विराट पर्व · अध्याय 71
देवताओं का प्रस्थान और उत्तर का नगर-प्रवेश
जनमेजय के पूछने पर वैशम्पायन बताते हैं कि अर्जुन को अकेले कौरवों से लड़ते देखने आए देवता किस प्रकार उनकी प्रशंसा करते हुए स्वर्ग लौट गए। पराजित कौरव अपने देश की ओर चल पड़ते हैं, और विराट की भेजी सेना उत्तर की अगवानी को निकलती है; नगर के ऊपर उठती धूल देखकर अर्जुन पहले आशंका करते हैं कि कौरव लौट आए हैं, पर उत्तर अपने लोगों को पहचान लेते हैं। बाजों, मालाओं और आशीर्वादों से स्वागत पाकर उत्तर घोषणा करते हैं कि युद्ध अर्जुन ने जीता है, और सबकी प्रशंसा पाकर भी वे अन्तर्मुख बने रहते हैं, जबकि अर्जुन राजकुमारी उत्तरा और उसकी सखियों को सुंदर वस्त्र देते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (4.71.1)
युद्धं तु मानुषं द्रष्टुमागतास्त्रिदशाः पुरा । किमकुर्वन्त ते पश्चात्कथयस्व ममानघ ॥
yuddhaṃ tu mānuṣaṃ draṣṭumāgatāstridaśāḥ purā | kimakurvanta te paścātkathayasva mamānagha
"देवता पहले उस मानवीय युद्ध को देखने आए थे। उसके बाद उन्होंने क्या किया? हे निष्पाप, मुझे बताइए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (4.71.2)
वासवप्रमुखाः सर्वे देवाः सर्षिपुरोगमाः । यक्षगन्धर्वसङ्घाश्च गणा अप्सरसां तथा ॥
vāsavapramukhāḥ sarve devāḥ sarṣipurogamāḥ | yakṣagandharvasaṅghāśca gaṇā apsarasāṃ tathā
इन्द्र आदि सब देवता, जिनके आगे ऋषि थे, यक्षों और गन्धर्वों के समूह तथा अप्सराओं के गण —
श्लोक 3 (4.71.3)
युद्धं तु मानुषं दृष्ट्वा कुरूणां फल्गुनस्य च । एकस्य च बहूनां च रौद्रमत्युग्रदर्शनम् ॥
yuddhaṃ tu mānuṣaṃ dṛṣṭvā kurūṇāṃ phalgunasya ca | ekasya ca bahūnāṃ ca raudramatyugradarśanam
कौरवों और अर्जुन के उस मानवीय युद्ध को देखकर, जो एक और अनेक के बीच था, भयंकर और अत्यन्त उग्र दिखने वाला,
श्लोक 4 (4.71.4)
अस्त्राणामथ दिव्यानां प्रयोगानथ संग्रहान् । लघु सुष्ठु च चित्रं च कृतीनां च प्रयत्नतः ॥
astrāṇāmatha divyānāṃ prayogānatha saṃgrahān | laghu suṣṭhu ca citraṃ ca kṛtīnāṃ ca prayatnataḥ
दिव्य अस्त्रों का छोड़ा जाना और लौटाया जाना, जो कुशल योद्धाओं द्वारा यत्नपूर्वक, फुर्ती से, सधे हाथ से और विचित्र रीति से किया गया,
श्लोक 5 (4.71.5)
भीष्मं शारद्वतं द्रोणं कर्णं गाण्डीवधन्वना । जितानन्यान्भूमिपालान्दृष्ट्वा जग्मुर्दिवौकसः ॥
bhīṣmaṃ śāradvataṃ droṇaṃ karṇaṃ gāṇḍīvadhanvanā | jitānanyānbhūmipālāndṛṣṭvā jagmurdivaukasaḥ
और गाण्डीवधारी के द्वारा भीष्म, शरद्वान के पुत्र कृप, द्रोण, कर्ण और दूसरे राजाओं को पराजित देखकर — वे स्वर्गवासी चले गए।
श्लोक 6 (4.71.6)
