन्द्र नान्यथा तद्भविष्यति ॥

uttareṇa tu sārathyaṃ kṛtaṃ nūnaṃ bhaviṣyati | nimittaṃ kiṃcidutpannaṃ tarkaścāpi dṛḍho mama | yato jānāmi rājendra nānyathā tadbhaviṣyati

निश्चय ही सारथि का काम उत्तर ने किया होगा। कोई लक्षण प्रकट हुआ है और मेरा तर्क भी दृढ़ है; इसलिए, हे राजेन्द्र, मैं जानता हूँ कि बात इसके सिवा और कुछ नहीं हो सकती।

श्लोक 26 (4.70.26)

कुरवोऽपि महावीर्या देवैरपि सुदुर्जयाः । ससोमवरुणादित्यैः सयक्षेशहुताशनैः ॥

kuravo'pi mahāvīryā devairapi sudurjayāḥ | sasomavaruṇādityaiḥ sayakṣeśahutāśanaiḥ

कौरव भी महापराक्रमी हैं और देवताओं के लिए भी दुर्जय हैं — सोम, वरुण, आदित्यों, यक्षराज कुबेर और अग्नि के लिए भी।

श्लोक 27 (4.70.27)

यत्र शान्तनवो भीष्मो द्रोणकर्णौ सुदुर्जयौ । अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तो जयद्रथः ॥

yatra śāntanavo bhīṣmo droṇakarṇau sudurjayau | aśvatthāmā vikarṇaśca somadatto jayadrathaḥ

जहाँ शान्तनुपुत्र भीष्म, दुर्जय द्रोण और कर्ण, अश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त, जयद्रथ,

श्लोक 28 (4.70.28)

भूरिश्रवाः शलो भूरिर्जलसन्धिश्च वीर्यवान् । दुर्योधनो दुष्प्रसहो दुःशासनविविंशती ॥

bhūriśravāḥ śalo bhūrirjalasandhiśca vīryavān | duryodhano duṣprasaho duḥśāsanaviviṃśatī

भूरिश्रवा, शल, भूरि, पराक्रमी जलसन्ध, दुर्योधन, दुष्प्रसह, दुःशासन और विविंशति,

श्लोक 29 (4.70.29)

वृषसेनोऽश्ववेगश्च वायुवेगसुवर्चसौ । बाह्लीकः शूरसेनश्च युयुत्सुश्च परन्तपः ॥

vṛṣaseno'śvavegaśca vāyuvegasuvarcasau | bāhlīkaḥ śūrasenaśca yuyutsuśca parantapaḥ

वृषसेन, अश्ववेग, वायुवेग और सुवर्चा, बाह्लीक, शूरसेन और शत्रुओं को तपाने वाला युयुत्सु,

श्लोक 30 (4.70.30)

सौबलः शकुनिश्चैव द्युमत्सेनश्च साल्वराट् । अन्ये च बहवः शूरा नानाजनपदेश्वराः ॥

saubalaḥ śakuniścaiva dyumatsenaśca sālvarāṭ | anye ca bahavaḥ śūrā nānājanapadeśvarāḥ

सुबलपुत्र शकुनि, साल्वराज द्युमत्सेन, और अनेक देशों के स्वामी बहुत-से दूसरे शूरवीर;

श्लोक 31 (4.70.31)

कृपेणाचार्यमुख्येन सहिताः कुरवो नृपाः । सज्जकार्मुकनिस्त्रिंशा रथिनो रथयूथपाः । अन्ये चैव महावीर्या राजपुत्रा महारथाः ॥

kṛpeṇācāryamukhyena sahitāḥ kuravo nṛpāḥ | sajjakārmukanistriṃśā rathino rathayūthapāḥ | anye caiva mahāvīryā rājaputrā mahārathāḥ

आचार्यों में प्रमुख कृप के साथ कुरु-नरेश, धनुष चढ़ाए और खड्ग तैयार रखे रथी और रथ-यूथों के नायक, तथा दूसरे भी महापराक्रमी महारथी राजकुमार —

