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विराट पर्व · अध्याय 72

विराट द्वारा कङ्क से क्षमायाचना; उत्तर ने विजय का श्रेय देवपुत्र को दिया

उत्तर विजयी होकर लौटता है, पर पासों के खेल में विराट के प्रहार से घायल युधिष्ठिर बृहन्नला को द्वार पर ही रुकवा देते हैं, क्योंकि अर्जुन का व्रत है कि युद्ध के बाहर उनके भाई का रक्त बहाने वाला जीवित न बचे। कङ्क को घायल देखकर उत्तर व्याकुल हो उठता है और पिता से ब्राह्मण की क्षमा माँगवाता है, जिसे युधिष्ठिर क्षमा कर देते हैं। जब विराट पुत्र की प्रशंसा करते हुए पूछता है कि कर्ण, कृप, भीष्म, दुर्योधन और द्रोण से उसका सामना कैसा रहा, तो उत्तर बताता है कि विजय एक देवपुत्र की थी, जिसने कौरवों को पीछे धकेलकर उनके वस्त्र छीन लिए। विराट उस वीर को पुरस्कृत करना चाहता है, पर अर्जुन को नहीं पहचानता; अर्जुन जीते हुए वस्त्र और रत्न राजकुमारी उत्तरा को दे देता है।

अध्याय 71अध्याय-सूचीअध्याय 73

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (4.72.1)

सभाज्यमानः पौरैश्च स्त्रीभिर्जानपदैरपि । आसाद्यान्तःपुरद्वारं पित्रे संप्रत्यवेदयत् ॥

sabhājyamānaḥ pauraiśca strībhirjānapadairapi | āsādyāntaḥpuradvāraṃ pitre saṃpratyavedayat

नगरवासियों, स्त्रियों और जनपद के लोगों से सम्मानित होता हुआ उत्तर अन्तःपुर के द्वार पर पहुँचा और उसने पिता को अपने आगमन की सूचना भिजवाई।

श्लोक 2 (4.72.2)

ततो द्वाःस्थः समासाद्य प्रणिपत्य कृताञ्जलिः । वर्धयित्वा जयाशीर्भिरिदं वचनमब्रवीत् ॥

tato dvāḥsthaḥ samāsādya praṇipatya kṛtāñjaliḥ | vardhayitvā jayāśīrbhiridaṃ vacanamabravīt

तब द्वारपाल ने पास आकर हाथ जोड़कर प्रणाम किया, विजय के आशीर्वादों से राजा का अभिनन्दन किया और यह वचन कहा—

द्वाःस्थ उवाच

श्लोक 3 (4.72.3)

राजन्पृथुयशस्तुभ्यं जित्वा शत्रून्समागतः । उत्तरः सह सूतेन द्वारि तिष्ठति वारितः ॥

rājanpṛthuyaśastubhyaṃ jitvā śatrūnsamāgataḥ | uttaraḥ saha sūtena dvāri tiṣṭhati vāritaḥ

"हे महायशस्वी राजन्, शत्रुओं को जीतकर उत्तर आपके पास लौट आया है। वह अपने सारथि के साथ द्वार पर रुका खड़ा है।

श्लोक 4 (4.72.4)

कुमारो योधमुख्यैश्च गणिकाभिश्च संवृतः । पौरजानपदैर्युक्तः पूज्यमानो जयाशिषा ॥

kumāro yodhamukhyaiśca gaṇikābhiśca saṃvṛtaḥ | paurajānapadairyuktaḥ pūjyamāno jayāśiṣā

राजकुमार प्रमुख योद्धाओं और गणिकाओं से घिरा है, नगर और जनपद के लोग उसके साथ हैं और विजय के आशीर्वादों से उसका सम्मान हो रहा है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (4.72.5)

ततो हृष्टो महीपालः क्षत्तारमिदमब्रवीत् । प्रवेशयोभौ तौ तूर्णं दर्शनेप्सुरहं तयोः ॥

tato hṛṣṭo mahīpālaḥ kṣattāramidamabravīt | praveśayobhau tau tūrṇaṃ darśanepsurahaṃ tayoḥ

तब हर्षित राजा ने द्वारपाल से कहा—"दोनों को शीघ्र भीतर ले आओ; मैं उन दोनों को देखना चाहता हूँ।"

श्लोक 6 (4.72.6)

क्षत्तारं कुरुराजस्तु शनैः कर्ण उपाजपत् । उत्तरः प्रविशत्वेको न प्रवेश्या बृहन्नला ॥

kṣattāraṃ kururājastu śanaiḥ karṇa upājapat | uttaraḥ praviśatveko na praveśyā bṛhannalā

पर कुरुराज युधिष्ठिर ने धीरे से द्वारपाल के कान में कहा—"उत्तर अकेला भीतर आए; बृहन्नला को प्रवेश न दिया जाए।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 7 (4.72.7)

एतस्य हि महाबाहोर्व्रतं नित्यं महात्मनः । यो ममाङ्गे व्रणं कुर्याच्छोणितं वा प्रदर्शयेत् । अन्यत्र संग्रामगतान्न स जीवेत्कथंचन ॥

etasya hi mahābāhorvrataṃ nityaṃ mahātmanaḥ | yo mamāṅge vraṇaṃ kuryācchoṇitaṃ vā pradarśayet | anyatra saṃgrāmagatānna sa jīvetkathaṃcana