सर्वे ते परितुष्टाश्च प्रशस्य च मुहुर्मुहुः । असङ्गगतिना तेन विमानेनाशुगामिना । प्रतिजग्मुरसङ्गास्ते त्रिदिवं च दिवौकसः ॥
sarve te parituṣṭāśca praśasya ca muhurmuhuḥ | asaṅgagatinā tena vimānenāśugāminā | pratijagmurasaṅgāste tridivaṃ ca divaukasaḥ
वे सब स्वर्गवासी अत्यन्त संतुष्ट होकर और बार-बार उनकी प्रशंसा करते हुए अपने उस शीघ्रगामी विमान से, जिसकी गति कहीं नहीं रुकती, बिना किसी बाधा के स्वर्ग लौट गए।
देवा ऊचुः
श्लोक 7 (4.71.7)
कुरवो निर्जिताः सर्वे भीष्मद्रोणकृपादयः । अजय्यास्त्रिदशैः सर्वैः सेन्द्रैः सर्वैः सुरासुरैः । पार्थेनैकेन संग्रामे विस्मयो नो महानहो ॥
kuravo nirjitāḥ sarve bhīṣmadroṇakṛpādayaḥ | ajayyāstridaśaiḥ sarvaiḥ sendraiḥ sarvaiḥ surāsuraiḥ | pārthenaikena saṃgrāme vismayo no mahānaho
"भीष्म, द्रोण, कृप आदि सब कौरव, जिन्हें इन्द्र सहित सब देवता और सब सुर-असुर भी नहीं जीत सकते थे, युद्ध में अकेले पार्थ ने जीत लिए। अहो, हमें बड़ा विस्मय है!
श्लोक 8 (4.71.8)
कस्मिन्मुहूर्ते संजातः कस्य धर्मस्य वा फलम् ॥
kasminmuhūrte saṃjātaḥ kasya dharmasya vā phalam
वह किस शुभ मुहूर्त में जन्मा था? यह किस धर्म का फल है?
श्लोक 9 (4.71.9)
किमाश्चर्यं फल्गुनेऽस्मिन्यो रुद्रेण न्ययोधयत् । निवातकवचानाजौ यस्त्रिंशत्कोटिसंमितान् ॥
kimāścaryaṃ phalgune'sminyo rudreṇa nyayodhayat | nivātakavacānājau yastriṃśatkoṭisaṃmitān
पर इस फाल्गुन में आश्चर्य ही क्या, जिसने रुद्र से युद्ध किया और जिसने संग्राम में तीस करोड़ निवातकवचों को परास्त किया?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (4.71.10)
तस्य चैतत्किमाश्चर्यं स्तुवन्त इति ते सुराः । जग्मुः सुरालयं हृष्टा विस्मयाविष्टचेतसः ॥
tasya caitatkimāścaryaṃ stuvanta iti te surāḥ | jagmuḥ surālayaṃ hṛṣṭā vismayāviṣṭacetasaḥ
"उसके लिए यह क्या आश्चर्य है?" — इस प्रकार स्तुति करते हुए वे देवता प्रसन्न होकर, विस्मय से भरे मन के साथ अपने लोक को चले गए।
श्लोक 11 (4.71.11)
कुरवोऽर्जुनबाणैश्च ताडिताः शरविक्षताः । कुरूनभिमुखा याताः समग्रबलवाहनाः ॥
kuravo'rjunabāṇaiśca tāḍitāḥ śaravikṣatāḥ | kurūnabhimukhā yātāḥ samagrabalavāhanāḥ
अर्जुन के बाणों से आहत और घायल कौरव अपनी समस्त सेना और वाहनों के साथ कुरुदेश की ओर चल पड़े।
श्लोक 12 (4.71.12)
विराटनगराच्चैव गजाश्वरथसंकुलाः । योधैः क्षत्रियदायादैर्बलवद्भिरधिष्ठिताः ॥
virāṭanagarāccaiva gajāśvarathasaṃkulāḥ | yodhaiḥ kṣatriyadāyādairbalavadbhiradhiṣṭhitāḥ
और विराटनगर से, हाथियों, घोड़ों और रथों से भरी, क्षत्रिय-कुल के बलवान योद्धाओं से युक्त —
श्लोक 13 (4.71.13)
विराटप्रहिता सेना नगराच्छीघ्रयायिनी । उत्तरं सह सूतेन प्रत्ययात्तमरिन्दमम् ॥