श्लोक 32 (4.70.32)

मरुद्गणैः परिवृतः साक्षादपि पुरंदरः । तद्बलं न जयेत्क्रुद्धो भीष्मद्रोणादिभिर्वृतम् ॥

marudgaṇaiḥ parivṛtaḥ sākṣādapi puraṃdaraḥ | tadbalaṃ na jayetkruddho bhīṣmadroṇādibhirvṛtam

उस सेना को, जिसमें भीष्म, द्रोण आदि हैं, मरुद्गणों से घिरे स्वयं इन्द्र भी क्रोध करके नहीं जीत सकते।

श्लोक 33 (4.70.33)

कस्तद्बृहन्नलादन्यो मनुष्यः प्रतियोत्स्यति । यस्य बाहुबले तुल्यो न भविष्यति कश्चन ॥

kastadbṛhannalādanyo manuṣyaḥ pratiyotsyati | yasya bāhubale tulyo na bhaviṣyati kaścana

बृहन्नला के सिवा कौन मनुष्य उससे लड़ सकता है — वह, जिसके बाहुबल के बराबर कोई कभी नहीं होगा,

श्लोक 34 (4.70.34)

अतीव समरं दृष्ट्वा हर्षो यस्याभिवर्धते । किमेवं पुरुषो लोके दिवि वा भुवि विद्यते ॥

atīva samaraṃ dṛṣṭvā harṣo yasyābhivardhate | kimevaṃ puruṣo loke divi vā bhuvi vidyate

जिसका हर्ष भयंकर युद्ध देखकर और भी बढ़ जाता है? क्या संसार में, स्वर्ग में या पृथ्वी पर, ऐसा कोई पुरुष है?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (4.70.35)

तेन संक्षुभितो राजा दीर्यमाणेन चेतसा । अब्रवीद्वचनं क्रूरमजानन्वै युधिष्ठिरम् ॥

tena saṃkṣubhito rājā dīryamāṇena cetasā | abravīdvacanaṃ krūramajānanvai yudhiṣṭhiram

इस पर क्षुब्ध और विदीर्ण हृदय वाले राजा ने, यह न जानते हुए कि वे युधिष्ठिर हैं, कठोर वचन कहे —

विराट उवाच

श्लोक 36 (4.70.36)

कङ्क मा ब्रूहि मे वाक्यं प्रतिकूलं द्विजोत्तम । बहुशः प्रतिषिद्धस्त्वं न च वाचं नियच्छसि ॥

kaṅka mā brūhi me vākyaṃ pratikūlaṃ dvijottama | bahuśaḥ pratiṣiddhastvaṃ na ca vācaṃ niyacchasi

"हे द्विजश्रेष्ठ कङ्क, मुझसे प्रतिकूल वचन मत बोलो! तुम्हें कई बार रोका गया है, फिर भी तुम अपनी वाणी पर संयम नहीं रखते।

श्लोक 37 (4.70.37)

नियन्ता चेन्न विद्येत न कश्चिद्धर्ममाचरेत् । इति प्रक्षुभितो राजा सोऽक्षेणाभ्यहनद्भृशम् ॥

niyantā cenna vidyeta na kaściddharmamācaret | iti prakṣubhito rājā so'kṣeṇābhyahanadbhṛśam

यदि कोई नियंत्रण करने वाला न हो तो कोई धर्म का आचरण ही न करे।" ऐसा कहकर अत्यन्त क्षुब्ध राजा ने उन्हें पासे से ज़ोर से मारा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 38 (4.70.38)

तस्य तक्षकभोगाभं बाहुमुत्क्षिप्य दक्षिणम् । विराटः प्राहनत्क्रुद्धः कर्णमाश्रित्य दक्षिणम् ॥

tasya takṣakabhogābhaṃ bāhumutkṣipya dakṣiṇam | virāṭaḥ prāhanatkruddhaḥ karṇamāśritya dakṣiṇam

तक्षक नाग के शरीर-जैसी अपनी दाहिनी भुजा उठाकर क्रुद्ध विराट ने उनके दाहिने कान के पास प्रहार किया,