क्योंकि इस महाबाहु महात्मा का यह नित्य व्रत है कि युद्ध के अतिरिक्त जो कोई मेरे शरीर पर घाव करे या मेरा रक्त बहाए, वह किसी भी प्रकार जीवित न रहे।

श्लोक 8 (4.72.8)

व्यक्तं भृशं सुसंक्रुद्धो मां दृष्ट्वैव सशोणितम् । विराटमिह सामात्यं हन्यात्सबलवाहनम् ॥

vyaktaṃ bhṛśaṃ susaṃkruddho māṃ dṛṣṭvaiva saśoṇitam | virāṭamiha sāmātyaṃ hanyātsabalavāhanam

निश्चय ही मुझे रक्त से सना देखते ही वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर यहीं विराट को उसके मन्त्रियों, सेना और वाहनों सहित मार डालेगा।

श्लोक 9 (4.72.9)

इन्द्रं वापि कुबेरं वा यमं वा वरुणं तथा । मम शोणितकर्तारं मृद्नीयात्किं पुनर्नरम् ॥

indraṃ vāpi kuberaṃ vā yamaṃ vā varuṇaṃ tathā | mama śoṇitakartāraṃ mṛdnīyātkiṃ punarnaram

मेरा रक्त बहाने वाला चाहे इन्द्र हो या कुबेर, यम हो या वरुण, वह उसे भी कुचल डालेगा; फिर मनुष्य की तो बात ही क्या!

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (4.72.10)

क्षणमात्रं तु तत्रैव द्वारि तिष्ठतु वीर्यवान् । इति प्रोवाच धर्मात्मा युधिष्ठिर उदारधीः ॥

kṣaṇamātraṃ tu tatraiva dvāri tiṣṭhatu vīryavān | iti provāca dharmātmā yudhiṣṭhira udāradhīḥ

"वह पराक्रमी क्षण भर वहीं द्वार पर ठहरे।" ऐसा धर्मात्मा, उदारबुद्धि युधिष्ठिर ने कहा।

श्लोक 11 (4.72.11)

इत्युक्त्वा क्षमया युक्तो धर्मराजो घृणान्वितः । सभायां सह मात्स्येन तूष्णीमुपविवेश ह ॥

ityuktvā kṣamayā yukto dharmarājo ghṛṇānvitaḥ | sabhāyāṃ saha mātsyena tūṣṇīmupaviveśa ha

यह कहकर क्षमाशील और करुणामय धर्मराज मत्स्यराज के साथ सभा में चुपचाप बैठ गए।

श्लोक 12 (4.72.12)

ततो राजसुतो ज्येष्ठः प्राविशत्पृथिवींजयः । ववन्दे स पितुः पादौ कङ्कं चाप्युपतिष्ठत ॥

tato rājasuto jyeṣṭhaḥ prāviśatpṛthivīṃjayaḥ | vavande sa pituḥ pādau kaṅkaṃ cāpyupatiṣṭhata

तब राजा का ज्येष्ठ पुत्र, पृथ्वी को जीतने वाला उत्तर, भीतर आया। उसने पिता के चरणों में प्रणाम किया और कङ्क के पास भी गया।

श्लोक 13 (4.72.13)

पश्यन्युधिष्ठिरं दृष्ट्या वक्रया चरणौ पितुः । अभिवाद्य ततो दृष्ट्वा कङ्कस्य रुधिरप्लुतम् । हृदयेऽदह्यत तदा मृत्युग्रस्त इवोत्तरः ॥

paśyanyudhiṣṭhiraṃ dṛṣṭyā vakrayā caraṇau pituḥ | abhivādya tato dṛṣṭvā kaṅkasya rudhiraplutam | hṛdaye'dahyata tadā mṛtyugrasta ivottaraḥ

पिता के चरणों में प्रणाम करते हुए उसने तिरछी दृष्टि से युधिष्ठिर को देखा; फिर कङ्क को रक्त से भीगा देखकर उत्तर का हृदय ऐसे जल उठा मानो उसे मृत्यु ने ग्रस लिया हो।

श्लोक 14 (4.72.14)

ततो रुधिरसिक्ताङ्गमनेकाग्रमनागसम् । भूमावेकान्त आसीनं सैरन्ध्र्या समुपासितम् । ततः पप्रच्छ राजानं त्वरमाण इवोत्तरः ॥

tato rudhirasiktāṅgamanekāgramanāgasam | bhūmāvekānta āsīnaṃ sairandhryā samupāsitam | tataḥ papraccha rājānaṃ tvaramāṇa ivottaraḥ

तब रक्त से सने अंगों वाले, व्याकुल और निरपराध कङ्क को एकान्त में भूमि पर बैठा और सैरन्ध्री को उनकी सेवा करते देखकर उत्तर ने उतावली में राजा से पूछा—

उत्तर उवाच

श्लोक 15 (4.72.15)

केनायं ताडितः कङ्कः केन पापमिदं कृतम् । को वा जिगमिषुर्मृत्युं केन स्पृष्टः पदोरगः ॥

kenāyaṃ tāḍitaḥ kaṅkaḥ kena pāpamidaṃ kṛtam | ko vā jigamiṣurmṛtyuṃ kena spṛṣṭaḥ padoragaḥ

"इस कङ्क को किसने मारा? यह पाप किसने किया? कौन मृत्यु के मुँह में जाना चाहता है? किसने साँप पर पैर रखा है?