virāṭaprahitā senā nagarācchīghrayāyinī | uttaraṃ saha sūtena pratyayāttamarindamam
विराट की भेजी हुई वह शीघ्रगामी सेना नगर से निकलकर शत्रुओं का दमन करने वाले उत्तर और उनके सारथि की अगवानी को चली।
श्लोक 14 (4.71.14)
तस्मिंस्तूर्यशताकीर्णे हस्त्यश्वरथसंकुले । प्रहर्षः स्त्रीकुमाराणां तुमुलः समपद्यत ॥
tasmiṃstūryaśatākīrṇe hastyaśvarathasaṃkule | praharṣaḥ strīkumārāṇāṃ tumulaḥ samapadyata
सैकड़ों तुरहियों से गूँजती और हाथी, घोड़ों तथा रथों से भरी उस भीड़ में स्त्रियों और बालकों का भारी हर्ष-कोलाहल उठ खड़ा हुआ।
श्लोक 15 (4.71.15)
अर्जुनस्तु ततो दृष्ट्वा सैन्यरेणुं समुत्थितम् । सैन्यध्वजं निशम्याथ वैराटिं समभाषत ॥
arjunastu tato dṛṣṭvā sainyareṇuṃ samutthitam | sainyadhvajaṃ niśamyātha vairāṭiṃ samabhāṣata
तब सेना की उड़ती धूल देखकर और उसके ध्वज पहचानकर अर्जुन ने विराटपुत्र से कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 16 (4.71.16)
नगरे तुमुलः शब्दो रेणुश्चाक्रमते नभः । किंनु खल्वपयातास्ते कुरवो नगरं गताः ॥
nagare tumulaḥ śabdo reṇuścākramate nabhaḥ | kiṃnu khalvapayātāste kuravo nagaraṃ gatāḥ
"नगर में भारी कोलाहल है और धूल आकाश में चढ़ रही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि कौरव लौटकर नगर में जा पहुँचे हों?
श्लोक 17 (4.71.17)
ते चैव निर्जिताऽस्माभिर्महेष्वासाः सुतेजसः । आमुञ्च कवचं वीर चोदयस्व च वाजिनः । जवेनाभिप्रपद्यस्व विराटनगरं प्रति ॥
te caiva nirjitā'smābhirmaheṣvāsāḥ sutejasaḥ | āmuñca kavacaṃ vīra codayasva ca vājinaḥ | javenābhiprapadyasva virāṭanagaraṃ prati
पर उन तेजस्वी महाधनुर्धरों को तो हम जीत चुके हैं। हे वीर, कवच पहन लो और घोड़ों को हाँको; वेग से विराटनगर की ओर चलो।
श्लोक 18 (4.71.18)
न तावत्तलनिर्घोषं गाण्डीवस्य च निस्वनम् । ध्वजं वा दर्शयिष्यामि अथवा स्वजनो भवेत् ॥
na tāvattalanirghoṣaṃ gāṇḍīvasya ca nisvanam | dhvajaṃ vā darśayiṣyāmi athavā svajano bhavet
अभी मैं न तो अपनी हथेलियों की थाप, न गाण्डीव की टंकार सुनाऊँगा और न अपना ध्वज दिखाऊँगा; हो सकता है वे अपने ही लोग हों।"
उत्तर उवाच
श्लोक 19 (4.71.19)
सेनाग्रमेतन्मात्स्यानां गणिकाश्च स्वलंकृताः । कन्या रथेषु दृश्यन्ते योधा विविधवाससः ॥
senāgrametanmātsyānāṃ gaṇikāśca svalaṃkṛtāḥ | kanyā ratheṣu dṛśyante yodhā vividhavāsasaḥ
"यह मत्स्यों की सेना का अग्रभाग है, और सजी-धजी गणिकाएँ हैं; रथों में कन्याएँ दिखाई दे रही हैं, और तरह-तरह के वस्त्र पहने योद्धा।
श्लोक 20 (4.71.20)
उत्तरामत्र पश्यामि सखीभिः परिवारिताम् । अनीकिन्यः प्रदृश्यन्ते हस्तिनोऽश्वाश्च वर्मिताः ॥