श्लोक 39 (4.70.39)

मुखे युधिष्ठिरं कोपान्मैवमित्यवभर्त्सयन् । बलवत्प्रतिविद्धस्य नस्तः शोणितमास्रवत् ॥

mukhe yudhiṣṭhiraṃ kopānmaivamityavabhartsayan | balavatpratividdhasya nastaḥ śoṇitamāsravat

क्रोध में उन्होंने युधिष्ठिर के मुख पर मारा और "ऐसा नहीं!" कहकर उन्हें डाँटा। ज़ोर से चोट लगने के कारण उनकी नाक से रक्त बहने लगा।

श्लोक 40 (4.70.40)

अक्षेणाभिहतो राजा विराटेन युधिष्ठिरः । तूष्णीमासीन्महाबाहुः कृष्णां पश्यन्सुदुःखिताम् ॥

akṣeṇābhihato rājā virāṭena yudhiṣṭhiraḥ | tūṣṇīmāsīnmahābāhuḥ kṛṣṇāṃ paśyansuduḥkhitām

विराट के पासे से आहत महाबाहु राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखी कृष्णा (द्रौपदी) की ओर देखते हुए चुपचाप बैठे रहे।

श्लोक 41 (4.70.41)

तस्य रक्तोत्पलनिभं शिरसः शोणितं तदा । प्रावर्तत महाबाहोरभिघातान्महात्मनः ॥

tasya raktotpalanibhaṃ śirasaḥ śoṇitaṃ tadā | prāvartata mahābāhorabhighātānmahātmanaḥ

तब उस चोट के कारण उन महाबाहु महात्मा के सिर से लाल कमल के समान रक्त बहने लगा।

श्लोक 42 (4.70.42)

तदप्राप्तं महीं पार्थः पाणिभ्यां समधारयत् । अवैक्षत च धर्मात्मा द्रौपदीं पार्श्वतः स्थिताम् ॥

tadaprāptaṃ mahīṃ pārthaḥ pāṇibhyāṃ samadhārayat | avaikṣata ca dharmātmā draupadīṃ pārśvataḥ sthitām

पृथ्वी पर गिरने से पहले ही पार्थ ने उसे दोनों हाथों में थाम लिया, और उन धर्मात्मा ने पास खड़ी द्रौपदी की ओर देखा।

श्लोक 43 (4.70.43)

सा वेदनामभिज्ञाय भर्तुश्चित्तवशानुगा । सा विषण्णा च भीता च क्रुद्धा च द्रुपदात्मजा ॥

sā vedanāmabhijñāya bhartuścittavaśānugā | sā viṣaṇṇā ca bhītā ca kruddhā ca drupadātmajā

पति के मन के अनुसार चलने वाली द्रौपदी ने उनकी पीड़ा समझ ली; वह द्रुपदकुमारी दुःखी भी थी, भयभीत भी और क्रुद्ध भी।

श्लोक 44 (4.70.44)

बाष्पं नियम्य कृच्छ्रेण भर्तुर्निःश्रेयसैषिणी । उत्तरीयेण सूक्ष्मेण तूर्णं जग्राह शोणितम् ॥

bāṣpaṃ niyamya kṛcchreṇa bharturniḥśreyasaiṣiṇī | uttarīyeṇa sūkṣmeṇa tūrṇaṃ jagrāha śoṇitam

बड़ी कठिनाई से आँसू रोककर, पति का परम हित चाहने वाली उस द्रौपदी ने तुरंत अपने महीन उत्तरीय में वह रक्त थाम लिया।

श्लोक 45 (4.70.45)

निगृह्य रक्तं वस्त्रेण सैरन्ध्री दुःखमोहिता । सौवर्णं गृह्य भृङ्गारं शोणितं तदपामृजत् । युधिष्ठिरस्य राजेन्द्र द्रुपदेन्द्रसुता तदा ॥

nigṛhya raktaṃ vastreṇa sairandhrī duḥkhamohitā | sauvarṇaṃ gṛhya bhṛṅgāraṃ śoṇitaṃ tadapāmṛjat | yudhiṣṭhirasya rājendra drupadendrasutā tadā