श्लोक 16 (4.72.16)

श्रोत्रियो ब्राह्मणश्रेष्ठ इन्द्रासनरतिक्षमः । पूजनीयोऽभिवाद्यश्च न प्रबाध्योऽयमीदृशः ॥

śrotriyo brāhmaṇaśreṣṭha indrāsanaratikṣamaḥ | pūjanīyo'bhivādyaśca na prabādhyo'yamīdṛśaḥ

यह वेदपाठी श्रेष्ठ ब्राह्मण है, इन्द्र के आसन पर बैठने योग्य है; ऐसा व्यक्ति पूजनीय और वन्दनीय है, उसे सताया नहीं जाना चाहिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (4.72.17)

स पुत्रस्य वचः श्रुत्वा विराटो राष्ट्रवर्धनः । प्रत्युवाचोत्तरं वाक्यं साध्वसाद्ध्वस्तमानसः ॥

sa putrasya vacaḥ śrutvā virāṭo rāṣṭravardhanaḥ | pratyuvācottaraṃ vākyaṃ sādhvasāddhvastamānasaḥ

पुत्र की बात सुनकर राज्य को समृद्ध करने वाले विराट ने भय से विचलित मन होकर उत्तर को जवाब दिया—

विराट उवाच

श्लोक 18 (4.72.18)

पुत्र ते विजयं श्रुत्वा प्रहृष्टोऽहं मुदा भृशम् । अक्षक्रीडनयाऽनेन कालक्षेपमकारिषम् ॥

putra te vijayaṃ śrutvā prahṛṣṭo'haṃ mudā bhṛśam | akṣakrīḍanayā'nena kālakṣepamakāriṣam

"पुत्र, तुम्हारी विजय सुनकर मैं अत्यन्त प्रसन्न हुआ और इसके साथ पासों का खेल खेलकर समय बिता रहा था।

श्लोक 19 (4.72.19)

तत्राजयत्कुरून्सर्वानुत्तरो राष्ट्रवर्धनः । इत्युक्तं हि मया पुत्र नेति कङ्को बृहन्नला । अजयत्सा कुरून्सर्वानिति मामब्रवीन्मुहुः ॥

tatrājayatkurūnsarvānuttaro rāṣṭravardhanaḥ | ityuktaṃ hi mayā putra neti kaṅko bṛhannalā | ajayatsā kurūnsarvāniti māmabravīnmuhuḥ

जब मैंने कहा कि 'वहाँ राज्य को समृद्ध करने वाले उत्तर ने सब कौरवों को जीत लिया', तब कङ्क ने कहा 'नहीं, बृहन्नला ने सब कौरवों को जीता है', और यही बात वह मुझसे बार-बार कहता रहा।

श्लोक 20 (4.72.20)

प्रशंसिते मया पुत्र विजये तव विश्रुते । बृहन्नलाया विजयं कङ्कोऽस्तुवत वै रुषा ॥

praśaṃsite mayā putra vijaye tava viśrute | bṛhannalāyā vijayaṃ kaṅko'stuvata vai ruṣā

पुत्र, जब मैंने तुम्हारी प्रसिद्ध विजय की प्रशंसा की, तब कङ्क ने रोष के साथ बृहन्नला की विजय का गुणगान किया।

श्लोक 21 (4.72.21)

मया प्रशस्यमाने तु त्वयि पण्डं प्रशंसति । बृहन्नलाप्रशंसाभिरभ्यसूयमहं तदा । ताडितोऽयं मया पुत्र दुरात्मा शत्रुपक्षकृत् ॥

mayā praśasyamāne tu tvayi paṇḍaṃ praśaṃsati | bṛhannalāpraśaṃsābhirabhyasūyamahaṃ tadā | tāḍito'yaṃ mayā putra durātmā śatrupakṣakṛt

मैं तुम्हारी प्रशंसा कर रहा था और यह एक नपुंसक की प्रशंसा कर रहा था; बृहन्नला की इन प्रशंसाओं से मैं तब चिढ़ उठा, और पुत्र, मैंने शत्रु का पक्ष लेने वाले इस दुष्ट को मारा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (4.72.22)

ताडितोऽयं यतिः कङ्क इत्युक्तं तद्वचोत्तरः । श्रुत्वा पितुर्भृशं क्रुद्धः पितरं वाक्यमब्रवीत् ॥

tāḍito'yaṃ yatiḥ kaṅka ityuktaṃ tadvacottaraḥ | śrutvā piturbhṛśaṃ kruddhaḥ pitaraṃ vākyamabravīt

पिता की यह बात सुनकर कि 'मैंने इस संन्यासी कङ्क को मारा', उत्तर अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और पिता से बोला—

उत्तर उवाच

श्लोक 23 (4.72.23)

अकार्यं ते कृतं राजन्क्षिप्रमेष प्रसाद्यताम् । मा त्वा ब्रह्मविषं घोरं समूलमुपनिर्दहेत् ॥

akāryaṃ te kṛtaṃ rājankṣiprameṣa prasādyatām | mā tvā brahmaviṣaṃ ghoraṃ samūlamupanirdahet

"राजन्, आपने अनुचित कर्म किया है। इन्हें तुरन्त प्रसन्न कीजिए, कहीं ब्राह्मण के क्रोध का भयानक विष आपको जड़ सहित न जला डाले।

श्लोक 24 (4.72.24)

यावन्न क्षयमायाति कुलं सर्वमशेषतः । स्फीतं वृद्धं च मात्स्यानामयं तावत्प्रसाद्यताम् ॥

yāvanna kṣayamāyāti kulaṃ sarvamaśeṣataḥ | sphītaṃ vṛddhaṃ ca mātsyānāmayaṃ tāvatprasādyatām