uttarāmatra paśyāmi sakhībhiḥ parivāritām | anīkinyaḥ pradṛśyante hastino'śvāśca varmitāḥ
मुझे यहाँ सखियों से घिरी उत्तरा दिखाई दे रही है। सेना की टुकड़ियाँ दिख रही हैं, और कवच पहने हाथी और घोड़े,
श्लोक 21 (4.71.21)
रथिनश्च पदाताश्च बहवो न च शस्त्रिणः । विराटवचनात्सर्वे संहृष्टाः प्रतिभान्ति मे । न च मेऽत्र प्रतीघातश्चित्तस्य स्वजने यथा ॥
rathinaśca padātāśca bahavo na ca śastriṇaḥ | virāṭavacanātsarve saṃhṛṣṭāḥ pratibhānti me | na ca me'tra pratīghātaścittasya svajane yathā
रथी और पैदल सैनिक, बहुत-से, पर बिना शस्त्रों के; मुझे सब विराट की आज्ञा से हर्षित दिखाई देते हैं। यहाँ मेरे मन को कोई खटका नहीं लगता; ऐसा लगता है जैसे हम अपने ही लोगों के बीच हों।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (4.71.22)
ततः शीघ्रं समासाद्य उत्तरं स्वजनो बहु । परस्परममित्रघ्नं सस्वजे तं समागतम् ॥
tataḥ śīghraṃ samāsādya uttaraṃ svajano bahu | parasparamamitraghnaṃ sasvaje taṃ samāgatam
तब उनके बहुत-से स्वजन शीघ्र ही शत्रुनाशक उत्तर के पास पहुँचे और आने पर बारी-बारी से उन्हें गले लगाया।
श्लोक 23 (4.71.23)
प्रीतिमान्पुरुषव्याघ्रो हर्षयुक्तः पुनः पुनः ॥
prītimānpuruṣavyāghro harṣayuktaḥ punaḥ punaḥ
वह पुरुषसिंह बार-बार प्रेम और हर्ष से भर उठा।
जना ऊचुः
श्लोक 24 (4.71.24)
दिष्ट्या जयसि भद्रं ते दिष्ट्या सूतो बृहन्नला । दिष्ट्या संग्राममागम्य भयं तव न किंचन ॥
diṣṭyā jayasi bhadraṃ te diṣṭyā sūto bṛhannalā | diṣṭyā saṃgrāmamāgamya bhayaṃ tava na kiṃcana
"सौभाग्य है कि तुम विजयी हुए — तुम्हारा कल्याण हो! सौभाग्य है कि तुम्हारा सारथि बृहन्नला सकुशल है! सौभाग्य है कि संग्राम में जाकर भी तुम्हें कोई भय नहीं हुआ!"
उत्तर उवाच
श्लोक 25 (4.71.25)
अजैषीदेष ताञ्जिष्णुः कुरूनेकरथो रणे । एतस्य बाहुवीर्यं तद्येन गावो जिता मया । कुरवो निर्जिता यस्मात्संग्रामेऽमिततेजसः ॥
ajaiṣīdeṣa tāñjiṣṇuḥ kurūnekaratho raṇe | etasya bāhuvīryaṃ tadyena gāvo jitā mayā | kuravo nirjitā yasmātsaṃgrāme'mitatejasaḥ
"इसी जिष्णु ने अकेले एक रथ से युद्ध में उन कौरवों को जीता। इसी के बाहुबल से मैंने गायें जीतीं; इसी के कारण युद्ध में अमित तेज वाले कौरव पराजित हुए।
श्लोक 26 (4.71.26)
अकार्षीदेष तत्कर्म देवपुत्रोपमो युवा । एष तत्पुरुषव्याघ्रो विक्षोभ्य कुरुमण्डलम् । गावः प्रसह्य विजिता रणे मां चाभ्यपालयत् ॥
akārṣīdeṣa tatkarma devaputropamo yuvā | eṣa tatpuruṣavyāghro vikṣobhya kurumaṇḍalam | gāvaḥ prasahya vijitā raṇe māṃ cābhyapālayat