हे राजन्, वस्त्र में रक्त थामकर दुःख से व्याकुल सैरन्ध्री ने सोने की झारी ली, और तब द्रुपदराज की उस पुत्री ने युधिष्ठिर का रक्त धो दिया।

विराट उवाच

श्लोक 46 (4.70.46)

सैरन्ध्रि किमिदं रक्तमुत्तरीयेण गृह्यते । कोऽत्र हेतुर्विशालाक्षि तन्ममाचक्ष्व तत्त्वतः ॥

sairandhri kimidaṃ raktamuttarīyeṇa gṛhyate | ko'tra heturviśālākṣi tanmamācakṣva tattvataḥ

"सैरन्ध्री, यह क्या रक्त है जिसे तुम उत्तरीय में थाम रही हो? हे विशाल नेत्रों वाली, इसका क्या कारण है? मुझे ठीक-ठीक बताओ।"

सैरन्ध्र्युवाच

श्लोक 47 (4.70.47)

रक्तबिन्दूनि यावन्ति कङ्कस्य धरणीतले । तावद्वर्षाणि राष्ट्रे ते अनावृष्टिर्भविष्यति ॥

raktabindūni yāvanti kaṅkasya dharaṇītale | tāvadvarṣāṇi rāṣṭre te anāvṛṣṭirbhaviṣyati

"कङ्क के रक्त की जितनी बूँदें धरती पर गिरें, उतने ही वर्षों तक तुम्हारे राज्य में अनावृष्टि रहेगी।

श्लोक 48 (4.70.48)

एतन्निमित्तं मात्स्येन्द्र कङ्कस्य रुधिरं मया । गृहीतमुत्तरीयेण विनाशो मा भवेत्तव ॥

etannimittaṃ mātsyendra kaṅkasya rudhiraṃ mayā | gṛhītamuttarīyeṇa vināśo mā bhavettava

हे मत्स्यराज, इसी कारण मैंने कङ्क का रक्त अपने उत्तरीय में थाम लिया, ताकि तुम्हारा विनाश न हो।

श्लोक 49 (4.70.49)

यतीशं यो विहन्येत तस्यायुर्विनशिष्यति । यो यतीशं नियम्येत सहस्रं यातना यमे ॥

yatīśaṃ yo vihanyeta tasyāyurvinaśiṣyati | yo yatīśaṃ niyamyeta sahasraṃ yātanā yame

जो किसी श्रेष्ठ संन्यासी पर प्रहार करता है, उसकी आयु नष्ट हो जाती है; जो किसी श्रेष्ठ संन्यासी को दण्ड देता है, वह यमलोक में सहस्र यातनाएँ भोगता है।

श्लोक 50 (4.70.50)

यतौ रक्तं दर्शयति यावत्पांसुरगृह्यत । तावन्तः पितृलोकस्थाः पितरः प्रपतन्त्यधः ॥

yatau raktaṃ darśayati yāvatpāṃsuragṛhyata | tāvantaḥ pitṛlokasthāḥ pitaraḥ prapatantyadhaḥ

जो संन्यासी का रक्त बहाता है, वह रक्त धूल के जितने कणों को भिगोता है, पितृलोक में रहने वाले उसके उतने ही पितर नीचे गिर पड़ते हैं।

श्लोक 51 (4.70.51)

इति ज्ञात्वा विराटेन्द्र धृतं रक्तं च वाससा । मया तव हितार्थाय त्वयि प्रणयकारणात् ॥

iti jñātvā virāṭendra dhṛtaṃ raktaṃ ca vāsasā | mayā tava hitārthāya tvayi praṇayakāraṇāt

हे विराटराज, यह जानकर मैंने तुम्हारे हित के लिए और तुम्हारे प्रति स्नेह के कारण यह रक्त वस्त्र में थाम लिया।"

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71