इससे पहले कि मत्स्यों का समृद्ध और प्राचीन कुल पूरी तरह नष्ट हो जाए, इन्हें प्रसन्न कर लीजिए।

श्लोक 25 (4.72.25)

प्रणम्य पादयोरस्य दण्डवत्क्षितिमण्डले । प्रगृह्य पादौ पाणिभ्यामयं तावत्प्रसाद्यताम् ॥

praṇamya pādayorasya daṇḍavatkṣitimaṇḍale | pragṛhya pādau pāṇibhyāmayaṃ tāvatprasādyatām

दण्ड की भाँति भूमि पर लेटकर इनके चरणों में प्रणाम कीजिए, दोनों हाथों से इनके पैर पकड़िए और इन्हें प्रसन्न कीजिए—

श्लोक 26 (4.72.26)

दक्षेण पाणिना स्पृष्ट्वा शपे त्वां क्षपितं मया । इति यावद्वदेत्कङ्क अयं तावत्प्रसाद्यताम् ॥

dakṣeṇa pāṇinā spṛṣṭvā śape tvāṃ kṣapitaṃ mayā | iti yāvadvadetkaṅka ayaṃ tāvatprasādyatām

तब तक इन्हें मनाइए जब तक कङ्क अपने दाहिने हाथ से आपको छूकर यह न कहें कि 'मैं शपथपूर्वक कहता हूँ, मैंने तुम्हारा अपराध मिटा दिया।'"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (4.72.27)

स पुत्रस्य वचः श्रुत्वा विराटः साध्वसाकुलः । क्षमयामास कौन्तेयं छन्नं ब्राह्मणवर्चसा ॥

sa putrasya vacaḥ śrutvā virāṭaḥ sādhvasākulaḥ | kṣamayāmāsa kaunteyaṃ channaṃ brāhmaṇavarcasā

पुत्र की बात सुनकर भय से व्याकुल विराट ने ब्राह्मण के वेश में छिपे कुन्तीपुत्र से क्षमा माँगी।

श्लोक 28 (4.72.28)

क्षमयन्तं तु राजानं पाण्डवः प्रत्यभाषत । चिरं क्षान्तं मया राजन्मन्युर्मम न विद्यते ॥

kṣamayantaṃ tu rājānaṃ pāṇḍavaḥ pratyabhāṣata | ciraṃ kṣāntaṃ mayā rājanmanyurmama na vidyate

क्षमा माँगते हुए राजा से पाण्डव ने कहा—"राजन्, मैंने तो कब का क्षमा कर दिया; मेरे मन में कोई क्रोध नहीं है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 29 (4.72.29)

यदि स्म तत्पतेद्भूमौ रुधिरं मम पार्थिव । सराष्ट्रस्त्वमिहोच्छेदमापद्येथा नरर्षभ ॥

yadi sma tatpatedbhūmau rudhiraṃ mama pārthiva | sarāṣṭrastvamihocchedamāpadyethā nararṣabha

हे पृथ्वीपति, यदि मेरा वह रक्त भूमि पर गिर जाता, तो हे नरश्रेष्ठ, तुम अपने राज्य सहित यहीं नष्ट हो जाते।

श्लोक 30 (4.72.30)

न दूषयामि राजेन्द्र यस्तु हन्याददूषकम् । फलं तस्य महाराज क्षिप्रं दारुणमाप्नुयात् ॥

na dūṣayāmi rājendra yastu hanyādadūṣakam | phalaṃ tasya mahārāja kṣipraṃ dāruṇamāpnuyāt

राजेन्द्र, मैं तुम्हें दोष नहीं देता; पर महाराज, जो निर्दोष को मारता है, उसे शीघ्र ही उसका भयानक फल मिलता है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (4.72.31)

शोणिते तु व्यतिक्रान्ते प्रविवेश बृहन्नला । अभिवाद्य महाराजं कङ्कं चाप्युपतिष्ठत ॥

śoṇite tu vyatikrānte praviveśa bṛhannalā | abhivādya mahārājaṃ kaṅkaṃ cāpyupatiṣṭhata

जब रक्त बहना थम गया, तब बृहन्नला ने प्रवेश किया, महाराज को प्रणाम किया और कङ्क के पास भी गई।

श्लोक 32 (4.72.32)

क्षमयित्वा तु कौरव्यं रणादुत्तरमागतम् । परिष्वज्य दृढं राजा प्रवेश्य भवनोत्तमम् । प्रशशंस ततो मात्स्यः शृण्वतः सव्यसाचिनः ॥

kṣamayitvā tu kauravyaṃ raṇāduttaramāgatam | pariṣvajya dṛḍhaṃ rājā praveśya bhavanottamam | praśaśaṃsa tato mātsyaḥ śṛṇvataḥ savyasācinaḥ

कौरव युधिष्ठिर से क्षमा माँग लेने के बाद राजा ने युद्ध से लौटे उत्तर को कसकर गले लगाया, उसे अपने श्रेष्ठ भवन में ले गया, और फिर सव्यसाची अर्जुन के सुनते हुए मत्स्यराज उसकी प्रशंसा करने लगा।

विराट उवाच

श्लोक 33 (4.72.33)

त्वया दायादवानस्मि कैकेयीनन्दिवर्धन । त्वया मे सदृशः पुत्रो न भूतो न भविष्यति ॥

tvayā dāyādavānasmi kaikeyīnandivardhana | tvayā me sadṛśaḥ putro na bhūto na bhaviṣyati