देवपुत्र के समान इस युवक ने वह काम किया। इसी पुरुषसिंह ने कुरु-मण्डल को क्षुब्ध करके युद्ध में बलपूर्वक गायें जीतीं और मेरी रक्षा की।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (4.71.27)
उत्तरस्य वचः श्रुत्वा शंसमानस्य चार्जुनम् । चोदिता राजपुत्रेण जयं मङ्गलवादिनः ॥
uttarasya vacaḥ śrutvā śaṃsamānasya cārjunam | coditā rājaputreṇa jayaṃ maṅgalavādinaḥ
अर्जुन की प्रशंसा करते हुए उत्तर के वचन सुनकर, राजकुमार की प्रेरणा से मंगल-वाचकों ने विजय की घोषणा की।
श्लोक 28 (4.71.28)
ततो गन्धैश्च माल्यैश्च धूपैश्च वसुसंभृतैः । कन्याः पार्थममित्रघ्नं किरन्त्यः समपूजयन् ॥
tato gandhaiśca mālyaiśca dhūpaiśca vasusaṃbhṛtaiḥ | kanyāḥ pārthamamitraghnaṃ kirantyaḥ samapūjayan
तब कन्याओं ने बहुमूल्य सामग्री से जुटाए गए सुगंधित द्रव्य, मालाएँ और धूप बिखेरते हुए शत्रुनाशक पार्थ का पूजन किया।
श्लोक 29 (4.71.29)
आपूर्यमाणो माल्यैश्च गन्धैश्च विविधैः शुभैः । संपूज्यमानो लोकेन नगरद्वारमागमत् ॥
āpūryamāṇo mālyaiśca gandhaiśca vividhaiḥ śubhaiḥ | saṃpūjyamāno lokena nagaradvāramāgamat
मालाओं और नाना प्रकार के शुभ सुगंधित द्रव्यों से लदे और लोगों द्वारा सम्मानित होते हुए वे नगर के द्वार पर पहुँचे।
श्लोक 30 (4.71.30)
भेर्यश्च तूर्याणि च वेणवश्च । विचित्रवेषाः प्रमदाजनाश्च । पुरो विराटस्य महाबलस्य । निष्क्रम्य भूमिंजयमभ्यनन्दन् ॥
bheryaśca tūryāṇi ca veṇavaśca | vicitraveṣāḥ pramadājanāśca | puro virāṭasya mahābalasya | niṣkramya bhūmiṃjayamabhyanandan
भेरियाँ, तुरहियाँ और बाँसुरियाँ, तथा रंग-बिरंगे वेश में सजी स्त्रियाँ महाबली विराट के नगर से निकलकर भूमिंजय (उत्तर) का अभिनंदन करने लगीं।
श्लोक 31 (4.71.31)
प्रशस्यमानस्तु जयेन तत्र । पुत्रो विराटस्य न हृष्यति स्म । संभाष्यमाणस्तु जनेन तेन । सोऽन्तर्मनाः पाण्डवमीक्षमाणः ॥
praśasyamānastu jayena tatra | putro virāṭasya na hṛṣyati sma | saṃbhāṣyamāṇastu janena tena | so'ntarmanāḥ pāṇḍavamīkṣamāṇaḥ
वहाँ विजय के लिए प्रशंसा पाकर भी विराट का पुत्र प्रसन्न नहीं हुआ; उन सब लोगों से बातें करते हुए भी वह अन्तर्मुख बना रहा और पाण्डव अर्जुन की ओर ही देखता रहा।
श्लोक 32 (4.71.32)
पुत्र्यै विराटस्य ततो वराणि । वस्त्राण्यदात्पाण्डुसुतः सखीभ्यः । सभाजयंश्चापि समागतास्ता । दृष्ट्वा जयं तच्च बलं कुमार्यः ॥
putryai virāṭasya tato varāṇi | vastrāṇyadātpāṇḍusutaḥ sakhībhyaḥ | sabhājayaṃścāpi samāgatāstā | dṛṣṭvā jayaṃ tacca balaṃ kumāryaḥ
तब पाण्डुपुत्र अर्जुन ने विराट की पुत्री और उसकी सखियों को सुंदर वस्त्र दिए, और वहाँ एकत्र हुई उन कुमारियों का भी सम्मान किया जिन्होंने वह विजय और वह बल देखा था।