"हे कैकेयी को आनन्द देने वाले, तुम्हारे कारण ही मैं सच्चा पुत्रवान हूँ। तुम्हारे समान पुत्र न कभी हुआ है, न होगा।

श्लोक 34 (4.72.34)

पदं पदसहस्रेण यश्चरन्नापराध्नुयात् । तेन कर्णेन ते तात कथमासीत्समागमः ॥

padaṃ padasahasreṇa yaścarannāparādhnuyāt | tena karṇena te tāta kathamāsītsamāgamaḥ

पुत्र, उस कर्ण से तुम्हारी भिड़न्त कैसी रही, जो एक साथ हज़ार लक्ष्यों पर बाण चलाकर भी एक भी लक्ष्य नहीं चूकता?

श्लोक 35 (4.72.35)

रणे यं प्रेक्ष्य सीदन्ति हृतवीर्यपराक्रमाः । कृपेण तेन ते तात कथमासीत्समागमः ॥

raṇe yaṃ prekṣya sīdanti hṛtavīryaparākramāḥ | kṛpeṇa tena te tāta kathamāsītsamāgamaḥ

पुत्र, उस कृप से तुम्हारा सामना कैसा रहा, जिसे युद्ध में देखते ही योद्धाओं का बल और पराक्रम हर लिया जाता है और वे शिथिल पड़ जाते हैं?

श्लोक 36 (4.72.36)

यस्य तद्विश्रुतं लोके महद्वृत्तमनुत्तमम् । पितुः कृते कृतं घोरं ब्रह्मचर्यमनुत्तमम् ॥

yasya tadviśrutaṃ loke mahadvṛttamanuttamam | pituḥ kṛte kṛtaṃ ghoraṃ brahmacaryamanuttamam

जिसका महान और अनुपम आचरण संसार में प्रसिद्ध है—पिता के लिए उसने ब्रह्मचर्य का कठोर और अनुपम व्रत लिया;

श्लोक 37 (4.72.37)

योऽयोधीत्समरे रामं जामदग्न्यं प्रतापिनम् । भीष्मोऽसौ पुरुषव्याघ्र न च युद्धे पराजितः ॥

yo'yodhītsamare rāmaṃ jāmadagnyaṃ pratāpinam | bhīṣmo'sau puruṣavyāghra na ca yuddhe parājitaḥ

जिसने युद्ध में प्रतापी जमदग्निपुत्र परशुराम से लोहा लिया—हे पुरुषसिंह, वह भीष्म युद्ध में कभी पराजित नहीं हुआ;

श्लोक 38 (4.72.38)

पराक्रमी च दुर्धर्षो विद्वाञ्शूरो जितेन्द्रियः । दृढवेधी क्षिप्रकारी विश्रुतः सर्वकर्मसु ॥

parākramī ca durdharṣo vidvāñśūro jitendriyaḥ | dṛḍhavedhī kṣiprakārī viśrutaḥ sarvakarmasu

जो पराक्रमी, दुर्जेय, विद्वान, शूर और जितेन्द्रिय है, दृढ़ता से बेधने वाला और शीघ्र बाण चलाने वाला है, और सब कर्मों में विख्यात है—

श्लोक 39 (4.72.39)

तेन ते सह भीष्मेण कुरुवृद्धेन संयुगे । युद्धमासीत्कथं तात सर्वमेतद्ब्रवीहि मे ॥

tena te saha bhīṣmeṇa kuruvṛddhena saṃyuge | yuddhamāsītkathaṃ tāta sarvametadbravīhi me

पुत्र, कुरुओं के उस वृद्ध भीष्म के साथ युद्ध में तुम्हारी लड़ाई कैसी रही? यह सब मुझे बताओ।

श्लोक 40 (4.72.40)

पर्वतं यो विनिर्भिन्द्याद्राजपुत्रो वरेषुभिः । दुर्योधनेन ते तात कथमासीत्समागमः ॥

parvataṃ yo vinirbhindyādrājaputro vareṣubhiḥ | duryodhanena te tāta kathamāsītsamāgamaḥ

पुत्र, उस राजकुमार दुर्योधन से तुम्हारा सामना कैसा रहा, जो अपने उत्तम बाणों से पर्वत को भी चीर दे?

श्लोक 41 (4.72.41)

आचार्यो वृष्णिवीराणां पाञ्चालानां च यः प्रभुः । कुरूणां पाण्डवानां च सर्वक्षत्रस्य यो गुरुः ॥

ācāryo vṛṣṇivīrāṇāṃ pāñcālānāṃ ca yaḥ prabhuḥ | kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca sarvakṣatrasya yo guruḥ

जो वृष्णि वीरों के आचार्य और पाञ्चालों के स्वामी हैं, कौरवों, पाण्डवों और समस्त क्षत्रियों के गुरु हैं,

श्लोक 42 (4.72.42)

सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठः सर्वलोकेषु विश्रुतः । तेन द्रोणेन ते तात कथमासीत्समागमः ॥

sarvaśastrabhṛtāṃ śreṣṭhaḥ sarvalokeṣu viśrutaḥ | tena droṇena te tāta kathamāsītsamāgamaḥ

जो सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ और सब लोकों में प्रसिद्ध हैं—पुत्र, उन द्रोण से तुम्हारा सामना कैसा रहा?

श्लोक 43 (4.72.43)

आचार्यपुत्रो यः शूरो द्रोणादनवमो रणे । तेन वीरेण ते तात कथमासीत्समागमः ॥

ācāryaputro yaḥ śūro droṇādanavamo raṇe | tena vīreṇa te tāta kathamāsītsamāgamaḥ

पुत्र, आचार्य के उस शूर पुत्र से, जो युद्ध में द्रोण से कम नहीं, तुम्हारा सामना कैसा रहा?

श्लोक 44 (4.72.44)

सर्वे चैव महावीर्या धार्तराष्ट्रा महारथाः । तैस्तैर्वीरैश्च ते तात कथमासीत्समागमः ॥

sarve caiva mahāvīryā dhārtarāṣṭrā mahārathāḥ | taistairvīraiśca te tāta kathamāsītsamāgamaḥ

और धृतराष्ट्र के सभी महापराक्रमी महारथी पुत्र—पुत्र, उन-उन वीरों से तुम्हारा सामना कैसा रहा?"

उत्तर उवाच

श्लोक 45 (4.72.45)

न मया निर्जिता गावो न मया कुरवो जिताः । कृतं च कर्म तत्सर्वं देवपुत्रेण केनचित् ॥

na mayā nirjitā gāvo na mayā kuravo jitāḥ | kṛtaṃ ca karma tatsarvaṃ devaputreṇa kenacit

"गौएँ मैंने नहीं जीतीं, न कौरवों को मैंने हराया। वह सारा कार्य किसी देवपुत्र ने किया।

श्लोक 46 (4.72.46)

स हि भीतं द्रवन्तं मां भीष्मद्रोणमुखान्कुरून् । दृष्ट्वा विषण्णं संग्रामे देवपुत्रो न्यवारयत् ॥

sa hi bhītaṃ dravantaṃ māṃ bhīṣmadroṇamukhānkurūn | dṛṣṭvā viṣaṇṇaṃ saṃgrāme devaputro nyavārayat

जब मैं भीष्म और द्रोण आदि कौरवों को देखकर युद्ध में घबराकर भयभीत हो भाग रहा था, तब उस देवपुत्र ने मुझे रोका।

श्लोक 47 (4.72.47)

स हि तिष्ठन्रथोपस्थे वज्रपाणिनिभो युवा । तेन ते निर्जिता गावस्तेन ते कुरवो जिताः ॥

sa hi tiṣṭhanrathopasthe vajrapāṇinibho yuvā | tena te nirjitā gāvastena te kuravo jitāḥ

वज्रधारी इन्द्र के समान वह युवक रथ पर डटा रहा; उसी ने आपकी गौएँ जीतीं और उसी ने कौरवों को हराया।

श्लोक 48 (4.72.48)

तस्य तत्कर्म वीरस्य न मया तात तत्कृतम् । स हि शारद्वतं द्रोणं द्रोणपुत्रं च वीर्यवान् । सूतपुत्रं च भीष्मं च चकार विमुखाञ्शरैः ॥

tasya tatkarma vīrasya na mayā tāta tatkṛtam | sa hi śāradvataṃ droṇaṃ droṇaputraṃ ca vīryavān | sūtaputraṃ ca bhīṣmaṃ ca cakāra vimukhāñśaraiḥ

पिताजी, वह कर्म उसी वीर का है, मेरा नहीं। उसी पराक्रमी ने अपने बाणों से शरद्वान् के पुत्र कृप, द्रोण, द्रोणपुत्र, सूतपुत्र कर्ण और भीष्म को रण से विमुख कर दिया।

श्लोक 49 (4.72.49)

दुर्योधनं च समरे प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् । प्रभग्नमब्रवीद्भीतं राजपुत्रं महाबलम् ॥

duryodhanaṃ ca samare prabhinnamiva kuñjaram | prabhagnamabravīdbhītaṃ rājaputraṃ mahābalam

और युद्ध में मदमत्त हाथी के समान महाबली राजकुमार दुर्योधन से, जब वह पराजित और भयभीत था, उसने कहा—

श्लोक 50 (4.72.50)

न हास्तिनपुरे त्राणं तव पश्यामि किंचन । न हास्तिनपुरे भोगा भोक्तुं शक्याः पलायता ॥

na hāstinapure trāṇaṃ tava paśyāmi kiṃcana | na hāstinapure bhogā bhoktuṃ śakyāḥ palāyatā

'मुझे हस्तिनापुर में तुम्हारे लिए कोई शरण नहीं दिखती; भागने वाला हस्तिनापुर के भोगों का उपभोग नहीं कर सकता।

श्लोक 51 (4.72.51)

व्यायामेन परीप्सस्व जीवितं कौरवात्मज । न मोक्ष्यसे पलायंस्त्वं लोके युद्धमना भव । पृथिवीं भोक्ष्यसे जित्वा हतो वा स्वर्गमाप्स्यसि ॥

vyāyāmena parīpsasva jīvitaṃ kauravātmaja | na mokṣyase palāyaṃstvaṃ loke yuddhamanā bhava | pṛthivīṃ bhokṣyase jitvā hato vā svargamāpsyasi

हे कुरुपुत्र, पराक्रम से अपने प्राण बचाने का यत्न करो। भागकर तुम संसार में कहीं नहीं बच सकोगे; युद्ध में मन लगाओ। जीतोगे तो पृथ्वी का भोग करोगे, मारे गए तो स्वर्ग पाओगे।'

श्लोक 52 (4.72.52)

स निवृत्तो नरव्याघ्रो मुञ्चन्वज्रनिभाञ्शरान् । सचिवैः संवृतो राजा भीष्मद्रोणकृपादिभिः । ततो मे रोमहर्षोऽभूदूरुस्तम्भश्च मेऽभवत् ॥

sa nivṛtto naravyāghro muñcanvajranibhāñśarān | sacivaiḥ saṃvṛto rājā bhīṣmadroṇakṛpādibhiḥ | tato me romaharṣo'bhūdūrustambhaśca me'bhavat

तब वह नरसिंह राजा दुर्योधन भीष्म, द्रोण, कृप आदि सहायकों से घिरा हुआ वज्र जैसे बाण छोड़ता हुआ लौट पड़ा। उस समय मेरे रोंगटे खड़े हो गए और मेरी जाँघें जड़ हो गईं।

श्लोक 53 (4.72.53)

यदभूद्घनसंकाशमनीकं व्यधमच्छरैः । तत्प्रणुद्य रथानीकं सिंहदर्पसमो युवा । तान्कुरून्द्रावयद्राजन्रणे नाग इव श्वसन् ॥

yadabhūdghanasaṃkāśamanīkaṃ vyadhamaccharaiḥ | tatpraṇudya rathānīkaṃ siṃhadarpasamo yuvā | tānkurūndrāvayadrājanraṇe nāga iva śvasan

बादलों की घटा जैसी उस सेना को उसने बाणों से छिन्न-भिन्न कर दिया; सिंह जैसे दर्प वाले उस युवक ने रथ-सेना को पीछे धकेलकर, हे राजन्, युद्ध में फुफकारते हाथी की भाँति उन कौरवों को भगा दिया।

श्लोक 54 (4.72.54)

एकेन तेन शूरेण षड्रथाः परिनिर्जिताः । शार्दूलेनेव मत्तेन मृगास्तृणचरा यथा ॥

ekena tena śūreṇa ṣaḍrathāḥ parinirjitāḥ | śārdūleneva mattena mṛgāstṛṇacarā yathā

उस अकेले वीर ने छह रथियों को परास्त कर दिया, जैसे मदमत्त बाघ घास चरने वाले हिरणों को परास्त कर देता है।

श्लोक 55 (4.72.55)

हयानां च गजानां च शूराणां च धनुष्मताम् । निहतानि सहस्राणि भग्ना च कुरुवाहिनी ॥

hayānāṃ ca gajānāṃ ca śūrāṇāṃ ca dhanuṣmatām | nihatāni sahasrāṇi bhagnā ca kuruvāhinī

हज़ारों घोड़े, हाथी, शूरवीर और धनुर्धर मारे गए और कौरव सेना छिन्न-भिन्न हो गई।

श्लोक 56 (4.72.56)

सूतपुत्रं शतैर्विद्ध्वा हयान्हत्वा महारथः । अस्त्रेण मोहयित्वा तं रक्तवस्त्रं समाददे ॥

sūtaputraṃ śatairviddhvā hayānhatvā mahārathaḥ | astreṇa mohayitvā taṃ raktavastraṃ samādade

उस महारथी ने सूतपुत्र को सैकड़ों बाणों से बेधकर, उसके घोड़ों को मारकर और अस्त्र से उसे मूर्च्छित करके उसका लाल वस्त्र ले लिया।

श्लोक 57 (4.72.57)

चतुर्भिः पुनरानर्च्छद्भीष्मं शान्तनवं शरैः । स तं विद्ध्वा हयांश्चाशु नास्य वस्त्रं समाददे ॥

caturbhiḥ punarānarcchadbhīṣmaṃ śāntanavaṃ śaraiḥ | sa taṃ viddhvā hayāṃścāśu nāsya vastraṃ samādade

फिर उसने शान्तनुपुत्र भीष्म पर चार बाणों से प्रहार किया; उन्हें और उनके घोड़ों को शीघ्र बेधकर भी उसने उनका वस्त्र नहीं लिया।

श्लोक 58 (4.72.58)

दुर्योधनं च बलवान्बाणैर्विव्याध सप्तभिः । तं स विद्ध्वा हयांश्चास्य पीतवस्त्रं समाददे ॥

duryodhanaṃ ca balavānbāṇairvivyādha saptabhiḥ | taṃ sa viddhvā hayāṃścāsya pītavastraṃ samādade

उस बलवान ने दुर्योधन को सात बाणों से बेधा; उसे और उसके घोड़ों को बेधकर उसने उसका पीला वस्त्र ले लिया।

श्लोक 59 (4.72.59)

द्रोणं कृपं च बलवान्सोमदत्तं जयद्रथम् । भूरिश्रवसमिन्द्राभं शकुनिं च महारथम् ॥

droṇaṃ kṛpaṃ ca balavānsomadattaṃ jayadratham | bhūriśravasamindrābhaṃ śakuniṃ ca mahāratham

द्रोण और कृप, सोमदत्त और जयद्रथ, इन्द्र के समान तेजस्वी भूरिश्रवा और महारथी शकुनि—

श्लोक 60 (4.72.60)

त्रिभिस्त्रिभिः स विद्ध्वा तु दुःशासनमुखानपि । विविधानि च वस्त्राणि महार्हाण्याजहार सः ॥

tribhistribhiḥ sa viddhvā tu duḥśāsanamukhānapi | vividhāni ca vastrāṇi mahārhāṇyājahāra saḥ

इन्हें तथा दुःशासन आदि को भी उसने तीन-तीन बाणों से बेधा और उनके तरह-तरह के बहुमूल्य वस्त्र छीन लिए।

श्लोक 61 (4.72.61)

द्वाभ्यां शराभ्यां विद्ध्वाऽथ तथाऽऽचार्यसुतं रणे । चापं छित्त्वा विकर्णस्य नीले चादत्त वाससी ॥

dvābhyāṃ śarābhyāṃ viddhvā'tha tathā''cāryasutaṃ raṇe | cāpaṃ chittvā vikarṇasya nīle cādatta vāsasī

फिर युद्ध में आचार्यपुत्र अश्वत्थामा को दो बाणों से बेधकर उसने विकर्ण का धनुष काट डाला और उसके दो नीले वस्त्र ले लिए।"

विराट उवाच

श्लोक 62 (4.72.62)

क्व स वीरो महाबाहुर्देवपुत्रो महायशाः । यो ममामोचयत्पुत्रं कुरुभिर्ग्रस्तमाहवे ॥

kva sa vīro mahābāhurdevaputro mahāyaśāḥ | yo mamāmocayatputraṃ kurubhirgrastamāhave

"वह महाबाहु, महायशस्वी देवपुत्र वीर कहाँ है, जिसने युद्ध में कौरवों के बीच फँसे मेरे पुत्र को छुड़ाया?

श्लोक 63 (4.72.63)

इच्छामि तममित्रघ्नं द्रष्टुमर्चितुमेव च । येन मे त्वं च गावश्च मोक्षिता देवसूनुना ॥

icchāmi tamamitraghnaṃ draṣṭumarcitumeva ca | yena me tvaṃ ca gāvaśca mokṣitā devasūnunā

मैं शत्रुओं का संहार करने वाले उस देवपुत्र को देखना और उसका पूजन करना चाहता हूँ, जिसने तुम्हें और गौओं को छुड़ाया।

श्लोक 64 (4.72.64)

तस्मै दास्यामि तां पुत्रीं ग्रामांश्चैव तु हाटकान् । स्फुरितं कटिसूत्रं च स्त्रीसहस्रशतानि च ॥

tasmai dāsyāmi tāṃ putrīṃ grāmāṃścaiva tu hāṭakān | sphuritaṃ kaṭisūtraṃ ca strīsahasraśatāni ca

उसे मैं अपनी पुत्री दूँगा, गाँव और सोना, चमचमाती करधनी और लाखों स्त्रियाँ दूँगा।"

उत्तर उवाच

श्लोक 65 (4.72.65)

अन्तर्धानं गतस्तात देवपुत्रः प्रतापवान् । अद्य श्वो वा परश्वो वा मन्ये प्रादुर्भविष्यति ॥

antardhānaṃ gatastāta devaputraḥ pratāpavān | adya śvo vā paraśvo vā manye prādurbhaviṣyati

"पिताजी, वह प्रतापी देवपुत्र अन्तर्धान हो गया। मुझे लगता है कि वह आज, कल या परसों फिर प्रकट होगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 66 (4.72.66)

एवमाख्यायमानस्तु छन्नं सत्रेण पाण्डवम् । वसन्तं तं तु नाज्ञासीद्विराटः पार्थमर्जुनम् ॥

evamākhyāyamānastu channaṃ satreṇa pāṇḍavam | vasantaṃ taṃ tu nājñāsīdvirāṭaḥ pārthamarjunam

इस प्रकार बताए जाने पर भी विराट वहाँ वेश बदलकर रहते हुए पाण्डुपुत्र अर्जुन को नहीं पहचान सका।

श्लोक 67 (4.72.67)

ततः पार्थोऽभ्यनुज्ञातो विराटेन महात्मना । सह पुत्रेण मात्स्यस्य मन्त्रयित्वा धनंजयः ॥

tataḥ pārtho'bhyanujñāto virāṭena mahātmanā | saha putreṇa mātsyasya mantrayitvā dhanaṃjayaḥ

तब महात्मा विराट की अनुमति पाकर पार्थ धनञ्जय ने मत्स्यराज के पुत्र से मन्त्रणा की

श्लोक 68 (4.72.68)

इत्येवं ब्रूहि राजानं विराटं समुपस्थितम् । इत्युक्त्वा सहसा पार्थः प्रविश्यान्तःपुरं शुभम् । ददौ वस्त्राणि रत्नानि विराटदुहितुः स्वयम् ॥

ityevaṃ brūhi rājānaṃ virāṭaṃ samupasthitam | ityuktvā sahasā pārthaḥ praviśyāntaḥpuraṃ śubham | dadau vastrāṇi ratnāni virāṭaduhituḥ svayam

और कहा—'उपस्थित राजा विराट से तुम इतना ही कहना।' यह कहकर पार्थ तुरन्त सुन्दर अन्तःपुर में गया और उसने स्वयं विराट की पुत्री को वे वस्त्र और रत्न दिए।

श्लोक 69 (4.72.69)

उत्तरा तु महार्हाणि वस्त्राण्याभरणानि च । प्रगृह्य तानि सर्वाणि प्रीता सानुचराऽभवत् ॥

uttarā tu mahārhāṇi vastrāṇyābharaṇāni ca | pragṛhya tāni sarvāṇi prītā sānucarā'bhavat

उत्तरा उन सब बहुमूल्य वस्त्रों और आभूषणों को लेकर अपनी सहेलियों सहित प्रसन्न हो उठी।

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